विधि Archive

समस्या-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 251(1)  के अंतर्गत जिस खातेदार पर रास्ते के लिये वाद दायर करते हैं उसी में से रास्ता दिया जाता है या किसी दूसरे  की खातेदारी में से रास्ता दिया जा सकता है,  यदि रास्ते में आने वाली दूरी कम हो।

– राहुल चौधरी, अजमेर

समाधान-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में कृषि भूमि में जाने के लिए रास्ते के संबंध में धारा 251 तथा धारा 251-क हैं। धारा 251 में आपका पहले से उपभोग में लिया जा रहा रास्ता किसी के द्वारा बंद कर देने या उस में बाधा पहुँचाने के संबंध में है तथा धारा 251-क किसी काश्तकार के खेत में आने जाने का रास्ता न होने पर नया रास्ता देने के संबंध में है। ये दोनों धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

धारा- 251.

रास्ते तथा अन्य निजी सुखाचार के अधिकार- (1) उस दशा में जब कोई भूमिधारी जो वस्तुतः रास्ते के अधिकार या अन्य सुखाचार या अधिकार का उपभोग कर रहा हो, अपने उक्त उपभोग में बिना उसकी सहमति के, विधि विहित प्रणाली से भिन्न तरीके से, बाधित किया जाय, तहसीलदार उक्तरूपेण बाधित भूमिधारी के प्रार्थना-पत्र पर तथा उक्त उपभोग एवं बाधा के विषय में सरसरी जाँच करने के पश्चात् बाधा को हटायेजाने की अथवा बंद किये जाने की और प्रार्थी भूमिधारी को पुनः उक्त उपभोग करने की आज्ञा, कर सकेगा चाहे उक्तरूपेण पुन: उपयोग किये जाने के विरुद्ध तहसीलदार के समक्ष अन्य कोई हक स्थापित किया जाय।

(2) इस धारा के अन्तर्गत पारित कोई आज्ञा किसी व्यक्ति को ऐसे अधिकार या सुखाचार को स्थापित करने से विवर्जित नहीं करेगी जिसके लिये वह सक्षम सिविल न्यायालय में नियमित रीति से वाद प्रस्तुत करके दावा कर सकता हो।

251-क.

अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना या नया मार्ग खोलना या विद्यमान मार्ग का विस्तार करना.-(1) जहाँ

(क) कोई अभिधारी, अपनी जोत की सिंचाई के प्रयोजन के लिए किसी अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना चाहता है; या

(ख) कोई अभिधारी या अभिधारियों का कोई समूह अपनी जोत या, यथास्थिति, उनकी जोतों तक पहुंचने के लिए अन्य खातेदार की जोत में से होकर एक नया मार्ग बनाना चाहता है या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित या चौड़ा करना चाहता है

और मामला पारस्परिक सहमति से तय नहीं होता है। तो ऐसा अभिधारी या, यथास्थिति, ऐसे अभिधारी ऐसी सुविधा के लिए संबंधित उप-खण्ड अधिकारी को आवेदन कर सकेंगे और उप-खण्ड अधिकारी, यदि संक्षिप्त जांच के पश्चात् उसका समाधान हो जाता है कि-

(i) यह आवश्यकता आत्यंतिक आवश्यकता है और यह जोत के केवल सुविधाजनक उपभोग के लिए नहीं है; और

(ii) अन्य खातेदार की जोत में से होकर, विशिष्ट रूप से नये मार्ग के मामले में, पहुंचने के वैकल्पिक साधन का अभाव सिद्ध किया गया है

तो आदेश द्वारा, आवेदक को, अभिधारी, जो उस | भूमि को धारित करता है, द्वारा सीमांकित या दर्शित लाईन के साथ-साथ भूमि की सतह से कम से कम । तीन फुट नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए या ऐसे ट्रैक | पर, जो उस अभिधारी द्वारा जो उस भूमि को धारित – करता है, दर्शाया जाये, भूमि में से होकर, और यदि ऐसा ट्रैक दर्शित नहीं किया जाये तो लघुतम या निकटतम रूट से होकर एक नया मार्ग जो तीस फुट से अधिक चौड़ा न हो, बनाने के लिए या विद्यमान मार्ग को तीस फुट से अनधिक तक विस्तारित या चौड़ा

करने के लिए, उस अभिधारी को, जो उस भूमि को धारित करता है, जिसमें से होकर पाइपलाइन बिछाने या एक नया मार्ग बनाने या विद्यमान मार्ग को चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये, ऐसे प्रतिकर के संदाय पर जो विहित रीति से उप-खण्ड अधिकारी द्वारा अवधारित किया जाये, अनुज्ञात कर सकेगा।

(2) जहाँ उप-धारा (1) के अधीन नया मार्ग बनाने या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित करने या चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये वहाँ ऐसे मार्ग | को समाविष्ट करने वाली उस भूमि के संबंध में अभिधृति निर्वापित की हुई समझी जायेगी और वह भूमि राजस्व अभिलेखों में “रास्ता’ के रूप में अभिलिखित की जायेगी।

(3) वे व्यक्ति, जिनको उप-धारा (1) में निर्दिष्ट सुविधाओं में से किसी भी सुविधा के उपभोग के लिए अनुज्ञात किया गया है, उक्त सुविधा के आधार पर उस जोत में, जिसमें से होकर ऐसी सुविधा मंजूर की जाये, कोई भी अन्य अधिकार अर्जित नहीं करेंगे।’

उक्त दोनों धाराओं के उपबंधों से आप समझ गए होंगे कि आप का मामला धारा 251 (1) का न हो कर धारा 251-क का है।

आप का सवाल यह था कि जिस पड़ौसी की भूमि में से रास्ता मांगा गया है और प्रकरण में पक्षकार बनाया गया है क्या उस के अलावा किसी अन्य जिसे प्रकरण में पक्षकार न बनाया गया हो उस की भूमि में से भी रास्ता दिया जा सकता है क्या? तो हमारा कहना है कि जिस से रास्ता मांगा ही नहीं गया उस से रास्ता नहीं दिलाया जा सकता है। जिस से रास्ता दिलाया जाए उस का प्रकरण में पक्षकार होना आवश्यक है। जिस की जमीन में से रास्ता दिया जाएगा उस का पक्ष सुना जाना आवश्यक है अन्यथा रास्ता दिए जाने का आदेश ही गैर कानूनी होगा। यदि ऐसी कार्यवाही लंबित है तो आप जिस के खेत में से आप रास्ता चाहते हैं वह यदि पक्षकार नहीं है तो उसे प्रकरण में पक्षकार बनाए जाने के लिए आप आवेदन कर सकते हैं।

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया और परिवार पर उस के प्रभाव।

September 12, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मैं पारिवारिक ओर समाजिक कारणों से धर्म परिवर्तन करना चाहता हूँ, मुझे ईसाई या सिख धर्म पसन्द है। पर मन मे कुछ सवाल हैं? धर्म परिवर्तन की कानूनी प्रक्रिया क्या है? क्या धर्म बदलने से पारिवारिक सम्पर्क कानूनी रूप से खत्म होता है, मैं अकेले ही धर्म बदलना चाहता हूँ, तो फिर पत्नी और बच्चे साथ रह सकते है या नहीं? कृपया मार्गदर्शन करें।

– अरविन्द कुमार, गांव,मिनवा टिकरिया, पोस्ट सहजनवा,जिला गोरखपुर

र्मान्तरण की कोई कानूनी प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। ईसाई धर्म की बपतिस्मा जैसी रस्मों का अन्य धर्मों में अभाव दीख पड़ता है। इस्लाम में या किसी भी धर्म में उसे छोड़ने के लिए किसी भी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक हिन्दू धर्म का प्रश्न है वह धर्मांतरण का समर्थन नहीं करता और इसमें धर्मांतरण के लिये कोई रस्म मौजूद नहीं है। यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है कि कोई व्यक्ति हिंदू कब बनता है क्योंकि हिंदू धर्म ने कभी भी दूसरे धर्मों को अपने प्रतिद्वंद्वियों के रूप में नहीं देखा। अनेक हिंदुओं की धारणा यह है कि ‘हिंदू होने के लिये व्यक्ति को हिंदू के रूप में जन्म लेना पड़ता है’ और ‘यदि कोई व्यक्ति हिंदू के रूप में जन्मा है, तो वह सदा के लिये हिंदू ही रहता है’; हालांकि, भारतीय कानून किसी भी ऐसे व्यक्ति को हिंदू के रूप में मान्यता प्रदान करता है, जो स्वयं को हिंदू घोषित करे। इस तरह जिस धर्म में प्रवेश लेना हो धर्म ग्रहण कर लेने की घोषणा कर देने से धर्मान्तरण पूर्ण हो जाता है। हिन्दू धर्म में अनेक सम्प्रदाय हैं। इन सम्प्रदायों के गुरू दीक्षा दे कर संप्रदायों में प्रवेश कराते हैं। इसी तरह आर्य समाज की संस्थाएँ इस कार्य को संपन्न करती हैं और उस का नियमित रिकार्ड भी रखती हैं। किसी मुस्लिम पुरुष या स्त्री को किसी हिन्दू सम्प्रदाय अथवा आर्य समाज की पद्धति से हिन्दू धर्म में प्रवेश कराया जा सकता है। आर्य समाज या धर्मगुरू दीक्षा या धर्मप्रवेश का प्रमाण पत्र भी जारी करते हैं। आप हिन्दू हें और धर्म परिवर्तन कर के ईसाई या सिख बनना चाहते हैं। सिख धर्म तो हिन्दू धर्म का ही एक संप्रदाय है। यदि आप सिख धर्म अपनाना चाहते हैं तो गुरुद्वारा जाइए और वहाँ जो भी ग्रंथी हैं उन से पूछ लीजिए कि सिख कैसे बना जा सकता है। वे आप को सिख धर्म की दीक्षा दे कर सिख बना देंगे। उस के उपरान्त आप गजट में प्रकाशन करवा लें। यदि ईसाई बनना चाहते हैं तो चर्च जा कर पादरी से मिलें और बपतिस्मा करवा कर ईसाई बन जाएँ। फिर राजकीय गजट में इस का प्रकाशन करवा लें।

भारत में केन्द्र सरकार के नगरीय विकास मंत्रालय ने धर्म परिवर्तन की घोषणा के गजट प्रकाशन के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की है जिस के अनुसार भारत के गजट में धर्म परिवर्तन की घोषणा का प्रकाशन कराया जा सकता है। इस के लिए एक स्थानीय प्रमुख समाचार पत्र में धर्म परिवर्तन की घोषणा का प्रकाशन तथा धर्म परिवर्तन की घोषणा का शपथ पत्र नॉन जुडिशियल स्टाम्प पेपर पर शपथ आयुक्त, नोटेरी या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित करवा कर प्रकाशन की शुल्क सहित निर्धारित फार्म में प्रेषित करते पर भारत के गजट में धर्म परिवर्तन की घोषणा का प्रकाशन कराया जा सकता है। इस से स्पष्ट है कि धर्म परिवर्तन की घोषणा का शपथ पत्र निष्पादित कर उसे शपथ आयुक्त, नोटेरी या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट से प्रमाणित करा लेने तथा स्थानीय प्रमुख समाचार पत्र में उस की घोषणा के प्रकाशन से धर्म परिवर्तन पूर्ण हो जाता है। यदि एक बार गजट में प्रकाशन हो जाए तो उस धर्म परिर्तन को दी गई चुनौती का सफल होना असंभव हो जाता है। निर्धारित प्रपत्र इस लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है।

यदि आप सिख धर्म ग्रहण करेंगे तो आप के व परिवार के कानूनी अधिकारों में कोई परिवर्तन नहीं होगा क्यों कि विवाह, संपत्ति, दत्तक ग्रहण, संरक्षण तथा उत्तराधिकार आदि मामलों में सिखों पर भी हिन्दू विधि ही प्रभावी है। ही माने जाते हैं और परिवार भी आप के साथ वैसे ही रहता रहेगा जैसे पहले रह रहा था। लेकिन आप ईसाई धर्म ग्रहण करते हैं तो इस से आप की संपत्ति का उत्तराधिकार ईसाई कानून से निर्धारित होने लगेगा। दोनों ही मामलों में बच्चे आप के साथ रह सकते हैं लेकिन आप की पत्नी को यह अधिकार मिल जाएगा कि आप के धर्म परिवर्तन कर लेने के आधार पर वह आप से तलाक ले सकती हैं।

 

समस्या-

मखदूमपुर गोमती नगर विस्तार लखनऊ से संतपाल ने पूछा है-

मेरे पिता जी पिता के नाम एक ४ बिस्वा प्लाट है।  पर उस प्लाट मे एक व्यक्ति ३५ साल से घर बनवाकर रह रहा है । अब वह अपना हक बताता है इस स्थिति मे उसे किस प्रकार घर से बेदखल किया जाये।

समाधान-

मारे पास अक्सर आप के जैसे सवाल आते है ंकि हमारी पुश्तैनी, या दादा जी की, या पिताजी की जमीन है उस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर के 15, 20, 25, 35 या अधिक वर्ष से मकान बना लिया है या उस पर खेती कर रहे हैं या फिर और कुछ कर रहे हैं।

भाई जब किसी ने आप की जमीन पर कब्जा किया और वहाँ अपना निर्माण या काम करने लगा तब क्या आप सोए हुए थे? और फिर उस के बाद अभी तक 12-13 या उस से अधिक सालों से क्या आप और आप के तमाम परिवार वाले सोए रहे? आपने सुना होगा कि सोते रहने वाले सब कुछ खो देते हैं।

आप बताइए कि आप की सम्पत्ति पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है लेकिन संपत्ति अभी तक आप के स्वामित्व की है तो आप को चाहिए क्या? आप उस का कब्जा ही तो वापस लेना चाहते हैं? यदि आप कब्जा वापस लेना चाहते हैं तो आप को अचल संपत्ति के कब्जे के लिए वाद संस्थित करना पड़ेगा। वैसी स्थिति में कब्जा आप के हाथ से निकल जाने की तिथि से केवल 12 वर्ष की अवधि में आप ऐसा कर सकते हैं।  इस से अधिक अवधि हो जाने पर आप का अचल संपत्ति के कब्जे का वाद इसलिये खारिज हो जाएगा कि आप ने दावा करने की निर्धारित अवधि में यह दावा पेश नहीं किया।

आप सभी इसे ठीक से पढ़ लें, और हमें ऐसे सवाल न भेजें जिन में आप अपनी अचल संपत्ति पर 12 वर्ष से पहले हो चुके कब्जे को वापस लेना चाहते हों। हम आज के बाद से इस तरह के सवालों का कोई उत्तर नहीं देंगे।

Women rights

समस्या-

रघुनदंन सोलंकी ने विजयनगर, सवाईमाधोपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारी पुस्तैनी जमीन है।  मेरे पिताजी के हम तीन पुत्र हैं, कोई पुत्री नहीं है। मेरे पिताजी का देहान्त हो चुका है, तथा हमारी माताजी जीवित हैं।  हमारे दोनो बड़े भाईयो की शादी हो चुकी है।  परन्तु शादी के 1 साल बाद हमारे मंझले भाई की निसंतान अवस्था मे मृत्यु हो गई। उसके 1 माह बाद हमारी भाभी मायके चली गई,  6 माह बाद उनके घरवालो ने बिना हमें बताये उनका नाता किसी के साथ कर दिया (नाता प्रथानुसार)।  मेरी भाभी और उनके दूसरे पति ने हम बताये बिना धोखे से हमारी पुस्तैनी जमीन पर नामांतरण खुलवाकर 1/4 में से 1 हिस्सा स्वंय के नाम कर लिया।  नामांतरण 2015 में खुलवाया गया जबकि उनका नाता 2013 में हुआ, जिसके सबूत के रुप मे हमारे पास 2014 में बनाये गये आधार, पहचान पत्र, राशन कार्ड की प्रति है जिनमे पति के रुप में उनके दूसरे पति का नाम है।  उसे दूसरे पति से एक पुत्र भी है।  तो क्या इस स्थिति में भी वह हमारी पुस्तेनी जमीन मे हिस्सेदार है?  क्योंकि हमे डर है कि कहीं वो जमीन बेच न दे? कृपया मदद करें।

समाधान-

प की निस्संतान विधवा भाभी ने नाता विवाह कर लिया है और उस के बाद उस ने आप की पुश्तैनी जमीन का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में करवा लिया है। जिस के अनुसार एक चौथाई संपत्ति उस के नाम दर्ज हो गयी है। इन तथ्यों के साथ मूलतः आप की समस्या यह है कि कही विधवा भाभी उस के नाम नामान्तरित एक चौथाई संपत्ति को  विक्रय न कर दे? क्या उसे नाता करने के बाद भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने और नामान्तरण कराने का अधिकार था?

सब से पहले तो आप को यह समझना चाहिए कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है?  पुश्तैनी संपत्ति जिन संपत्तियों के सम्बंध में कहा जाता है उन्हें हमें सहदायिक संपत्ति कहना चाहिए। ऐसी संपत्ति जो कि किसी हिन्दू पुरुष को उस के पिता, दादा या परदादा  से उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। ऐसी संपत्ति में उत्तराधिकारी के पुत्र का हिस्सा जन्म से ही निश्चित हो जाता था। लेकिन 17 जून 1956 से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो गया। इस तरह किसी भी स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होने लगा। जिस में पुत्रों के साथ साथ पुत्रियोँ, पत्नी और माँ को बराबर का हिस्सा दिया गया था।  इस का अर्थ यह हुआ कि उक्त तिथि 17.06.1956 के बाद से कोई भी संपत्ति सहदायिक संपत्ति बनना बन्द हो गयी। इस कारण यदि कोई संपत्ति दिनांक 17 जून 1956 के पहले किसी हिन्दू पुरुष को उसके पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो वह सहदायिक होगी। लेकिन इस तिथि के बाद कोई भी स्वअर्जित संपत्ति सहदायिक नहीं हो सकती थी।तो पहले आप जाँच लें कि जिसे आप अपनी पुश्तैनी संपत्ति बता रहे है वह वास्तव में सहदायिक संपत्ति भी है या नहीं है।

आप का मामला 2005 के बाद का है। इस कारण आप की इस संपत्ति पर 2005 के संशोधन के बाद का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा। उस की धारा 6(3) में यह उपबंध है कि किसी सहदायिक संपत्ति मेंं हि्स्सेदार हिन्दू (पुरुष और स्त्री दोनों) की मृत्यु हो जाती है तो यह माना जाएगा कि सहदायिक संपत्ति में उस का जो हिस्सा था वह संपूर्ण सहदायिक संपत्ति का विभाजन हो कर उसे मिल चुका था और उस का उस हिस्से का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दू उतराधिकार अधिनियम के उपबंधों के अनुसार निश्चित किया जाएगा।

उक्त नियम के अनुसार जिस दिन आप के पिता जी की मृत्यु हुई उस दिन उन का हिस्सा तीन भाइयों और माँ को बराबर के चार हिस्सों में मिल गया अर्थात संपत्ति में सभी का 1/4 हिस्सा हो गया। अब एक विवाहित निस्संतान भाई की मृत्यु हो गयी तो उस का हिस्सा उस की पत्नी के हिस्से में उसी दिन चला गया जिस दिन आप के भाई की मृत्यु हो गयी थी। उस भाभी ने बाद में नाता कर लिया। उस ने नाता किया। विधवा होने के बाद तो वह  वैधानिक विवाह भी कर सकती थी। इस नाते को भी वैधानिक विवाह ही माना जाएगा। लेकिन नाता होने से या विवाह कर लेने से  किसी विधवा को उस के पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति वापस अन्य उत्तराधिकारियों में जाने की कोई विधि या कानून नहीं है। पति से उत्तराधिकार प्राप्त कर लेने से विधवा के विवाह में भी किसी तरह की रोक नहीं है।

इस तरह आप की विधवा भाभी ने नाता करने के उपरान्त भी जो नामान्तरण खुलवाया है वह विधिपूर्वक है। वह आज भी उस 1/4 हिस्से की स्वामिनी है। वह जमीन का बंटवारा करवा कर अपने हिस्से को अलग करवा कर अपना खाता अलग खुलवा सकती है अपने हिस्से पर अलग से कब्जा प्राप्त कर सकती है और उसे विक्रय या किसी भी प्रकार से हस्तान्तरित कर सकती है। वह बिना बंटवारा कराए भी अपने हिस्से की भूमि का विक्रय कर सकती है।

 

दत्तक ग्रहण कैसे होगा?

March 19, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

किशन बास वाला ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं एक हिंदू परिवार से हूं और मेरे दो बच्चे हैं मेरी छोटी वाली बच्ची जिसका जन्म अभी हुआ है, उसको मेरे माता पिता गोद ले रहे हैं।  क्या मैं बच्ची को गोद दे सकता हूँ और यदि गोद देता हूं तो उसकी प्रक्रिया क्या होगी? अभी बच्ची का जन्म सर्टिफिकेट नहीं बना है तो जन्म सर्टिफिकेट बच्ची का किस नाम से बनेगा मेरे नाम से या मेरे माता पिता के नाम से बनेगा? बच्ची का जन्म हॉस्पिटल में हुआ है?

समाधान-

बेटी का जन्म अस्पताल में हुआ है, वहाँ आप की पत्नी और आप का नाम दर्ज है। वे प्रमाण पत्र में भी वही नाम लिखेंगे जिस के आधार पर जन्म मृत्यु पंजीयक के यहाँ से जन्म-प्रमाण पत्र जारी होगा। वैसे भी जन्म के समय तो दत्तक नहीं हुआ था इस कारण जन्म प्रमाण पत्र में तो जन्मदाता माता पिता का नाम ही अंकित किया जाएगा। यदि कोई जुगाड़ कर के आपके माता पिता का नाम दर्ज करा दें तो यह गलत होगा और दर्ज कराने वाला परेशानी में पड़ सकता है कि उस ने गलत तथ्य बता कर जन्म प्रमाण पत्र बनवाया है। ऐसे अनेक अपराधिक मुकदमे राजस्थान में चल भी रहे हैं।

आप अपनी पत्नी की सहमति से बेटी को अपने माता पिता को गोद दे सकते हैं। इस के लिए आप व आप की पत्नी तथा आप के माता-पिता द्वारा दत्तक ग्रहण विलेख निष्पादित कर आपके क्षेत्र के उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराना होगा।

गोदनामा और वसीयत दोनों ही प्रभावी रहेंगे।

March 4, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अंकित ने ग्राम सेथवाल, रानी की सराय, जिला आजमगढ़ (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी नानी ने अपनी दो बेटियों को वसीयत करने के बाद मुझे पंजीकृत विलेख से दत्तक ग्रहण किया है। उनकी छोटी पुत्री मेरी जन्मदात्री माता है।  मैं जानना चाहता हूँ कि सम्पत्ति के लिए गोदनामा प्रभावी है या वसीयत?

समाधान-

गोदनामा और वसीयत दोनों विलेख अपने अपने तरीके से प्रभावी होंगे। वसीयत तो वसीयत करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त प्रभावी होती है। वसीयत को मृत्यु के पहले तक कभी भी बदला जा सकता है। एक ही विषय में अनेक वसीयतें होने पर एक व्यक्ति की अन्तिम वसीयत सभी को सुपरसीड करेगी।

गोदनामा से आप अपनी नानी के गोद पुत्र हो गए हैं। यदि परिवार में पहले से कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति हो तो जो संपत्ति नाना की मृत्यु के बाद नानी को मिली है उस में आप के गोद लेने से नानी के साथ साथ आप का हिस्सा भी तय हो चुका है। अब यदि आप की नानी की मौजूदा वसीयत बनी रहती है तो नानी के हिस्से की जो भी संपत्ति होगी वह वसीयत में आप की माँ व मौसियों को मिलेगी। इस संबंध में आप को सभी दस्तावेज बता कर किसी स्थानीय दीवानी विधि के जानकार वकील से परामर्श करना चाहिए।

बँटवारा और पृथक कब्जा ही समस्या का हल है।

December 25, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रामकुमार महतो ने ग्राम बाहेरी, जिला दरभंगा, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के पिताजी तीन भाई थे, उन तीनों के नाम से एक जमीन है। जिसके पहले कॉलम मे बहिस्सा बराबर लिखा हुआ है, और कैफियत खाना में तीनों के नाम से अलग-अलग खेसरा नं देकर उनके आगे कब्जा दिखाया गया है। जिसके अनुसार सभी अपने हिस्से के जमीन पर बिना किसी विवाद के लगभग 80 वर्षों से रहते चले आ रहे हैं। उस हिस्से में किसी के पास कम जमीन है तो किसी के पास अधिक जमीन है। आगे चलकर कुछ लोगों ने अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच भी दिया है जिस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों के कहने पर मेरे विपक्षी ने 2012 से मेरे साथ सम्पत्ति को बराबर हिस्से में बटवारा को लेकर विवाद करने लगे। अब उनके साथ ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच का समर्थन भी है। वे लोग जबरदस्ती मेरे हिस्से की जमीन पर (जिस पर मकान बनाकर हम लोग लगभग 50 वर्ष पूर्व से बिना किसी विवाद के रहते चले आ रहे हैं ) कब्जे की कोशिश करते हैं। जिससे जान माल के नुकसान का भय हमेशा बना रहता है। कृप्या सही सलाह दें?

समाधान-

प की उक्त वर्णित संपत्ति पुश्तैनी है और वह अभी भी आप के परदादा और उन के भाइयों के नाम दर्ज है। जब भी जमीन के किसी खातेदारी की मृत्यु हो जाती है तो उस के उत्तराधिकारियों का यह दायित्व होता है कि वे मृतक का नाम खारिज करवा कर उस के उत्तराधिकारियों के नाम और उन के हिस्से रिकार्ड में दर्ज कराएँ। यदि उत्तराधिकारी उन के नाम और हिस्से दर्ज करवा भी दें तो केवल यह दर्ज होता है कि कुल जमीन में उन का हिस्सा कितना है। उन का पृथक हिस्सा कौन सा है यह दर्ज नहीं होता। उस के लिए किसी भी जमीन के सभी मौजूदा हिस्सेदारों को आवेदन दे कर अपने अपने खाते अलग कराने चाहिए और हिस्से भी अलग अलग करा लेने चाहिए जिस से भविष्य में समस्या न हो।

आपने जो रिकार्ड भेजा है उस में पूरी संपत्ति किस की है यह दर्ज है उन के हिस्से भी दर्जै हैं साथ ही यह भी दर्ज है कि जमीन के कौन से हिस्से पर किस का कब्जा है। जब किसी कब्जे दार ने अपने हिस्से की जमीन का कोई हिस्सा विक्रय किया तो उस ने अपने कब्जे की जमीन में से उतना हिस्सा खऱीददार के कब्जे में दे दिया। जब कि विक्रय या तो खाते में दर्ज ही नहीं हुआ और दर्ज हुआ होगा तब भी वह आप के साथ संयुक्त खातेदार रहेगा जब तक कि सभी खातेदारों / हिस्सेदारों का विभाजन हो कर उन के पृथक पृथक हिस्से दर्ज हो कर उन्हें उन के हिस्सों पर कब्जा न दे दिया जाए।  इस तरह समस्या तो बनी हुई है और इस का समाधान भी आसान नहीं है। इस समस्या का हल या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर अदालत में विवाद के निर्णय और निष्पादन से। अदालत में विभाजन होना और उस का निष्पादन होना बहुत लंबी प्रक्रिया है। लेकिन वही सही हल है।

आप के कब्जे में जो जमीन और मकान है वह स्पष्ट रूप से रिकार्ड में दर्ज है। इस कारण कोई भी आप को अपने कब्जे से बिना किसी अदालत के निर्णय और निष्पादन के बेदखल नहीं कर सकता। यदि किसी को बंटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवाना है तो वह अदालत में विभाजन का दावा करे। जो लोग आप को बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं उन से आप कह सकते हैं कि वे पहले अदालत से फैसला करवाएँ। फिर भी आप यदि परेशानी से बचना चाहते हैं तो किसी वकील से मिल कर राजस्व रिकार्ड में दर्ज आप के कब्जे की जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए दावा करा सकते हैं। एक बार निषेधाज्ञा प्राप्त हो जाने पर बेदखली के विरुद्ध आप को सुरक्षा मिल जाएगी।

समस्या-

अश्विनि कुमार ने एमक्यू119, दीपिका कालोनी, पोस्ट- गेवरा प्रोजेक्ट, जिला कोरबा (छत्तीसगढ़) से समस्या भेजी है कि-

मै एवं मेरी पत्नी भी कोरबा के ही हैं। मेरी पत्नी के द्वारा मेरे ऊपर धारा 498क (जून 2012), धारा 125 (अगस्त 2012), घरेलू हिंसा (अक्तूबर 2013)2013 मे केस किए हैं। धारा 125 में अन्तरिम भरण पोषण के लिए फरवरी 2014 से 5000.00 रुपये प्रति माह मेरे द्वारा दिया जा रहा है। सभी केस अभी अंतिम दौर मे चल रहा है। मेरी पत्नी जून 2017 से केन्द्रीय विद्यालय मे शिक्षिका के पद पर नियुक्त होकर 27500.00 रुपए वेतन प्राप्त कर रही है। मुझे जानकारी होने पर मेरे द्वारा केन्द्रीय विद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर तीसरे पक्ष की जानकारी देने से मना किया गया। अपील में गया तो अपील अधिकारी के द्वारा मेरी पत्नी को पूछे जाने पर मेरी पत्नी ने जानकारी देने से मना कर दिये जाने की जानकारी देते हुये मुझे जानकारी नहीं दी गयी। सूचना के अधिकार के तहत दी गयी जानकारी आपकी ओर प्रेषित कर रहा हूँ। मुझे मेरी पत्नी से संबन्धित जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है?

समाधान-

प यह जानकारी इस कारण से प्राप्त करना चाहते हैं जिस से आप न्यायालय के समक्ष इन दस्तावेजों के प्रस्तुत कर यह साबित कर सकें कि आप की पत्नी को भरण पोषण के लिए किसी राशि की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन किसी भी न्यायिक कार्यवाही में यदि कोई तथ्य साबित करना है तो उस में उस के लिए इस तरह के प्रावधान हैं कि न्यायालय स्वयं उस पक्ष को वे तथ्य प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है या फिर किसी दस्तावेज को जो न्यायालय में लंबित मुकदमे का निर्णय करने के लिए आवश्यक हो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। इस सम्बन्ध में दीवानी और अपराधिक प्रक्रिया संहिताओं में उपबंध हैं।

दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 में दस्तावेज प्रस्तुत कराने तथा विपक्षी को परिप्रश्नावली दे कर उन के उत्तर प्रस्तुत करने के उपबंध हैं इसी प्रकार धारा 91 दंड प्रक्रिया संहिता में दस्तावेज प्रस्तुत कराने संबंधित उपबंध हैं। आप अपने वकील से संपर्क कर के उन्हें इन उपबंधों में से उपयोगी उपबंध में आवेदन प्रस्तुत कर उक्त दस्तावेज संबंधित स्कूल प्रशासन को प्रस्तुत करने का आदेश न्यायालय से कराएँ। जरूरत होने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

समस्या-

लक्ष्मी नारायण ने मोहल्ला शीतलगंज, पूर्वा, जिला उन्नाव से भेजी है कि-

मेरे पिता 3 भाई थे, सबसे बडे भाई की 3 बेटियाँ, दूसरे नं. पर मेरे पिता थे और सबसे छोटे भाई ने शादी नहीं की थी। सबसे पहले मेरे पिता का देहांत हो गया और प्रोपर्टी का 1/3 हिस्सा मेरे नाम दर्ज हो गया। इसके बाद सबसे छोटे भाई का देहांत हुआ जो कि अविवाहित थे और इनकी 1/3 हिस्से की प्रौपट्री सबसे बडे भाई के नाम सन् 1985 में दर्ज हो गयी। अंत में सबसे बडे भाई का देहांत हुआ और सन् 1992 में प्रौपट्री का (1/3+1/3=2/3) हिस्सा उनकी बेटियों के नाम दर्ज हो गया जो कि सारी विवाहित हो चुकी थीं। क्या 1992 में बेटियों को प्रोपर्टी में हिस्सा मिलता था? और मुझे मेरे पिता के सबसे छोटे भाई की प्रोपर्टी में 1/2 हिस्सा नहीं मिलेगा क्या?

समाधान-

दि आप के द्वारा कथित संपत्ति में कोई कृषि भूमि सम्मिलित नहीं है तो अब तक जो भी हुआ है वह सही हुआ है।

आप के पिता की मृत्यु पर उन के हिस्से की सम्पत्ति आप के हिस्से में आ गयी। जब आप के छोटे चाचा का देहान्त हुआ तो आप के पिता जीवित नहीं थे इस कारण उन के बड़े भाई को उन की संपत्ति प्राप्त हुई। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की अनुसूची में भाई को ही उत्तराधिकार का अधिकार है मृत भाई की संतान को नहीं। चूंकि उन की संपत्ति बड़े भाई को मिल गयी तो बड़े भाई की मृत्यु पर उन की तीन बेटियों को उन की संपत्ति मिली जो सही मिली है।

उत्तर प्रदेश में खेती की संपत्ति के सिवा सभी प्रकार की संपत्ति पर बेटियों को चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित हो पिता का उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार है, बाकी सभी राज्यों में खेती की संपत्ति पर भी सभी बेटियों को उत्तराधिकार प्राप्त है।

 

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