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कर्मचारी का चरित्र सत्यापन

हमें सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के किसी कर्मचारी के चरित्र सत्यापन के संबंध में अनेक तरह से प्रश्न पूछे जाते हैं। हर प्रश्नकर्ता को उस के प्रश्न का पृथक से उत्तर देना संभव नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में नियोजन प्राप्त करते समय कर्मचारी द्वारा पूर्व में किसी अपराध के लिए अभियोजित किए जाने या दोष सिद्ध पाए जाने और दंडित किए जाने के तथ्य को छुपाने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (ए.आई.आर. 2016 सुप्रीमकोर्ट 3598)  के मामले में स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह स्थिति इस प्रकार है…

किसी अभ्यर्थी द्वारा दोषसिद्धि, गिरफ्तारी या किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के बारे में, सेवा में प्रवेश करने से पहले या बाद में नियोजक को दी गई जानकारी, सही होना चाहिए और आवश्यक जानकारी का कोई दमन या गलत उल्लेख नहीं होना चाहिए।

झूठी जानकारी देने के लिए सेवाओं की समाप्ति या उम्मीदवारी को रद्द करने का आदेश पारित करते समय, कर्मचारी द्वारा ऐसी जानकारी देते समय यदि कोई विशेष परिस्थितियाँ रही हों तो उन पर विचार कर सकता है। निर्णय लेने के समय नियोक्ता, कर्मचारी पर लागू सरकार के आदेशों / निर्देशों / नियमों को ध्यान में रखेगा।

यदि किसी आपराधिक मामले में शामिल होने की जानकारी को छुपाने या गलत जानकारी देने का मामला हो, जिसमें आवेदन / सत्यापन फॉर्म भरने से पहले ही दोषी ठहराया या बरी कर दिया गया था और ऐसा तथ्य बाद में नियोक्ता के ज्ञान में आता है, तो वह कोई भी निम्नलिखित में से मामले के लिए उपयुक्त कोई भी कदम उठा सकता है: –

  1. तुच्छ प्रकृति के मामलों में, जिनमें दोषसिद्धि दर्ज की गयी हो, जैसे कम उम्र में नारे लगाना, या एक छोटे से अपराध के लिए, जिसके बारे में अगर बता दिया गया होता तो भी कर्मचारी को पद के लिए अयोग्य नहीं माना गया होता, नियोक्ता अपने विवेक से गलत जानकारी देने या उसे छुपाने की कर्मचारी की गलती की अनदेखी कर सकता है।
  2. जहां दोषसिद्धि दर्ज की गई है जो प्रकृति में तुच्छ नहीं है, नियोक्ता कर्मचारी की उम्मीदवारी को रद्द कर सकता है या कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर सकता है।
  3. यदि तकनीकी आधार पर नैतिक अवमानना ​​या जघन्य / गंभीर प्रकृति के अपराध से जुड़े मामले में कर्मचारी पहले ही बरी हो चुका था, और यह पूरी तरह से बरी होने का मामला नहीं हो, या संदेह का लाभ दिया गया है, तो नियोक्ता उपलब्ध अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर पूर्ववृत्त के रूप में विचार कर सकता है, और कर्मचारी की निरंतरता के रूप में उचित निर्णय ले सकता है।
  1. ऐसे मामले में, जहाँ कर्मचारी ने एक निष्कर्षित आपराधिक मामले की सत्यता से घोषणा की है, नियोक्ता अभी भी पूर्ववृत्त पर विचार कर सकता है और उसे उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
  2. ऐसे मामले में जहाँ चरित्र सत्यापन में रूप में तुच्छ प्रकृति के आपराधिक मामले का लंबित होना कर्मचारी द्वारा घोषित किया गया है तब नियोक्ता मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, अपने विवेक से उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्णय ले सकता है।
  3. जहाँ कर्मचारी कई लंबित मामलों के संबंध में जानबूझकर तथ्य छुपाने का मामला हो वहाँ इस तरह की झूठी जानकारी देने को अपने आप में महत्वपूर्ण मान कर एक नियोक्ता उस व्यक्ति की नियुक्ति के आदेश को जिसके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित थे ,उचित नहीं मानते हुए उसे रद्द कर सकता है या सेवाओं को रद्द कर सकता है।

7.यदि आपराधिक मामला लंबित था, लेकिन फॉर्म भरने के समय उम्मीदवार को पता नहीं था, फिर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियुक्ति प्राधिकारी अपराध की गंभीरता को देखते हुए निर्णय ले सकता है।

  1. यदि कर्मचारी की सेवा में पुष्टि हो जाती है, तो तथ्यों को छुपाने या सत्यापन के रूप में गलत जानकारी प्रस्तुत करने के आधार पर सेवा से हटाने या बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले विभागीय जांच करना आवश्यक होगा।
  2. सूचनाएँ छुपाने या गलत सूचनाओं के निर्धारण के लिए सत्यापन / सत्यापन-प्रपत्र अस्पष्ट नहीं अपितु विशिष्ट होना चाहिए। ऐसी जानकारी जिसका विशेष रूप से उल्लेख किया जाना आवश्यक हो उसका खुलासा किया जाना चाहिए। यदि जानकारी नहीं मांगी जाए, लेकिन नियोक्ता के ज्ञान के लिए प्रासंगिक हो तो उस मामले में उद्देश्यपूर्ण तरीके से फिटनेस के मामले पर विचार किया जा सकता है लेकिन ऐसे मामलों में गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
  3. यदि किसी व्यक्ति को गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर दोषी ठहराए जाने से पहले, यह तथ्य उसके ज्ञान में लाया जाना और उसे सफाई का अवसर दिया जाना चाहिए।

पासपोर्ट आवेदन में मुकदमे के बारे में क्या लिखा जाए?

passportindiaसमस्या-

जोधपुर, राजस्थान से देवेन्द्र कुमार ने पूछा है –

मेरी भाभी ने सन 2007 में आत्महत्या की थी।  इस मामले मे भाभी के मायके वालों ने दहेज हत्या के आरोप मे हमारे परिवार के कई लोगों का नाम थाने में जाकर लिखवा दिया। इस में मेरा नाम भी शामिल है। मेरी अग्रिम जमानत 2007 में ही हो गयी थी,  मुझे कभी भी कोर्ट में नहीं जाना पड़ा और पेशी पर भी नहीं जाना पड़ता है।  लेकिन मेरा नाम चार्ज शीट में है।  अब मेरी समस्या ये है कि मैं पासपोर्ट बनवाना चाहता हूँ।  पासपोर्ट के लास्ट लाइन में ये पूछा जाता है कि आपके खिलाफ कोई केस तो नहीं चल रहा है,  तो उस में मैं क्या लिखू हाँ या नहीं? मेरा पुलिस वेरिफिकेशन कैसे होगा? मै किस प्रकार पासपोर्ट बनवा सकता हूँ?

समाधान-

प ने जो तथ्य बताए हैं, उन में अस्पष्टता है। आप का नाम आरोप पत्र में किस तरह से है आप ने यह नहीं बताया। आरोप पत्र में यह अंकित किया जाता है कि किस व्यक्ति ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई और क्या कराई। निश्चित रूप से आप का नाम वहाँ अंकित होगा। उस के बाद आप ने अग्रिम  जमानत करवा ली। फिर अन्वेषण के दौरान कोई ऐसा तथ्य नहीं आया जिस से आप के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध किया जा सके। तब आप के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत नहीं हुआ जिस के कारण आप को न्यायालय में नहीं जाना पड़ा। फिर भी आप के परिवार के जिन लोगों के मुकदमे चल रहे हैं उन्हों ने वकील भी किया होगा। आप उन वकील के पास जा कर पत्रावली देख कर सुनिश्चित कर लें कि आप के विरुद्ध कोई आरोप पत्र प्रस्तुत हुआ है या नहीं। वकील की मदद से उस आरोप पत्र की प्रमाणित प्रतिलिपि हासिल कर लें साथ ही न्यायालय की उस आदेशिका की प्रमाणित प्रतिलिपि भी प्राप्त कर लें जिस में यह अंकित हो कि किन किन अभियुक्तगण के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत हुआ है। इस से यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में नाम होने पर भी आप के विरुद्ध साक्ष्य न होने से कोई आरोप पत्र आप के विरुद्ध प्रस्तुत नहीं हुआ।

तनी तैयारी के बाद आप पासपोर्ट के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले आवेदन में लिख सकते हैं कि आप के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं चल रहा है। जब पुलिस वेरिफिकेशन में पुलिस वाले खुद यह लिख देंगे कि आप के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं चल रहा है। यदि उक्त प्रथम सूचना रिपोर्ट का उल्लेख आए तो आप पुलिस वालों को प्रमाणित प्रतिलिपियाँ बता कर संतुष्ट कर सकते हैं। जब आप को पासपोर्ट के लिए साक्षात्कार के लिए बुलाया जाए तब आप उक्त प्रमाणित प्रतिलिपियाँ साथ ले कर जाएँ जिस से वहाँ यदि कोई प्रश्न पूछा जाए तो आप उस का उत्तर सबूत सहित दे सकें। हमारी राय में पासपोर्ट बनाने में कोई परेशानी नहीं आनी चाहिए।

कब्जा तुरंत प्राप्त करने के लिए धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में कार्यवाही करें और विक्रय पत्र फर्जी होने पर छल के लिए अपराधिक मुकदमा करें।

समस्या-

नरसिंहगढ़, जिला राजगढ़, मध्यप्रदेश से मोहित नागर ने पूछा है-

मेरे पिताजी ने धूलजी नाम के एक व्यक्ति से भूखंड खरीदा, धूलजी ने यह प्लाट एक ऊदावत नाम के वकील से खरीदा था। हम ने इस 15X 65 वर्गफुट के भूखंड पर अपना छोटा सा मकान बनाया।  झाला नाम के एक अन्य व्यक्ति के नाम भी उस भूखंड की रजिस्ट्री है, वह शक्तिशाली व्यक्ति है। उस ने आ कर हमारा मकान जेसीबी मशीन से तोड़ दिया। हमारे पास कोई सपोर्ट नहीं है हम चार भाई बहन हैं और बहनों का विवाह इस भूखंड के विक्रय पर निर्भर करता है जिसे हम बेचना चाहते हैं लेकिन भूखंड पर झाला ने बाउंड्री बना ली है। कृपया हमें सुझाएँ कि हम क्या करें? .

समाधान-

प के पिता ने भूखंड खरीद कर उस पर मकान बनाया था जिस से स्पष्ट है कि उस पर आप का कब्जा था।  झाला नाम के व्यक्ति ने भूखंड पर आप के कब्जे को जबरन छीना है जो विधि विरुद्ध है। आप का मकान तोड़ कर झाला द्वारा कब्जा किए 60 दिन से अधिक न हुए हों तो आपधारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता में सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के न्यायालय में कब्जा वापस दिलाने के लिए झाला नाम के व्यक्ति के विरुद्ध आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।  यदि शांति भंग होने की संभावना हो तो इस कार्यवाही में मजिस्ट्रेट उक्त भूखंड को रिसीवर नियुक्त कर के उस के कब्जे में दे सकता है। तथा साक्ष्य के आधार पर निर्णय कर के जिस व्यक्ति का पहले कब्जा था उसे सौंप सकता है।

क ही भूखंड के दो पंजीकृत विक्रय पत्र होने का सीधा अर्थ यह है कि उन में से एक अवश्य ही फर्जी है।  आप को यह पता करना चाहिए कि कौन सा विक्रय पत्र फर्जी है? इस के लिए आप अपने नगर की नगरपालिका या फिर तहसील के रिकार्ड में जहाँ भी उस जमीन का रिकार्ड रखा गया हो जानकारी कर सकते हैं कि वह जमीन वास्तव में आरंभ में किस के नाम थी और आप तक या झाला तक कैसे पहुँची? यदि यदि आप को पता लगे कि आप का विक्रय पत्र फर्जी है तो आप आप को विक्रय करने वाले व्यक्ति धूलजी और धूलजी को विक्रय करने वाले ऊदावत नाम के वकील के विरुद्ध फर्जी भूखंड बेच कर आप के साथ छल करने के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि पुलिस की अन्वेषण में यह सिद्ध हुआ कि आप के साथ छल किया है तो उन के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही होगी। इस के अलावा आप जो धन आपने धूल जी को भूखंड खरीदने के लिए दिया उसकी ब्याज सहित वापसी के लिए दीवानी दावा कर सकते हैं। यदि झाला के प्रभाव के कारण पुलिस कार्यवाही करने को तैयार न हो तो आप सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे अन्वेषण के लिए पुलिस थाना को भिजवा सकते हैं अथवा न्यायालय के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत कर झाला के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं।

दि आप को पता लगे कि आप की रजिस्ट्री सही है और झाला द्वारा आप का मकान तोड़ कर कब्जा किए 60 अधिक हो गए हैं तो फिर आप को उस के विरुद्ध जमीन का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। जो भी उपाय आप करना चाहें उस के पहले किसी भरोसेमंद स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के माध्यम से कार्यवाही कराएँ।

अपराधिक मुकदमा चल रहा हो तो न्यायालय से विदेश जाने की अनुमति प्राप्त करने पर पासपोर्ट बन जाएगा

समस्या-

ग्राम-महाराणा, तहसील-बाँन्सी, जिला-बाँका, बिहार से तौफीक अहमद ने पूछा है-

मने विरोधी पक्ष पर मुकदमा किया है जिसका केस नंबर 81/12 है।  जिस में मारपीट की धारा 307 आईपीसी मौजूद है।  विरोधियों ने बचने के लिए हमारे ऊपर भी काउंटर केस कर दिया।  जिसमें उस तरफ से भी धारा 307 आईपीसी मौजूद है।  मामला कोर्ट में है। अब तक इंजरी रिपोर्ट्स्, डीएसपी सुपरविजन की गवाही उनके खिलाफ पाई गई है। मैं एक विद्यार्थी हूँ।  पढ़ाई के साथ जॉब भी करता हूँ, मुझे फॉरेन जाने का प्रस्ताव भी आ रहा है मुझे पासपोर्ट बनाना बेहद ही ज़रूरी है।  तो क्या मेरा पासपोर्ट बन सकता है? अगर हाँ, तो कैसे? अगर नहीं तो क्यों? तो फिर कब बनेगा?

समाधान-

ह सही है कि जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी अदालत में फौजदारी मुकदमा (Criminal Case) चल रहा हो तो पासपोर्ट कार्यालय पासपोर्ट नहीं बनाता है। क्यों कि इस तरह जिस व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा चल रहा है वह देश के बाहर चला जाता है और उस के विरुद्ध मुकदमे को आगे बढ़ाना और उस में निर्णय करना दुष्कर हो जाता है। लेकिन जिस न्यायालय में मुकदमा चल रहा है वह अदालत अभियुक्त को विदेश जाने की अनुमति प्रदान कर दे तो पासपोर्ट कार्यालय पासपोर्ट बना देता है।

प को चाहिए कि जिस न्यायालय में आप के विरुद्ध मुकदमा चल रहा है उस न्यायालय में आवेदन कर दें और वहाँ से विदेश जाने की अनुमति प्राप्त करें।  न्यायालय से विदेश जाने की अनुमति के आदेश की प्रमाणित प्रति पासपोर्ट आवेदन पत्र के साथ पासपोर्ट कार्यालय को प्रस्तुत करें।   आप का पासपोर्ट बिना अड़चन के बन जाएगा।

परिवादी को मुकदमे से पारिवारिक व आर्थिक परेशानी हो रही है, मामला कैसे समाप्त हो?

समस्या-

विगत दो वर्ष पूर्व एक लड़की को पास के गॉंव वाले लड़के के द्वारा मोबाईल पर अश्लील बातें की जा रही थी,  जिसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पुलिस थाने में लिखवाई गई थी।  पिछले दो सालों से केस अदालत में लंबित है।  इसका कोई फैसला नहीं हो पा रहा है।  अदालत में हो रही देरी से इस केस में लड़की को पारिवारिक व आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है इसलिये वह चांहती है कि इस पर समझौता हो जाये,  इसके लिये क्या करना होगा?

-आनन्द, बैतूल, मध्यप्रदेश

समाधान-

प के प्रश्न से पता नहीं लगता है कि मामला किस धारा के अंतर्गत न्यायालय में चल रहा है।  धारा की जानकारी के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन है कि इस मामले में क्या  लड़की ने या उस के अभिभावक ने पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराई। यदि इस मामले में पुलिस कार्यवाही नहीं करती तो उसे बदनामी उठानी पड़ती।  पुलिस ने कार्यवाही कर दी है तो आप यह कह रहे हैं कि लड़की को पारिवारिक आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है जो संभव प्रतीत नहीं होता है।  लड़की का तो अब उस मामले से सिर्फ इतना लेना देना है कि एक बार उसे अदालत में जा कर बयान देना है वह भी तब जब अदालत स्वयं समन भेज कर लड़की को बुलाए।  इस से लड़की को किस प्रकार पारिवारिक व आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है यह बात समझ नहीं आ रही है।  ऐसा तो तभी हो सकता है जब स्वयं अभियुक्त पक्ष उसे परेशान कर रहा हो।  यदि ऐसा है तो यह न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालना है जो कि स्वयं में एक अपराध है।  इस परिस्थिति में तो लड़की या उस के अभिभावकों को मामला वापस लेने के स्थान पर परेशान करने के लिए फिर से पुलिस को या उस न्यायालय को जिस में यह मामला चल रहा है शिकायत करनी चाहिेए। जिस से न्याय में बाधा उत्पन्न करने वालों को इस कार्य के लिए भी दंडित किया जा सके।

प के प्रश्न से यह भी पता नहीं लगता है कि मामला किस धारा के अंतर्गत न्यायालय में चल रहा है।  यह संदेह भी उत्पन्न हो रहा है कि यह प्रश्न अभियुक्त पक्ष की ओर से पूछा जा रहा हो।  धारा की जानकारी के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन है कि इस मामले में क्या हो सकता है।  इस तरह के मामलों में धारा 354 आईपीसी का अपराध बनता है। यह लड़की द्वारा शमनीय है।  यदि लड़की न्यायालय में आवेदन दे कि वह अपराध का शमन चाहती है तो मुकदमा समाप्त हो सकता है,लेकिन न्यायालय इस बात की जाँच भी कर सकती है कि लड़की कहीं दबाव में तो यह आवेदन नहीं दे रही है।

अपराधिक मुकदमे में गवाह उपस्थित न होने पर क्या होगा ?

समस्या-

क लड़की से मेरी केवल बातचीत होती थी।  17 जनवरी 2010 को मेरी अनुपस्थिति में वह अचानक मेरे घर पर आई और कहा कि मैं ने उस के साथ शादी की है।  मेरी पत्नी में और उस के बीच झगड़ा हुआ और आपस में मारपीट हो गई। उस लड़की ने थाने में जा कर मामला दर्ज कराया तो पुलिस ने 498-ए का मुकदमा बना दिया जिस में घर के सभी लोगों का नाम लिखा दिया।  किसी तरह उस से समझौता किया तो उस आधार पर हमारी गिरफ्तारी पूर्व जमानत हुई।  पुलिस ने मेरे और मेरी पत्नी के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया लेकिन घऱ के अन्य लोगों के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं पाना लिखा।  हमारे वकील ने आरोप विरचित होने के समय आरोप मुक्ति के लिए बहस की।  लेकिन न्यायालय ने कहा कि समझौते के आधार पर जमानत हुई है इस कारण से आरोप मुक्ति नहीं हो सकती।  अब गवाही के लिए उस लड़की का समन निकला है।  उस ने मेरे घर का पता दे रखा था इस कारण से वह मेरे घर पर आया।  हम ने मना कर दिया कि वह यहाँ नहीं रहती है और न कभी यहाँ रही है।  बाकी सभी गवाह मेरे मोहल्ले के हैं जो सच बोलेंगे।  वह लड़की गवाही देने नहीं आ रही है।  तो ऐसे में क्या हमारी जमानत खारिज हो जाएगी? इस मामले में न्यायालय का क्या निर्णय होना चाहिए?

-महाबली, सासाराम, बिहार

समाधान-

प ने अपने मुकदमे में वकील किया हुआ है।  आप को अपने मुकदमे के बारे में जो भी शंकाएँ हों  उन के बारे में अपने वकील से जानकारी करना चाहिए।  वे अधिक बेहतर तरीके से बता सकते हैं क्यों कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी होती है।

प के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र राज्य सरकार के लिए पुलिस द्वारा प्रस्तुत किया गया है।  उस मामले को साबित करने का दायित्व राज्य सरकार का है।  आप पर लगाए गए आरोप को बिना किसी युक्तियुक्त संदेह के साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है।  यदि अभियोजन पक्ष किसी भी कारण से आप पर आरोप साबित नहीं कर पाता है तो आप निर्दोष करार दिए जाएंगे और मुकदमा समाप्त हो जाएगा।  उस लड़की को गवाही के लिए प्रस्तुत करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है आप की नहीं।  यदि पुलिस उस लड़की को गवाही में नहीं ला पाती है तो गवाही के अभाव में कोई भी बात आप के विरुद्ध साबित नहीं की जा सकती।  आप बेफिक्र रहें।  आप की जमानत केवल जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने पर रद्द की जा सकती है।  यदि आप प्रत्येक पेशी पर अदालत में उपस्थित होते रहें तो आप की जमानत भी खारिज नहीं की जा सकती है।  इतना हो सकता है कि मुकदमे में सुनवाई में देरी हो जाए।

स मामले में आरोप 498-ए भा.दंड संहिता का है जिस में प्राथमिक रूप से यह साबित किया जाना आवश्यक है कि परिवादी आप की पत्नी है।   यह साबित करने के लिए क्या सबूत पुलिस प्रस्तुत करेगी यह तथ्य मेरे सामने नहीं है।  मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो विवाह हुआ ही नहीं उसे पुलिस ने साबित कैसे मान लिया।  इस के लिए भी पुलिस ने कुछ गवाह अवश्य नकली बनाए होंगे।  यदि उस लड़की के साथ आप का विवाह ही साबित नहीं होगा तो इस मामले में आप को दोषी साबित किया जान संभव नहीं है।  जो तथ्य आप ने मेरे सामने रखे हैं उन के आधार पर मुकदमा झूठा सिद्ध होगा और न्यायालय को चाहिए कि वह उस लड़की के विरुद्ध धारा 182 भा. दंड संहिता में मुकदमा चलाए कि उस ने मिथ्या रिपोर्ट कर के पुलिस को आप को क्षति पहुँचाने के लिए गुमराह किया।  इस मुकदमे में उस लड़की को दंडित किया जा सकता है।

डॉ. बिनायक सेन व अन्य दो अभियुक्तों को दंडित करने वाला मूल निर्णय अंतर्जाल पर उपलब्ध

दिसंबर 24, 2010 को रायपुर (छत्तीसगढ़) के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बी.पी. वर्मा ने अपने यहाँ लंबित सत्र प्रकरण क्रमांक 182/2007 छत्तीसगढ़ शासन बनाम पिजूष उर्फ बुबून गुहा, डॉ. विनायक सेन एवं नारायण सान्याल के मुकदमे में निर्णय सुनाया। निर्णय में जो दण्ड उक्त तीनों अभियुक्तगण को सुनाए गए हैं उन्हें नीचे देखा जा सकता है।
निर्णय के अंत में न्यायालय ने यह टिप्पणी अंकित की है कि, अभियुक्त गणों को उपरोक्तानुसार दी गई कारावास की मूल सजाएँ साथ साथ भुगतायी जाएँगी।
स निर्णय ने देश भर के जनतंत्र प्रेमी लोगों को व्यथित किया है। विशेष रूप से इस प्रकरण में जिस तरह से सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. बिनायक सेन को आजीवन कारावास के दंड से दंडित किया गया है उस की देश के जनगण के एक हिस्से के साथ-साथ दुनिया भर की मानवाधिकार संस्थाओं ने आलोचना की है और डॉ. बिनायक सेन को रिहा किए जाने की मांग की है। इस हेतु देश के अनेक महत्वपूर्ण लोगों ने अपने हस्ताक्षरयुक्त याचिका माननीय राष्ट्रपति को प्रेषित की है। इस संबन्ध में एक आलेख न्याय व्यवस्था राजसत्ता का अभिन्न अंग है, उस का चरित्र राज्य से भिन्न नहीं हो सकता सहयोगी ब्लाग “अनवरत” पर प्रकाशित हुआ है। तीसरा खंबा को इस निर्णय की प्रति आज शाम ही उपलब्ध हुई है। उसे पढ़ने पर अपनी राय तीसरा खंबा पर प्रकाशित की जाएगी। यदि कुछ पाठक न्यायालय द्वारा सुनाए गए मूल निर्णय को देखना पढ़ना चाहें तो यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

कंडक्टर द्वारा टिकट न देकर पैसा जेब में रख लेना 409 भा.दं.संहिता में अपराध

डॉ. पुरुषोत्तम मीना राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान ने निम्न प्रश्न तीसरा खंबा को प्रेषित किया है …
प्रश्न …. रोड़वेज और रेलवे के कंडक्टर्स/टिकट चेकर्स के द्वारा यात्रियों से किराया ले कर टिकट या रसीद नहीं दी जाती है और धनराशि अपनी जेब में रख ली जाती है। 
क्या कंडक्टर्स का यह कृत्य धारा 409 भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत अपराध है? यदि हाँ तो दोषियों को सजा दिलाने के लिए क्या किया जाए? क्यों कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्यवाही के नाम पर केवल औपचारिकता की जाती है। 
 उत्तर –
 डॉ, मीना जी!
रेलवे अधिनियम की धारा-188 के अंतर्गत प्रावधान किया गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा-409 के लिए प्रत्येक रेलवे कर्मचारी को लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) माना जाए।  इसी तरह भा.दं.सं. की धारा-21 में लोक सेवक को परिभाषित किया गया है। इस में कहा गया है कि कोई भी कोरपोरेशन जो केन्द्रीय, प्रान्तीय या राज्य सरकार के किसी अधिनियम के स्थापित किया गया है उस के कर्मचारी लोकसेवक होंगे।
एक कंडक्टर या टिकट चैकर के रूप में किसी कर्मचारी को टिकट बनाने, विक्रय करने या शास्ति सहित टिकट राशि वसूलने का कर्तव्य दिया जाता है। वह कर्तव्य करते हुए ऐसी कोई भी राशि वसूल कर के जेब में रख लेता है और रसीद जारी नहीं करता तो निश्चित रूप से यह धारा-409 भा.दं.सं. के अंतर्गत अपराध है। ऐसे कर्मचारी को इस अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है।
कर्मचारी को दंडित कराने के लिए सबसे पहले तो रेलवे को शिकायत करनी चाहिए। आप यह भी कर सकते हैं कि जहाँ उक्त कृत्य किया जाए उस से संबंधित जीआरपी थाने पर अपनी शिकायत दर्ज कराएँ। पुलिस का यह कर्तव्य है कि शिकायत पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करे, और अन्वेषण कर अभियुक्त के विरुद्ध आरोप पत्र संबंधित न्यायालय में प्रस्तुत करे। पुलिस थाना अनेक बार रिपोर्ट दर्ज नहीं करता है। लेकिन आज उस के लिए भी यह सुविधा उपलब्ध हो गई है कि पुलिस विभाग की वेबसाइट पर जा कर संबंधित पुलिस अधीक्षक का ई-मेल पता जानें और अपनी शिकायत पुलिस अधीक्षक और उस से ऊपर के अधिकारियों को प्रेषित कर दें। उस शिकायत पर अवश्य कार्यवाही होगी।
वास्तव में इन  मामलों में होता यह है कि वसूल की गई राशि तो यात्री को देनी ही होती है। अक्सर रसीद जारी न करने की शर्त पर कंडक्टर या टिकट चेकर कम राशि पर भी उसे सुरक्षित यात्रा करवाता है और कोई शिकायत दर्ज नहीं होती। इस तरह कमाई गई राशि में विभाग के ऊपर तक के अधिकारियों का किसी न किसी रूप में हिस्सा होता है। यही कारण है कि इस तरह की शिकायतें विभाग में होती भी हैं तो उन्हें दबा दिया जाता है।  यात्री भी आम तौर पर अन्वेषक को गवाही देने और बाद में न्यायालय में गवाही देने की परेशानियों से बचने के लिए शिकायत करने में रुचि नही

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है? (2)

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है?
अपवाद-2
कोई व्यक्ति शरीर, या संपत्ति की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का सद्भावनापूर्ण प्रयोग करते हुए कानून द्वारा उसे दी गई शक्ति का अतिक्रमण कर दे और बिना पूर्व चिंतन के और प्रतिरक्षा के लिए आवश्यक हानि से अधिक अपहानि करने के इरादे के बिना उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर दे जिस के विरुद्ध वह प्रतिरक्षा का अधिकार प्रयोग में ला रहा था, तो अपराधिक मानव वध हत्या नहीं है। 
 
उदाहरण के रूप में लंबूजी ने छोटूजी को चाबुक मारने की कोशिश की लेकिन इस तरह नहीं कि छोटूजी को कोई गंभीर हानि या चोट पहुँचती। अपने बचाव में छोटूजी ने पिस्तोल निकाल ली, लेकिन उस से न डरते हुए लंबूजी ने चाबुक को न रोक कर हमला जारी रखा। छोटूजी को लगा कि अब पिस्तौल चलाए बिना वे चाबुक की मार से नहीं बच सकते पिस्तोल चला दी। गोली ऐसे घातक अंग पर लगी कि लंबूजी का काम तमाम  हो गया।  यहाँ छोटू जी लंबू जी की हत्या के लिए दोषी नहीं हैं, बल्कि अपराधिक मानव वध के दोषी हैं।
 
 अपवाद-3
कोई व्यक्ति लोक सेवक होते हुए या किसी लोक सेवक की मदद करते हुए लोक न्याय को अग्रसर करने के लिए कार्य करते हुए कानून द्वारा दी गई शक्तियों से आगे बढ़ कर कोई ऐसा कार्य करता है जिसे वह कानूनी और लोकसेवक के नाते कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सद्भावनापूर्वक आवश्यक होने का विश्वास रखते हुए मृतक के विरुद्ध कोई वैमनस्यता रखे बिना के किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है। तो यह हत्या नहीं है, अपितु अपराधिक मानव वध है। इस अपवाद में यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसे मामले में यह बात तथ्यहीन है कि किस व्यक्ति ने आवेश दिलाया था या पहला हमला किया था।

 अपवाद-4
अचानक झगड़े से उपजे क्रोध की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में पूर्व चिन्तन के बिना, झगड़े का कोई अनुचित लाभ उठाने की मंशा के बिना या क्रूरतापूर्ण या असामान्य तरीके का प्रयोग किए बिना कारित की गई मृत्यु हत्या नहीं है, लेकिन अपराधिक मानव वध है।

 अपवाद-5
यदि जिस की मृत्यु हुई है वह अठारह वर्ष से अधिक उम्र का हो कर भी अपनी सम्मति से मृत्यु होना सहन करता है या मृत्यु की जोखिम उठाता है उस जोखिम में उस का अपराधिक मानव वध हत्या नहीं है।                

उदाहरण के रूप में लंबूजी ने अठारह वर्ष से कम आयु के छोटू जी को उकसाया कि वह स्वैच्छापूर्वक आत्महत्या कर ले। यहाँ छोटूजी अठारह वर्ष से कम उम्र के होने के कारण अपनी मृत्यु सहन करने या जोखिम उठाने की सम्मति देने में असमर्थ थे। इस कारण से लंबू जी ने हत्या का दुष्प्रेरण किया है। 

इच्छित व्यक्ति के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति की हत्या या अपराधिक मानव वध 
 
भा.दं.संहिता की धारा 301 में स्पष्ट किया गया है कि……
यदि कोई व्यक्ति कोई ऐसा कार्य कर के जिस से उस का इरादा किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करना हो या ऐसा करने से किसी की मृत्यु संभाव्य हो किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है जिस की मृत्यु कारित करना उस का उद्देश्य नहीं था। यद्यपि यहाँ उस का इरादा उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना नहीं था जिस की उस ने मृत्यु कर दी है। उस व्यक्ति द्वारा कारित की गई मृत्यु उसी तरह अपराधिक मानव वध या हत्या है जिस तरह उस व्यक्ति द्वारा इच्छित व्यक्ति की मृत्यु कारित करना होती। 

धारा 302 से धारा 306 में विभिन्न श्रेणियों के अपराधिक मानव वध के लिए दंडों की व्यवस्था की गई है, जिस की चर्चा हम आगे करेंगे।

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है?

पिछले आलेख अपराधिक मानव वध कब हत्या है? में मानव वध को कब हत्या कहा जा सकता है? इसे स्पष्ट किया गया था। लेकिन इस परिभाषा के कुछ अपवाद भी हैं।

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है?
अपवाद-1 

यदि गंभीर और अचानक ऐसी उत्तेजना उत्पन्न किए जाने पर कि व्यक्ति आत्मसंयम की शक्ति खो दे और वह उत्तेजना देने वाले व्यक्ति अथवा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटनावश कारित कर दे तो ऐसा मानववध हत्या नहीं कहा जाएगा। लेकिन इस अपवाद के कुछ बंधन भी हैं……

  1. कि ऐसी उत्तेजना किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने या उसे क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से दिखावटी या अपने बचाव की दृष्टि से स्वनिर्मित न हो। 
  2. कि ऐसी उत्तेजना किसी ऐसी बात द्वारा उत्पन्न  नहीं हो जो कि किसी लोकसेवक द्वारा लोकसेवक की शक्तियों के विधिपूर्ण  प्रयोग में की गई हो।
  3. कि ऐसी उत्तेजना ऐसी उत्तेजना किसी ऐसी बात द्वारा उत्पन्न नहीं हुआ हो जो व्यक्ति के अपने स्वरक्षा के के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो

यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि, उत्तेजना गंभीर और अचानक थी या नहीं कि अपराध को हत्या की श्रेणी में जाने से बचा दे एक तथ्य का प्रश्न है जो परिस्थितियों और साक्ष्य के आधार पर ही सुनिश्चित किया जा सकता है।

 इस अपवाद को इन उदाहरणों से समझा जा सकता है….

  1.  संता द्वारा उत्तेजित किए जाने के कारण बंता इरादतन बंता के पुत्र का वध कर देता है। यह हत्या कही जाएगी क्यों कि बंता को संता के पुत्र ने उत्तेजित नहीं किया था और संता के पुत्र की मृत्यु उत्तेजना में दुर्घटना या गलती से नहीं हुई थी।
  2. बंता को संता ने अचानक इस तरह उत्तेजित कर दिया कि बंता ने संता पर अपनी पिस्तौल तानी और चला दी। गोली संता को नहीं लगी। लेकिन गोली नजदीक ही पंता को लग गई जो बंता को दिखाई नहीं दे रहा था। बंता को पंता को मारने का कोई इरादा नहीं था और यह संभावित भी नहीं था कि पंता उस की गोली से मर जाता। यहाँ बंता ने पंता की ‘हत्या’ नहीं की है, किन्तु ‘अपराधिक मानव वध किया है’।
  3. बंता सिपाही ने अपने मित्र संता को घर से बाहर बुलाया और अचानक उसे गिरफ्तार कर लिया।  इस से संता को  अचानक तीव्र आवेश आ गया और उस ने अचानक बंता का वध कर दिया। यह हत्या कहलाएगी। क्यों कि आवेश ऐसी बात पर आया था जो बंता ने लोकसेवक के नाते लोकसेवक का कर्तव्य करते हुए की थी। 
  4. बंता एक मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हो कर एक साक्षी के रूप में बयान करता है कि वह संता की किसी बात पर विश्वास नहीं करता। उसे संता के बयान पर कतई विश्वास नहीं है और संता ने शपथ ले कर भी अदालत के सामने झूठ बोल कर शपथ को भंग किया है। संता को अचानक बंता के इस बयान पर आवेश आ गया और उस ने बंता का वध कर दिया। यह हत्या है। 
  5. बंता यकायक संता की नाक पकड़ने का प्रयास करता है। संता उस से बचने के लिए बंता को पकड़ लेता है, जिस से बंता को आवेश आता है और वह संता का वध कर देता है। यह हत्या है क्यों कि उत्तेजना ऐसी बात से हुई है जो प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई थी।
  6. बंता ने संता पर आघात किया संता को इस से क्रोध आ गया। पास में ही खडे उगन्ता ने संता के गुस्से का लाभ उठाने के लिए संता को उसी समय कटार पकड़ा दी और संता ने गुस्से में बंता की हत्या कर दी। यहाँ हो सकता है कि संता अपराधिक मानव वध का
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