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दूसरा विवाह साबित हुए बिना जारकर्म का अपराध साबित नहीं किया जा सकता।

rp_188157_142310595795100_543578_n.jpgसमस्या-

सीता गुप्ता ने मैसूर, कर्नाटक से समस्या भेजी है कि-

में सीता गुप्ता मैसूर निवासी हूँ। वर्ष 2000 में मेरा विवाह दिल्ली निवासी आर एस अग्रवाल के साथ हुआ था। विवाह के 4 वर्ष बाद पारिवारिक कलह के कारण मैं अपने दो बच्चों को लेकर मायके आ गयी और 125 के मुक़दमे से गुज़ारा भत्ता मुझे मिलने लगा। 2004 से मैं अपने पति से किसी संपर्क या सम्बन्ध के बिना अपने माता-पिता के पास अपने दो बच्चों उम्र 14 साल और 12 साल के साथ रह रही हूँ। मुझे पता लगा है कि मेरे पति ने किसी महिला से अपने सम्बन्ध बना लिए और उनके एक पुत्र भी है। मैंने प्रयास करके उनके पुत्र के पासपोर्ट की नक़ल प्राप्त कर ली जिसमें माता-पिता के स्थान पर मेरे पति और उस महिला का नाम लिखा हुआ है। मेरे पति और उस महिला के पासपोर्ट की नक़ल भी मुझे मिल गई है जिसमें महिला के पासपोर्ट में पति के नाम का स्थान और मेरे पति के पासपोर्ट में पत्नी के नाम का स्थान खाली है। उन दोनों के विवाह का कोई सबूत मेरे पास नहीं है लेकिन वे रहते इक्कठे ही हैं। मेरे वकील का कहना है कि उन्हों ने शादी नहीं की है वे लिव-इन-रिलेशन में रहते हैं इसलिए कोई कारवाई नहीं की जा सकती है। चूँकि, मेरे पति ने उस बच्चे को अपना नाम पासपोर्ट में दिया हुआ है तो क्या इन परिस्थितियों में मैं अपने पति के खिलाफ बायगेमी या अडलट्री या कोई अन्य केस कर सकती हूँ?

समाधान-

बायगेमी का तो कोई अपराध आप के पति के विरुद्ध नहीं बनता है। धारा 494 आईपीसी में बायगेमी का जो अपराध है उस में कोई पति किसी पुरुष के विरुद्ध तभी संस्थित कर सकता है जब दूसरे पुरुष ने उस की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाए हों।

धारा 497 में (Adultery) जारकर्म का जो अपराध वर्णित है वह भी तभी अपराध है जब कि पति या पत्नी ने अपने पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह कर लिया हो। यदि आप के पति किसी स्त्री के साथ लिव इन में रहते हैं तो इसे दूसरा विवाह होना नहीं कहा जा सकता। इस कारण आप धारा 497 में भी कोई परिवाद न्यायालय मे तभी दर्ज करवा सकती हैं जब कि पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो। पति के पासपोर्ट में पत्नी का नाम और पत्नी के पास पोर्ट में पति का नाम दर्ज नहीं है लेकिन पुत्र के पासपोर्ट में पिता का नाम दर्ज है। यह लिव इन में होना संभव है।

किसी का पुत्र होने के लिए यह कतई जरूरी नहीं है कि उस के पिता का उस की माता के साथ विवाह हुआ ही हो। लिव इन रिलेशन से भी संतान का जन्म हो सकता है और उस की मां या पिता जन्म-मृत्यु पंजीयक के यहाँ पुत्र का जन्म पंजीकृत करवा सकता है। उस जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर पुत्र का पासपोर्ट बन सकता है।

ब तक आप यह सिद्ध करने की स्थिति में न हों कि आप के पति ने दूसरा विवाह कर लिया है आप यदि परिवाद करेंगी तो वह मिथ्या साबित हो सकता है और आप एक दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के मामले में फँस सकती हैं।

जारकर्म (Adultery) का अपराध क्या है?

Adulteryसमस्या-

रामचन्द्र चौधरी ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

दि किसी की पत्नी के शादी के बाद दूसरे व्यक्तियों के साथ अवैध शारीरिक सम्बंध हैं और ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसी औरत को गर्भनिरोधक गोलियां खिलाकर बांझ कर दिया है जिस से अभी तक कोई बच्चा भी पैदा नहीं हुआ है और ऐसा पिछले 14 वर्षों से चल रहा है तो क्या ऐसी परिस्थिति में उस पत्नी के पति द्वारा आईपीसी की धारा 497 के तहत वाद दायर किया जा सकता है और क्या 497 के अंतर्गत दायर वाद गैर जमानती है अथवा नहीं। और क्या ऐसे वाद में न्यायालय शादी के बाद विवाहेतर सम्बंधों को सही साबित करने के लिए औरत का डीएनए टेस्ट करवा सकता है अथवा और उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति ने 3 साल पहले किसी औरत के साथ शारीरिक सम्बंध बनाये तो उसका खुलासा डीएनए टेस्ट में हो सकता है अथवा नहीं। इस मामले में एक राजकीय कर्म चारी-शिक्षक होते हुए भी इस प्रकार के कुकृत्य को अंजाम दे रहा है तो शिक्षित व्यक्ति के इस प्रकार के कृत्य किये जाने को न्यायालय द्वारा गंभीरता से लिया जायेगा अथवा नहीं?

समाधान-

प ने धारा 497 आईपीसी के बारे में पूछा है। यह धारा जारकर्म (Adultery) के बारे में बताती है भारतीय दंड संहिता के अनुसार जिसे कोई पुरष ही कर सकता है और जो किसी पुरुष का किसी विवाहित पुरुष के प्रति अपराध है। यह धारा कहती है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए कि कोई स्त्री किसी की पत्नी है उस के पति की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना उस के साथ यौन संबंध स्थापित करता है तो वह 497 का अपराध करता है। आप खुद इस धारा को पढ़ लीजिए-

  1. जारकर्म–जो कोई ऐसे व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथुन करेगा जो बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, और दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा । ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी ।

ह अपराध असंज्ञेय है और जमातीय है। अर्थात इस के लिए आप को न्यायालय को सीधे परिवाद प्रस्तुत करना होगा और साबित भी आप को ही करना होगा। इस में अभियुक्त को सम्मन से ही बुलाया जाएगा और जमानत प्रस्तुत करने पर न्यायालय उसे जमानत पर छोड़ देगा।

डीएनए टेस्ट से यह साबित नहीं किया जा सकता कि किसी खास व्यक्ति ने किसी खास व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित किया है। इस कारण डीएनए टेस्ट इस मामले में बेकार सिद्ध होगा। यदि आप साबित कर दें कि उस अध्यापक ने आप की पत्नी के साथ आप की सम्मति और मौनानुकूलता के बिना यौन संबंध स्थापित किया है तो अदालत उसे दंडित कर देगी और उस की नौकरी पर भी उस का बुरा प्रभाव पड़ेगा। लेकिन यह कार्यवाही आप तभी करें जब आप अपराध को साबित कर सकें। अन्यथा वह व्यक्ति आप पर उलटा मानहानि का मुकदमा कर देगा जिस में आप को सजा, जुर्माना और क्षतिपूर्ति करनी पड़ सकती है। जगहँसाई होगी वह अलग है।

पति और पुत्र को छोड़ कर प्रेमी के साथ भाग कर आप प्रेमी को अपराधी बना देंगी।

समस्या-

नागपुर, महाराष्ट्र से संजना ने पूछा है –

separationमेरी शादी को सात साल हुए हैं। मेरे एक चार वर्ष का बच्चा भी है। मैं अपने पति से खुश नहीं हूँ। मैं ने अपने पति से तलाक मांगा भी, लेकिन उस ने देने से इन्कार कर दिया। मैं किसी और से प्यार करती हूँ और वह भी मुझे बहुत प्यार करता है। उस की अभी तक शादी नहीं हुई है। हम दोनों शादी करना चाहते हैं। हम दोनों भाग जाएँ तो क्या होगा?

समाधान-

प के नाम से पता लगता है कि आप हिन्दू हैं। हिन्दू विधि के अनुसार हिन्दू विवाह एक विधिक संस्था है जो एक स्री व एक पुरुष का विवाह होने से अस्तित्व में आता है। जब एक बार कोई भी स्त्री-पुरुष एक विवाह में बंध जाते हैं तो दोनों एक दूसरे से विधिक रूप से कर्तव्यों और अधिकारों में बंध जाते हैं। हिन्दू विवाह केवल न्यायालय की डिक्री से अथवा जीवन साथी के मृत्यु पर ही समाप्त हो सकता है। एक विवाह में रहते हुए एक स्त्री और एक पुरुष दूसरा विवाह नहीं कर सकता। आप की भी स्थिति यही है कि जब तक आप अपने पति से विवाह विच्छेद की डिक्री न्यायालय के माध्यम से प्राप्त नहीं कर लेती हैं तब तक आप दूसरा विवाह नहीं कर सकतीं।

प के एक चार वर्ष का पुत्र भी है। आप पति से अप्रसन्न हैं और इसीलिए आप उन से तलाक चाहती हैं और एक अन्य युवक से जिसे आप प्यार करती हैं और वह भी प्यार करता है के साथ भाग जाना चाहती हैं। जब आप ने विवाह किया था तब आप अपने पति से न तो प्रसन्न थीं और न अप्रसन्न। क्यों कि आप अपने पति के साथ नहीं रही थीं। साथ रहने पर ही पता लगा कि आप उस के साथ प्रसन्न नहीं हैं।  आप ने उन के साथ सात वर्ष बिताए और अब अप्रसन्न हैं। अप्रसन्नता के कारण आप ने नहीं बताए हैं। लेकिन जिस युवक से आप प्यार करती हैं उस के साथ भी आप भी अभी तक नहीं रही हैं। आप यह निर्णय कैसे कर सकती हैं कि आप उस के साथ प्रसन्न ही रहेंगी? अर्थात् आप के जीवन में पति से अप्रसन्न रहते हुए भी एक निश्चितता है। लेकिन यदि आप उस युवक के साथ भाग गईं तो आप का जीवन पुनः अनिश्चित हो जाएगा। आप उस के साथ प्रसन्न रह सकती हैं यह निश्चित नहीं किया जा सकता।

प निश्चित रूप से अपने पुत्र को तो प्रेम करती होंगी। आप के भाग जाने से उसे भी आप को छोड़ना पड़ेगा और उस से व उस के प्रेम से वंचित हो जाएंगी। आप एक बच्चे को माँ के स्नेह और संरक्षण से वंचित कर देंगी। आप उसे साथ ले जाएंगी तो फिर आप उसे अपने पिता के संरक्षण और प्रेम से वंचित करेंगी। आप ने यह नहीं बताया कि आप के पति आप से प्रेम नहीं करते हैं। लगता तो यही है कि वे आप से प्रेम करते हैं, अन्यथा वे आप को तलाक देने को तैयार हो जाते।

प के उस युवक के साथ भाग जाने के बाद। आप के पति आप की तलाश करेंगे। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराएंगे। पुलिस आप को व आप के प्रेमी को पकड़ कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी। आप की चिकित्सकीय जाँच भी होगी। जिस में सहज रूप से यह प्रमाणित हो जाएगा कि आप ने उस युवक के साथ यौन संबंध बनाए हैं। आप तो इस में किसी तरह के अपराध की दोषी नहीं होंगी लेकिन वह युवक आप के साथ यौन संबंध बनाने का अर्थात जारता का दोषी होगा क्यों कि वह जानबूझ कर एक ऐसी स्त्री के साथ यौन संबंध स्थापित करेगा जो कि किसी दूसरे की पत्नी है। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में पाँच वर्ष के लिए दंडित किया जा सकता है। ऐसी अवस्था में आप उस युवक के साथ किसी भी स्थिति में प्रसन्न नहीं रह सकेंगी। आप का घर उस प्रेमी युवक के साथ भी नहीं बसेगा। आप न तो घर की रहेंगी और न घाट की।

स अवस्था में आप के पास दो ही विकल्प हैं। एक तो आप अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय को आवेदन करें और विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करें फिर उस युवक के साथ संबंध बनाएँ। दूसरा विकल्प यह है कि आप जिन कारणों से अपने पति से अप्रसन्न हैं उन्हें अपने पति को बताएँ और उन से अपने मतभेद दूर कर के उन के साथ प्रेम पूर्वक जीवन निर्वाह करें। इस से आप को अपने पुत्र को भी नहीं छोड़ना पड़ेगा। आप चाहें तो अपनी इस समस्या के लिए किसी पारिवारिक काउंसलर की मदद भी ले सकती हैं जो आप को और आप के पति की काउंसलिंग कर के मतभेदों को सुलझाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकता है।

अपराध कानून में लिव-इन-रिलेशनशिप

लिव-इन-रिलेशनशिप  के सम्बन्ध में तीसरा खंबा पर पिछले आलेख “लिव-इन-रिलेशनशिप और पत्नी पर बेमानी बहस”  तथा  अनवरत के आलेख “लिव-इन-रिलेशनशिप 65% से अधिक भारतीय समाज की वास्तविकता है” पर विभिन्न प्रकार के विचार टिप्पणियों के रूप में आए हैं। अनेक प्रश्न उठे हैं। सभी प्रश्नों पर एक साथ विचार किया जाना न तो संभव है और न ही उपयुक्त  प्रतीत होता है। ऐसी परिस्थिति में इस विषय पर सिलसिलेवार विचार किया जाना आवश्यक प्रतीत हो रहा है। मैं सभी टिप्पणीकारों से इस में सहयोग की आशा करते हुए अपनी बात आरंभ करना चाहता हूँ। मेरी कोशिश रहेगी कि विमर्श में मैं उठे हुए प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूँ। मेरा यह भी प्रयत्न रहेगा कि मैं मनोगतवादी तरीके से बात न करूँ।

पहला सवाल काबिल टिप्पणीकार पाठक श्री जी. विश्वनाथ ने यह रखा कि लिव-इन-रिलेशनशिप को हम हिन्दी में क्या कहें? इस का उत्तर प्रश्न उठने के पूर्व ही मैं दे चुका था। अनवरत के आलेख में मैं इसे सहावासी-रिश्ता कह चुका हूँ। मेरे विचार में इस से उपयुक्त शब्द नहीं हो सकता। आप भी कोई नाम इस के लिए सुझा सकते हैं। फिलहाल इसी से काम चलाते हैं।

ऐसा लग सकता है कि मानव समाज में विवाह के मौजूदा कानूनी रूप हमेशा से चले आ रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है।  विवाह की संस्था के अनेक रूप हमें देखने को मिलते हैं। पुरातन रूपों में से अनेक बिलकुल विलुप्त हो चुके हैं अथवा दुनियाँ के केवल उन आदिवासी समाजों में मिलते हैं जहाँ अभी शेष दुनिया से संपर्क न्यूनतम है। हमें विश्व साहित्य की पुस्तकों में ही अनेक रूप देखने को मिल जाते हैं। दोनों भारतीय महाकाव्यों रामायण और महाभारत में ही इन के दर्शन किए जा सकते हैं। द्रोपदी का पांच भाइयों की पत्नी होना पूरी कथा में बहुत निन्दनीय रूप में नहीं देखा जाता है। जिस से पता लगता है कि विवाह का वह रूप तब नया नहीं था और चौंकाने वाला भी नहीं था। वहीं भीम का हिडिम्बा के साथ रिश्ते को सहावासी रिश्ता ही कहा जा सकता है। क्यों कि वहाँ हिडिम्बा व भीम एक दूसरे से किसी प्रकार के दायित्व की आशा नहीं रखते। इस रिश्ते से एक पुत्र भी उत्पन्न होता है और उसे उन के पुत्र के रूप में मान्यता मिलती है। दूसरी ओर रामायण में दशरथ के तीन रानियाँ हैं, लेकिन राम एक पत्नीव्रती हैं वे एक पत्नी के लिए रावण से युद्ध करते हैं। लंका का तख्ता पलट देते हैं। कुछ दिन रावण के आवास में रहने के कारण सीता पर उंगलियाँ उठती हैं और राम उन का त्याग कर देते हैं। अश्वमेध यज्ञ के लिए भी दूसरा विवाह नहीं करते सीता की सोने की मूर्ति बनाते हैं। दूसरी ओर बालि अपने छोटे भाई की पत्नी पर अधिकार कर लेता है और राम उसे मृत्युदंड देते हैं। बाद में छोटा भाई विभीषण बड़े भाई की पत्नी को अपना लेता है। खैर ये सब महाकाव्यों की बातें हैं।

विवाह संस्था निश्चित रूप से मानव समाज में बहुत देर से अस्तित्व में आया है। इस के विभिन्न रूपों और उन के विकास पर हम किसी और अवसर पर बात कर सकते हैं। अभी सीधे विषय पर आया जाए। आजाद भारत में सभी विवाह के सभी परंपरागत और धर्मसम्मत रूपों को मान्यता दी गई है। हिन्दू विवाह पद्धति में बहुपत्नी विवाह आजादी के बाद तक प्रचलित और कानून सम्मत था, 1955 में हिन्दू विवाह अधिनियम बना जो 18 मई 1955 को लागू हो गया। इस कानून ने पहली बार एक पत्नित्व को स्थापित किया अब कोई भी हिन्दू दूसरा विवाह नहीं कर सकता था। इस कानून को बौद्धों, जैनों, और सिखों पर भी लागू किया गया। मुस्लिम, ईसाई पारसी और ज्यू धर्मावलंबियों तथा अनुसूचित जनजातियों को इस से अलग रखा गया और उन लोगों को भी इस से पृथक रखा गया जो रीति रिवाजों के कानून से शासित होना साबित कर सकता था। कुल मिला कर आजाद भारत ने एक स्त्री और पुरुष के अंतरंग रिश्ते को विवाह की संस्था में बंधा पाया जो भिन्न प्रकार की हो सकती थीं। लेकिन ऐसी बात नहीं थी कि उस वक्त के कानून के अनुसार सहावासी रिश्तों की कानून के अनुसार गुंजाइश नहीं थी, या वह कोई दंडनीय अपराध रहा हो।

भारतीय दंड संहिता (I.P.C.) में विवाह से संबंधित अपराधों के खण्ड में दो प्रमुख अपराधों को छोड़ कर अन्य अपराध इस विषय में कोई रोशनी नहीं डालते। यो दोनों अपराध धारा 494 और 497 में दिए गए हैं जो निम्न प्रकार हैं-

भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के द्वारा द्वि-विवाह (Bigamy) को अपराध बनाया गया है जो इस प्रकार है….

494. पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह करना – जो कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा  में  विवाह करेगा जिस से ऐसा विवाह इस कारण शून्य है कि वह ऐसे पति या पत्नी के जीवनकाल में होता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिस की अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

अपवाद – इस धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं है जिस का ऐसे पति या पत्नी के साथ विवाह किसी सक्षम अधिकारिता के न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया हो।

और न किसी ऐसे व्यक्ति पर है जो पूर्व पति या पत्नी के जीवनकाल में विवाह कर लेता है, यदि ऐसा पति या पत्नी उस पश्चातवर्ती विवाह के समय ऐसे व्यक्ति से सात वर्ष तक निरन्तर अनुपस्थित रहा हो, और उस काल के भीतर ऐसे व्यक्ति ने यह नहीं सुना हो कि वह जीवित है, परन्तु यह तब जब कि ऐसा पश्चातवर्ती विवाह करने वाला व्यक्ति उस विवाह के होने से पूर्व उस व्यक्ति को, जिस के साथ ऐसा विवाह होता है तथ्यों की वास्तविक स्थिति की जानकारी, जहाँ तक कि उन का ज्ञान उस को हो, दे दे।

इसी तरह जारकर्म (Adultery) को धारा 497 के द्वारा अपराध घोषित किया गया है जो इस तरह है….

497. जारकर्म – जो कोई ऐसे व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है, और जिस का किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है,  या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथुन करेगा जो बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, और दोनों में से किसी भांति के कारावास से दंडनीय, जिस की अवधि पाँच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी।

धारा 494 के अंतर्गत द्वि-विवाह के अपराध के कारण कोई भी विवाहित स्त्री या पुरुष ऐसा विवाह नहीं कर सकता, जो किसी विवाह विधि के अंतर्गत शून्य हो। यह धारा जहाँ  सभी व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के अंतर्गत दूसरा विवाह अनुमत होने पर उसे छूट देती है। वहीं इस बात की छूट भी देती है कि कोई भी विवाहित स्त्री किसी दूसरे पुरुष के साथ और विवाहित पुरुष किसी दूसरी स्त्री के साथ बिना विवाह किये सहावासी रिश्ता बनाता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दंडनीय नहीं होगा।

धारा 497 में जारकर्म को परिभाषित करते हुए उसे दंडनीय अपराध बनाया गया है। जो केवल पुरुषों के लिए दंड का विधान करती है। कोई भी पुरुष जो किसी विवाहित स्त्री के साथ जिस के बारे में वह जानता है या विश्वास रखता है उस पुरुष की सहमति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथुन करता है जिसे बलात्संग नहीं कहा जा सकता तो वह जारकर्म का दोषी होगा। यहाँ अन्य पुरुष को किसी भी पति की मौनानुकूलता या सहमति से स्त्री के साथ ऐसे मैथुन को जो बलात्संग नहीं है अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। स्पष्टतः यहाँ स्त्री को पुरुष की संपत्ति माना गया है।

जिस समाज में आर्थिक और सामाजिक दबाव बहुत अर्थ रखते हों, जहाँ बलात्संग के अपराध में लोग स्त्री की सहमति साबित कर छूट जाते हों वहाँ स्त्री की सहमति दर्जा क्या हो सकता है? इस का आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं।

इन दो धाराओं के अतिरिक्त धारा 493 में विधिपूर्ण विवाह का धोका देकर स्त्री के साथ सहवास करने,  धारा 495 में विवाहित होना छुपा कर विवाह कर लेने, धारा 496 में विधिपूर्वक विवाह होने का धोका देकर अविधि विवाह करने तथा 498 में विवाहिता स्त्री को अपराधिक आशय से किसी अन्य व्यक्ति के साथ अयुक्त (illicit) संभोग करने के लिए फुसला कर ले जाने और निरुद्ध रखने को अपराध बनाया गया है। इस के अतिरिक्त कोई भी अपराध भारतीय दंड विधान में वर्णित नहीं है।

इस प्रकार हम देखते हैं अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा स्त्रियों के साथ सहावासी रिश्ते बनाने की पूरी छूट दंड कानून ने पहले से ही दे रखी है। जितने भी प्रतिबंध हैं वे सभी कानूनी रूप से विवाहित महिलाओं के संबंध मे ही हैं। (जारी)

( अगले आलेख में हम सामाजिक प्रथाओं की बात करेंगे)

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