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माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

नागरिकों का कुछ अपराधों की सूचना पुलिस या मजिस्ट्रेट को देने का दायित्व

दंड प्रक्रिया संहितासमस्या-

पवन जैन ने बारोसी बाजार, जिला कटिहार, बिहार से समस्या भेजी है कि-

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 39 क्या है? इस के बारे में जानकारी देने का कष्ट करें।

समाधान-

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 39 देश सभी नागरिकों और निवासियों को यह दायित्व सौंपती है कि कुछ खास तरह के गंभीर अपराधों के घटित होने अथवा ऐसे गंभीर अपराध किए जाने की तैयारी की उन्हें जानकारी हो तो उन्हें इस की सूचना तुरन्त निकटतम पुलिस स्टेशन अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट को देनी चाहिए।

दि किसी व्यक्ति को ऐसी जानकारी होते हुए भी वह ऐसी जानकारी पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी अथवा मजिस्ट्रेट को नहीं देता है तो पता लगने पर कि उसे ऐसी जानकारी थी उसे यह साबित करना होगा कि ऐसी सूचना नहीं देने का उस के उचित कारण था।

स धारा में उन अपराधों की सूची दी हुई है जिन की सूचना देने का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति को दिया गया है। इस सूची में भारतीय दंड संहिता की धारा 121 से 126,130,143 से 145, 147, 161 से 165-ए, 272 से 278, 302, 303, 304, 382, 392 से 399, 409, 431 से 439 449, 450, 456 से 460 और धारा 489ए से 489ई सम्मिलित हैं।

न में मुख्यतः राज्य के विरुद्ध अपराध, लोक प्रशान्ति के विरुद्ध अपराध, अवैध परितोषण से संबंधित अपराध, खाद्य और औषधियों के अपमिश्रण से संबंधित अपराध, जीवन को संकट में डालने वाले अपराध, फिरौती आदि के लिए अपहरण करने के अपराध, चोरी करने के लिए मृत्यु या अवरोध पैदा करने के पश्चात चोरी का अपराध, लूट और डकैती, ग़बन, संपत्ति की ठगी का अपराध, गृह भेदन और करेंसी नोटों और बैंक नोटों से संबंधी अपराध सम्मिलित हैं।

किसी भी व्यक्ति की आय पर किसी का कोई अधिकार नहीं।

Say-Noसमस्या-

विकास चंद ने शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क्या सरकारी सेवारत पत्नी के वेतन में पति अथवा सास ससुर का कोई अधिकार है यदि ससुराल पक्ष से इस हेतु पत्नी को प्रताडित किया जाये तो कानूनी रूप से उसकी क्या सुरक्षा हो सकती है?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की आय में किसी दूसरे का कोई अधिकार नहीं होता। चाहे वह पत्नी हो या पति, सास, ससुर, पुत्र, पुत्री कोई भी क्यों न हो। किसी भी व्यक्ति की आय उस की अपनी आय होती है उसे वह अपने इच्छानुसार खर्च कर सकता है या बचत कर सकता है और संपत्ति बना सकता है।

लेकिन सामाजिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के कुछ दायित्व होते हैं। जैसे यदि पति अशक्त हो और उसे जीवन यापन के लिए खर्च की जरूरत हो तो पत्नी का दायित्व है कि वह उसे भरण पोषण के लिए पर्याप्त साधन जुटाए। जैसे एक पति का दायित्व होता है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों का भरण पोषण करे। जैसा पिता का दायित्व बच्चों के प्रति है वैसा ही माता का भी दायित्व बच्चों के प्रति होता है। हाँ एक पुत्र वधु के प्रति न तो सास-ससुर का कोई दायित्व होता है और न ही किसी प्रकार का कोई अधिकार। पति का भी पत्नी की आय पर कोई अधिकार नहीं होता। यदि उसे किसी तरह के भरण पोषण की आवश्यकता है तो वह न्यायालय में दावा प्रस्तुत कर सकता है। न्यायालय यह तय करेगा कि वास्तव में उसे पत्नी से भरण पोषण की आवश्यकता है या नहीं है।

दि इस हेतु पत्नी को प्रताड़ित किया जाता है तो यह सीधे सीधे घरेलू हिंसा का मामला है पत्नी तीनों के विरुद्ध घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव के कानून के अन्तर्गत कार्यवाही कर सकती है। यह कार्यवाही इस बात पर निर्भर करती है कि पत्नी को क्या राहत चाहिए। यदि यह हिंसा धारा 498ए के दायरे की हुई तो पत्नी धारा 498ए में भी पति और सास-ससुर के विरुद्ध शिकायत दर्ज करा सकती है।

प ने अत्यन्त ही संक्षेप में अपनी समस्या रखी है, जो सैद्धान्तिक है। यदि आप ने समस्या का वास्तविक स्वरूप और परिस्थितियाँ भी सामने रखी होतीं तो हम उस का समाधान अधिक स्पष्ट आप को सुझा सकते थे।

दुर्घटना की प्राथमिक जिम्मेदारी वाहन चालक की

accident car animalसमस्या-
महेश पुरी, अराँई (अजमेर) राजस्थान से पूछते हैं-

दिनांक 13-09-2011 को मैं और मेरे साथ श्री सुरेश चन्‍द पारीक कार द्वारा इनके पुत्र श्री अवधेश पारीक से मिलने के लिए बीकानेर जा रहे थें। रास्‍ते में दिन के करीबन 1 बजे कार के रास्‍ते में नील गायों (रोजडों) के आ जाने से कार  दुर्घटनाग्रस्‍त हो गई। इस कार दुर्घटना में मैं और श्री सुरेश पारीक  बुरी तरह से घायल हो गये। अस्‍पताल में श्री सुरेश चन्‍द पारीक की मृत्यु हो गई। दुर्घटना के समय कार कों मैं ही चला रहा था। इसलिए इसका पुरा ही मामला मेरे उपर डाल दिया गया। श्री सुरेश चन्‍द पारीक की पत्‍नी श्रीमती निमला देवी पारीक ने यह सारा मामला मेरे पर ही लगा दिया है।  इस दुर्घटना का जिम्‍मेदार मुझे ठहराया गया है, जबकि इस कार दुर्घटना में मुझे भी घायल हो कर मौत से जूझना पड़ा था। इस समस्‍या से बचने का उपाय बताएँ।

 

समाधान-

दुर्घटना के समय कार आप चला रहे थे। कार दुर्घटना में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई तथा आप भी घायल हुए हैं। कार दुर्घटना के केवल दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण तो यह हो सकता है कि आप ने  कार चालन  में लापरवाही बरती, दूसरा कारण यह हो सकता है कि दैवीय संयोग से यह दुर्घटना हुई।

 इस मामले में एक मात्र प्रत्यक्षदर्शी साक्षी केवल आप हैं। पुलिस अवश्य किसी राह चलते व्यक्ति को प्रत्यक्षदर्शी साक्षी बना सकती है, और हो सकता है उस ने बनाया हो। यदि आप को पूरा विश्वास है कि यह दुर्घटना अचानक नील गायों के आप के सामने आने के कारण घटित हुई है और आप का कोई दोष नहीं है तब भी आप के विरुद्ध जो अपराधिक मुकदमा पुलिस द्वारा स्थापित किया है उस में आप को प्रतिरक्षा करनी पड़ेगी। यदि आपका वकील अच्छा हुआ तो आप को इस मामले से दोष मुक्त करवा देगा। आप को स्वयं ही साबित करना होगा कि आप का कोई दोष नहीं था और यह दुर्घटना एक दैवीय संयोग थी।

स दुर्घटना में आपके साथी सुरेश चन्द्र पारीक का देहान्त हुआ है। उस की पत्नी और बच्चों को उन की क्षति हो गई है। उन्हें इस दुर्घटना में पर्याप्त मुआवजा केवल तभी प्राप्त हो सकता है जब कि वे इस दुर्घटना का दोष चालक का बताएँ। एक यह भी कारण है कि वे आप को दोषी बता रहे हैं। इस में उन का कोई दोष नहीं है। यदि वाहन बीमित था और आप के पास पर्याप्त ड्राइविंग लायसेंस था तो आप को दुर्घटना के मुआवजे की चिन्ता नहीं करनी चाहिए उस का भुगतान बीमा कंपनी करेगी। यदि इन दोनों में कोई कमी होगी तो वह भुगतान भी आप को करना होगा।

स आप यह ध्यान रखें कि अपराधिक मुकदमे में वकील अच्छा करें जो आपकी प्रतिरक्षा ठीक से प्रस्तुत करे। जिस से आप दण्ड से बच सकें।

चैक केवल वर्तमान दायित्व के भुगतान के लिए ही दें, किसी और उद्देश्य के लिए नहीं

समस्या-

मैं ने एक मकान बनवाया। ठेकेदार की सलाह से मैं ने ठेकेदार के जानकार दुकानदार से निर्माण सामग्री का क्रय किया।  मेरे ठेकेदार ने कहा कि मैं गारन्टी के रूप में अपना एक चैक दुकानदार को दे दूँ, जिस से निर्माण सामग्री सही समय पर मिलती रहे।  मैं दुकानदार को समय समय पर भुगतान करता रहा।  असल समस्या तब आरंभ हुई जब ठेकेदार ने मेरा काम पूरा किए बिना ही छोड़ दिया।  उस ने पूरी राशि की मांग की।  मैं ने उस से कहा कि वह काम पूरा कर दे और कान्ट्रेक्ट के मुताबिक पूरा रुपया ले ले।  मैं दुकानदार के पास अपना चैक वापस लेने गया तो उस ने वह चैक तो ठेकेदार को दे दिया है क्यों कि तुम ने उस का पूरा भुगतान नहीं किया है।  मैं ने दोनों से मेरा चैक वापस देने का आग्रह किया किन्तु उन्हों ने मेरा चैक नहीं लौटाया।  मैं ने तब बैंक से चैक का भुगतान रोकने के लिए कहा। बैंक ने भुगतान रोक दिया लेकिन चैक वापसी में यह रिमार्क लगा दिया कि बैंक में पर्याप्त निधि नहीं है।  तब दुकानदार ने धारा 138 का मुकदमा लगा दिया।  इस मुकदमे में मुझे 29,950/- रुपए भुगतान करने का आदेश हुआ तथा चार माह के कारावास की सजा हो गई।  दुकानदार ने उस के पास का विक्रय का पूरा असल रिकार्ड नष्ट कर दिया और फर्जी रिकार्ड प्रस्तुत किया है जिस पर मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं।  लेकिन मजिस्ट्रेट ने इस रिकार्ड को सही मान कर उस के पक्ष में निर्णय दे दिया है।  क्या मैं सत्र न्यायालय में उक्त दंडादेश की अपील कर सकता हूँ?  क्या इस अपील में मुझे लाभ मिलेगा?

-कर्मवीर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा

समाधान-   

चैक अनादरण के मुकदमों में अभियुक्त के बचने के अवसर न के बराबर होते हैं।  क्यों कि इस मामले में केवल चैक का अनादरित होना, अनादरण के तीस दिनों में चैक की राशि के भुगतान का नोटिस चैक जारीकर्ता को दिया जाना, और नोटिस के पन्द्रह दिनों में उस के द्वारा चैक धारक को भुगतान न करना ही अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त होता है।  यह अवश्य है कि चैक किसी दायित्व के लिए दिया हुआ होना चाहिए।  लेकिन कानून ऐसा है कि यदि चैक दिया गया है तो यह माना जाता है कि चैक किसी दायित्व के लिए ही दिया गया होगा।  यदि चैक किसी दायित्व के अधीन न दिया गया हो तो इस तथ्य को साबित करने का दायित्व अभियुक्त पर डाला गया है।  अभियुक्त द्वारा यह साबित करना अत्यन्त कठिन या असंभव होता है कि उस ने चैक किसी दायित्व के भुगतान के लिए नहीं दिया था।

प के पास इस बात की कोई लिखत नहीं है कि आप ने चैक सीक्योरिटी के बतौर ही दिया था।  यदि लिखत होती तो आप साबित कर सकते थे कि चैक भुगतान के लिए नहीं अपितु सीक्योरिटी के बतौर दिया था।  जब भी चैक किसी वर्तमान दायित्व के भुगतान के लिए न दिया जा कर किसी और उद्देश्य से दिया जाए तो उस की लिखत अवश्य लेनी चाहिए।  लेकिन अक्सर लोग यही गलती करते हैं कि कोई लिखत नहीं लेते।  जब से चैक अनादरण को अपराधिक बनाया गया है तब से तो सभी बैक खाताधारियों को सावधान रहना आवश्यक हो गया है कि वे बिना किसी दायित्व के किसी को चैक नहीं दें।  बिना तिथि अंकित किए और बिना राशि भरे तो कदापि न दें।  इस के अतिरिक्त जब भी कोई दुकानदार माल भेजता है तो उस के साथ चालान भेजता है जिस पर हस्ताक्षर करवा कर वापस लेता है।  आप को भी चाहिए था कि आप ने जो रुपया उसे भुगतान किया उस की रसीद समय समय पर लेते।  लेकिन शायद आपने ऐसा भी नहीं किया।

स के अलावा जब दुकानदार ने आप को चैक वापस लौटाने से मना किया और कहा कि चैक तो ठेकेदार ले गया है।  उस का यह कहना ही अमानत में खयानत था।  साथ ही इस बात का अंदेशा उत्पन्न हो गया था कि आप के विरुद्ध चैक को ले कर मुकदमा किया जाएगा।  आप को तब भी सावधान हो जाना चाहिए था और उन के इस षड़यंत्र के विरुद्ध कार्यवाही आरंभ कर देनी चाहिए थी।  आप को पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट करनी चाहिए थी।  पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर आप को न्यायालय में तुरंत परिवाद दाखिल करना चाहिए था।  जब आप को चैक अनादरण का नोटिस प्राप्त हुआ तब आप को उस का उत्तर देना चाहिए था और साथ ही न्यायालय को तुरन्त परिवाद भी दाखिल करना चाहिए था।

वास्तविकता यह है कि आप ने चैक को ले कर लापरवाही बरती और उस की सजा आप को भुगतनी पड़ रही है।  आप ने जो तथ्य बताए हैं उस से नहीं लगता कि आप को सत्र न्यायालय से कोई राहत मिल पाएगी।  वैसे भी जब तक विचारण न्यायालय का निर्णय और वहाँ प्रस्तुत साक्ष्य का सूक्ष्म अध्ययन न कर लिया जाए कोई भी विधिज्ञ यह नहीं बता सकता कि  आप को अपील में लाभ मिलेगा या नहीं।  लेकिन फिर भी आप के पास अपील करने का एक अवसर उपलब्ध है।  यदि आप के वकील ने विचारण न्यायालय में पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत की है तो हो सकता है सत्र न्यायालय में आप को लाभ मिल जाए।  आप को अपील का यह अवसर कदापि नहीं छोड़ना चाहिए और अपील कर के इस मुकदमे के माध्यम से आप के साथ जो अन्याय हुआ है उसे न्याय में परिवर्तित करने का प्रयत्न करना चाहिए।  अपील करने के पूर्व आप को चाहिए कि आप अपराधिक मामलों के किसी अच्छे वकील से सलाह लें और सत्र न्यायालय में उसी से पैरवी कराएँ।  सभी बैंक खाताधारियों को एक बात गाँठ बांध लेनी चाहिए कि वे जब किसी को चैक दें तो केवल तत्कालीन दायित्व के भुगतान के लिए ही दें और यह सुनिश्चित कर लें कि चैक अनादरित नहीं होगा।  अन्यथा ये अवश्य जान लें कि चैक अनादरण के बाद सजा से बचना लगभग असंभव होगा।

पिता से पुत्री के भरण पोषण की राशि प्राप्त करने के लिए माता कब कार्यवाही करे?

समस्या-

मैं मुम्बई में केन्द्र सरकार की नौकरी में हूँ। मेरा विवाह 2006 दिसम्बर में हुआ था। लेकिन मेरी कुछ गलतियों के कारण अब मेरे पति मुझ से तलाक चाहते हैं। मैं ने सब कुछ पति के सामने स्वीकार किया लिया और यह विश्वास दिलाया कि फिर भविष्य में कभी भी ऐसा नहीं होने दूंगी।  लेकिन पति मुझ पर विश्वास नहीं है और वे मुझ से अलग होना चाहते हैं।  मेरे एक चार वर्ष की पुत्री भी है। पति ने कहा है कि यदि मैं चाहूँ तो पुत्री को अपने संरक्षण में रख सकती हूँ।  मेरे पति ने सहमति से तलाक की कानूनी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।  मेरा सवाल यह है कि सहमति से तलाक के बाद यदि मैं पुत्री को अपने पास रखूँ तो क्या उस के पिता से भरण पोषण के लिए वित्तीय सहायता की मांग कर सकती हूँ?   कानूनी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के पहले मुझे क्या करना चाहिए।

-वृषाली, कल्याण, महाराष्ट्र

समाधान-

प ने साफगोई और साहस का परिचय दिया है। गलतियाँ इंसान से होती हैं और वही उसे सुधारता भी है। लेकिन यदि आप के पति आप से अलग होना ही चाहते हैं और आप तैयार हैं तो यह दोनों के लिए ठीक है। वैसे सहमति से तलाक के मामले में भी आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद ही तलाक की डिक्री पारित होगी। छह माह बाद पति व पत्नी दोनों से पूछा जाएगा कि क्या आप का इरादा अब भी तलाक लेने का है या बदल गया है। उस समय तक यदि पति-पत्नी के बीच पुनः विश्वास कायम हो जाए तो वे तलाक की अर्जी को खारिज करवा कर फिर से साथ रह सकते हैं। दोनों में से एक के भी सहमति को वापस ले लेने पर तलाक होना संभव नहीं है तब भी न्यायालय अर्जी को खारिज कर देगा।

हमति से तलाक के मामले में तलाक की सभी शर्तें दोनों पक्षों के बीच तय हो जानी चाहिए।  जैसे पत्नी का स्त्रीधन क्या है? जिसे वह अपने साथ रखेगी। संतान यदि माता के साथ रहेगी तो उस के भरण पोषण के लिए पिता क्या राशि प्रतिमाह देगा और भविष्य में यह राशि किस तरह बढ़ेगी या घटेगी।

भारतीय विधि में पुत्री को अपने माता पिता से उस का विवाह होने तक या आत्मनिर्भर होने तक भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। यदि सहमति से तलाक की डिक्री में संतान के भरण पोषण के मामले में कोई शर्त तय नहीं भी होती है तब भी संतान अपनी माता के माध्यम से बाद में भी भरण पोषण, अध्ययन और विवाह आदि के खर्चों के लिए धनराशि की मांग कर सकती है। आप चाहें तो पुत्री के लिए पिता से जो भी भरण पोषण आदि खर्चे भविष्य में चाहिए उन्हें तलाक की अर्जी देने के पहले तय कर के उसे अर्जी में अंकित करवा सकती हैं। तलाक की डिक्री में उन का उल्लेख हो जाएगा। यदि ऐसा तलाक के समय न किया जा सके तो बाद में भी तय किया जा सकता है और पिता भरण पोषण से इन्कार करे तो भरण पोषण प्राप्त करने के लिए पुत्री की ओर से माता न्यायालय में भरण पोषण की राशि के लिए आवेदन या वाद प्रस्तुत कर सकती है।

पिता को नई परिस्थितियाँ समझा कर बीच की राह निकालने का प्रयत्न करें

समस्या-

मै शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हूँ। मुझे मासिक ९००० वेतन मिलता है।  मैं अपने घर से बहूत दूर था तब तक तो ठीक था। माह में खर्च के लिए रूपये भी देता था। मैं ने अपने ही खर्च पर बहन की और अपनी शादी किया।  घर भी बनाया जिस में उन्होंने एक रुपया तक का मुझे सहयोग नहीं दिया।  मेरे पिता जी के पास कृषि भूमि भी है, मेरे नाम पर भी कृषि भूमि है। परन्तु सभी की देख रेख वे ही करते हैं। मुझे उसका कुछ भी नहीं देते जब मै अपना स्थानांतरण करवा कर घर आया तो मुझे घर में रहने नहीं दिया।  आज मैं घर से बाहक दूसरी जगह पर किराये के मकान में रहता हूँ।   मैं शारीरिक रूप से एक पैर से विकलांग भी हूँ।  मेरी समस्या है कि  मेरे पिता मुझ से मेरे वेतन का आधा हिस्सा मांगते हैं। यह कहाँ तक सही है? मेरा कहना है कि मैं आधा क्या पूरा दूंगा, परन्तु मुझे घर में रहने दो या चावल दो,  मै खर्चा देने के लिए तैयार हूँ। अभी घर में माता पिता एवं एक अविवाहित भाई है।  कृषि भूमि उनके लिए काफी है।  यदि मुझे आधा वेतन देना होगा तो मेरा परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो जायेगा। मैं विकलांग होने कारण कोई अन्य काम करने में असमर्थ हूँ। |कृपया उचित सलाह दीजिये। ताकि मेरी मानसिक परेशानी दूर हो सके।

समाधान-

मारे यहाँ हिन्दू परिवारों में पुराने जमाने में संयुक्त परिवार और संयुक्त परिवार की संपत्ति का सिद्धान्त रहा है जो हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के आने के बाद समाप्तप्रायः हो चला है। आप के पिता की समझ है कि आप का परिवार एक संयुक्त परिवार है। उस के सभी सदस्यों और संपत्ति से हुई आय परिवार की संपत्ति है और जब तक वे परिवार के मुखिया हैं उस का प्रबंध करने का अधिकार उन का है। उन के सामने संभवतः अभी दायित्व हैं। आप के छोटे भाई का विवाह करना है, हो सकता है और भी दायित्व हों। वे इसी के लिए बचा कर कुछ धन संग्रह कर लेना चाहते हैं। जमीन और अन्य साधनों से आय इतनी पर्याप्त नहीं है कि वे धन संग्रह कर सकें। यही कारण है कि वे आप को परिवार के साथ नहीं रखना चाहते। परिवार में रहते ही आप के परिवार का खर्च और बढ़ जाएगा। वे उसी के लिए आप का आधा वेतन चाहते हैं। यही कारण है कि वे आप की जमीन को भी अभी अपने कब्जे में रखना चाहते हैं।

लेकिन कानूनी स्थितियाँ बदल चुकी हैं।  कानून परिवार को संयुक्त नहीं मानता। आप भी समझते हैं कि आप जितनी मदद परिवार की कर सकते हैं कर चुके हैं। आगे आप की भी जीवन है, आप का भी दायित्व है। उस के लिए आप कुछ बचा कर रखना चाहते हैं। आप का जीवन स्तर परिवार से कुछ सुधरा हुआ है आप उसे खोना नहीं चाहते। इस कारण आप चाहते हैं कि आप को अपनी जमीन की उपज मिले। हालाँकि आप जमीन पर खेती करने में असमर्थ हैं।

प के पिता और आप दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों ने आप दोनों के बीच एक द्वन्द उत्पन्न कर दिया है। आप दोनों को ही अपने अपने स्थान से कुछ हटना पड़ेगा और बीच में आ कर समझौता करना पडेगा। आप को पिता से कहना पड़ेगा कि आप की जमीन में जो खेती की जा रही है उस का मुनाफा प्राप्त करना आप का हक है। वह उन्हें आप को दे देना चाहिए। उस के अतिरिक्त आप परिवार की जो संयुक्त संपत्ति है उस में से कोई हिस्सा अभी नहीं चाहते हैं। यदि आप उन के साथ मकान में आ कर रहेंगे तो उस से आप के पास कुछ बचत होगी और आप उन की मदद भी कर पाएंगे। यदि पिता के कथनानुसार चले तो फिर न बचत होगी और न आप उन की मदद कर पाएंगे।

प अपने पिता को ठीक से समझाएँ। यदि हो सके तो कुछ अन्य लोग जिन पर आप के पिता विश्वास कर सकते हैं उन की मदद ले कर अपने पिता को नई परिस्थितियों को समझाने की कोशिश करेंगे तो यह मामला घर में बातचीत और आपसी समझ से हल हो सकता है। अन्यथा कोर्ट कचहरी में तो समय भी लगता है और दोनों पिता-पुत्र का पैसा बरबाद होगा। यदि यही पैसा बचेगा तो परिवार के काम आएगा। मुझे लगता है कि आप के पिता इतनी समझ तो रखते ही होंगे कि आप के द्वारा समझाई बात को समझ सकेंगे, शायद वे भी कोर्ट कचहरी पसंद नहीं करें और इस नौबत को टालने का प्रयत्न करें। यदि फिर भी नहीं समझ पाते हैं तो आप के पास अपने अधिकारों के लिए न्यायालय में गुहार लगाने के सिवा कोई चारा नहीं रहेगा।

अचल संपत्ति क्रय करने पर क्रेता को क्या खर्चे देने होंगे?

समस्या-

मैं एक मकान खरीदना चाहता हूँ। उस मकान की कीमत अदा करने के अतिरिक्त मुझे और क्या क्या खर्चे देने होंगे? कृपया बताएँ?

-प्रमोद कुमार, पानीपत, हरियाणा

समाधान-

ब भी किसी संपत्ति के क्रय विक्रय का सौदा होता है तो दोनों पक्ष क्रेता और विक्रेता मिल कर तय करते हैं कि लेन-देन क्या होगा और किस तरह होगा?   मकान, दुकान, खेत आदि अचल संपत्ति के क्रय विक्रय का सौदा करना हो तो यह देखा जाना चाहिए कि बेची-खरीदी जा रही संपत्ति पर कोई भार तो नहीं है, जैसे, उस संपत्ति पर कोई कर्ज तो नहीं ले रखा है, किसी सरकारी विभाग का कोई टेक्स आदि तो बकाया नहीं है। जब भूमि फ्री-होल्ड की होती है तो उसे बिना किसी की अनुमति के बेचा जा सकता है। लेकिन यदि पट्टे (लीज होल्ड) की संपत्ति हो तो उस में पट्टाकर्ता (लेसर) की अनुमति लिया जाना आवश्यक है। यदि पट्टाकर्ता ऐसी अनुमति प्राप्त न की गई हो तो खरीददार विक्रय पत्र के पंजीयन के बाद जब उस संपत्ति का नामान्तरण अपने नाम कराने जाएगा तो उसे भारी जुर्माना राशि अदा करनी पड़ सकती है।

ब भी संपत्ति का मूल्य तय करने की बात होती है तो आम तौर पर उस का बाजार मूल्य ही तय होता है।  यदि संपत्ति पर किसी तरह का भार हो और उस भार की अदायगी विक्रेता को करनी होती है, तब विक्रय मूल्य उस के बाजार मूल्य के समान तय होता है। लेकिन यदि किसी संपत्ति पर भार हो और उस की अदायगी क्रेता को करनी हो तो संपत्ति का क्रय मूल्य उसी अनुपात में कम हो जाता है। इस तरह यह दोनों पक्षों के बीच हुई विक्रय की संविदा पर निर्भर करता है कि किसे क्या देना और करना है। किसी भी सौदे में संपत्ति पर भारों की समस्त देनदारी विक्रेता की ही मानी जाएगी। क्यों कि क्रेता तो संपत्ति को समस्त भारों से रहित ही खरीदता है और विक्रेता को केवल संपत्ति का मूल्य और विक्रय पत्र के पंजीयन का खर्च अदा करता है। इस के अलावा जो भी खर्चे होते हैं उन की अदायगी विक्रेता का दायित्व है। यदि विक्रय पत्र के पंजीयन के लिए किसी तरह का कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था से प्राप्त करना आवश्यक हो तो उसे प्राप्त करने की जिम्मेदारी भी विक्रेता की है। लेकिन यदि विक्रय संविदा में यह तय हो गया हो कि यह खर्च क्रेता वहन करेगा तो यह सब खर्च फिर क्रेता का दायित्व हो जाता है।  यदि सौदे में कुछ भी न लिखा हो तो फिर यह सब खर्चे विक्रेता की जिम्मेदारी होंगे। वैसे भी किसी क्रेता को इसी शर्त पर ही कोई सौदा करना चाहिए कि वह केवल विक्रय मूल्य अदा करेगा तथा विक्रय पत्र के पंजीयन का खर्च उठाएगा, शेष सभी जिम्मेदारियाँ विक्रेता पर छोड़नी चाहिए। इसी के आधार पर संपत्ति का विक्य मूल्य तय करना चाहिए।

ब क्रेता विक्रेता की किसी जिम्मेदारी को ले लेता है तो अक्सर वह फँस जाता है। उसे वह जिम्मेदारी पूरी करनी होती है और विक्रेता निर्धारित अवधि में पूरा विक्रय मूल्य अदा करने पर दबाव डालता है। लेकिन यदि जिम्मेदारी विक्रेता की हो तो वह सारी जिम्मेदारियाँ पूरी करने  के उपरान्त ही क्रेता से पूरा मू्ल्य वसूल करने और विक्रय पत्र का निष्पादन करने की बात कह सकेगा। यदि तय समय में विक्रेता संपत्ति के विक्रय से पूर्व की सारी औपचारिकताएँ पूर्ण नहीं कर पाता है तो क्रेता सौदा निरस्त कर के क्रेता से उसे अदा कर दी गई अग्रिम राशि और हर्जाना वसूल करने की स्थिति में होता है। यदि किसी क्रय-विक्रय संविदा में अनापत्ति प्रमाण पत्र सहित समस्त खर्चो के मामले में कुछ भी नहीं तय हुआ है तो वे सभी खर्च उठाने की जिम्मेदारी विक्रेता की है।

लालच के शिकारों को बचाने के लिए कानून मे बदलाव निहायत जरूरी

ब जा कर यह स्थिति बनने लगी है कि निर्माण कंपनियाँ कानून के प्रति जो असावधानियाँ बरतती है उस के खिलाफ कार्यवाही होने लगी है। हालाँ कि इस स्थिति के निर्माण में मीडिया की भूमिका प्रमुख है, क्यों कि दुर्घटना होने के तुरंत बाद जिस तरह से मीडिया संवाददाता खोज बीन कर कानूनी कमियों को खोज निकालते हैं और पुलिस व अन्य एजेन्सियों के लिए कानूनी कार्यवाही करना आवश्यक हो जाता है अन्यथा ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं के कृष्ण धनबंधन उजागर होने लगते हैं। लेकिन कानूनी कार्यवाही की जो तलवार लटकी है उस से निपटने के लिए अब अफसरों ने हड़ताल का सहारा लिया है कि उन के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही न की जाए। 

कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के झालावाड़ जिले के नीमोदा के पास निर्माणाधीन 1200 मेगावाट के सुपर थर्मल पावर स्टेशन पर 6.7 टन की एल्बो उठाते समय रोप टूट जाने से हुए हादसे में तीन श्रमिकों की दब कर मृत्यु हो गई। बात राष्ट्रीय स्तर तक मीड़िया में गई तो पुलिस ने आनन फानन में सदोष मानव वध मानते हुए निर्माण उप कंपनियों के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत ने फिलहाल उन की जमानत लेने से इन्कार कर दिया। थर्मल के निर्माण में जुटे ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के अफसरों ने इस कदम के विरुद्ध हड़ताल कर दी है और थर्मल इकाई का निर्माण कार्य रुक गया है।

यह एक नई परिस्थिति है, और लगता है हमारे प्रशासन के पास इस नई परिस्थिति से निपटने के लिए केवल यही एक रास्ता बचा है कि कानून को अपना काम करने से रोक दिया जाए। वैसे भी जमीन के नीचे धन की जो नहरें बहती हैं उन के कारण कानून अपना काम कभी कभी ही कर पाता है। इस नई परिस्थिति का कारण यह है कि कानून ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के प्रबंधकों को इन लापरवाहियों के लिए दोषी मानता है। जब कि ये प्रबंधक वास्तव में साधारण वेतन पर रखे गए कर्मचारी होते हैं। उन की स्थिति मजदूरों की अपेक्षा कुछ ही बेहतर होती है और रोजगार बनाए रखने के लिए अपने नियोजक की हर अच्छी बुरे काम को अंजाम देते रहते हैं। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इस तरह की दुर्घटना होने पर मुख्य निर्माण कंपनी के निदेशकों/मालिकों और उप निर्माण कंपनी के मालिकों और ठेकेदारों को ही इस तरह की दुर्घटना के लिए जिम्मेदार मानने के लिए कानन बनना चाहिए। क्यों कि असल में सुरक्षा की आवश्यकता को दरकिनार करने का काम धन बचाने के लिए उन्हीं के निर्देशन पर संपन्न होता है औऱ बचे हुए धन के स्वामी भी वे ही बनते हैं। इस तरह यदि किसी दुर्घटना के लिए कोई अपराधिक लापरवाही का मामला बनता है तो सजा का भागी भी वस्तुतः उन्हीं लोगों को बनना चाहिए जो कि उस व्यवसाय से अधिक से अधिक धन कमाते हैं। उन्हीं की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि जिस कार्य से वे धन कमा रहे हैं उस से मनुष्य के प्रति कोई अपराध घटित न हो।

लेकिन अब तक जो कानून हैं उन में  हमेशा कुछ विशिष्ठ पदों पर नियुक्त अधिकारियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। ये अधिकारी बड़ी कंपनियों में तो बड़े वेतन पाते हैं लेकिन मंझोले कारोबारों और उद्योगों में ये अधिकारी बहुत मामूली वेतनों पर काम कर रहे होते हैं। यही वजह है कि जब ठेकेदार कंपनियों के अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया तो वे ही हड़ताल पर उतर आए। उन का हड़ताल पर जाना बहुत वाजिब लगता है। क्यों कि वे सारे काम तो अपने मालिकों के निर्देशो

जिरह के बाद आत्महत्या के मामले में जज की जिम्मेदारी क्यों न तय हो?

बर पढ़ कर मन खट्टा तो हुआ ही लेकिन हमारी न्याय-प्रणाली पर क्षुब्धता उत्पन्न हुई। आखिर वह कौन जज था जिस ने मुकदमे की आदेशिका में यह नोट लगाया कि ‘खुदकुशी करने से ठीक पहले महिला के साथ कोर्ट में इस तरह के सवाल पूछे गए थे कि वो पूरी तरह से टूट गई’, लेकिन उस तरह के सवालों को पूछने से सफाई पक्ष के वकील को नहीं रोक सका।
इस खबर ने न केवल हमारी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है अपितु न्याय व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिस महिला के साथ उस के पति की हाजिरी में उस के देवर ने बलात्कार किया हो और बाद में सास ने उसे ही प्रताडित किया हो पहले ही टूट चुकी होना स्वाभाविक है। किसी तरह इस मुकदमे के दर्ज हो जाने के बाद यह तो हो ही नहीं सकता कि ठीक सुप्रीम कोर्ट की नाक के नीचे दिल्ली की अदालत सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विरुद्ध केमरा ट्रॉयल न करे। केमरा ट्रायल में असंबंधित व्यक्ति तो क्या संबंधित व्यक्ति भी जरूरी न हो तब तक उपस्थित नहीं रह सकता। जज को ऐसी ट्रॉयल के दौरान खुद उपस्थित रहना जरूरी है। जज उपस्थित भी था और उस ने अदालत की मुकदमे की पत्रावली पर नोट भी डाला कि पीड़िता जिरह के दौरान बुरी तरह टूट गई थी। वह कौन सी बात थी जिस ने जज को ऐसे प्रश्न पूछने से सफाई पक्ष के वकील को नहीं रोका? जब यह घटना प्रकाश में आ गई है तो उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय का यह भी दायित्व बनता है कि वह उस जज के बारे में जाँच करे, उस से जवाब तलबी करे कि आखिर उस ने ऐसा क्यों होने दिया? यदि लगता है कि जज की भूमिका कानून सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नहीं पायी जाए तो उसे उचित दंड भी मिलना चाहिए जिस से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और उन पर रोक लगे।
ब जज ने पत्रावली पर नोट डाला तो उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए था कि गवाही के उपरांत उस महिला की सुरक्षा की क्या व्यवस्था है? क्यों कि जिरह के बाद भी पीड़िता को उस की ससुराल वालों ने बुरी तरह धमकाया था। उसी के बाद उस बदकिस्मत महिला ने आत्महत्या कर ली। ऐसे लोगों और परिवारों का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए। तीसरा खंबा महिला आयोग व मानवाधिकार आयोगों से भी आग्रह करता है कि इस घटना की पूरी जाँच कर तुरंत दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही की जानी चाहिए।


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