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किन आजीविकाओं के साथ एक व्यक्ति एडवोकेट के रूप में वकालत कर सकता है?

समस्या-

बिलासपुर छत्तीसगढ़ से गिरीश अग्रवाल पूछते हैं –

मैं जनहित में निःशुल्क वकालत की सेवा करना चाहता हूँ।  क्या आजीविका के लिए अन्य कार्य करते हुए यह संभव है?  क्या यह व्यवसायिक दुराचरण होगा?  कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

बार कौंसिल ऑफ इंडिया रूल्स के पार्ट IV के चैप्टर II के सैक्शन 7 नियम 47-52 में एक एडवोकेट पर अन्य व्यवसायिक गतिविधियाँ करने पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं, ये निम्न प्रकार हैं –

Section VII-Restriction on other Employments

47. An advocate shall not personally engage in any business; but he may be a sleeping partner in a firm doing business provided that in the opinion of the appropriate State Bar Council, the nature of the business is not inconsistent with the dignity of the profession.

48. An advocate may be Director or Chairman of the Board of Directors of a company with or without any ordinarily sitting fee, provided none of his duties are of an executive character. An advocate shall not be a Managing Director or a Secretary of any company.

49. An advocate shall not be a full-time salaried employee of any person, government, firm, corporation or concern, so long as he continues to practise, and shall, on taking up any such employment, intimate the fact to the Bar Council on whose roll his name appears and shall thereupon cease to practise as an advocate so long as he continues in such employment.

Nothing in this rule shall apply to a Law Officer of the Central Government of a State or of any Public Corporation or body constituted by statute who is entitled to be enrolled under the rules of his State Bar Council made under Section 28 (2) (d) read with Section 24 (1) (e) of the Act despite his being a full time salaried employee.

Law Officer for the purpose of these Rules means a person who is so designated by the terms of his appointment and who, by the said terms, is required to act and/or plead in Courts on behalf of his employer.

50. An advocate who has inherited, or succeeded by survivorship to a family business may continue it, but may not personally participate in the management thereof. He may continue to hold a share with others in any business which has decended to him by survivorship or inheritance or by will, provided he does not personally participate in the management thereof.

51. An advocate may review Parliamentary Bills for a remuneration, edit legal text books at a salary, do press-vetting for newspapers, coach pupils for legal examination, set and examine question papers; and subject to the rules against advertising and full-time employment, engage in broadcasting, journalism, lecturing and teaching subjects, both legal and non-legal.

52. Nothing in these rules shall prevent an advocate from accepting after obtaining the consent of the State Bar Council, part-time employment provided that in the opinion of the State Bar Council, the nature of the employment does not conflict with his professional work and is not inconsistent with the dignity of the profession. This rule shall be subject to such directives if any as may be issued by the Bar Council India from time to time.

 नियम 47- के अनुसार एक एडवोकेट किसी व्यवसाय में सीधे स्वयं लिप्त नहीं हो सकता किन्तु वह ऐसे व्यवसाय में मौन साझीदार हो सकता है जो राज्य बार कौंसिल की राय में एडवोकेट के पेशे की गरिमा के प्रतिकूल न हो।

नियम 48- के अनुसार एक एडवोकेट एक सामान्य बैठक शुल्क सहित निःशुल्क कंपनी का निदेशक या निदेशक मंडल का प्रधान हो सकता है, किन्तु उस के कर्तव्य कार्यकारी प्रकार के नहीं होने चाहिए। वह किसी कंपनी का प्रबंध निदेशक अथवा सचिव नहीं हो सकता है।

नियम 49- के अनुसार कोई भी एडवोकेट किसी व्यक्ति, सरकार, फर्म, निगम या संस्थान का पूर्णकालिक वैतनिक कर्मचारी नहीं हो सकता। जब तक वह एडवोकेट का पेशा करे यदि वह इस तरह का कोई कार्य करना चाहता है तो उसे उस राज्य के बार कौंसिल जिस में उस का नाम दर्ज है सूचित करना चाहिए और तब तक एडवोकेट का पेशा रोक देना चहिए जब तक वह ऐसे नियोजन में रहे। लेकिन यह नियम केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, सार्वजनिक निगमों और विधि द्वारा निर्मित निकायों के विधिक सलाहकारों पर प्रभावी नहीं है जिन्हें राज्य बार कौंसिल द्वारा उन के नियमों के तहत छूट प्रदान की गई है।

नियम 50- के अनुसार यदि किसी एडवोकेट को उत्तराधिकार में या उत्तरजीविता में कोई पारिवारिक व्यवसाय प्राप्त हुआ हो या किसी के अन्य के साथ व्यवसाय में भागीदारी प्राप्त हुई हो तो वह उसे जारी रख सकता है,  लेकिन वह उस के प्रबंधन में व्यक्तिगत रूप से भाग नहीं लेगा।

नियम 51- के अनुसार एक एडवोकेट शुल्क के लिए संवैधानिक विधेयकों का पुनर्विलोकन कर सकता है, वेतन प्राप्त कर के कानूनी पाठ्य पुस्तकों का संपादन कर सकता है, समाचार पत्रों के लिए प्रेस पुनरीक्षण कर सकता है, विधिक परीक्षा के लिए छात्रों को कोचिंग दे सकता है, परीक्षा के प्रश्नपत्र बना सकता है और उत्तर पुस्तिकाएँ जाँच सकता है और विज्ञापन व पूर्णकालिक नियोजनों के लिए बनाए गए नियमों के अंतर्गत प्रसारण, पत्रकारिता तथा विधि व अन्य विषयों का अध्यापन कर सकता है।

नियम 52- के अनुसार बार कौंसिल की अनुमति से अंशकालिक नियोजन स्वीकार कर सकता है।

दि आप के आजीविका हेतु किए गए अन्य कार्य उक्त प्रतिबंधित श्रेणी में नहीं हैं और अनुमत श्रेणी के अंतर्गत हैं तो आप एक एडवोकेट के रूप में वकालत का व्यवसाय कर सकते हैं।

कानून, नियम और उन के अंतर्गत जारी अधिसूचनाएँ अंतर्जाल पर उपबल्ध क्यों नहीं ?

पिछले दिनों ‘तीसरा खंबा’ से पटना, बिहार के महेश कुमार वर्मा ने पूछा कि  “प्रा. कं., लि. कं., प्रा. लि. कं. इत्यादि कंपनी में क्या अंतर है?  यह भी बताएं कि ये सब कंपनी किस स्थिति में अपने कामगार को पी.एफ. की सुविधा देने के लिए बाध्य है तथा यदि कंपनी द्वारा पी. एफ. की सुविधा नहीं दी जाती है तो क्या करनी चाहिए?  यह भी बताएं कि पी.एफ. के अलावा अन्य कौन सी सुविधा देने के लिए कंपनी बाध्य है?”

हेश जो जानना चाहते हैं वह भारत का कोई भी नागरिक जानना चाह सकता है और यह जानकारी सहज ही प्राप्त होना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कानूनी अधिकार होना चाहिए।  आखिर देश के प्रत्येक नागरिक को यहाँ के कानून जानने का अधिकार है और यह देश की सरकारों का कर्तव्य होना चाहिए कि वे नागरिकों के इस महत्वपूर्ण अधिकार की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध कराएँ।  लेकिन देश के कानून, नियम और राजकीय अधिसूचनाएँ आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।  उन की प्रकाशित प्रतियों को बाजार का माल बना दिया गया है।  जिस का अर्थ यह है कि यदि कोई नागरिक इन्हें जानना चाहता है तो उसे बाजार जा कर इन्हें खरीदना पड़ेगा।

ज अंतर्जाल तक प्रत्येक नागरिक की पहुँच सब से आसान चीज है।  जो जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्ध है उस तक पहुँचना आम नागरिक के लिए दुरूह और अधिक व्ययसाध्य नहीं है।  यूँ तो भारत सरकार का यह कर्तव्य होना चाहिए कि संसद द्वारा पारित सभी कानूनों और नियमों को अंग्रेजी और हिन्दी के अतिरिक्त सभी भारतीय भाषाओं में अंतर्जाल पर उपलब्ध कराए।  क्यों कि किसी भी कानून की पालना तभी संभव हो सकती है जब कि उस का नागरिकों को ज्ञान हो, या कम से कम जब भी वह इन के बारे में जानना चाहे उसे अपनी भाषा में आसानी से उपलब्ध हो।  इसी तरह सभी प्रदेशों को भी प्रादेशिक कानूनों और नियमों को अपने प्रदेशों की भाषाओं में उपलब्ध कराना चाहिए।  पर न तो केन्द्र सरकार ही इसे अपना कर्तव्य और दायित्व    मानती है और न ही राज्य सरकारें।  संसद और विधानसभाएँ कानून पारित करती हैं और सरकारी गजट में प्रकाशित कर छोड़ देती हैं।  गजट की प्रतियाँ सीमित होती हैं उतनी ही जितनी कि राजकीय विभागों के लिए आवश्यक हों।  इसी से वे लगभग अप्राप्य होते हैं।

किसी भी कानून को अंतर्जाल पर उपलब्ध कराना सरकारों के लिए कोई बड़ा व्यय साध्य काम नहीं है।  गजट में प्रकाशन के लिए आज कल सब से पहले कंप्यूटरों पर कानूनों और नियमों की सोफ्टकॉपी तैयार होती है।  सभी सरकारों के पास एनआईसी की अंतर्जाल व्यवस्था उपलब्ध है, उन के अपने सर्वर हैं और देश भर में फैला पूरा तामझाम है। सरकारों को करना सिर्फ इतना है कि राजकीय मुद्रणालय गजट प्रकाशन के लिए जो सोफ्टकॉपी तैयार करें उसे एनआईसी को उपलब्ध कराएँ और एनआईसी उसे तुरंत अन्तर्जाल पर उपलब्ध करा दे।  होना तो यह चाहिए कि प्रत्येक सरकार का राजकीय गजट मुद्रित रूप के साथ साथ अंतर्जाल पर भी प्रकाशित हो।

अंग्रेजी में तो यह काम आसानी से हो सकता है।  हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं की समस्या यह है कि राजकीय मुद्रणालय गजट की सोफ्टप्रति जिन फोण्टों में तैयार करते हैं वे यूनिकोड के नहीं हैं और उन्हें सीधे सीधे अंतर्जाल पर डालना संभव नहीं है।  इस के लिए सब से पहले तो एक ऐसे प्रशासनिक निर्णय की जरूरत है जिस से हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं का कंप्यूटरों पर होने वाला सारा सरकारी कामकाज केवल यूनिकोड फोण्टों में होने लगे।  यदि हमें देश के तमाम कामकाज को कंप्म्प्यूटरों पर लाना है तो यह एक न एक दिन करना ही पड़ेगा तो फिर अविलम्ब क्यों न किया जाए?

ब तक सारा काम यूनिकोड़ फोण्टों में न होने लगे तब तक एनआईसी यह कर सकती है कि जिन फोण्टों में काम होता है उन से टेक्स्ट को यूनिकोड फोण्टों में परिवर्तित करने के लिए फोण्ट परिवर्तक तैयार कर ले और राजकीय मुद्रणालयों से सोफ्टकॉपी मिलने पर उस का फोण्ट परिवर्तित कर अंतर्जाल पर उन्हें प्रकाशित कर दे।  यह व्यवस्था बिना किसी विशेष खर्च के उपलब्ध साधनों के आधार पर सरकारें लागू कर सकती हैं।  देरी केवल सरकारों की इच्छा की कमी और निर्णय लेने अक्षमता में छुपी है। शायद हमारी सरकारें ही नहीं चाहतीं कि देश के नागरिकों को देश का कानून जानना चाहिए। शायद वे हमेशा इस बात से आतंकित रहती हैं कि यदि देश के कानून तक आम लोगों की पहुँच होने लगी तो वे अपना अंधाराज कैसे चला सकेंगे?

 

क्या मैं सरकारी नौकरी में रहते हुए काव्य गोष्ठियों में भाग ले सकता हूँ?

 योगेश “योगी” पूछते हैं
मैं राजस्थान सरकार की सेवा में हूँ।  मैं नौकरी में आने से पूर्व से ही हिंदी का कवि हूँ। एक ब्लॉग भी इसी विषय पर लिखता हूँ।  मैं ये जानना चाहता हूँ कि “क्या मैं नौकरी में रहते हुए काव्य गोष्ठियों में भाग ले सकता हूँ, साथ ही ब्लॉग, न्यूज़ पेपर में लिखने के सम्बन्ध में भी सलाह दे तो अति कृपा होगी”

 उत्तर –
योगेश जी,
स विषय पर तीसरा खंबा में चार आलेख हाल ही में प्रकाशित किए गए थे। इन में यह चर्चा की गई थी कि सरकारी कर्मचारी क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते। ये चारों आलेख …
(4) सरकारी कर्मचारी प्रकाशन, प्रसारण में कब और किस सीमा तक भाग ले सकते हैं?… भाग-4  आप को पढ़ लेने चाहिए। इस से आप को समझने में मदद मिलेगी कि आप एक सरकारी कर्मचारी होने पर क्या कर सकते हैं  और क्या नहीं।
प के कविता लिखने पर और कवि गोष्ठियों में भाग लेने पर भी किसी तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। आप ब्लाग, समाचार पत्र और पत्रिकाओं में भी लिख सकते हैं यदि आप का लेख, रचना या अन्य सामग्री साहित्यिक, कलात्मक, या वैज्ञानिक प्रकार की हो, और उस में ऐसा कोई मामला न हो जिसे किसी कानून, नियम या उपनियम के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी द्वारा प्रकट करना निषेध कर दिया गया हो। इस के लिए आप को राजस्थान सरकार के कर्मचारियों के लिए बनाए गए आचरण नियम भी अवश्य पढ़ लें।

सरकारी कर्मचारी प्रकाशन, प्रसारण में कब और किस सीमा तक भाग ले सकते हैं?… भाग-4

  म यहाँ कुछ दिनों से प्रवीण त्रिवेदी (प्राइमरी का मास्टर) के निम्न प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं  –

रकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक किस हद तक और किस तरह से देश के ज्वलंत  मुद्दों पर अपनी अधिकतम सक्रियता रख सकता है ? क्या उस पर कर्मचारी होने के कारण देश के आम नागरिक को प्राप्त  अधिकारों पर किसी तरह का अंकुश लग जाता है? उसे किसी भी शान्तिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है कि नहीं? … यदि है तो किस हद तक? क्या शांतिपूर्ण अनशन, प्रदर्शन या अन्य  विरोध के तरीकों पर जिला प्रशासन की पूर्वानुमति आवश्यक है? क्या वे कोई अराजनैतिक , सामाजिक, और सांस्कृतिक संगठन बना सकते हैं ….. या उसके अधीन कार्य कर सकते हैं? …….. या उसके अधीन कोई  शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं ?

 उत्तर  –

ह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि क्या सरकारी/अर्ध कर्मचारी समाचार पत्र पत्रिकाओं व अन्य प्रकाशनों के लिए काम कर सकते हैं?  एक सरकारी/अर्ध सरकारी कर्मचारी अपने नियोजक की पूर्व स्वीकृति के बिना किसी समाचार पत्र या समयावधि प्रकाशन (Periodical) का पूर्ण रूप से अथवा आंशिक रूप से स्वामित्व ग्रहण नहीं कर सकता। वह ऐसे किसी प्रकाशन का संपादन या प्रबंधन भी नहीं कर सकता, और न उस में भाग ले सकता है। वह किसी भी रेडियो/टेलीविजन प्रसारण में नियोजक की पूर्वानुमति के बिना भाग नहीं ले सकता। नियुक्ति अधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना वह किसी समाचार पत्र, पत्रिका में कोई लेख या पत्र अपने नाम से या बेनामी या किसी अन्य के नाम से प्रकाशनार्थ प्रेषित नहीं कर सकता। लेकिन यदि ऐसा लेख, रचना या अन्य सामग्री साहित्यिक, कलात्मक, या वैज्ञानिक प्रकार की हो, और उस में ऐसा कोई मामला न हो जिसे किसी कानून, नियम या उपनियम के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी द्वारा प्रकट करना निषेध हो, तो सरकारी/अर्धसरकारी कर्मचारी को उस के प्रसारण, प्रकाशन के लिए पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं है। यदि उस लेख, रचना या अन्य सामग्री में सरकारी कर्मचारी के विभाग से सम्बन्धित मामले चाहे वे सरकारी स्रोत से तैयार किये गए हों या नहीं, तो कर्मचारी उस के लिए सरकार द्वारा एक कर्मचारी के लिए निश्चित मानदेय से अधिक मानदेय प्राप्त नहीं कर सकता।
कोई भी सरकारी/अर्धसरकारी कर्मचारी रेडियो/टेलीविजन प्रसारण या किसी प्रलेख में जो उस के नाम से, बेनामी या कल्पित नाम या किसी अन्य के नाम से प्रकाशित हो या प्रेस व मीडिया को दिए जाने वाले पत्र व्यवहार या सार्वजिनिक बयानों के या विचारों में ऐसे कथन नहीं करेगा जो –
1.  केन्द्रीय या किसी राज्य सरकार की वर्तमान या हाल ही की नीति या कार्यवाही पर प्रतिकूल आलोचना का प्रभाव रखता हो;
2.  केन्द्र व किसी भी राज्य सरकार के मध्य सम्बन्धों में उलझन पैदा कर सकता हो; या 
3.  जो क
ेन्द्रीय सरकार या किसी मित्र विदेशी सरकार के मध्य सम्बन्धों में उलझन पैदा कर सकता हो;
 लेकिन ..
उक्त नियम किसी सरकारी/अर्धसरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए ऐसे कथनों या विचारों पर जो उस के द्वारा सरकारी पद की हैसियत से अपने कर्तव्य का समुचित पालन करने हुए प्रकट किये गए हों लागू नहीं होता।

ब तक दी गई जानकारी से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक सरकारी/अर्ध सरकारी कर्मचारी का किन किन गतिविधियों में भाग लेना प्रतिबंधित है और वह क्या क्या गतिविधियाँ कर सकता है? आम तौर पर यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों और उन से संबंधित किसी भी गतिविधि में वह भाग नहीं ले सकता। वह ऐसी किसी भी गतिविधि में भी भाग नहीं ले सकता जो चुनी हुई सरकार को उलटने के उद्देश्य के अंतर्गत की जा रही हों। लेकिन वह इन के अलावा लगभग सभी गतिविधियों में भाग ले सकता है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मामले में यही नियम प्रभावी होगा। यदि उक्त नियमों का उल्लंघन नहीं होता है तो सरकारी/अर्धसरकारी कर्मचारी अराजनैतिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक संगठन बना सकते हैं, या उसके अधीन कार्य कर सकते हैं,  या उसके अधीन कोई  शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर भी सकते हैं ?
शान्तिपूर्ण प्रदर्शन, अनशन और अन्य कार्यक्रमों के लिए जिला या स्थानीय प्रशासकों से अनुमति की आवश्यकता इसलिए होती है कि इन्हें नगर के महत्वपूर्ण स्थानों पर आयोजित किया जाता है। ये सभी स्थान सार्वजनिक स्थान हैं, जिन पर आयोजन के लिए पूर्वानुमति सदैव ही आवश्यक है। इस तरह के आयोजन में लोग एकत्र होते हैं, ध्वनि विस्तारक का प्रयोग होता है, यातायात पर असामान्य प्रभाव पड़ता है इस कारण से वह आयोजन कानून और व्यवस्था का प्रश्न भी बन जाता है। कानून व्यवस्था बनाए रखने और यातायात नियंत्रण के लिए प्रशासन को विशेष व्यवस्था करनी पड़ सकती है। इस कारण से इस तरह के आयोजनों के लिए स्थानीय या जिला प्रशासन की पूर्वानुमति की आवश्यकता होती है। पूर्वानुमति की यह आवश्यकता केवल कर्मचारियों के लिए ही नहीं अपितु सभी नागरिकों और संगठनों के लिए होती है। 

सरकारी कर्मचारी किन किन गतिविधियों में भाग नहीं ले सकता … भाग-3

 प्रवीण त्रिवेदी (प्राइमरी का मास्टर) ने कुछ प्रश्न किए थे, जिन का सार है –

रकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक किस हद तक और किस तरह से देश के ज्वलंत  मुद्दों पर अपनी अधिकतम सक्रियता रख सकता है ? क्या उस पर कर्मचारी होने के कारण देश के आम नागरिक को प्राप्त  अधिकारों पर किसी तरह का अंकुश लग जाता है? उसे किसी भी शान्तिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है कि नहीं? … यदि है तो किस हद तक? क्या शांतिपूर्ण अनशन, प्रदर्शन या अन्य  विरोध के तरीकों पर जिला प्रशासन की पूर्वानुमति आवश्यक है? क्या वे कोई अराजनैतिक , सामाजिक, और सांस्कृतिक संगठन बना सकते हैं ….. या उसके अधीन कार्य कर सकते हैं? …….. या उसके अधीन कोई  शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं ?

 उत्तर  –

म ने किसी व्यक्ति के राजकीय सेवा में होने के कारण उस की आचरण संहिता पर विचार आरंभ किया था। आज हम उस के राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के संबंध में विचार करते हैं। राज्य को सभी के प्रति समानता का व्यवहार करना चाहिए। राज्य का यह व्यवहार उस के कर्मचारियों के व्यवहार से स्पष्ट होता है। इस कारण उस की राजनैतिक गतिविधियों को प्रतिबंधित किया गया है। देश की सभी सरकारी/अर्धसरकारी सेवाओं के आचरण नियमों में आम तौर पर धारा-7 में इस के लिए उपबंध किए गए हैं। इन के अनुसार कोई भी कर्मचारी किसी राजनैतिक दल या ऐसे संगठन का जो राजनीति में भाग लेता हो सदस्य नहीं हो सकता, न उस से किसी तरह का कोई संबंध रख सकता है, न उस की गतिविधियों में भाग ले सकता है, न सहायतार्थ चंदा दे सकता है और न अन्य किसी प्रकार से उस की सहायता कर सकता है। वह किसी राजनैतिक आंदोलन या गतिविधियों में भाग भी नहीं ले सकता है। वह चुनाव के समय मत देने पर अपने प्रभाव का प्रयोग नहीं कर सकता और न ही अन्य प्रकार से उस में दखल दे सकता है। वह मत दे सकता है लेकिन वह इस तरह का संकेत नहीं दे सकता कि उस का मत किस के पक्ष में जाएगा। लेकिन यदि उसे चुनाव संपन्न कराने का कर्तव्य प्रदान किया जाता है और वह चुनाव संपन्न कराता है तो वह आचरण नियमों के विरुद्ध नहीं होगा। लेकिन किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा अपने निवास स्थान या वाहन पर चुनाव चिन्ह, झण्डा आदि प्रदर्शित करने का अर्थ यह लिया जाएगा कि उस ने मतदान में अपने प्रभाव का उपयोग किया है जो कि आचरण नियमों के विरुद्ध है।किसी चुनाव में किसी उम्मीदवार के लिए नामांकन प्रस्ताव या अनुमोदन करना या उस के मतदान/चुनाव अभिकर्ता के रूप में कार्य करना राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना है।
दि किसी सरकारी कर्मचारी को सकारण यह विश्वास हो कि उस के उच्चाधिकारी या उस के ऊपर के किसी व्यक्ति द्वारा उसे राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेने या किसी दल विशेष की सहायता करने के लिए दबाव डाला जा रहा है तो उस का कर्तव

कर्मचारियों के आचरण नियम क्यों नहीं आम किए जाते? ….. भाग-2

 प्रवीण त्रिवेदी (प्राइमरी का मास्टर) ने पूछा था –

१-सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक किस हद तक और किस तरह से देश के ज्वलंत  मुद्दों पर अपनी अधिकतम सक्रियता रख सकता है ?
२-क्या सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक होने से देश के आम नागरिक को प्राप्त  अधिकारों पर किसी तरह का अंकुश लग जाता है?
३-शान्तिपूर्ण किसी भी प्रदर्शन का अधिकार सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक को है कि नहीं? … यदि है तो किस हद तक?
४-क्या शांतिपूर्ण अनशन, प्रदर्शन या अन्य  विरोध के तरीकों पर जिला प्रशासन की पूर्वानुमति आवश्यक है?
५-सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक क्या कोई अराजनैतिक , सामाजिक, और सांस्कृतिक संगठन बना सकते हैं ….. या उसके अधीन कार्य कर सकते हैं? …….. या उसके अधीन कोई  शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं ?
 उत्तर –

प्रवीण भाई के प्रश्नों के उत्तर में कल यह बताया गया था कि कोई भी व्यक्ति किसी नियोजन में एक अनुबंध/संविदा के अंतर्गत ही प्रवेश करता है, जब तक वह संविदा रहती है तब तक उस संविदा की शर्तों का पालन करना उस का कर्तव्य है। यदि वह किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है तो वह सेवा संबंधी दुराचरण का दोषी हो सकता है, जिस के लिए उसे संविदा समाप्त करने अर्थात उस की सेवाएँ समाप्त करने का दंड दिया जा सकता है। भारत में सभी राजकीय, अर्धराजकीय सेवाओं के सदस्यों के लिए पृथक-पृथक आचरण नियम बनाए गए हैं। इन सेवाओं के सदस्यों के लिए इन आचरण नियमों का पालन करना आवश्यक है। आचरण नियमों के विपरीत आचरण करना या उन का उल्लंघन करना एक दुराचरण हो सकता है जिस के लिए कर्मचारी/अधिकारी को दंडित किया जा सकता है।

भारत में केन्द्र सरकार, व राज्य सरकार द्वारा निर्मित सभी आचरण नियम सारतः और तत्वतः एक जैसे हैं और केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के लिए बनाए गए नियमों के प्रतिरूप दिखाई देते हैं। हालाँकि उन में अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप  कहीं कहीं परिवर्तन भी किए गए हैं। इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक कर्मचारी इन नियमों को सेवा में प्रवेश के पहले गंभीरता के साथ अवश्य पढ़े। यह केवल कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है अपितु नियोजकों (सरकारों और संस्थानों) की भी आवश्यकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अनेक बार ये नियम  कर्मचारी द्वारा तलाश किए जाने पर भी नहीं मिलते हैं। होना तो यह चाहिए कि कर्मचारी पर प्रभावी आचरण नियमों और सेवा नियमों के सार की एक प्रति उसे नियुक्ति के लिए दिए जाने वाले प्रस्ताव पत्र के साथ ही भेजी जानी चाहिए। किन्तु ऐसा नहीं किया जाता है। ये प्रत्येक सरकारी विभाग में आसानी से उपलब्ध होने चाहिए, लेकिन इन का अभाव बना रहता है। अब तो यह भी सुविधा है कि प्रत्येक विभाग की अपनी वेबसाइट है, कम से कम विभाग इन्हें हिन्दी, अंग्रे
जी और क्षेत्रीय भाषा में उन पर तो चस्पा कर ही सकते हैं। लेकिन अभी तक उस का भी अभाव बना हुआ है। इस अभाव के पीछे सब से बड़ा कारण स्वयं सरकारी अधिकारी और कर्मचारी  स्वयं हैं। वे नहीं चाहते कि ये आचरण नियम जनता जाने। यदि देश के नागरिकों को पता हो कि एक कर्मचारी का आचरण कैसा होना चाहिए तो कोई भी नागरिक किसी भी कर्मचारी के आचरण पर प्रश्न खड़ा कर सकता है। ऐसी स्थिति में सरकारों को चाहिए कि वे आचरण नियमों का प्रचार करें और जनता को प्रोत्साहित करें कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी इन के विरुद्ध आचरण करता है तो उस की शिकायत की जा सकती है और शिकायत सही पाए जाने पर उसे दंडित किया जा सकता है, जिस में उस की सेवा समाप्ति भी सम्मिलित हो सकती है। लेकिन सरकारें भी इस ओर से आँखें मूंदे बैठी रहती हैं। यह आप के सोचने की बात है कि देश में फैले भ्रष्टाचार की एक मूल यहाँ भी है।

चरण नियमों में अनेक महत्वपूर्ण बातें हैं, लगभग सभी आचरण नियमों के नियम-3 में यह उल्लेख किया गया है कि प्रत्येक राजकीय/अर्धराजकीय कर्मचारी “सदैव” (चाहे वह कर्तव्य पर हो या न हो) ईमानदार रहेगा, कर्तव्यनिष्ठ और कार्यालय की गरिमा बनाए रखेगा। जो कर्मचारी पर्यवेक्षीय पदों पर हैं उन्हें यह कर्तव्य भी सौंपा गया है कि वे ऐसे कदम उठाएंगे जिस से उस के नियंत्रण और प्राधिकार में काम कर रहे कर्मचारियों की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता सुनिश्चित की जा सके। इस तरह हम देखते हैं कि एक राजकीय कर्मचारी से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने व्यवहार को सदैव चाहे वह घर में हो, या बाहर हो या अपने कर्तव्य पर हो चौबीसों घंटे अपने व्यवहार को संयत बनाए रखेगा। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लक्ष्मीनारायण पाण्डे बनाम जिलाधीश (एआईआर 1960 इलाहाबाद 1955) के मामले में यह निर्णय दिया है कि सरकार अपने कर्मचारी के ऐसे व्यक्तिगत आचरण पर भी कार्यवाही कर सकती है, जो उस के पद से संबंधित नहीं हो। इस तरह एक सरकारी कर्मचारी से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह कर्तव्य करते समय और अन्यथा भी कोई ऐसा आचरण नहीं करे जो नैतिक पतन की श्रेणी में सम्मिलित हो। उसे अपने परिवार, संबंधियों, मित्रों और जनता के बीच ऐसे बेढंगे प्रकार से व्यवहार नहीं करना चाहिए जो उस के पद के लिए अशोभनीय हो। यहाँ सिद्धांत यह है कि सरकारी कर्मचारी का अनुचित और बेढंगा व्यवहार सरकार के लिए चिंता का विषय हो सकता है क्यों कि किसी भी सरकार की वास्तविक छवि उस के कर्मचारियों के व्यवहार से बनती है।

चरण नियमों में आचरण के सम्बन्ध में जो दायित्व कर्मचारियों के लिए निर्धारित किए गए हैं वे ही उन के परिवार के सदस्यों के बारे में भी निर्धारित किए गए हैं। इस का अर्थ यह है कि एक सरकारी/अर्धसरकारी कर्मचारी को न केवल अपने आचरण को इन नियमों के अनुरूप करना होगा अपितु उस के परिवार के सदस्यों के आचरण को भी नियंत्रित रखना होगा। एक कर्मचारी के परिवार के सदस्यों को भी कुछ गतिविधियाँ करने से निषिद्ध किया गया है। ऐसी स्थिति में यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि किस किस को कर्मचारी के परिवार का सदस्य माना जाएगा। इन नियमों में परिवार के सदस्यों को परिभाषित किया गया है
जिस के अनुसार कर्मचारी की पत्नी या पति चाहे वह पति के साथ निवास करती है या नहीं लेकिन उस में ऐसी पत्नी या पति सम्मिलित नहीं हैं जिस का किसी न्यायालय की डिक्री द्वारा न्यायिक पृथक्करण हो गया हो;  कर्मचारी का पुत्र और पुत्री, सौतेला पुत्र और पुत्री जो पूर्णतः सरकारी कर्मचारी  पर निर्भर हो लेकिन वह संतान इस में सम्मिलित नहीं है जो कर्मचारी पर आश्रित न हो या किसी कानून के अंतर्गत कर्मचारी के संरक्षण से वंचित कर दिया गया हो तथा अन्य कोई भी व्यक्ति जो रक्त से या विवाह से कर्मचारी की पत्नी या पति से सम्बन्धित हो और पूर्णतः सरकारी कर्मचारी पर आश्रित हो कर्मचारी के परिवार का सदस्य माना गया है।

र्मचारी के परिवार के सदस्य किन गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते यह अगले अंक में स्पष्ट किया जाएगा। आज के लिए इतना ही।
.….. जारी

सरकारी/अर्धसरकारी कर्मचारी क्या क्या नहीं कर सकते?

 प्रवीण त्रिवेदी (प्राइमरी का मास्टर) ने पूछा है –

१-सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक किस हद तक और किस तरह से देश के ज्वलंत  मुद्दों पर अपनी अधिकतम सक्रियता रख सकता है ?
२-क्या सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक होने से देश के आम नागरिक को प्राप्त  अधिकारों पर किसी तरह का अंकुश लग जाता है?
३-शान्तिपूर्ण किसी भी प्रदर्शन का अधिकार सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक को है कि नहीं? … यदि है तो किस हद तक?
४-क्या शांतिपूर्ण अनशन, प्रदर्शन या अन्य  विरोध के तरीकों पर जिला प्रशासन की पूर्वानुमति आवश्यक है?
५-सरकारी या अर्धसरकारी कर्मचारी या शिक्षक क्या कोई अराजनैतिक , सामाजिक, और सांस्कृतिक संगठन बना सकते हैं ….. या उसके अधीन कार्य कर सकते हैं? …….. या उसके अधीन कोई  शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं ?
 उत्तर –

प्रवीण भाई!

प के प्रश्न सामयिक और वर्तमान समय में अत्यन्त प्रासंगिक हैं। लेकिन वे उलटे भी हैं। आप के सभी प्रश्नों में यह पूछा है कि सरकारी/अर्धकर्मचारी कर्मचारी/अध्यापक क्या क्या गतिविधियाँ कर सकते हैं? लेकिन इस तरह के प्रश्न सदैव असीम होते हैं और उन का उत्तर दिया जाना कभी भी संभव नहीं हो सकता। क्यों कि स्वयं गतिविधियों की कोई सीमा नहीं हो सकती। वे सदैव अपना प्रकार बदल कर सामने आती हैं। आप का प्रश्न यह हो सकता था कि सरकारी/अर्धकर्मचारी कर्मचारी/अध्यापक क्या क्या गतिविधियाँ नहीं कर सकते? तो उस का उत्तर देने में आसानी हो सकती थी। यहाँ आप के तमाम प्रश्नों के उत्तर उन्हें विलोम में परिवर्तित कर यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

प के प्रश्नों के उत्तर खोजने के पहले यह बताना आवश्यक प्रतीत हो रहा है कि  भारत के प्रत्येक नागरिक को स्वयं को भारत का नागरिक मानना चाहिए। फिर यह जानना चाहिए कि उस के क्या अधिकार और कर्तव्य हैं? सभी कर्मचारियों के भी, चाहे वे सरकारी, अर्धसरकारी या गैरसरकारी हों, संवैधानिक और कानूनी अधिकार अन्य नागरिकों के समान ही  हैं। यदि अंतर है तो इतना वे नियोजन में प्रवेश के पूर्व अपने नियोजक के साथ एक अनुबंध करते हैं, जिस के अंतर्गत वे नियोजक के लिए काम करते हैं और नियोजक उस के बदले उन्हें वेतन व अन्य सुविधाएँ प्रदान करता है। इस अनुबंध में कुछ शर्तें होती हैं जिन में कर्मचारी के लिए कुछ कार्यों का किया जाना निषिद्ध कर दिया गया होता है।  प्रत्येक कर्मचारी को यह जानना आवश्यक है कि उस के अनुबंध की शर्तें क्या क्या हैं, और वह कौन से काम ऐसे हैं जिन्हें न करने के लिए उस ने अपने नियोजन अनुबंध के अंतर्गत स्वीकार कर लिया है। 
दाहरण के रूप में भारत में धर्म का पालन करने की संवैधानिक स्वतंत्रता है, प्रत्येक व्यक्ति पर उस की अपनी व्यक्तिगत विधि भी लागू होती है। अपनी व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत एक मुस्लिम के एक साथ चार तक पत्नियाँ हो सकती हैं। लेकिन एक मुस्लिम व्यक्ति जब किसी नियोजक के साथ अनुबंध कर के उस का कर्मचारी होता है और उस के अंतर्गत यह स्वीकार कर लेता कि वह कर्मचारी रह
ते हुए एक ही पत्नी रखेगा, और दूसरा निकाह नहीं करेगा।  यदि वह एक पत्नी के होते हुए दूसरा निकाह करता है तो ऐसा करना सेवा अनुबंध का उल्लंघन और सेवा संबंधी दुराचरण होगा। सेवा अनुबंध के उल्लंघन का दुराचरण करने के लिए नियोजक उस के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही कर के उसे दंडित कर सकता है। एक नियोजक सब से बड़ा दंड जो अपने कर्मचारी को दे सकता है, वह सेवा अनुबंध समाप्त कर कर्मचारी को अपनी सेवा से हटाना हो सकता है जो इस दुराचरण के लिए भी उसे दिया जा सकता है। लेकिन इस का अर्थ यह कदापि नहीं है कि नियोजक ने उस की व्यक्तिगत विधि में, अथवा उस के किसी मौलिक, संवैधानिक अधिकार में अथवा उस के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप किया है। इस का अर्थ कदापि यह भी नहीं है कि उस के द्वारा किया गया दूसरा विवाह अवैध है। उस के द्वारा किया गया दूसरा विवाह वैध उस की व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत वैध होगा और वैध ही रहेगा। लेकिन नियोजक को इस बात का पूरा अधिकार है कि वह कर्मचारी द्वारा सेवा अनुबंध में किए गए उल्लंघन के दुराचरण के लिए उसे दंडित कर सके। ठीक यही स्थिति सभी कर्मचारियों की है। इसलिए उन्हें यह जानना चाहिए कि सेवा में आने पर उन्हों ने नियोजक की किन-किन शर्तों को स्वीकार किया है।

भी सरकारी, अर्धसरकारी नियोजनों के लिए आचरण नियम बने हुए होते हैं जिन में यह उल्लेख होता है कि एक कर्मचारी नियोजन में रहते हुए कौन कौन से काम नहीं कर सकता। केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपने कर्मचारियों लिए आचरण नियम पृथक पृथक बनाए हुए हैं। यहाँ तक कि अलग अलग विभागों और विशिष्ठ सेवाओँ के लिए आचरण नियम अलग अलग हैं और उन में उन के नियोजन के चरित्र को देखते हुए भिन्नताएँ भी हैं। प्रत्येक कर्मचारी को नियोजन प्रदान करने के समय दिए जाने वाले नियुक्ति पत्र में यह उल्लेख होता है कि वह आचरण नियमों का पालन करेगा। यदि उल्लेख न भी हो तो भी सरकारी और अर्धसरकारी संस्थाओं के नियोजन नियमों में यह अंकित होता है कि कर्मचारी आचरण नियमों का पालन करेगा और आचरण नियमों का उल्लंघन करना दुराचरण माना जाएगा जिस के लिए उस के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही की जा कर उसे दंडित किया जा सकता है। इस कारण प्रत्येक कर्मचारी को चाहे वह सरकारी/अर्ध सरकारी सेवा में हो या फिर किसी निजि सेवा में, उसे उन सभी नियमो का अध्ययन  अवश्य कर लेना चाहिए जो उस पर प्रभावी हैं, जिस से वह जान सके कि उसे नियोजन में रहते हुए किस तरह का आचरण करना है और किस तरह का आचरण नहीं करना है। 

प के प्रश्नों का उत्तर देने के पूर्व यह भूमिका ही किसी ब्लाग पोस्ट की सीमा से लंबी हो गई है। इस लिए आप के प्रश्नों के उत्तर अगली पोस्ट में। कृपया उस के लिए प्रतीक्षा करें।

सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के लिए दंडित करने व नियम बनाने की शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-98

अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति
र्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत एक अभिलेख न्यायालय है। इसी कारण से इस न्यायालय को अपनी ही अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। अवमानना के लिए दंडित करने की इस शक्ति का प्रयोग केवल न्यायालय के न्याय प्रशासन के संबंध में ही किया जा सकता है, किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत अपमान के संबंध में इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
इस शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही कर सकता है जो अवांछित उपायों से न्यायाधीशों को प्रभावित करने और न्याय की प्रक्रिया में प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 121 में यह उपबंध किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण और निर्णय के संबंध में संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। लेकिन किसी समाचार पत्र में या अन्यथा प्रकाशित किसी आलोचनात्मक आलेख या कथन से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रशासन के प्रति समुदाय के विश्वास को क्षति पहुँची हो या उस कथन या आलोचना से न्यायिक प्रशासन में अवरोध उत्पन्न हुआ हो तो उक्त कथन अथवा आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। 
सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 145 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। वह केवल वे ही नियम बना सकता है जो कि संसद द्वारा नहीं बनाए गए हों। इस तरह संसद द्वारा निर्मित विधि और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में किसी भी तरह के संघर्ष की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
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