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बेईमानी पूर्ण छल के लिए पुलिस में रिपोर्ट कराएँ और धन वसूली के लिए दीवानी वाद संस्थित करें।

समस्या –

मनीषा ने विकास नगर, कोंडगाँव, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे समाज वाले व सहेली के पति ने अपनी पत्नी के सामने मुझसे 50000 रुपये 2 महीने के लिये मांगे थे। मैंने परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्टाम्प पर लिखवा कर उनको पैसे दिए।  1 महीने बाद शहर छोड़ कर भाग गया, अब जब मुझे अपने पैसे वापस चाहिये तो मुझे बोलते हैं कि  मैं तो कंगाल हूँ, सब अपनी बीवी के पास छोड़ आया हूँ, जा के उससे पैसे मांगो,  उसको टॉर्चर करो, मैं कहाँ से दूंगा। मैंने हर संभव कोशिश कर ली, पर वो किसी चीज़ से नहीं डरता। धीरे धीरे भी पैसे वापस करने का नाम नहीं ले रहा । उसकी पत्नी ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया के मैं खुद अपने भाई के दरवाजे पर हूँ, कहाँ से तुमको पैसे दूँ। वो आदमी और भी बहुत लोगों से पैसे लेकर गया है। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

सा प्रतीत होता है कि सहेली के पति ने जानबूझ कर अपनी पत्नी को परेशान करने की नीयत से आप से रुपया लिया है और अब पल्ला झाड़ रहा है। यदि आपने स्टाम्प पर लिखवाया है तो आप अपने धन की वसूली के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं। यह वाद रुपया देने और स्टाम्प लिखे जाने की तारीख से तीन साल के भीतर किया जा सकता है। इस तरह आप स्टाम्प लिखे जाने की तिथि से तीन साल पूरे होने के दो माह पहले तक धन वापसी के लिए दूसरे प्रयास कर सकती हैं। लेकिन तीन साल पूरे होने के दो महीने पहले ही किसी वकील से मिल कर दीवानी वाद संस्थित कर दें, उस में कोताही नहीं करें।

इस व्यक्ति ने आप के साथ ही छल और बेईमानी की है जो कि धारा 420 आईपीसी व अन्य धाराओं के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इस कारण आपको तुरन्त उस व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। आम तौर पर पुलिस वाले इस तरह के मुकदमों को दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। पुलिस को रिपोर्ट देने के बाद एक दो दिन में कार्यवाही न होने पर एस पी को लिखित में परिवाद पूरे विवरण के साथ रजिस्टर्ड एडी से भिजवाएँ। एक सप्ताह में भी कोई कार्यवाही न होने पर किसी वकील से संपर्क कर के न्यायालय में अपराधिक परिवाद दर्ज कराएँ। अपराधिक कार्यवाही के दबाव में आप का पैसा वसूल हो जाए तो ठीक अन्यथा स्टाम्प लिखे जाने की तिथि के तीन साल पूरे होने के पहले अपना रुपया वसूली का मुकदमा अदालत में जरूर लगा दें।

दोनों ही मामलों में आप अपनी सहली के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करें बल्कि उसे गवाह बनाएँ क्यों कि वह इस वक्त आपका साथ जरूर देगी।

बकाया वेतन के लिए विधिक नोटिस दे कर दीवानी वाद दाखिल करें …

कानूनी सलाहसमस्या-

नवीन ने गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने 24 फऱवरी 2014 को नोएडा, उत्तर प्रदेश के एक न्यूज चैनल में मैनेजिंग एडिटर के तौर पर ज्वाइन किया। छोटे स्तर की इस कंपनी ने मुझे ऑफर लेटर और पहचान पत्र दिया, लेकिन ज्वाइनिंग लेटर आदि दूसरे कोई भी दस्तावेज नहीं दिए। मार्च, अप्रैल, मई और जून में मुझे चेक से वेतन मिला, कई बार देर सवेर। लेकिन जुलाई का वेतन रोक लिया गया। कहा- कंपनी में आर्थिक संकट है, बाद में मिलेगा। इस दौरान वेतन 1.5 लाख का तिहाई हिस्सा 50 हजार रुपये देकर बोला- बाकी बाद में मिलेगा। अगस्त और सितंबर में भी वेतन नहीं मिला तो मैंने ऑफिस जाना बंद कर दिया। कंपनी ने 50-50 हजार की दो किश्ते फिर दीं, यानी जुलाई 14 तक का वेतन पूरा किया, लेकिन बाकी के दो महीने का वेतन नहीं दे रही, जो 3 लाख रुपये होता है। कंपनी इन्कम टैक्स तो काटती रही, लेकिन पीएफ आदि कोई दूसरी कटौती या सुविधा किसी कर्मचारी को नहीं देती। मैंने अभी लिखित इस्तीफा नहीं सौंपा है, लेकिन वेतन वेतन मिलने की संभावना भी नहीं लग रही, ऐेसे में मुझे क्या करना चाहिए? अपना वेतन लेने के लिए कानूनन किस तरह का कदम उठाना ठीक रहेगा?

समाधान-

प का जुलाई 14 तक का वेतन प्राप्त हो चुका है। लगता है आप 14 अक्टूबर तक ड्यूटी करते रहे उस के उपरान्त आप ने काम पर जाना बन्द कर दिया। बेहतर होता कि आप काम पर जाना बन्द करने के स्थान पर अपने कांट्रेक्ट की शर्तों के अनुसार त्यागपत्र दे देते जिस में कारण भी स्पष्ट कर देते कि कंपनी आर्थिक संकट का बहाना बना कर वेतन अदा नहीं कर रही है इस कारण आप त्यागपत्र दे रहे हैं। बकाया वेतन का तुरन्त भुगतान किया जाए।

खैर, त्याग पत्र तो आप तुरंत दे ही दें। उसे आप पिछली उस तिथि से भी दे सकते हैं जिस तिथि से आप ने कार्यालय जाना बन्द कर दिया था। वजह वेतन का समय से न मिलना और कंपनी का आर्थिक संकट में होना ही बताना चाहिए।

प के बकाया वेतन के लिए आप कंपनी को कानूनी नोटिस दे दें कि यदि वे 15 दिन में आप का बकाया वेतन अदा नहीं करते हैं तो आप उन के विरुद्ध बकाया वेतन की वसूली के ले दीवानी न्यायालय में वाद प्रस्तुत करेंगे जिस के हर्जे खर्चे के लिए भी कंपनी जिम्मेदार होगी।

छह माह से अधिक का किराया बकाया होते ही किराया वसूली और मकान/दुकान खाली करने का दावा करें।

Shopsसमस्या-
विपिन कुमार पाण्डे ने मेहर जिला मध्य प्रदेश से पूछा है-

मेरे किराएदार का सन 2007 में देहान्त हो गया है। मृत्यु के उपरान्त मैं ने उस के दोनों लड़कों से जब भघी दुकान को खाली करने को कहा तो दोनों लड़के टालमटोल कर रहे हैं। वे किराया भी नहीं दे रहे हैं। कई बार कहने पर भी बात को अनसुना कर देते हैं। बात करने जाता हूँ तो हील हवाली करने लग जाते हैं। अब मैं क्या करूँ?

समाधान-

प बड़े कमाल के दुकान मालिक हैं। किराएदार सात साल से किराया नहीं दे रहे हैं और आप सिर्फ उन से बात कर के आ जाते हैं। इतने वर्ष उन्हों ने गुजार दिए हैं फिर भी आप बात का ही सहारा ले कर बैठे हैं। आप को उन से दुकान खाली कराने के लिए तुरन्त कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए।

प का नगर एक छोटा कस्बा है। हमारे पास यह जानने का साधन नहीं है कि वहाँ मध्यप्रदेश स्थान नियंत्रण अधिनियम 1961 प्रभावी है अथवा नहीं। फिर आप की दुकान के मामले में प्रभावी है या नहीं। यदि यह प्रभावी है तो आप को इस कानून के अन्तर्गत किराया वसूली और दुकान खाली कराने के लिए किसी वकील से नोटिस दिलवा कर न्यायालय में दावा दाखिल करना चाहिए। यदि यह प्रभावी नहीं है तो संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम के अन्तर्गत लीज को समाप्त करने का नोटिस दे कर बकाया किराए और दुकान के कब्जे के लिए कार्यवाही करनी चाहिए।

क्सर लोग यह सोच बैठते हैं कि इस तरह का मुकदमा करने पर बरसों लग जाएंगे और दूसरे तरीके आजमाते रहते हैं और कभी कभी इतने वर्ष निकल जाते हैं जितने साल में तो कानूनी तरीके से दुकान का कब्जा मिल जाए और किराया भी वसूल हो जाए। इस कारण से यदि आप का किराएदार छह माह से अधिक का किराया बकाया कर दे तो उसी समय किराया वसूली और दुकान मकान खाली कराने के लिए दावा कर देना चाहिए। आप के मामले में भी अभी देरी नहीं हुई है। आप को तुरन्त किसी स्थानीय वकील से सलाह कर के दुकान खाली कराने और बकाया किराया वसूली का दावा कर देना चाहिए।

पिता व भाई दगा करें तो क्या उपाय है?

पति पत्नी और वोसमस्या-
दिल्ली से सुमन दुबे पूछती हैं –

मैं बिहार से हूँ और 2006 से मैं अपने पति के साथ दिल्ली में रहती हूँ। आज से लगभग 3 साल पहले( 2010 में मैं ने अपने पिता को दो लाख रुपये दिया एक लाख मैं ने दिया और एक लाख मैं ने अपने ससुराल से ससुर जी से दिलवाया। लेकिन पिता होने के कारण हम ने उनसे कोई लिखित नहीं लिया। उस के बाद मेरा भाई मेरे पास दिल्ली रहने आया। मेरे पिता ने मुझसे काफ़ी निवेदन किया और हम ने उसे बुला लिया और वह दिल्ली में रह कर ऑटो चलाने लगा। उसके बाद वो ग़लत संगति करना, शराब पीना, मेरे साथ गाली गलोज़ करना दो दो दिन घर से गायब रहना। घर में चोरी करना शुरू कर दिया। ऑटो किराए पर थी, गाड़ी का किराया भी मैं ने अपने गहने गिरवी रख कर दिया और अभी भी गाड़ी वाले का 50000/- रुपये बाकी है। मेरा भाई गाड़ी खड़ी करके भाग गया। आज उसे भागे दो साल  हो चुके हैं।  मेरे भाई और पिता ने मुझे काफ़ी मानसिक और आर्थिक तरीके से मजबूर किया, यहाँ तक कि मैं ने कितनी ही बार आत्म हत्या करने की ठान ली। लेकिन बच्चों के और पति तथा ससुराल वालों के प्यार को देख कर ऐसा नहीं कर पाई। नहीं तो मेरे ससुराल वाले उल्टे ही फँस जाते। लोग कहते हैं कि ससुराल वाले गलत हैं। लेकिन मैं कहती हूँ कि मायके वाले क्या ग़लती नहीं कर सकते? मेरे मायके वालों ने मुझे वो जख्म दिया है जो जीवन भर नहीं भरेगा। मैं अपने ससुराल वालों की बेटी हूँ, बहू नहीं। इतना प्यार मिलता है मुझे। 2012 में मैने अपने पिता को दिए हुए 200000/- रुपये वापस माँगे तो उन्होंने देने से मना करते हुए कहा कि मेरे बेटे ने तुझे कमा कर दे दिया है, अब तेरा कोई रुपया बाकी नहीं है। आज के बाद फ़ोन मत करना।  उस के बाद मैं ने पिता की संपत्ति में बँटवारे का केस डाल दिया। मेरे पिता के पास बिहार में पुश्तैनी घर और 35 बीघा खेती की ज़मीन है। हम तीन बहनें, दो भाई, मेरी दादी है। जब से मैने ये केस जिला न्यायालय में डाला है तब से मेरे भाई और पिता मेरे ससुराल वालों को, मुझे और मेरे पति को डरा-धमका रहे हैं। जान से मारने झूठे केस में फँसाने और किडनैपिंग करने की धमकी देते हैं। मेरे खिलाफ मेरे ससुराल वालों को भड़काते हैं और कहते हैं कि मैं ने आप का रुपया आप की बहू को दे दिया है। अब आप का कोई रुपया बाकी नहीं है। आप सभी लोग जेल जाओगे। मेरे भाई और पिता मेरे ससुराल वालों की और मेरी काफ़ी बेइज्जती करते हैं। मैं ये जानना चाहती हूँ कि क्या मुझे मेरा रुपया ब्याज़ के साथ मिल सकता है और क्या साथ ही पिता की संपत्ति भी मिल सकती है?  कुछ ज़मीनें मेरे दादा जी, दादी जी और पिता जी के नाम पर हैं तथा अभी मेरे पिता व दादी जी जीवित हैं और दादा जी काफ़ी साल पहले गुजर गये। साथ ही क्या मैं अपने मायके वालों पर बेइज्जती के लिए और डराने, धमकाने, के लिए भी दिल्ली में और बिहार में दोनो जगह केस डाल सकती हूँ?  मेरा भाई लोग मुझे गंदी गंदी गालियों का भी इस्तेमाल करता है और बहुत कुछ ऐसी बात कहते हैं जिस का ज़िक्र मैं यहाँ इस में नहीं कर सकती। उम्मीद करती हूँ आप समझ जाएँगे। अब सोचती हूँ की आत्महत्या कर ही लूँ। मेरा भाई यहाँ दिल्ली से हमारे जानने वालों से भी 50000/- रुपये लेकर भाग है दो साल हो गये।  जिससे लिया है वो हमारे ऊपर दबाव बना रहे हैं। अब आप सलाह दें कि क्या करना चाहिए?

समाधान-

प बहुत खुशकिस्मत इंसान हैं। आप को पिता और भाई अच्छे न मिले लेकिन आप को पति और ससुराल वाले अच्छे और भले मिले हैं। आप खुद भी अच्छी और भली हैं, यदि न होतीं तो आप पति और भाई की मदद न करतीं और छल का शिकार नहीं होतीं। लेकिन स्वार्थी और गंदे संबधियों के कारण आत्महत्या की सोचना भी गलत है। यदि आप ऐसा करती हैं तो आप आप से प्यार करने वाले पति, बच्चों और ससुराल के संबंधियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेंगी। आत्महत्या के बारे में सोचना बिलकुल बंद कर दें। विषम से विषम परिस्थितियों में लड़ना बेहतर होता है, बजाय इस के कि जीवन समाप्त कर लिया जाए।

ब से पहला काम तो आप ये कर सकती हैं कि आप दिल्ली के किसी दैनिक अखबार में सूचना प्रकाशित करवा सकती हैं कि आप के पिता और भाई से आप ने अपने सम्बन्ध उन के व्यवहार के कारण समाप्त कर लिए हैं। जिस से आप के संबंध के आधार पर कोई उन से व्यवहार न करे। जो लोग आप पर भाई का कर्जा चुकाने का दबाव डाल रहे हैं उन्हें साफ कह दें कि आप कुछ नहीं कर सकते। भाई को कर्जा या उधार सामान देते समय आप ने उस की गारन्टी तो नहीं दी थी कि वे आप को तंग करें।

प अपने पिता को दिए गए कर्जे को वसूल नहीं कर सकतीं यदि आप के पास उन्हें कर्ज देने का कोई दस्तावेज सबूत नहीं है। यदि कर्ज का दस्तावेजी सबूत है और कर्ज दिए हुए तीन वर्ष समाप्त नहीं हुए हैं तो आप कर्ज की वसूली के लिए दीवानी वाद दिल्ली के दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती हैं।

दि आप की दादा कोई पुश्तैनी जमीन/संपत्ति छोड़ गए हैं और उस का बँटवारा नहीं हुआ है तो आप उस में अपने हिस्से के लिए बिहार में दावा कर सकती हैं। लेकिन इस के लिए आप को उक्त संपत्ति के दस्तावेज दिखा कर बिहार में किसी दीवानी मामलों की वकालत करने वाले वकील से सलाह करनी चाहिए। कृषि भूमि से संबंधित कानून सब राज्यों में भिन्न भिन्न हैं और उन मामलों में राजस्व विभाग के रिकार्ड पर बहुत कुछ निर्भर करता है।

हाँ तक आप के पिता और भाई द्वारा किए गए अपराधिक कृत्यों मारपीट की धमकी देना, गाली गलौज करना आदि के लिए आप जहाँ उन्हों ने ये कृत्य किए हैं पुलिस थाना में रपट लिखा कर कार्यवाही कर सकती हैं या सीधे न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर के कार्यवाही कर सकती हैं।

लेकिन व्यवहारिक बात ये है कि आप दिल्ली में रहती हैं और आप के पिता व भाई बिहार में। यह सही है कि पिता व भाई ने आप को आर्थिक हानि पहुँचाई है और अपराधिक व्यवहार किया है। उन्हें इस का दंड मिलना चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था इतनी सुस्त है कि उस में राहत प्राप्त करने में वर्षों लग जाते हैं। वह इतनी लचीली भी है कि कोई फर्जी रिपोर्ट करा दे या मुकदमा बना दे तो उसे भी प्रारंभिक स्तर पर फर्जी मान कर निरस्त नहीं किया जाता है। आप इस तथ्य पर भी विचार करें कि आप के पिता और भाई भी अपने बचाव में कुछ कार्यवाही कर सकते हैं। बेहतर यही है कि आप अपने पिता व भाई से संबंध विच्छेद करने का विज्ञापन दें और उन्हें उन के हाल पर छोड़ दें। अपने पति, बच्चों व ससुराल के भले और अच्छे लोगों के साथ अपने नए जीवन का आरंभ करें।

चैक अनादरण का मुकदमा क्या है? और इस में कितनी सजा हो सकती है?

cheque dishonour1समस्या-
ठीकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश से आनन्द सिंह तोमर ने पूछा है-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के मुकदमे में क्या होता है? यदि कोर्ट फैसला सुना दे तो कितना जुर्माना और अधिक से अधिक कितनी सजा हो सकती है? यदि सम्पति नाम पर हो और रुपए नहीं दें तब क्या होगा?

समाधान –

ज जिस रूप में यह कानून मौजूद है उस का स्वरूप इस प्रकार है ….

क व्यक्ति के पास किसी अन्य व्यक्ति के खाते का चैक है, जो किसी ऋण के पुनर्भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए दिया गया था।  जिस का भुगतान उसे प्राप्त करना है तो वह उस चैक को उस पर अंकित तिथि से वैधता की अवधि समाप्त होने तक अपने बैंक में प्रस्तुत कर उस चैक का धन चैक जारीकर्ता के खाते से प्राप्त कर सकता है।   वैधता की अवधि सामान्य तौर पर चैक पर अंकित जारी करने की तिथि के तीन माह के भीतर और विशेष रूप से चैक पर अंकित इस से कम अवधि तक के लिए वैध होता है।  किसी भी कारण से यह चैक अनादरित (बाउंस) हो कर वापस आ सकता है।    वैधता की अवधि के दौरान इस वापस आए चैक को कितनी ही बार भुगतान हेतु बैंक में प्रस्तुत किया जा सकता है।

दि इस चैक का भुगतान किसी भी तरीके से नहीं होता है और चैक अनादरित ही रह जाता है तो अंतिम बार उस के बैंक से अनादरण की सूचना प्राप्त होने से 30 दिनों की अवधि में चैक धारक लिखित सूचना (नोटिस) के माध्यम से चैक जारीकर्ता से चैक की राशि पन्द्रह दिनों में भुगतान करने की मांग करे और यह नोटिस प्राप्त होने के पन्द्रह दिनों में भी उस चैक की राशि चैक धारक को चैक जारीकर्ता भुगतान करने में असफल रहे तो चैक का यह अनादरण एक अपराध हो जाता है।  चैक धारक नोटिस की पन्द्रह दिनों की अवधि समाप्त होने के तीस दिनों के भीतर अदालत में अपराध की शिकायत दर्ज करा सकता है।

स शिकायत पर अदालत प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त (चैक जारी कर्ता) के विरुद्ध समन जारी करेगी और अभियुक्त के न्यायालय में उपस्थित हो जाने पर मामले की सुनवाई करेगी।  अभियोजन की साक्ष्य के उपरांत अभियुक्त को सफाई में साक्ष्य का अवसर देगी और सुनवाई के उपरांत अभियुक्त को दोषी पाए जाने पर न्यायालय उसे दो वर्ष तक के कारावास और चैक की राशि से दो गुना राशि तक के जुर्माने की सजा से दंडित कर सकता है। जुर्माना अदा न होने पर अभियुक्त को अधिकतम छह माह तक की अवधि का अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है।

ह मामला पूरी तरह से दस्तावेजों पर आधारित है।  चैक, उसे बैंक में प्रस्तुत करने की रसीद, उस के अनादरित होने की सूचना, चैक जारी कर्ता को उस के पते पर भेजा गया नोटिस सभी दस्तावेज हैं और अकेले शिकायतकर्ता के बयान से प्रमाणित किए जा सकते हैं।  यदि कोई गंभीर त्रुटि न हो जाए तो शिकायत का सीधा अर्थ चैक जारीकर्ता को  सजा होना है।

धारा 138  के सभी मामलों में एक ही बात है जो चैक जारीकर्ता के पक्ष में जा सकती थी, वह यह कि चैक किसी ऋण के भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए नहीं दिया गया हो।  आम तौर पर नियम यह है कि जो किसी कथन को प्रस्तुत करेगा वही उसे प्रमाणित करेगा।  सामान्य कानून के अनुसार इस तथ्य को कि चैक किसी ऋण के भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए दिया गया था,  प्रमाणित करने का दायित्व शिकायतकर्ता पर होना चाहिए था।  लेकिन धारा 139 में यह उपबंधित किया गया है कि जब तक अभियुक्त विपरीत रूप से प्रमाणित नहीं कर दे कि चैक को किसी दायित्व के निर्वाह या ऋण के भुगतान हेतु जारी किया हुआ ही माना जाएगा।  धारा 139 ने ही इस कानून को मारक बना दिया है और चैक जारी कर्ता के लिए कोई सफाई नहीं छोड़ी है।

प के मामले में भी आप के व परिवादी के बीच कोई समझौता न हो पाने और समझौते के आधार पर मुकदमे का निर्णय न हो पाने पर आप को अधिकतम दो वर्ष तक के कारावास और चैक की राशि से दो गुना राशि तक के जुर्माने की सजा से दंडित किया जा सकता है। जुर्माना अदा न होने पर अभियुक्त को अधिकतम छह माह तक की अवधि का अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता में यह भी उपबंध है कि जुर्माने की राशि अभियुक्त की संपत्ति की कुर्की कर के उस से वसूल की जा सकती है। इस तरह यदि आप के नाम पर कोई संपत्ति है तो उसे कुर्क कर के उस से भी जुर्माने की राशि वसूल की जा सकती है।

फर्म के पर्चों के आधार पर हस्ताक्षरकर्ता और फर्म मालिक दोनों के विरुद्ध अपराधिक और दीवानी कार्यवाही की जा सकती है

समस्या-

दुर्गा नगर, राजपुर चुँगी, आगरा, उत्तर प्रदेश से अनिल कुमार कुशवाहा ने पूछा है –

मैं ने अपने पिताजी के रिटायरमेंन्ट की राशि 4,20,000/- रुपए ब्याज 1.5 प्रतिशत प्रतिमाह दर पर (जिसके यहाँ मैं जून 2008 से नौकरी करता था) आपसी भरोसे पर दे दिये। उसने मुझे ट्रेड स्लिप दी जो माल के दायित्व में दी जाती है जिसे पर्चा कहा जाता है। यह पर्चा सिस्टम आगरा हींग की मंडी (जूता मार्केट) में प्रसिद्ध है।  यह पर्चा फर्म के खातों में डाला जाता है एवं आगरा इनकमटैक्स में शू ट्रेडिग में मान्य है। फर्म के नाम से छपा हुआ पर्चा जिस में दुकान का पता पेमेंन्ट की तिथि और प्रोपराइटर के हस्ताक्षर हैं। अब वह कोई ब्याज नहीं दे रहा। उसने वापस धनराशि भी देने से मना कर दिया और लड़ने के लिए तैयार हो गया। मेरे पास मनी लेन्डरिंग का कोई लाइसेंन्स नहीं है। मैं मात्र 6500/रु मासिक की नौकरी करता था पिछले छ महीने से खाली बैठा हूँ। मैने कभी इनकमटैक्स नहीं भरा, आवश्यकता नहीं पड़ी। मेरे पिताजी सेना से रिटायर होकर केन्द्र सरकार के (509 वर्कशाप आगरा) में कार्यरत हैं। पिताजी के रिटायरमैंन्ट का पैसा नगद में थोडा-थोडा कर के पांच-छः बार (नवम्वर 2010 से मार्च 2011 तक) में दिया था। जिस फर्म के पर्चे दिये हैं उसका वह (रियासत हुसैन) मालिक नहीं था। वह जूते की दूसरी फर्म फैक्ट्री का प्रोपराइटर है। दोनों फर्म एक ही स्थान पर थी जहाँ मैं एकाउन्टेन्ट का काम करता था। परिवार का मुखिया या भाइयों  में बडा होने के कारण (रियासत हुसैन) का दोनो फर्मों पर कब्जा या अधिकार रखा था। शू केयर नाम की फर्म के पर्चे हैं जिसका प्रो0 (रियासत हुसैन) का छोटा भाई फिरासत हुसैन है। शू केयर फर्म से पूँजी निकाल कर वर्ष 2011 अप्रेल में नई फर्म अलोफ शू के नाम से खोल ली है तथा मार्च 2012 में बीस साल पुरानी फर्म शू केयर को बन्द कर दिया है। जून -जुलाई 2011 में पैसे वापस मांगने पर उसने नवम्बर 2011 यानि दीवाली के बाद देने को कहा। मैं इस भरोसे था कि मैं इसके यहाँ काम कर रहा हूँ अतः मेरे साथ धोखा नहीं करेगा। जनवरी 2012 से अक्टूबर 2012 तक टालता रहा। मैं ने उससे पोस्ट डेटेड चैक देने को कहा तो चैक देने के लिए उसने मना कर दिया। कहता था थोड़े-थोड़े कर के तीन-चार साल में दूँगा। तीन-चार महीने तक के तन्खवाह के पैसे नहीं देता था। साल भर तक मानसिक क्लेश सहने के बाद परेशान होकर इसकी नौकरी छोड दी। नबम्बर 2012 में पिताजी के पैसे 420,000/व तन्खवाह के शेष 24000/का तकाजा करने पर कुछ भी देने के लिए मना कर दिया। अब वह रुपये इसलिए नहीं लौटाना चाहता क्योंकि वह सोचता है प्रिन्टेड पर्चा जिस पर उसके हस्ताक्षर हैं कानूनी कार्यवाही के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कहता है भाई की फर्म थी जो कि फेल (बन्द) हो गयी। मुझे किसी का पैसा नहीं देना मेरे भाइयों (तीन छोटे भाई हैं) ने पैसा लिया था। जबकि तीनों छोटे भाईयों को सवा साल पहले इसने बिजनेस से अलग कर दिया था इस कारण अन्य तीनों छोटे भाईयों से मुझे कोई शिकायत नहीं है। विश्वास के कारण नगद उधार देने पर बहुत लोगों के साथ धोखा हो जाता है। इस आगरा शहर के जूता व्यवसाय में पर्चे की समस्या बहुत लोगों के साथ प्रतिवर्ष होती है। फाईनेंसर के नियुक्त दलाल पर्चे के काम को (पैसे के लेन देन) हींग की मँडी आगरा मैं सडक पर खडे हो कर प्रतिदिन करते हैं। इस कारण दलाल या फाईनेंसर पुलिस कार्यवाही व कानूनी कार्यवाही में नहीं पडते। मैं जानना चाहता हूँ कि क्या हस्ताक्षर करे पर्चों के आधार पर दीवानी वाद कर अपना पैसा ब्याज व कानूनी खर्चे सहित वसूल सकते हैं? दीवानी वाद के लिए इसके हस्ताक्षर करे पर्चा के अलावा इसका पेन कार्ड, राशन कार्ड, प्रोपर्टी, मकान व दो प्लाट, गाडी की आर सी व 600 ग्राम सोना (इस सभी पर बैंक से लोन लिया गया है) की फोटो कापी है। मेरे अलावा छः-सात लोगों का पूरा 15 लाख रुपया पर्चों में इसी रियासत हुसैन पर फँसा है। क्या (रियासत हुसैन) पर 420 व धोखाधडी का केस लगाया जा सकता है? क्योंकि छोटे भाई की फर्म के पर्चों हस्ताक्षर क्यों करे। और फर्म फेल (शू केयर बन्द करने से पहले) नई फर्म छोटे भाई फिरासत हुसैन ने अलोफ शू के नाम से खोल ली है एफआईआर इसलिए नहीं की क्योंकि बातचीत से मामला सुलझाना चाह रहा था। तकलीफ इस बात की है कि पाँच-छः हजार रुपये माह की नौकरी करने वाले के (मेरे हाथ से) घर से चार (4,20,000$24000) लाख रुपये और फँस गये मैं बेहद परेशान हूँ मेरे पास अन्य कोई पूँजी नहीं है जिससे मै कोई व्यवसाय कर सकूँ। कृपया मेरा उचित मार्ग दर्शन करें?

समाधान-
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विश्वास और धोका दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिना विश्वास के कोई धोखा नहीं होता। सही विश्वास तो वही होता है जब व्यक्ति लेने देन को मौखिक या मामूली दस्तावेजों के आधार पर नहीं करता है। रुपया जब भी उधार दिया जाए कभी भी फर्म या कंपनी के नाम से नहीं देना चाहिए अपितु व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर ही देना चाहिए और उस का लिखत स्टाम्प पेपर पर लिखवा कर नोटेरी से सत्यापित करवा लेना चाहिए। खैर, अभी तक जो हो चुका है उस का तो कुछ नहीं किया जा सकता। आप को आगे की कार्यवाही के बारे में सोचना चाहिए। आप का कहना है कि आप के पास मनी लेंडिंग का लायसेंस नहीं है। यदि किसी के पास रुपया है और वह उस रुपए को किसी संबंधी, मिलने वाले को या व्यापारिक संबंधों के कारण उधार देता है तो ऐसी देनदारी के लिए मनीलेंडिंग का लायसेंस होना आवश्यक नहीं है।

प का यह मामला पूरी तरह से भा.दंड संहिता की धारा 420 से 424 तक में गंभीर अपराध करने का मामला है। आप को तुरन्त प्रथम सूचना रिपोर्ट संबंधित पुलिस थाना में करानी चाहिए। यदि पुलिस थाना रिपोर्ट दर्ज करने से मना करे तो किसी अच्छे वकील के माध्यम से न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस मामले में आप को रियासत हुसैन और फिरासत हुसैन दोनों के विरुद्ध मामला चलाना चाहिए क्यों कि रियासत हुसैन के पर्चों पर हस्ताक्षर हैं तथा उस ने फिरासत हुसैन की फर्म के पर्चों का उपयोग किया। इस तरह इस छल में फिरासत हुसैन की सहमति भी थी। यह इस लिए भी जरूरी है कि फिरासत हुसैन के इस मामले में लिप्त हो जाने से वह रियासत हुसैन पर दबाव भी बनाएगा।

स के अतिरिक्त आप रूपयों व ब्याज की वसूली के लिए रियासत हुसैन के विरुद्ध दीवानी दावा भी कर सकते हैं। पर्चों पर रियासत हुसैन के हस्ताक्षर हैं। लेकिन पर्चे हिरासत हुसैन के स्वामित्व की फर्म के नाम से हैं। इस कारण से यह दावा रियासत हुसैन व हिरासत हुसैन की फर्म दोनों को प्रतिवादी बनाते हुए करना चाहिए। फर्म हिरासत हुसैन के जरिए पक्षकार बनेगी तथा फर्म के समन हिरासत हुसैन को तामील कराए जाएंगे। हमें पूरा विश्वास है कि यदि सही कानूनी कार्यवाही की गई तो आप को आप का पैसा ब्याज सहित वापस मिल जाएगा। कार्यवाही में समय तो अवश्य लगेगा।

डरा धमका कर कोई बिल वसूल नहीं किया जा सकता, आप पुलिस को शिकायत कर मुकदमा दर्ज कराएँ

समस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से नागेश्वर ने पूछा है-

कुछ दिनों पहले मेरे चाचा जो कि लखनऊ में ही स्कूल टीचर हैं, ने मुझे टाटा फोटॉन का इंटरनेट कनेक्शन लेकर दिया था। जिसमें दो महीने तक का यूजर डाटा फ्री था। तथा कनेक्शन देने वाले ने बताया था कि दो महीने बाद इसमें नया प्लान एक्टिवेट करवाना होगा अन्यथा ये बंद हो जायेगा।  मेरे पास लखनऊ का कोई आवासीय पहचान पत्र न होने के कारण उसने मेरे चाचा के स्कूल के पैड पर उनकी फोटो, स्कूल की मोहर लगवाकर ले ली थी और तथा कनेक्शन चालू कर दिया था।  तकरीबन एक महीने बाद वो डिवाइस खराब हो गयी तो मैने कंपनी के टोल फ्री नम्बर पर कॉल करके डिवाइस के बारे में सूचना दे दी। तब दूसरी ओर से मुझे बताया गया कि आपकी डिवाइस बंद कर दी गयी है।  अब तकरीबन 4 महीने बाद कंपनी मेरे चाचा के पास 1499 रुपए का बिल भेजा तथा वसूली करने के लिए जो व्यक्ति आते है वे धमकाते है तथा बिल न जमा करने पर चाचा के ऊपर कानूनी कार्यवाही की धमकी देते है।  जब कि मैंने न तो कोई प्लान एक्टिवेट कराया था और दो महीने डाटा फ्री होने पर भी डिवाइस खराब हो जाने पर पूरा इस्तेमाल नहीं कर सका था।  क्या हमारे चाचा पर कोई कानूनी कार्यवाही बनती है तथा जब मैने कोई प्लान एक्टिवेट नहीं करवाया फिर भी मुझे बिल जमा करना पड़ेगा?

समाधान-

प की इस समस्या में कुछ तथ्य छूटे हुए प्रतीत होते हैं।  आप ने यह नहीं बताया कि आप ने जो कनेक्शन लिया था व प्री-पेड था या पोस्ट पेड। चूंकि कंपनी ने आप को बिल भेजा है इस कारण से ऐसा लगता है कि यह क्नेक्शन पोस्ट-पेड था। आप ने आरंभ में इस कनेक्शन के लिए क्या भुगतान किया था? यह भी नहीं बताया। दो माह का यूजर डाटा मुफ्त तभी हो सकता था जब कि आपने कम से किसी एक न्यूनतम अवधि के लिए कुछ भुगतान किया हो।  मुझे लगता है कि आप से उक्त योजना को समझने में कोई त्रुटि हुई है। आप को उक्त योजना को पूरी तरह समझना चाहिए था। आप ने अपने प्रश्न में यह भी नहीं बताया कि आप ने कौन सी योजना के तहत अपना कनेक्शन प्राप्त किया था?

कंपनी से आप को दो माह यूजर डाटा मुफ्त मिला भी था तो एक माह में योजना को डी-एक्टीवेट कर देने पर उस कि शिकायत करनी चाहिए थी और यह पूछना चाहिए था कि आप की योजना डीएक्टीवेट क्यों की गई है? कोई भी कंपनी लाभ के लिए व्यवसाय करती है। ऐसी योजना कभी बाजार में नहीं डालती जिस में बिना कुछ लिए दिए दो माह तक इंटरनेट कनेक्शन को मुफ्त उपयोग करने दे और बाद में उपभोक्ता की मर्जी पर छोड़ दे कि वह चाहे तो उस कनेक्शन को जारी रखे या न रखे। मुझे लगता है कि आप की योजना में ही एक्टीवेशन कराना था और उस पर ही आप को दो माह का यूजर डाटा मुफ्त प्राप्त होता। आप के द्वारा एक्टीवेशन नहीं कराए जाने के कारण उन्हों ने योजना को बंद कर दिया और आप के द्वारा उपयोग किए गए डाटा का बिल आप को भेज दिया गया। इस तरह आप को जो क बिल दिया गया है वह सही प्रतीत होता है।

फिर भी किसी बिल का भुगतान प्राप्त करने का तरीका यह नहीं हो सकता है कि किसी व्यक्ति को आप के पास भेजा जाए और वह धमकियाँ दे। अधिक से अधिक एक व्यवसाई बिल के भुगतान के लिए उपभोक्ता के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकता है। इस तरह बिल वसूल करने के लिए धमकाना अपराधिक है।

स मामले में हमारी सलाह है कि आप पहले पूरी योजना को ठीक से जाँच लें। यदि आप को दिया गया बिल सही प्रतीत होता है तो आप उस का भुगतान कर दें। आप ने डाटा उपयोग किया है तो उस का भुगतान आप को करना चाहिए। यदि आप को लगता है कि बिल गलत है तो आप अब की बार वसूल करने आने वाले को साफ कह दें कि आप का कोई बकाया नहीं है और कंपनी चाहे तो मुकदमा कर सकती है। यदि वह धमकाता है तो आप उस के विरुद्ध पुलिस थाने में शिकायत कर के मुकदमा दर्ज करवाएँ।

जिस मामले में आप ने स्वयं कानून की पालना नहीं की उस में आप न्याय की आशा कैसे कर सकते हैं?

समस्या-

जबलपुर, मध्यप्रदेश से शिरीष कुमार सोनी पूछते हैं –

मैं एक सुनार हूँ, मेरी दुकान जबलपुर में है।  सितम्बर 2012 में कुछ लोग मेरी दुकान में  आए, उनके साथ मेरा एक दोस्त था।  उसने गारंटी दी थी कि मैं इनको जानता हूँ, इनको ट्रक खरीदना है इसलिए चांदी-सोना बेच रहे हैं।  उन्हों ने मेरी दुकान पर गोल्ड का 150 ग्राम सोना और 50 ग्राम चान्दी बेची और चले गये।  दूसरे दिन पुलिस आई और कहा कि तुमने चोरी का माल खरीदा है।  मुझको थाने ले गई।  वहाँ पर उन्हों ने मुझ से 40ग्राम सोना और 50 ग्राम चान्दी का माल जमा करवा लिया।  फिर बाद में जिस के घर से चोरी हुई थी वो भी आता था और मेरे पास से सोने के कुल मिला कर 150 ग्राम जेवर ले चुका है, और मांग रहा है।  मैं क्या करूं?  जो लड़के चान्दी सोना बेचने आए थे उनको पुलिस ने उसी दिन पकड़ लिया था। पूरी राशि रुपए 3,92,000 जप्त व कर लिया था।  लेकिन उसकी जब्ती नहीं बनाई।  उस माल के खरीदने की कोई रसीद नहीं है।  मैं अपना पैसा वापस पाने के लिए क्या करूँ?

समाधान-

प की समस्या स्वयं आप के व्यापार करने के तरीके से उत्पन्न हुई है।  आप ने जब सोना-चांदी खरीदा तो आप ने रुपया दिया था। आप ने बेचने वालों को जो रुपया दिया था उस की रसीद उन से प्राप्त करनी चाहिए थी और सोना-चांदी की रसीद उन्हें देनी चाहिए थी। लेकिन आप ने यह सब काम बिना किसी सबूत के किया।  बेचने वाले पकड़े गए और रुपया भी उन से बरामद कर लिया गया। अब पुलिस ने रुपए की जब्ती नहीं बनाई यह आप किस आधार पर कह रहे हैं? यदि जब्ती नहीं बनाई है तो फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि उन से सारा रुपया जब्त कर लिया गया है? यदि पुलिस ने रुपया ले लिया है और जब्ती नहीं बनाई है और इस बात का सबूत है तो फिर आप को इन सबूतों को पुलिस के उच्चाधिकारियों और न्यायालय के सामने रखना चाहिए।

प का जो मित्र बेचने वालों के साथ आया था उस ने कोई मौखिक गारंटी दी है तो उस का कोई महत्व नहीं है। आप से पुलिस ने जो सोना चांदी जमा करवाया है उसे जब्ती में दिखाया है अथवा नहीं यह आप ने नहीं बताया है। यदि उस की जब्ती दिखाई गई है तो वह सोना चांदी अभी मौजूद है। वह सोना-चांदी आप को नहीं मिलेगा। क्यों कि उसे अदालत उसी की सुपूर्दगी में देगी जो उस का असली मालिक है।  जिस व्यक्ति के घर चोरी हुई थी उस व्यक्ति को आपने जो माल दिया है उसे आप से लेने का कोई अधिकार नहीं था?   आपने उसे माल दिया यह आप की गलती है। यदि उसे माल दिया है तो उस की रसीद आप को लेनी चाहिए थी।  यदि आप ने उस से कोई रसीद प्राप्त नहीं की है तो आप यह कैसे कह सकते हैं कि आप ने उस व्यक्ति को माल दिया है? जब पुलिस ने आप के द्वारा खरीदे हुए माल को चोरी का माल बताया था तो आप को सारा माल पुलिस के सुपुर्द कर के उस की रसीद प्राप्त करनी चाहिए थी। आप ने अधूरा माल पुलिस को दिया और उस की रसीद प्राप्त की या नहीं, तथा चोरी का माल खरीदने के लिए पुलिस ने आप के विरुद्ध कोई मुकदमा बनाया है या नहीं इस की कोई जानकारी आप ने नहीं दी है। जब आप ने कुछ माल पुलिस को जब्त करा दिया था तो फिर शेष माल ही आप उस व्यक्ति को दे सकते थे जिस के घर चोरी हुई थी। आप ने उस से अधिक माल आपने उसे क्यों दे दिया?

स तरह आप की समस्या के सारे तथ्य स्पष्ट नहीं हैं।  प्रतीत होता है कि आप चोरी का माल बिना रसीद के खरीदने के अपराध बोध से और मुकदमा बनने के दबाव से इतने अधिक घबरा गए कि जो जैसा कहता गया करते गए।  आप को पहले ही दिन तुरन्त किसी अच्छे वकील से राय करनी चाहिए थी उस राय के अनुसार काम करना चाहिए था। यदि पुलिस ने आप के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं बनाया है और आप से कोई जब्ती नहीं दिखाई है तो पूरे मामले से आप की संबद्धता पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है। ऐसी स्थिति में कोई कानूनी राय आपसी बातचीत और तथ्यों की पूरी जानकारी के बिना देना संभव नहीं है।

जो कुछ आप खो चुके हैं उस में से बहुत कम वापस लौटने की उम्मीद है।  क्यों कि आप के पास किसी बात का कोई सबूत नहीं।  जिस मामले में आप ने स्वयं कानून की पालना नहीं की उस मामले में आप न्याय की आशा कैसे कर सकते हैं?  अब भी आप को चाहिए कि आप जबलपुर में ही किसी अच्छे फौजदारी मामलों के वकील से संपर्क कर के राय करें। पूरे तथ्य उसे बताएँ। जिन तथ्यों की जानकारी आप को नहीं हो सकी है उन्हें जानने में भी वह वकील आप की मदद कर सकता है।  यदि आप की समस्या का कोई हल हुआ या आप के नुकसान में कुछ कमी करने का कोई मार्ग निकलेगा तो भी  वह जबलपुर के किसी स्थानीय वकील से राय कर के ही निकल सकता है।

लापता व्यक्ति से उधार दिया गया धन कैसे वसूल करें?

समस्या-

मैंने एक व्यक्ति को ३,००,००० लाख रूपये उधार दिए थे।  किन्तु अब वह व्यक्ति गुमशुदा हो गया है जिसकी सूचना उसके परिवार वालों ने पुलिस थाना में भी की हुई है।  परन्तु २ माह बाद भी उसका कोई पता नहीं चल सका है।  अपना रुपया प्राप्त करने के लिए क्या कर सकता हूँ? क्या मैं उसके परिवार वालो पर भी १३८ का केस कर सकता हूँ?

-अंकित शरण, देहरादून, उत्तराखंड

समाधान-

प उस व्यक्ति के परिवार वालों के विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा नहीं कर सकते।  वैसे भी आप यह मुकदमा तभी कर सकते हैं जब कि उस व्यक्ति ने उक्त राशि के भुगतान के लिए आप को चैक दिया हो और वह चैक अनादरित हो गया हो। अनादरण की सूचना मिलने के 30 दिनों के भीतर आप ने उसे उस व्यक्ति के पते पर नोटिस भेजा हो जो उस पते पर किसी के द्वारा प्राप्त कर लिया गया हो। ऐसा नोटिस प्राप्त कर लेने से 15 वें दिन की तिथि से एक कैलेंडर माह के भीतर ही आप मुकदमा कर सकते हैं।  धारा 138 परक्राम्य् अधिनियम का मुकदमा रुपया वसूली के लिए नहीं अपितु चैक अनादरण के लिए होता है और यह एक अपराधिक मुकदमा होता है।  जिस में सजा के साथ चैक राशि से दुगने जुर्माने/ हर्जाने का आदेश दिया जा सकता है जिसे परिवादी अर्थात मुकदमा प्रस्तुत करने वाले को दिलाया जा सकता है।  अपराधिक मुकदमा होने के कारण यह उसी व्यक्ति के विरुद्ध किया जा सकता है जिस ने चैक दिया है।  आप उस व्यक्ति के लापता हो जाने पर भी यह मुकदमा उक्त प्रकार से निर्धारित अवधि में कर सकते हैं।  लेकिन मुकदमा तब तक अटका रहेगा जब तक कि उस व्यक्ति का पता नहीं लग जाता है और न्यायालय का समन तामील हो कर वह व्यक्ति न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हो जाता है। आप उस के पता लगने का इंतजार करेंगे तो समय निकल जाएगा और फिर आप यह मुकदमा नहीं कर सकते।

हाँ, आप उस व्यक्ति के विरुद्ध रुपया वसूली के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं।  लेकिन आप को उस में वसूली जाने वाली राशि पर न्यायालय शुल्क अदा करना पड़ेगा। इस मुकदमे में भी समन का उस व्यक्ति पर तामील होना आवश्यक है।  उस के उपरान्त वह व्यक्ति यदि उपस्थित न हो तो मुकदमे में एक-तरफा सुनवाई की जा कर निर्णय व  डिक्री प्राप्त की जा सकती है। उस व्यक्ति के कभी भी न आने की स्थिति में 7 वर्ष के उपरान्त उसे मृत मान कर उस के उत्तराधिकारियों से रुपया वसूल किया जा सकता है। वैसे आम तौर पर इस तरह लापता व्यक्ति से रूपया वसूल कर पाना असंभव जैसा होता है।

टेलीफोन उपभोग की बकाया का भुगतान तो करना होगा

समस्या-

मैं ने अपना बीएसएनएल का टेलीफोन कनेक्शन कटवा दिया है। लेकिन फिर भी बकाया का बिल आ रहा है। क्या मुझे बकाया बिल का भुगतान करना पड़ेगा? जब कि मैं दोबारा बीएसएनएल का कनेक्शन नहीं लेना चाहता।

-विनोद कुमावत, झुन्झुनू, राजस्थान

समाधान-

प जब भी किसी टेलीफोन कंपनी से कनेक्शन लेते हैं तो वह कंपनी कुछ अमानत जमा करवा लेती है। लेकिन प्रत्येक अवधि के बिल उस अवधि में टेलीफोन के उपयोग के आधार पर दिए जाते हैं। बीएसएलएल के बिल अक्सर एक माह बाद आता है जब तक आप का एक माह का बिल और तैयार हो जाता है जो फिर अगले माह आता है।

ब आप ने कनेक्शन कटवाया तब आप का कम से कम एक माह का अधिक से अधिक दो माह का बिल बकाया होगा जो आप के द्वारा किए गए उपभोग का बिल है, उस का भुगतान तो आप को करना ही होगा। आप ने कनेक्शन तो कटवा दिया है लेकिन कंपनी से अपने बकाया का हिसाब नहीं किया है। अच्छा तो यह है कि आप बकाया का हिसाब कर के उस का भुगतान कर के अपनी अमानत राशि वापस प्राप्त कर लें या फिर अमानत का बकाया में समायोजन करवा कर बकाया राशि रहती है तो उसे जमा करवा दें या फिर आप का बकाया अमानत से कम हो तो अपनी शेष अमानत प्राप्त कर लें।

दि आप ने बकाया का हिसाब नहीं किया तो बीएसएनएल अपने बकाया की वसूली के लिए आप को नोटिस दे कर उस का दावा भी आप के विरुद्ध न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती है। तब आप को ब्याज और अदालत का मुकदमा खर्चा भी देना पड़ सकता है।

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