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हिंसा के बाद ससुराल से निकाल देने पर स्त्री के पास विधिक उपाय।

समस्या-

अनामिका ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे सास ससुर और जेठानी दवारा मुझे बहुत टॉर्चर किया गया। दहेज के लिए “कम लाई हो” के ताने दिए गए और जेठानी और सास ने मुझे मारा भी है। मेरे पति सब देखते हुए भी कुछ नहीं बोले, उन लोगो को। मेरे पति और जेठानी के बीच नाजायज़ संबंध है। इसका विरोध करने पर उन लोगो ने मुझे घर से निकाल दिया है। अब मैं क्या करूँ? मेरे पति उस औरत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और मुझे तलाक़ दे रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ? कृपया उचित सलाह दीजिए।

समाधान –

र उस महिला की समस्या घर है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और यदि है तो उस के बाद भी वह अपनी रिश्तेदारियों से अलग किसी मित्र समूह में नहीं है। वस्तुतः  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस का जन्म समूह में हुआ है और वह समूह के बिना नहीं रह सकता। एक स्त्री विवाह तक मायके में रहती है तब उस के साथ परिवार होता है। जैसे जैसे वह बड़ी होती है परिवार को इस की चिन्ता सताने लगती है कि अब उस की विदाई का समय आ गया है और वह विवाह कर के उसे विदा कर देता है। कुछ ही परिवार हैं जो यह सोचते हैं कि स्त्री को पहले आत्मनिर्भर बनाना चाहिए और उस के पास आत्मनिर्भर मित्रो का एक समूह भी होना चाहिए। स्त्री के लिए ये दो चीजें सब से अधिक जरूरी हैं। जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता या कम से कम ध्यान दिया जाता है। अभी आप के पास ये दो चीजें होतीं तो आप को कोई परेशानी नहीं होती, आप खुद अपनी समस्या से मुकाबला कर सकती थीं। आप ने अपनी समस्या में अपनी आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर मित्र समूह और मायके के बारे में कुछ नहीं बताया है।

आप के पति के अपनी भाभी के साथ संबंध वाली समस्या का कानून के पास कोई हल नहीं है। आप के साथ जो कुछ हुआ है उस के बाद आप का उस परिवार से संबंध तोड़ना, पति से तलाक लेना और टॉर्चर के लिए ससुराल वालों को सजा दिलाना ही आप का उपाय है। इस के लिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दे कर अपनी सुरक्षा, पृथक आवास की सुविधा और भरण पोषण की राशि प्रतिमाह प्राप्त करने के लिए तुरन्त आवेदन करना चाहिए। आप अपने साथा हुई हिंसा के लिए तथा आप के स्त्रीधन को पाने के लिए जो आप के पति के पास या ससुराल में रह गया है धारा 498ए तथा 406 भारतीय दंड संहिता में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती हैं और पुलिस द्वारा यथोचित कार्यवाही न करने पर न्यायलाय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के साथ ही धारा 13  हिन्दू विवाह अधिनियम में अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन  तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण राशि प्रतिमाह पाने के लिए आवेदन करने के उपाय आप के पास उपलब्ध हैं। बेहतर है कि आप अपने निकट के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर ये सब उपाय करने का प्रयत्न करें, देरी न करें।

पत्नी को उस की इ्च्छा के विरुद्ध साथ नहीं रखा जा सकता।

समस्या-

कमलेश कुमार ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरी शादी 20 मई 2017 को हिन्दू रीति रिवाज के साथ हुई थी। बारात में मेरे गांव के लोगो से ससुराल पक्ष के लोगो ने मारपीट कर दी। उनके गांव वालों ने एक बाराती को खूब लहूलुहान होने तक मारा और नजदीक के थाना मे बाराती के खिलाफ केस दर्ज कर दिया। इसके बाद हमने समझौता कर के शादी की। लेकिन शादी के 1 माह बाद पता चला कि मेरी लड़की पक्ष के लोगों ने मेरे छोटे भाई के खिलाफ मारपीट की रिपोर्ट की है। फिर यह झुठा मामला समझौता करने पर बहुत मुश्किल से ससुराल पक्ष के हाथ-पांव जोड़ने पर 8-9 महीने में खत्म हुआ। शादी के बाद लड़की मेरे और मेरे परिवार के साथ गलत व्यवहार औऱ मेरे साथ मारपीट करने लगी। बात बात में लड़ने झगड़ने लगी फिर भी मैं इसे सहन करता रहा, कुछ समय बाद ठीक हो जाएगा कह कर। लेकिन दिन ब दिन और ज्यादा लड़ाई झगड़ा करने लगी।  फिर वह कभी 15 दिन के लिए तो कभी 1 माह के लिए बिना पूछे मायके चली जाती थी। कुछ महीनों बाद पता चला कि लड़की का गांव के एक लड़का के साथ अवैध संबंध था। तीज में एक माह से अधिक समय तक अपने घर मे रही और तभी वहीं गर्भवती हो गई। इस अवैध गर्भधारण की बात को उनसे कहने पर दहेज में फंसाने की बात करती थी। फिर भी लड़की को रखने के उद्देश्य से मैंने बात दबा दिया। 17 जून 2017 को एक लड़के को जन्म दिया।  लड़की मेरे साथ मुश्किल से 10 माह ही रही। इसके बाद मेरे घर रायपुर से अपने जीजा के साथ चली गई। उनका अपने जीजा के साथ भी अवैध संबंध है। फिर भी मैंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया और उनके साथ रहने के लिए उनके जीजा के खिलाफ थाना में कोई शिकायत नहीँ की। उसके बाद कई प्रयास के बाद भी लड़की वापस नही आई। समाज मे भी आवेदन देके बुलाया लेकिन लड़की नही आई। महिला थाना में रिपोर्ट लिखाई थी की मेरे पति मुझे रख नही रहे है। महिला थाना में भी समझाइस दी गई कि अपने पति के साथ रहो लेकिन लड़की नही मानी और दहेज के समान मांग कर दी। मैं भी समान देने के लिए राजी हो गया। उसको महिला थाने में अपने सामान का लिस्ट देना था जो लड़की नही दी जिससे समान वापस नही कर पाया। अब कोर्ट में भरण पोषण की मांग कर रही है। मैं निजी कंपनी में काम करता हँ। मेरी सैलरी 10,000 महीना है। मैं रायपुर में 3000 किराये के मकान रहता हूं। लड़की मुझसे 12,000 महीना भरण-पोषण के लिए मांग रही है। मेरे और मेरे परिवार के नाम पर  कोई जमीन जायदाद नहीं है और न ही मेरे परिवार का अन्य आय का स्त्रोत है। जब भी समझौता के लिए उनके घर जाता हूँ तो मेरी पत्नी और उनके घर वाले मारपीट करते हैं। कई बार जाति समाज ने इस मामले को सुलझाने के लिए उन्हें बुलाया लेकिन कभी नही आई। इस वजह से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। वही आफिस का काम भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा हूं। जिससे नौकरी छूटने का भी खतरा है। अब मैं उस लड़की को मर्जी के हिसाब रखना चाहूंगा अगर वह मेरी साथ नहीं रहना चाहेगी तो मैं तलाक चाहता हूं। लेकिन जल्द से जल्द इस मामला का निराकरण चाहता हूँ। कृपया सलाह प्रदान करें।

समाधान-

प के अनुसार शादी के पहले झगड़ा हुआ, आप के बाराती से मारपीट की तब भी आपने शादी की। फिर वह परिवार वालों से बिना कारण झगड़ने लगी तब भी आप ने उस से कुछ नहीं कहा। वह मर्जी से अपने मायके आती जाती रही। फिर आप को पता लगा कि उस के किसी लड़के से संबंध हैं तब भी आप शान्त रहे। फिर वह मायके में गर्भवती हो गयी और एक बच्चे को जन्म दिया फिर भी आपने कुछ नहीं कहा। फिर वह बच्चे को साथ ले कर जीजा के साथ चली गयी, उस के साथ भी उस के अवैध संबंध हैं। आप ने उस के जीजा के खिलाफ भी कोई शिकायत नहीं की। अब तक आपने अपना कोई दोष नहीं बताया। आप इंसान हैं कि देवता है?

अब आप कहते हैं कि पुलिस ने समझौते के लिए बुलाया वह आप के साथ रहने को मना कर गयी। फिर कहते हैं कि आप उस को अपनी मर्जी के हिसाब से रखेंगे। भाई आप रखेंगे कैसे? वह रहना चाहेगी तब ना। और यदि पत्नी या पति न चाहे तो उसे जबरन तो पुलिस और अदालत भी साथ नहीं रखवा सकती। इस लिए यह ख्याल तो छोड़ दें कि आप उसे मर्जी के अनुसार अपने साथ रखेंगे।

आप तलाक लेना चाहते हैं तो किसी स्थानीय वकील से मिलिए। वे आपसे बात कर के आपसे जरूरी दस्तावेज इकट्ठा कर के पता करेंगे कि आप किन किन आधारों पर तलाक ले सकते हैं। फिर आप तलाक के लिए मुकदमा कर दें। पत्नी खर्चा मांग रही है तो देना पड़ेगा। जब तक वह दूसरी शादी नहीं कर लेती है तब तक देना पड़ेगा। बच्चे का खर्च भी देना पड़ेगा तब तक जब तक कि उस की कस्टडी आप को नहीं मिल जाती। आप तलाक का मुकदमा करने के बाद बच्चे की कस्टडी का मुकदमा कर सकते हैं।

मानसिक संतुलन मत बिगाड़िए, यह बीमारी है डाक्टर के पास जा कर इलाज कराइए। उस से कुछ होने वाला नहीं है और शारीरिक व मानसिक हानि और होगी।

जारता का आरोप तभी लगाएँ जब आप उसे साबित कर सकते हों।

समस्या-

श्रीमती कृष्णा नाथ ने जगदलपुर, जिला बस्तर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 21 जून 2010 को मध्यप्रदेश के बीनागज जिला गुना के रहने वाले प्रदीप नाथ से हुई थी और मेरी 5 साल की बेटी है। मेरे पति ने मेरा विश्वास तोड़ा है किसी और लड़की के साथ उनका रिलेशनशिप है। मुझे वो खर्चा पानी भी नहीं देते, वो कुछ काम नहीं करते हैं। अगर मैं उन पे भरण पोषण के लिए केस करूँ तो मुझे कितने पैसे मिलेंगे? मैं ये भी बता दू मैं मेरे पति से बड़ी हूँ, इससे मेरे केस में परेशानी होगी क्या? मुझे मेरी बेटी को पालने में परेशानी हो रही इसलिए मुझे कुछ मागदर्शन देने की कृपा करें।

समाधान-

प अपने पति पर जारता और उपेक्षा का आरोप लगा रही हैं। यदिआप यह आरोप अपने आवेदन में भी लगाती हैं तो आप को यह आरोप साबित करना होगा। यदि आप यह आरोप साबित नहीं कर पाती हैं तो आप के पति भविष्प में मिथ्या आरोप लगा कर बदनाम करने की क्रूरता करने का आधार बना कर आप के विरुद्ध विवाह विच्छेद का मुकदमा कर सकते हैं और जीत भी सकते हैं।

आप के पति कुछ नहीं कमाते। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि आप को मुकदमा कर देने पर कितनी भरण पोषण राशि प्राप्त हो सकती है। लेकिन कानून बहुत स्पष्ट है यदि किसी व्यक्ति ने विवाह किया है और उस विवाह से किसी संतान का जन्म भी हो चुका है तो पति यह नहीं कह सकता कि उस की कमाई कुछ भी नहीं है। यदि उस ने विवाह किया है और संतान को जन्म दिया है तो उसे भरण पोषण की राशि तो देनी होगी। यह राशि आप दोनों के परिवारों के जीवन यापन के स्तर से तय होगा।

आप भघरण पोषण का मुकदमा जहाँ आप निवास कर रही हैं वहाँ के न्यायालय में धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रस्तुत कर सकती हैं।

 

आप क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकती हैं।

समस्या-

सुशीला ने पोकरण, जैसलमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति का व्यवहार मेरे और मेरे पैतृक परिवार के प्रति अच्छा नहीं है। जिस के कारण अब मैं मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ। मेरे पति मेरे इलाज के लिए कुछ नहीं करते। मैं इस से परेशान हो कर अपने मायके आ गयी हूँ। अब मेरा पति मुझे और मेरे मायके के परिजनों को फोन कर के धमकियाँ दे रहा है वह मेरे रिश्तेदारों और जाति के लोगों को मेरे बारे में गलत बातें लिख कर मैसेज कर रहा है। जिस से मैं  वापस उस के पास जा कर रहने लगूँ। लेकिन मैं वापस नहीं जाना चाहती और तलाक लेना चाहती हूँ। मुझे बताएँ मैं तलाक कैसे ले सकती हूँ।

समाधान-

प के पति का व्यवहार आप के प्रति क्रूरता पूर्ण है, बीमार पत्नी का इलाज नहीं कराना और उसे बुरा भला कहना क्रूरता है। इस कारण आप का मायके आना पूरी तरह जायज था। उस के बाद उस का धमकियाँ देना और लोगों को आप को बदनाम करने वाले फोन मैसेज भेजना क्रूरता की इन्तेहा है। आप क्रूरता के इस आधार पर तलाक के लिए अर्जी उस जिले के परिवार न्यायालय मे प्रस्तुत कर सकती हैं जिस जिले में आप के विवाह की रस्म संपन्न हुई थी अथवा जिस जिले में आप अपने पति के साथ अन्तिम बार निवास कर रही थी।

इस के अतिरिक्त आप अपने स्त्री-धन की मांग अपने पति से कर सकती हैं नहीं देने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध होगा। क्रूरता कर के और आप का इलाज न करा के वह धारा 498ए आईपीसी का अपराध कर ही चुका है। आप इन दोनों धाराओँ के अन्तर्गत पुलिस में रिपोर्ट कराएँ, यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में इस संबंध में परिवाद प्रस्तुत करें। इस के अलावा आप अपने लिए भऱण पोषण का खर्चा प्राप्त करने के लिए धारा 125 दं.प्र.संहिता और महिलओँ के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।

जिस व्यक्ति से वसूली होनी है उस की या उस की साझेदारी वाली संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है।

समस्या-

रवि ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


मेरा भाई और उसकी पत्नी शादी के 3 महीने बाद से ही घर से अलग रह रहे हैं। उनका आपस मे कोई विवाद हुआ और फिर 498/ 406 125 498और 406 में अभी कोर्ट में नहीं लगा है, एफआर्ईआर  हुए 2 साल हो गए हैं।  गुजारा भत्ता का केस कोर्ट में है जिस में 2500 प्रति माह खर्च देना होगा और पिछले 32000 भी। भाई हिप जुआइन्ट की बीमारी के कारण कुछ काम नहीं कर पाता, उसका खर्च भी दोस्त मिल कर उठाते हैं।  गुज़ारा भत्ता न देने पर कोर्ट ने 30 दिन का समय दिया है, नहीं तो कुर्की की कार्यवाही की जाएगी। भाई के पास कोई सम्पत्ति नहीं है। वह किराये के मकान में रहता है।  क्या कुर्की में माता पिता या भाई की सम्पत्ति को भी जप्त किया जा सकता है क्या?


समाधान-

त्नी का भरण पोषण करने की जिम्मेदारी पति की है न कि पति के रिश्तेदारों की। यह जिम्मेदारी भी पति की वर्तमान आय और संपत्ति पर  निर्भर करती है। यदि इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आदेश नहीं दिया है तो उस आदेश के विरुद्ध अपील या रिविजन करना चाहिए और वसूली पर स्थगन प्राप्त करना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब संपत्ति और वर्तमान आय तथा शारीरिक स्थिति के संबंध में दस्तावेजी सबूत अपील या रिविजन कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ।

जहाँ तक वसूली के लिए संपत्ति को कुर्क करने का प्रश्न है तो केवल पति की या उस की साझेदारी वाली किसी संपत्ति को ही कुर्क किया जा सकता है, अन्य किसी संपत्ति को नहीं। यदि किसी गलत फहमी के अंतर्गत किसी अन्य संपत्ति को कुर्क किया भी जाए तो उस संपत्ति का स्वामी संबंधित न्यायालय में अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकता है।

 

 

धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण दीवानी प्रकृति का है, दीवानी प्रक्रिया संहिता के प्रावधान सिद्धान्त रूप में लागू होंगे।

समस्या-

नेहा सोनी ने इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति मुझे मेरे मायके छोड़ कर चले गये और मुझे आने के लिए भी मना कर दिया। वो मुझे साथ रखना नहीं चाहते। मैं ने कोर्ट में 125 और 498 ए के मुकदमे लगा रखे हैं।  मेरे पति प्राइवेट कॉलेज मे प्रोफसर हैं। मेरे पास  उन की सैलरी का प्रमाण नहीं है।   मेरा अंतरिम मेंटेनेन्स 1700 रुपए प्रतिमाह तय हुआ है। जबकि मेरे ससुराल वाले काफ़ी संपन्न हैं। वो मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, ना ही कोई हाल निकालना चाहते हैं।  क्या करूँ बहुत परेशान हूँ। मेरी मदद करें।

समाधान-

भारत में अदालतों की संख्या आबादी के मुकाबले बहुत कम है। दस लाख की आबादी पर अमरीका में 140 अदालतें हैं और ब्रिटेन में 55 जब कि भारत में इसी जनसंख्या पर केवल 12 अदालतें हैं। वैसी स्थिति में न्याय में देरी होना स्वाभाविक है। 498ए की कार्यवाही तो धीमे ही चलेगी उस पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता। वहाँ अभियोजक सरकार होती है। आपको केवल गवाही के लिए बुलाया जाएगा।

धारा 125 दं.प्र.सं. के भरण पोषण के मामले में आप को अंतरिम राहत न्यायालय ने दे दी है। अब जब भी अन्तिम निर्णय होगा तब जो भी गुजारा भत्ता आप का तय होगा वह आप के द्वारा आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने की तिथि से प्रभावी होगा। इस तरह यदि आप का गुजारा भत्ता 5000 प्रतिमाह तय होता है तो 1700 के अलावा जितना गुजारा भत्ता बकाया होगा वह आप को बाद में मिल जाएगा। इस लिए आप को चाहिए कि आप 125 दं.प्र.सं. के प्रकरण में उचित गुजारा भत्ता तय होने पर अधिक ध्यान दें। गुजारा भत्ता का आधार हमेशा पति की आर्थिक स्थिति और मासिक आय होती है। मासिक आय तो आप को प्रमाणित  करनी होगी।

आप को चाहिए कि आप पति के निजी कालेज का पता लगाएँ अपने स्तर पर उन की सेलरी की जानकारी करें और आर्थिक स्थिति का ज्ञान करें। धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण अपराधिक कानून का हिस्सा होने के साथ साथ दीवानी प्रकृति का है। इस कारण से दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के प्रावधान सिद्धान्त रूप में इस प्रकरण में प्रभावी होते हैं। इकबाल बानो बनाम स्टेट ऑफ यूपी के मामले में 05.06. 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दीवानी प्रकृति का माना है।आप इस मामले में सीपीसी के प्रावधानों केअनुरूप प्रतिपक्षी को देने के लिए प्रश्नावली दे सकती हैं और न्यायालय उन का उत्तर देने का आदेश प्रतिपक्षी को दे सकता है इसी तरह आप कोई भी दस्तावेज जो प्रतिपक्षी के शक्ति और आधिपत्य में है उसे प्रकट और प्रस्तुत कराने के लिए आवेदन न्यायालय को दे सकती हैं। दं.प्र.संहिता में भी धारा 91 में दस्तावेज प्रतिपक्षी से अथवा किसी से भी मंगाया जा सकता है और दस्तावेज लाने वाले को दस्तावेज साथ ला कर बयान देने के लिए कहा जा सकता है। इस तरह जिस संस्था में आप के पति काम करते हैं उस संस्था के प्रमुख को दस्तावेज ले कर न्यायालय में बुलाने के लिए समन जारी किया जा सकता है। आप इस मामले में अपने वकील से बात करें कि वह सीपीसी और दं.प्र.सं. के प्रावधानों में ऐसे आवेदन प्रस्तुत करे और इस संबंध में न्यायालयों के निर्णय तलाश कर उन का उपयोग करते हुए वस्तु स्थिति को न्यायालय के समक्ष रखे जिस से उचित रूप से आप का गुजारा भत्ता न्यायालय तय कर सके।

दहेज प्रताड़ना की एफआईआर निरस्त होने के आदेश की प्रतियाँ अन्य सभी मामलों में प्रस्तुत करें।

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

भरण पोषण की राशि में धारा 127 दं.प्र.सं. के अंतर्गत संशोधन कराया जा सकता है।

समस्या-

कौशल पटेल ने ग़ाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैं कौशल पटेल उम्र 36 वर्ष गाजियाबाद (उ0प्र0) में निवास करता हूँ। मेरी शादी सन् 2008 में हुई थी। मेरी आर्थिक स्थिति के चलते मेरी पूर्व पत्नी ने मुझसे तलाक ले लिया था। मेरा तलाक सन् 2014 में मेरठ (उ0प्र0) न्यायालय में हुआ था। तलाक के बाद धारा 125 में खर्चे के मुकदमें का भी फैसला भी 2014 में ही हो गया था। जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर प्रति माह मुझे अपनी पूर्व पत्नी को रूप्यै 3500/- का भुगतान करना पड़ता है। जो मैं कोर्ट में जमा करवाता हूँ। भुगतान में 2000/-रूपये मेरी पत्नी का और 1500/-रूपये मेरी बेटी का होता है। मेरी बेटी जो कि अब 7 वर्ष की है जो की मेरी पूर्व पत्नी के साथ ही है। चूंकि मैं अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहता हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। अभी मुझे मालूम हुआ है कि मेरी पूर्व पत्नी डिग्री काॅलेज में प्राईवेट लेक्चरार हो गई है। सैलरी का मुझे नहीं पता कि कितनी मिलती है लेकिन प्राईवेट लेक्चरार को भी लगभग 20-25 हजार की सैलरी मिलती है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या मेरी पूर्व पत्नी नौकरी करते समय भी मुझसे खर्चा लेने की अधिकारी है? क्या मुझे न्यायालय से कोई समाधान मिल सकता है? जिससे मुझे खर्चा ना देना पड़े क्यूंकि मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कृपया उचित समाधान बतायें।


समाधान-

कौशल जी, आप को न्यायालय के समक्ष दो तथ्य प्रमाणित करने होंगे। पहला यह कि आप की आय नहीं है या बहुत कम है। दूसरा यह कि आप की पत्नी वास्तव में 20-22 हजार रुपया कमाने लगी है। आप इन्हें प्रमाणित करने के लिए सबूत जुटाइए। केवल आप के कहने मात्र से अदालत ये दोनों तथ्य साबित नहीं मानेगी।

यदि आप पर्याप्त सबूत जुटा लेते हैं और उक्त दोनों तथ्यों को साबित करने में सफल हो सकते हों तो धारा 127 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और पूर्व में जो आदेश धारा 125 के अंतर्गत दिया गया है उसे संशोधित किया जा सकता है।

यदि वास्तव में आप की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और आप इस तथ्य को प्रमाणित कर देते हैं तो पत्नी को दी जाने वाली मासिक भरण पोषण राशि बन्द की जा सकती है। लेकिन बेटी के लिए दी जाने वाली राशि कम होने की बिलकुल सम्भावना नहीं है।

 

बन्दी रखने वाला ससुराल छोड़ कर ही आगे बढा़ जा सकता है।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

मोनिका ने हिसार, हरियाणा से पूछा है-

मेरी शादी को पाँच महिने हुए हैं। कुछ दिन बाद से ही मरे ससुराल वाले और पति मुझे परेशान कर रहे हैं। शादी से पहले मुझे बताया था कि मेरा पति ड्रिंक नहीं करता है औऱ शादी के बाद मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हूँ। लेकिन ये मुझे पढ़ाई नहीं करने देते हैं, न ही नौकरी करने देते हैं। घर से भी नहीं निकलने देते, मुझे कैद कर रखा है। मेरा पति रोज ड्रिंक कर के घर आता है और मुझ से लड़ाई करता है। मुझे मायके भेजने की धमकी देते हैं। मैं पढ़ना चाहती हूँ, आगे बढ़ना चाहती हूँ कुछ बोलती हूँ तो सब मेरे साथ बोलना बन्द कर देते हैं 20-20 दिन मुझ से कोई नहीं बोलता। मायके गयी तो एक माह तक मुझे लेने कोई नहीं आया। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के कथनों से एक बात पक्की लग रही है कि आप के ससुराल वालों को आप जैसी बहू नहीं बल्कि घर में बन्द रह कर घर का काम करने वाली बहू चाहिए थी। आम तौर पर विवाह के पहले लोग वायदे कर देते हैं यह सोच कर कि विवाह के बाद सब ठीक हो जाएगा। हमें नहीं लगता कि आप अपनी ससुराल में रह कर पढ़ाई आगे बढ़ा सकती हैं। आप का पति भी ड्रिंक करना नहीं छोड़ेगा। घर के बाहर निकलना भी आप का स्वतंत्रता पूर्वक नहीं हो सकता।

यदि आप इन परिस्थितियों से तंग हैं तो आप अपनी ससुराल छोड़ सकती हैं इस का आप को अधिकार है। क्यों कि आप के साथ ससुराल में वाजिब व्यवहार नहीं हो रहा है जो कि आप के साथ क्रूरता है। यदि आप के मायके वाले सपोर्ट करने में सक्षम हों तो आप मायके जा कर वहाँ नौकरी तलाश कर के नौकरी कर सकती हैं और अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हैं। इस के साथ ही आप अपने पति से प्रतिमाह भऱण पोषण राशि प्राप्त कर सकती हैं जिस के लिए आप को धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता अथवा घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन करने होंगे। आप चाहें तो ससुराल वालों की क्रूरता के लिए उन के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है जिस पर धारा 498ए का मामला दर्ज हो सकता है।

आप यदि वास्तव में अपनी परिस्थितियों को बदलना चाहती हैं तो आप को ससुराल छोड़ना ही पड़ेगा। एक बार ससुराल छोड़ दें फिर किसी अच्छे स्थानीय वकील से मिल कर सलाह करते हुए आगे का रास्ता तय कर सकती हैं।

कमाते नहीं, फिर भी शादी की है तो बीवी-बच्चे का भरण पोषण तो देना होगा।

mother_son1समस्या-

रमेश कुमार ने गुडामालानी, बाडमेर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी वर्ष 2011 मे हुई थी कुछ समय तक तो हमारे वैवाहिक सम्‍बध ठीक रहे।  लेकि‍न वर्ष 2014 के बाद मेरी पत्‍नी मेरे साथ बुरा व्‍यवहार करने लगी। घर में लडाई-झगडा करने लग गई और मुझे परेशान करने लगी, अब मेरे साथ नही रह रही है व मेरी 1 साल की बच्‍ची को लेकर पीहर में रह रही है। जबकि‍ मैं मेरे साथ रखना चाहता हूँ। वह कह  रही है कि‍ मैं धारा 125 के तहत भरण पोषण की मांग करूंगी जबकि‍ मैं पढाई करता हूँ। मेरे पढ़ाई का खर्चा भी मेरे पि‍ताजी देते हैं। मेरे पास कोई जाँब नहीं है। धारा 125 के तहत न्‍यायलय कि‍तना भरण पोषण दिला सकता है अगर मैं भरण पोषण नहीं दे पाता हूँ तो मुझे कि‍तनी सजा मि‍ल सकती है।

समाधान-

भाई, आप की समस्या भारी है। आप अभी कमाते नहीं हैं, फिर भी आप ने शादी कर ली है, यहाँ तक कि बच्चा भी है। शादी भी आप ने अपनी मर्जी से तो नहीं की होगी। घर वालों ने दबाव डाला होगा तभी शादी की होगी। अब आप घर वालों से कहिए कि जो भी परिणाम ह वह आप भुगतिए। यदि अदालत भरण पोषण का आदेश देती है तो उस की पालना भी आप के परिवार वाले करेंगे। वर्ना जब भी आप एक माह का भरण पोषण न देंगे आप को एक माह के लिए जेल भेज दिया जाएगा और महिने के पहले बाहर तब आएंगे जब बकाया राशि आप अदा कर देंगे। फिर अगले माह भरण पोषण बकाया हो जाएगा और फिर जेल जाने की तैयारी हो जाएगी। आप के घर वालों को आप के साथ इतनी ज्यादती नहीं करनी चाहिए थी। विवाह तो तभी करना चाहिए था जब आप खुद कमाने लगते और पत्नी व बच्चों के भरण पोषण में सक्षम हो जाते।

आप सोचिए, तीन साल तक आप की पत्नी ने अच्छा व्यवहार किया और अब तीन साल बाद बुरा व्यवहार कर रही है, इस का कारण क्या है? भारतीय परिवारों में लड़कों की किशोर पन में ही शादी कर दी जाती है। उस के बाद भी लड़का यदि कमाने नहीं लगता है तो सारे ताने उस की पत्नी को सहन करने होते हैं। यही कारण है कि आप की पत्नी ने पहले तो उन तानों को सहा होगा, फिर प्रतिरोध किया होगा और फिर वह मायके चली गयी।

बच्चा आप का है तो उस का भरण पोषण तो आप को देना होगा और पत्नी का भी। यह दोनों मिला कर 4 हजार से 10 हजार प्रतिमाह तक हो सकता है। आप घर वालों को बता दें कि आप जब तक पढ़ाई पूरी कर कमाने नहीं लगते यह सब तो परिवार को करना पड़ेगा। यही एक मात्र उपाय है। कमाने लगेंगे तो पत्नी भी आप के साथ आ कर रहने लगेगी।

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