अपराध Archive

समस्या-

मेरे साथ गाँव मे कुछ विवाद हो गया था और मैंने पुलिस को शिकायत की मुझे सिपाही  फर्जी केस में फँसा देने की धमकी दे रहा है  और मुझे जाति सूचक गाली देता है कहता है कि दुबारा गाँव में दिखाई मत देना। आये दिन परेशान करता रहता है। क्या ऐसा कोई उपाय है जिससे उस पर कार्यवाही कर सकूँ? मैं अपने पिता व भाइयों व बहनों से सभी कानूनी, गैर कानूनी व सामाजिक सम्बन्ध समाप्त करना चाहता हूँ। मेरे द्वारा किये गये समस्त कृत्यों के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। मेरे परिवार के किसी सदस्य का इससे कोई लेना देना नहीं है और न कोई जिम्मेदार है। कृपया बताएँ कि मैं परिवार के समस्त लोगो से सम्बन्ध विच्छेद कैसे कर सकता हूँ?

-अवनीश कुमार, हरपालपुर, जनपद हरदोई, उत्तर प्रदेश

समाधान-

सा प्रतीत होता है कि आप के साथ कोई घटना हुई है जिस से आप बहुत डर गए हैं। हालांकि आप ने घटना का विवरण नहीं दिया है। खैर जो भी हुआ हो। सब से पहले तो आप अपने मन से हर तरह के डर को निकाल बाहर करें। क्यों कि डरना किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। उस से समस्या बढ़ेगी, कम नहीं होगी।

आप यह चाहते हैं कि अपने परिवार वालों से संबंध विच्छेद कर दें और जो आपदा आप पर आने वाली है उस का प्रभाव परिवार पर न पड़े। तो ऐसा आप सोचते हैं, लेकिन यह संभव नहीं है। आप के परिवार के लोग जो आप को बहुत प्यार करते हैं क्या आप को मुसीबत में देख कर परेशान नहीं होंगे। किसी कानूनी कार्यवाही से उन की परेशानी समाप्त होना संभव नहीं है।

संबध विच्छेद करने और बेदखल करने का प्रश्न है तो आप के परिवार में आप के माता, पिता, भाई, बहिन व अन्य रक्त संबंधी हैं। इन का आप के साथ रिश्ता रक्त संबंध से बना है वह कानून द्वारा या किसी घोषणा से समाप्त होना संभव नहीं है। आप कितनी ही घोषणाएँ कर दें जो आप के माता, पिता, भाई, बहिन, चाचा, ताऊ वगैरा हैं उन के साथ रक्त संबंध तो बने ही रहेंगे वे किसी भी तरह से समाप्त नहीं हो सकते। आप तौर पर अखबारों में इस तरह की घोषणाएँ प्रकाशित होती रहती हैं कि हमने अपने पुत्र, पुत्री या माता पिता से संबंध विच्छेद कर लिया है। लेकिन इस तरह की घोषणाओं से किसी तरह का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होता। यदि किसी तरह के कोई दायित्व आने होते हैं तो वे आते ही हैं उन से इस तरह की घोषणाओं के द्वारा नहीं बचा सकता।

जहाँ तक पुलिस द्वारा आप की रिपोर्ट दर्ज न करने और किसी सिपाही द्वारा आपको धमकाने का प्रश्न है तो आप इस संबंध में एस.एस.पी. को लिखित परिवाद रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेज सकते हें। ऐसी शिकायत की प्रति, रजिस्ट्री की रसीद और ए.डी. लौट कर आए तो उसे सुरक्षित रखें और पुलिस द्वारा फिर भी कोई कार्यवाही आपकी रिपोर्ट पर न करने  आप न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

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समस्या-

मेरा एक चैक दिनांक 8-3-2016 को बैंक जाते हुए रास्ते में गिर गया था और काफी ढूढंने पर भी नहीं मिला, कुछ मिनटो बाद मेने उस चेक के गुम की होने लिखित में सूचना बैंक में देकर उस चेक का भुगतान रोक दिया। अब डेढ साल बाद वह चैक किसी लङके को मिला और भुगतान के लिये मेरे खाते मे लगाकर बाउंस करा दिया। उसने मेरे को सूचना देकर केस भी कर दिया। अब   आप ही हल बतायें मैं क्या करूं?

-रवि कामरानी, डन्डापुरा सिन्धी कालोनी, विदिशा-464001 (म.प्र.)

समाधान-

ब आप को चैक बाउंस का नोटिस मिला तो उस के जवाब में यह बात लिखनी चाहिए थी और पुलिस को सूचना देनी चाहिए थी कि आप के खोए हुए चैक का कोई गलत इस्तेमाल कर रहा है। आप अब भी इस मामले में पुलिस में मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस कोई कार्यवाही न करे तो अदालत में परिवाद के माध्यम से मामला दर्ज कराएँ।

आप के विरुद्ध यदि मुकदमा हो गया है तो आप को लड़ना पड़ेगा। प्रतिरक्षा में अच्छा वकील खड़ा करें। आप बैंक से अपनी सूचना की प्रति मांगें जिसे आप अपनी प्रतिरक्षा मे प्रस्तुत कर सकते हैं, बैंक के शाषा प्रबंधक को अपनी गवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं, क्यों की डेढ़ वर्ष पहले जो पत्र बेंक को दिया था वह बहुत बढ़िया सबूत है। जब कि चैक की तारीख अधिक से अधिक चार छह माह पहले की रही होगी। आप चिन्ता न करें आप का पक्ष मजबूत है।

हिंसा के बाद ससुराल से निकाल देने पर स्त्री के पास विधिक उपाय।

September 12, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अनामिका ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे सास ससुर और जेठानी दवारा मुझे बहुत टॉर्चर किया गया। दहेज के लिए “कम लाई हो” के ताने दिए गए और जेठानी और सास ने मुझे मारा भी है। मेरे पति सब देखते हुए भी कुछ नहीं बोले, उन लोगो को। मेरे पति और जेठानी के बीच नाजायज़ संबंध है। इसका विरोध करने पर उन लोगो ने मुझे घर से निकाल दिया है। अब मैं क्या करूँ? मेरे पति उस औरत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और मुझे तलाक़ दे रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ? कृपया उचित सलाह दीजिए।

समाधान –

र उस महिला की समस्या घर है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और यदि है तो उस के बाद भी वह अपनी रिश्तेदारियों से अलग किसी मित्र समूह में नहीं है। वस्तुतः  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस का जन्म समूह में हुआ है और वह समूह के बिना नहीं रह सकता। एक स्त्री विवाह तक मायके में रहती है तब उस के साथ परिवार होता है। जैसे जैसे वह बड़ी होती है परिवार को इस की चिन्ता सताने लगती है कि अब उस की विदाई का समय आ गया है और वह विवाह कर के उसे विदा कर देता है। कुछ ही परिवार हैं जो यह सोचते हैं कि स्त्री को पहले आत्मनिर्भर बनाना चाहिए और उस के पास आत्मनिर्भर मित्रो का एक समूह भी होना चाहिए। स्त्री के लिए ये दो चीजें सब से अधिक जरूरी हैं। जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता या कम से कम ध्यान दिया जाता है। अभी आप के पास ये दो चीजें होतीं तो आप को कोई परेशानी नहीं होती, आप खुद अपनी समस्या से मुकाबला कर सकती थीं। आप ने अपनी समस्या में अपनी आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर मित्र समूह और मायके के बारे में कुछ नहीं बताया है।

आप के पति के अपनी भाभी के साथ संबंध वाली समस्या का कानून के पास कोई हल नहीं है। आप के साथ जो कुछ हुआ है उस के बाद आप का उस परिवार से संबंध तोड़ना, पति से तलाक लेना और टॉर्चर के लिए ससुराल वालों को सजा दिलाना ही आप का उपाय है। इस के लिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दे कर अपनी सुरक्षा, पृथक आवास की सुविधा और भरण पोषण की राशि प्रतिमाह प्राप्त करने के लिए तुरन्त आवेदन करना चाहिए। आप अपने साथा हुई हिंसा के लिए तथा आप के स्त्रीधन को पाने के लिए जो आप के पति के पास या ससुराल में रह गया है धारा 498ए तथा 406 भारतीय दंड संहिता में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती हैं और पुलिस द्वारा यथोचित कार्यवाही न करने पर न्यायलाय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के साथ ही धारा 13  हिन्दू विवाह अधिनियम में अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन  तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण राशि प्रतिमाह पाने के लिए आवेदन करने के उपाय आप के पास उपलब्ध हैं। बेहतर है कि आप अपने निकट के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर ये सब उपाय करने का प्रयत्न करें, देरी न करें।

समस्या-

मेरे ऊपर धारा 498a आईपीसी तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में प्रकरण लंबित हैं, साक्ष्य हो चुकी है, साक्ष्य में उन्होंने दहेज देना स्वीकार किया है, दहेज देना अपराध है, कार्यवाही कैसे हो उन पर?

-रामकिशोर, मारवाड़ी का बाग, उनाव रोड, जिला दतिया, मध्य प्रदेश

समाधान-

हेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और दहेज देना तथा दहेज लेने या देने के लिए प्रतिज्ञा या संविदा करना अपराध है। इस अपराध के लिए अभियुक्त को अपराध साबित हो जाने पर छह माह तक का कारावास और 5 हजार तक के जुर्माने का दंड दिया जा सकता है। यह अपराध जमानतीय है और प्रसंज्ञेय नहीं है, अर्थात इस में प्रसंज्ञान लेने पर अभियुक्त को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए जमानती वारंट ही जारी किया जा सकता है तथा न्यायालय में उपस्थित होने पर उसे जमानत पेश करने पर हिरासत में नहीं लिया जा सकता है।

इस अपराध का परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में ही प्रस्तुत किया जासकता है और मजिस्ट्रेट को अपराध घटित होने के 1 वर्ष की अवधि में प्रसंज्ञान लेने का अधिकार है उस के पश्चात नहीं जिस का सीधा अर्थ है कि यह अपराध घटित होने के एक वर्ष की अवधि में यदि सक्षम न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत नहीं किया गया तो फिर इस अपराध के संबंध में कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं है। आप के मामले में यदि दहेज देने की अभिस्वीकृति में एक वर्ष पूर्व दहेज देना स्वीकार किया गया है तो कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं होगा।

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

चैक का भुगतान बैंक को लिख कर रुकवाना भी चैक अनादरण ही है।

June 24, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मैंने किसी व्यक्ति को उसके नाम से अगले महीने की डेट का चेक दिया हैतो क्या मैं उसे कैंसिल करवा सकता हूं। क्या वह मुझ पर केस कर सकता है?   मैंने उससे कोई उधार नहीं लिया है।

-राजीव यादव, आवास विकास, रुद्रपुर

समाधान-

कोई भी चैक आप ने किसी को दिया है तो वह उसे बैंक में समाशोधन के लिए प्रस्तुत कर सकता है। यदि चैक किसी भी वजह से डिसऑनर होता है तो चैक धारक आप को चैक की राशि का भुगतान करने के लिए 15 दिन मे ंकरने की लिखित सूचना देगा। आप नोटिस मिलने से 15 दिन में यदि राशि का भुगतान नहीं करते हैं तो आप के विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय में दाखिल किया जा सकता है।

यदि आप ने चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया है तो भी चैक धारक आप के विरुद्ध परिवाद दे सकता है। क्यों कि चैक के मामले में अदालत द्वारा  यह  माना जाएगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन दिया गया था। आपको यह साबित करना होगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था।

आप को चैक रुकवाने के लिए बैंक में आवेदन देना होगा कि चैक का भुगतान न किया जाए। लेकिन आप को तब बैंक को यह भी लिखना चाहिए कि वह चैक दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था तो किस कारण से दिया गया था। जब आप को नोटिस मिल जाए तो भी आप नोटिस का जवाब देते हुए कहें कि यह चैक दायित्व के अधीन नहीं था। बल्कि अमुक कारण से दिया गया था।

एक बार चैक डिसऑनर हो जाने के बाद और नोटिस कानून के मुताबिक आप को मिल जाने के बाद केस तो हो ही सकता है, आप को लड़ना भी पड़ेगा और अपनी सफाई पेश करनी होगी अन्यथा कुछ भी निर्णय हो सकता है।

समस्या-

गोपाल ने पूना, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे एक मित्र का एक मैसेज एक अज्ञात मोबाइल नंबर पर 2015 में गया था। जो कि मोबाइल में नंबर गलत सेव होने से हो गया था। लेकिन वह जिस का नंबर था वह एक किसी विवाहित महिला का था जिस से मेरे मित्र का कोई संबंध नहीं था। उस महिला ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जिस के कारण 354 डी आईपीसी में मुकदमा कायम हुआ और अदालत में जमानत हुई। फिर धारा 107 दंड प्रक्रिया संहिता में भी पाबंद किया गया। लेकिन मेरा मित्र जमानत के बाद अदालत में हाजिर न हुआ क्यों कि वह किसी दूसरे गाँव में रहता है। इस से मेरे मित्र को क्या नुकसान हो सकता है?

समाधान-

प के मित्र की 354 आईपीसी के प्रकरण में जमानत हुई थी इस का सीधा अर्थ है कि पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। जमानत इसी बात की थी कि आप का मित्र सुनवाई के लिए हर पेशी पर अदालत में हाजिर होता रहेगा। अब आप का मित्र अदालत में पेशियों पर हाजिर नहीं हुआ है तो उस के द्वारा पेश किए गए जमानत व मुचलके की राशि को जब्त कर के उस के नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका होगा। आप के मित्र का वर्तमान पता न्यायालय के रिकार्ड पर न होने से वारंट उस तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई पेशी पर भी वारंट तामील न होने पर आप के मित्र को फरार घोषित कर उस की संपत्ति को कुर्क करने का आदेश तथा स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है। आप के मित्र के मिल जाने पर पुलिस गिरफ्तार कर के अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है जहाँ से अदालत यदि फिर से जमानत पर न छोड़े तो जेल भेजा जा सकता है। जब तक मुकदमे का निर्णय न हो या वही अदालत या उस से ऊँची अदालत जमानत पर छोड़े जाने का आदेश पारित न करे और जमानत पेश न हो तब तक जेल में रहना पड़ सकता है।

इस का समाधान ये है कि आप के मित्र को जमानत कराने वाले वकील से मिलना चाहिए और उस अदालत में जहाँ उस की जमानत हुई थी जा कर उस मुकदमे में फिर से जमानत करानी चाहिए। पुरानी जमानत जब्ती का जुर्माना जो भी हो वह जमा करना चाहिए और पेशियों पर हाजिर हो कर मुकदमे को समाप्त कराना चाहिए। इस तरह के मुकदमे लोक अदालत में गलती स्वीकार करने पर मामूली जुर्माना जमा कर के भी समाप्त कराए जा सकते हैं।

समस्या-

प्रभात झा ने आरा, प्रतापगंज, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा दो भाई हैं। मेरे पापा और बड़े चाचा ने मिलकर जमीन खरीदी परंतु सारी ज़मीन बड़े चाचा ने अपने नाम से ले ली और पापा भी इस पर ध्यान नहीं दे सके क्योंकि वो बाहर रहकर काम करते थे। अब मेरे चाचा जी ने मौखिक रूप से जमीन बँटवारा किया है। लेकिन वो लिखित रूप से जमीन देने के लिए तैयार नही हैं, वो मनमाना ढंग से जमीन का बटवारा करना कहते हैं, साथ ही जेठांस की भी मांग करते हैं। हम लोगों के जोर देने पे वो सारा ज़मीन अपने बेटों के नाम से करने की धमकी देते हैं। हम लोगों के पास जमीन से सम्बंधित कोई दस्तावेज भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस जमीन पर पापा का कितना हक़ है और क्या वह जमीन क़ानूनी रूप से दोनों भाई में बटवारा हो सकता है। अगर हाँ तो अब हमें क्या करना चाहिए? साथ ही अगर मेरे चाचा ने जमीन धोखे से अपने बेटों के नाम पर कर दी तो उस स्थिति में हम लोग जमीन पे दावा कर सकते हैं या नहीं।

समाधान-

ब भी कोई संपत्ति संयुक्त रूप से खरीदी जाए तो उस के विक्रयपत्र में इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि विक्रय मूल्य की राशि में किस का कितना योगदान है, और खरीददार कौन कौन हैं। लेकिन भारत में अक्सर ये होता है कि रिश्तेदार एक दूसरे के भरोसे में इस तरह के सौदे करते हैं और बाद में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हमारा कहना है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ विश्वास होता है। इस कारण कम से कम चल-अचल संपत्ति और नकदी के मामलों में सहज विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि कैसे भी नहीं किया जाना चाहिए। आप के पिता ने आँख मूंद कर अपने भाई का विश्वास किया और अब उस की परेशानी न केवल वे भुगत रहे हैं बल्कि आप सभी भुगत रहे हैं।

आपके मामले में जमीन के कागजात अर्थात विक्य पत्र में आपके पिता का नाम नहीं है। लेकिन यदि उस जमीन को खरीदने में उन का भी आर्धिक योगदान है तो उस धन को जुटाने और जमीन के लिए भाई को देने के संबंध में कुछ न कुछ सबूत अवश्य होंगे। ये सबूत दस्तावेजी भी हो सकते हैं और मौखिक साक्ष्य से उन्हें साबित किया जा सकता है। य़दि आप के पिता जमीन खरीदने के लिए धन भाई को देना साबित करने की स्थिति में हों तो आप के पिता को तुरन्त भाई के विरुद्ध धोखाधड़ी के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से मना करे तो वकील की सहायता ले कर सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अन्वेषण के लिए पुलिस थाने को भेजे जाने का की प्रार्थना करना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिस से आप के पिता अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त कर सकते हैं।

कोशिश करें और लोक अदालत की भावना से मुकदमे को निपटाएँ!

October 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

स्वाती ठाकुर ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरा कोर्ट मे एक केस चल रहा है 294, 323, 506 आईपीसी की धाराओँ में, जिसमे मैं और मेरी ३ सहेलियाँ भी शामिल हैं। जो सामने वाली लड़की है, जिसने हमारे खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है, वो एक बार भी कोर्ट नहीं आयी है और मेरे साथ जो ३ लड़कियाँ हैं वो भी कोर्ट नहीं आती हैं। सिर्फ़ मैं ही हर महीने पेशी में जाती हूँ इस केस में आगे क्या होगा? वक़ील भी मुझे कुछ नहीं बताते हैं? मैं क्या करूँ? क्या जैसे सब इस केस में कोई और लड़की नहीं आती हैं मैं भी जाना बंद कर दूँ? इस केस को एक साल होने जा रहा है, कृपया राह दिखाएँ।

समाधान-

प के विरुद्ध जो मुकदमा है उस में धारा 294 आईपीसी संज्ञेय भी है और इस में आपस में राजीनामा भी नहीं हो सकता। इस धारा के कारण आप के विरुद्ध जिस लड़की ने रिपोर्ट की है उस की रिपोर्ट पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया, अन्वेषण किया और आप चारों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत कर दिया है। अब वह लड़की केवल फरियादी है लेकिन अभियोग राज्य सरकार की ओर से है इस कारण उसे हर पेशी पर आने की जरूरत नहीं है। उसे तो न्यायालय तब बुलाएगा जब उस की गवाही अदालत को दर्ज करनी होगी।

इस मुकदमे में शिकायतकर्ता लड़की से सुलह हो जाए तो भी राजीनामा संभव नहीं है। यह हो सकता है कि 294 के सिवा दो अन्य धाराओं में राजीनामा पेश कर दिया जाए और 294 को स्वीकार कर के आइंदा ऐसी हरकत नहीं करने की चेतावनी के आधार पर न्यायालय लोकअदालत की भावना से मुकदमे का निपटारा कर दे। इस संबंध में आप को अपने वकील से बात करनी चाहिए। आप उन से बात करने की जिद करेंगी तो वे आप को सब बताएंगे। यदि नहीं बताएँ तो आप वकील बदल सकती हैं।

यदि तीन सहेलियाँ मुकदमे में पेशी पर हाजिर नहीं होती हैं तो उन की हाजरी माफी का आवेदन हर तारीख पर पेश किया जाता होगा या फिर उन की जमानत जब्त हो कर उन के वारंट निकल चुके होंगे। आप पेशी पर नहीं आएंगी तो आप के भी गिरफ्तारी के वारंट निकल जाएंगे।

सब से बेहतर तरीका यह है कि यदि इस मामले में अपना अपराध स्वीकार करना किसी लड़की के कैरियर को प्रभावित न करता हो तो आप चारों अपना अपराध स्वीकार कर लें और अदालत से कहें कि इस मामले में लोक अदालत की भावना से निर्णय कर दिया जाए। वैसी स्थिति में आप को चेतावनी के दंड से दंडित कर के या थोड़ा बहुत जुर्माना कर के मुकदमे का निर्णय हो सकता है। बेहतर है कि आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के तय करें कि क्या करना चाहिए।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

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