Succession Archive

समस्या-

हरिओउम् ने झाँसी, उत्तर प्रदेश से पूझा है-

मेरी माता जी की निर्वसीयती सम्पत्ति में मेरे पिता ने नगर पंचायत में खुद को वारिस दर्ज करवा रखा है। मेरे पिता अब किसी दूसरी महिला के साथ रहते हैं।  मुझे डर है कि पिता वह सम्पत्ति उक्त महिला को हस्तांतरित न कर दें। नगर पालिका का कहना है कि एक बार जो नाम दर्ज हो गया तो हो गया, अब तुम्हारा नाम दर्ज नहीं किया जा सकता है। बगैर कोर्ट में जाये माता जी की सम्पत्ति में उत्तराधिकार दर्ज कैसे कराया जा सकता है?

समाधान-

नगर पालिका संपत्ति का जो रिकार्ड रखती है उसमें वह नामान्तरण दर्ज करती है। लेकिन कानूनन नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं होता है। फिर भी नामान्तरण एक बार कर दिया जाए तो केवल नामान्तरण आदेश की अपील कर के अपीलीय अधिकारी के आदेश से ही परिवर्तित कराया जा सकता है। यदि नामान्तरण में परिवर्तन करा भी लिया जाए तो भी आप की समस्या बनी रहेगी।  आप के पिताजी फिर भी उस संपत्ति को किसी अन्य को विक्रय पत्र, दानपत्र या अन्य किसी प्रकार का हस्तान्तरण विलेख पंजीकृत करवा कर हस्तान्तरित कर सकते हैं।  उन्हें रोकने के लिए तो आप को न्यायालय की शरण लेनी ही पड़ेगी।

आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की माता जी के उत्तराधिकारी, आप आप के भाई और बहिन तथा आप के पिता हैं। इस तरह आज की तिथि में माताजी की वह संपत्ति एक अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है। इस संपत्ति के बँटवारे के लिए कोई भी एक हिस्सेदार दीवानी वाद संस्थित कर सकता है।

सबसे बेहतर तो यही है कि आप या कोई भी अन्य हिस्सेदार उक्त संपत्ति के विभाजन और अपने हिस्से का पृथक कब्जा प्राप्त करने का दावा दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करे। उस के साथ ही संपति को पिता द्वारा खुर्द बुर्द करने की संभावना के आधार पर उसी दावे में अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर इस आशय की अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करा ले कि विभाजन का वाद निर्णीत होने तक पिता उस संपत्ति या उस का कोई भी भाग खुर्द बुर्द न करें। इस के सिवा अन्य कोई उपाय पिता को रोकने का नहीं है।

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समस्या-

मोहम्मद दानिश खान ने मानिकपुर, तहसील कुन्दा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा जी का देहांत 1953 को हुआ है, मेरे पिताजी 2 भाई और एक बहिन हैं। मेरे दादा जी का पैतृक मकान है, जिसका कुछ भाग मेरे चाचा के लड़कों ने सिर्फ़ स्टांप पेपर के ज़रिये बेच दिया है। जिसे किराएदार बनवा रहा है। मेरी फूफी की मौत हो चुकी है, उनकी लड़की ने अपने हिस्से के लिए मुक़दमा दायर किया है। क्या उन्हें हिस्सा मिलेगा? क्या मेरी फूफी की बेटी स्टे ले सकती है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि हम किस तरह अर्जेंट्ली स्टे ले सकते हैं। मेरे पिता जी ने अपना हिस्सा न्ही बेचा है। अभी तक बँटवारा भी क़ानूनी तौर पे नहीं हुआ था, फिर भी मेरे चाचा के लड़कों ने कुल मकान का 1/2 भाग बेच दिया है।

समाधान-

आप एक मुस्लिम हैं, आप का दाय मुस्लिम विधि के अनुसार तय होगा। आपके दादाजी की मृत्यु के उपरान्त आप के पिता, चाचा और फूफी तीनों का उन की संपत्ति पर अधिकार है। पुत्री का हिस्सा पुत्रों के हिस्से से आधा होता है, यह कहा जा सकता है कि पुत्री का 1 हिस्सा होता है तो पुत्रों के 2-2 हिस्से होते हैं।

इस गणना के अनुसार आप के पिता व चाचा को संपत्ति के 2/5-2/5 हिस्से पर अधिकार है और 1/5 हिस्से पर फूफी का अधिकार है। इस तरह चाचा का अधिकार संपत्ति के ½ हिस्से पर नहीं है। उसने यदि ½ हिस्सा बेच दिया है तो वह उसके हिस्से से अधिक है और अवैधानिक है।

यदि आप की फूफी ने बंटवारे का दावा किया है तो उन्हें तुरन्त उसी दावे में मकान में निर्माण कार्य को रुकवाने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर निर्माण कार्य रुकवाना चाहिए। यह तुरन्त हो सकता है। बंटवारे के उसी दावे में आप के पिता भी पक्षकार हैं तो वे फूफी के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं या खुद भी उसी दावे में अलग से स्टे के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्ततु कर सकते हैं।

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समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

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हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।

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कानून के उल्लंघन पर अदालत के चक्कर काटना लाजमी है।

January 2, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

वनराजसिंह चौहण ने धामतवाण दश्कोई, अहमदाबाद से पूछा है-


मेरे दादाजी के पास 2 ऐकर पुश्तैनी जमीन है। दादाजी को 7 संतान हैं। 4 लडके 3 लड़कियाँ है। लडकियों की शादी हो चुकी है। दादाजी का ही पूरे 2 ऐक़ड़ में नाम है। वो जमीन दादाजी ने पैसे ले कर बेचदी है। कबजा भी दे दिया है। पैसा भी सब मिल गया है। दादाजी की 3 में से 1 लडकी ने सिविल कोर्ट में 2005 के उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन एक्ट के तहत हिस्सा मांगा है। दादाजी को कोर्ट के चक्कर काटने पड़े हैं। और जमीन का पैसा चारों लडकों को दे दिया है। इसका समाधान बताइए।

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन को अस्तित्व में आए 13 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। अभी तक भी यदि उसे लागू करने की इच्छा इस अधिनियम के अंतर्गत हिन्दू शब्द की परिभाषा में आने वाले तमाम समाजों में सहदायिक/ पुश्तैनी संपत्ति में पुत्रियों को पुत्रों के समान हिस्सा देने की मानसिकता नहीं बनी है और वे अपनी इच्छा से लड़कियों को दूसरे तरीकों से संपत्ति से वंचित करने की कोशिश करेंगे तो ये दिन तो देखने को मिलेंगे।

आप के दादाजी ने काम ही ऐसा किया है कि उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़ें। कोई भी व्यक्ति यदि कानून के विरुद्ध या उस के उल्लंघन में कोई काम करेगा तो उसे कभी भी और कितने भी समय तक के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ सकते हैं। चक्कर तो उसे भी काटने पड़ेंगे जिस ने दादाजी से यह माल खरीदा है। चूंकि हिस्सा मांगा है इस कारण से चारों पुत्रों और दो दूसरी पुत्रियों को भी अदालत का मुहँ देखना पड़ रहा होगा।

आप के दादाजी ने उस पुश्तैनी संपत्ति को बेच कर जो धन प्राप्त किया है वह भी सहदायिक संपत्ति है जो अब चारों भाइयों के पास है। इस कारण आप की बहिनें चारों भाइयों और दादाजी के विरुद्ध जमीन में या विक्रय से प्राप्त धन से अपना हि्स्सा मांग सकती हैं।

अब तो इस का एक ही रास्ता है। चारों भाई मिल कर तीनों बहिनों को मनाएँ और कहें कि वे उन्हें उनके हिस्से के बदले नकद धन देने को तैयार हैं। तीनों बहिनों को बिठा कर बात करें और एक समझौते पर पहुँचें जिस में तीनों बहिनें यह लिख कर देने को तैयार हों कि उन्हें जमीन बेचने से प्राप्त धनराशि में से उन के हिस्से की धनराशि मिल गयी है और अब इस मुकदमे को वे नहीं चलाना चाहती हैं। यह समझौता अदालत में पेश हो और इस के अनुसार अदालत अपना निर्णय पारित कर यह फैसला दे कि सभी उत्तराधिकारियों को उन का हिस्सा मिल चुका है। तभी इस विवाद से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

समस्या-

अमन ने 510 धानमंडी, जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी ने खुद के पैसे से 1976 में एक मकान खरीदा था। 1976 से अभी तक मैं और मेरी माताजी साथ रह रहे हैं। मेरी चार शादीशुदा बहनें हैं। मेरे पिताजी की 2001 में निर्वसीयत मृत्यु हो चुकी है। अभी मैंने मकान को वापस बनाया है। कानून मे बेटियों को 2005 में  हक दिया गया था। अब क्या मुझे बहनों हक-तर्कनामा की जरूरत पडेगी। मैने सुना है कि अगर बेटी अपना हक माँगती है तो पिता 9 दिसंबर 2005 को जीवित होना चाहिए। जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु 2005 अधिनियम लागू होने से पहले 2001 में हो चुकी है। अतः अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

आप 2005 के जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं वह कानून केवल पुश्तैनी / सहदायिक संपत्तियों के संबंध में है। आप का मकान आप के पिता ने खुद अपने धन से 1976 में खरीदा था। इस कारण वह उन की स्वअर्जित संपत्ति है। उस का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। आप के मामले में 1905 का संशोधन अधिनियम प्रभावी नहीं है।

धारा -8 के अनुसार मृतक पुरुष की पत्नी, पुत्र व पुत्रियाँ और माता समान हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप का मकान आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस में आप की माताजी, चार बहनों तथा आप सब को 1/6 हिस्सा प्राप्त है। इन में से कोई भी विभाजने की मांग कर सकता है और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

यदि आप की बहनें चाहती हैं कि उन का हिस्सा औऱ आप की माँ का हिस्सा भी आप को ही प्राप्त हो तो आप को आप की बहनों और माताजी से हक-त्याग विलेख या रीलीज डीड अपने हक में निष्पादित करानी होगी। तभी आप उक्त मकान के एक मात्र स्वामी हो सकते हैं।

सहदायिक और स्वअर्जित संपत्तियों में बँटवारा

December 19, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार ने भूठन कलाँ, ज़िला फ़तेहाबाद, हरियाणा से पूछा है-

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि अभी जीवित हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम २ भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बुआ जी अपना हिस्सा माँग रही हैं तो हमारे घर का बँटवारा कैसे होगा? क्या ज़मीन के 5 हिस्से होंगे या पापा और बुआ के नाम आधी ज़मीन होगी, बाद में पापा को जो जमिन मिलेगी उसमें हमारा हिस्सा होगा? अगर दादा जी अपनी इच्छा से ज़मीन अपने बेटे के नाम कर देते हैं तो क्या बुआ ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप की संपत्ति का बंटवारा इस तथ्य पर निर्भर करता है कि दादाजी के नाम जो जमीन है वह पुश्तैनी /सहदायिक है या नहीं? यदि वह सहदायिक नहीं हो कर उन की स्वअर्जित संपत्ति हुई तो उस का बँटवारा भिन्न रीति से होगा।

यदि संपत्ति स्वअर्जित है तो दादाजी के जीवन काल में किसी का कोई हिस्स नहीं है और बुआ को हिस्सा मांगने का कोई अधिकार नहीं है। यदि दादाजी उस संपत्ति की वसीयत कर देते हैं तो जिस के नाम वसीयत होगी उसे यह संपत्ति प्राप्त होगी।  वसीयत किए बिना ही दादाजी का देहान्त हो जाता है तो उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार दाय होगा और आप के पिता और बुआ को आधी आधी संपत्ति प्राप्त होगी। आप को पिता के हिस्से की संपत्ति में इसी प्रकार अधिकार प्राप्त होगा।

दि संपत्ति पुश्तैनी /सहदायिक है (पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति क्या है यह इसी साइट पर अन्यत्र देखा जा सकता है) तो इस संपत्ति में आप के पिता, बुआ और दादाजी तीनों का समान हिस्सा है। दादाजी के रहते बुआ अपना हिस्सा मांगती है तो उसे 1-3 हिस्सा मिलेगा। यदि दादाजी वसीयत कर देते हैं तो दादाजी के जीवनकाल के बाद भी बुआ को 1/3 हिस्सा ही प्राप्त होगा। यदि वे वसीयत करते हैं तो उन के देहान्त के बाद जिस के नाम वसीयत होगी उसे उनके हिस्से की 1-3 संपत्ति प्राप्त हो जाएगी। अन्यथा यह हिस्सा भी उन के जीवनकाल के बाद आधा आधा आपकी बुआ और पिता के बीच बंट जाएगा।

समस्या

विपिन शुक्ला, ने ग्राम -ललितपुर, जिला-उन्नाव, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे मित्र राजकिशोर के पिता लोग तीन भाई थे सबसे बड़े भाई की मृत्यु सबसे पहले 2014 में हुई, जिनकी एक विवाहित पुत्री है। इसके बाद सबसे छोटे भाई की मृत्यु सड़क दुर्घटना में 2016 में हुई, जो कि अविवाहित थे। सबसे बाद राजकिशोर के पिता कि मृत्यु हुई। राजकिशोर के दादा जी और दादी की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी है। छोटे चाचा ने किसी को कोई वसीयत नहीं लिखी थी।  राजकिशोर के छोटे चाचा जो कि अविवाहित हैं, उनके हिस्से की जमीन का वारिस कौन होगा?

समाधान-

प का मामला यदि उत्तर प्रदेश में स्थित खेती की जमीन के संबंध में है तो हमारा कहना है कि उस पर उत्तर प्रदेश जमींदारी अधिनियम 1950 के उपबंधों के अनुसार उत्तराधिकार तय होगा। इस अधिनयम की धारा 171 के अनुसार किसी पुरुष की पत्नी और किसी पुत्र के जीवित न होने पर माता-पिता को, उन के भी जीवित न होने पर विवाहित पुत्री को, विवाहित पुत्री के भी जीवित न होने पर जीवित भाई-बहिन को तथा पूर्व मृत भाई के पुत्र को समान भाग प्राप्त होंगे।

प के मामले में सब से छोटे भाई की मृत्यु के समय उन के बड़े भाई अर्थात राजकिशोर के पिता जीवित थे और वही राजकिशोर के छोटे चाचा की मृत्यु के उपरान्त उन के एक मात्र उत्तराधिकारी थे। इस प्रकार छोटे चाचा की जमीन का अधिकार राजकिशोर के पिता को प्राप्त हुआ है।

ब क्यों कि राजकिशोर के पिता का भी देहान्त हो चुका है, इस कारण उन की जमीन के वारिस राजकिशोर के पिता के उत्तराधिकारी होंगे और छोटे चाचा की जमीन के उत्तराधिकारी भी राजकिशोर के पिता के उत्तराधिकारी होंगे। यदि राजकिशोर की माता तथा उन का कोई और भाई है या फिर किसी पूर्व मृत भाई की संतानें हैं तो सभी को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा। पूर्व मृत भाई की संतानों को कुल एक हिस्सा प्राप्त होगा। यदि राजकिशोर की माँ जीवित नहीं हैं और कोई भाई भी नहीं है तो पिता की समूची जमीन का उत्तराधिकारी राजकिशोर होगा और छोटे चाचा की जमीन का उत्तराधिकारी होकर वह भी उसी को प्राप्त होगी।

मुकदमों में देरी अदालतों की बहुत कम संख्या के कारण होती है।

December 5, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

संजु देवी ने गांव- ऱानोली, तहसील- खाटुश्यामजी, जिला- सीकर, राजस्थान से पूछा है-,

मैं अपने पिता की सबसे छोटी पुत्री हूँ। मेरे पिता की मौत बचपन में हो चुकी थी। शादी के बाद मैंने पिता की पैतृक संपति में हिस्से का वाद दो साल पहले कर दिया था। लेकिन मेरे भाई ने अभी तक न्यायालय में कोई जवाब नहीं दिया। इस तरह मेरे केस को कमजोर कर दिया गया है? न्यायालय के स्टे के बाद भी मेरी माँ का सम्पूर्ण भूमि से हकत्याग करवा कर अपने नाम पर चढवाने की कोशिश की गई है।  लेकिन मैंने पटवारी को पूरी बात बताकर उस हकत्याग को निरस्त करवाने के लिये एक और वाद दायर किया है, अब मेरी मॉ चल बसी है। क्या मेरे केस का कुछ भविष्य है? स्टे के बाद भी वो लोग मुझे नुकसान पहुँचाने की पूरी कोशिशें कर के मुझे एक तरह से बेदखल करना चाहते हैं। सर मार्गदर्शन देवे।

समाधान-

प की समस्या भारत के तमाम न्यायार्थियों की समस्या है।  हमारे देश में न्यायालयों की बहुत कमी है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 140 से अधिक अदालतें हैं, जब कि भारत में 10 लाख की आबादी पर केवल मात्र 12-13 अदालतें हैं। ऐसी स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका के मुकाबले में हमारी अदालतों पर 10 गुना से भी अधिक मुकदमों के निपटारे का बोझा है। हमारे यहाँ कम अदालतें होने का एक कारण यह है कि हमारी सरकारें अदालतों की संख्या को बढ़ाने पर कोई रुचि नहीं लेतीं क्यों कि वे समझती हैं कि अदालते बढ़ा देने से उनकी पार्टी को अगले चुनाव में मिलने वाले वोटों में कोई इजाफा नहीं होने वाला है। वे सारे फण्डस को इस तरह उपयोग में लेते हैं जिस से वे अगले चुनाव में वोट प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल कर सकें।

दालतें इन मुकदमों को निपटाने के लिए कोशिश भी करती है। अधिक मुकदमे होने और पुराने मुकदमों की भरमार होने के कारण नए मुकदमों में जरा जरा सी बात के लिए पेशी की तारीख बदल दी जाती है। इस वर्ष उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने सभी अधीनस्थ न्यायालयों को निर्देश दिए हैं कि वे साल के अंत तक 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों का निपटारा कर दें। इस के बावजूद बहुत सी अदालतें ऐसी हैं जहाँ 20 वर्षे से अधिक पुराने मुकदमो का निपटारा भी नहीं हो सकेगा।

प के मामले में हो सकता है कि आपके भाइयों ने अदालत के सम्मन लेने में ही देरी की हो। इस कारण कुछ पेशियाँ हो गयी हों वर्ना अब यह नियम है कि प्रतिवादी की तामील होने के 90 दिनों के भीतर उसे अनिवार्य रूप से जवाब दावा पेश करना होगा। यदि 90 दिनों के भीतर जवाब दावा पेश न हुआ हो तो आप अदालत पर दबाव बनाएं कि वह प्रतिवादीगण के जवाब के अवसर को समाप्त करते हुए आगे की कार्यवाही करे।

प सोच रही हैं कि देरी करने से आप का मुकदमा कमजोर हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है। बस आप यह ध्यान रखें कि आप का वकील अच्छा हो और पैरवी में किसी तरह की कमजोरी या भूल न हो। यह आप की स्वयं की मुस्तैदी से ही संभव है। नतीजें में देरी हो सकती है लेकिन  नतीजा आप के पक्ष में आएगा।

हाँ तक पूरी न्याय व्यवस्था को गति प्रदान करने की बात है तो उस के लिए जरूरी है कि जनता का दबाव भी राजनेताओँ और राज्य सरकार पर होना चाहिए। अभी अवय्स्क बालिकाओं के प्रति यौन अपराधों के मामले में दबाव था तो सरकारों को इस तरह की नयी अदालतें बड़ी संख्या में खोलनी पड़ीं हैं। इस से उस तरह के अपराधों में साल-छह माह में ही फैसले आने लगेंगे। इसी तरह का दबाव समूची न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पड़े तो बात बन सकती है, पर वह पूरे देश के स्तर का मसला है।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

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