Indian Evidence Act Archive

courtroomसमस्या-

ब्यावर, राजस्थान से दिनेश कुर्ड़िया ने पूछा है –

मेरी पत्नी ने मुझ पर झूठा 498-ए का मुकदमा दर्ज कराया तब उस ने अलग घटना बताई, तथा  मेरे द्वारा जब मेरी पत्नी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया तो मेरी पत्नी ने उसी समय की अलग घटना बताई। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

हली घटना जिस पर आप की पत्नी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई है, उस की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ आप प्राप्त कर सकते हैं। आप की पत्नी ने दूसरा बयान कहाँ दिया है इस का उल्लेख आपने नहीं किया है। हो सकता है वह उस ने आप के द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे के जवाब के रूप में न्यायालय में प्रस्तुत किया हो। आप को दोनों ही बयानों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर सभी मुकदमों की पत्रावलियो में प्रस्तुत कराएँ जिस से आप की पत्नी के दोनों तरह के बयान हर पत्रावली में रेकार्ड पर आ जाएँ। इस से यह पता लगेगा कि आप की पत्नी दो तरह के बयान दे रही है।

ब उन मुकदमों में आप की पत्नी के बयान हों तो उस से जिरह के दौरान इन दोनों बयानों को प्रदर्शित करवाते हुए इन की सत्यता के बारे में प्रश्न करने होंगे जिस से आप की पत्नी का मिथ्यापन न्यायालय के समक्ष साबित हो जाए।

दि 498-ए का मुकदमा मिथ्या साबित हो जाता है तो यह क्रूरता की श्रेणी में आएगा और इस आधार पर आप को विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

मुजफ्फरपुर, बिहार से रामनारायण कुमार ने पूछा है-

क लड़की शादी के बाद अपने ससुराल से झगड़ा करके मायके चली आई। मायके में आने के समय उसे तीन माह का गर्भ था।  मायके में उसने एक लड़के को जन्म दिया। लड़के वाले ने लड़की को अपने ससुराल चलने को कहा तो उस ने जाने से इनकार कर दिया। लड़का पक्ष समाज को विदा करने के लिए निवेदन किया।  लड़की पक्ष ने समाज का भी कहना नहीं माना।  तब हार कर लड़का पक्ष ने फॅमिली कोर्ट में आवेदन दिया।  लड़की पक्ष ने दहेज प्रताड़ना का झूठा केस लड़का पक्ष पर कोर्ट में कर दिया है।  इस में लड़का पक्ष को क्या करना चाहिए?  लड़का पक्ष लड़की एवम् उस बच्चे को मान सम्मान के साथ रखना चाहता है।

समाधान-

Lawyers in courtप ने अपनी समस्या में यह नहीं बताया कि लड़का पक्ष ने फैमिली कोर्ट में आवेदन किस संबंध में दिया है, विवाह विच्छेद के लिए अथवा दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना (पत्नी को ससुराल लाने) के लिए? खैर¡

ड़का पक्ष को अपना मुकदमा पूरी तैयारी के साथ लड़ना चाहिए। गवाह सबूत प्रस्तुत करने में कोई कोताही नहीं करनी चाहिए। उसी तरह उस के व उस के परिवार के विरुद्ध दहेज प्रताड़ना का जो झूठा मुकदमा किया गया है उस में भी अच्छा वकील कर के मजबूती से प्रतिरक्षा करना चाहिए। यदि लड़का पक्ष सही और सच्चा है तो उस का आवेदन भी न्यायालय मंजूर करेगा और उन के विरुद्ध जो मिथ्या मुकदमें बनाए गये हैं वे भी खारिज हो जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता है तो आगे अपील भी की जा सकती है।

क्सर इस तरह के मामलों में कभी यदि सचाई हारती है तो वह केवल इस कारण से न्यायालय में अपने पक्ष के गवाह सबूत ठीक से प्रस्तुत नहीं किए जाते और प्रतिरक्षा सही तरीके से नहीं होती। इस कारण से यह जरूरी है कि लड़का पक्ष का वकील अच्छा हो, मुकदमे को समय देने वाला हो। वकील को तथ्य और साक्ष्य हमेशा पक्षकार ही ला कर देते हैं। यदि स्वयं पक्षकार सबूत जुटाने और तथ्यों को अपने वकील को बताने में कोई कमी रखता है तो एक अच्छा वकील होने पर भी मुकदमे में हार का सामना करना पड़ सकता है। इस लिए मुकदमा करने के बाद सबूत और साक्ष्य जुटाने में तथा तथ्यों को बताने में पक्षकारों को पूरी गंभीरता बरतनी चाहिए।

सचाई साबित करने के लिए जिरह (Cross Examination) का प्रयोग करें।

December 28, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से सतीश कुमार जानना चाहते हैं –

मेरे और मेरी पत्नी के मध्य वैवाहिक मतभेद विवाह के पश्चात से ही चल रहे हैं। जिस सम्बन्ध में मैं ने तलाक हेतु एक वाद परिवार न्यायालय में डाल रखा है और मेरी पत्नि ने मेरे विरूद्ध दहेज मांगे जाने के लिये एक परिवाद कर रखा है।  जिसमें मेरी पत्नी द्वारा वर्ष 2011 तक मेरे साथ रहना दिखाया गया है जबकि लगभग 3 वर्षो से मैं व पत्नी साथ साथ नहीं रह रहे हैं।  मेरी पत्नि अपने मायके में ना रहकर नौएडा में किसी स्थान पर रह रही है।  साक्ष्य छुपाने की नियत से  वह किसी और की आई.डी. का मोबाईल नम्बर इस्तेमाल कर रही है।  मैं मोबाईल के माध्यम से उसकी लोकेशन पता चलाना चाहता हूँ।  परन्तु मोबाईल किसी और के नाम होने पर पत्नि इस बात का फायदा उठा सकती है कि यह मोबाईल उसका नहीं है। और ना ही यह कॉल डिटेल उसकी है। उक्त परिस्थिति में मैं किस प्रकार अपनी पत्नी के नौएडा में रहने सम्बन्धी जानकारी सर्विलान्स के माध्यम से प्राप्त कर सकता हूँ?

समाधान-

cross examinationप इंटरनेट पर सर्च कर के उस मोबाइल नं. का राज्य व कंपनी पता कर सकते हैं।  फिर उस कंपनी को आप लिख सकते हैं कि इस नंबर से मेरी पत्नी लगातार मुझ से व अन्य व्यक्तियों से बात करती रही है, मेरे व पत्नी के मध्य अदालत में विवाद चल रहे हैं, इस कारण यह बताया जाए कि यह मोबाइल नं. किस व्यक्ति को दिया हुआ है।  ऐसी सूचना आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांग सकते हैं।  लेकिन फिर भी यह जानकारी आप को यह साबित करने के लिए बहुत कमजोर होगी कि आप की पत्नी आप के साथ पिछले तीन साल से नहीं रही है।

प के मुकदमे में निश्चय ही आपने किसी वकील की सलाह और सहायता प्राप्त की होगी।  आप को उस से विमर्श करना चाहिए। यह साबित करने की जिम्मेदारी आप की पत्नी की है कि वह आप के साथ कहाँ कहाँ रही है? यदि मुकदमे में आप की साक्ष्य पहले हो तो आप साक्ष्य समाप्त करने के समय रिबुटल साक्ष्य प्रस्तुत करने का अधिकार सुरक्षित रखें।  बाद में जब आप की पत्नी साक्ष्य के लिए आए तो उस से जिरह में प्रश्न पूछें कि वह कहाँ कहाँ आप के साथ रही है? आप का कौन कौन मित्र घर पर आता रहा है? वह मकान कहाँ है? घर की लोकेशन क्या है? आसपास के मकान कैसे हैं? उन में कौन कौन रहता है? आप काम पर कब जाते हैं? आप के दफ्तर आदि का विवरण पूछें। बाद में आप अपनी गवाही में अपने मुहल्ले व दफ्तर के लोगों के बयान करवा सकते हैं कि आप को वे तीन साल से अकेले रहते देख रहे हैं, इस बीच आप की पत्नी वहाँ आ कर नहीं रही है।

समस्या-

वाराणसी, उत्तर प्रदेश से आई.पी. सिंह ने पूछा है-

मैं वाराणसी के अधीनस्थ न्यायालय में प्रेक्टिस कर रहा हूँ।  एक मुकदमे में मैं अभियुक्त का वकील हूँ। धारा 376 आईपीसी का मामला है। लड़के और लड़की के बीच फोन पर हमेशा बात होती थी जिस की सीडी हम ने न्यायालय में प्रस्तुत कर दी जिसे सुन कर लड़की ने मना कर दिया कि यह मेरी आवाज नहीं है। तब मैं ने न्यायालय से प्रार्थना की कि इस में जो आवाज है वह लड़की की है या नहीं। तब जज साहब ने प्रश्न किया कि किस कानून के अंतर्गत जाँच कराई जा सकती है? ये बताएँ।  मैं ने न्यायालय से कानूनी उपबंध बताने के लिए समय ले लिया है। कानून खूब छाना लेकिन मुझे नहीं मिला। कृपया आप मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प के इस मामले में कानून का कोई सीधा उपबंध  उपलब्ध नहीं है। किन्तु कुछ अन्य उपबंधों का उपयोग करते हुए कोई भी न्यायालय परिवादी की आवाज का सेंपल लेने और उसे विधि विज्ञान प्रयोगशाला को जाँच के लिए प्रेषित करने का आदेश दे सकता है।

स संबंध में आप दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा विनोद कुमार बनाम दिल्ली सरकार के मामले में दिनांक 5 जुलाई 2012 को पारित निर्णय का उपयोग कर सकते हैं। इस निर्णय को यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है। इस मामले की परिस्थितियाँ बिलकुल आप के मामले जैसी हैं।  इस मामले में भी लिव-इन-रिलेशन की स्वीकृति स्त्री द्वारा दी गई थी और बाद में आप की ही तरह का मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 313/493/495/306/376/494/120B के अंतर्गत दर्ज कराया गया था। परिवादी के बयान के समय टेपरिकार्ड प्रस्तुत किया गया था। परिवादी से टेप रिकार्ड पर दर्ज आवाज सुना कर पूछे जाने पर उस ने रिकार्ड की गई आवाज अपनी होने से इन्कार कर दिया था।  इस पर अभियुक्त ने परिवादी की आवाज का सेंपल ले कर उस की विधि विज्ञान प्रयोगशाला से जाँच कराने के लिए निवेदन किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने परिवादी की आवाज का सेंपल लेने और उस की विधि विज्ञान प्रयोगशाला से जाँच कराने तथा विशेषज्ञ की राय  जानने का आदेश इस मामले में दिया है।

समस्या-

क लड़की द्वारा मुझ पर अपहरण और बलात्कार का मुक़दमा किया गया।  प्रकरण का न्यायालय में विचारण चल रहा है।  वह लड़की मुझ से जैल में मिलने जाती थी और मेरे साथ मोबाइल पर बात भी करती थी जिसे मैंने रेकॉर्ड कर लिया है और उसकी सीडी बनवा ली।  अभी न्यायालय में लड़की के बयान में उस से जिरह चल रही है।  जिरह में उस ने कहा कि वह  जैल मे मुझ से मिलने नहीं जाती थी और मोबाइल पर बात भी नहीं करती थी।  मेरे वकील ने जज के सामने निवेदन किया कि जैल से मुझ से मिलने वालों का रिकार्ड मँगवाया जाए तो जज  ने कहा कि मुझे न्यायिक दृष्टान्त (रूलिंग) दीजिए की जिरह के दौरान ऐसे दस्तावेज मंगाए  जा सकते हैं।   मेरे वकील ने रूलिंग दी है लेकिन उस में केवल अंगूठे का निशान और हस्ताक्षर के बारे में उल्लेख है।  वॉयस रेकॉर्डिंग के बारे में उल्लेख नही है।  कृपया ये बताएँ कि साक्ष्य अधिनियम या किस अन्य अधिनियम के तहत वॉयस रिकॉर्डिंग को कोर्ट में रखा जा सकता है। यदि वह लड़की अपनी आवाज़ से मुकर जाती है तो उसका परीक्षण करने का क्या नियम है? कृपया विस्तार से बताएँ।  क्यों कि मेरे जज साहब को हर बात पर रूलिंग चाहिए।  मेरे वकील साहब को ये रूलिंग नहीं मिल रही है। कृपया मेरी मदद करें।

-अशोक तिवारी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प के प्रश्न से यह ठीक से पता नहीं लग रहा है कि वास्तव में आप की परेशानी क्या है और न्यायालय को किस कानूनी तथ्य के बारे में न्यायिक दृष्टान्त चाहिए।  हम आप के प्रश्न से केवल यह अनुमान लगा सके हैं कि क्या वॉयस रिकार्डिंग को एक साक्ष्य के बतौर ग्रहण किया जा सकता है या नहीं?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम आरंभ में 1872 में अधिनियमित किया गया था।  उस समय तक इलेक्ट्रोनिकी इतनी विकसित ही नहीं थी कि उस में इलेक्ट्रोनिक साधनों से उत्पन्न की हुए रिकार्ड को साक्ष्य के रूप में ग्रहण किए जाने के संबंध में उपधारणा की जाती।  लेकिन समय के साथ इस तरह के साधनों के माध्यम से उत्पन्न रिकार्ड को साक्ष्य के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता महसूस की गई और भारतीय साक्ष्य अधिनियम में तदनुरूप अनेक संशोधन कर के नए उपबंध जोड़े गए हैं।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 क में यह उपबंध किया गया है कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेखों की अन्तर्वस्तु धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार साबित की जा सकती है।

धिनियम की धारा 65ख में यह अधिनियमित किया गया है कि इलेक्ट्रोनिक अभिलेख में अन्तर्विष्ट कोई सूचना जो कागज पर मुद्रित है और कम्प्यूटर द्वारा उत्पादित प्रकाशकीय या चुम्बकीय माध्यम में भंडारित, अभिलिखित या नकल की गई है को दस्तावेज होना माना जाएगा तथा उसे साक्ष्य में ग्राह्य माना जाएगा। इस तरह के अभिलेख को साक्ष्य में प्रस्तुत करने के संबंध में कुछ शर्तें इस धारा में दी गई हैं। जिन की पालना किया जाना आवश्यक है।

स तरह आप के द्वारा अपने मोबाइल में रिकार्ड किया गया संदेश और उस से कंप्यूटर की सहायता से बनाई गई उस की प्रतिलिपि एक दस्तावेज है जो धारा 65ख के प्रावधानों के अनुसार न्यायालय के समक्ष साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जा सकती है। इस सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा State (N.C.T. Of Delhi) vs Navjot Sandhu@ Afsan Guru के मामले में दिनांक 04.08.2005 को तथा Societe Des Products Nestle S.A. … vs Essar Industries And Ors के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 04.09.2006 को दिए गए निर्णय आप के काम के हो सकते हैं।  इन निर्णयों को आप उन के शीर्षकों पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं और प्रिंट कर के अपने काम में ले सकते हैं।

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