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कर्मचारी का चरित्र सत्यापन

हमें सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के किसी कर्मचारी के चरित्र सत्यापन के संबंध में अनेक तरह से प्रश्न पूछे जाते हैं। हर प्रश्नकर्ता को उस के प्रश्न का पृथक से उत्तर देना संभव नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में नियोजन प्राप्त करते समय कर्मचारी द्वारा पूर्व में किसी अपराध के लिए अभियोजित किए जाने या दोष सिद्ध पाए जाने और दंडित किए जाने के तथ्य को छुपाने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (ए.आई.आर. 2016 सुप्रीमकोर्ट 3598)  के मामले में स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह स्थिति इस प्रकार है…

किसी अभ्यर्थी द्वारा दोषसिद्धि, गिरफ्तारी या किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के बारे में, सेवा में प्रवेश करने से पहले या बाद में नियोजक को दी गई जानकारी, सही होना चाहिए और आवश्यक जानकारी का कोई दमन या गलत उल्लेख नहीं होना चाहिए।

झूठी जानकारी देने के लिए सेवाओं की समाप्ति या उम्मीदवारी को रद्द करने का आदेश पारित करते समय, कर्मचारी द्वारा ऐसी जानकारी देते समय यदि कोई विशेष परिस्थितियाँ रही हों तो उन पर विचार कर सकता है। निर्णय लेने के समय नियोक्ता, कर्मचारी पर लागू सरकार के आदेशों / निर्देशों / नियमों को ध्यान में रखेगा।

यदि किसी आपराधिक मामले में शामिल होने की जानकारी को छुपाने या गलत जानकारी देने का मामला हो, जिसमें आवेदन / सत्यापन फॉर्म भरने से पहले ही दोषी ठहराया या बरी कर दिया गया था और ऐसा तथ्य बाद में नियोक्ता के ज्ञान में आता है, तो वह कोई भी निम्नलिखित में से मामले के लिए उपयुक्त कोई भी कदम उठा सकता है: –

  1. तुच्छ प्रकृति के मामलों में, जिनमें दोषसिद्धि दर्ज की गयी हो, जैसे कम उम्र में नारे लगाना, या एक छोटे से अपराध के लिए, जिसके बारे में अगर बता दिया गया होता तो भी कर्मचारी को पद के लिए अयोग्य नहीं माना गया होता, नियोक्ता अपने विवेक से गलत जानकारी देने या उसे छुपाने की कर्मचारी की गलती की अनदेखी कर सकता है।
  2. जहां दोषसिद्धि दर्ज की गई है जो प्रकृति में तुच्छ नहीं है, नियोक्ता कर्मचारी की उम्मीदवारी को रद्द कर सकता है या कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर सकता है।
  3. यदि तकनीकी आधार पर नैतिक अवमानना ​​या जघन्य / गंभीर प्रकृति के अपराध से जुड़े मामले में कर्मचारी पहले ही बरी हो चुका था, और यह पूरी तरह से बरी होने का मामला नहीं हो, या संदेह का लाभ दिया गया है, तो नियोक्ता उपलब्ध अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर पूर्ववृत्त के रूप में विचार कर सकता है, और कर्मचारी की निरंतरता के रूप में उचित निर्णय ले सकता है।
  1. ऐसे मामले में, जहाँ कर्मचारी ने एक निष्कर्षित आपराधिक मामले की सत्यता से घोषणा की है, नियोक्ता अभी भी पूर्ववृत्त पर विचार कर सकता है और उसे उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
  2. ऐसे मामले में जहाँ चरित्र सत्यापन में रूप में तुच्छ प्रकृति के आपराधिक मामले का लंबित होना कर्मचारी द्वारा घोषित किया गया है तब नियोक्ता मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, अपने विवेक से उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्णय ले सकता है।
  3. जहाँ कर्मचारी कई लंबित मामलों के संबंध में जानबूझकर तथ्य छुपाने का मामला हो वहाँ इस तरह की झूठी जानकारी देने को अपने आप में महत्वपूर्ण मान कर एक नियोक्ता उस व्यक्ति की नियुक्ति के आदेश को जिसके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित थे ,उचित नहीं मानते हुए उसे रद्द कर सकता है या सेवाओं को रद्द कर सकता है।

7.यदि आपराधिक मामला लंबित था, लेकिन फॉर्म भरने के समय उम्मीदवार को पता नहीं था, फिर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियुक्ति प्राधिकारी अपराध की गंभीरता को देखते हुए निर्णय ले सकता है।

  1. यदि कर्मचारी की सेवा में पुष्टि हो जाती है, तो तथ्यों को छुपाने या सत्यापन के रूप में गलत जानकारी प्रस्तुत करने के आधार पर सेवा से हटाने या बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले विभागीय जांच करना आवश्यक होगा।
  2. सूचनाएँ छुपाने या गलत सूचनाओं के निर्धारण के लिए सत्यापन / सत्यापन-प्रपत्र अस्पष्ट नहीं अपितु विशिष्ट होना चाहिए। ऐसी जानकारी जिसका विशेष रूप से उल्लेख किया जाना आवश्यक हो उसका खुलासा किया जाना चाहिए। यदि जानकारी नहीं मांगी जाए, लेकिन नियोक्ता के ज्ञान के लिए प्रासंगिक हो तो उस मामले में उद्देश्यपूर्ण तरीके से फिटनेस के मामले पर विचार किया जा सकता है लेकिन ऐसे मामलों में गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
  3. यदि किसी व्यक्ति को गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर दोषी ठहराए जाने से पहले, यह तथ्य उसके ज्ञान में लाया जाना और उसे सफाई का अवसर दिया जाना चाहिए।

न्यायालय में लंबित किसी प्रकरण को दूसरे न्यायालय में कैसे स्थानान्तरित कराया जाए?

समस्या-

सुधा ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे पति द्वारा मुझ पर तलाक प्रकरण किया गया है मैं अपने गम्भीर रूप से बीमार एवं वृद्ध माता के घर पर हूँ। दो अलग-अलग न्यायालयों द्वारा स्वीकृत भरण पोषण एवं अंतरिम भरण पोषण की राशि मेरे पति द्वारा हीला हवाली करने और न्यायालय के दखल के पश्चात मुझे प्रदान की जाती है। उक्त भरण पोषण राशियों की स्वीकृति के सम्बन्ध में मेरे पति द्वारा एक प्रकरण के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय मैं चुनौती प्रस्तुत की थी, जिस में उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा उक्त भरण पोषण राशियों को उचित एवं सही माना है। उक्त तलाक प्रकरण को मैं अपने घर से 300 कि.मी.दूर परिवार न्यायालय से स्थानीय ए डी.जे न्यायालय में स्थानांतरित करवाना चाहती हूँ, इसके लिये मुझे क्या करना होगा ?


समाधान-

प का विवाह विच्छेद का प्रकरण पति द्वारा हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। इस अधिनियम की धारा 21-ए में इस अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत प्रकरणों के स्थानान्तरण के उपबंध हैं। इस के अतिरिक्त इस अधिनियम के प्रकरणों पर दीवानी प्रक्रिया संहिता प्रभावी है। धारा 21-ए में उपबंधित है कि यदि धारा 10 और 13 के प्रकरण अलग अलग स्थानों पर प्रस्तुत किए गए हों तो बाद वाले मुकदमे को पहले वाले मुकदमे के स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है। इस के लिए स्थानान्तरण चाहने वाले व्यक्ति को उच्च न्यायालय में आवेदन करना होगा। धारा 24 दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी भी प्रकरण को किसी पक्षकार की सुविधा के लिए अपने अधीन किसी भी न्यायालय को स्थानान्तरित कर सकता है।

आप को चाहिए कि आप उक्त प्रकरण के स्थानान्तरण के लिए अपने उच्च न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत करें। जिस में वे कारण अंकित किए जाएँ जिनके आधार पर आप अपना प्रकरण किसी खास न्यायालय में स्थानान्तरित करना चाहती हैं। उच्च न्यायालय विपक्षी पक्षकार को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के उपरान्त स्थानान्तरण के सम्बंध में उचित आदेश पारित कर सकता है।

ऐसा कोई बन्दोबस्त नहीं कि आप के खिलाफ कोई मुकदमा न हो।

justiceसमस्या-

अजय साहू ने धमतरी, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी उम्र 50 वर्ष है, मेरे दो पुत्र हैं। मेरी जित नी भी पैतृक सम्पत्ति है मैंनें दोनों पुत्रों को बराबर हिस्सा दिया है। वर्तमान में जो कृषि भूमि है वह मेरी स्वअर्जित भूमि है। जिसे मैं अपने छोटे बेटे को देना चाहता हूँ जो मुझे अत्यंत प्रिय है। छोटे पुत्र की ही देख रेख में मैं अपना जीवन यापन कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ मेरी स्वअर्जित भूमि को मैं किसी को भी दान कर सकता हॅू अंतरित कर सकता हूँ। किसी के नाम कर सकता हूँ, विक्रय कर सकता हूँ, वसीयत कर सकता हूँ। मेरी स्वअर्जित भूमि में मेरा पूर्णतः अधिकार है। वर्तमान में मेरे स्वअर्जित भूमि में हिस्सा पाने के लिए मेरे बड़े पुत्र ने मुझ पर केस किया है। तहसील धमतरी, छ.ग. में 8 माह से केस चल रहा है अभी तक कोई सुनवाई नही हुई है केस और कब तक चलेगा मुझे पता नहीं। मुझे बार बार पेशी में जाने मे परेशानी हो रही है। मेरा आपसे यह सवाल है कि मेरी स्वअर्जित भूमि है जिसमे कानूनी मेरा पूर्णतः अधिकार है इस के बावजूद क्या मुझे केस लड़ना पड़ेगा। वर्तमान में तो मेरा बडा़ पुत्र तहसील मे केस किया है हो सकता है कि आगे चलकर जिला न्यायालय में राजस्व न्यायालय में सिविल कोर्ट में, हाई कोर्ट में, सुप्रीम कोर्ट में कहीं भी केस कर सकता है क्या उसके साथ साथ मुझे भी केस लड़ना पड़ेगा? मुझे भी परेशान होना पड़ेगा? मैं तो तहसील न्यायालय तक के ही केस में थक गया हूँ सर। पता नहीं आगे और किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। महोदय आपकी राय से ऐसा कुछ रास्ता नहीं है क्या जिस में मैं इन से बच सकूँ। मेरे बड़े पुत्र के द्वारा किया गया तहसील न्यायालय में केस को खारिज करवा सकूँ और भी अन्य न्यायालयों में अगर वो केस करे तो उसे मैं एक दो पेशी में ही खारिज करवा सकूँ। हमारे कानून में ऐसा कुछ नियम नहीं है क्या जिस से मैं इन केशों से बच सकूँ या ऐसा कोई कागजात बनवा सकता हूँ क्या जिससे मुझे इन सभी केसों से छुटकारा मिल सके या कुछ ऐसा नियम जिस से मेरा पुत्र मुझ पर केस ही ना कर सके। आपसे निवेदन है की जल्द से जल्द मेरा मार्ग प्रशस्त कीजिए इन मुसीबतों से मुझे बाहर निकालिए।

समाधान-

लोग दस-बीस साल तक या पीढ़ियों तक जमीन जायदाद के लिए लड़ते रहते हैं और आप हैं कि 8 माह में ही परेशान हो गए। अब यदि आप के पुत्र ने ही आप पर संपत्ति के लिए दावा किया है तो वह तो लड़ना ही पड़ेगा। इस लड़ाई से आप पीछा नहीं छुड़ा सकते।

संपत्ति का मामला दीवानी या राजस्व का मामला है। इन मामलों में पक्षकार को खुद पेशी पर उपस्थित होने की कोई जरूरत नहीं होती है। केवल जब मामले में पक्षकार के बयान होने हों या गवाहों को बयान के लिए साथ ले कर जाना हो तभी जरूरत होती है। शेष पेशियों पर खुद वकील भी आप की पैरवी कर सकते हैं। लेकिन जब आप पेशी पर न जाएँ तो इस बात का ध्यान रखें कि हर पेशी के दिन सुबह टेलीफोन पर वकील को बता दें कि आज आप के मुकदमे की पेशी है उसे वकील साहब को देखना है। पेशी के रोज शाम को या अगले दिन फोन कर के यह जरूर पूछें कि पेशी में क्या हुआ और अगली तारीख क्या पड़ी है। यदि आप दुर्ग में रह कर इतना कर सकते हैं तो फिर आप इस मुकदमे से परेशान न होंगे। आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के सुविधाएँ प्राप्त कर सकते हैं। वैसे भी दावा यदि आप के पुत्र ने किया है तो मामला उसे साबित करना है, आप को नहीं, आप की भूमिका मामूली है।

जैसा हल आप चाहते हैं वैसा कोई हल मिल भी जाए तो फिर ये अदालतें, ये जज, अहलकार, अदालतों के कर्मचारी, वकील और मुंशियों के पास तो काम ही नहीं रहेगा। वे क्या करेंगे? असल में व्यक्तिगत संपत्ति ऐसी चीज है जिस ने सारी दुनिया को उलझा रखा है। यह न होती तो दुनिया में कोई झगड़ा न होता। जब तक यह रहेगी ये झगड़े चलते ही रहेंगे।

कोई अपनी पत्नी को उस की इच्छा के विरुद्ध रहने को बाध्य नहीं कर सकता।

husband wifeसमस्या-
छत्तीसगढ़ से बिजय कुमार ने पूछा है-

मेरी बहिन की शादी 11.03.2011 को हुई थी। शादी के 6 माह बाद पता चला कि लड़का काम पर आज तक नहीं जाता है और अगर मेरी बहिन सिलाई क्लास जाती है तो उसे भी काम पर नहीं जाने देता है। जिस के कारण घर का खर्चा चल नहीं पा रहा है। सिस्टर को मम्मी पापा से, भाई, बहिन से मिलने नहीं जाने देता है। जीजा धमकी देता है कि अगर तुम घर से बाहर निकलोगी तो मैं अपना एक्सिडेंट करवा कर तुम्हें और तुम्हारे परिवार को झूठे इल्ज़ाम मे फसा दूंगा। जीजा थोड़ा हाफ मेंटल लगता है। बहिन के साथ बहुत ही बुरा व्यहारा किया जाता है। अब मेरी बहिन माँ और पापा के पास जाना चाहती है। वापस फिर कभी नहीं आना चाहती है। क्या करें? हमारा आर्थिक हालत अच्छी नहीं है कि हम कोर्ट जाकर मुक़दमा लड़ें।

समाधान-

प की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है तो भी कोई बात नहीं है। आप की बहिन जब चाहे अपने पति को छोड़  कर अपने  माता पिता के घर आ सकती है। यदि संभव हो तो वह अपने ससुराल के थाने में यह रिपोर्ट दर्ज करवा कर आए कि वह अपने पति के परेशान करने और घर खर्च नहीं देने के कारण तंग आ कर अपने मायके जा रही है और अपने खुद के सामान के अतिरिक्त कुछ नहीं ले जा रही है।

प के जीजा की जो स्थिति आप ने बताई है वह बिलकुल सही है तो ऐसे व्यक्ति के साथ किसी भी स्त्री का जीवन बिता सकना दुष्कर है। कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी को जबरन अपने पास रोक कर नहीं रख सकता।

दि आप का जीजा पुलिस की कोई कार्यवाही करता है तो आप की बहिन बयान दे सकती है कि उस की हालत उस के पति ने खराब कर दी है इस कारण वह उस के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती है। यदि उस का पति चाहे तो उस से तलाक ले सकता है। यदि कोई अदालती कार्यवाही आप की बहिन के विरुद्ध होती है तो आप की बहिन अदालत को कह सकती है कि उस के पास मुकदमा लड़ने के लिए पैसा नहीं है। इस कारण उसे सरकारी खर्च पर वकील दिलाया जाए और अदालत आने जाने तथा अदालत का अन्य खर्च उस के पति से दिलाया जाए। आप की बहिन चाहे तो अपने भरण पोषण की मांग भी कर सकती है। यदि उस का पति किसी भी प्रकार का मुकदमा करता है तो उसी मुकदमे में वह यह आवेदन दे सकती है कि उसे उस के पति से अदालत का खर्च, आने जाने का खर्च और भरण पोषण दिलाया जाए।

मुकदमे का निर्णय होने तक शान्ति से प्रतीक्षा कीजिए . . .

Havel handcuffसमस्या-
हैदरगढ़, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश से यू.एस.पाण्डेय ने पूछा है –   

मेरा एक मकान ग्राम खेमीपुर, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में स्थित है। मेरे मकान के सहन के एक हिस्से पर पड़ौस में रहने वाले एक पडौसी ने आज से तीन वर्ष पहले कब्ज़ा कर लिया है।  हम पुलिस के पास गए और पुलिस ने धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत केस दर्ज कर दिया जो एसडीएम के न्यायालय में चल रहा है। अभी कोई फैसला नहीं हुआ। लेकिन विरोधी मेरी जमीन पर काबिज है और कब्ज़ा करने कि कोशिश कर रहे हैं। जिसके लिए पुलिस के पास जाते हैं तो विरोधी से पैसा लेते हैं हमें धमकी देते हैं। ज्यादा कोशिश करो तो 107, 151 धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में बंद कर देते हैं। फ़िलहाल हमें न पुलिस से न एसडीएम से न्याय मिल पा रहा है। क्या करें, बहुत परेशान हैं।

समाधान-

प के मकान की जमीन पर पड़ौसी ने कब्जा कर लिया। पुलिस ने धारा 145 धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में मामला दर्ज कर के न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर दी। इस मामले में एसडीएम के न्यायालय को यह निर्णय करना है कि क्या विवादित तिथि को जिस दिन आप पड़ौसी द्वारा आप की भूमि पर कब्जा करना बताते हैं उस दिन के पहले आप का कब्जा था और पडौसी ने जबरन कब्जा कर लिया। यदि वे ऐसा पाते हैं तो भूमि का कब्जा आप को सौंपने का आदेश दिया जा सकता है। लेकिन यह आदेश सुनवाई दोनों पक्षों के की साक्ष्य होने के उपरान्त ही दिया जा सकता है। आप ने यह नहीं बताया कि मुकदमा किस स्तर पर चल रहा है। इस कारण कुछ कह सकना असंभव है।

म तौर पर न्यायालयों में मुकदमों की संख्या बहुत होती है। एसडीएम एक प्रशासनिक अधिकारी भी होता है जो प्राथमिक रूप से प्रशासनिक कार्यों को अधिक महत्व देता है। इस कारण से इस तरह के मामलों में बहुत देरी होती है। इस के लिए राज्य में अधिक न्यायालय होना चाहिए। प्रशासनिक अधिकारियों को इस तरह के न्यायालय संबंधी कार्य नहीं सोंपे जाने चाहिए। ये सभी राज्य में न्यायिक सुधारों से ही संभव है। लेकिन पीड़ित लोग राज्य से इस की मांग नहीं करते। यह कभी राजनीति का विषय नहीं बनता। वोट मांगने आने पर कभी लोग इस बात की मांग नहीं करते कि किसी भी न्यायालय में मुकदमे का निर्णय एक वर्ष में हर हाल में होने जैसी व्यवस्था होनी चाहिए। इस कारण से कोई भी सरकार न्यायिक सुधारों की तरफ कोई ध्यान नहीं देती है। इसी कारण से न्यायार्थी भटकते रहते हैं।

ह अधिक भूमि पर कब्जा नहीं कर सकता क्यों कि न्यायालय में यह स्थिति तो स्पष्ट ही होगी कि किस भूमि पर आप का कब्जा है और किस भूमि पर उस का। यदि उस के कब्जे की विवादित भूमि पर आप कब्जा करने का प्रयत्न करेंगे तो पुलिस निश्चित रूप से आप के विरुद्ध ही कार्यवाही करेगी न कि उस के विरुद्ध। आप के मामले में निर्णय तो एसडीएम के न्यायालय से ही होगा। आप एक काम कर सकते हैं कि अपने वकील को कह सकते हैं कि वह न्यायालय पर जल्दी निर्णय का दबाव बनाए। चूंकि आप के पड़ौसी का वर्तमान में कब्जा है इस कारण से वह कब्जा आप को न्यायालय के निर्णय के उपरान्त ही मिल सकेगा। तब तक आप को शान्त हो कर बैठना ही पड़ेगा।

एक में सफलता पर अन्य मुकदमों में प्रतिरक्षा के मामले में अगंभीर न हों।

sexual-assault1समस्या-

रायपुर, छत्तीसगढ़ से गौतम ने पूछा है-

तीसरा खंबा को बहुत बहुत धन्यवाद कि आप की सलाह के अनुसार मेरे मित्र ने वकील के दबाव में लगाया गया आवेदन वापस ले लिया और विवाह को चुनौती देकर विजय प्राप्त की उस महिला का धारा 125 दं.प्र.संहिता का आवेदन निरस्त कर दिया गया।  उसने 498-ए व 294,323,506 भा.दं.सं. का  मिथ्या मामला भी 125 के आवेदन के तुरंत बाद लगाया था जिसमे अब उसकी गवाही होनी है। इस मामले में भी उसने स्वयं को पत्नी बताया है। क्या धारा 125 में जो आदेश हुआ है उस का इस मामले पर क्या असर होगा? क्या मेरा मित्र अब विवाह करने हेतु पूरी तरह स्वतंत्र है?

समाधान-

प को व आप के मित्र को बधाई कि उन्हों ने एक मुकदमे में सफलता प्राप्त की। किन्तु इस सफलता से आप को व आप के मित्र को निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। धारा 498-ए व 294,323,506 भा.दं.सं. में से केवल 498-ए ही एक धारा है जो विवाह पर आधारित है। यह एक अपराधिक मुकदमा है और इस में अपराध व उस से जुड़े तथ्यों को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है। वे यह साबित नहीं कर सकते कि विवाह हुआ था। इस कारण से धारा 498-ए का अपराध तो आप के मित्र के विरुद्ध साबित नहीं होगा। लेकिन गवाहों के बयानों के समय गंभीरतापूर्वक और सावधानी से गवाहों का प्रतिपरीक्षण किया जाना आवश्यक है।

न्य धाराओं 294,323,506 भा.दं.सं. में वर्णित अपराध विवाह से संबंधित नहीं हैं। यदि गवाही में ये सब साबित हुए तो आप के मित्र को दंडित किया जा सकता है। इस कारण से इस मुकदमे को भी पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए और सभी आरोपों को मिथ्या साबित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

किसी भी निर्णीत कानूनी विवाद में पूरी पत्रावली का अध्ययन किए बिना कोई सलाह दिया जाना सम्भव नहीं है।

Lawyers in courtसमस्या-

कैथल, हरियाणा से विजय कुमार ने पूछा है-

मेरे दादा जी की मृत्यु 1988 में हो गई थी, वो एक वसीयत कर गए थे।  मार्च 1987 में जो कि रजिस्टर नहीं थी, गवाहों के (अंगूठे) उस वसीयत पर लगे हैं, वह वसीयत मेरे पिता जी के पास थी, उन्हों ने उस समय ध्यान नहीं दिया। वसीयत में मेरे दादाजी ने सारी प्रॉपर्टी अपने 4 लड़कों के नाम लिखी थी।  मेरे चाचाओं को उसके बारे में पता नहीं था। कुल ज़मीन 5 किले 4 कनाल है। मेरे पिताजी 4 भाई ओर उनकी 3 बहनें हैं। ज़मीन 5 किले 4 कनाल में मेरी 3 बुआ के नाम भी चढ़ गए हैं।  मेरी 3 बुआ ने मेरे पिताजी को छोड़कर मेरे 3 चाचा के नाम अपना हिस्सा कर दिया। मेरे पिता जी ने उस वसीयत के आधार पर कोर्ट मे केस किया, पर मेरे पिता जी वह केस हार गए।  वसीयत पर जो हस्ताक्षर और अंगूठे थे वे मेरे पिताजी ने साबित कर दिये थे।  अब मेरे पिता जीने आगे अपील कर रखी है।  अब केस का क्या होगा? उस ज़मीन पेर धारा 145/146 लगी हुई है।

समाधान-

प के पिता जी के पास वसीयत थी तो उन्हें दादा जी के देहान्त के तुरन्त बाद उस के आधार पर कृषि भूमि में नामान्तरण कराने चाहिए थे। मुकदमे में आप के पिता जी को वसीयत को साबित करना था। केवल गवाहों के हस्ताक्षरों को साबित कर देने मात्र से वसीयत साबित नहीं होती है। उस के लिए वसीयत करने की सभी शर्तों का साबित किया जाना जरूरी है।

किसी भी मामले में जहाँ न्यायालय का निर्णय हो चुका हो और अपील लंबित हो तब तक कोई राय या सलाह नहीं दी जा सकती जब तक कि उस मुकदमे की पूरी पत्रावली का अध्ययन नहीं कर लिया जाए। यहाँ तीसरा खंबा में हम इस तरह की समस्याओं का हल प्रस्तुत नहीं कर सकते। यहाँ हम केवल लोगों की कानून से सम्बन्धित समस्याओं पर सलाह देते हैं कि उन के पास क्या कानूनी उपाय है।

प को अपने ही वकील से यह प्रश्न पूछना चाहिए और अपनी संतुष्टि करनी चाहिए। यदि आप को लगता है कि आप का वकील अक्षम सिद्ध हो  रहा है तो किसी अन्य अनुभवी वकील को मुकदमे की पूरी पत्रावली ले कर मिलें। वह आप को उचित सलाह दे सकता है।

सचाई साबित करने के लिए जिरह (Cross Examination) का प्रयोग करें।

समस्या-

गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से सतीश कुमार जानना चाहते हैं –

मेरे और मेरी पत्नी के मध्य वैवाहिक मतभेद विवाह के पश्चात से ही चल रहे हैं। जिस सम्बन्ध में मैं ने तलाक हेतु एक वाद परिवार न्यायालय में डाल रखा है और मेरी पत्नि ने मेरे विरूद्ध दहेज मांगे जाने के लिये एक परिवाद कर रखा है।  जिसमें मेरी पत्नी द्वारा वर्ष 2011 तक मेरे साथ रहना दिखाया गया है जबकि लगभग 3 वर्षो से मैं व पत्नी साथ साथ नहीं रह रहे हैं।  मेरी पत्नि अपने मायके में ना रहकर नौएडा में किसी स्थान पर रह रही है।  साक्ष्य छुपाने की नियत से  वह किसी और की आई.डी. का मोबाईल नम्बर इस्तेमाल कर रही है।  मैं मोबाईल के माध्यम से उसकी लोकेशन पता चलाना चाहता हूँ।  परन्तु मोबाईल किसी और के नाम होने पर पत्नि इस बात का फायदा उठा सकती है कि यह मोबाईल उसका नहीं है। और ना ही यह कॉल डिटेल उसकी है। उक्त परिस्थिति में मैं किस प्रकार अपनी पत्नी के नौएडा में रहने सम्बन्धी जानकारी सर्विलान्स के माध्यम से प्राप्त कर सकता हूँ?

समाधान-

cross examinationप इंटरनेट पर सर्च कर के उस मोबाइल नं. का राज्य व कंपनी पता कर सकते हैं।  फिर उस कंपनी को आप लिख सकते हैं कि इस नंबर से मेरी पत्नी लगातार मुझ से व अन्य व्यक्तियों से बात करती रही है, मेरे व पत्नी के मध्य अदालत में विवाद चल रहे हैं, इस कारण यह बताया जाए कि यह मोबाइल नं. किस व्यक्ति को दिया हुआ है।  ऐसी सूचना आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांग सकते हैं।  लेकिन फिर भी यह जानकारी आप को यह साबित करने के लिए बहुत कमजोर होगी कि आप की पत्नी आप के साथ पिछले तीन साल से नहीं रही है।

प के मुकदमे में निश्चय ही आपने किसी वकील की सलाह और सहायता प्राप्त की होगी।  आप को उस से विमर्श करना चाहिए। यह साबित करने की जिम्मेदारी आप की पत्नी की है कि वह आप के साथ कहाँ कहाँ रही है? यदि मुकदमे में आप की साक्ष्य पहले हो तो आप साक्ष्य समाप्त करने के समय रिबुटल साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार सुरक्षित रखें।  बाद में जब आप की पत्नी साक्ष्य के लिए आए तो उस से जिरह में प्रश्न पूछें कि वह कहाँ कहाँ आप के साथ रही है? आप का कौन कौन मित्र घर पर आता रहा है? वह मकान कहाँ है? घर की लोकेशन क्या है? आसपास के मकान कैसे हैं? उन में कौन कौन रहता है? आप काम पर कब जाते हैं? आप के दफ्तर आदि का विवरण पूछें। बाद में आप अपनी गवाही में अपने मुहल्ले व दफ्तर के लोगों के बयान करवा सकते हैं कि आप को वे तीन साल से अकेले रहते देख रहे हैं, इस बीच आप की पत्नी वहाँ आ कर नहीं रही है।

किसी भी संयुक्त संपत्ति में अपना हिस्सा बिना विभाजन के भी विक्रय किया जा सकता है

समस्या-

डॉ. आर सी गौड़, जयपुर, राजस्थान से पूछते हैं-

मेरे पिता की कुछ खेती की जमीन है।  पिताजी का 1998 में देहान्त हो गया है। 1962 में उक्त कृषि भूमि के खातेदारी अधिकार उन के चार पुत्रों के नाम (प्रत्येक का चौथाई हिस्सा) स्थानान्तरित कर दिए गए।  1997 में मेरे सब से बड़े भाई ने एसडीओ कोर्ट में 62.5 प्रतिशत हिस्से के लिए मुकदमा कर दिया। उन की भी मृत्यु 1998 में हो गई। उन के पाँच पुत्र, पत्नी और दो पुत्रियाँ हैं। उन सब ने एक पुत्र को मुकदमा लड़ने के लिए अधिकृत कर दिया।  एसडीओ कोर्ट से 2011 में मुकदमा खारिज कर दिया गया। अधिकृत पुत्र ने उक्त निर्णय की अपील कर दी। जिस में हमारे साथ साथ अपने भाई, बहन और माँ को भी पक्षकार बनाया। संभवतः मुकदमे में देरी करने के लिए। लेकिन एक वर्ष के उपरान्त भी उस के परिजनों को मुकदमे के समन तामील नहीं हुए हैं। मुकदमे में कोई प्रगति नहीं हो रही है। हम तीन भाई अपने हिस्से की जमीन बेचना चाहते हैं। मेरा एक भाई बहुत बीमार है उसे पैसों की बहुत जरूरत है। लेकिन अपील लंबित होने के कारण हम जमीन नहीं बेच पा रहे हैं। आप बताएँ हम क्या करें।

समाधान-

प के पिता की मृत्यु के बाद ही तो आप भाइयों के नाम भूमि के खातेदारी अधिकार स्थानान्तरित हुए होंगे। इस तरह आप के पिता की मृत्यु तिथि 1962 के पूर्व की होनी चाहिए। संभवतः आप से गलत टाइप हो गई होगी।

प के भाई ने 1997 में 62.5 प्रतिशत भूमि के लिए दावा किया। यह दावा किस आधार पर किया गया यह आप ने नहीं बताया है। हो सकता है यह इस आधार पर किया हो कि जमीन पैतृक संपत्ति थी और आप के पिता जी को उन के दादा जी  से प्राप्त हुई थी और आप के सब से बड़े भाई का जन्म 1956 के पूर्व का है और अन्य सभी भाइयों का 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के बाद का। खैर, उस संबंध में आप का कोई प्रश्न नहीं है।

प के बड़े भाई का दावा खारिज हो गया है। उस की अपील की गई है। यदि अपील में किसी तरह का स्थगन आदेश नहीं है तो आप शेष तीन भाई बिना विभाजन के भी अपना हिस्सा बेच सकते हैं। अपने हिस्से का पंजीयन क्रेता के नाम करवा सकते हैं और यदि जमीन का कब्जा आप के पास है तो कब्जा भी क्रेता को हस्तांतरित कर सकते हैं। उस में कोई बाधा नहीं है। अपील में आप के साथ ही क्रेता भी पक्षकार बन सकता है। आप को इस काम में सिर्फ इतनी बाधा हो सकती है कि क्रेता इस अपील के चलते खरीदी गई भूमि के विक्रय की कुछ राशि रोक ले। यदि आप को इस तरह का कोई क्रेता मिल जाए तो आप उसे अपने हिस्से की जमीन बेच सकते हैं।

क्त मुकदमे में सभी का प्रतिनिधित्व करने के लिए आप के बड़े भाई के जिस पुत्र को सब ने अधिकृत किया हुआ है और जिसने अपील की है उस के लिए यह कह सकते हैं कि चूंकि उक्त अधिकार पत्र खारिज नहीं किया गया है और अपील दावे का ही अगला रूप है। इस लिए उस अधिकृत पुत्र की अपील से संबंधित दावे में जिन लोगों ने उसे अधिकृत किया हुआ था उन्हें अपील में अपीलान्ट की उपस्थिति के आधार पर अपील की सूचना होना मानते हुए मुकदमे को आगे बढ़ाया जाए। आप इस हेतु अपने वकील से सलाह कर के आवेदन पत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस आवेदन में आप यह भी कह सकते हैं कि जानबूझ कर मामले को लटकाने और आप तीन भाइयों को हैरान, परेशान और ब्लेक मेल करने के लिए इस तरह की अपील प्रस्तुत कर उसे फिजूल चलाया जा रहा है।

पत्नी पतिगृह छोड़, मुकदमा क्यों करती है?

समस्या-

मैंने आज तक जहाँ भी देखा है हर मामले में पत्नी अपने मायके में जाकर पति के ऊपर मुकदमा करती हुई मिली है।  आपके तीसरा खंबा में भी जितने मामले मैंने पढ़े है उन में भी पत्नी ने किसी न किसी कारण से पति का घर छोड़ अपने मायके जाकर पति के ऊपर मुकदमा किया है।  लेकिन मेरे मामले में बिलकुल उलट है मेरी पत्नी ने मेरे ही घर में रह करके मेरे ऊपर 498ए और घरेलू हिंसा अधिनियम में झूठे मुकदमे किए हैं।  मुझे मेरे ही घर से निकाल दिया है और खुद मेरे ही घर में मेरे बच्चों के साथ रह रही है। खुद 10,000/- रुपए महिने की नौकरी कर रही है।  क्या इस तरह के मामलों के लिए कोई खास धारा नहीं है? ये तो सभी जानते हैं कि पति के साथ गलत हो रहा है, पर पुलिस और प्रशासन कुछ करने को तैयार नहीं होता है।  मेरी सुनने वाला कोई नहीं है। घरेलू हिंसा अधिनियम में तो अदालत ने एक-तरफ़ा कार्यवाही करते हुए मुझ से अंतरिम खर्चा दिलाने की अंतिम 24.07.2012 दी है।  अब आप ही बताएँ मैं क्या करूँ?

-कमल हिन्दुस्तानी, हिसार, हरियाणा

समाधान-

त्नी क्यों पतिगृह छोड़ कर मायके जाती है और वहाँ जा कर मुकदमा क्यों करती है?  यह प्रश्न कानूनी कम और सामाजिक अधिक है।  इस मामले में सामाजिक अध्ययन किए जाने चाहिए जिस से उन कारणों का पता लगाया जा सके कि ऐसा क्यों हो रहा है?  जब तक इस तरह के सामाजिक अध्ययन समाज विज्ञानियों द्वारा नहीं किए जाएंगे और कोई अधिकारिक रिपोर्टें समाज के सामने नहीं होंगी तब तक उन कारणों के उन्मूलन और कानूनो के कारण हो रहे पति-उत्पीड़न का उन्मूलन संभव नहीं है।  वर्तमान में कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है यह सभी मानते और समझते हैं।  लेकिन कानूनों में कोई त्रुटि भी नहीं है जिस से उन्हें बदले या संशोधित करने का मार्ग प्रशस्त हो।  धारा 498-ए में बदलाव लाने के प्रयास जारी हैं।  इस संबंध में विधि आयोग ने प्रयास किए हैं और हो सकता है कि उन प्रयासों के नतीजे शीघ्र आएँ।  लेकिन यदि कानूनों में परिवर्तन हुए तो वे परिवर्तन की तिथि से ही लागू होंगे।  आज जिन लोगों के विरुद्ध मुकदमे चल रहे हैं उन्हें उन परिवर्तनों का लाभ नहीं मिलेगा।

कानूनों के दुरुपयोग की समस्या दो तरह की है।  धारा 498-ए में कोई बुराई नहीं है लेकिन पहली समस्या तो सामाजिक है। किसी पत्नी या बहू के साथ इस धारा के अंतर्गत मानसिक या शारीरिक क्रूरता का बर्ताव किए जाने पर अपराध बनता है।   लेकिन यदि आप ने एक बार भी अपनी पत्नी पर थप्पड़ मार दिया या किसी और के सामने यह कह भर दिया कि थप्पड़ मारूंगा तो वह भी क्रूरता है।  अब आप देखें कि भारत में कितने पुरुष ऐसे मिलेंगे जिन्हों ने इस तरह का बर्ताव अपनी पत्नी के प्रति नहीं किया होगा? ऐसे पुरुषों की संख्या नगण्य होगी। इस का अर्थ हम यही ले सकते हैं कि हमारा समाज हमारे कानून की अपेक्षा बहुत पिछड़ा हुआ है।  लेकिन भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिस के लिए यही कानून उपयुक्त है।  हमारे सामने यह चुनौती है कि हम हमारे समाज को कानून की इस स्थिति तक विकसित करें।  एक बार एक प्रगतिशील कानून का निर्माण करने के बाद उस से पीछे तो नहीं ही हटा जा सकता।  कुल मिला कर यह एक सामाजिक समस्या है।

दूसरी समस्या पुलिस के व्यवहार के संबंध में है।  जब कोई महिला अपने पति के विरुद्ध शिकायत करना चाहती है तो वह किसी वकील से संपर्क करती है।  वकील को भी काम चाहिए।  वह महिला को उस के पति को परेशान करने के सारे तरीके बताता है, यहाँ तक कि वकीलों का एक ऐसा वर्ग विकसित हो गया है जो इस तरह के मामलों का स्वयं को विशेषज्ञ बताता है।  वह महिला को सिखाता है और सारे प्रकार के मुकदमे दर्ज करवाता है।  मामला पुलिस के पास पहुँचता है तो पुलिस की बाँछें खिल जाती हैं।  पुलिस को तो ऐसे ही मुकदमे चाहिए जिस में आरोपी जेल जाने से और सामाजिक प्रतिष्ठा के खराब होने से डरता है।  ऐसे ही मामलों में पुलिसकर्मियों को अच्छा खासा पैसा बनाने को मिल जाता है।  जो लोग धन खर्च कर सकते हैं उन के विरुद्ध पुलिस मुकदमा ही खराब कर देती है, उन का कुछ नहीं बिगड़ता और जो लोग पुलिस को संतुष्ट करने में असमर्थ रहते हैं उन्हें पुलिस बुरी तरह फाँस देती है।  इस तरह यह समस्या कानून की नहीं अपितु पुलिस और सरकारी मशीनरी में फैले भ्रष्टाचार से संबंधित है।  कुल मिला कर सामाजिक-राजनैतिक समस्या है।  इस के लिए तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना पड़ेगा।

क बार पुलिस जब न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो न्यायालयों का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे उस मामले का विचारण करें।  देश में न्यायालय जरूरत के 20 प्रतिशत से भी कम हैं।  विचारण में बहुत समय लगता है और यही समय न केवल पतियों और उन के रिश्तेदारों के लिए भारी होता है अपितु पति-पत्नी संबंधों के बीच भी बाधक बन जाता है।  तलाक का मुकदमा होने पर वह इतना लंबा खिंच जाता है कि कई बार दोनों पति-पत्नी के जीवन का अच्छा समय उसी में निकल जाता है।  जब निर्णय होता तो नया जीवन आरंभ करने का समय निकल चुका होता है। कुल मिला कर समस्या सामाजिक-राजनैतिक है और सामाजिक-राजनैतिक तरीकों से ही हल की जा सकती है।  न्यायालय केवल कानून की व्याख्या कर सकते हैं, वे कानून नहीं बना सकते।

ब आप के मामले पर आएँ।  आप की पत्नी ने आप को अपने ही घर से कैसे निकाल दिया यह बात समझ नहीं आती।  या तो आप ने किसी भय से खुद ही घर छोड़ दिया है, या फिर आप ने वह घऱ अपनी पत्नी के नाम से बनाया हुआ हो सकता है।  मुझे कोई अन्य कारण नहीं दिखाई देता है।  यदि घर आप का है तो आप को वहाँ रहने से कौन रोक रहा है?  जब तक वह आप की पत्नी है आप उसे निकाल भी नहीं सकते।  आप पत्नी से तलाक ले लें तो फिर आप को यह अधिकार मिल सकता है कि आप उसे अपने मकान में न रहने दें। यह सब निर्णय हो सकते हैं लेकिन अदालतें कम होने के कारण इस में बरसों लगेंगे। यही सब से बड़ा दुख है और समस्या है।  पर इस का हल भी राजनैतिक ही है।  पर्याप्त संख्या में न्यायालय स्थापित करने का काम तो सरकारों का ही है और सरकारें सिर्फ वे काम करती हैं जिन के कारण राजनैतिक दलों को वोट मिलते हैं। जिस दिन राजनैतिक दलों को यह अहसास होगा कि पर्याप्त अदालतें न होने के कारण उन्हें वोट नहीं मिलेंगे उस दिन सरकार पर्याप्त अदालतें स्थापित करने का काम कर देंगी।

रेलू हिंसा के मामले के एक-तरफा होने का कारण तो केवल यही हो सकता है कि आप स्वयं सूचना होने के बाद भी न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए हैं या हो गए हैं तो फिर अगली पेशियों पर आप स्वयं या आप का कोई वकील न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ।  ऐसे में न्यायालय के पास इस के सिवा क्या चारा है कि वह एक-तरफा कार्यवाही कर के निर्णय करे।  आप को सूचना है तो आप स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर एक-तरफा सुनवाई किए जाने के आदेश को अपास्त करवा सकते हैं।  उस के बाद न्यायालय आप को सुन कर ही निर्णय करेगा।  यदि आप की पत्नी की आय 10,000/- रुपया प्रतिमाह है और आप इस को न्यायालय के समक्ष साबित  कर देंगे तो न्यायालय आप की पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं दिलाएगा।  लेकिन आप के बच्चे जिन्हें वह पाल रही है उन्हें पालने की जिम्मेदारी उस अकेली की थोड़े ही है।  वह आप की भी है।  न्यायालय बच्चों के लिए गुजारा भत्ता देने का आदेश तो आप के विरुद्ध अवश्य ही करेगा।

 

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