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घरेलू हिंसा और अमानवीय क्रूरता से पीड़ित स्त्री को मदद करें और मुक्त कराएँ।

समस्या-

सत्यम ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी एक फ्रेंड है, उसका हस्बैंड उसको मारता पीटता है, मेंटली टॉर्चर करता है, बिना बात के ही लड़ता रहता है। आज तो उसने हद ही कर दी, सुबह से बिना बात के लड़ने लगा और बोलता है कि मेरे घर में सिगड़ी नहीं चलना चाहिए। वाइफ बोलती है, सिगड़ी ना जलाओ तो मर जाऊं क्या ठंड में। तो हस्बैंड बोलता है कि मर जा, अब यदि सिगड़ी जलाई तो वही सिगड़ी तेरे ऊपर डाल दूंगा जलती हुई। उस लड़की की लाइफ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। घर से निकलने नहीं देता। किसी रिलेटिव पहचान वालों के यहां जाने नहीं देता। कहता है कि मैं जिस से बोलूंगा उससे मिलेगी, उससे बात करेगी, नहीं तो किसी से नहीं करेगी। बिना बात के लड़ता रहता है। लड़की को डिवोर्स भी नहीं देता है, बोलता है कि मैं तुझे छोड़ने नहीं दूंगा। सबसे ज्यादा शक करता। उसको कहीं आना जाना नहीं देता और मारने के लिए हाथ उठाता है। एक दो बार मारा भी। लड़के की फिजिकल रिलेशन किसी और के साथ है शायद। वह दूसरी लड़के को घर में लाना चाहता है। लड़की बोलती है कि तेरे को देख के साथ रहना है, जिसको लाना है ले आ। बस मुझे शांति से रहने दे। इस पर लड़का बोलता कि मैं ना तुझे जीने दूंगा, ना मरने दूंगा। लड़की करे तो क्या करे? लड़की के पास कोई सबूत नहीं है कि उसका हस्बैंड कहीं और रिलेशन में है। लड़की का साथ देने वाला कोई नहीं है कि वह अपने हस्बैंड के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा सके। लड़की तो अपने हस्बैंड से बात करना पसंद नहीं करती, तो क्या करें? कोई रास्ता बताइए।

समाधान-

लड़की के साथ घरेलू हिंसा हो रही है। भंयकर अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार किया जा रहा है। मारपीट भी हुई है। यह सब विवाह विच्छेद के लिए पर्याप्त है। इस के अलावा धारा 498ए आपीसी में संज्ञेय अपराध भी है, जिस की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यह रिपोर्ट कोई भी परिजन या मित्र भी कर सकता है।

न्यायालय में किसी भी मामले में निर्णय होने में हमारे यहाँ समय लगता है। इस का मुख्य कारण हमारे मुल्क के पास जरूरत की चौथाई अदालतें भी नहीं होना है। अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 140 अदालतें हैं जब कि भारत में मात्र 12 इस तरह वहाँ के अनुपात में हमारी अदालतों की संख्या 8 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सभी तरह के विक्टिम पुलिस या न्यायालय के पास जाने के बजाए यातनाएँ भुगतते रहते हैं। इसी कारण अनेक प्रकार के अपराध पलते रहते हैं। हर रिपोर्ट कराने आने वाले को हतोत्साहित करती है कि रिपोर्ट कराने के बजाए भुगतते रहो, क्यों कि उसे भी अपने रिकार्ड में अपराध कम दिखाने होते हैं।

जहाँ तक स्त्रियों का मामला है वे तब तक पुलिस के पास जाने में झिझकती हैं जब तक कि उन्हें यह पक्का विश्वास न हो जाए कि उन के पास जीवन जीने और सुरक्षा के पर्याप्त विकल्प हैं। जब कभी कोई परिचित इस तरह की रिपोर्ट करा भी दे तो स्त्रियाँ पुलिस के या अपने पति व ससुराल वालों के दबाव के कारण टूट जाती हैं और कह देती हैं कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहती। वैसी स्थिति में वह परिचित बहुत बुरी स्थिति में फँस जाता है। अक्सर लड़की के मायके वाले भी उस का साथ नहीं देते, क्यों कि हमारा तो विचार ही यह है कि लड़कियाँ परायी होती हैं। इस विचार के अनुसार लड़कियाँ समाज में सब के लिए पराई होती हैं, वे कभी किसी की अपनी नहीं होतीं।

इस मामले में यदि आप मन, वचन कर्म से चाहते हैं कि लड़की उन यातनाओं से मुक्त हो अच्छा जीवन जिए तो आप को उसे विश्वास दिलाना होगा कि उस के पास सुरक्षित जीवन  जीने के न्यूनतम वैकल्पिक साधन हैं। आप को भी प्रयास करना होगा कि वह किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। तभी वह यह लड़ाई लड़ सकती है। यदि आप आश्वस्त हैं कि लड़की को न्यूनतम वैकल्पिक जीवन साधन उपलब्ध होने का विश्वास दिला सकते हैं तो आप पुलिस को रिपोर्ट करें, पुलिस कार्यवाही न करे तो एस.पी. को मिलें। यदि फिर भी काम न चले तो मजिस्ट्रेट को शिकायत दें। लड़की को उस के पति की कारा से मुक्ति दिलाएँ।

लड़की के मुक्त हो जाने पर उस की ओर से विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन, धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण के लिए परिवार न्यायलय में आवेदन प्रस्तुत कराएँ। घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण, वैकल्पिक आवास तथा लड़की के आसपास न फटकने के लिए निषेधात्मक आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं। इस से लड़की को जो मदद आप अभी उपलब्ध करा रहे हैं उस की जरूरत कम हो जाएगी।  आप लड़की को कोई नियोजन दिला कर उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें। उसे नियोजन मिल जाने पर वह स्वावलंबी हो जाएगी। जब उस का विवाह विच्छेद हो जाए तो वह निर्णय कर सकती है कि उसे एकल स्त्री की तरह जीना है अथवा एक अच्छा जीवन साथी तलाश कर उस के साथ जीवन व्यतीत करना है।

पति के अत्याचारों के विरुद्ध शिकायत करें और मुकदमा करें, आत्महत्या का विचार तुरन्त त्याग दें।

समस्या-

रोशनी खातून ने ग्राम हमीरपुर जिला कटिहार, बिहार से पूछा है-

मैं मुस्लिम धर्म से हूँ। मेरी शादी 7 महीने पहले हुई थी मेरे पति मेरे साथ मारपीट और दहेज़ की मांग करते थे।  उसके खिलाफ महिला थाना में आवेदन दिया।  थाने में उस ने दरोगा को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। एक एफिडेविट दिया कि मारपीट नहीं करेंगे और पति-पत्नी की तरह रहेंगे और थाने से ही मेरी विदाई हुई। ससुराल पहुँचने के बाद फिर से वही ताने, मारपीट, दहेज़ की डिमांड होने लगी। फिर मैंने अपनी माँ को फ़ोन कर के बताया तो वो मुझे ससुराल से मायके ले आयी।

अब मैं 2 महीने से गर्भवती हूँ , इसकी सूचना अपने पति को फ़ोन करके दी तो कहता है मैंने तुमसे शादी ही नहीं की है, तो ये मेरा बच्चा कैसा हुआ। अब मैं क्या करूँ? गर्भपात कराऊँ या बच्चे को इस दुनिया में आने दूँ। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा ? मेरे पति मुझसे शादी सिर्फ दहेज़ के लिए किये थे।

अब वो दूसरी शादी करने वाले हैं। क्या वो मुझसे बिना तलाक लिए शादी कर सकता है?  इस बच्चे का क्या करूँ?  उसपर कौन सा केस करूँ।  केस कितने सालों तक चलेगा? क्या शादी में दिया हुआ सामान वो वापस करेगा? समाज में मेरे परिवार की बदनामी हो रही है, इसलिए मैं आत्महत्या करने की सोच रही हूँ क्यूंकि क़ानून से न्याय मिलने में मुझे पता नहीं कितने साल लग जाएंगे। कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प के विवाह को सात माह हुए हैं और उस में आप पर तमाम कहर टूट पड़े हैं। आप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को ले कर आत्महत्या करने की सोचना बिलकुल भी ठीक नहीं है। आपने और न ही आप के परिवार ने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिस से बदनामी हो।  बदनामी तो उस शख्स और परिवार की होनी चाहिए जिस ने आप के साथ इंसान की तरह नहीं। होता यह है कि जब भी कोई गलत काम करता है तो उस का परिणाम आने के पहले ही झूठा प्रचार आरंभ कर देता है। इस से पीड़ित पक्ष को लगता है कि उस की बदनामी हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप को चाहिए कि आप धीरज रखें और अपने विरुद्ध हुई ज्यादतियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें।

आप को जब एक बार शपथ पत्र दे कर आप का पति ले गया था और उस के विपरीत उस ने व्यवहार किया है तो आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। आप का कहना है कि पहले पुलिस ने पैसा खा कर काम नहीं किया। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। आम तौर पर पुलिस को यह निर्देश हैं कि पहली बार में पति पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। उस दफे भी आप यदि जाने से इन्कार कर देतीं तो पुलिस किसी हालत में समझौता नहीं कराती। हो सकता है यह करते हुए भी पुलिस के किसी अधिकारी ने सामने वाले पक्ष से पैसा लिया हो। लेकिन आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए कि आपके साथ फिर से मारपीट हुई है, ताने मारे गए हैं, दहेज मांगा गया है जिस के कारण आपको पति का निवास छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। पति ने आप का तमान स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया है इस तरह पति ने धारा 323, 498ए, 406 आईपीसी का अपराध किया है। । यदि थाना रिपोर्ट करने से मना करे तो वही रिपोर्ट एक पत्र के साथ रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से एस.पी. को भेजनी चाहिए। यदि फिर भी कोई कार्यवाही न हो तो  मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकील की मदद से परिवाद दाखिल करना चाहिए। इस के अलावा मजिस्ट्रेट के न्यायालय में तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आवेदन दे कर भऱण पोषण की मासिक राशि की मांग करनी चाहिए।

यह सही है कि मुस्लिम विधि में चार विवाह तक किए जा सकते हैं। लेकिन यह भी प्रावधान है कि सभी पत्नियों को एक जैसा व्यवहार मिलना चाहिए तथा दूसरी शादी के लिए पहली की सहमति होनी चाहिए। आप चाहें तो दूसरा विवाह रुकवाने के लिए दीवानी अदालत से स्थायी व अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद व प्रार्थना कर सकती हैं। यदि फिर भी पति दूसरा विवाह कर ले तो आप को हक है कि आप भी अदालत से तलाक के लिए प्रार्थना पत्र दे कर तलाक ले सकें।

जहाँ तक गर्भ रह जाने की बात है। बच्चे का भविष्य तो अभी अनिश्चित ही है। पिता गंभीर नहीं है तो उसे पिता का प्रेम और स्नेह तो मिलने से रहा। वैसी स्थिति में हमारी नजर में उस का दुनिया में आना ठीक नहीं है। फिर भी यह निर्णय तो केवल माँ ही ले सकती है कि उसे अपनी संतान को दुनिया में लाना है या नहीं। यदि अभी गर्भाधान को तीन माह नहीं हुए हैं तो स्वैच्छिक गर्भपात कराया जा सकता है।

जहाँ तक मुकदमों के चलने के समय की बात है तो यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वहाँ अदालतों में कितने मुकदमें हैं। कितने ही मुकदमे चल रहे हों पर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आपके पास यही रास्ता है और आपको मजबूती के साथ इस लड़ाई को लड़ना चाहिए। आप अवश्य जीतेंगी।

हिंसा के बाद ससुराल से निकाल देने पर स्त्री के पास विधिक उपाय।

समस्या-

अनामिका ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे सास ससुर और जेठानी दवारा मुझे बहुत टॉर्चर किया गया। दहेज के लिए “कम लाई हो” के ताने दिए गए और जेठानी और सास ने मुझे मारा भी है। मेरे पति सब देखते हुए भी कुछ नहीं बोले, उन लोगो को। मेरे पति और जेठानी के बीच नाजायज़ संबंध है। इसका विरोध करने पर उन लोगो ने मुझे घर से निकाल दिया है। अब मैं क्या करूँ? मेरे पति उस औरत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और मुझे तलाक़ दे रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ? कृपया उचित सलाह दीजिए।

समाधान –

र उस महिला की समस्या घर है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और यदि है तो उस के बाद भी वह अपनी रिश्तेदारियों से अलग किसी मित्र समूह में नहीं है। वस्तुतः  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस का जन्म समूह में हुआ है और वह समूह के बिना नहीं रह सकता। एक स्त्री विवाह तक मायके में रहती है तब उस के साथ परिवार होता है। जैसे जैसे वह बड़ी होती है परिवार को इस की चिन्ता सताने लगती है कि अब उस की विदाई का समय आ गया है और वह विवाह कर के उसे विदा कर देता है। कुछ ही परिवार हैं जो यह सोचते हैं कि स्त्री को पहले आत्मनिर्भर बनाना चाहिए और उस के पास आत्मनिर्भर मित्रो का एक समूह भी होना चाहिए। स्त्री के लिए ये दो चीजें सब से अधिक जरूरी हैं। जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता या कम से कम ध्यान दिया जाता है। अभी आप के पास ये दो चीजें होतीं तो आप को कोई परेशानी नहीं होती, आप खुद अपनी समस्या से मुकाबला कर सकती थीं। आप ने अपनी समस्या में अपनी आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर मित्र समूह और मायके के बारे में कुछ नहीं बताया है।

आप के पति के अपनी भाभी के साथ संबंध वाली समस्या का कानून के पास कोई हल नहीं है। आप के साथ जो कुछ हुआ है उस के बाद आप का उस परिवार से संबंध तोड़ना, पति से तलाक लेना और टॉर्चर के लिए ससुराल वालों को सजा दिलाना ही आप का उपाय है। इस के लिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दे कर अपनी सुरक्षा, पृथक आवास की सुविधा और भरण पोषण की राशि प्रतिमाह प्राप्त करने के लिए तुरन्त आवेदन करना चाहिए। आप अपने साथा हुई हिंसा के लिए तथा आप के स्त्रीधन को पाने के लिए जो आप के पति के पास या ससुराल में रह गया है धारा 498ए तथा 406 भारतीय दंड संहिता में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती हैं और पुलिस द्वारा यथोचित कार्यवाही न करने पर न्यायलाय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के साथ ही धारा 13  हिन्दू विवाह अधिनियम में अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन  तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण राशि प्रतिमाह पाने के लिए आवेदन करने के उपाय आप के पास उपलब्ध हैं। बेहतर है कि आप अपने निकट के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर ये सब उपाय करने का प्रयत्न करें, देरी न करें।

माँ को घरेलू हिंसा व बँटवारे के लिए कार्यवाही करनी चाहिए।

rp_wrongfullconfinment12.jpgसमस्या-
विक्रम सिंह रावत ने गली नम्बर 112,बी ब्लाक, बुराड़ी, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मैं जब तीन साल का था तब मेरे नाना-नानी ने मुझे अपने पास रख लिया था। कुछ साल बाद मेरी माँ भी वहीं रहने आ गई। अब मेरी उम्र 39 और मेरी माँ की 57 साल हैं । मेरे पिताजी अलग रहते थे सन् 1997 में उनका स्वर्गवास हो गया। नाना जी ने हमको एक कमरा और किचन दे रखा था। नानाजी 1999 में गुजर गए थे। मेरे नाना जी के तीन बच्चे हैं जिस में सबसे बड़ी मेरी माँ और उसके बाद दो भाई हैं । नानाजी मरने से पहले कोई वसीयत नहीं करके गए। मकान 100 गज का है और यह 1970 में लिया गया था जो कि अभी भी नाना जी के नाम हैं। पिछले कुछ सालो सें हम पर दोनों मामा-मामी द्वारा घर ख़ाली करने का दबाव डाला जा रहा था। मै टूरिस्ट गाड़ी चलाता हूँ और अधिकतर दिल्ली से बाहर रहता हूँ। एक दिन मैं शाम को घर आया मैं ने थोड़ी ड्रिंक भी कर रखी थी तो दोनों मामी और उनकी लडकियाँ मेरे से लड़ने लगी तो थक कर मैं ने 100 नम्बर पर कॉल करके पुलिस को बुला लिया वो लोग पुलिस के सामने भी मुझे गाली दे रहे थे। पुलिस वालो ने मेरे को कहा अगर मैने ड्रिंक नही की होती तो कुछ होता तुम थोड़ी देर घर से बाहर चले जाओ थोड़ी देर में ये अपने आप शांत हो जाएँगी मैने वैसा ही किया। मेरे घर पर वापस आने के थोड़ी देर बाद वो लोग थाने से पुलिस को लेकर आ गए और 107/151 में मुझे तिहाड़ भिजवा दिया जहाँ से अगले दिन मुझे जमानत मिली। इस केस की दो तारीख पड़ी जिस में उनकी तरफ से कोई नहीं आया तो जज ने केस ख़तम कर दिया। मैं घर पर ना जाकर अपने ससुराल में चला गया। इस वक्त मेरी माँ गाँव में थी जो की उत्तराखंड में है। उन लोगों मेरी माँ को फोन करके गाँव से बुलवाया और उन्हें धमका कर कि तेरे लड़के को जेल से बाहर नही आने देँगे किसी वकील के ऑफिस में अंग्रेजी के कुछ पेपरों पर साईन करवा लिए। हम लोगों ने अपने कमरे में अपना ताला लगा रखा है। जिसके ऊपर उन लोगों ने भी अपना ताला लगा दिया है हमने 100 नम्बर कॉल किया पुलिस वाले बोले लोकल थाने में शिकायत करो। हम ने थाने में लिखित में शिकायत दी तो वो बोले की हम ताला नहीं खुलवा सकते कोर्ट से ऑडर निकलवाओ। तब से हम किराये के कमरे में रह रहे हैं। नानी को भी उन लोगो ने अपने साथ मिला रखा हैं । अब हम चाहते हैं कि उस मकान में से मेरी माँ का हिस्सा उन्हें मिले। हमारे कमरे में लगा उन लोगों का ताला खुले और जब तक कोई फैसला नहीं हो जाता हम लोगो को उस घर में रहने का हक मिले।

समाधान-

स दिन की घटना के पहले आप और माँ उसी कमरे किचन में निवास कर रहे थे। उस पर आपका ताला लगा हुआ है ऊपर से मामा मामी का भी लगा हुआ है। यदि उसी समय आप पुलिस को या न्यायालय में शिकायत करते तो धारा 145 दं.प्र.सं. का प्रकरण दर्ज हो कर सुनवाई होती और कब्जा आप को सौंपने का आदेश हो जाता। लेकिन लगता है उस बात को अब 60 दिन से अधिक हो गए हैं। धारा 145 दं.प्र.संहिता में अब वह काम नहीं हो सकता।

प की माता जी को चाहिए कि उन के पिता (आप के नाना) की संपत्ति में अपना अलग हिस्सा प्राप्त करने के लिए बँटवारे का वाद दीवानी न्यायालय में संस्थित करें। इस वाद के संस्थित करने के बाद न्यायालय से आप के कब्जे के कमरे और रसोई का ताला खुलवाने के लिए तथा आपके कब्जे में दखल न करने के आदेश के लिए आप अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर सकते हैं।

स के अलावा आप और आप की माता जी उस परिसर में रह रहे थे। ताला लगा कर आप की माता जी को वहाँ रहने से रोक दिया गया है यह महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का मामला भी है। आप की मताजी घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन कर उक्त परिसर पर उन्हें कब्जा दिलाने की कार्यवाही कर सकती हैं। इस सम्बन्ध में आप स्थानीय वकीलों से सलाह कर कार्यवाहियाँ आरंभ कर सकते हैं।

क्रूरता के आधार पर आप की बहिन अपने पति के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है।

widow daughterसमस्या-

मथुरा, उत्तर प्रदेशसे शिखर आकाश ने पूछा है-
मेरी बहन काविवाह को लखनऊ के एक संयुक्त परिवार में 14 साल पहले हुआ। उसेअपनी ससुराल मे मानसिक प्रताड़ना दी जाती रही है, जिसे मेरी बहन पिछ्ले 14 सालोंसे झेलती आ रही है। उस के साथ घर के पुरुष और महिलाओं द्वारा अभद्रव्यवहार,भाषा का प्रयोग किया जाता रहा है। एक पुत्र 12 साल का है जो शारीरिक रूप से कमज़ोर है। अपनी माँ पर हो रहे इस दुर्व्यवहार से सहमा रहता है और उसकाविकास रुक गया है। पतिसुनते नहीं हैं और अपने भाई का साथ देते हैं। पति के भाईपेशे से वकील हैं और सारा परिवार इसी बात का दम्भ भरता है। मेरी बहन संगीतविशेषरज्ञहै और उसे घर से बाहर आने जाने भी नहीं दिया जाता है। उस का जीवन औरकेरियर बर्बाद हो रहाहै। क्या बहन न्यायिक पृथक्करण/ विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है औरअपने नाबालिग पुत्र को अपने साथ रख सकती है?

समाधान-

प की समस्या में यह स्पष्ट नहीं है कि आप की बहन और उस के पुत्र के साथ किस तरह का शारीरिक मानसिक दुर्व्यवहार किया जा रहा है। लेकिन जो किया जा रहा है वह क्रूरता है। इस क्रूरता के आधार पर आप की बहन न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त कर सकती है। यदि वह चाहे तो विवाह विच्छेद की डिक्री भी प्राप्त कर सकती है। वह नाबालिग पुत्र को अपने साथ भी रख सकती है। इस के साथ साथ स्वयं अपने लिए व अपने पुत्र के लिए भरण पोषण का खर्च भी प्राप्त कर सकती है।

स के लिए उसे स्वयं अपने पुत्र सहित परिवार से अलग रहना होगा या लखनऊ छोड़ कर मथुरा आ कर रहना होगा। एक बार दोनों अलग रहने लगें तो फिर न्यायिक पृथक्करण/ विवाह विच्छेद, घरेलू हिंसा व भरण पोषण के लिए कार्यवाही कर सकती हैं। यदि वह मथुरा आ कर रहने लगे तो ये सभी कार्यवाहियाँ मथुरा में संस्थित की जा सकती हैं।

हिंसा तथा घर से निकाल दिए जाने पर पत्नी घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन करे।

Headache_paintingसमस्या-

यूनुस अंसारी ने सारंगपुरा, जिला राजगढ़ मध्यप्रदेश से पूछा है-

 

क्षिप्राबाईके पति ने दहेज़ की मांग कर घर से निकल दिया जिस पर से ४९८ क मुक़दमा चल रहाहै। क्षिप्राबाई के एक लड़का 7 साल का है शिप्राबाई पति के साथ जाना चाहती हैवो नहीं ले जा रहा है, अब शिप्राबाई को क्या करना चाहिए।

 

समाधान-

 

न्यायालय पति के विरुद्ध यह आदेश पारित कर सकता है कि पति पत्नी को ले जा कर अपने पास रखे। यदि बेटा भी पत्नी के साथ रहता है तो दोनों के भरणपोषण की पर्याप्त व्यवस्था करे। इन में से यदि भरण पोषण की व्यवस्था पति नहीं करता है तो न्यायालय भरण पोषण की राशि वसूल कर के पत्नी को दिलवा सकता है। लेकिन पत्नी को अपने साथ रखने के लिए पति को बाध्य नहीं कर सकता।

 

क्षिप्राबाई को चाहिए कि वह पति के विरुद्ध महिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। जिस में धारा 18, 19, 20, 21 व धारा 22 की राहत प्राप्त करने की प्रार्थना करे। इस आवेदन पर न्यायालय घरेलू हिंसा से संरक्षण का आदेश, भरण पोषण की राशि अदा करने का आदेश, पति के घर में या पड़ौस में पत्नी के लिए निवास उपलब्ध कराने का आदेश, बच्चे के संरक्षण का आदेश तथा हर्जाना राशि पत्नी को अदा करने का आदेश पारित कर सकता है। आदेश का पालन भी इसी अधिनियम के अंतर्गत कराया जा सकता है और पति द्वारा किसी आदेश का उल्लंघन करने पर उसे दण्डित भी कराया जा सकता है।

आपसी बातचीत और काउंसलिंग से समस्या का हल निकालें।

husband wifeसमस्या-
प्रमोद कुमार दास ने पश्चिम बंगाल से पूछा है-

मेरा विवाह 15.12.2013 को हुआ। मेरी पत्नी 3-4 दिन रही और वपास अपनी माँ के यहाँ चली गई।अब हमारे ऊपर धारा 498 ए/ 323/406 भा.दंड संहिता व धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता का मुकदमा कर दिया है। मैं क्या करूँ?

समाधान-

हज 3-4 दिन साथ रहने पर इस तरह का विवाद का उत्पन्न होना गलत बात है। इस का सीधा अर्थ यह है कि आप ने पत्नी को विवाह के पूर्व न तो यह बताया कि उसे ससुराल में कैसे रहना होगा, उस के क्या दायित्व होंगे और आप उस से कैसा व्यवहार चाहते हैं। न आप ने यह जानने की अपेक्षा की कि एक बार ससुराल आने पर उस की अपेक्षाएँ क्या होंगी। अधिकतर विवाद अपेक्षाओं तथा अवांछित दायित्वों की पूर्ति न होने तथा व्यवहार के संबंध में होने वाले मतभेदों से उत्पन्न होते हैं। आप ने अपनी समस्या में यह भी नहीं बताया कि इन तीन चार दिनों में हुआ क्या था जिस से विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई।

त्नी ने आप पर मारपीट का आरोप लगाया है। ससुराल वालो पर मारपीट का आरोप 498-ए बन जाता है। 406 का अर्थ है कि वह अपना स्त्री-धन यहाँ छोड़ गई है उसे मांग रही है। आप को उस का स्त्री-धन तुरन्त लौटा देना चाहिए, या फिर पुलिस थाने में प्रस्तुत कर देना चाहिए। मुकदमा अदालत तक जाए तो उस में अपना बचाव मजबूती से करना चाहिए। आप की पत्नी आप से भरण पोषण की राशि भी मांग रही है जो आप को देनी ही होगी।

विवाह के एक वर्ष तक की अवधि में विवाह विच्छेद की अर्जी नहीं लगाई जा सकती। इस कारण से इस समस्या का हल आपसी बातचीत से या फिर मध्यस्थों के माध्यम से काउंसलिंग के जरिए निकाला जा सकता है। मेरा मानना है कि आप को तमाम पूर्वाग्रह त्याग कर अपनी पत्नी और ससुराल वालों से बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाएंगे और यदि आप की कोई गलती रही हो तो उसे गलती के रूप में स्वीकार करेंगे तो हल जल्दी निकलेगा।

परित्यक्त गर्भवती पत्नी तुरन्त घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम में आवेदन करे।

victim womenसमस्या-
कंचन ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

रीब 2.5 साल पहले हमरा प्रेम विवाह हुआ था। हम साथ रहते थे। अचानक एक दिन ऑफिस का कुछ काम बता कर 4 दिन के लिए चले गये और फिर मुझे 15 दिन बाद पता चला कि अपने घर वालो की मर्ज़ी से दूसरी शादी कर लिए हैं। जब मैं उनके घर गई तो उस समय डर की वजह से मेरे पति को मेरे साथ भेज दिया। मेरे पति 6 दिन मेरे साथ रहे उन 6 दिनों के अंदर उन्होने तलाक़ के लिए मुक़दमा कर दिया। लेकिन मैं तलाक नहीं चाहती हूँ। क्यूंकि मैं 6 माह की प्रेग्नेंट हूँ और मैं अपने पति के साथ रहना चाहती हूँ। जो दूसरी शादी हुई है लड़की के घर वाले सब कुछ जान चुके हैं। लेकिन वे मेरे ससुराल वालों का साथ दे रहे हैं। वे चाहते हैं मुझे मेरा पति छोड़ दे और वे अपनी बेटी को उस घर मे रखें। अभी मेरे पति  1 माह से मुझे छोड़ कर जा चुके हैं। मैं चाहती हूँ कि मुझे उस घर में और मेरे पति के साथ रहने का न्याय मिले और इस में टाइम ना लगे। फिलहाल मुझे तलाक देने का कोई सुबूत उन के पास नहीं है। अगर मैं उस घर में क़ानून के साथ रहने का परमीशन मिल जाए और वे लोग मुझे कोई क्षति ना पहुँचा पाएँ। कृपया इसका कोई रास्ता बताएँ।

समाधान-

ब भी आप कानून के पास जाएंगी तो वह आप से सबूत मांगेगा। आप ने प्रेम विवाह किया था तो आप के पास उस का सबूत होना चाहिए। आप ने यह नहीं बताया कि आप ने विवाह किस विधि से किया था। यदि आप के विवाह का ठोस सबूत है तो आप को कार्यवाही करने में आसानी होगी। विवाह का पंजीकरण कहीं हुआ है और उस का प्रमाण पत्र आप के पास है तो यह एक ठोस सबूत है।

कोई भी कानून किन्हीं दो व्यक्तियों को साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकता। लेकिन यदि वे पति पत्नी हैं तो उन्हें दाम्पत्य निभाने का आदेश दे सकता है। यदि ऐसे आदेश का निर्वाह कोई पक्ष नहीं करता है तो पीड़ित पक्ष दूसरे से तलाक प्राप्त कर सकता है। मेरी समझ में जो व्यक्ति दो वर्ष में ही अपनी पत्नी को छोड़ कर परिवार के दबाव में दूसरा विवाह कर ले उस के साथ रहना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। यह आप के आत्मसम्मान के भी पूरी तरह विरुद्ध है।

प के पति द्वारा दूसरा विवाह किए जाने के सबूत आप के पास हैं और आप कानून के समक्ष सिद्ध कर सकती हैं कि पति ने दूसरा विवाह किया है तो यह एक अपराध है आईपीसी की धारा 494 के अन्तर्गत अपराध है। यदि आप के और आप के पति के बीच विवाह का कोई ऐसा सबूत नहीं है जिस से विवाह प्रमाणित किया जा सकता हो और आप के पति आप के साथ हुए विवाह से इन्कार करें तो आप के साथ बिना विधिपूर्वक विवाह के रहना, सहवास करना और आप का गर्भवती हो जाना आप के पति का गंभीर अपराध है जिस में उन्हों ने धारा 393 का अपराध किया है। साथ ही धारा 376 के अन्तर्गत बलात्कार का अपराध भी किया है। निश्चित ही ऐसे अपराधी के साथ आप का जीवन निर्वाह नहीं हो सकता है।

वास्तव में आप की समस्या और उस लड़की व उस के परिवार वालों की समस्या एक ही है जो इस सामाजिक मूल्य के कारण है कि यदि कोई जानबूझ कर या धोखे से भी किसी लड़की के साथ कोई यौन अपराध घटित कर दे तो उस के लिए अपराधी को सजा हो या न हो। लेकिन समाज उस लड़की को हमेशा दोषी और अपवित्र मानने लगता है। यदि प्रेम विवाह हुआ हो, पत्नी गर्भवती हो और पति उसे छोड़ दे, तलाक की कार्यवाही कर दे या फिर बच्चे व उस की माता की परवरिश करने से इन्कार कर दे तो निश्चित ही उस महिला और बच्चे के लिए सब से बड़े संकट की बात है।

प ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पति ने तलाक की अर्जी लगा देने की बात आपने कही है वह किस आधार पर की है, क्या आप को न्यायालय से समन मिला है? आप के पति के पास कोई मजबूत आधार तलाक प्राप्त करने के लिए नहीं दिखाई देता है इस कारण से यदि अर्जी लगा भी दी गई हो तो भी तलाक मंजूर होना संभव नहीं है।

 यदि आप के पास अपने विवाह का सबूत है तो आप को तुरन्त पुलिस में यह शिकायत दर्ज करानी चाहिए कि आप के पति ने आप को छोड़ कर दूसरा विवाह कर लिया है। आप के साथ क्रूरता का व्यवहार किया है। इस के साथ ही आप को से ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’ के अंतर्गत न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत करते हुए तुरन्त इस अंतरिम राहत की प्रार्थना करनी चाहिए कि आप को अपने पति के घर में अथवा अन्यत्र आवास के लिए पृथक स्थान दिलाया जाए। आप के पति, उन के परिवार वाले और दूसरी लड़की व उस के परिवार वाले आप को किसी भी तरह से हानि न पहुँचाएँ, तथा आप को प्रतिमाह पर्याप्त राशि भरण पोषण और खर्चे के लिए दी जाए। इस आवेदन पर न्यायालय तुरन्त आदेश पारित कर सकता है।

दि आप के पास अपने विवाह का कोई सबूत नहीं है तो आप सीधे धारा 493, 494 तथा 376 आईपीसी के अन्तर्गत आप के पति के विरुद्ध पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराएँ। पुलिस रिपोर्ट दर्ज करने से मना करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस थाने में दर्ज कराएँ। यदि ऐसा हुआ तो पुलिस कार्यवाही और गिरफ्तारी के भय से ही आप के पति आप की सभी मांगे मानने पर बाध्य हो सकते हैं।

कानूनी कार्यवाही के साथ साथ अपने पैरों पर खड़े होने के प्रयास करें।

widow daughterसमस्या –
ग्वालियर, मध्यप्रदेश से पूजा ने पूछा है –

मेरी शादी हिंदू रीति रिवाज से 2008 में हुई थी।  शादी के बाद से ही मेरे ससुराल वाले मुझे परेशान करते थे। जब मैं गर्भवती हुई तो ससुराल वाले गर्भ गिरा दो कहने लगे। उन को बच्चा नहीं चाहिए था।  मैं अपने बच्चे को नहीं मार सकती थी। कई बार मुझे और मेरे  अजन्मे बच्चे को मरने की कोशिश की गयी। एक दिन मुझे आधी रात को घर से निकाल दिया मेरे पास न पैसे थे, न ही कोई और साधन। किसी तरह में महिला थाने पहुँची और अपनी आप बीती बताई। वहाँ के टीए ने मेरे पति को बुलवाया। पति ने मुझसे माफी मांगी और दुबारा ऐसा नहीं होगा, ऐसा कहकर मुझे अपनी शिकायत वापस लेने को कहा। मैं बेसहारा और बीमार थी। सब की बातें मान कर मैं ने अपनी शिकायत वापस ले ली। फिर मेरे पति मुझे घर की बजाय मेरे माता पिता के पास जबरदस्ती छोड़ गये। मेरी हालत बहुत बिगड़ चुकी थी। 2009 मे मैं ने एक बेटी को जन्म दिया। मेरे घर वाले मुझे और मेरी बेटी को किसी तरह ससुराल छोड़ आए। मेरे पति मुझ से बहुत बुरा बरताव करते थे। मेरी सास ने मेरे साथ कई बार मारपीट की। मेरी सास हर बात पर मुझे अपमानित करती थी। मानसिक रूप से मुझे पागल कर देगी ये धमकी देती थी। अपने माता पिता से पैसे लाओ बस यही एक मुद्दा होता था। मेरे माँ बाप ने अपनी क्षमता से ज्यादा दिया। एक दिन मेरे पति मुझे और मेरी बेटी को मेरे माता पिता के घर छोड़ गये। मैं ने उनसे ऐसा ना करने की बहुत मिन्नत की। पर उन्होंने नहीं सुना। मेरे बूढ़े माँ-बाप मेरा और मेरी बेटी का खर्चा बहुत मुश्किल से उठा पा रहे थे। मेरी दो छोटी बहनों की शादी का जिम्मा भी मेरे माता पिता पर था। मेरे ससुराल वाले मेरी बहनों को और मेरे माता पिता को डराते धमकाते थे। अपने परिवार की बदनामी की वजह से माँ ये सब सहती रही। एकदिन मेरे पति ने मुझसे तलाक़ के लिए नोटिस भेज दिया। मैं बहुत डर गयी। मेरे पति ना तो मुझे पैसे देते हैं। ना ही साथ रखते हैं। वो मुझसे रिश्ता तोड़ना चाहाते हैं। मैं क्या करूँ? कैसे अपनी बेटी को पालूँ? वकील को खरीद लिया है। सब कहते हैं मर जाओ तुम। मेरी ग़लती क्या है? मुझे नहीं पता। मैं और मेरी बेटी बहुत बुरी दशा में हैं। मैं क्या करूँ मुझे जीना है। और अपनी बेटी को बचाना है मेरी मदद करें। में क्या करूँ बताएँ?

समाधान –

पूजा जी, सब से अच्छी बात तो आप के पास यह है कि आप जीना चाहती हैं और अपनी बेटी को बचाना चाहती हैं। इस हालत में भी आप के इस जज्बा सलाम करने लायक है। आप की गलती ये है कि आप, आप के माता-पिता और बहनें यह सोचती हैं कि जीवन में एक स्त्री के लिए शादी करना, पति पर निर्भर रहना और उस की हर अच्छी बुरी बात को सहन करना चाहिए। लेकिन आप अपने खुद के जीवन से यह समझ चुकी हैं कि पति पर निर्भरता स्त्री के जीवन की सब से बड़ी हार और दुखदायी चीज है। इस कारण पहला काम तो ये करें कि आप अपने माता-पिता और बहनों को इस सोच से निकालें। उन्हें समझाएँ कि विवाह से बड़ी चीज लड़कियों और महिलाओं के लिए अपने पैरों पर खड़े होना है।

कील को खरीद लिया है। आप की यह बात जमती नहीं है। यदि आप यह समझती हैं कि वकील को खरीद लिया है तो उस वकील से साफ कह दें कि वह आप की पैरवी न करे। आप अपने यहाँ के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन दे कर आप के मुकदमे लड़ने के लिए सहायता मांगें। विधिक सेवा प्राधिकरण अध्यक्ष जिला न्यायाधीश होते हैं तथा सचिव मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट होते हैं। आप उन में से किसी से भी व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी व्यथा बता कर उन से मदद मांग सकती हैं।

प को तुरन्त अपने व अपने बेटी के लिए धारा स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर निर्वाह खर्च की तथा पृथक आवास के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। यदि आप के पति तलाक की अर्जी पेश करें तो वहाँ जवाब देने के पहले धारा 24 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन कर के स्वयं तथा अपनी बेटी के लिए निर्वाह खर्च तथा न्यायालय आने जाने के खर्च हेतु आवेदन करना चाहिए। जब तक आप के पति निर्वाह खर्च न देंगे तब तक वह मुकदमा आगे न चलेगा। इस के अलावा आप 498-ए भारतीय दंड संहिता में आप के साथ हुई क्रूरता और मारपीट के लिए आप अपनी सास व पति के विरुद्ध पुलिस थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराएँ। इसी रिपोर्ट में धारा 406 में अपने स्त्री-धन आप को न लौटाने की शिकायत भी करें। इस के अलावा आप धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में अपने व अपनी पुत्री के लिए निर्वाह खर्च देने के लिए भी  आवेदन कर सकती हैं।

न सब कार्यवाहियों के अलावा सब से बड़ी बात यह है कि आप को अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करना चाहिए। सब बड़े शहरों में कुछ संस्थाएँ महिलाओं की मदद करने वाली होती हैं। आप ऐसी ही किसी संस्था से संपर्क कर के मदद प्राप्त कर सकती हैं और वे आप को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद कर सकती हैं। आप सीधे अपने राज्य के मुख्यमंत्री को तथा महिला व बाल कल्याण मंत्री को भी अपनी सारी व्यथा लिख कर भेज सकती हैं वहाँ से भी आप को मदद मिल सकती है।

घरेलू हिंसा के प्रकरण में सभी विपक्षीगण को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना आवश्यक नहीं।

alimonyसमस्या-

जमशेदपुर, झारखंड से अमित शर्मा ने पूछा है –

मेरी उम्र 34 साल है और एक साधारण परिवार से हूँ।  मेरी शादी मध्यप्रदेश के जबलपुर की वन्दना शर्मा पुत्री श्री आर पी विश्वकर्मा से 16 अप्रैल 2009 को संपन्न हुई।  ये शादी हमारे पिता जी ने जीवनसाथी मेट्रीमोनी साईट पर वन्दना को देखते हुए, पारिवारिक माहोल में संपन्न की थी।  ठीक एक साल बाद 13 अप्रेल 2010 को मेरे बेटे का जन्म जमशेदपुर में हुआ।  सभी कुछ ठीक ठाक चलता रहा जिसका फोटोग्राफ हमारे है।  इस बीच वन्दना की छोटी बहन राखी विश्वकर्मा की शादी 2011 में हुई जिस में हम सभी परिवार के लोग जबलपुर गए और उसके बाद भी वन्दना को जब वह जबलपुर जाती थी उसे मैं पहुंचाता और जा कर वापस ले आता था।  परन्तु वन्दना का एक बड़ा भाई था जिसका नाम हेमंत विश्वकर्मा था जो 2007 से ही घर छोड़ कर जा चुका है और अभी तक किसी भी तरह की जानकारी नहीं है कि वो दुनिया में है भी कि नहीं। उस ने एमबीए की पढाई की थी। दूसरे भाई श्री अमित विश्वकर्मा जो जबलपुर कोर्ट में पेशे से वकील हैं, उनकी शादी 27 फ़रवरी 2012 को संपन्न हुई। उस शादी में वन्दना और मेरे बेटे देव्याम को 15 फ़रवरी 2012 को मैं जबलपुर छोड़ कर आया। जिसका प्रूफ मेरे पास है। वन्दना के पापा ने हम सब को वकील श्री अमित विश्वकर्मा जी की शादी में मेरे परिवार और भी रिश्तेदारों के नाम इनविटेशन कार्ड दिया था। जिस में मैं मेरे पापा, बहन, बहनोई, मम्मी कुल पांच लोग शादी के अवसर पर जबलपुर गए। उन्हों ने तोहफे वगैरह दिए। वापस आने के समय वन्दना ने हम सब से राजी खुशी से वादा किया कि मैं मेरी नई भाभी के साथ 10-12 दिन गपशप और दोस्ती कर पापा के संग देव्याम को लेकर आ जाउंगी।  देव्याम को मैंने  और वन्दना ने विचार विमर्श कर के जी किड्स स्कूल जमशेदपुर दाखिला करवाया था और स्कूल में 10 दिनों की छुट्टी का आवेदन दे कर भाई की शादी में वन्दना जबलपुर गई थी। लेकिन अब वो वापस जमशेदपुर नहीं आना चाहती। उल्टा उसने जबलपुर से घरेलु हिंसा का एक केस कर दिया है जो हम सब की सोच से बाहर है।  वन्दना को जबलपुर गए एक साल पांच महीने हो रहे हैं। घरेलू हिंसा के केस में जबलपुर में 26 जुलाई 2013 की तारीख है। उसने हम पांचो लोगों पर झूठा आरोप लगा कर ये साबित कर दिया है कि किसी पर विश्वास नहीं किया जाये।

मैं ने जमशेदपुर के कोर्ट में सेक्शन 9 का मुकदमा किया हुआ है जिसमें वन्दना कोर्ट में किसी भी तारीख पर हाजिर नहीं हुई है। कोर्ट के आदेश पर जबलपुर के दैनिक भास्कर समाचार पत्रिका में छपवाया गया था तो उसने जबलपुर से हम सब पर लगाये गए आरोपों के साथ पुलिस की सुरक्षा देने की अपील कि है।  हमें जबलपुर के कोर्ट में या सुप्रीम कोर्ट में वकील दे कर इस झूठे मुकदमें से मुक्ति दिलाएँ।

समाधान-

प ने अपनी समस्या का कोई कारण नहीं बताया। बिना कारण तो कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती। विवाह को चार वर्ष हो चुके हैं तथा एक तीन वर्ष का पुत्र भी है। वैसी स्थिति में अकारण तो आप की पत्नी ने ऐसा कदम नहीं उठाया होगा। कुछ तो उस के पीछे कारण मूल कारण होंगे ही। आप उन कारणों को खोजें और विवाद को हल करने का प्रयत्न करें।

प की पत्नी ने घरेलू हिंसा में मुकदमा लगाया है। इस का अर्थ यह है कि आप की पत्नी आप से विवाद को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। यदि विवाद आगे बढ़ाने की मंशा होती तो वह इस से अधिक गंभीर मुकदमे आप के विरुद्ध कर सकती थी वह भी उस अवस्था में जब कि उस का एक भाई वहीं जबलपुर में वकालत का व्यवसाय कर रहा हो। आप को इस मुकदमे का संकेत समझना चाहिए और जबलपुर जा कर स्वयं या किसी मध्यस्थ के माध्यम से आपसी बातचीत से मामले को सही रास्ते पर लाना चाहिए।

रेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमे में सभी विपक्षीगण को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं है। विपक्षीगण अपने वकील के माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपस्थिति दे सकते हैं और आवेदन पत्र का उत्तर दे सकते हैं। आप को सिर्फ इतना करना पड़ेगा कि आप सभी विपक्षीगण से वकालतनामे पर हस्ताक्षर करवा कर जबलपुर ले जाएँ और वहाँ जिस भी वकील को नियुक्त करें उसे दे दें। वह वकील आपके अतिरिक्त जितने भी विपक्षी इस कार्यवाही में पक्षकार बनाए गए हैं उन की ओर से न्यायालय के समक्ष उपस्थिति दे देगा और जवाब प्रस्तुत कर देगा। बाद में जिस जिस को आप गवाही के लिए प्रस्तुत करना चाहें उसे उपयुक्त तारीख पेशी पर साथ ले जाएँ।

बलपुर में आप को वकील करने में परेशानी हो तो आप वहाँ के वरिष्ठ वकील श्री राजेन्द्र जैन से संपर्क कर उन्हें अपना वकील नियुक्त कर सकते हैं।  उन का पता बी-2 समदरिया रेजीडेंसी, पेट्रोल पम्प के पास,  ब्योहार बाग, जबलपुर है। उन के टेलीफोन नंबर 9425150896/ 07812621177/ 0761 2521177 हैं।


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