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तहसील कोई निर्णय नहीं कर रही है तो आरटीआई से देरी का कारण पूछें।

समस्या-

चंद्रप्रकाश ओझा ने गांव-छत्तरगढ़, जिला-बीकानेर, राज्य-राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी को 1977 में छत्तरगढ़ जिला बीकानेर में भूदान यज्ञ बोर्ड ने 25 बीघा जमीन आवंटित की। राजस्व रिकार्ड में यह जमीन भूदान यज्ञ बोर्ड के नाम दर्ज थी तथा मेरे पिताजी आवंटी थे। राज्य सरकार ने भूदान बोर्ड के सभी आवंटियों को खातेदारी अधिकार देने का निर्णय किया तथा भूदान बोर्ड को अपने आवंटियों के नाम सपुष्ट सूची में भेजकर छत्तरगढ़ तहसीदार को खातेदारी देने के आदेश देने के लिए अधिकृत किया जिसके तहत भूदान बोर्ड ने अधिकांश को खातेदारी अधिकार देने के लिए तहसीदार छत्तरगढ़ को अलग अलग सपुष्ट सूचियाँ भेजकर सूची में शामिल आवंटियों को खातेदारी अधिकार देने को कहा। जिसमे से अधिकांश को खातेदारी अधिकार दे दिए गए। भूदान बोर्ड ने 27 जुलाई 2018 को जो सूची भेजी उसमें मेरे पिताजी का नाम भी था, लेकिन खातेदारी मिलती उससे पहले ही 17 जुलाई 2018 को 99 वर्ष की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया।

मेरे पिताजी ने अपने जीवन काल में सन 2012 में रजिस्टर्ड वसियत कर अपनी सारी सम्पति अपने पोते (मेरे पुत्र के) नाम कर दी थी। तथा वसीयत में ये भी लिख दिया था कि मेरी मृत्यु के बाद भी अगर कोई सम्पति मेरी बनती है तो उसका स्वामित्व भी मेरे इस पोते के नाम रहेगा । मेरे माता- पिता ने मेरे छोटे भाई, उसकी पत्नी व बच्चों को 2007 में ही मारपीट करने,अभद्र व अमानवीय व्यवहार करने पर अपनी सारी चल व अचल सम्पत्ति से बेदखल कर अखबार में निकाल दिया था। मेरे पिताजी ने मेरे बेटे के नाम वसीयत की थी उसने तहसील में एक प्रार्थना पत्र के साथ रजिस्टर्ड वसीयत की प्रति व बेदखली की कंटिंग लगाकर, खातेदारी अपने नाम करने का निवेदन किया।

तहसीलदार ने जो सूची भूदान बोर्ड ने भेजी थी जिसमें 26 नाम थे उनको खातेदारी अधिकार देने के लिए अखबार में आपत्तियां आमंत्रित की । मेरे छोटे भाई ने आपत्ति लगा दी जिसमें उसने सभी वारिसान के नाम खातेदारी देने का लिखा। मेरे 4 बहनें भी हैं। जबकि उसे, उसकी पत्नी व बेटों को बेदखल किए 11 वर्ष हो चुके है।

अब तहसील द्वारा कोई निर्णय नहीं किया जा रहा। उनका कहना है कि खातेदारी से पहले ही आपके पिताजी की मृत्यु हो गई इसलिए वो गैर खातेदार हुए और गैर खातेदार की वसीयत मान्य नहीं है। जबकि राजस्व रिकार्ड में सभी आवंटियों के नाम इस प्रकार दर्ज है
खातेदार-भूदान यज्ञ बोर्ड
आवंटी-बाबूलाल ओझा

तहसील वालों का यह भी कहना है कि मृतक के भी नाम खातेदारी नहीं हो सकती, जबकि इससे पूर्व जिन 40 आवंटियों को खातेदारी अधिकार दिए गए उनमें कुछ मृतकों के नाम भी खातेदारी दी जा चुकी है। तहसील ऐसे दोहरे मानदंड क्यों अपना रही है।

क्या वसीयतकर्ता के ये लिखने के बाद भी कि “मेरी मृत्यु के बाद भी अगर कोई सम्पति मेरे नाम होती है तो उसका अधिकार भी उसे होगा जिसके हक में वसीयत की गई है।” वसीयतकर्ता की ऐसी इच्छा के बाद भी क्या तहसीलदार ऐसा कर सकते है?

मेरे पिताजी को भूदान बोर्ड ने 1977 में ये भूमि आवंटित करते हुए भूदान बोर्ड का पट्टा दिया था। तब से पिछले 41सालों से खेती कर रहे है ।

कृपया मार्गदर्शन करें कि मेरे पिता की वसीयत व उनकी इच्छानुसार खातेदारी हो सकती है क्या? इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाए? हालांकि अभी तो राजस्थान में विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लगी हुई है इसलिए किसी को भी खातेदारी अधिकार नही दिए गए है लेकिन आचार संहिता हटते ही खातेदारी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी । इसलिए मार्गदर्शित करें कि इस एक माह की अवधि में क्या प्रक्रिया अपनाई जाए कि सभी के साथ हमारे प्रकरण का भी निस्तारण हो सके।

 

समाधान-

हसील आप मामले में आपके पिता के वसीयती के नाम खातेदारी न देने के जो कारण बता रही है वे सभी बहाने हैं। तहसील को बताना चाहिए कि जो नहीं किया जा रहा है वह किस कानून और नियम के अंतर्गत किया जा रहा है। लेकिन तहसील में तो यह सब क्लर्क और अधिकारी मौखिक रूप से कह रहे होंगे। उन्हों ने अभी तक कोई निर्णय नहीं किया है। वैसे भी आम धारणा यह है कि राजस्थान की तहसीलों में बिना धन खर्च किए कोई फाइल आगे नहीं सरकती है। हमें आप के मामले में ऐसा ही कोई पेच नजर आता है।  मौखिक रूप से जो कुछ तहसील कह रही है उस में से कोई भी तर्क किसी कानून या नियम के अंतर्गत नहीं है। अभी तक तहसील ने आप की खातेदारी की अर्जी को लिख कर अस्वीकार नहीं किया है।

अभी आचार संहिता है तो इस अवधि में आप आरटीआई के माध्य़म से पूछ सकते हैं कि वसीयती के नाम पर खातेदारी  दिए जाने का मामला क्यों अभी तक लंबित है? उस के कारण क्या हैं? यदि कोई नियम या कानून आड़े आ रहा है तो वह बताया जाए। यदि तहसली आरटीआई के अंतर्गत कोई कारण बताती है तो उस उत्तर के आधार पर आगे का उपाय तय किया जा सकता है। उस के आधार पर रिट याचिका भी उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है।  यदि कोई कारण बताया जाता है तो उस के आधार परआगे का उपाय तय किया जा सकता है।

किराएदारी का नवीनीकरण कराने का प्रयास करें।

Shopsसमस्या-

कृष्ण कान्त चौधरी ने सनावद, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारे यहाँ शासकीय अस्पताल द्वारा कुल 65 दुकाने निर्मित की गई, जो कि रोगी कल्याण समिति के (अस्पताल के द्वारा गठित समिति का नाम रोगी कल्याण समिति है) द्वारा नीलामी प्रक्रिया द्वारा बेचीं गयीं जिस का 35 माह बात नवीनीकरण किया जाता है। (प्रत्येक तीन वर्ष में) साथ ही यह नियम भी है कि वह दुकान किसी अन्य को नहीं बेची जाएगी, न ही किराये पर दे सकते हैं, न भागीदारी कर सकते हैं। किन्तु आज कुल 65 दुकान में से करीब -करीब 20 दुकानें रीसेल हो चुकी हैं। अब हम सभी की समस्या है कि हमें रोगी कल्याण समिति के द्वारा दुकान खाली करने के पत्र आ रहे हैं (जबकि रोगी कल्याण समिति ने अनेक नियमों का उल्लंघन करते हुए गैरेज, चाकू छुरी, अंडा, ध्वनि विस्तारक आदि के व्यवसायियों को दुकान न देने का नियम होते हुए भी दी है) ऐसी स्थिति में हमारे साथ क्या होगा? या हमें क्या करना चाहिए? कृपया उचित मार्गदर्शन प्रदान करें।

समाधान-

दि कोई व्यक्ति कोई गलती करता है तो उस से उस के साथ की गई किसी दूसरे की गलती समाप्त नहीं होती। यदि रोगी कल्याण समिति ने अपने नियमों के विरुद्ध कोई कार्य किया है तो उस के लिए उस के विरुद्ध शिकायत की जा सकती है। वैसे कार्यों को रोकने या समाप्त करने के लिए अलग कानूनी कार्यवाही की जा सकती है। समिति एक संगठन है जिस का गठन शासन द्वारा किया गया है। उस की गलती को रोकने के लिए कोई भी नागरिक न्यायालय में कार्यवाही कर सकता है। लेकिन समिति ने गलतियाँ की हैं इस कारण कोई और उस के साथ गलती कर के लाभ उठा सकता है, यह सम्भव नहीं है।

न 65 दुकानों के हस्तान्तरण के संबंध में जो दस्तावेज आप ने हमें भेजा है वह एक किरायानामा मात्र है। दुकानें नीलामी के द्वारा किराए पर दी गई हैं। यह किराएदारी 3 वर्ष की है। यह दस्तावेज पंजीकृत नहीं है जब कि एक वर्ष से अधिक की किराएदारी का किरायानामा पंजीकृत होना चाहिए। वैसी स्थिति में सभी दुकानदार किराएदारी के सामान्य नियमों के अन्तर्गत किराएदार हैं।

दुकान खाली करने का नोटिस भेजा गया है तो इस का अर्थ ये है कि समिति वर्तमान किराएदारों से किराएदारी का नवीनीकरण चाहती है। दुकान खाली कराने के लिए तो समिति को सभी दुकानदारों के विरुद्ध दुकान खाली कराने के मुकदमे करने होंगे। यदि समिति किसी के विरुद्ध इस तरह का मुकदमा करती है तो वह दुकानदार उसे मेरिट पर लड़ सकता है और सफल या असफल हो सकता है।

मेरी राय में सभी दुकानदारों को जो मूल दुकानदार हैं या फिर हस्तान्तरिती हैं, समिति से बात करनी चाहिए कि उन की किराएदारी का नवीनीकरण कर दिया जाए। नवीनीकरण के लिए आपसी शर्तें तय हो सकती हैं जो मूल दुकानदार और हस्तान्तरिती के लिए अलग अलग सकती हैं।

किराए पर देने के पहले संपत्ति पर स्वत्व प्राप्त करने का प्रयत्न करें।

समस्या-

कोरबा, छत्तीसगढ़ से प्रवीण कुमार ने पूछा है-

गाँव के आबादी क्षेत्र में मेरा एक कब्ज़ा किया हुआ मकान है।  जिस पर मेरा कब्जा १० साल से है जिसका बिजली का कनेक्शन मेरे नाम से है व बिल मेरे नाम से आता है।   मेरा एक परिचित उस पर एक संस्था (स्कूल) खोलने के लिए मकान किराये पर मांग रहा है।  पर मुझे संशय बना हुआ है की संस्था खुलने के बाद उक्त मकान पर कब्जा न हो जाये। क्या ऐसा हो सकता है?  इसके लिए मुझे किस तरह का अनुबंध करना होगा।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएँ, जिस से मुझे कुछ आय प्राप्त हो और मकान का कब्जा भी मेरा हो?

समाधान-

Farm & houseकान आप के कब्जे में 10 वर्ष से है। जो कोई भी व्यक्ति उस का स्वामी है वह आगे दो वर्ष तक और आप से कब्जा प्राप्त करने का दावा न्यायालय में स्वत्व के आधार पर संस्थित कर सकता है। लेकिन कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो जाने के बाद वह दावा नहीं कर सकता। आप यदि संपत्ति को किराए पर देते हैं तो उस में एक परेशानी यह है कि यदि किराएदार कब्जा संपत्ति के असली मालिक को दे देने का कोई लिखित दस्तावेज लिख दे और कुछ दिन बाद पुनः उसी से किरायानामा लिखवा ले। भले ही वह वास्तविक रूप से किसी को कब्जा दे या न दे तो एक बार कब्जा स्वत्वाधिकारी के पास चले जाने पर आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे। आप के मामले में वास्तविक स्वत्वाधिकारी की क्या स्थिति है यह जानकारी आप ने नहीं दी है।

प के गाँव में यदि नगरपालिका नहीं है तो वहाँ संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत आप भवन को लीज पर दे सकते हैं। लेकिन यह लीज 11 माह से अधिक की होने पर उसे पंजीकृत कराना जरूरी होगा। अन्यथा प्रत्येक 11 माह बाद एक लीज एग्रीमेंट समाप्त होने पर नया लीज एग्रीमेंट लिखाना होगा। यह मान कर चलें कि किरायानामा/ लीज डीड लिखवा लेने पर किराएदार हमेशा किराएदार ही रहेगा। वह मकान मालिक नहीं हो सकता।

फिर भी हमारी राय है कि आप कब्जा 12 वर्ष का हो जाने तक भवन किराए पर न दें तो अच्छा है। 12 वर्ष से अधिक का कब्जा हो जाने पर प्रयत्न करें कि ग्राम पंचायत से आप को पट्टा मिल जाए जिसे आप अपने नाम पंजीकृत करवा लें। इस तरह स्वत्व प्राप्त हो जाने के बाद ही किसी व्यक्ति को भवन किराए पर दें। वैसे पंचायत 12 वर्ष के पहले भी मकान की जमीन पर कब्जे के आधार पर पट्टा दे सकती है।

किरायानामा अक्सर 11 माह की अवधि के लिए क्यों लिखा होता है?

समस्या-

जोधपुर, राजस्थान से प्रहलाद ने पूछा है –

मैं अपनी दुकान किराए पर देना चाहता हूँ। दुकान का किरायानामा 11 माह के लिए लिखाया जाए या पिर पाँच वर्ष के लिए? किराएदार जान-पहचान का है। पाँच वर्ष का किरायानामा बना लें तो कैसा रहेगा?

समाधान-

पंजीयन अधिनियम के अनुसार यदि किराएदारी एक वर्ष या इस से अधिक काल के लिए की जाती है तो ऐसा किरायानामा रजिस्टर्ड होना चाहिए। यही कारण है कि लोग ग्यारह माह का किरायानामा लिखाते हैं जिस से उस का पंजीयन नहीं कराना पड़े।  यही कारण है कि अधिकांश किराएनामें 11 माह की अवधि के लिए लिखे होते हैं।  पाँच वर्ष का किरायानामा लिखवाने पर आप को किरायानामा पंजीकृत कराना होगा तथा दो वर्ष के किराए की राशि के बराबर राशि की संपति के विक्रय पत्र पर निर्धारित स्टाम्प ड्यूटी अदा करनी होगी।  शायद स्टाम्प ड्यूटी के रूप में इतनी राशि देने पर किराएदार सहमत नहीं होगा।

लेकिन यदि किरायानामा पांच वर्ष की अवधि के लिए लिखा और पंजीकृत कराया जाता है और उस में यह शर्त होती है कि आप पाँच वर्ष के पूर्व आप दुकान को खाली नहीं करा सकेंगे। तो फिर आप केवल इस आधार पर कि किराएनामे की अवधि समाप्त हो गई है अपनी दुकान को खाली करवा सकते हैं।

राजस्थान में कृषिभूमि का नामान्तरण

 झुन्झुनू, राजस्थान से विनोद कुमाँवत ने पूछा है –

मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेने के उपरान्त कृषि भूमि के नामान्तरण के लिए किस राजस्व अधिकारी को आवेदन करना होगा और  नामान्तरण दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है। 
 उत्तर –

विनोद जी,

भारत के संविधान के अनुसार भूमि प्रबंधन राज्य का विषय है। इस कारण से इस सम्बन्ध में देश के प्रत्येक राज्य  के लिए अलग अलग कानून और नियम हैं। आप राजस्थान के निवासी हैं। इस कारण से आप को राजस्थान के कानून और नियमों के अनुसार ही प्रक्रिया अपनानी होगी। राज्य में  नगरीय भूमि, आबादी भूमि, उद्योगों के लिए आवंटित भूमि तथा वन भूमि के अतिरिक्त जितनी भी भूमि है वह सब राजस्व विभाग के नियंत्रण में है। समस्त भूमि की स्वामी राज्य सरकार है। कृषक को उस भूमि पर केवल उपयोग के अधिकार प्राप्त हैं।  कृषक की हैसियत किसी भी कृषि भूमि पर एक किराएदार जैसी है, जिस के लिए उसे सरकार को वार्षिक रूप से लगान भी अदा करना होता है। राज्य के राजस्व विभाग का सब से निचली पायदान का अधिकारी पटवारी है। एक कृषक को अपने खाते की कृषि भूमि से संबंधित किसी भी कार्य के लिए अपने क्षेत्र के पटवारी से संपर्क करना चाहिए। कृषकों की अधिकांश समस्याओं का समाधान पटवारी कर देता है। इस संबंध में ग्रामीण क्षेत्र में एक किस्सा प्रचलित है; “कोई नौजवान राजस्व अधिकारी गांव के दौरे पर गया। कृषकों से उसने मधुर व्यवहार किया। ग्रामीण ने पूछा आप कौन से अधिकारी हैं, तो उस ने बताया कि वैसे तो मैं तहसीलदार हूँ, लेकिन आप का तो बच्चा जैसा हूँ। ग्रामीण बहुत प्रसन्न हुआ और उस ने उसे अपने बेटे जैसा समझते हुए आशीष दी कि “तुम बहुत अच्छे हो, भगवान तुम्हें तरक्की दे और जल्दी ही पटवारी बनाए।” इस किस्से से जाना जा सकता है कि पटवारी ग्रामीण किसानों के लिए कितना महत्वपूर्ण अधिकारी है। 
दि किसी भी प्रकार से किसी कृषक का खातेदारी अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित हो जाए तो राजस्व अभिलेख में उस हस्तान्तरण को दर्ज किए जाने को नामान्तरण कहा जाता है। खातेदारी अधिकारों को व्यक्तिगत संपत्ति के समान समझा गया है और वे उन सब रीतियों से हस्तान्तरित हो सकते हैं जिन से संपत्ति हस्तान्तरित हो सकती है । जैसे कोई कृषि भूमि पर अपने खातेदारी अधिकारों को विक्रय कर के, दान कर के, उसे ट्रस्ट कर के या अन्य रीति से हस्तान्तरित कर सकता है। राजस्थान में कृषि भूमि पर खातेदारी अधिकार को अचल संपत्ति के समान माना गया है और किसी व्यक्ति के देहान्त पर उत्तराधिकार की विधि के अनुसार उत्तराधिकारियों को खातेदारी अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस तरह मृत खातेदार कृषक के अधिकार उस की मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों को हस्तान्तरित हो जाते हैं। केवल इस हस्तान्तरण को राजस्व अभिलेख में दर्ज करना होता है। इस के लिए जिस व्यक्ति को किसी भी प्रकार से खातेदारी अधिकार हस्तान्तरित हुए हों उसे अविलम्ब राजस्व विभाग में आवेदन आवश्यक दस्तावेजों सहित प्रस्तुत करना चाहिए।
राजस्थान में नामान्तरण दर्ज करने के लिए आवेदन समस्त आवश्यक दस्तावेजों सहित तहसीलदा

मकान मालिक गुंडागर्दी करे तो पुलिस में रपट कराएँ या अदालत को परिवाद प्रस्तुत करें।


 प्रियंका पूछती हैं – – – 

म एक दुकान में पिछले 50 वर्ष से किराएदार हैं, उसी मकान में हमारे साथ एक और किराएदार है जिस ने मकान खरीद लिया है और हम पर दुकान खाली करने के लिए गुंडागर्दी करने लगा है जो हमारे मकान मालिक है उन्हों ने रजिस्ट्री में हमारा नाम किराएदारी में लिखाया है। हमें क्या करना चाहिए?

 उत्तर – – –

प्रियंका जी,

प पहले भी किराएदार थीं और अब भी किराएदार हैं। कोई दो दिन पहले से किराएदार है या 50 साल से, वह किराएदार ही होता है। किराएदार के अधिकार और कर्तव्य समान होते हैं, किराएदारी की लंबाई से कोई फर्क नहीं पड़ता है। अब मकान के बिक जाने के कारण अंतर यह आया है  कि आप का मकान मालिक बदल गया है। किसी भी किराएदार से दुकान या मकान तभी खाली कराया जा सकता है जब कि मकान मालिक के पास कानून में वर्णित कोई आधार उपलब्ध हो। यदि आप नियमित रूप से दुकान का किराया अदा करती हैं और मकान मालिक के पास कोई अन्य आधार उपलब्ध नहीं है तो वह आप से दुकाम खाली नहीं करवा सकता है।
ब यदि मकान मालिक आप से दुकान खाली कराने के लिए गुंडागर्दी करता है या फिर गैरकानूनी तरीके इस्तेमाल करता है तो वह शांति भंग करता है या फिर अपराध कर रहा है। ऐसी स्थिति में आप को शांति भंग करने के लिए अपने वर्तमान मकान मालिक जो आप के विरुद्ध यह सब कर रहा के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखाएँ और कार्यवाही करें। यदि पुलिस थाना कार्यवाही नहीं करता है तो पुलिस अधीक्षक को अपनी शिकायत रजिस्टर्ड डाक से प्रेषित करें। यदि फिर भी कार्यवाही नहीं होती है तो आप अदालत में सीधे परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। यदि मकान मालिक जबरन आप से दुकान खाली कराने की कोशिश करता है तो ऐसी कोशिश के विरुद्ध आप अदालत में दीवानी वाद प्रस्तुत कर के उस के विरुद्ध इस आशय का अस्थाई व्यादेश प्राप्त कर सकती हैं कि वह दुकान को खाली कराने के लिए कानूनी तरीकों के अतिरिक्त अन्य कोई भी तरीका न अपनाए। इस के लिए आप को किसी विश्वसनीय स्थानीय वकील की सहायता प्राप्त करनी होगी।

किरायेदार छह माह से परिसर का उपयोग नहीं कर रहा है और किराया भी नहीं दे रहा है, आप मकान खाली करा सकते हैं

 
 नेमीचन्द पूछते हैं – – –
मेरा एक किराएदार है, मैं ने उस के साथ कोई संविदा (कंट्रेक्ट) नहीं की है। उस ने छह माह से किराया अदा नहीं किया है और मकान भी खाली नहीं कर रहा है। वह मकान में रह भी नहीं रहा है बल्कि उस का ताला डाल रखा है। कृपया मुझे सही सलाह दें ताकि मैं मकान खाली करा सकूँ। 
उत्तर – – –
 नेमीचन्द जी,
प ने अपना राज्य का नाम नहीं बताया है, जहाँ आप का मकान स्थित है और जिस में किराएदार को रखा है। सभी राज्यों में किराएदारी कानून में भिन्नता है। तीसरा खंबा इसी कारण से सभी प्रश्नकर्ताओं से उन के राज्य और नगर/ग्राम का नाम पूछता है। लेकिन प्रश्नकर्ता इसे बताने में झिझकते हैं।
फिर भी सभी राज्यों में छह माह का किराया अदा नहीं करना किराया अदायगी में चूक मानी जाती है और इस आधार पर किसी भी किरायेदार से मकान खाली कराया जा सकता है।
प ने यह भी बताया है कि किरायेदार वहाँ रहता भी नहीं है उस ने ताला डाल रखा है। इस तरह लगातार छह माह से किराए पर प्राप्त परिसर का उपयोग किराएदार द्वारा न करना भी किरायेदार से मकान खाली कराने का एक आधार है। 
प के पास अपने किरायेदार से परिसर खाली कराने के लिए दो मजबूत आधार उपलब्ध हैं। आप को तुरंत किसी वरिष्ठ और विश्वसनीय वकील से संपर्क कर के किरायेदार के विरुद्ध परिसर खाली कराने तथा बकाया किराया की वसूली के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। इस में तनिक भी देरी करना उचित नहीं।
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