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अदालत का सुझाव : नशे में दुर्घटना कर मृत्यु कारित करने को अजमानतीय और दस वर्ष तक की कैद की सजा से दंडनीय बनाने के लिए कानून बनाया जाए

सड़क दुर्घटना में कु. बबिता चौधरी की मृत्यु का प्रकरण  आखिर अदालत में रंग लाया।  14 दिसम्बर 2008 को कोटा के एक कॉलेज की कुछ छात्राएं शिक्षण टूर
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उद्योग पर मुसीबत के वक्त कामगारों और नियोजकों दोनों के लिए सहायक ले-ऑफ का कानून

मैं ने कल के आलेख में कहा था कि ले-ऑफ के कानूनी प्रावधान मालिकों और उन के कामगारों दोनों के लिए लाभदायक हैं।  औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 की धारा
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मंदी में नियोक्ताओं की उन के कामगारों को काम देने में असमर्थता और उस से संबंधित कानून

 मैं ने कल यह उल्लेख किया था कि मंदी के इस समय में बहुत से नियोक्ता उन के यहाँ काम करने वाले कामगारों की अज्ञानता और विवशता का
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मंदी में राज्य सरकारों की जिम्मेदारी

मंदी का दौर जारी है।  कर्मचारिय़ों पर छंटनी की तलवार लटकी है।  सरकार ने घोषणा की है कि तनख्वाह कम कर दें लेकिन कर्मचारियों को छंटनी न करें। 
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डी अजित के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का कोई निर्णय नहीं है

कल तीसरा खंबा पर आलेख नहीं था, केवल जनादेश में प्रकाशित आलेख ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में  की सूचना मात्र थी।  इस आलेख पर सात
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ब्लागर हैं तो क्या? कानून से ऊपर नहीं

दिनेशराय द्विवेदी कल से ही डी अजित के मामले की ब्लाग जगत में चर्चा है। पर्याप्त प्रयत्न करने के उपरांत भी इस मामले में दिया गया सर्वोच्च न्यायालय
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जुगाड़ को कानूनी मान्यता क्यों नहीं

कुछ दिनों पूर्व मैं अपनी ससुराल अकलेरा, जिला झालावाड़ (राजस्थान) गया था।  विवाह में सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेजाने का बहुत काम होता है। 
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नियुक्तियों के अभाव में रिक्त पड़ी अदालतें और भटकते न्यायार्थी

तीसरा खंबा लगातार यह बताता रहा है कि न्यायालयों की कमी के कारण किस तरह आम न्यायार्थी को बरसों तक न्याय नहीं मिल पा रहा है।  विगत दिनों
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न्याय व्यवस्था से टूटता मोह : सरकारें जल्दी चेत जाएँ ___

जिस बात का मुझे कुछ बरसों से अंदेशा था वह सामने आ ही गई।   आज अदालत ब्लाग पर खबर  है कि चंडी गढ़ में चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन
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अपराधों के अन्वेषण, अभियोजन और अदालतों की पर्याप्तता और स्वतंत्रता-स्वायत्तता के बारे में सोचा जाना जरूरी है

एस. एन. विनोद जो नागपुर के प्रधान संपादक दैनिक ‘राष्ट्रप्रकाश’ एवं समूह संपादक- मराठी ‘दैनिक देशोन्नती’  ने अपने ब्लाग चीरफाड़ पर अपने आलेख फिर फैसला हुआ, न्याय नहीं
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