विधि Archive

समस्या-

स्वाति साहू ने राजा तालाब, गाँधी चौक, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे दादा जी ने अपने स्वयं के पैसे से लिये हुए मकान में मेरी बेवा माता जी और हम पांच बहनों को अपने साथ रखा है, पिछले 30 साल से। दादा जी का निधन होने पर मेरे बड़े पापा और चाचा हम लोगों को घर खाली करने के लिए धमकी दे रहे हैं। दादा जी ने मम्मी के नाम पर वसीयत किये हैं। पर वो रजिस्टर्ड नहीं हुआ है, नोटरी से अटेस्टेड कराया है। जो कि तहसील में मान्य नही है। हमे क्या करना चाहिए जिससे हमें कोई घर से निकाल न पाए?

समाधान-

दादाजी की वसीयत के अनुसार मकान आप की मम्मी का है और आप को वहाँ से निकाला जाना गैर कानूनी होगा। इस कारण से आप सभी वहाँ से निकलने से साफ मना कर दें। बड़े पापा और चाचा वगैरा से कह दें कि वे यदि यह समझते हैं कि वे मकान खाली कराने के अधिकारी हैं तो अदालत में दावा करें, यदि अदालत से फैसला हो जाता है कि मकान हमें खाली करना होगा तो कर देंगे। पर किसी के कहने से न करेंगे।

किसी भी वसीयत का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है, यहाँ तक कि किसी स्टाम्प पेपर तक पर होना जरूरी नहीं है। वसीयत एक खाली कागज पर भी लिखी जा सकती है। आप को किस ने कह दिया कि यह तहसील में मान्य नहीं है? वसीयत पर वसीयत करने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए और दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए जिन की उपस्थिति में वह वसीयत की गयी हो. नोटेरी से अटेस्टेशन हुआ है इस से नोटेरी एक और गवाह हो गया है तथा नोटेरी का रजिस्टर वसीयत के सही होने का एक ठोस सबूत है। इस वसीयत को आप लोग जब भी कोई मुकदमा चलेगा तब अदालत में गवाहों के बयान से प्रमाणित करा सकते हैं।

आप के चाचा ताऊ को उन के पिता की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने का आधिकार है। लेकिन आप की माँ के नाम मकान की वसीयत है तो उसे प्राप्त करने का चाचा ताऊ का अधिकार समाप्त हो चुका है।  यदि आप को लगता हो कि आप के चाचा, ताऊ जबरन आप को मकान से बेदखल कर सकते हैं तो आप अदालत में दावा कर के गैर कानूनी तरीके से मकान से बेदखल करने पर रोक लगाने के लिए स्थायी और अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

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समस्या-

प्रतापचंद्र ने ग्राम करवनियां, ब्लाक नगवां, जिला सोनभद्र (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी बहन कंचन का केस अप्रैल 2016 से ही रावर्ट्सगंज जिला न्यायालय में चल रहा है। 2013 में बस्ती जिले के करमांव निवासी किसोर चंद्र मणी से उसकी शादी हिंदू रिवाज से हुई थी, जिसके बाद तीन बार वह क्रमशः 1 सप्ताह, 1 माह, 3 माह के लिए, ससुराल गयी है। उसे बार बार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उस पर जानलेवा हमला किया गया, उसके पति का उसकी भाभी से संबंध है, इसका विरोध करने पर परिवार वालों ने इसे भी देवर से संबंध रखने की सलाह दे डाली। तीन साल तक सुलह-समझौता करवा कर दोनो पक्षों द्वारा मामले को हल करने की भरसक कोशिश की गई, पर हल न निकला। दहेज की मांग व शारिरिक प्रताड़ना और भी बढ़ती गई।  जब उसे जान से मार देने की कोशिश की गई तब से वह अपने मायके में ही है, और वह उससे तलाक लेना चाहती है। पहले मिल कर बातचीत से तलाक़ का मामला हल न होने पर, साल 2016 अप्रैल में हम लोग की तरफ से दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा तथा गुजाराभत्ता लड़के पक्ष वालों पर मुकदमा कर दिया गया। लड़के वाले पहले की ही तरह अब भी धोखाधड़ी वाली बात करते हैं कि अब सब ठीक हो जायेगा विदाई कर दो। पर लड़की का स्टैंड क्लीयर है- कि मुझे तलाक़ चाहिए। दो-ढाई सालों में कोर्ट में वे लोग पेशी पर अबतक तीन या चार बार ही आये हैं, किंतु उनका कुछ नहीं हुआ। अक्टूबर 23, 2018 को मेंटेनेंस (125) का फैसला आया पर कोर्ट द्वारा तय रू. 2500 गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है, बाकी दो केसों का क्या हुआ वकील कुछ नहीं बताता। मुझे जानकारी नहीं है। मै बाहर ही रहता हूँ गाजियाबाद. कृपया बतायें की अब कोर्ट क्या करेगी? या हमें क्या करना होगा। ताकि जल्दी से मामले का निपटारा हो?

समाधान-

2013 में शादी हुई, बहिन तीन बार में कुल मिला कर चार माह एक सप्ताह ससुराल में रह रही है। उसी में इतने झगड़े हैं। आप ने जब सुलह समझौते की बात शुरू की तभी आप को ये सारे मुकदमें और तलाक का मुकदमा कर देना चाहिए था। सुलह समझौते की बातचीत तो मुकदमों के लंबित रहते भी चल सकती थी।

दो-ढाई साल पहले 2016 आप की बहिन की और से तीन मुकदमे किए गए हैं।  अब आप को जल्दी पड़ी है। तीनों मुकदमों में सामने वाले पक्ष को जवाब देने का मौका होगा, आप की साक्ष्य होगी, उस की साक्ष्य होगी फिर बहस और फिर फैसला होगा। समय तो लगेगा। यह अमरीका नहीं है जहाँ दस लाख की आबादी पर 140 अदालतें हों, यहाँ इतनी आबादी पर 12-13 अदालतें हैं। लोग ज्यादा अदालतों के लिए तो लड़ेंगे नहीं, वोट देंगे तब हिन्दू मुसलमान हो जाएँगे। तो ऐसे ही भुगतना होगा।

आप की बहिन को तलाक चाहिए और अभी तक तलाक का मुकदमा तक नहीं किया है। तलाक कैंसे मिलेगा? जिस दिन आप को यह पता लगा कि पति के उस की भाभी के साथ संबंध है और बहिन को भी देवर के साथ संबंध रखने की सलाह दी गयी है तभी आप को तुरन्त तलाक का मुकदमा करवाना चाहिए था। अब भी बहिन के लिए तलाक चाहते हैं तो उस के लिए मुकदमा तुरन्त करें। आप ने 2013 से 5 साल बहिन के जीवन के बरबाद हो चुके हैं। थोड़ा धैर्य रखिए नतीजे भी आएँगे। न्याय ऐसी चीज नहीं है जो जाए और बाजार से खरीद लाए, बस काम खत्म। समय तो लगेगा।

आप खुद अपनी बहिन के वकील से दैनन्दिन संपर्क में नहीं हैं। एक बार जाइए, उस से मिलिए और विस्तार से बात कीजिए। उसे कहिए कि आप उस से फोन पर पूछताछ करते रहेंगे। तो वकील सब कुछ बताएगा। यदि एक दो मुलाकातों के बाद लगे कि वकील ठीक से काम नहीं कर पा रहा है तो किसी अच्छे वकील को कर लें। हालांकि वकील बदलने से मुकदमे में लगने वाला समय कम होगा ऐसा लगता नहीं है।

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माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

November 3, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

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समस्या-

सोनू कुमार ने सलेमपुर, जिला देवरिया, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मारी एक सौतेली बहन है, पिताजी के मर जाने के बाद वो प्रॉपर्टी में हिस्सा मांग रही है। जबकि माँ अभी जिन्दा है।  वो धमका रही है।  क्या वो प्रॉपर्टी में हिस्सेदार है या नहीं? कृपया बताएँ?

समाधान-

प के पिता की मृत्यु के साथ ही आप के पिता की संपत्ति के लिए उत्तराधिकार खुल चुका है। उन की जो भी संपत्ति है उस में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत सभी उत्तराधिकारियों के अधिकार निश्चित हो चुके हैं।

आप के पिता की मृत्यु के बाद उन की जीवित पत्नी अर्थात आप की माता जी तथा सभी संतानों का बराबर का हक उन की संपत्ति में उत्पन्न हो गया है और कोई भी उत्तराधिकारी आप के पिता द्वारा छोड़ी गयी संपत्ति के बंटवारे की मांग कर सकता है।

आप की सौतेली बहिन का भी अपने पिता की संपत्ति में अधिकार उत्पन्न हो चुका है। वह आप से उस के अधिकार की मांग कर रही है तो आप आपसी सहमति से बंटवारा कर के उसे उस का हिस्सा दे सकते हैं। या उस के हिस्से के बराबर धन उसे दे कर उस का हिस्सा शेष सभी या किसी एक उत्तराधिकारी के पक्ष में रिलीज करवा कर इस विवाद का निपटारा कर सकते हैं। अन्यथा स्थिति में आप की सौतेली बहिन बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

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समस्या

भारत सिंह, गाँव मानपुरा गुजराती, तहसील नरसिंहगढ़, जिला राजगढ़,  मध्यप्रदेश ने पूछा है-

मारे दादा जी के नाम की खेती की ज़मीन थी जो उन्हे उत्तराधिकार मे उनके पिता से प्राप्त हुई थी 1960 के दशक में जो दूसरे गाँवं में थी। कुछ समय के बाद हमारे दादा जी ने वो ज़मीन बेच दी  और दूसरे गाँव में 3 बीघा उनके नाम से तथा 4 बीघा दादी के नाम से खरीद ली।  हमारे दादा जी के दो पुत्र थे एक मेरे पापा दूसरे मेरे चाचा। मेरे पिता जी का देहांत 1993 में हो गया।  जिसके बाद मेरे चाचा ने दादा दादी को बहला फुसला के पूरी ज़मीन उनके नाम 2011 में करवा ली, हमें और हमारे भाई को बिना बताए। जिसकी जानकारी हमें अभी लगी तो मैने वकील से पूछताछ की तो उन्होंने कहा प्रॉपर्टी उनके नाम से खरीदी हुई है वो जिसे चाहे दे सकते हैं।  वकील को दूसरे गांव का ज़रूर नहीं बताया कि वहाँ से बेचकर यहाँ खरीदी है।  आप से निवेदन है कि मुझे क्या कार्यवाही करनी चाहिए जिससे हमें भी हमारे पिता का हिस्सा मिल जाए। और क्या क्या डॉक्युमेंट इकट्ठे करने पड़ेंगे? अभी तक दादा दादी के नाम से हमें कुछ भी प्राप्त नाहीं हुआ है। दादा दादी चाचा के सपोर्ट में है। जो नामानन्तरण हुआ है उसमें ये ज़िक्र है हमारी उम्र अधिक हो जाने से हम हमारी ज़मीन हमारे एकमात्र पुत्र को दे रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या गंभीर है और विवरण अपूर्ण है। आप के दादाजी को उक्त जमीन 1960 के दशक में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। तब तक हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 प्रभावी (17.06.1956) हो गया था। इस तरह यदि यह जमीन आपके दादा जी के पिता की स्वअर्जित भूमि थी तो वह उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आपके दादाजी को उत्तराधिकार में मिली और वे उस जमीन के स्वामी हो गये। यह जमीन सहदायिक नहीं हो सकती थी यदि यह उक्त अधिनियम प्रभावी होने के पहले सहदायिक नहीं हो गयी हो। क्यों कि इस अधिनियम में सहदायिक संपत्ति के अस्तित्व में आने की स्थिति को समाप्त कर दिया गया है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति स्वअर्जित संपत्ति जैसी ही है।  इस का अर्थ है कि यदि यह जमीन आपके दादाजी को भी उन के पिता, दादा या परदादा से प्राप्त हुई होती तभी वह सहदायिक हो सकती थी। आप को इस बात का दस्तावेजी सबूत तलाशना होगा कि पूर्व में जो जमीन  आप के दादा जी ने बेची वह उन के पिता को भी उत्तराधिकार में पिता से प्राप्त हुई थी। इस के बाद आपको यह सबूत लाना होगा कि वह जमीन बेची उस से जो धन प्राप्त हुआ उसी से वर्तमान जमीन खरीदी गयी। तब आप यह स्थापित कर पाएंगे कि उक्त जमीन सहदायिक है उस में आपके पिता और आप का जन्म से अधिकार है। यदि ये दोनों तथ्य स्थापित नहीं कर सके तो वर्तमान भूमि दादाजी की स्वअर्जित भूमि है और उसे वे जिसे चाहें दे सकते हैं। आप का कोई कानूनी अधिकार उस पर नहीं है।

दूसरे आप के द्वारा दिए गए विवरण से पता लगता है कि नामान्तरण के माध्यम से जमीन चाचा की हो गयी है। लेकिन नामान्तरण का आधार क्या है? यह स्पष्ट नहीं है। यदि दान करना है तो उस के लिए दान पत्र पंजीकृत होना आवश्यक है। यदि वसीयत है तो उस के आधार पर दादा दादी के जीवित रहते नामान्तरण नहीं हो सकता।  इस कारण आपको यह भी जानकारी करनी चाहिए कि नामान्तरण का आधार क्या है? क्या उस आधार पर नामांतरण हो सकता है। नामांतरण को चुनौती दी जा सकती है, यदि वह कानून के अनुसार नहीं हो। लेकिन आप को उक्त संपत्ति में से तभी कुछ प्राप्त हो सकता है जब कि आप को उस में कोई अधिकार हो। आप के विवरण से नहीं लग रहा है कि उक्त संपत्ति में आपका कोई अधिकार है। चाचा ने दादा दादी से किसी तरह जमीन अपने नाम करवा ली है तो उसे चुनौती देने का आप को कोई अधिकार नहीं है। यदि इसी तरह आप दादा दादी से उक्त जमीन अपने नाम करवा लेते तो चाचा को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं होता।

समस्या-

मेरे पिताजी दो भाई थे, जिनके पास एक पुश्तैनी जमीन 14×70 स्क्वायर फुट की थी जिसके खसरे में मेरे दादा का  नाम दर्ज है। दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से 40 वर्ष पूर्व जमीन का बंटवारा आधा-आधा कर लिया किन्तु कोई विलेख नही लिखवाया। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के 14×35 के प्लाट पर स्वयं के खर्च से 40 वर्ष पूर्व मकान बनवा लिया था तथा जिसका किसी ने विरोध नही किया था, जिसका गृहकर 38 वर्षो से पिताजी के नाम से ही जमा होता है, पिताजी जी की मृत्यु के बाद मेरे नाम से गृहकर जमा होता है और मकान पर मेरा ही कब्जा है। मेरे चाचा जिनके हिस्से में 14×35 का प्लाट था उन्होंने अपने हिस्से के प्लाट में अभी तक कोई निर्माण नही करवाया  और उनकी मृत्यु भी हो चुकी है। अब विवाद का विषय ये है कि चाचा का पुत्र 40 वर्ष पूर्व हुए आपसी बंटवारे को नही मान रहा, उसका कहना है कि चूंकि 14×70 के पूरे प्लाट का खसरा उसके दादा के (पिता के पिता) नाम पर है और बंटवारे का कोई विलेख नही इसलिए घर का और खाली जमीन का बंटवारा करो और अपने घर मे से हमको भी हिस्सा दो। छोटे दादा के पुत्र द्वारा झूठे केस में फसाने की साजिश की जा रही और मारने की धमकी दी जा रही। क्या कानूनी तौर पर वह मेरे दादा जी का मकान हड़प सकता है? सर हमारे पास घर के 38 वर्षों का गृहकर की रसीद (जो पिताजी के नाम से है), घर का 12 वर्षों का बिजली का बिल (मेरे स्वयं के नाम से),16 वर्षो का जलकर की रसीद (पिताजी के नाम पर), पिताजी का राशन कार्ड, माताजी का राशन कार्ड और मेरे दादाजी के नाम वाला नगर पंचायत आफिस से जारी 14×35 स्क्वायर फुट के प्लाट (जिसमे पिताजी के द्वारा बनवाया मकान है) का खसरा है। क्या कानूनी तौर पर चाचा का पुत्र मेरे मकान पर कब्जा पा सकता है?

-मोनू अहमद,  नगर पंचायत रुद्रपुर, जिला-देवरिया, (उ. प्र.)

समाधान-

दि 40 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था तो उस के गवाह अवश्य होंगे। आवश्यकता पड़ने पर साक्षियों  के बयान करवा कर बंटवारे को साबित किया जा सकता है। इस संबंध में आप Karpagathachi And Ors vs Nagarathinathachi 1965 AIR 1752 के प्रकरण को देखें। आप के पास पिताजी के नाम से 38 वर्ष से गृहकर की रसीद है। घर बनाने के बाद ही तो गृहकर आरंभ हुआ है यह एक सहायक सबूत है जो कहता है कि मकान बने हुए हिस्से पर आपका इतने लंबे समय से कब्जा है। 16 वर्षों का जलकर र 12 वर्ष से बिजली के बिल भी सहायक सबूत हैं। आप अच्छे से बंटवारा और मकान का निर्माण साबित कर सकते हैं। प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) के तर्क का भी सहारा लिया जा सकता है। इस तरह कानूनी रूप से आपके मकान को हड़प करना इतना आसान नहीं है।

आप अपने चचेरे भाई को कह दीजिए कि वह दुबारा से बंटवारा चाहता है तो बंटवारे का दावा कर दे। फैसला अदालत में हो। आप यदि मुकदमे को मुस्तैदी से लड़ेंगे तो आप की संपत्ति आपके पास ही रहेगी।

समस्या-

मेरी पत्नी बबीता देवी (68 वर्ष) एक पैर से विकलांग है। मेरे बाबा अंबिका सिंह जिनको 1940 में 7 एकड़ 42 डिसमिल जमीन उनके हिस्से में प्राप्त हुआ था। मेरे पिता दो भाई थे मेरे पिता का नाम वेशर सिंह और मेरे चाचा का नाम वादों सिंह। मेरी चाचा वादों सिंह ने विवाह नहीं किया था। मेरे चाचा वादों सिंह ने 3 एकड़ 42 डिसमिल जमीन 1948 में खरीदा था मेरे चाचा वादों सिंह की मृत्यु 2004 में हुई। उनके मरणोपरांत वह जमीन अभी मेरे पास है। क्या मेरे चाचा के द्वारा जो जमीन मुझे मिला उस पर मेरे पुत्र या पुत्री का अधिकार है। जिस वक्त मेरे चाचा ने जमीन खरीदा था उस वक्त वो संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे किंतु उनके द्वारा खरीदे गए जमीन के केवाला पर सिर्फ उन्हीं का नाम है, मेरे पिताजी का नाम नहीं है। मुझे 3 पुत्र पैदा हुऐ परंतु तीनो जन्म के समय मृत पाए गए, तीनों की मृत्यु पेट में ही हो गई थी। फिर मुझे दो पुत्रियां हुई। क्या उन मृत पुत्रों का भी कोई हिस्सा हमारे संपत्ति में होता है? यदि हां तो फिर क्या वह हिस्सा मेरी पत्नी को स्थानांतरित होगा? मेरी पुत्री ने मुझ पर टाइटल पार्टीशन सूट किया है। उसका हिस्सा इस संपत्ति में कितना हो सकता है । जबकि 7 एकड़ 42 डिसमिल जो कि मेरे बाबा का हिस्सा था, उस में मेरे चाचा का जो हिस्सा होता है वह तो मेरा पर्सनल प्रॉपर्टी कहलायेगा।

उमेश सिंह vishnukr1506@gmail.com

समाधान-

आप के दादा अम्बिका सिंह को 2014 में जो जमीन उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह आप की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति है। इस संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता से तय होगा। 2005 से पुत्रियाँ भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखने लगी हैं। इस कारण आप की पुत्री आप की सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने की अधिकारी है। आप के पुत्र मृत पैदा हुए इस कारण उन का कोई अलग से हिस्सा नहीं है। वह हिस्सा आपकी पत्नी को प्राप्त नहीं होगा।  दादा की जमीन में आप के चाचा का हिस्सा भी आप को मिल गया है। लेकिन वह फिर भी आप की स्वअर्जित संपत्ति नहीं है क्यों कि वह आपको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है।  आप की पुत्री इस भूमि में अपना हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है। उस का हिस्सा कुल जमीन में 1/3 ही होगा। आप के चाचा ने जो हिस्सा खुद खरीदा है और जिस का केवाला उन के नाम है वह जमीन आप की स्वअर्जित मानी जाएगी और आप के जीतेजी उस में किसी को हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस जमीन में आप की पुत्री कोई भी हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

समस्या-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 251(1)  के अंतर्गत जिस खातेदार पर रास्ते के लिये वाद दायर करते हैं उसी में से रास्ता दिया जाता है या किसी दूसरे  की खातेदारी में से रास्ता दिया जा सकता है,  यदि रास्ते में आने वाली दूरी कम हो।

– राहुल चौधरी, अजमेर

समाधान-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में कृषि भूमि में जाने के लिए रास्ते के संबंध में धारा 251 तथा धारा 251-क हैं। धारा 251 में आपका पहले से उपभोग में लिया जा रहा रास्ता किसी के द्वारा बंद कर देने या उस में बाधा पहुँचाने के संबंध में है तथा धारा 251-क किसी काश्तकार के खेत में आने जाने का रास्ता न होने पर नया रास्ता देने के संबंध में है। ये दोनों धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

धारा- 251.

रास्ते तथा अन्य निजी सुखाचार के अधिकार- (1) उस दशा में जब कोई भूमिधारी जो वस्तुतः रास्ते के अधिकार या अन्य सुखाचार या अधिकार का उपभोग कर रहा हो, अपने उक्त उपभोग में बिना उसकी सहमति के, विधि विहित प्रणाली से भिन्न तरीके से, बाधित किया जाय, तहसीलदार उक्तरूपेण बाधित भूमिधारी के प्रार्थना-पत्र पर तथा उक्त उपभोग एवं बाधा के विषय में सरसरी जाँच करने के पश्चात् बाधा को हटायेजाने की अथवा बंद किये जाने की और प्रार्थी भूमिधारी को पुनः उक्त उपभोग करने की आज्ञा, कर सकेगा चाहे उक्तरूपेण पुन: उपयोग किये जाने के विरुद्ध तहसीलदार के समक्ष अन्य कोई हक स्थापित किया जाय।

(2) इस धारा के अन्तर्गत पारित कोई आज्ञा किसी व्यक्ति को ऐसे अधिकार या सुखाचार को स्थापित करने से विवर्जित नहीं करेगी जिसके लिये वह सक्षम सिविल न्यायालय में नियमित रीति से वाद प्रस्तुत करके दावा कर सकता हो।

251-क.

अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना या नया मार्ग खोलना या विद्यमान मार्ग का विस्तार करना.-(1) जहाँ

(क) कोई अभिधारी, अपनी जोत की सिंचाई के प्रयोजन के लिए किसी अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना चाहता है; या

(ख) कोई अभिधारी या अभिधारियों का कोई समूह अपनी जोत या, यथास्थिति, उनकी जोतों तक पहुंचने के लिए अन्य खातेदार की जोत में से होकर एक नया मार्ग बनाना चाहता है या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित या चौड़ा करना चाहता है

और मामला पारस्परिक सहमति से तय नहीं होता है। तो ऐसा अभिधारी या, यथास्थिति, ऐसे अभिधारी ऐसी सुविधा के लिए संबंधित उप-खण्ड अधिकारी को आवेदन कर सकेंगे और उप-खण्ड अधिकारी, यदि संक्षिप्त जांच के पश्चात् उसका समाधान हो जाता है कि-

(i) यह आवश्यकता आत्यंतिक आवश्यकता है और यह जोत के केवल सुविधाजनक उपभोग के लिए नहीं है; और

(ii) अन्य खातेदार की जोत में से होकर, विशिष्ट रूप से नये मार्ग के मामले में, पहुंचने के वैकल्पिक साधन का अभाव सिद्ध किया गया है

तो आदेश द्वारा, आवेदक को, अभिधारी, जो उस | भूमि को धारित करता है, द्वारा सीमांकित या दर्शित लाईन के साथ-साथ भूमि की सतह से कम से कम । तीन फुट नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए या ऐसे ट्रैक | पर, जो उस अभिधारी द्वारा जो उस भूमि को धारित – करता है, दर्शाया जाये, भूमि में से होकर, और यदि ऐसा ट्रैक दर्शित नहीं किया जाये तो लघुतम या निकटतम रूट से होकर एक नया मार्ग जो तीस फुट से अधिक चौड़ा न हो, बनाने के लिए या विद्यमान मार्ग को तीस फुट से अनधिक तक विस्तारित या चौड़ा

करने के लिए, उस अभिधारी को, जो उस भूमि को धारित करता है, जिसमें से होकर पाइपलाइन बिछाने या एक नया मार्ग बनाने या विद्यमान मार्ग को चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये, ऐसे प्रतिकर के संदाय पर जो विहित रीति से उप-खण्ड अधिकारी द्वारा अवधारित किया जाये, अनुज्ञात कर सकेगा।

(2) जहाँ उप-धारा (1) के अधीन नया मार्ग बनाने या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित करने या चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये वहाँ ऐसे मार्ग | को समाविष्ट करने वाली उस भूमि के संबंध में अभिधृति निर्वापित की हुई समझी जायेगी और वह भूमि राजस्व अभिलेखों में “रास्ता’ के रूप में अभिलिखित की जायेगी।

(3) वे व्यक्ति, जिनको उप-धारा (1) में निर्दिष्ट सुविधाओं में से किसी भी सुविधा के उपभोग के लिए अनुज्ञात किया गया है, उक्त सुविधा के आधार पर उस जोत में, जिसमें से होकर ऐसी सुविधा मंजूर की जाये, कोई भी अन्य अधिकार अर्जित नहीं करेंगे।’

उक्त दोनों धाराओं के उपबंधों से आप समझ गए होंगे कि आप का मामला धारा 251 (1) का न हो कर धारा 251-क का है।

आप का सवाल यह था कि जिस पड़ौसी की भूमि में से रास्ता मांगा गया है और प्रकरण में पक्षकार बनाया गया है क्या उस के अलावा किसी अन्य जिसे प्रकरण में पक्षकार न बनाया गया हो उस की भूमि में से भी रास्ता दिया जा सकता है क्या? तो हमारा कहना है कि जिस से रास्ता मांगा ही नहीं गया उस से रास्ता नहीं दिलाया जा सकता है। जिस से रास्ता दिलाया जाए उस का प्रकरण में पक्षकार होना आवश्यक है। जिस की जमीन में से रास्ता दिया जाएगा उस का पक्ष सुना जाना आवश्यक है अन्यथा रास्ता दिए जाने का आदेश ही गैर कानूनी होगा। यदि ऐसी कार्यवाही लंबित है तो आप जिस के खेत में से आप रास्ता चाहते हैं वह यदि पक्षकार नहीं है तो उसे प्रकरण में पक्षकार बनाए जाने के लिए आप आवेदन कर सकते हैं।

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया और परिवार पर उस के प्रभाव।

September 12, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मैं पारिवारिक ओर समाजिक कारणों से धर्म परिवर्तन करना चाहता हूँ, मुझे ईसाई या सिख धर्म पसन्द है। पर मन मे कुछ सवाल हैं? धर्म परिवर्तन की कानूनी प्रक्रिया क्या है? क्या धर्म बदलने से पारिवारिक सम्पर्क कानूनी रूप से खत्म होता है, मैं अकेले ही धर्म बदलना चाहता हूँ, तो फिर पत्नी और बच्चे साथ रह सकते है या नहीं? कृपया मार्गदर्शन करें।

– अरविन्द कुमार, गांव,मिनवा टिकरिया, पोस्ट सहजनवा,जिला गोरखपुर

र्मान्तरण की कोई कानूनी प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। ईसाई धर्म की बपतिस्मा जैसी रस्मों का अन्य धर्मों में अभाव दीख पड़ता है। इस्लाम में या किसी भी धर्म में उसे छोड़ने के लिए किसी भी प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक हिन्दू धर्म का प्रश्न है वह धर्मांतरण का समर्थन नहीं करता और इसमें धर्मांतरण के लिये कोई रस्म मौजूद नहीं है। यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है कि कोई व्यक्ति हिंदू कब बनता है क्योंकि हिंदू धर्म ने कभी भी दूसरे धर्मों को अपने प्रतिद्वंद्वियों के रूप में नहीं देखा। अनेक हिंदुओं की धारणा यह है कि ‘हिंदू होने के लिये व्यक्ति को हिंदू के रूप में जन्म लेना पड़ता है’ और ‘यदि कोई व्यक्ति हिंदू के रूप में जन्मा है, तो वह सदा के लिये हिंदू ही रहता है’; हालांकि, भारतीय कानून किसी भी ऐसे व्यक्ति को हिंदू के रूप में मान्यता प्रदान करता है, जो स्वयं को हिंदू घोषित करे। इस तरह जिस धर्म में प्रवेश लेना हो धर्म ग्रहण कर लेने की घोषणा कर देने से धर्मान्तरण पूर्ण हो जाता है। हिन्दू धर्म में अनेक सम्प्रदाय हैं। इन सम्प्रदायों के गुरू दीक्षा दे कर संप्रदायों में प्रवेश कराते हैं। इसी तरह आर्य समाज की संस्थाएँ इस कार्य को संपन्न करती हैं और उस का नियमित रिकार्ड भी रखती हैं। किसी मुस्लिम पुरुष या स्त्री को किसी हिन्दू सम्प्रदाय अथवा आर्य समाज की पद्धति से हिन्दू धर्म में प्रवेश कराया जा सकता है। आर्य समाज या धर्मगुरू दीक्षा या धर्मप्रवेश का प्रमाण पत्र भी जारी करते हैं। आप हिन्दू हें और धर्म परिवर्तन कर के ईसाई या सिख बनना चाहते हैं। सिख धर्म तो हिन्दू धर्म का ही एक संप्रदाय है। यदि आप सिख धर्म अपनाना चाहते हैं तो गुरुद्वारा जाइए और वहाँ जो भी ग्रंथी हैं उन से पूछ लीजिए कि सिख कैसे बना जा सकता है। वे आप को सिख धर्म की दीक्षा दे कर सिख बना देंगे। उस के उपरान्त आप गजट में प्रकाशन करवा लें। यदि ईसाई बनना चाहते हैं तो चर्च जा कर पादरी से मिलें और बपतिस्मा करवा कर ईसाई बन जाएँ। फिर राजकीय गजट में इस का प्रकाशन करवा लें।

भारत में केन्द्र सरकार के नगरीय विकास मंत्रालय ने धर्म परिवर्तन की घोषणा के गजट प्रकाशन के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की है जिस के अनुसार भारत के गजट में धर्म परिवर्तन की घोषणा का प्रकाशन कराया जा सकता है। इस के लिए एक स्थानीय प्रमुख समाचार पत्र में धर्म परिवर्तन की घोषणा का प्रकाशन तथा धर्म परिवर्तन की घोषणा का शपथ पत्र नॉन जुडिशियल स्टाम्प पेपर पर शपथ आयुक्त, नोटेरी या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित करवा कर प्रकाशन की शुल्क सहित निर्धारित फार्म में प्रेषित करते पर भारत के गजट में धर्म परिवर्तन की घोषणा का प्रकाशन कराया जा सकता है। इस से स्पष्ट है कि धर्म परिवर्तन की घोषणा का शपथ पत्र निष्पादित कर उसे शपथ आयुक्त, नोटेरी या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट से प्रमाणित करा लेने तथा स्थानीय प्रमुख समाचार पत्र में उस की घोषणा के प्रकाशन से धर्म परिवर्तन पूर्ण हो जाता है। यदि एक बार गजट में प्रकाशन हो जाए तो उस धर्म परिर्तन को दी गई चुनौती का सफल होना असंभव हो जाता है। निर्धारित प्रपत्र इस लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है।

यदि आप सिख धर्म ग्रहण करेंगे तो आप के व परिवार के कानूनी अधिकारों में कोई परिवर्तन नहीं होगा क्यों कि विवाह, संपत्ति, दत्तक ग्रहण, संरक्षण तथा उत्तराधिकार आदि मामलों में सिखों पर भी हिन्दू विधि ही प्रभावी है। ही माने जाते हैं और परिवार भी आप के साथ वैसे ही रहता रहेगा जैसे पहले रह रहा था। लेकिन आप ईसाई धर्म ग्रहण करते हैं तो इस से आप की संपत्ति का उत्तराधिकार ईसाई कानून से निर्धारित होने लगेगा। दोनों ही मामलों में बच्चे आप के साथ रह सकते हैं लेकिन आप की पत्नी को यह अधिकार मिल जाएगा कि आप के धर्म परिवर्तन कर लेने के आधार पर वह आप से तलाक ले सकती हैं।

 

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