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दीवानी वाद का आर्थिक क्षेत्राधिकार उस में किए गए वाद के मूल्यांकन से निर्धारित होगा।

rp_property1.jpgसमस्या-

मानस ने रुद्रपुर, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे नानाजी A ने अपने भाई B को आपसी स्नेह के चलते अपने घर के एक हिस्से में रहने की जगह दी (लाइसेंस दिया बिना किसी लेनदेन के)। B, B की पत्नी और बेटे BS का देहांत हो चुका है, लेकिन अब BS की पत्नी उतने हिस्से को अपने नाम फ्रीहोल्ड कराना चाह रही है। हम उनके लाइसेंस को रद्द करते हुए उनके ऊपर बेदखली का वाद चलाना चाहते हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में। कृपया मार्गदर्शन करें की किन परिस्थितियों और कारणों में बेदखली वाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में दायर हो सकता है?

समाधान

कोई भी दीवानी वाद उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना होता है जिसे उसे सुनने का क्षेत्राधिकार होता है। संपत्ति से संबंधित वाद का क्षेत्राधिकार उस न्यायालय को होता है जिस न्यायालय के अधिक्षेत्र में वाद से संबंधित संपत्ति स्थित होती है, यदि वाद से संबंधित संपत्तियाँ एकाधिक न्यायालयों के अधि क्षेत्र में स्थित हों तो उन में से किसी भी न्यायालय के समक्ष वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

म तौर पर कम मूल्य के वाद प्रारंभिक दीवानी न्यायालय अर्थात सिविल जज के न्यायालय को प्रस्तुत किए जाते हैं, उस से अधिक मूल्य के वाद वरिष्ठ सिविल जज को, उस से अधिक मूल्य के वाद जिला जज को तथा असीमित मूल्य वाले वाद कहीं जिला जज को और कहीं उच्च न्यायालय को प्रस्तुत किए जाते हैं। हर राज्य में यह क्षेत्राधिकार भिन्न भिन्न प्रकार से निर्धारित किए गए हैं। आप को जानकारी करना चाहिए कि आप के राज्य में दीवानी न्यायालयों की आर्थिक अधिकारिता क्या है। यह आप अपने जिला न्यायालय के कार्यालय से जान सकते हैं।

मान लीजिए आप के जिला जज की अधिकारिता 5 लाख से असीमित मूल्य तक के दीवानी वाद सुनने की है तो जिला जज के यहाँ प्रस्तुत किए गए वाद का मूल्य 5 लाख या उस से अधिक का होना चाहिए। यदि आप अपने वाद का मूल्यांकन 5 लाख से अधिक का करते हैं तो आप का वाद जिला जज के यहाँ प्रस्तुत किया जा सकता है। चूंकि संपत्ति आप की है इस कारण मकान के जिस हिस्से में लायसेंसी निवास कर रहा है उस का मूल्यांकन आप कर सकते हैं। आप जो भी बाजार मूल्य अपने वाद में उस संपत्ति का घोषित करेंगे उसी के आधार पर वाद मूल्य माना जाएगा और उसी आधार पर क्षेत्राधिकार तय होगा और उसी के अनुरूप आप को न्यायालय शुल्क भी अदा करना होगा।

आर्थिक क्षेत्राधिकार न होने पर मुकदमा सही क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय में प्रस्तुत करने हेतु लौटा दिया जाएगा।

rp_judge3.jpgसमस्या-

रज़ाउल हक़ ने संभल, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने 3 साल पहले अपनी माँ से खेती की जमीन का बैनामा कराया था और अपनी माँ को 20 लाख रूपये दिए। जमीन का दाखिल ख़ारिज भी होगया। 15 दिन पहले मेरी माँ का देहांत होगया। मेरा एक बड़ा भाई है उस से माँ नाराज़ रहती थी। अब भाई ने सिविल जज (जू0डी0)के यहाँ यह दावा किया है मैंने माँ के बदले किसी और को रजिस्ट्रार के सामने लेजाकर बैनामा कराया है। जब कि मेरा बैनामा बिलकुल सही है। इस बैनामे में 2 लाख 10 हज़ार की स्टाम्प लगी थी। अब मैं पूछना चाहता हूँ कि 1- क्या सिविल जज (जू0डि0) इतनी मालियत का मुकदमा सुन सकता है? 2- इस मुकदमे में क्या जवाब दाखिल करना चाहिए?

समाधान

हाँ तक आर्थिक क्षेत्राधिकार का प्रश्न है, हमारी जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में जूनियर डिविजन सिविल जज को 25000/- और सीनियर डिविजन सिविल जज को असीमित आर्थिक क्षेत्राधिकार है? इस तरह यदि आपका मुकदमा जूनियर डिविजन सिविल जज के न्यायालय में है तो उसे इस मुकदमे को सुनने का क्षेत्राधिकार नहीं है। वैसे उत्तर प्रदेश सिविल रूल्स के नियम 19 में यह प्रावधान है कि प्रत्येक न्यायालय में एक फार्म रखा जाएगा जिस में यह प्रदर्शित होगा कि उस न्यायालय का आर्थिक व अन्य क्षेत्राधिकार क्या है? जिस न्यायालय में आप का मुकदमा लंबित है उस न्यायालय के पेशकार (रीडर) से आप पूछ सकते हैं कि उस न्यायालय का आर्थिक क्षेत्राधिकार क्या है? लेकिन यदि इस न्यायालय को क्षेत्राधिकार न हुआ तो भी न्यायालय मुकदमे के किसी भी स्तर पर इस वाद को वादी को सही क्षेत्राधिकार के न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए लौटा सकता है। हमें लगता है कि आप के भाई ने पंजीकृत विक्रय पत्र को निरस्त कराने का वाद दाखिल करने के स्थान पर और कोई वाद प्रस्तुत किया है, यदि ऐसा है तो अन्त में यह निरस्त हो जाएगा।

आप को विक्रय पत्र आप की माँ ने स्वयं निष्पादित किया है इस कारण आप को डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। विक्रय पत्र पंजीकृत है, उस पर गवाहों को और उसे निष्पादित करने वाली आप की माताजी के पहचान कर्ताओं के हस्ताक्षर हैं। आप उन की गवाही से प्रमाणित कर सकते हैं कि निष्पादन करने वाली आपकी माताजी ही थीं न कि कोई अन्य स्त्री। फिर यह प्रमाणित करने का दायित्व वादी का है कि विक्रय पत्र आप की माताजी ने नहीं अपितु किसी अन्य स्त्री ने निष्पादित किया था। आप को वाद का क्या उत्तर देना चाहिए यह बिना वाद पत्र का अध्ययन किए बताना संभव नहीं है। आप को कोई अच्छा स्थानीय दीवानी मामलों के वकील की सेवाएँ इस के लिए प्राप्त करनी चाहिए। फिर भी आप को अपने भाई के कथनों को अस्वीकार करते हुए कहना चाहिए कि विक्रय पत्र माँ ने ही निष्पादित किया था।

जहाँ विपक्षी का शाखा कार्यालय हो वहाँ उपभोक्ता परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

lawसमस्या-
प्रशांत चौहान ने इंदौर, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मेरी एक निकटतम महिला पारिवारिक मित्र मूलतः मुम्बई के निवासी हैं। वे कुछ माह पूर्व अपने परिजनो से मिलने अहमदाबाद गई थीं। वहाँ से कुछ दिन पश्चात पुनः मुम्बई वापसी हेतु उनके द्वारा अहमदाबाद के रेलवे आरक्षण कार्यालय से फ़ार्म भरकर टिकट बुक कराया था। उस फ़ार्म में जो दिनांक उन्होंने अंकित की थी, रेलवे के आरक्षण कर्मचारी लिपिक ने उसके स्थान पर उसी दिन को आगामी माह का टिकट बना दिया। इस बात का पता जब चला जब वे अपनी निर्धारित तय तिथि पर स्टेशन पहुँची। टिकट चूँकि आगामी माह का था तो वे टिकट में दर्शायी सीट एवं कोच में यात्रा करने की पात्र नहीं थी। काफी जद्दोजहद एवं टिकट परिचारक से निवेदन एवं दंड राशि भुगतान पश्चात वे उसी दिनांक को अन्य कोच कि अन्य सीट पर दण्डित किराए के साथ उसी ट्रेन से अपनी यात्रा संपन्न की। इस बीच काफी परेशानी उन्होंने भुगती क्योकि उनके साथ और कोई सम्बन्धी यात्रा में नहीं था| उक्त त्रुटि एवं परिस्थितियों के लिए वे जिम्मेवार नहीं थीं। जिम्मेदार थे रेलवे आरक्षण कार्यालय एवं तत्कालीन लिपिक जिसने सही जानकारी देने के बावजूद सही दिनांक टिकट में अंकित नहीं की।  उक्त परिस्थितियो के निर्मित होने, एक अकेली महिला को परेशानी भुगतने इत्यादि के सम्बन्ध में योग्य क्षतिपूर्ति सम्बन्धी “सेवा में कमी” किये जाने सम्बन्धी वाद वे रेलवे प्रशासन अहमदाबाद के विरुद्ध उपभोक्ता फोरम में वाद दायर करना चाहती हैं। किन्तु वे खुद अपना प्रकरण लड़ पाने में असमर्थ हैं। उन्होंने मुझे उक्त कार्यवाही हेतु अधिकृत किया है। मेरे द्वारा गत माह उनके अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में सेवा में कमी किये जाने सम्बन्धी वाद पूर्व सुचना पत्र रेलवे प्रशासन अहमदाबाद को भेजा गया है जिसका कि आज तक योग्य प्रतिउत्तर प्रतीक्षित है।
पसे यह मार्गदर्शन चाहिए कि क्या मैं उनके अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में उक्त प्रकरण को जिला उपभोक्ता फोरम , जिला इंदौर में दायर कर सकता हूँ? क्योंकि मेरे मित्र मुम्बई के निवासी हैं एवं सेवा में कमी का मामला अहमदाबाद रेलवे के विरुद्ध है।

समाधान-

पभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 11 (2) (ए) देखें। इस में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी परिवादी अपना परिवाद जहाँ विपक्षी पक्षकार, विपक्षी पक्षकारों में से कोई एक, वास्तव में स्वेच्छा से निवास करता है या जहाँ वह व्यवसाय करता है और जिस का शाखा कार्यालय है या व्यक्तिगत लाभ के लिए काम करता है उस क्षेत्र के जिला उपभोक्ता फोरम में परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

प के इस मामले में यदि भारतीय रेल को आप विपक्षी पक्षकार बनाते हैं तो उस का कार्यालय इन्दौर में है। आप इन्दौर में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

लेकिन तथ्यात्मक रूप से इस विवाद में यह परेशानी हो सकती है कि आप ने जो स्लिप भर कर दी है वह रिकार्ड में उपलब्ध होगी और उस में आप की मित्र ने ही गलती से माह अगला भर दिया होगा तो आप का परिवाद निरस्त हो सकता है। इस के अतिरिक्त यह तर्क भी रेलवे की और से आ सकता है कि टिकट को तुरन्त देख लिया जाना चाहिए था कि वह सही समय व तिथि का दिया गया है या नहीं और उस की शिकायत तुरन्त ही करनी चाहिए थी। मुकदमा लड़ने पर इस तर्क को असफल करने की तैयारी भी साथ ही कर लें।

अवयस्क की अभिरक्षा के लिए उस स्थानीय क्षेत्र के न्यायालय को क्षेत्राधिकार है, जहाँ अवयस्क निवास करता है।

समस्या-

सीतापुर, उत्तर प्रदेश से आकाश ने पूछा है –

मेरी पत्नी लखनऊ में मेरे बेटी के साथ रहती है। मैं सीतापुर में रहता हूँ। मैं एक बार लखनऊ में अपनी बेटी से मिलने गया तो मेरी पत्नी ने मुझे मारपीट कर झूठे मुकदमे में फँसा दिया। मुझे लखनऊ में जान का खतरा है। मैं ने सीतापुर में संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 25 में बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए मुकदमा किया है। पत्नी के वकील ने अदालत में कहा है कि मुकदमा सीतापुर न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है, यह लखनऊ की अदालत के क्षेत्राधिकार में है। क्या मैं इस मुकदमे को सीतापुर में लड़ सकता हूँ? पत्नी मुकदमे को लखनऊ ले जाना चाहती है। कोई ऐसा केस पहले हुआ हो जिस में बच्चे के पिता के यहाँ मुकदमा चला हो तो बताएँ। उचित सलाह दें।

समाधान –

widow daughterकिसी भी बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन पर सुनवाई का अधिकार किस न्यायालय को हो यह इस बात से निर्धारित नहीं होता कि आवेदक कहाँ रहता है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस बात से निर्धारित होता है कि बालक कहाँ रहता है या रह रहा है। जब आप स्वयम् ही कह रहे हैं कि बेटी पत्नी के साथ लखनऊ में निवास करती है। तो इस तरह सीतापुर के न्यायालय को उक्त मामले में क्षेत्राधिकार नहीं है। इस आधार पर आप का मुकदमा सीतापुर के न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है। आप की पत्नी के वकील ने सही आपत्ति उठाई है। इस आपत्ति के आधार पर न्यायालय यह निर्णय देगा कि मामला उस के क्षेत्राधिकार का नहीं है और वह उसे नहीं सुन सकता। इस स्थिति में आप चाहें तो मुकदमा वापस ले कर पुनः लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। या क्षेत्राधिकार के आधार पर निरस्त होने के उपरान्त लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं।

प की मुख्य परेशानी ये है कि लखनऊ में आप को जान का खतरा है। ये जान का खतरा तो सीतापुर में भी हो सकता है। आप उस खतरे के बारे में पुलिस, प्रशासन और न्यायालय से अलग से राहत प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन इस आधार पर उक्त मुकदमे का क्षेत्राधिकार नहीं बदल सकता। आप को उक्त आवेदन सीतापुर न्यायालय से वापस ले कर लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए। बाद में आप उसी न्यायालय से जान के खतरे की बात कर सकते हैं या फिर उच्च न्यायालय के समक्ष उक्त मुकदमे को लखनऊ से अन्यत्र जहाँ आप को खतरा न हो स्थानान्तरित करने हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

लोक न्यूसेंस और व्यक्तिगत न्यूसेंस के लिए एक ही वाद प्रस्तुत किया जा सकता है?

समस्या-

सुजानगढ़, राजस्थान से राजाराम ने पूछा है-

क्या लोक न्यूसेन्स और निजि न्यूसेन्स के लिए दीवानी वाद एक साथ धारा 91 तथा आदेश 7 नियम 1 के अंतर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है? और क्या इस वाद में क्या किसी कनवर्शन आदेश जो स्टोन क्रेसर स्थापित करने के लिए दिया गया हो उसे शून्य व अवैध घोषित किया जा सकता है?  यदि उस कनवर्शन आदेश का प्रीमियम 35000 रुपए हो तो वह दावा किस न्यायालय में प्रस्तुत होगा? और इस प्रकार के दावे में न्यायालय शुल्क 30 रुपया ही देनी होगी या मूल्यांकन के आधार पर देनी होगी?

समाधान-

Code of Civil Procedureप का आभार कि आप ने बहुत उपयोगी प्रश्न किए हैं।  ये सभी प्रश्न आम जनता के अधिकारों से संबंधित हैं और इन की जानकारी होने के उपरान्त सामान्य नागरिक जनहित के मामलों में न्यायालय के समक्ष अपना वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

दि किसी न्यूसेंस से एक व्यक्ति या कुछ व्यक्ति परेशान हों तो वे व्यक्ति जो उस न्यूसेंस से हानि उठा रहे हैं या उठा सकते हैं वे न्यायालय में उस न्यूसेंस को हटाने तथा उस के विरुद्ध निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद ला सकते हैं।  लेकिन यदि किसी न्यूसेंस से आम जनता को कोई नुकसान पहुँच रहा हो और वादीगण को कोई व्यक्तिगत हानि न हो रही तो भी वह धारा 91 दी.प्र.संहिता के अन्तर्गत वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। धारा 91 में यह उपबंधित किया गया है कि यदि किसी लोक न्यूसेंस का या अन्य दोषपूर्ण कार्यों की दशा में जिन से लोक पर प्रभाव पड़ता है या पड़ना संभव है तो वे घोषणा या निषेधाजा या किसी अन्य अनुतोष के लिए कोई भी दो व्यक्ति चाहे उन्हें उस दोषपूर्ण कृत्य से कोई व्यक्तिगत विशेष नुकसान नहीं हो रहा है न्यायालय की अनुमति से संस्थित कर सकते हैं।

दि किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से भी हानि हो रही हो तो वह तो अकेला भी बिना न्यायालय की अनुमति के ऐसा वाद प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन यदि वह एक व्यक्ति को और अपने साथ वादी के रूप में वाद प्रस्तुत करने के लिए तैयार कर ले तो न्यायालय की अनुमति से लोक न्यूसेंस के लिए भी वाद प्रस्तुत कर सकता है।  इस वाद में यह नहीं देखा जाएगा कि वादीगण को व्यक्तिगत रूप से कोई नुकसान हो रहा है या नहीं।  इस कारण धारा 91 के अंतर्गत वाद प्रस्तुत करना अधिक लाभदायक है और व्यक्तिगत न्यूसेंस और लोक न्यूसेंस के लिए वाद एक ही वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

दि वाद केवल घोषणा और निषेधाज्ञा के लिए ही है तो उस पर घोषणा के लिए न्यूनतम न्याय शुल्क 20 रुपया निर्धारित है और घोषणा के लिए निश्चित मूल्यांकन 400 रूपया है। जिस पर न्यायशुल्क रुपए 2.5 प्रतिशत की दर से 10 रुपया देय है।  इस तरह ऐसा वाद रुपए 30 न्यायशुल्क पर प्रस्तुत किया जा सकता है।  ऐसा वाद सिविल न्यायाधीश कनिष्ठ खण्ड के न्यायलय में प्रस्तुत होगा।

मेरी राय में इस वाद में मूल्यांकन कनवर्जन के प्रीमीयम पर करने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्यों कि वाद न्यूसेंस के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है, जिस से कनवर्जन प्रभावित हो रहा है। लेकिन यदि आप कनवर्जन को ही चुनौती देना चाहते हैं और उसे शून्य तथा अवैध घोषित कराना चाहते हैं तो आप को मूल्यांकन 35000 की राशि पर ही करना होगा। तब वाद का मूल्यांकन 35400 हो जाएगा।  तब आप को वाद पर रुपए 1905 न्याय शुल्क देनी होगी। तब उक्त वाद का मूल्यांकन अधिक हो जाने के कारण आप को वाद सिविल न्यायालय वरिष्ठ खंड के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।

संतान की अभिरक्षा (Custody) के लिए आवेदन किस न्यायालय को प्रस्तुत करें?

समस्या-

सीतापुर, उत्तर प्रदेश से आकाश  ने पूछा है-

मेरा विवाह 2006 में हुआ, 2008 में एक पुत्री ने जन्म लिया। उस के बाद मेरी पत्नी अपने मायके चली गई। मैं विदा कराने गया तब विवाह पैदा हुआ। पत्नी ने मेरे शहर में रहने से इन्कार कर दिया। तब मैं ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम में पत्नी को विदा कराने का मुकदमा किया जो एक पक्षीय 17 फरवरी 2010 को निर्णीत हो गया। पत्नी ने अदालत के आदेश की पालना नहीं की। बल्कि पूरे परिवार ने मेरे घर आ कर मेरी माँ के साथ मारपीट की।  जिस में धारा 323, 452 भारतीय दंड संहिता का मुकदमा बना। मैं ने धारा 9 के आदेश के निष्पादन की कार्यवाही की।  अभी मेरी पुत्री मेरी पत्नी की अभिरक्षा में है। मैं उस की अभिरक्षा स्वयं लेना चाहता हूँ। इस के लिए मैं ने अपने शहर सीतापुर में पुत्री की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत किया है। मेरी पत्नी लखनऊ  में रहती है। क्या मेरा मुकदमा उस के शहर में स्थानान्तरित तो नहीं होगा? या मेरे शहर में मेरा मुकदमा खारिज तो नहीं होगा?  मेरी पत्नी मुझे मेरी बेटी से नहीं मिलने देती है, उस के लिए मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

imagesप ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के आदेश का निष्पादन कराने के लिए आवेदन किया है।  लेकिन किसी भी मनुष्य को उस की इच्छा के विपरीत किसी के साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता।  यदि आप की पत्नी आप के साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है तो आप को यह अधिकार है कि आप धारा 9 के आदेश / डिक्री के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री के लिए आवेदन कर सकते हैं।

किसी बालक/ बालिका की अभिरक्षा के लिए आवेदन उस न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत बालक /बालिका सामान्य रूप से निवास करती है। आप के मामले में 2008 में पुत्री के जन्म के बाद से ही वह माँ के साथ लखनऊ में निवास कर रही है वही उस का सामान्य निवास का स्थान है। इस कारण से आप को अभिरक्षा के लिए आवेदन लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए था। आप का आवेदन सीतापुर के न्यायालय से लखनऊ के न्यायालय में स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता। किन्तु सीतापुर का न्यायालय आप के आवेदन को लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए आप को वापस कर सकता है।

बालक /बालिका की अभिरक्षा के लिए न्यायालय यह देखता है कि बालक /बालिका का हित किस की अभिरक्षा में रहने में है। इसलिए बालक/ बालिका की अभिरक्षा का प्रश्न माता या पिता के अधिकार का न हो कर बालक /बालिका के हित का है। उसी के आधार पर आप का आवेदन निर्णीत होगा। आप को आप की पत्नी आप की पुत्री से नहीं मिलने देती है। इस के लिए आप ने जिस न्यायालय में अभिरक्षा के लिए आवेदन किया है उसी न्यायालय में यह आवेदन कर सकते हैं कि बालक /बालिका को माता और पिता दोनों के साथ रहने और मिलने का अवसर दिया जाना चाहिए। न्यायालय आप के आवेदन पर इस तरह का आदेश प्रदान कर सकती है जिस से आप अपनी पुत्री से मिल सकें और कुछ समय उस के साथ बिता सकें।

तलाक चाहते हैं तो आवेदन करने में देरी न करें

समस्या-

जलगाँव, महाराष्ट्र से भोजराज पूछते हैं-

मेरी पत्नी ने घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया है।  उस का उनका मायका यवतमाल जिले में है और मैं जलगाँव जिले में रहता हूँ।  उसने केस यवतमाल में दर्ज कराया। लेकिन वहाँ के न्यायाधीश ने क्षेत्राधिकार न होने से केस खारिज कर दिया।  लेकिन उसने फिर आवेदन प्रस्तुत कर दिया।  125 दंड प्रक्रिया संहिता का भी केस शुरू कर दिया है।  केस अक्टूबर 2011 में दर्ज हुआ था।  मेरी पत्नी यहाँ प्राइवेट कंपनी में काम करती है जिसे उसने  कोर्ट में भी यह कबूल किया है।  उस का मासिक वेतन मुझ से अधिक है। वह मुझे न तो तलाक दे रही है और न वापस आ रही है।  अब उसे नहीं रखना चाहता हूँ। वकील बोलते हैं कि दोनों केसों में निर्णय होने दो तब तलाक का मुकदमा करना। मेरी उम्र 35 वर्ष है और उस की 24 वर्ष है।  की उम्र तो अभी विवाह की है लेकिन मेरी तो निकली जा रही है। घऱ की हालत बहुत खराब है, मम्मी-पापा की उमर 70 से ऊपर है वे लोग ठीक से चल भी नहीं सकते हैं।   ऐसे में मुझे शादी करना ज़रूरी है।  मेरा मासिक वेतन 4500 रुपए है जिस में घर चलना मुश्किल हो गया है।  अब आप बताएँ 125 दं.प्र.सं. में मुझे कितने पैसे उसे देने होंगे? उसका मासिक प्रतिमाह 9000 रुपये तक मिलता है। उस का भुगतान अभी 5000 रुपए है और इंसेटिव अलग मिलता है।  कोर्ट में उस ने प्रति परीक्षण में यह बताया है कि वह नौकरी करती है और उसका भुगतान उस वक़्त 3500 रुपये था और इंसेन्टिव भी मिलता है वह यहाँ जलगाँव में रहती है लेकिन उसने मुकदमा यवतमाल जिले में किया है।

समाधान-

रेलू हिंसा का मुकदमा दुबारा यवतमाल में ही किया है तो वह पुराने निर्णय के आधार पर खारिज हो जाएगा, क्यों कि आप की पत्नी जलगांव में रहती है। मुझे लगता है कि उस ने दुबारा कोई मुकदमा नहीं किया अपितु जो मुकदमा पहले किया था उसी की अपील प्रस्तुत की होगी जिसे आप दुबारा मुकदमा करना कहते हैं।  धारा 125 दं.प्र.सं. में मुकदमा कहाँ किया है यह आप ने नहीं बताया।

दि आप की पत्नी आप से अधिक कमाती है और जलगाँव में निवास करती है तो जैसा कि उस ने अपने बयान में स्वीकार किया है तो यवतमाल में किए गए सभी मुकदमे खारिज हो जाने चाहिए।  आप की पत्नी आप से अधिक कमाती है और ऐसा साबित हो जाता है तो अदालत आप से आप की पत्नी को खर्चा दिलाने का आदेश नहीं करेगी। मुकदमों में समय तो लगेगा।  इस का कोई इलाज नहीं है।  देश में अदालतें जरूरत की बीस प्रतिशत हैं।  इस का इलाज तो अदालतें बढ़ाए बगैर नहीं किया जा सकता जिसे केवल सरकार ही बढ़ा सकती है।

प के माता-पिता आप की जिम्मेदारी हैं आप की पत्नी की नहीं। आप का और आप के माता-पिता का खर्च आप की कमाई से नहीं चलता तो इस का कोई संबंध आप की पत्नी से नहीं है। कोई भी स्त्री आप से विवाह करेगी और आप के माता-पिता का दायित्व उठाएगी, ऐसा संभव नहीं लगता। इन परिस्थितियों में इन शर्तों के साथ कोई भी स्त्री आप से विवाह करने से कतराएगी।

प को अपनी पत्नी के साथ समझौते के प्रयास करने चाहिए। यदि आप की पत्नी आप से अधिक कमाती है तो परिवार उस के खर्च से चलाया जा सकता है, लेकिन वह काम करेगी तो आप से यह प्रत्याशा रखेगी कि आप के माता-पिता को आप संभालें। आप को अपने जीवन को स्वयं व्यवस्थित करने का प्रयत्न करना चाहिए।  फिर आप यदि तलाक लेना ही चाहते हैं तो तलाक (विवाह विच्छेद) के लिए मुकदमा तुरंत कर दें।  विवाह विच्छेद के मुकदमे में भी समय लगेगा और इस तरह फिर आप के मुताबिक आप विवाह के योग्य नहीं रह जाएंगे।

सायबर अपराध तथा संबंधित उपभोक्ता विवाद के लिए कार्यवाही कहाँ करें?

समस्या-

पिछले दिनों मुझे एक वेब स्क्रिप्ट की जरुरत थी। जिसके लिए मैंने अपनी जरुरत की वेब स्क्रिप्ट बेचने वालों की गूगल खोज से खोजबीन की व कई वेब स्क्रिप्ट के डेमों देखे। जिनमें से मुझे एक वेब डिजाइनर की वेब स्क्रिप्ट पसंद आई। वे वेब डिजाइनर के जोधपुर के थे इसलिए मुझे ज्यादा भरोसेमंद भी लगे। जब उनसे बातचीत हुई तो मेरा उन पर भरोसा और पक्का हो गया और उनसे उस वेब स्क्रिप्ट का फोन पर मोलभाव तय कर मैंने तय मूल्य की रकम उनके व्यक्तिगत बैंक खाते दिनांक २१-१०-२०११ को अपने खाते से नेट बैंकिंग के जरिये ट्रान्सफर भी कर दी और उसी रात में उन्होंने मेरे डोमेन पर वह स्क्रिप्ट अपलोड भी कर दी।

नके द्वारा दी गयी उस वेब एप्लीकेशन में काफी त्रुटियाँ थी जिसके बारे बताने पर वे जल्द ठीक करवाने का आश्वासन देते रहे, एक दो कमियां उन्होंने ठीक भी कराई।  लेकिन अभी भी उस एप्लीकेशन में काफी कमियां हैं, जिसके चलते उसे वेब साईट पर चलाना बेमानी लगता है। मेरे द्वारा कई बार अनुरोध करने के बावजूद उन्होंने आज तक वे कमियां ठीक नहीं की। पहले वे फोन पर आश्वासन देते रहते थे, पर अब उन्होंने मेरा फोन उठाना भी बंद कर दिया है और मेल भेजने पर उसका कोई जबाब भी नहीं देते। जबकि मैं उन्हें लिख चुका हूँ कि मुझे कोई समय सीमा बतायें पर उनकी और से कोई जबाब नहीं मिलता।

मेरे जोधपुर रहने वाले एक मित्र ने भी उन्हें फोन पर मेरा कार्य करने का अनुरोध किया। तब उनका मेरे पास फोन आया। उन्हों ने अपनी व्यस्तता उजागर की, साथ ही मुझे मेरी समस्या जल्द सुलझाने का आश्वासन दिया और यह भी अनुरोध किया कि इस तरह अपने किसी परिचित से फोन न करवाएँ। क्योंकि इस तरह उनकी प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल असर पड़ता है। इसके बावजूद अब तक उन्होंने न मेरी समस्या का समाधान किया और न ही वे मुझे कोई समय सीमा बता रहे है।
ऐसी स्थिति में मेरे पास दो ही उपाय बचते है –
१- उनके खिलाफ क़ानूनी कार्यवाही
२- जोधपुर से प्रकाशित होने वाले अखबारों में उनकी इस धोखाधड़ी की प्रमुखता से खबर छपवाना।

दि मैं उनके खिलाफ क़ानूनी कार्यवाही करना चाहूं तो कृपया मार्गदर्शन करें कि क्या मैं उनके खिलाफ अपने शहर के पुलिस थाने में धोखाधड़ी के मामले में शिकायत दर्ज करवा सकता हूँ ? मेरे पास सबूत के तौर पर सिर्फ उनके खाते में ट्रान्सफर की गयी रकम की प्रविष्टि ही है। उनके द्वारा किये गए वादे उनकी वेब साईट पर लिखें है।

-रतनसिंह शेखावत, फरीदाबाद, हरियाणा

समाधान-

ब से पहले तो मैं आप को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि आप ने समस्या को पूर्ण विस्तार से लिखा है जिस से उसे समझने में कठिनाई नहीं हुई। कुछ कठिनाई हुई भी तो वह टेलीफोन बातचीत से हल हो गई। आप की समस्या सायबर व्यवहार से संबंधित है। क्यों कि इस में आप ने अपनी आवश्यकता की वस्तु क्रय करने के लिए अंतरजाल पर खोज की और जब लगा कि वस्तु आप के उपयोग की है तो उसे क्रय करने के लिए आप ने उस के विक्रेता से टेलीफोन पर बातचीत की। आप ने वस्तु का मोलभाव किया और अंत में वह आप के प्रस्तावित मूल्य पर आप को वस्तु विक्रय करने के लिए सहमत हो गया। उस ने अंतिम रूप से तय वस्तु की कीमत आप को टेलीफोन पर जोधपुर से बात करते हुए बताई जिस से आप दोनों के बीच एक संविदा संपन्न हुई। आप ने संविदा के अंतिम  होने के संदेश को टेलीफोन पर फरीदाबाद में सुना। इस तरह यह संविदा फरीदाबाद में संपन्न हुई है। इस का अर्थ यह है कि अंशतः वाद कारण फरीदाबाद में घटित हुआ है। इस के उपरान्त आप ने फरीदाबाद स्थित अपने बैंक खाते से विक्रेता के बैंक खाते में संविदा की संपूर्ण राशि स्थानान्तरित कर दी। विक्रेता ने आप की वेब साइट पर वेब स्क्रिप्ट को अपलोड किया। इस तरह आप के द्वारा खरीदी गई वस्तु की सप्लाई उस ने स्वयं आप की वेब साइट पर दी जिसे आप फरीदाबाद से संचालित करते हैं। इस तरह उस ने माल फरीदाबाद में आप को सौंपा है। इस कारण से भी वाद कारण अंशतः फरीदाबाद में उत्पन्न हुआ है। जिस से यह स्पष्ट है कि कोई भी कानूनी कार्यवाही चाहे वह अपराधिक हो या दीवानी, फरीदाबाद में संस्थित की जा सकती है।

प यह जानना चाहते हैं कि क्या पुलिस में अथवा फरीदाबाद के न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर धोखाधड़ी करने का अपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है? तो उक्त मामले में विक्रेता ने वेबसाइट पर प्रचार करते हुए तथा फोन पर बातचीत के माध्यम से आप को यह विश्वास दिलाया कि वह एक अच्छा और उपयोगी माल आप को विक्रय कर रहा है। जब आप को माल मिला तो वह इस तरह का था कि उसे वेब साइट पर चलाया ही नहीं जा सकता था। वह बार बार कहने पर भी माल को दुरु्त नहीं कर रहा है। इस तरह यह स्पष्ट है कि उस ने आप को अनुपयोगी माल बेचा है और धन प्राप्त कर लिया है। यह वैसा ही है कि कोई वीपीपी से आप को ट्रांजिस्टर या कैमरा भेजे लेकिन पैकेट में केवल डिब्बा निकले। इस तरह उसने आप को धन प्रदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित किया है। विक्रेता का यह कृत्य धारा 420 भा.दं.संहिता के अंतर्गत अपराध है जिस के लिए विक्रेता को सात वर्ष तक के कारावास का दंड दिया जा सकता है। अंशतः वाद कारण फरीदाबाद में उत्पन्न हुआ है इस कारण से फरीदाबाद के आप के निवास के पुलिस थाने में इस की रिपोर्ट लिखाई जा सकती है जिस पर संज्ञेय अपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकता है।

प उक्त फौजदारी कार्यवाही के अतिरिक्त फरीदाबाद के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष भी अपना प्रतिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप आप के द्वारा अदा किए गए धन के साथ साथ आप को हुए शारीरिक व मानसिक संताप के लिए प्रतितोष व खर्चा मुकदमा भी दिलाया जा सकता है।

वाद किस न्यायालय में संस्थित किया जाए ?

पिछले रविवार को हमने बात की थी कि दीवानी प्रकृति के वाद क्या हैं ? इस कड़ी में स्पष्ट किया गया था कि ‘वह वाद, जिस में संपत्ति संबंधी या पद सम्बन्धी अधिकार प्रतिवादित है, इस बात के होते हुए भी कि ऐसा अधिकार धार्मिक कृत्यों या कर्मों सम्बन्धी प्रश्नों के विनिश्चय पर पूर्ण रूप से अवलम्बित है, दीवानी प्रकृति का वाद है। आज इसी बात को आगे बढ़ाते हुए हम बात करेंगे इस प्रश्न पर कि दीवानी वाद कहाँ और किन न्यायालयों में संस्थित किए जा सकते हैं?

आर्थिक क्षेत्राधिकार

स का सब से पहला और महत्वपूर्ण नियम यह है कि कोई भी वाद उस निम्नतम श्रेणी के न्यायालय में संस्थित किया जाएगा जिस का विचारण करने के लिए वह सक्षम है। यहाँ निम्नतम श्रेणी से तात्पर्य किसी न्यायालय के आर्थिक क्षेत्राधिकार से हैं। उदाहरण के रूप में दिल्ली में  1 पैसे से ले कर 20 लाख रुपए तक मूल्य के वाद जिला न्यायालय में तथा इस से अधिक मूल्य के सभी वाद उच्च न्यायालय में संस्थित किए जाएंगे। जब कि राजस्थान में एक पैसे से 25 हजार रुपयों तक मूल्य के वाद सिविल जज कनिष्ठ खंड के न्यायालय में, 25001 रुपए से ले कर 50000 रुपए मूल्य तक के वाद सिविल जज वरिष्ठ खंड के न्यायालय में तथा इस से अधिक मूल्य के सभी वाद जिला न्यायाधीश के न्यायालय में संस्थित किए जाएंगे। इस तरह सभी राज्यों के लिए न्यायालयों का आर्थिक क्षेत्राधिकार भिन्न भिन्न है। जिस व्यक्ति को जिस राज्य में अपना वाद संस्थित करना हो उसे पता करना चाहिए कि उस राज्य में आर्थिक क्षेत्राधिकार का निर्धारण किस प्रकार से किया गया है। उसी के अनुरूप अपना वाद सक्षम न्यायालय में संस्थित करना चाहिए।

स्थान आधारित क्षेत्राधिकार

वाद यदि …

  1. किसी स्थावर संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने का हो चाहे वह किराया या लाभ प्राप्ति के साथ हो या न हो;
  2. स्थावर संपत्ति के विभाजन का हो;
  3. स्थावर संपत्ति के बंधक की या उस पर या उस पर भार के पुरोबंध, विक्रय या मोचन के लिए हो;
  4. स्थावर संपत्ति में किसी अन्य अधिकार या हित के अवधारण के लिए हो;
  5. स्थावर संपत्ति के प्रति किए गए किसी दोष के प्रतिकर के लिए हो; या
  6. कुर्की या कर की वसूली के लिए स्थावर संपत्ति स्थावर संपत्ति को हस्तगत करने के लिए हो

तो वाद उस स्थानीय न्यायालय में संस्थित किए जाएँगे जिस की स्थानीय अधिकारिता के अंतर्गत वह संपत्ति स्थित है।

लेकिन प्रतिवादी के लिए या उस के द्वारा धारित संपत्ति के संबंध में अनुतोष की या ऐसी संपत्ति के प्रति दोष के लिए प्रतिकर की प्राप्ति के लिए वाद यदि जो राहत मांगी गई है वह व्यक्तिगत अनुपालना के द्वारा प्राप्त की जा सकती है तो वाद या तो उस न्यायालय में संस्थित किया जा सकेगा जिस की स्थानीय अधिकारिता में  वह संपत्ति स्थित है या फिर वहाँ संस्थित किया जा सकेगा जहाँ प्रतिवादी स्वेच्छा से और वास्तव में निवास करता है, या कारोबार करता है, या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है।

  • उपरोक्त मामलों में संपत्ति जहाँ एक से अधिक न्यायालयों के स्थानीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत स्थित है तो वाद किसी भी ऐसे न्यायालय में संस्थित किया जा सकेगा जिस के स्थानीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत उस संपत्ति का कोई भाग स्थित है। किन्तु तभी जब कि पूरे की विषय वस्तु के मूल्य की दृष्टि से उस न्यायालय द्वारा वाद संज्ञेय हो।
  • जहाँ यह अभिकथित किया जाता है कि यह अनिश्चित है कि किन्ही एकाधिक न्यायालयों के स्थानीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत स्थित है, वहाँ वाद उन में से किसी भी न्यायालय में संस्थित किया जा सकेगा और उस के द्वारा पारित डिक्री मान्य होगी लेकिन तभी जब कि न्यायालय ऐसा है जो वाद की प्रकृति और मूल्य की दृष्टि से अधिकारिता का प्रयोग करने में सक्षम हो।
  • जहाँ वाद शरीर या चल संपत्ति के प्रति दोषों के प्रतिकर के लिए हो वहाँ यदि दोष किसी एक न्यायालय की अधिकारिता के भीतर किया गया हो और प्रतिवादी किसी अन्य न्यायालय की सीमा के भीतर निवास करता है तो वादी के चयन पर वह वाद उन में से किसी भी न्यायालय के सन्मुख संस्थित किया जा सकेगा।

न्य सभी वाद वहाँ संस्थित किए जा सकेंगे जहाँ प्रतिवादी निवास करते हैं या वाद हेतुक उत्पन्न होता है। इस मामले में जहाँ एक से अधिक प्रतिवादी हों वहाँ कोई एक प्रतिवादी वाद के संस्थित करने के समय जिस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के भीतर स्वेच्छा से वास्तव में निवास करता है या कारोबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है, या ऐसा नहीं है तो उन्हों ने वाद प्रस्तुत करने के लिए सहमति दे दी हो या जहाँ वाद हेतुक पूर्णतः या भागतः उत्पन्न हुआ हो।

परोक्त में निगमों के मामले में यह समझा जाएगा कि वह भारत में अपने एक मात्र या प्रधान कार्यालय में या किसी ऐसे वाद हेतुक के संबंध में किसी ऐसे स्थान में उत्पन्न हुआ है जहाँ उस का अधीनस्थ कार्यालय भी है ऐसे स्थान में कारोबार करता है।

 

वसीक अहमद का मुकदमा कानपुर की अदालत ने वापस क्यों लौटाया?

सीक अहमद चाहते थे कि वे विदेश जाएँ, उन्हें विदेश में कोई नियोजन प्राप्त हो जाए। उन्हों ने मुम्बई के एक ऐजेंट से संपर्क किया। ऐजेंट ने उन से आवश्यक दस्तावेज मंगाए। कुछ दिन बाद उस ने वसीक अहमद को वीजा की फोटो प्रति भेजी और उन से एक लाख रुपए भेजने को कहा। वसीक अहमद ने एक लाख रुपया ऐजेंट को भेज दिया। उस के बाद ऐजेंट ने कोई संपर्क नहीं रखा, यहाँ तक कि उन का पासपोर्ट तक उन्हें नहीं लौटाया। वसीक अहमद ने उन के साथ हुई इस धोखाधड़ी के लिए कानपुर की अदालत में एक अपराधिक परिवाद प्रस्तुत किया। लेकिन अदालत ने उन्हें उन का परिवाद इस टिप्पणी के साथ लौटा दिया कि वे इस परिवाद को मुम्बई की अदालत में पेश करें। वसीक अहमद चाहते हैं कि उन का परिवाद कानपुर में पेश हो। प्रश्न यह है कि उन का परिवाद कानपुर की अदालत ने लौटा क्यों दिया? और मुम्बई की अदालत में पेश करने को क्यों कहा?

अदालतयूँ तो भारत के हर राज्य के हर जिले और कुछ अन्य नगरों में अदालतें हैं और इन अदालतों में मुकदमे पेश किए जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी भी अदालत में कोई भी मुकदमा पेश कर दिया जाए। हर मुकदमे के लिए कानून द्वारा यह निश्चित किया गया है कि उसे किस अदालत में पेश किया जाए। इस तरह यह कानून से निर्धारित होता है कि कोई मुकदमा विशेष किस अदालत में चलाया जाएगा। वसीक अहमद का मुकदमा ठगी और धोखाधड़ी के बारे में था। दोनों ही कृत्य अपराध हैं इस लिए अपराधी को दंडित करने के लिए अपराधिक मुकदमा चलाया जाना था। अपराधिक मुकदमे के लिए यह आवश्यक है कि या तो पुलिस को रिपोर्ट की जाए और पुलिस यदि यह समझती है कि यह ऐसा मुकदमा है जिस में वह कार्यवाही करने को सक्षम है और कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त कारण हैं तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण आरंभ कर देती है।  अन्वेषण की समाप्ति पर यदि अपराध होना पाया जाता है और अपराधी का पता लग जाता है तो अपराधी के विरुद्ध आरोप पत्र मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करती है। प्रत्येक पुलिस थाना के लिए एक मजिस्ट्रेट की अदालत निश्चित है जिस में वह गिरफ्तार किए गए अपराधियों को प्रस्तुत करती है और जिस में वह अपराधियों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करती है। प्रत्येक मजिस्ट्रेट की अदालत को कुछ थाना क्षेत्रों के लिए स्थानीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है। यदि पुलिस किसी मामले में रिपोर्ट दर्ज कर अन्वेषण नहीं करती है तो परिवादी सीधे स्थानीय अधिकारिता वाले न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। वसीक अहमद का मुकदमा किस थाना क्षेत्र से संबंधित था और मजिस्ट्रेट की किस अदालत को उस पर स्थानीय अधिकारिता प्राप्त थी यह जानने के लिए हमें दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय-13 पढ़ना होगा जो जाँचों और विचारणों में दंड न्यायालयों की अधिकारिता के बारे में हैं। इसी अध्याय के उपबंधों से यह तय होता है कि किसी अपराधिक मामले में कौन सा न्यायालय जाँच और विचारण करने में सक्षम है।

दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय-13 का आरंभ धारा 177 से होता है। इस धारा में यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक अपराध की जाँच और विचारण मामूली तौर पर ऐसे न्यायालय द्वारा किया जाएगा जिस की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर वह अपराध किया गया है। इस के उपरान्त धारा-178 में यह उपबंधित है हे कि जहाँ यह अनिश्चित हो कि कई स्थानीय क्षेत्रों में से किस में अपराध किया था, जहाँ अपराध चालू रहने वाला है और एक से अधिक स्थानीय क्षेत्रों में किया जाना चालू रहता है, जहाँ वह अपराध अंशतः एक स्थानीय क्षेत्र में और अंशतः दूसरे स्थानीय क्षेत्र में किया गया हो तथा जहाँ वह अनेक स्थानीय क्षेत्रो में किये गए कार्यों से बनता है वहाँ उस की जाँच या विचारण  ऐसे स्थानीय क्षेत्रों पर अधिकारिता रखने वाले किसी भी न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। धारा 179 में यह उपबंधित है कि जब कोई कार्य किसी की गई बात और किसी निकले हुए परिणाम के कारण अपराध है तो उस की जाँच या विचारण दोनों में से किसी क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। इस के उपरान्त इस अध्याय में धारा-189 तक न्यायालय के क्षेत्राधिकार के संबंध में उपबंध करती है। लेकिन यहाँ वसीक अहमद के मामले के लिए उन्हें पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ब हम वापस वसीक अहमद के मामले की और लौट चलें। वसीक अहमद ने जिस ऐजेंट से संपर्क किया वह मुम्बई में रहता है। वह कभी कानपुर या उत्तर प्रदेश नहीं आया। जब भी वसीक अहमद ने संपर्क किया उस से मुम्बई में ही फोन या डाक या इंटरनेट के माध्यम से संपर्क किया। उस ऐजेंट ने कोई भी कार्य कानपुर में नहीं किया। यहाँ तक कि वसीक अहमद द्वारा भेजा गया एक लाख रुपया भी उस ने मुम्बई में ही प्रा्प्त किया। इस तरह कानपुर के किसी भी मजिस्ट्रेट के न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के क्षेत्र में ऐजेंट ने ऐसा कोई काम नहीं किया जो उस के द्वारा किए गए अपराध से जुड़ा होता। इसी कारण से कानपुर के किसी न्यायालय को उस के मामले पर क्षेत्राधिकार नहीं था।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 201 में यह उपबंधित है कि जब कोई परिवाद ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जो कि उस अपराध का संज्ञान करने केलिए सक्षम नहीं है तो वब परिवाद लिखित होने की स्थिति में परिवादी को परिवाद इस तरह का पृष्ठांकन कर लौटा देगा। परिवाद मौखिक होने की स्थिति में परिवादी को उचित न्यायालय में जाने का निर्देश देगा।

सी स्थिति के अनुरूप वसीक अहमद को कानपुर के न्यायालय ने उन का परिवाद उस पर पृष्ठांकन कर कि वे अपना परिवाद मुम्बई के न्यायालय में प्रस्तुत करें वापस लौटा दिया गया।

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