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पुश्तैनी संपत्ति जिस में संतानों का हक है, पिता द्वारा विक्रय किया जाना वैध नहीं है।

समस्या-

भोजपाल ने ग्राम पोस्ट धावरभाटा, मगरलोड, छत्तीसगढ़ समस्या भेजी है कि-


मैं एक बहुत बड़ी समस्या से जूझ रहा हूँ।  मेरे पिता के नाम की खेती की जमीन जो पैतृक थी उसे कुछ लोगों के द्वारा मेरे पिता की मानसिक स्थिति का फायदा उठकार बंधक की बात कहकर मेरे तथा परिवार के सदस्यों की बिना जानकारी व सहमति के रजिस्ट्री पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए गए हैं।  जिसकी जानकारी मुझे पंचायत के द्वारा प्रमाणीकरण सूचना पत्र प्रदान करने पर हुयी। उक्त रजिस्ट्री पत्र में 1.16 हेक्टेयर का प्रतिफल राशि को चेक के माध्यम से 1387000 रूपये देना दर्शाया गया है जो पूर्णतः कूटरचित व फर्जी है किसी प्रकार का चेक नहीं दिया गया है, न ही उनके खाते में पैसा डाला गया है। इसकी जानकारी होने पर मैंने पुलिस अधीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत की थी जिस पर प्रशासन ने चेक संबंधी कोई जाँच नहीं की और रजिस्ट्री पत्र को वैधानिक बताकर न्यायालय जाने हेतु पुलिस हस्तक्षेप अयोग्य पत्र दे दी। इस संदर्भ में मैंने पुलिस को वैधानिक बताये जाने का आधार व चेक संबंधी जानकारी आरटीआई के माध्यम से मांगा लेकिन मुझे कोई संतोसप्रद जानकारी नहीं मिली। मैंने कलेक्टर महोदय को पुनः जाँच के लिए शिकायत आवेदन किया। पुनः जाँच में अनावेदक क्रेता ने यह ब्यान दिया कि उसने 6 लाख रूपये में ये जमीन खरीदी है तथा पैसा नगद देना बताया।  चेक के माध्यम से नहीं। जबकि रजिस्ट्री पत्र में प्रतिफल राशि चेक के माध्यम से 1387000 रूपये मिलना दर्शया है जो कि कूटरचित है। लेकिन पुलिस विभाग द्वारा इस तरीके से धोखाधड़ी करने वालों पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी। सर मैं बहुत परेशान हूँ। मेरे पिता के नाम की सभी जमीन को धोखे से रजिस्ट्री करा लिए हैं क्योकि मैं, मेरा भाई और बहन बाहर पढाई करते थे इसलिए इसकी जानकारी हमें नहीं हुई। यदि जमीन उनके नाम हो गयी तो हम लोग रस्ते पर आ जायेंगे, मैं पूरी तरह से मानसिक रूप से परेशान हूँ और आर्थिक रूप से कमजोर भी। प्लीज सर मुझे सुझाव दे की मैं क्या करूँ?


समाधान-

पुलिस ने यदि जाँच करके मामले को पुलिस हस्तक्षेप योग्य नहीं माना है तो आप को चाहिए कि आप मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें।  रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रति प्राप्त करें तथा कलेक्टर के आदेश से जो जांच हुई है उस की तथा उस जाँच में दिए गए अनावेदक क्रेता के बयान की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर उन्हें भी परिवाद के साथ प्रस्तुत करें। इस के लिए आप को स्थानीय किसी वकील की सेवाएँ प्राप्त करनी होंगी।

इस के अलावा समय रहते विक्रय पत्र की रजिस्ट्री को निरस्त करने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। क्यों कि कोई भी पिता पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में से अपनी संतानों के भाग को विक्रय नहीं कर सकता। इस आधार पर यह रजिस्ट्री निरस्त हो जाएगी। यही आपत्ति आप उक्त भूमि के राजस्व रिकार्ड के नामान्तरण की कार्यवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं।

सहदायिक संपत्ति की आय से निर्मित संपत्ति भी सहदायिक है।

rp_Hindu-Succession-199x300.jpgसमस्या-

राहुल ने अजमेर राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादा जी के दो लड़के और तीन लड़कियाँ हैं। दादा जी के पास जो जमीन थी उसमें आधी पुस्तैनी थी  और आधी स्वअर्जित थी।|  दादा जी ने दोनों लड़को के बीच मे मार्च 1998 मे आपसी राजीनामे से जमीन का बँटवारा एक सादे कागज पर किया जिसमें दोनों लड़को का हिस्सा रखा और लड़कियों का हिस्सा नहीं रखा।  और इस कागज पर मेरे दादा जी के और उनके दोनों लड़को और दो गवाहों  के हस्ताक्षर हैं| और इस बटवारे के अनुसार जो दादा जी की पुस्तैनी जमीन  थी वो उनके बड़े लड़के को दी और जो स्वअर्जित थी उसको छोटे लड़के को दी। और इस बटवारे के अनुसार ही दोनों भाई कब्ज़ा करके कास्त करने लग गए।  फिर लगभग 3 माह बाद ही मेरे दादा जी को उनके छोटे बेटे ने बातो मे बहकाकर उस स्वअर्जित जमीन की वसीयत करा कर उसको रजिस्टर्ड करवा लिया।  इस बात से उनका बड़ा लड़का (मेरे पिताजी) बिलकुल अनजान था। मेरे दादा जी का देहांत 2012  में होने के बाद इस बात का पता चला। अब मेरे दादा जी के देहांत के पश्चात मेरे पिताजी के हिस्से की जमीन में दूसरे भाई और तीनो बहनो का नाम भी लग गया है।  जबकि मेरे चाचा के हिस्से में वसीयत के अनुसार केवल मेरे चाचा का नाम ही लगा है।  अब मेरा चाचा मेरे पिताजी के हिस्से की जमीन में से भी बँटवारा करना चाहता है।  मेरे पापा के पास केवल सबूत के रूप में वो सादा कागज ही है।  अब मेरे पापा को अपना हिस्सा पाने के लिए क्या करना होगा?  क्या मेरे बुआजी (पिताजी की बहने) उनका हिस्सा मेरे पापा के पक्ष में कर सकती हैं? और अगर ऐसा हो सकता हैं तो  इसमें लगभग कितना खर्च आएगा | कागज के बटवारे के अनुसार मेरे पिताजी के हिस्से में लगभग 22  बीघा जमीन है।  प्लीज  मेरे पिताजी के साथ हो रहे इस अन्याय से बचाने का रास्ता बताइये।

 

समस्या-

मारा उत्तराधिकार का कानून ही न्याय की अवधारणा के विपरीत है। इसी कारण अक्सर लोगों के साथ अन्याय होता है और वे न्याय प्राप्त करने के लिए सारा जीवन अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। जो पुश्तैनी जमीन है उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार बन जाता था। जब कि पुत्रियों का भरण पोषण के अतिरिक्त कोई अधिकार नहीं होता था। फिर उस में पुत्रियों को भी उत्तराधिकार प्राप्त होने लगा। 2012 में जब आप के दादा जी का देहान्त हुआ तब पुत्रियों को भी जन्म से ही पुश्तैनी संपत्ति में वही अधिकार प्राप्त हो चुका था जो कि पुत्रों को है। इस कारण से पुश्तैनी संपत्ति में तो दोनों पुत्रों और पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त है। उस के सीधे सीधे पाँच हिस्से होंगे। तीन पुत्रियों के और दो पुत्रों का। 1/5 हिस्सा आप के चाचा का होगा और इतना ही आप के पिता का और आप की बुआओं के। यदि तीनों बुआएँ अपना हिस्सा आप के पिता जी को दे दें तो उन के पास पुश्तैनी जमीन का 4/5 हिस्सा हो सकता है।

सहदायिक संपत्ति की आय से निर्मित संपत्ति भी सहदायिक है। इस कारण स्वअर्जित भूमि पर यह आपत्ति उठायी जा सकती है कि आप के दादा जी के पास पुश्तैनी भूमि की आय के सिवा और कोई आय नहीं थी। स्वअर्जित भूमि उसी पुश्तैनी से हुई आय से खरीदी गयी। यदि कोई संपत्ति पुश्तैनी भूमि की आय से खरीदी जाती है तो वह भी पुश्तैनी ही होती है। इस तरह आप के दादा जी के पास कोई स्वअर्जित भूमि नहीं रह जाती है। आप के पिताजी को इसी तरह का प्रतिवाद अपने पक्ष में खड़ा करना होगा। आप के पिता जी के पास यदि पूरी भूमि का आधा हिस्सा है तो वे इस विवाद के चलते अपने कब्जे की भूमि पर काबिज रह सकते हैं। इस तरह के मुकदमे बहुत लंबे चलते हैं। लड़ने वाले थक जाते हैं और एक ही परिवार के होने के कारण किसी न किसी स्तर पर आपसी समझौता हो जाता है।

हमारी राय है कि आप इस मामले में किसी अच्छे स्थानीय वकील से राय कर के आगे बढ़ें। बहुत कुछ आप के वकील की काबिलियत और मेहनत पर ही आप की लड़ाई का परिणाम निर्भर करेगा।

पुश्तैनी संपत्ति में किसी को उस के हिस्से से बेदखल नहीं किया जा सकता।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

राहुल ने संजय नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता की मृत्यु सन 2015 में हुई है और अब मेरी माँ मुझे अपनी पुश्तैनी चल-अचल सम्पत्ति से बेदखल करना चाहती है। जबकि मेरे दादा जी जिन्दा है और उन्होंने न ही कोई वसीयत बनाई है और न ही उन्होंने मेरे पिता के नाम कोई जमीन की है।  मेरा मेरी मां से कोई झगड़ा नहीं है। मेरी माँ मेरी बहन के कहने पर ऐसा कर रही है हमारे परिवार में मेरी माँ, एक अविवाहित बहन, अविवाहित भाई, मैं स्वयं विवाहित हूँ। क्या मेरी माँ मुझे मेरी पुश्तैनी संपत्ति से बेदखल कर सकती है? कृपया कर मुझे समाधान अवश्य लिखे आपकी अति महान कृपा होगी।

समाधान-

बेदखल शब्द दखल से बना है। बेदखल करने का अर्थ है किसी के दखल को समाप्त करना। दखल शब्द का अर्थ संपत्ति के मामले में कब्जे से है न कि स्वामित्व से है।

पुश्तैनी या सहदायिक संपत्तियाँ बहुत कम अस्तित्व में रह गयी हैं। फिर भी जो भी पुश्तैनी और सहदायिक संपत्तियाँ हैं उन में किसी भी व्यक्ति को अधिकार कानून से मिलता है। सन्तान के जन्म लेते ही पुश्तैनी संपत्ति में उस का हिस्सा तय हो जाता है। इस हिस्से से उसे कोई भी बेदखल नहीं कर सकता है।

यदि कोई  पुश्तैनी संपत्ति है और उस में आप के पिताजी का कोई हिस्सा था तो उस का एक हिस्सा उत्तराधिकार में आप की माँ को भी प्राप्त हुआ होगा। वे अधिक से अधिक उस मां के पास जो हिस्सा है उस में से आप के उत्तराधिकार से आप को वंचित कर सकती हैं जो उन का अधिकार है। लेकिन आप को प्राप्त हुए हिस्से से आप को आप की माँ ही नहीं कोई भी वंचित नहीं कर सकता।

पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों को अधिकार

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

सुमन ने सोनीपत हरियाणा से पूछा है-

मैं 45 साल की विवाहित महिला हूँ। हम दो भाई व दो बहनें हैं।  मेरे पिता जी जीवित हैं। मेरे पिता के नाम गाँव कुण्डली में 20 एकड़ जमीन है जो कि मेरे पिता जी को मेरे दादा जी व दादा जी को उनके पिता जी से तथा आगे उनके पिता जी से उत्तराधिकार में मिली थी। ये पुश्तैनी जमीन है।  मैंने मेरे पिता जी व भाईयों को छ: साल पहले दस लाख रुपये उधार दिए थे। एक साल पहले मैंने मकान खरीदना था तब मैंने पिता जी व भाईयों से रुपये लौटाने को कहा तो उन्होंने मेरे रुपये देने से मना कर दिया तथा अब बोलचाल भी बन्द कर दी है। मेरे पति मुझे रुपये लाने को कहते है । परन्तु मैं मजबूर हूँ।  मैं बहुत दु;खी रहती हूँ। क्या पुश्तैनी जमीन में मेरा हिस्सा है?  यह जानना चाहती हूँ कि क्या मैं पिता के जीवित रहते पुश्तैनी जमीन में से मेरे हिस्से की जमीन ले सकती हूँ? मुझे क्या करना होगा तथा मुझे कितना हिस्सा मिल सकता है?  क्या मेरे पिता जी पुश्तैनी सारी जमीन मेरे भाईयों के नाम कर सकते है? कृपया उचित कानूनी सलाह दें।

समाधान-

दिनांक 09.09.2005 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के प्रभावी होने के पूर्व पुत्रियों को पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार नहीं था। किन्तु उक्त तिथि से सभी पुत्रियों को पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में उसी तरह अधिकार प्राप्त हो गया है जैसे कि पुत्रों को प्राप्त है। उक्त तिथि के उपरान्त जन्म लेने वाली पुत्रियों को यह अधिकार जन्म लेने के समय ही प्राप्त होने लगा है।

उक्त अधिनियम के अनुसार आप को भी अपने पैतृक परिवार की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में दिनांक 09.09.2005 से ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, अब आप भी उस सहदायिकी की एक सदस्य हैं। और आप अपने हिस्से को अलग करने की मांग कर सकती है। यदि उक्त तिथि के बाद सहदायिकी का कोई हिस्सा सहदायिकी से अलग किया गया हो तो उस में भी आप का अधिकार था।

आप तुरन्त बँटवारा कराने तथा अपना पृथक हिस्सा व उस पर कब्जा प्राप्त करने के लिए तुरन्त बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार से वंचित करने के विरुद्ध वाद।

समस्या-

अखिल ने रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-rp_gavel5.jpg

कृपया हमारी शंका  का समाधान करें? क्या (1) यदि संपत्ति दादाजी के पिता की संपत्ति को बेचकर खऱीदी गयी थी तब वह संपत्ति पुश्तैनी मानी जायेगी। जिस पर हम सभी भाई बहनों का बराबर-बराबर अधिकार होगा (2) यदि संपत्ति  दादाजी ने अपनी कमाई से अर्जित की है तो क्या उस पर पिता का अधिकार है और वह चाहें तो उस संपत्ति को किसी को भी दे सकते हैं।

आशीष त्रिपाठी ने सिंगरौली मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या पिता के मृत्यु के पश्चात उस पुश्तैनी संपत्ति पर दावा किया जा सकता है जो पिता ने अन्य लोगों के नाम रजिस्ट्री कर चुका हो? यदि हाँ ! तो किस अधिनियम के तहत य

समाधान-

कोई भी संपत्ति पुश्तैनी या सहदायिक तभी मानी जाएगी जब कि वह 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष हिन्दू को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। यदि आप के दादा जी के पिता के पास वह संपत्ति उक्त तिथि से पूर्व उत्तराधिकार में आयी थी तो पुश्तैनी थी और उसे विक्रय कर के खरीदी गयी संपत्ति भी पुश्तैनी होगी और हर संतान का जन्म से उस में अधिकार होगा।

यदि संपत्ति दादा जी ने अपनी कमाई से खरीदी है और उन का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हो गया था तो आप के पिता के पास वह संपत्ति पुश्तैनी होगी और उस में आप सभी भाई बहनों का भी अधिकार होगा। आप के पिता आप को उस अधिकार से वंचित कर के संपत्ति का विक्रय नहीं कर सकते थे। इस विक्रय को विक्रय की तिथि से 12 वर्ष की अवधि (मियाद) में दीवानी वाद कर के निरस्त कराया जा सकता है। यदि विक्रय के समय आप नाबालिग थे तो आप बालिग होने की तिथि से मियाद में ऐसा दावा कर सकते हैं। यदि आप को इस विक्रय की जानकारी न थी तो आप को जानकारी प्राप्त होने से मियाद में ऐसा वाद संस्थित कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी संपत्ति में उस के अधिकार से वंचित किए जाने के वि्रुद्ध वाद संस्थित करने की मियाद 12 वर्ष है। इसे मियाद अधिनियम में मिलने वाली छूटों के आधार पर कुछ और बढ़ाया जा सकता है। इस मामले में आप को किसी स्थानीय वकील से सलाह करना चाहिए।

ससुर की संपत्ति में पुत्र वधु का कोई अधिकार नहीं।

rp_Flats.jpgसमस्या-

सीमा ने छत्तीसग़ढ़ से पूछा है-

मेरे पति से मैं सात वर्ष से अलग हूँ। मेरा 14 वर्ष का पुत्र भी है। मेरा तलाक नहीं हुआ है। मेरे ससुर जी का देहान्त हो चुका है अब उन की संपत्ति का बंटवारा हो रहा है जिस में मेरे पति उन के बड़े भाई व दो बहनों को हिस्सा दिया जा रहा है। क्या इस संपत्ति में मेरा या मेरे पुत्र का भी अधिकार है?

समाधान-

प के ससुर जी की संपत्ति का बंटवारा हो रहा है। यदि इस संपत्ति में कोई संपत्ति ऐसी हुई जो कि पुश्तैनी /सहदायिक संपत्ति है तो उस में आप के पुत्र का हिस्सा हो सकता है। ससुर की संपत्ति में केवल विधवा पुत्रवधु का अधिकार हो सकता है, आप के पति जब तक जीवित हैं आप का कोई हिस्सा नहीं हो सकता।

अपने पुत्र के अधिकार की जाँच करने के लिए आप को पहले पता लगाना होगा कि आप के पति के परिवार में कोई संपत्ति ऐसी है या नहीं जो कि पुश्तैनी हो। पुश्तैनी संपत्ति वही है जो कि 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और उस के पश्चात उत्तराधिकार में ही उस पुरुष के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई हो और उस के बाद उस उत्तराधिकारी के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई हो।

भूमि/ संपत्ति विवादों में पहले जानें की वह पुश्तैनी है या नहीं।

rp_land-demarcation.jpgसमस्या-

संजीव कुमार ने समस्तीपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पास 20 कट्ठा पुश्तैनी भुमि है, जो मेरे स्व0 दादाजी (मृत्यु वर्ष 1975) की स्वअर्जित संपत्ति है। मेरे स्व. पिताजी (मृत्यु वर्ष 2003) एंव मेरी बुआ अपने ससुराल में अभी जीवित है। मेरे पिताजी का एक पुत्र मैं स्वंय एंव चार विवाहित पुत्रियॉँ हैं। साथ ही मेरी एक विधवा मॉं भी है जो सरकारी पेंशनधारी महिला है। जब 16 अक्टूबर, 2015 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘‘प्रकाश वर्सेस फुलावती‘‘ एंव अन्य मामलों के संज्ञान में यह निर्णय सुनाया गया कि जिन के पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 से पहले हो गई है उनकी बेटियों को पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा नहीं मिलेगा।‘‘ सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के बाद मेरे दादाजी की पुश्तैनी भुमि में मेरा, मेरी चार विवाहित बहनों, मेरी बुआ एंव मेरी विधवा माँ की क्या हिस्सेदारी होगी, जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु वर्ष 2003 में ही हो गई थी?

 

समाधान-

प की यह भूमि पुश्तैनी नहीं है। 17 जून 1956 के पूर्व किसी हिन्दू पुरुष को अपने तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति ही पुश्तैनी है। 17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हो गया और उस समय तक जो स्वअर्जित संपत्तियाँ थीं उन का उत्तराधिकार इस अधिनियम की धारा 8 के अनुसार होने लगा। इस अधिनियम से उत्तराधिकार मिलने पर कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। हिस्से पर जिस का स्वामित्व स्थापित होता है वह उस की निजी संपत्ति होती है। उस में पुत्र पौत्र आदि का कोई अधिकार नहीं है। उस का उत्तराधिकार उस हिस्सेदार की मृत्यु पर खुलता है।

प की भूमि दादा जी की स्वअर्जित थी। उन का देहान्त 1975 में हुआ। इस तरह आप के पिता व बुआ दोनों 50-50 प्रतिशत भूमि के हिस्सेदार हुए। आप के पिता जी का देहान्त 2003 में हुआ। इस समय 20 प्रतिशत अर्थात 10 कट्ठा जमीन पर उन का स्वामित्व था। इस समय माँ व चार बहनों सहित आपके पिता के आप छह उत्तराधिकारी थे इस कारण आप का इस जमीन पर 1/6 हिस्सा हुआ। आप का अधिकार सिर्फ 10/6 कट्ठा जमीन पर है।

प्रकाश बनाम फूलवती के मामले का निर्णय उन संपत्तियों के संबंध में है जो 1956 के पूर्व ही पुश्तैनी संपत्ति थीं। वह आप के मामले में प्रभावी नहीं होगा।

पुश्तैनी संपत्ति में अपने हिस्से के बंटवारे का दीवानी वाद संस्थित किया जा सकता है।

rp_property1.jpgसमस्या-

दक्षिता पालीवाल ने वल्लभनगर जिला उदयपुर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी के 3 पुत्रियाँ (शादी शुदा) 2 पुत्र थे। मैं 11 साल की थी तब 2008 में मेरे पिता (40) की अचानक बीमार होने से मृत्यु हो गई उस समय मेरे परिवार में दादा जी (80) हमारे साथ रहते थे, तथा बड़े पिता जी शहर में रहते थे अपने परिवार के साथ। हमारे बड़े पिता जी का व्यवहार हमारे साथ बिल्कुल अच्छा नहीं था। मम्मी ने जून 2010 में तंग आकर दूसरी शादी कर ली (2 साल बाद)। मुझे मेरे नाना जी ने बड़ा किया, दादा जी को बड़े पापा ने शहर में अपने पास रखा। उनकी मृत्यु 21/02/15 को हो गई। बड़े पापा ने अपनी चालाकी से दादा जी से 09/2010 में रजिस्टर्ड वसीयत लिखवा ली जिसमें पैतृक 50 बीघा कृषि भूमि, गाँव का घर, शहर का घर, प्लाट सब अपने नाम करवा लिया। मेरे नाम सिर्फ 5 बीघा जमीन कर दी। मैं अपना हक लेने के लिए क्या कर सकती हूँ? बड़े पापा की पहचान बड़े-बड़े लोगों तक हैं पैसा है रुतबा है। कृपया उपाय बताये।

समाधान

क्त संपत्ति में जो भी संपत्ति स्वयं दादाजी द्वारा स्वअर्जित है उसे वे वसीयत कर सकते थे। इस कारण स्वअर्जित संपत्ति के मामले में तो वसीयत ही मानी जाएगी। किन्तु जो संपत्ति आप के दादाजी के पास पुश्तैनी थी तथा उस पुश्तैनी संपत्ति की आय से कोई संपत्ति बनाई गयी थी तो वह भी पुश्तैनी मानी जाएगी। इस पुश्तैनी संपत्ति में आप का भी अधिकार है।

प के दादा जी उस पुश्तैनी संपत्ति में से केवल उन का जो हिस्सा था उसे वसीयत कर सकते थे। लेकिन अन्य लोगों के हिस्सों को वसीयत नहीं कर सकते थे। इस तरह उक्त संपत्ति जो हिस्सा आप के पिता का और आप का था उस पर आप का अधिकार है। आप अपने हिस्से की संपत्ति के बंटवारे का वाद कर सकती हैं। इस दीवानी वाद में दादा जी के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना होगा। इस वाद में यदि आप के बड़े पापा वसीयत का हवाला देते हैं तो उन्हें वह वसीयत साबित करनी होगी और आप को उस वसीयत को फर्जी या गैर कानूनी साबित करना होगा। आप स्थानीय वकील से राय कर के कार्यवाही करें।

एक बार जो संपत्ति पुश्तैनी हो गई वह जब तक हस्तान्तरित नहीं होगी पुश्तैनी ही रहेगी।

समस्या-

दीपक ने झलनिया, फतेहाबाrp_कानूनी-सलाह.jpgद, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं ने आपका पिछला लेख पढा जिसको लेकर मेरे मन मे कुछ प्रश्न हैं। मान लीजिए एक व्यक्ति जिसका नाम नानक है को 1950 में अपने पिता के देहांत के बाद सम्पत्ति प्राप्त हुई अर्थात् पुश्तैनी जायदाद हुई। इसके बाद1955 में उस का एक पुत्र कमल का जन्म हुआ जिस से उसकी सम्पत्ति सहदायिक हो गई। 1960 में नानक का देहान्त हो गया और सम्पति कमल को हस्तांतरित हो गई। लेकिन देहान्त के आठ महीने बाद उसका एक और पुत्र भीम का जन्म हुआ, तब क्या भीम अपने पिता की सम्पत्ति में सहदायिक होगा या नहीं? इसके अलावा मान लीजिए1980 में कमल के एक पुत्र दिनेश का जन्म हुआ और तब क्या दिनेश अपने दादा की सम्पत्ति में सहदायिक बनेगा या नहीं क्योंकि सम्पति पुश्तैनी है? और सहदायिक बनेगा तो उसे अपना हिस्सा कैसे प्राप्त होगा क्योंकि सम्पति तो कमल के नाम है और कमल अपनी जायदाद में दिनेश को कुछ नही देना चाहता? इसके अलावा ये बताए कि दिनेश के लिए अपने दादा की सम्पत्ति तो पुश्तैनी कहलाएगी लेकिन अपने पिता कमल की सम्पत्ति पुश्तैनी बनेगी या नहीं।

समाधान-

प के प्रश्न बहुत वाजिब हैं। नानक की मृत्यु के उपरान्त उस के पुत्र कमल को संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है इस कारण वह पुश्तैनी है। एक बार यह संपत्ति पुश्तैनी हो जाने पर हमेशा पुश्तैनी रहेगी। उस का चरित्र तब तक नहीं बदल सकता जब तक कि वह किसी अन्य को हस्तान्तरित नहीं हो जाती है। जैसे ही नानक के देहान्त के उपरान्त उस के पुत्र भीम का जन्म हुआ तो पुश्तैनी संपत्ति में उस का भी हिस्सा है। क्यों कि वह संपत्ति पुश्तैनी है इस तरह भीम के जन्म के साथ ही वह संपत्ति सहदायिक भी हो गयी। पिता की मृत्यु से कमल संपत्ति का स्वामी बना है लेकिन पुश्तैनी संपत्ति का वह उस की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। न ही स्वामित्व के दस्तावेज या रिकार्ड में उस का नाम चढ़ा है। भीम या तो स्वयं या फिर अपनी माता के माध्यम से अपने अधिकार को प्राप्त कर सकता है। यदि कमल देने से इन्कार करता है तो बंटवारे का वाद संस्थित कर सकता है।

दि कमल के 1980 में पुत्र होता है तो भी उस के जन्म के साथ ही कमल की पुश्तैनी संपत्ति में उस का अधिकार उत्पन्न हो जाएगा और वह संपत्ति सहदायिक हो जाएगी। इस पुश्तैनी संपत्ति की आय से अर्जित संपत्ति भी पुश्तैनी होगी। लेकिन जो भी कमल की स्वअर्जित संपत्ति होगी उस में कमल के पुत्र का कोई अधिकार नहीं होगा। वह कमल की व्यक्तिगत संपत्ति रहेगी और उसे वह वसीयत कर सकता है या दान, विक्रय आदि के दवारा हस्तान्तरित कर सकेगा। यदि वह कुछ नहीं करता है तो उस की मृत्यु पर हिन्दू उत्तराधिकार के नियम के अनुसार उस की स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार तय होगा। इस में कमल के पुत्र दिनेश को जो हिस्सा मिलेगा वह पुश्तैनी नहीं होगा। वह उस के जीवन काल तक उस की निजि संपत्ति रहेगा।

पुश्तैेनी संपत्ति की आय से खरीदी गई संपत्ति भी पुश्तैनी है।

Joint propertyसमस्या-

परी चौहान ने अंबाला, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता के पास करोड़ोँ की संपत्ति है जो उन्होंने पुश्तैनी जमीन (जो सरकार ने अधिग्रहण कर ली थी) का मुआवजा मिलने के बाद उसी पैसे से अर्जित की है। उन्होंने बाकी बची जमीन और पुश्तैनी घर भी बेच दिया। पिता के दुर्व्यव्हारी और बुरी संगत में होने के कारन होने कारण कोई भी संतान माता पिता के पास रहने को तैयार नहीं है। हम 3 भाई बहन हैं और विवाहित हैं। पिता किसी भी परिस्थिति में किसी को कुछ नहीं देना चाहते। सारी सम्पत्ति उन्ही के नाम है पर उनके द्वारा कमा के इकट्ठी नहीँ की गई। पुश्तैनी जमीन उत्तर प्रदेश मेरठ में थी जो 80 के दशक में सरकार ने अधिग्रहण की थी जिसका मुकदमा लंबा चला और पूरा मुआवजा ब्याज सहित सन्2000 के आस पास मिला। फ़िलहाल पिता ने काफ़ी संपत्ति हरियाणा अम्बाला में ली है और यही रहते हैं। दो साल पहले अपनी सभी संतानो को 1-1 प्लाट दिया परंतु अपनी बदमिज़ाज़ी क चलते सभी से प्रॉपर्टी ट्रान्सफर करा ली। प्रश्न 1- प्रॉपर्टी ट्रान्सफर क्या है और उसकी कितनी वैधता है? 2- क्या पिता के ना चाहने पर भी उनकी नाम की संपत्ति में हम भाई बहनों का कानूनी हक़ है या नहीँ?

समाधान-

पुश्तैनी संपत्ति क्या है इसे हम पिछले आलेखों में अच्छी तरह बता चुके हैं। यदि पुश्तैनी संपत्ति को बेच कर या उस से होने वाली आय से नई संपत्ति बनाई गयी है तो वह भी पुश्तैनी ही है। इस कारण आप के द्वारा बताई गई संपत्ति पुश्तैनी और सहदायिक ही प्रतीत होती है। पुश्तैनी संपत्ति में आप भाई बहनों का अधिकार है। इस कारण से उस से होने वाली आय में भी आप सब के अधिकार हैं। आप के पिता उस संपत्ति को आप की अनुमति तथा हस्ताक्षरों के बिना विक्रय नहीं कर सकते। यदि उन्हों ने कोई संपत्ति विक्रय कर दी है तो भी वह विक्रय गलत और अवैध है।

प के पिताजी ने पुरानी संपत्ति को विक्रय कर के अपने नाम से संपत्तियाँ बना ली हैं। जिस से किसी को भी लग सकता है कि यह पुश्तैनी न हो कर उन की स्वअर्जित संपत्ति है। इस स्थिति का लाभ उठा कर वे किसी को भी संपत्ति बेच सकते हैं। इस कारण आप को चाहिए कि आप तीनों अथवा तीनों में से कोई एक तुरन्त दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संपत्ति के विभाजन हेतु प्रस्तुत करें और साथ ही अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन भी इस आशय का प्रस्तुत करें कि वे आप की संपत्ति बेचें या बेचने का इकरार न करें, उसे खुर्द बुर्द न करें। आप चाहें तो संपूर्ण संपत्ति पर रिसीवर नियुक्त करने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं जिस से सारी संपत्ति रिसीवर के कब्जे में आ जाए और उस से होने वाली आय को विभाजन तक वह सुरक्षित रखे। इस संबंध में आप का किसी अच्छे स्थानीय वकील से राय कर कार्यवाही करना उचित रहेगा।

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