Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Coparcenary Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

जालसाजी और त्रुटि के आधार पर दस्तावेज निरस्त करने का वाद दस्तावेज की जानकारी होने से 3 वर्ष की अवधि में लाया जा सकता है।

समस्या-

गौरव मिश्रा ने ग्राम-मोहान, जिला-कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मने और हमारे बड़े भाई जी ने हमारे बड़े ताऊ जी यानी हमारे पिता जी के बड़े भाई से 12.02.2004 को उनके भूमि के 1/2 भाग यानि उनकी संपूर्ण जमीन का पंजीकृत बैनामा कराया था। जिसका दाख़िल ख़ारिज भी हो चुका था। हमारे ताऊ जी का यानी विक्रेता का सन 2015 में स्वर्गवास हो चुका है, अब विक्रेता (ताऊ जी) की इकलौती विवाहित पुत्री कहती है कि हमारे पिता से बैनामा धोखे से फर्ज़ी तरीके से के करा लिया गया है।  उसने किसी के कहने पर पर हमारे खिलाफ (दीवानी न्यायलय) में बैनामा निरस्त करने के लिए 23.02.2018 को मुकदमा डाल दिया है, यानी बैनामा होने के 14 वर्ष बाद।  हम यह जानकारी चाहते हैं कि बैनामा होने के कितने वर्ष बाद तक बैनामा निरस्त कराने के लिये मुकदमा डाला जा सकता है, और जो हमारा मुकदमा चल रहा है उसे ख़ारिज कैसे करायें, जिससे हमारा समय और पैसे बर्बाद ना हो?

समाधान-

प ने और आप के भाई ने अपने ताऊजी से जमीन खरीद ली, उस के विक्रय पत्र का पंजीयन हो गया। इस पंजीयन के 14 वर्ष बाद ताऊजी की पुत्री ने उस विक्रय को धोखे से, फर्जी तरीके से कराने का आरोप लगाते हुए दीवानी वाद संस्थित किया है। आम तौर पर इस तरह का वाद दस्तावेज के निष्पादन की तिथि अर्थात पंजीयन की तिथि के तीन वर्ष की अवधि के भीतर ही किया जा सकता है, उस के उपरान्त नहीं। उस के उपरान्त ऐसा वाद दाखिल होने पर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण ग्रहण के योग्य ही नहीं रहता है और न्यायालय ऐसे वाद को पंजीकृत करने के पूर्व ही निरस्त कर सकता है। लेकिन आप के मामले में वाद को पंजीकृत भी किया गया है और आप को उस के समन भी प्राप्त हो चुके हैं। इस से स्पष्ट है कि वाद को निर्धारित अवधि में लाने के लिए कुछ न कुछ कथन वाद-पत्र में किए गए होंगे। आप को वे कथन यहाँ अपनी में हमें बताने चाहिए थे। जिस से समाधान करने में हमें सुविधा होती।

ह तो स्पष्ट है कि आप के विरुद्ध विक्रय पत्र के पंजीयन को निरस्त कराने के लिए फ्रॉड/ जालसाजी करने का आधार लिया गया है। इस के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 17 में अलग से उपबंध दिए गए हैं। इस में यह कहा गया है कि यदि जालसाजी या किसी त्रुटि से निर्मित किए गए दस्तावेज को प्रतिवादी ने ही छुपा कर रखा है तो उस मामले में लिमिटेशन तब आरंभ होगी जब कि जालसाजी से निर्मित दस्तावेज की जानकारी वादी को होगी। आप के मामले में वाद प्रस्तुत करने के लिए इसी उपबंध का सहारा लिया गया प्रतीत होता है।

दि आप ने भूमि का क्रय करने के बाद दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं किया है और अपने पास रखा है तो निश्चित रूप से आप के ताऊ की पुत्री को तभी उस की जानकारी हुई होगी जब ताऊ जी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति  को उन की पुत्री ने अपने नाम नामांतरण कराना चाहा होगा और जमीन का रिकार्ड देखा होगा। इस तरह आप के ताऊजी की मृत्यु से तीन वर्ष की अवधि में आप के विरुद्ध वाद फ्रॉड के आधार पर ही लाया जा सकता था।

ब इस वाद का समापन केवल और केवल दोनों पक्षों की साक्ष्य के उपरान्त ही किए गए निर्णय से ही हो सकता है। इस का कोई शॉर्टकट नहीं है। मुकदमा आप को लड़ना होगा। उस की अपील भी लड़नी होगी। तब तक लड़ना होगा जब तक खुद वादिनी थक हार कर घर नहीं बैठ जाती है। इस के सिवा कोई उपाय नहीं है।

एक ही व्यक्ति द्वारा दो दत्तक ग्रहण संभव हैं।

समस्या-

जयपुर, आँन्ध्रप्रदेश से रविराज ने पूछा है –

मेरे ताउजी जो 1960-1970 में जिसकी तारीख मेरे पास नहीं है 10-20 साल के बीच की उम्र के थे, तब ताउजी व पिताजी की विधवा भाभी के गोद चले गए थे। जिसका रजिस्टर्ड गोदनामा है।  लेकिन मेरे ताउजी अपनी भाभी के पास नहीं रहे व अपने पिता के पास वापस आ गये व उनके साथ रहने लगे।  कुछ समय पश्चात पापाजी की भाभी जी ने पापा जी को 1985 में गोद ले लिया व रजिस्टर्ड गोदनामा बना लिया, तब पापाजी की उम्र लगभग ३० वर्ष थी व शादी हो चुकी थी व भाइयों से अलग हो चुके थे। मेरे पिताजी ने उनकी खूब देखभाल की जो एक पुत्र करता है।  उनका अंतिम संस्कार तथा अन्य सामाजिक कार्य भी बड़ी अच्छी तरह किया था। सब लोगो को पता है कि मेरे पिताजी ने ही अपनी भाभी की सम्पति (यह एक कृषि भूमि है जो मेरे पिता की भाभी को अपने पति से मिली थी व भाभी के पति को यह भूमि अपने पिता से मिली थी) के असली हक़दार हैं, यह भूमि जब से पिताजी गोद गए हैं तब से हमारे कब्जे में है व हम इस पर काश्तकारी का कार्य कर रहे हैं, 1998 में पापाजी की भाभी जी का देहांत हो गया व भूमि राजस्व रिकॉर्ड में 1998 से पापाजी के नाम हो चुकी है।  अब मेरे पापाजी की भाभी, मेरे ताउजी, मेरे पापाजी के पापाजी (मेरे दादाजी व दादीजी का देहांत हो चूका है) मेरे पापाजी जीवित हैं।  हमारे व ताउजी के परिवार जिस में (ताईजी व उनके २ पुत्र व् उनकी उनकी २ पुत्र वधु हैं) से हमारी बनती नहीं है (मनमुटाव हैं)। मेरे सवाल हैं कि क्या कभी मेरे ताउजी का परिवार हमारी सम्पति पर दावा कर सकता है कि-

1. यह हमारी सम्पति है (क्यूंकि ताउजी पापाजी से पहले गोद जा चुके थे)?
२. क्या हमें हमारे असली दादाजी यानि पापाजी की पैतृक पिता की सम्पति से भी बेदखल कर सकते हैं? (इस आधार पर कि आप के पिता गोद गए हुए हैं) जो की सहदायिक है जिसमे पापाजी का नाम गोद जाने के बाद यानि 1989 (इस समय पापाजी के पैत्रक पिता का का देहांत हुआ था) से राजस्व रिकॉर्ड में मौजूद है।
३. क्या पापाजी का गोद जाना गैर क़ानूनी है क्यूंकि गोद जाते वक्त उनकी उम्र ३० वर्ष थी तथा विवाह हो चुका था? अगर गैर क़ानूनी है तो गोदनामा रजिस्टर्ड कैसे हुआ?
४.यदि हमारे ऊपर कभी ऐसी परेशानी आये तो हमारा बचाव कैसे हो सकता है? क्या निम्न प्रकार हम या पिता जी बचाव कर कर सकते हैं जैसा कि (क) पिताजी भाइयों से अलग होने के बाद गोद गए हैं (ख) परिवार के सभी सामाजिक कार्यों में बराबर हिस्सा देते रहे हैं या अन्य कोई उपाय है तो बताये।

समाधान-

की समस्या एक ही व्यक्ति द्वारा किए गए दो दत्तक ग्रहण से संबंधित है। ग्रहण किए गए दत्तक की उम्र 15 वर्ष से अधिक होने या विवाहित होने मात्र से उसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता है। यदि परिवार और बिरादरी में 15 वर्ष से अधिक उम्र और विवाहित व्यक्ति को गोद लेने की परंपरा रही है तो यह संभव है और यह वैध होगा। इस तरह आप के ताऊजी का और आप के पिताजी का दत्तक ग्रहण दोनों ही वैध हो सकते हैं।

त्तक लिए गए पुत्र को पैतृक संपत्ति का जो भाग दत्तक ग्रहण के पूर्व प्राप्त हो चुका है वह उस से नहीं छीना जा सकता है।  इस तरह दत्तक ग्रहण से पूर्व के परिवार की संपत्तियों में उन्हें दत्तक ग्रहण के पूर्व जो अधिकार प्राप्त हो चुका है वह उन का ही रहेगा। लेकिन दत्तक ग्रहण की तिथि के उपरान्त उन्हें कोई भी अधिकार अपनी पूर्व के पैतृक परिवार से प्राप्त नहीं होगा। इस तरह पूर्व के पैतृक परिवार से प्राप्त कौन सी संपत्ति दोनों के हिस्से में आएगी यह दोनों के दत्तक ग्रहण की तिथियों से निर्धारित होगा।

क्यों कि दोनों ही दत्तक हैं इस कारण से दत्तक माता की संपत्ति पर दोनों का बराबर का अर्थात आधा आधा अधिकार रहेगा।

लेकिन यदि कोई भी संपत्ति आप के पिता के नाम आ चुकी है और विगत 12 वर्ष से अधिक समय से उन का उस पर कब्जा है तो उस के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही किसी न्यायालय में इस लिए संस्थित नहीं की जा सकती है कि अवधि विधान के अनुसार कार्यवाही किया जाना बाधित है। यदि आप के पिताजी पर कोई कार्यवाही की जाती है तो उस का मुकाबला अन्य आधारों के साथ साथ अवधि विधान के आधार पर किया जा सकता है।

दीवानी वाद निर्धारित अवधि के उपरान्त प्रस्तुत नहीं किया जा सकता

 समस्या-

मैं ने 6.02.2006 को एक मकान खरीदने की संविदा की थी। दिनांक 04-02.2006 को मैं ने विक्रेता को अग्रिम राशि 50,000/- रुपए दिए। संविदा 3, 50, 000/- की थी। परन्तु विक्रेता को वह संपत्ति दान में प्राप्त हुई थी और विक्रेता ने मुझे मकान के पूरे दस्तावेजात नहीं बताए थे। मैं ने दिनांक 11-02.2004 को विक्रेतागण के विरुद्ध एक परिवाद दायर किया और फौजदारी मुकदमा किया। प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मेरे परिवाद को माना और विक्रेता को धारा 420 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत दोषी माना। विक्रेता  उस मुकदमे को सत्र न्यायालय में ले गए। सत्र न्यायालय ने उस मामले को दीवानी प्रकृति का मानते हुए निर्णय दिया। मैं मुकदमे को उच्च न्यायालय में ले गया। उच्च न्यायालय ने भी दिनांक 06.02.2012 को यही निर्णय दिया कि मामला दीवानी प्रकृति का है।   क्या मैं अब सिविल मुकदमा दायर कर सकता हूँ?

-संचित, चूरू, राजस्थान

समाधान-

प ने अपने प्रश्न में अनेक तथ्य छिपा लिए हैं।  विक्रेता को संपत्ति दान में मिलने मात्र से यह स्पष्ट नहीं होता कि आप को धारा-420 भा.दं.संहिता के अंतर्गत मुकदमा क्यों करना पड़ा। यह तो तभी संभव था जब कि संपत्ति को बेचने का विक्रेता को अधिकार न होता और उस ने आप के साथ संविदा कर के रुपया प्राप्त किया होता। संभव है ऐसा ही हुआ हो लेकिन आप ने  यह बात अपने प्रश्न में प्रकट नहीं की।

प की संविदा दिनांक 06.02.2006 को हुई थी, रुपया आप दो दिन पहले ही दे चुके थे। आप ने संविदा करने वाले के विरुद्ध फौजदारी मुकदमा किया। आखिर आप उस मुकदमे से राहत क्या चाहते थे। एक फौजदारी मुकदमे में अपराध करने वाले व्यक्ति को केवल मात्र सजा और जुर्माना हो सकता है।   जिस से परिवादी को केवल संतोष प्राप्त होता है। कोई भौतिक राहत प्राप्त नहीं होती। यह अवश्य  है कि न्यायालय परिवादी को कुछ हर्जाना दिला सकती है। लेकिन प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की हर्जाना दिलाने की सीमा भी सीमित होती है। इस कारण यह तो आरंभ से निश्चित था कि आप द्वारा विक्रेता को दिया गया अग्रिम रुपया आप के परिवाद पर संस्थित फौजदारी मुकदमे से प्राप्त नहीं हो सकता।

जो तथ्य आप ने बताए हैं उन के अनुसार आप को जिस दिन यह पता लगा कि विक्रेता ने उस का संपत्ति पर विक्रयाधिकार न होते हुए भी आप के साथ संविदा कर के रुपए 50,000/- प्राप्त कर लिए हैं। उसी दिन वाद कारण उत्पन्न हो चुका था और दीवानी मुकदमा करने के लिए अवधि आरंभ हो चुकी थी। कोई भी वाद अवधि अधिनियम द्वारा निर्धारित अवधि व्यतीत हो जाने के उपरान्त प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। आप के पक्ष में वाद कारण उत्पन्न होने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि में आप यह मुकदमा कर सकते थे। आप के द्वारा मुकदमा करने की अवधि समाप्त हो चुकी है। अब आप उन 50,000/- रुपए की वापसी और हर्जाने के लिए  दीवानी मुकदमा नहीं कर सकेंगे।

फिर भी हो सकता है कि कोई और राह निकल आए। इस के लिए आप अपने क्षेत्र के किसी वरिष्ठ दीवानी वकील से मिलें और समस्त दस्तावेज और परिस्थितियाँ उन्हें बताएँ। यदि आप के उन 50,000/- रुपयों की वसूली के लिए कोई उपाय हो सकेगा तो वे अवश्य बता देंगे।

क्रेताओं के विरुद्ध वाद कारण विक्रय पत्र के पंजीयन की तिथि पर उत्पन्न होगा

समस्या –

क वाद  अधिमान्य अधिकार Preferential Right हेतु विचाराधीन है जो अविभाजित हिन्दू पैत्रृक संपत्ति का है इसके ४ सहस्वामी है वाद प्रस्तुति के बाद ३ सहस्वामी ने इस सम्पत्ति को आपस में मिलकर ४ क्रेताओं को विक्रय कर दिया। इस वाद में जो ४ क्रेता है उन में से एक क्रेता वाद प्रस्तुति के समय से ही वाद में पक्षकार रहा है और उसने अपने पुत्र भाई एवं भतीजे के नाम से विक्रय पत्र सम्पादित किए हैं। वादी ने यह वाद प्रस्तुत किया कि वादग्रस्त सम्पत्ति में उसका १/४ स्वत्व है और शेष ३/४ स्वत्व क्रय करने का अधिमान्य अधिकार (Preferential Right है।  वाद प्रस्तुति के बाद में विक्रय पत्र का पंजीयन हुआ इस कारण से अन्य ३ क्रेताओं को बाद में पक्षकार बनाने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया।  हालाँकि एक आवेदन आदेश १ नियम १० दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत तत्काल प्रस्तुत कर दिया था और उस का आदेश होने पर आदेश ६ नियम १७ दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पक्षकारों के नाम जोड़ने हेतु प्रस्तुत कर दिया था लेकिन इस आवेदन पर आदेश आने में २ वर्ष का समय लगा। मेरे प्रश्न  हैं कि इस वाद में Limitation Act का प्रभाव क्या होगा? क्या वाद में एक क्रेता पक्षकार समयावधि में है और अन्य समय बाधित हैं? क्या वाद प्रस्तुति दिनांक और संशोधन दिनांक, दोनों तिथियाँ लिमिटेशन को प्रभावित करती हैं? इस परेशानी का अन्य कोई उपाय क्या है?

-राजेश, इन्दौर, मध्यप्रदेश

समाधान-

क चार व्यक्तियों के संयुक्त स्वामित्व की संपत्ति को उस के तीन स्वामियों ने विक्रय कर दिया। आप उस के विरुद्ध यह वाद ले कर आए कि उस संपत्ति को वे विक्रय नहीं कर सकते क्यों कि उस संपत्ति में 1/4 हिस्सा आप का भी है। उस के अलावा आप ने यह भी कहा कि वे यदि अपने हिस्से विक्रय करना चाहते हैं तो आप को उन के 3/4 भाग को क्रय करने का अधिकार है। उन तीन हिस्सेदारों ने जब विक्रय का अनुबंध किया तभी आप ने उन के विरुद्ध तथा अनुबंध करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध  वाद प्रस्तुत कर दिया। इस वाद के लिए वाद कारण या तो उक्त संपत्ति को बेचे जाने की आशंका से उत्पन्न हुआ या फिर उन के बीच हुए लिखित अनुबंध से। आप ने अपने वाद में  वाद कारण क्या लिखा है यह तो आप ही बेहतर जानते हैं।

वाद प्रस्तुत करने के उपरान्त उक्त संपत्ति के तीन भागीदारों ने उक्त संपत्ति के विक्रय पत्र का पंजीयन करवा दिया। उस पंजीयन से आप को पता लगा कि उक्त संपत्ति किन व्यक्तियों को विक्रय की गई है। जिस दिन आप को यह पता लगा कि उक्त संपत्ति क्रय करने वाले अन्य लोग कौन हैं, उसी दिन उन व्यक्तियों के विरुद्ध वाद कारण उत्पन्न हो गया। आप द्वारा पहले से प्रस्तुत किए गए वाद में विक्रय पत्र का निष्पादन और पंजीयन पश्चातवर्ती घटनाएँ थीं। दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 तथा  आदेश 1 नियम 10 के अंतर्गत पश्चातवर्ती घटनाओं के आधार पर आदेश पारित किया जा सकता है। यदि आप ने उक्त दोनों प्रार्थना पत्र विक्रय पत्र के पंजीयन की तिथि से या उस के बाद आप द्वारा उस की जानकारी होने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के भीतर प्रस्तुत किए हैं तो आप के वाद पर अवधि अधिनियम  के उपबंधों का कोई प्रभाव नहीं होगा। आप के समक्ष वास्तव में कोई परेशानी नहीं है।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada