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दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

November 11, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों और पाठकों और सहयोगियो¡

दीपावली शुभकामनाएँ!दैव की तरह दीपावली का त्यौहार फिर आ गया है। आप सभी दीपावली के इस त्यौहार को मनाने में व्यस्त हैं। आठ वर्ष से कुछ अधिक समय पहले दीपावली के कुछ दिन पूर्व 28 अक्टूबर 2007 को ‘तीसरा खंबा’ एक ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ यह नितांत वैयक्तिक प्रयास एक दिन वेबसाइट का रुप ले लेगा और इस के पाठकों के लिए एक जरूरी चीज बन जाएगा, ऐसा मैं ने सोचा भी नहीं था।

रंभ में सोचा यही गया था कि यदा कदा मैं अपने इस ब्लाग पर न्याय व्यवस्था के बारे में अपने विचारों को प्रकट करते हुए कुछ न कुछ विचार विमर्श करता रहूंगा। जब भी कहीं विमर्श आरंभ होता है तो वह हमेशा ही कुछ न कुछ कार्यभार उत्पन्न करता है। यदि विमर्श के दौरान समस्याओं के कुछ हल प्रस्तुत होते हैं तो फिर यह बात निकल कर सामने आती है कि समस्याओं के हल की ओर आगे बढ़ा जाए।  समस्याग्रस्त लोगों के सामने जो हल प्रस्तुत करता है उसी से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह हल की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कोई अभियान का आरंभ करे, उस के रास्ते पर उन का पथप्रदर्शक भी बने।  दुनिया के छोटे बड़े अभियानों से ले कर समाज को आमूल चूल बदल देने वाली क्रांतियों का आरंभ इसी तरह के विमर्शों से हुआ है।

न्याय समाज व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है।  समाज की छोटी से छोटी इकाई परिवार से ले कर  बड़ी से बड़ी इकाई राज्य को स्थाई बनाए रखने के लिए न्याय आवश्यक है। यदि चार लोग साथ रहते हों और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटाने का काम करते हों तो भी जो कुछ वे जुटा लेते हैं उस का उपयोग वे न्याय के बिना नहीं कर सकते। एक दिन के शाम के भोजन के लिए कुछ रोटियाँ जुटाई गई हैं तो उन का आवश्यकतानुसार न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है। यदि उन में से दो लोग सारी रोटियाँ खा जाएँ तो शेष दो लोगों को भूखा रहना होगा। एक-आध दिन  और यदा-कदा तो यह चल सकता है। लेकिन यदि नियमित रूप से ऐसा ही होने लगे तो दोनों पक्षों में संघर्ष निश्चित है और साथ बना रहना असंभव। जब चार लोगों का एक परिवार बिना न्याय के एकजुट नहीं रह सकता तो एक गाँव, एक शहर, एक अंचल, एक प्रान्त और भारत जैसा एक विशाल देश कैसे एकजुट रह सकता है। इस कारण मैं अक्सर यह कहता हूँ कि मनुष्य केलिया न्याय रोटी से पहले की आवश्यकता है।

ज समाज में न्याय पूरी तरह हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर निर्भर है।  भारत के गणतंत्र का रूप लेने और संविधान के अस्तित्व में आने पर उसने एक न्याय व्यवस्था देने का वायदा इस देश की जनता के साथ किया। इस संवैधानिक न्याय व्यवस्था के लागू होने की एक अनिवार्य शर्त यह भी थी कि इस के वैकल्पिक उपायों का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया जाए। लेकिन गणतंत्र के 66वें वर्ष में भी संवैधानिक न्याय व्यवस्था पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी है और संविधानेतर संस्थाएं (जातीय पंचायतें और खापें) अब भी मनमाना न्याय कर रही हैं और अपने जीवन को बनाए रखने के लिए समाज के जातिवादी विभाजन पर आधारित प्राचीन  संगठनों से शक्ति प्राप्त करती हैं।  एक जनतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए इन पुरानी संस्थाओं और संगठनों का समाप्त किया जाना नितांत आवश्यक था। इन पुरानी संस्थाओं और उन के अवशेषों को पूरी तरह समाप्त करने का यह कार्यभार गणतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं पर था।  लेकिन जब जातिवाद ही सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद के सदस्यों को चुने जाने का आधार बन रहा हो वहाँ यह कैसे संभव हो सकता था? हमारा जनतांत्रिक गणतंत्र एक चक्रव्यूह में फँस गया है जिस में जातिवादी संस्थाएँ संसद को चुने जाने का आधार बन रही हैं।  संसद को इन संस्थाओं की रक्षा करने की आवश्यकता है। जिस के लिए जरूरी है कि संवैधानिक न्याय व्यवस्था अधूरी और देश की आवश्यकता की पूर्ति के लिए नाकाफी बनी रहे जिस से इन जातिवादी संस्थाओं को बने रहने का आधार नष्ट न हो सके। जनतंत्र कभी सफल हो ही नहीं सके।

ही कारण है कि भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी न्यायपालिका को जरूरी स्तर की सुविधाएँ प्रदान नहीं कीं। जब देश में अंग्रेजों का शासन था तो अदालतें सिर्फ इतनी थीं कि वे देश की जनता पर अपना आधिपत्य बनाए रखें। उन्हें सामाजिक न्याय की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन एक जनतांत्रिक गणतंत्र बन जाने के बाद देश की गरीब से गरीब जनता को न्याय प्रदान करना इस गणतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है। यदि यह आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकी है तो हमें जानना चाहिए कि हमारा यह गणतंत्र अधूरा है। आप इस से अनुमान कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 135-140 जज नियुक्त हैं जब की भारत में 10 लाख की इसी आबादी पर केवल 12-13 जज नियुक्त हैं। अमरीका के मुकाबले केवल दस प्रतिशत अदालतें हों तो न्याय व्यवस्था कैसे चल सकती है। यही कारण है कि अदालतों में अम्बार लगा है। एक एक जज दस दस जजों का काम निपटा रहा है। ऐसे में न्याय हो सकना किसी तरह संभव नहीं है। अदालतें सिर्फ कागजी न्याय (पेपर जस्टिस) कर रही हैं। जज न्याय करने के काम ऐसे कर रहे हैं जैसे उन्हें मशीन से लॉन की घास काटना हो। अब भी न्याय केवल कारपोरेट्स, वित्तीय संस्थाओं, धनपतियों और दबंगों को मिल रहा है। इस के बाद जिस विवाद में ये लोग पक्षकार नहीं हैं उन विवादों में इन का किसी पक्षकार के पक्ष में हस्तक्षेप न्याय को अन्याय में परिवर्तित कर देता है। अदालतें कम होने पर मुकदमों का अंबार लगा है। कई कई पीढियाँ गुजर जाने पर भी न्याय नहीं मिलता। अनेक निरपराध लोग जीवन भर जेलों में सड़ते रहते हैं। जरूरी होने पर अनेक वर्षों तक तलाक नहीं मिलता, बच्चों को उपयुक्त अभिरक्षा नहीं मिलती। मकान मालिक को अपना ही मकान उपयोग के लिए नहीं मिलता तो किराएदार बिना वजह मकान से निकाल दिए जाते हैं। न्याय के अभाव में जितना अन्याय इस देश में हो रहा है उस का सानी किसी जनतांत्रिक देश में नहीं मिल सकता। उस पर जब हमारे लोग इसे दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहते हैं तो शर्म से सिर झुकाने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता।

दि देश की जनता को वास्तविक जनतंत्र चाहिए तो उसे इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। वास्तविक जनतंत्र इस देश की श्रमजीवी जनता, उजरती मजदूरों-कर्मचारियों, किसानों, विद्यालयों-महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, बेरोजगार व रोजगार के लिए देस-परदेस में भटकते नौजवानों की महति आवश्यकता है। वे ही और केवल वे ही इस चक्रव्यूह को तोड़ सकते हैं। लेकिन उन्हें इस के लिए व्यापक एकता बनानी होगी।

ह एक मकसद था जिस के लिए तीसरा खंबा ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ था।  एक न्यायपूर्ण जीवन की स्थापना सुंदर और उत्तम लक्ष्य तो हो सकता है पर उस की प्राप्ति के लिए जीवन को जीना स्थगित नहीं किया जा सकता। वह तो जैसी स्थिति में उस में भी जीना पड़ता है।  वर्तमान समस्याओं से लगातार निपटते हुए जीना पड़ता है।  यह एक कारण था कि तीसरा खंबा से पाठकों की यह अपेक्षा हुई कि वह वर्तमान समस्याओं के अनन्तिम और अपर्याप्त ही सही पर मौजूदा हल भी प्रस्तुत करे। तीसरा खंबा को यह आरंभ करना पड़ा।  आज स्थिति यह है कि तीसरा खंबा के पास सदैव उस की क्षमता से अधिक समस्याएँ मौजूदा समाधान के लिए उपस्थित रहती हैं।  पिछले एक डेढ़ वर्ष में यह भी हुआ कि तीसरा खंबा जो बात लोगों के सामने रखना चाहता था वे नैपथ्य में चली गईं और समस्याओं के मौजूदा समाधान मंच पर आ कर अपनी भूमिका अदा करते रहे।

श्री बीएस पाबला

   बीएस पाबला

स बीच 1 जनवरी 2012 को तीसरा खंबा को वेब साइट का रूप मिला।  शायद यह कभी संभव नहीं होता यदि तीसरा खंबा के आरंभिक मित्र श्री बी.एस.पाबला  इस के लिए लगातार उकसाते न रहते और इसे तकनीकी सहायता प्रदान न करते। उन के कारण ही तीसरा खंबा को आप एक वेबसाइट के रूप में देख पा रहे हैं।  इस रूप में इस के पाठकों की संख्या के साथ कानूनी समस्याओं में भी वृद्धि हुई।  पहली जनवरी 2012 से 10 नवम्बर 2015 तक 3 वर्ष 10 माह दस दिनों में (11,69,400) ग्यारह लाख उनहत्तर हजार चार सौ से अधिक पाठक तीसरा खंबा पर दस्तक दे चुके हैं। वर्तमान में लगभग 2000 पाठक तीसरा खंबा पर प्रतिदिन दस्तक दे रहे हैं। हमें यह महसूस हुआ कि प्रतिदिन एक समस्या का समाधान प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है। उसे बढ़ा कर दो करना पड़ा। लेकिन उसे हम अधिक दिन नहीं चला पाए। वह तभी संभव हो सकता है जब कि तीसरा खंबा को व्यवसायिक स्तर पर चलाया जाए। पर वह भी फिलहाल संभव नहीं है। कानूनी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करना मात्र इस वेब साइट का एक-मात्र लक्ष्य न तो कभी था और न हो सकता है। हम चाहते हैं कि सप्ताह में कुछ विशिष्ठ आलेख वर्तमान न्याय व्यवस्था की समस्याओं और एक जनतांत्रिक आवश्यकता के लिए आवश्यक आदर्श न्याय व्यवस्था के लक्ष्य पर प्रकाशित किए जाएँ।  लेकिन यह तभी संभव है जब तीसरा खंबा के कुछ सक्षम मित्रों की सहभागिता इस में रहे।  सभी सक्षम मित्रों से आग्रह है कि इस काम में तीसरा खंबा के साथ खड़े हों और न्याय व्यवस्था के संबंध में अच्छे आलेखों से इस वेब साइट की समृद्धि में अपना योगदान करें।

श्री मनोज जैन, एडवोकेट

       मनोज जैन

बी.एस. पाबला जी जैसे निस्वार्थ व्यक्तित्व के निशुल्क तकनीकी सहयोग के बिना इस साइट को यहाँ तक लाना संभव नहीं था। मुझे हमेशा महसूस होता है कि इस काम में कुछ विधिज्ञो को और जोड़ा जा सके तो हम इसे अधिक विस्तार दे सकते हैं। इस वर्ष मेरे एक युवा ऊर्जावान साथी श्री मनोज जैन इस के साथ जुड़े हैं। हम दोनों अपने प्रोफेशन में भी सहभागी हैं। उन का योगदान तीसरा खंबा को नई ऊंचाइयों तक जाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।  हम तीसरा खंबा में उन का स्वागत करते हैं।

दीपावली के अवसर पर तीसरा खंबा अपने सभी पाठकों और मित्रों का हार्दिक अभिनंदन करता है।  सभी के लिए हमारी शुभकामना है कि वे आने वाले समय में जीवन को और अधिक उल्लास के साथ जिएँ।  साथ ही यह आशा भी है कि तीसरा खंबा को पाठकों और मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहेगा।

                                                                                                                                                                                                  … दिनेशराय द्विवेदी

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copyright1समस्या-

प्रदीप शेरावत ने नजफगढ़, नई दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

क्या कोई व्यक्ति उन रचनाओं का, जो सार्वजनिक डोमेन में है, किसी अन्य भाषा में अनुवाद कर पुनः प्रकाशित करा सकता है? अगर उस से पहले किसी अन्य व्यक्ति या प्रकाशक ने उस रचना का अनुवाद कर के प्रकाशित किया हुआ है, तो क्या वह व्यक्ति या प्रकाशक बाद में अनुवाद करने वाले पर कोई क़ानूनी कारवाही कर सकता है? अथवा भाषा शैली की चोरी का इल्जाम लगा सकता है? क्यूंकि अनुवाद कितने ही लोगों द्वारा किया जाए पर सभी अनुवाद मूल रचना के अनुसार ही होंगे। सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध रचनाओं को पुनः प्रकाशित करने के लिए किन-किन बातों और नियमों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि किसी भी तरह की कानूनी उलझनों से बचा जा सके?

समाधान-

किसी भी रचना का सार्वजनिक डोमेन में होने का कोई कानूनी अर्थ नहीं है। आप को पहले यह जानना चाहिए कि उस रचना पर किसी का कापीराइट जीवित है या नहीं है। यदि उस रचना पर किसी का कोई कापीराइट है तो उस का किसी भी तरह का कोई उपयोग बिना कापीपाइट धारक की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।

दि आप किसी ऐसी रचना का अनुवाद कर रहे हैं जिस पर किसी तरह का कोई कापीराइट नहीं है तो उस में परेशान होने की किसी तरह की कोई आवश्यकता तब तक नहीं है जब तक अनुवाद करने में आप ने पूर्व में हो चुके अनुवादों की सहायता न ली हो। क्यों कि यह संभव ही नहीं है कि एक रचना का कोई दो व्यक्ति अनुवाद करें और वे दोनों कहीं भी हू-ब-हू हो जाएँ। किसी भी भाषा के शब्दकोष एक हो सकता है लेकिन उसी भाषा का हर व्यक्ति का शब्दभंडार भिन्न भिन्न और अभिव्यक्ति का तरीका भी भिन्न होता है।

क्या क्या कार्यवाहियाँ की जा सकती हैं? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाना संभव नहीं है। कोई भी व्यक्ति यदि उसे किसी को परेशान करना हो तो किसी भी तरह की कोई भी मिथ्या कार्यवाही भी कर सकता है। उस का इलाज यही है कि उस का प्रतिवाद किया जाए और इस प्रकार संस्थित कार्यवाही को निरस्त कराया जाए। इस कारण इस तरह की समस्याओं पर तभी विचार किया जाना चाहिए जब ऐसी कार्यवाही हो कर सामने आ जाए। आप को केवल यह सावधानी बरतनी है कि आप का आशय सही हो। यदि आप किसी भी कार्य को बिना किसी दुराशय और सदाशयता के साथ करेंगे और किसी के अधिकार का अतिक्रमण नहीं करेंगे तो आप के विरुद्ध की गई किसी भी कार्यवाही का आसानी से प्रतिवाद किया जा सकेगा।

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copyright1समस्या-

धीरेन भट्ट ने अहमदावाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

म गूगल पर से कोई फोटो डाउनलोड करते हैं तब नीचे लिखा आता है कि subject to copyright अगर यह फोटो हम डाउनलोड करके उस फोटो में जोक या कोई सुविचार या अन्य कुछ भी लिख कर नीचे हमारा नाम लिख कर Facebook या whatsapp पर upload करें तो हम गुनहगार होते है या नहीं? ऐसा हम कर सकते हैं? इस बारे में मुझे पूरी जानकारी देने की कृपा करें। अगर possible होतो मुझे मेरे email पर उत्तर दें।

समाधान-

ब से पहले तो हम बता दें कि हम ई-मेल पर किसी को समस्या का समाधान नहीं देते, यह हमारे लिए संभव नहीं है। जब भी संभव होगा उस की सूचना तीसरा खंबा पर दे दी जाएगी।

भी कलात्मक कृतियों पर स्वतः ही कापीराइट होता है और कृतिकार की अनुमति के बिना उस की कृति का उपयोग करना कापीराइट एक्ट का उल्लंघन है जो कापीराइट अधिनियम की धारा 63 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है, अर्थात आप जब कापीराइट का उल्लंघन करते हैं तो आप गुनहगार होते हैं। गूगल से किसी भी चित्र को डाउनलोड करना अपराध नहीं है। लेकिन डाउनलोड करने के बाद उस का उपयोग अन्यत्र फेसबुक, व्हाट्सएप, पत्रिका, समाचार पत्र आदि पर स्वतंत्र रूप से या उस में कुछ जोड़ घटा कर अपलोड करना कापीराइट का उल्लंघन है।

ई लोग ऐसा करते हैं, लेकिन वे कापीराइट एक्ट का उल्लंघन कर के अपराध कर रहे होते हैं। यदि उन की शिकायत हो तो उन के विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है। जिस का कापीराइट है वह उस की कृति के उपयोग के लिए हर्जाने या उपयोग शुल्क की मांग भी कर सकता है।

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केवल सूचनाएँ कृतियाँ नहीं हैं, उन पर कोई कॉपीराइट नहीं होता …

September 27, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
INTERESTING FACTSसमस्या-

मालेर कोटला, पंजाब से साहिल कुमार ने पूछा है-

मुझे तीसरा खंबा से कॉपीराइट से सम्बन्धित कुछ जानकारी चाहिए। मैं एक 11वीं कक्षा का छात्र हूँ और मेरा ब्लॉगर पर एक ब्लॉग www.interestingfactsinhindi.blogspot.com है। इस ब्लॉग पर मैं भिन्न-भिन्न चीजों के बारे में रोचक तथ्य डालता हूँ, जो कि मैं अंग्रेजी साइट्स से अनुवाद करता हूँ पर किसी एक साइट से नहीं बल्कि अलग अलग से करता हूँ। मेरा प्रश्न यह है कि  उन साइटस को कैसे पता चलेगा कि कोई उनकी सामग्री का अनुवाद करके कोई अपने ब्लॉग पर डाल रहा है, और वह पता चलने के बाद क्या कर सकते हैं। मैं उक्त ब्लॉग के अलावा एक ऐसा ब्लॉग भी बनाना चाहता हूँ जिस में कि मैं ज्ञान से संम्बंधित कई और भी चीजें डालना चाहता हूँ और उस की सामग्री भी शायद मैं इसी तरह से एकत्र करूँ। कृपया मेरी कॉपीराइट सम्बन्धी इस अज्ञानता और डर को दूर करें।

समाधान-

साहिल कुमार जी, सब सब से पहले तो मैं आप के श्रम की सराहना करना चाहता हूँ कि आप ज्ञानवर्धक तथ्यों को अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद कर के अपने उक्त ब्लाग पर डाल कर हिन्दी अंन्तर्जाल के पाठकों को यह ज्ञानवर्धक सामग्री उपलब्ध करवा रहे हैं। इस तरह आप वास्तव में हिन्दी की सेवा कर रहे हैं और उस समृद्ध भी कर रहे हैं। आप को इस कार्य के लिए बहुत बहुत बधाई¡ आप एक ब्लाग और भी ऐसा ही बनाना चाहते हैं। एक व्यक्ति के लिए दो ब्लाग निरन्तर चला पाना संभव नहीं होता। फिर वह भी तब जब आप एक विद्यार्थी हैं। आप को अभी अपने विद्यार्थी जीवन के लक्ष्य भी प्राप्त करने हैं। इस तरह आप को पूरा समय अपने अध्ययन में देना चाहिए। उस से समय बचने के बाद ही ब्लागिंग करनी चाहिए। मेरा आप को सुझाव है कि जो भी आप सामग्री प्रस्तुत करना चाहते हैं उसे एक ही ब्लाग पर डालें। इस से आप का ब्लाग जल्दी जल्दी अपडेट होगा और आप के पाठकों की संख्या में भी वृद्धि होगी। आप ने अपने ब्लाग पर सामग्री को विषयों के हिसाब से वर्गीकृत किया हुआ है इस कारण से यदि एक से अधिक विषयों की सामग्री को भी आप एक ही ब्लाग पर प्रस्तुत करेंगे तो आप के ब्लाग की रेटिंग भी अच्छी होगी। आप का ब्लाग बहुत उपयोगी सिद्ध हो और उस के पाठक निरन्तर बढ़ते रहें ऐसी मेरी शुभकामना है।

कापीराइट के संबंध में बहुत अधिक डरने की कोई जरूरत नहीं है। आप जिस तरह की सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं वह सामान्य ज्ञान से संबंधित सामग्री है। वह कोई कृति नहीं है। आप केवल कूछ सूचनाएँ अपनी भाषा में अपनी खुद की शैली में प्रस्तुत कर रहे हैं। इस तरह की सामग्री पर किसी तरह का कोई कापीराइट नहीं होता है। आप इस तरह की सामग्री बिना किसी भय के प्रस्तुत करते रह सकते हैं। यदि आप किसी मौलिक कलात्मक रचना का अनुवाद प्रस्तुत करेंगे तो ही कॉपीराइट का प्रश्न उत्पन्न होगा। अभी आप जो सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं वे किसी तरह की कृति का अनुवाद नहीं है, वे केवल सूचनाएँ मात्र हैं, उन पर किसी तरह का कापीराइट नहीं है।

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कापीराइट के उल्लंघन को रोकने के लिए क्या करें?

August 13, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
graphic designसमस्या-

रायपुर, छत्तीसगढ़ से रहीम खान ने पूछा है –

मैं ग्राफिक्स डिजाईन का कार्य करता हूँ। जो भी ग्राफिक्स डिजाईन बनाता हूँ। उसकी कॉपी हो जाती है। मैं कैसे कॉपीराईट कानून का इस्तेमाल करूं। और मेरे फर्म के बनाये हुए कलात्मक कलाकृतियों को सुरक्षा प्रदान करूं?

समाधान-

ग्राफिक डिजायन भी एक कलात्मक कृति है और जो जिस कृति को जन्म देता है उसी के पास उस का कापीराइट होता है। बिना उस की अनुमति के कोई भी उस कृति का उपयोग नहीं कर सकता। कापीराइट के लिए यह आवश्यक नहीं कि आप अपनी कृति को पंजीकृत करायें ही। हालाँकि किसी डिजाइन के कापीराइट के पंजीयन की सुविधा भी उपलब्ध है।

प ग्राफिक डिजाइन का कार्य किस तरह करते हैं? यह आप ने स्प्ष्ट नहीं किया है। ग्राफिक डिजाइन का कार्य या तो आप किसी के लिए संविदा पर करते हैं, या फिर किसी के नियोजन में करते हैं, या फिर स्वतंत्र रूप से अपने लिए करते हैं। यदि संविदा में यह स्पष्ट नहीं है कि डिजाइन पर कापीराइट किस का रहेगा तो उस डिजाइन का कापीराइट डिजाइन बनाने वाले का रहता है। जब आप किसी से भी डिजाइन बनाने के लिए संविदा करते हैं तो वह भी दो तरह की हो सकती है। एक संविदा में आप के ग्राहक को केवल किसी एक काम के लिए उस डिजाइन का उपयोग करने की छूट देते हैं। लेकिन बाद में उसे वह डिजाइन पसंद आ जाता है और वह अपने अन्य कामों में भी उस डिजाइन का करना चाहता है तो वह आप की अनुमति के बिना ऐसा नहीं कर सकता। ऐसी संविदा में कापीराइट आप के पास ही रहता है, लेकिन उस डिजाइन के केवल विशिष्ट उपयोग की आप उसे अनुमति देते हैं। दूसरे आप अपने ग्राहक को संपूर्ण उपयोग की छूट देते हैं तो वह उस का कोई भी उपयोग कर सकता है लेकिन फिर भी कापीराइट आप के पास रहता है। एक तीसरी संविदा ऐसी भी हो सकती है जिस में आप ग्राहक को उस का कापीराइट भी दे दें।

दि आप किसी के कर्मचारी के रूप में वेतन पर काम करते हुए डिजाइन बनाते हैं तो उस पर कापीराइट नियोजक का होता है।

किसी व्यक्ति द्वारा विशेष रूप से किया गया डिजाइन का कार्य अनेक प्रकार का हो सकता है जैसे-

  1. एक बड़े काम के लिए किया गया कोई हिस्सा, जैसे किसी अखबार या पत्रिका के लिए किया गया कार्य।
  2. किसी फिल्म या दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम के लिए किए गए कार्य का एक हिस्सा।
  3. किसी किए गए कार्य का संपादन।
  4. किसी किए गए कार्य का अनुवाद।
  5. पूरक कार्य, जैसे किसी पुस्तक के लिए बनाए गए ग्राफ।
  6. किसी मानचित्र के लिए बनाए गए ग्राफिक्स, आदि।

स तरह के कामों को यदि आप वेतन ले कर करते हैं या काम में अपनी हिस्सेदारी का ठेका लेकर करते हैं तो उन पर कापीराइट आप का नहीं होगा। लेकिन यदि आप कार्य करने की संविदा में स्प्ष्ट करते हैं कि आप के द्वारा किए गए कार्य का कापीराइट आप के पास रहेगा तो उस पर कापीराइट आप का होगा।

स तरह ग्राफिक डिजाइन के कार्य के लिए आप जब भी संविदा करते हैं तो आप को उस संविदा को किसी वकील को अवश्य दिखा लेना चाहिए जिस से आप कापीराइट की रक्षा कर सकें।

किसी भी डिजाइन पर कापीराइट आप का है और उस का कोई अनधिकृत व्यक्ति उपयोग करता है या उस में संशोधन कर के नकल करता है तो वह व्यक्ति आप के कापीराइट का उल्लंघन करता है। यह उल्लंघन कापीराइट अधिनियम की धारा 63 के अन्तर्गत अजमानतीय अपराध है। आप इस के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना में दर्ज करवा सकते हैं। यदि अन्वेषण में पाया गया कि कापीराइट का उल्लंघन किया गया है तो पुलिस अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी। उसे छह माह से तीन वर्ष तक के कारावास के साथ पचास हजार से दो लाख रुपयों तक का जुर्माने के दंड से दंडित किया जा सकता है।

दि कोई व्यक्ति आप द्वारा निर्मित डिजाइन का उपयोग कर के या उसे संशोधित कर उपयोग कर के आप के कापीराइट का उल्लंघन कर रहा है तो आप उस व्यक्ति द्वारा उस डिजाइन के उपयोग करने से रोकने के लिए दीवानी न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते है तथा उस के द्वारा किए गए उपयोग के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए वाद भी कर सकते हैं।

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समस्या-

मैं आईटी सैक्टर में हूँ, वर्तमान में मैं एक प्राइवेट फर्म  में काम कर रही हूँ। दो वर्ष पूर्व मैं एक व्यक्ति के संपर्क में आई जो कि उस के व्यवसाय के लिए कुछ आईटी एप्लीकेशन्स विकसित करवाना चाहता था। मैं ने उस के लिए आवश्यक सोफ्टवेयर तैयार किए तथा उसे जब भी आवश्यकता हुई आवश्यक सपोर्ट प्रदान किया। मैं ने जब भी उक्त कार्य के भुगतान के लिए उक्त व्यक्ति से कहा उस ने साफ साफ कोई उत्तर नहीं दिया। यह व्यक्ति भारतीय है और अमरीका में ग्रीन कार्ड होल्डर है। मैं उस से अपना पैसा कैसे प्राप्त कर सकती हूँ। मैं सोचती हूँ कि मैं उस के नियोजक जो कि एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी है को शिकायत करूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

-श्वेता शर्मा, बैंगलोर, कर्नाटक

समाधान-

प ने जो कार्य उस व्यक्ति के लिए किया वह आप के तथा उस व्यक्ति के बीच एक संविदा कार्य था। आप के मामले में यदि कोई स्पष्ट और लिखित संविदा हुई हो कि उस व्यक्ति को आप के कार्य के लिए एक निश्चित राशि अदा करनी है तो आप अपना कार्य संपन्न कर चुकी हैं और आप संविदा के अनुसार उक्त कार्य के लिए जो भी धन निश्चित हुआ हो वह उस से प्राप्त करने की अधिकारी हैं। इस तरह के मामलों में लिखित संविदा का होना निहायत जरूरी है।

दि आप का और उस के बीच कोई संविदा नहीं हुई हो तो आप उसे अपने काम की शुल्क स्वयं निर्धारित कर उसे भेज सकती हैं जिस में आप यह कह सकती हैं कि वह  उक्त बिल के भुगतान तक उक्त सोफ्टवेयर का उपयोग नहीं करे। क्यों कि उक्त सोफ्टवेयर को आपने विकसित किया है और उस पर आप का कापीराइट है। आप की अनुमति के बिना वह व्यक्ति उस सोफ्टवेयर का उपयोग नहीं कर सकता जिसे आपने विकसित किया है।

दि बिल भेजने के उपरान्त निर्धारित अवधि में वह व्यक्ति आप को आप के काम के मूल्य का भुगतान न करे तो आप उसे विधिक सूचना (Legal Notice) दें कि वह आप के काम का भुगतान निश्चित अवधि में कर दे अन्यथा आप अपनी शुल्क की राशि प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत करेंगी तथा कापीराइट के उल्लंघन के लिए दीवानी और अपराधिक मुकदमा चलाएँगी, तथा उस के नियोजक को भी शिकायत करेंगी।

नोटिस के उत्तर में भुगतान प्राप्त न होने की दशा में आप उक्त कार्यवाहियों में से कोई एक या सभी कर सकती हैं। पर मेरी राय यह है कि आप पहले न्यायालय में एक वाद उक्त सोफ्टवेयर को उस व्यक्ति द्वारा उपयोग में लेने से रोके जाने के लिए निषेधाज्ञा जारी करने के लिए प्रस्तुत करें और तुरंत अस्थाई निषेधाज्ञा जारी करवाएँ।  उस के बाद उस के नियोजक को सूचित करें, फिर भी काम न हो तो आप कापीराइट एक्ट के अंतर्गत उस के विरुद्ध अपराधिक मामला दर्ज कराएँ। आप उस से अपनी शुल्क और क्षतियाँ प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकती हैं। पर ध्यान रहे शुल्क वसूली के लिए वाद वादकारण उत्पन्न होने के तीन वर्ष की अवधि में ही किया जा सकता है।

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बालक की अभिरक्षा के निर्णय में उस का हित सर्वोपरि

January 30, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

न्यायालयों के समक्ष अनेक बार माता, पिता और संरक्षक के बीच यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि बालक किस की अभिरक्षा में रहे? ऐसे प्रश्नों पर निर्णय देने में सर्वोपरि तथ्य यह है कि बालक का हित किस के संरक्षण में रहने पर साध्य होगा। सर्वेोच्च न्यायालय ने श्यामराव मारोती कोरवाटे बनाम दीपक किसनराव टेकम के मुकदमे में यही व्यवस्था प्रदान की है।

क्त प्रकरण में दीपक किसनराव का विवाह कावेरी के साथ 2002 में सम्पन्न हुआ था। 2003 में उस ने एक बालक विश्वजीत को जन्म दिया। लेकिन बालक के जन्म के उपरान्त अत्यधिक रक्तस्राव के कारण कावेरी का देहान्त हो गया। माता के देहान्त के उपरान्त बालक उस की नाना श्यामराव मारोती के संरक्षण में पलता रहा। दीपक किसनराव ने दूसरा विवाह कर लिया जिस से उसे एक और पुत्र का जन्म हुआ। इस बीच अगस्त 2003 में बालक के नाना ने बालक का संरक्षक नियुक्त करने के लिए जिला न्यायालय को आवेदन किया जब कि पिता ने बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए। जिला जज ने दोनों प्रार्थना पत्रों पर एक ही निर्णय देते हुए बालक के 12 वर्ष का होने तक की अवधि के लिए  नाना को उस का संरक्षक  नियुक्त किया। न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि तब तक पिता को बालक से मिलने की स्वतंत्रता होगी। जिला न्यायाधीश ने पिता के आवेदन को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि वह बालक के 12 वर्ष का होने के पश्चात बालक की अभिरक्षा के लिए पुनः आवेदन कर सकता है।

पिता ने जिला न्यायाधीश के निर्णय को मुम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर बैंच के समक्ष नअपील प्रस्तुत कर चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पिता की अपील को स्वीकार करते हुए बालक की अभिरक्षा पिता को देने का निर्णय प्रदान किया। नाना ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि पिता के प्राकृतिक संरक्षक होते हुए भी बालक के हितों को देखते हुए न्यायालय किसी अन्य व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर सकता है। इस मामले में जन्म से ही बालक नाना के साथ निवास कर रहा है और उस का लालन-पालन सही हो रहा है उस की शिक्षा भी उचित रीति से हो रही है ऐसी अवस्था में जिला जज द्वारा नाना को 12 वर्ष की आयु तक के लिए बालक का संरक्षक नियुक्त किया जाना विधिपूर्ण था।

र्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि बालक 12 वर्ष की आयु तक नाना के संरक्षण में ही रहेगा। इस अवधि में पिता बालक के विद्यालय का दो सप्ताह से अधिक का अवकाश होने पर सात दिनों तक के लिए पिता बालक को अपने पास रख सकेगा। जिस के दिनों की पूर्व सूचना पिता बालक के नाना को देगा। इस के अतिरिक्त माह में दो बार अवकाश के दिन शनिवार रविवार को या किसी अन्य त्योहारी अवकाश के दिन नाना बालक को सुबह से शाम तक उस के पिता के पास रहने देगा। इस बीच पिता चाहे तो बालक के स्कूल की फीस, ड्रेस, पुस्तकें व भोजन आदि का खर्च उठा सकता है। बालक 12 वर्ष की आयु का होने के उपरान्त पिता उस की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए जिला न्यायाधीश के समक्ष फिर से आवेदन कर सकेगा।

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क्‍या किसी समाचार पर भी किसी का कॉपीराइट होता है?

August 4, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
 
 एक पाठक श्री मलखान सिंह आमीन ने पूछा है –

मैं जानना चाहता हूं कि क्‍या किसी समाचार पर भी किसी का कॉपीराइट होता है? जैसे मान‍ लीजिए बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान या अमिताभ बच्‍चन कोई पार्टी आर्गेनाइज करते हैं या किसी समारोह का हिस्‍सा बनते हैं। जाहिर है कि इसकी खबर बनेगी ही।  अब इन कार्यक्रमों की खबर बनने और छपने के बाद क्‍या इन पर कॉपीराइट रहेगा या नहीं?  अभी तक मेरी जानकारी में इतना ही है कि न्‍यूज और किसी भी तरह की सूचना पर किसी का कोई कॉपीराइट नहीं होता। 

 उत्तर –

मलखान सिंह जी,

प्रश्न पूछने के लिए आभार। आप की जानकारी सही है। किसी समाचार अथवा सूचना पर किसी व्यक्ति का कोई कॉपीराइट नहीं होता है। तीसरा खंबा की चिट्ठी कॉपीराइट किन किन कृतियों में उत्पन्न होता है तथा अवस्थित रहता है?  में स्पष्ट रूप से बताया गया है  कि किन किन कृतियों में कॉपीराइट अवस्थित रहता है। यहाँ प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम की धारा 13 पुनः उदृत करना उचित होगा। यह निम्न प्रकार है –

13. कृतियाँ जिन में कॉपीराइट अवस्थित रहता है


(1) इस धारा तथा इस कानून के प्रावधानों की परिधि में सम्पूर्ण भारत में कृतियों की जिन श्रेणियों पर कॉपीराइट अवस्थित रहेगा, वे निम्न प्रकार हैं

(क) मूल साहित्यिक, नाटकीय, संगीतीय और कलात्मक कृतियाँ;
(ख) सिनेमा फिल्में; और
(ग) ध्वन्यांकन।
स उपबंध को पढ़ कर आप स्वयं निर्धारित कर सकते हैं कि किन किन कृतियों में कॉपीराइट अवस्थित रहता है और किन किन कृतियों में नहीं रहता है। उक्त प्रकार की कृतियों में से भी कुछ कृतियाँ ऐसी हैं जिन में कॉपीराइट अवस्थित नहीं रहता। इस सम्बन्ध में उपधारा (2) निम्न प्रकार है –

(2) जिन कृतियों पर धारा 40 तथा 41 के प्रावधान लागू होते हैं उन के अलावा उक्त उप धारा (1) में वर्णित कृतियों में कॉपीराइट अवस्थित नहीं होगा जब तक कि वह कृति
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(i) प्रकाशित कृति है तो सर्वप्रथम भारत में प्रकाशित हुई है, और कृति यदि भारत के बाहर प्रकाशित हुई है तो के मामले में प्रकाशन की तिथि पर उस का कृतिकार, या प्रकाशन की तिथि पर कृतिकार जीवित न रहा हो तो उस की मृत्यु की तिथि पर वह भारत का नागरिक हो;
(ii) वास्तुकलात्मक कृति के अलावा एक अप्रकाशित कृति के मामले में कृतिकार कृति के संपन्न होने की तिथि को भारत का नागरिक हो या वह भारत में निवास करता हो; और
(iii) वास्तुकलात्मक कृति के मामले में कृति भारत में स्थित हो।

स्पष्टीकरण यदि कृति एक संयुक्त कृतित्व है तो इस उपधारा में वर्णित कॉपीराइट के लिए आवश्यक शर्तें सभी कृतिकारों को संतुष्ट करनी होंगी।

सी धारा की उपधारा (3) व (4) भी यह बताती हैं कि किन किन कृतियों में कॉपीराइट अवस्थित नहीं रहता है –
(3) कॉपीराइट अवस्थित नहीं होगा –
(क) किसी भी सिनेमा फिल्म में, यदि फिल्म का महत्वपूर्ण अंश किसी अन्य कृति का उल्लघंन है;
(ख) किसी साहित्यिक, नाटकीय या संगीतीय कृति के संबंध में निर्मित ध्वन्यांकन में, यदि ध्वन्यांकन के निर्माण में कॉपीराइट का उल्लंघन किया गया है;

(4) किसी भी सिनेमा फिल्म या ध्वन्यांकन में कॉपीराइट उस कृति के कॉपीराइट पर बेअसर रहेगा जिस के सम्बन्ध में या जिस के महत्वपूर्ण अंश के सम्बन्ध में वह सिनेमा फिल्म या ध्वन्यांकन जिस का भी निर्माण किया गया है।
शा है,आप को आप की जिज्ञासा का उत्तर मिल जाएगा।
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बेबी कुमारी ने पूछा है – 

कॉपीराइट कैसे प्राप्त किया जाता है,  हम कहाँ से कॉपीराइट प्राप्त कर सकते हैं, इसे प्राप्त करने के लिए क्या क्या औपचारिकताएँ पूरी करनी पड़ती हैं?


 उत्तर –


बेबी कुमारी जी,
प के प्रश्न से लगता है कि आप यह नहीं जानती कि कॉपीराइट क्या है। पहले उसे समझने का प्रयत्न करें।  तीसरा खंबा पर पूर्व में कुछ पोस्टें इस विषय पर लिखी गई हैं जिन्हें आप यहाँ कॉपीराइट शब्द पर क्लिक कर के पढ़ सकती हैं। इन से आप को इस के बारे में प्रारंभिक जानकारी प्राप्त हो जाएगी। 

कॉपीराइट कानून के प्रभाव से किसी भी कृति पर उस के कृतिकार का कॉपीराइट जैसे ही उस कृति की रचना संपन्न होती है, स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है। बस कृतिकार के पास उस का प्रमाण होना चाहिए। पुस्तक, चित्र, छायाचित्र, किसी भी लिखित सामग्री आदि के सम्बंध में उस का प्रथम प्रकाशन उस के कॉपीराइट का अच्छा प्रमाण है। इस तरह सामान्य रूप से कॉपीराइट का पंजीयन कराना आवश्यक नहीं है। कॉपीराइट का पंजीयन कराने से केवल यह सुविधा मिलती है कि कॉपीराइट का पंजीयन किसी कृति पर कृतिकार का कॉपीराइट होने प्रथम दृष्टया प्रमाण माना जाता है। लेकिन कानून के समक्ष कॉपीराइट अधिकार को चुनौती प्राप्त होने पर पंजीयन होने पर भी यह साबित करना पड़ेगा कि पंजीयन के पूर्व कृतिकार को किसी कृति विशेष पर कॉपीराइट प्राप्त था। 

भारत में शिक्षा विभाग में कॉपीराइट कार्यालय स्थापित किया गया है। यहाँ कॉपीराइट पंजिका सुरक्षित रखी जाती है। कॉपीराइट कार्यालय के मुखिया को कॉपीराइट पंजीयक बनाया गया है। यह कार्यालय बी.2/डब्लू.3. सी.आर. बैरेक्स, कस्तूरबा गाँधी मार्ग, नई दिल्ली-110 003 पर स्थित है। किसी भी कृतिकार को अपनी किसी कृति के कॉपीराइट का पंजीयन कराना है तो वह उक्त पते पर संपर्क कर सकता है।

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डॉ. भूपेन्द्र ने पूछा है –
एक प्रकाशक ने 18 वर्ष पूर्व मेरे द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक को मामूली रूप परिवर्तन के साथ पुनः प्रकाशित किया है। क्या इस मामले पर कॉपीराइट अधिनियम लागू होगा। मेरी पुस्तक साहित्यिक पुस्तक  है। इस दृष्टि से क्या कुछ किया जा सकता है?यद्यपि मेरी पुरानी पुस्तक में कोई आई. एस.बी .एन .नंबर आदि नहीं थे और प्रकाशन व्यक्तिगत रूप से किया गया था जबकि नई पुस्तक में नंबर भी है ,क्या इनका प्रभाव होगा ?
उत्तर-
डॉ. साहब!
मैं पहले भी स्पष्ट कर चुका हूँ कि किसी भी कृति (work) का प्रतिलिप्याधिकार (copyright) उस कृति के रचनाकार का होता है। आप की पुस्तक पर आप का प्रतिलिप्याधिकार है। इस का सबूत यह भी है कि आप की पुस्तक 18 वर्ष पूर्व प्रकाशित हो चुकी थी। उस पुस्तक की प्रकाशित प्रतियाँ, मुद्रक की गवाही आदि उस के प्रमाण हैं।  आप की इस पुस्तक को आप की अनुज्ञप्ति के बिना कोई अन्य व्यक्ति प्रकाशित करता है तो यह आप के प्रतिलिप्याधिकार का उल्लंघन होगा। यह उल्लंघन कॉपीराइट एक्ट की धारा 63 के द्वारा दंडनीय अपराध है। यदि ऐसा अपराध मुनाफा कमाने के लिए किया गया है तो इस अपराध को करने वालों को 50 हजार रुपए से दो लाख रुपए तक का जुर्माना और छह माह से तीन वर्ष तक के कारावास का दंड दिया जा सकता है। इस के अतिरिक्त आप दीवानी उपाय भी कर सकते हैं। न्यायालय मे दावा प्रस्तुत कर उल्लंघन कर प्रकाशित की गई पुस्तकों की बिक्री को रुकवा सकते हैं, उन्हें नष्ट करने का आदेश प्राप्त कर सकते हैं और हर्जाने की मांग कर सकते हैं।
आप का कहना है कि आप की पूर्व में प्रकाशित पुस्तक में मामूली रूप परिवर्तन किए जा कर नई पुस्तक प्रकाशित की गई है  और प्रकाशक ने उस में आईएसबीएन नंबर भी डाला है। मामूली रूप परिवर्तनों के साथ भी किसी कृति को अनधिकृत रूप से प्रकाशित करना प्रतिलिप्याधिकार का उल्लंघन है। फिर भी आप यह जानने के लिए किसी ऐसे वकील की सेवाएँ प्राप्त कर सकते हैं कि आप के प्रतिलिप्याधिकार का उल्लंघन हुआ है या नहीं। वह दोनों पुस्तकों को पढ़ कर यह निर्णय कर सकता है। जहाँ तक आईएसबीएन नंबर का प्रश्न है इस से किसी का प्रतिलिप्याधिकार प्रभावित नहीं होता है। यह केवल किसी पुस्तक के प्रकाशन की उसी तरह पहचान है जिस तरह किसी मोटर गाड़ी की पंजीयन संख्या होती है। इस का लाभ केवल मात्र यह है कि इस से तुरंत जाना जा सकता है कि यह पुस्तक किस प्रकाशक ने, कब, कहाँ से, किस ग्रुप और किस शीर्षक से  प्रकाशित की है।

कॉपीराइट के बारे में अधिक जानकारी यहाँ चटका लगा कर प्राप्त की जा सकती है।

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