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सूचना अधिकारी से सूचना प्राप्त न होने पर समय सीमा में अपील करें।

RTIसमस्या-

हरि शंकर ने मेरठ शहर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ का रहने वाला, पिछडी जाति (सोनार) से हूं। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है, घर पर ही कम्प्यूटर जॉब वर्क करके परिवार का पालन कर रहा हूं। मैंने अपने बेटे को वर्ष २००९ में जनपद मेरठ के ही एक इंजीनियरिंग कालेज में बीटेक में बैंक से शिक्षा ऋण लेकर प्रवेश दिलाया था। मेरे बेटे ने प्रत्येक वर्ष छात्रवृत्ति/शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था। वर्ष २०१३ में उसका कोर्स पूरा हो गया। इस दौरान कालेज ने उसे मात्र एक ही वर्ष की शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान किया। जैसा कि विदित है कि कालेज प्रबंध तंत्रों द्वारा छात्रवृत्ति/शुल्क प्रतिपूर्ति घोटाले दिन प्रतिदिन उजागर हो रहे हैं। इसी को देखते हुए मैंने एक आरटीआई आवेदन कालेज सूचना अधिकारी तथा एक आरटीआई जन कल्याण अधिकारी जनपद मेरठ को दी। समय सीमा समाप्त होने पर भी कोई जवाब न मिलने पर पुन: एक रिमांइडर दिया। रिमांइडर पर मेरा प्रेषक में पता देखकर जिला समाज कल्याण अधिकारी ने बिना लिफाफा खोले ‘रिफ्यूज्ड’ रिमार्क के साथ वापस भेज दिया। अत: आपसे निवेदन है कि मेरा सही मार्गदर्शन करने की कृपा करें कि मैं इस संबंध में क्या प्रक्रिया प्रयोग में ला सकता हूं। क्योंकि मुझे पूर्ण विश्वास है कि समाज कल्याण अधिकारी तथा कालेज प्रबंध तंत्र ने मिलकर छात्रवृत्ति/शुल्कप्रतिपूर्ति में भारी घोटाला कर बच्चों के हक पर डांका डाला है। यदि यह राशि हमें मिल जाये तो बैंक का कुछ भार उतर जायेगा।

समाधान-

ह एक सामान्य समस्या है। अनेक बार ऐसा होता है कि सूचना के लिए आवेदन प्रस्तुत करने पर समय सीमा में कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता है। वैसी स्थिति में आवेदक को समय सीमा में सूचना अधिकारी से उच्च अधिकारी को अपील प्रस्तुत करना चाहिए और अपील से सन्तुष्ट न होने पर दूसरी अपील आयोग को करना चाहिए।

दि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते है या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर सम्बंधित लोक सूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है (धारा 19(1)।

दि आप प्रथम अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 60 दिनों के भीतर केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे सम्बंधित हो) के पास की जा सकती है। (धारा 19(3)।

हो सकता है आप के मामले आप के द्वारा आवेदन दिए जाने के बाद अपील की अवधि समाप्त हो चुकी हो। वैसी स्थिति में आप नए सिरे से सूचना के लिए आवेदन कर सकते हैं।

गलत नामान्तरण आदेश के विरुद्ध अपील प्रस्तुत करें।

agriculture landसमस्या-

अरविन्द साद ने ग्राम –मर्दाना. तह. सनावद,जिला- खरगोन, म.प्र. से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी (पिताजी के पिताजी )ने अपनी मृत्यु पूर्व दो गवाहों के समक्ष एक रजिस्टर्ड वसियेत की थी। जिस में उन्होने अपनी पैतृक जमीन (कृषि भूमि ) में से कुछ भाग मेरे नाम कर दिया है जब कि मेरे पिताजी सहित मेरे दादा जी के कुल 05 पुत्र व 01 पुत्री (मेरे बुवा)है, जिन्होंने मेरे दादा जी की मृत्यु के तत्काल बाद हमारी जानकारी के बिना ग्राम पंचायत से मृत्यु प्रमाण पत्र लेकर हल्के के पटवारी व तहसीलदार से मिलकर सम्पूर्ण जमीन सभी 06 लोगों के नाम दर्ज करा लिए (जिस में मेरे पिताजी सहित मेरी बुवा भी है), लेकिन जब मैं और मेरे पिताजी पटवारी व तहसीलदार को वसियत के साथ नामान्तरण का आवेदन देने गये तो बहुत दिनों तक हमें घुमाते रहे और करीब तीन माह बाद बताया कि आपकी वसीयत अब काम की नहीं है क्यों कि आपकी जमीन पर मृत्यु नामांतरण के आधार पर मृत्यु नामांतरण हो चुका है जिस से आपके परिवार के सभी भाई बहनों के नाम दर्ज हो चुके हैं। जब कि न तो मेरे पिताजी की और ना ही मेरी कही पर हस्ताक्षर ली है , वास्तविकता में मैं (अरविन्द) और मेरे पिताजी ही खेती देखते हैं बाकी सभी ग्राम से बाहर बड़े पदों पर कार्यरत हैं जिसका फायदा उन्होंने उठाया है।

समाधान-

प के दादा जी के पास जो भूमि पुश्तैनी थी उस में उन के पुत्रों सहित उन का खुद का भी हिस्सा था। इसे ऐसे समझें कि यदि दादाजी के समय बँटवारा होता तो कुछ भूमि उन्हें अपनी खुद की भी मिलती। जितनी मिलती उसे वे वसीयत कर सकते थे। वही उन्हों ने वसीयत की है। आप की वसीयत वैध है। जो नामान्तरण किया गया है वह गलत किया गया है। भूमि पर आप काश्त करते हैं तो आप के पास उस का कब्जा है।अपना कब्जा बनाए रखें। यदि उस कब्जे में किसी तरह के दखल की संभावना हो तो अनुचित दखल के लिए न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

प को गलत नामान्तरण आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त कर उस की अपील प्रस्तुत करनी चाहिए और उसे निरस्त कराना चाहिए और यह आदेश प्राप्त करना चाहिए कि वसीयत को ध्यान में रखते हुए नया नामान्तरण किया जाए। इस संबंध में आप किसी अच्छे राजस्व मामलों के वकील से संपर्क करें और उस की मदद से कानूनी कार्यवाही करें।

गलत नामान्तरण के आदेश के विरुद्ध तुरन्त अपील प्रस्तुत करें …

Willसमस्या-

सुभाष ने हिसार, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

खास वसीयत का अधिकार हिंदुओं को नहीं प्राप्त है। खास वसीयत लिखित या कुछ सीमाओं तक मौखिक हो सकती है। खास वसीयत क्या है? मेरे दादा जी की स्वअर्जित सम्पति थी और उन्होंने मेरे नाम वसीयत की थी| मैंने उन के स्वर्गवास होने पर उस वसीयत का इन्तकाल नहीं करवाया और वो सम्पति उनके उतराधिकारियों के नाम हो गई। उन को गुजरे हुए अभी 2 महीने हुए हैं। अब मुझे क्या करना चाहिए? क्या यह वसीयत निरस्त हो गई है?

समाधान-

कानून में वसीयत केवल वसीयत होती है कोई वसीयत खास और आम नहीं होती। आप यह खास वसीयत शब्द कहाँ से ले कर आए इस का पता करें। यदि एक ही संपत्ति के सम्बन्ध में एक व्यक्ति ने एक से अधिक वसीयत की हों तो अन्तिम वसीयत ही प्रभावी होती है। वसीयत वसीयत की विधि से होनी चाहिए। अर्थात बिना किसी प्रभाव. लालच या दबाव के की गई होनी चाहिए। वसीयत पर वसीयत करने वाले के हस्ताक्षर दो गवाहों के सामने होने चाहिए और गवाहों के हस्ताक्षर भी वसीयत पर होने चाहिए।

दि संपत्ति को वसीयत प्रस्तुत न होने के कारण सहज उत्तराधिकारियों का नामांतरण हो चुका है तो उस से परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। इस आदेश से वसीयत खारिज नहीं होती। आप को नामांतरण के आदेश की अपील करनी चाहिए कि यह आदेश बिना किसी सामान्य सूचना के पारित किया गया है जो गलत है। नामांतरण वसीयत के आधार पर होना चाहिए। आप की अपील मंजूर की जा कर अपीलीय अधिकारी नामांतरण करने वाले अधिकारी को पुनः वसीयत की जाँच करते हुए नामांतरण खोलने का आदेश दे देगा। अपील करने की अवधि की एक सीमा होती है। आप को नामान्तरण की जानकारी मिल चुकी है इस कारण से आप को तुरन्त अपील करनी चाहिए। देरी होने पर आप को हानि उठानी पड़ सकती है। इस मामले में किसी स्थानीय वकील से तुरन्त संपर्क कर के बिना कोई देरी किए कार्यवाही करें।

गलत नामान्तरण आदेश की अपील तथा कृषि भूमि के विभाजन का वाद प्रस्तुत करें।

partition of propertyसमस्या-

रविन्द्र ने रायरा, पाली राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादा की जमीन में से मेरे पिता छह भाई हैं। उन में से एक चाचा का देहान्त 2003 में हो गया। उन का कोई वारिस नहीं है। इस तरह वह जमीन मेरे पिता और उन के चार भाइयों के नाम होनी थी। लेकिन मेरे चाचा ने छल कर के मेरे पिता का नाम हटवा कर शेष चार के नाम ही करवा ली। मेरे पिता जी के नाम की जमीन नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए? .

समाधान-

 आप के मृत चाचा और दादा की मृत्यु पर राजस्व विभाग द्वारा रखे जाने वाले खाते में नामान्तरण होने से ही यह हुआ है। यह नामान्तरण गलत है। आप के पिता जी को नामान्तरण आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करनी चाहिए और उस की अपील जिला कलेक्टर के न्यायालय को करनी चाहिए। जिला कलेक्टर अपील का निर्णय कर के नामान्तरण को ठीक करवा देगा।

 स के अतिरिक्त आप के पिताजी को एसडीओ के यहाँ उक्त जमीन के बटवारे का वाद भी प्रस्तुत करना चाहिए जिस से सभी भाइयों का हिस्सा अलग अलग हो कर उस पर अलग अलग कब्जा मिल जाए।

गलत नामान्तरण के विरुद्ध अपील कर भू-विक्रय पर निषेधाज्ञा प्राप्त करें।

समस्या-
राहुल मिश्रा ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे बाबाजी पिताजी के पिता ने और दादी ने अपनी 2 संपत्ति कि एक वसीयत कि है जिसमे बाबाजी ने और मेरी दादी जी ने मुझे अपना वारिस चुना है।  बाबाजी ने मेरी माँ के नाम संपत्ति कि कोई वसीयत नहीं कि और न ही उनका नाम ही डाला वसीयत में।  वसीयत को उन्होंने पंजीकृत करवाया हुवा है। मेरे बाबाजी की २२ नवम्बर को मृत्यु हो चुकी है।  अब जब कि मैंने वसीयत के आधार पर तहसील न्यायालय में नाम कराना चाहता हूँ तो मेरी माताजी ने उस में  ऐतराज करके दादी और मेरे साथ लेखपाल को पैसे खिला कर अपने नाम भी करवा ली है।  वो उस जमीन को बेच सकती है इसी डर के कारण मेरे बाबाजी ने उनके नाम वसीयत नहीं की। अब क्या यहाँ पर बाबाजी कि वसीयत के आधार पर कुछ हो सकता है या नहीं?  मैं क्या करूँ?  अभी मैं गाव में नहीं रह रहा हूँ।  मुझे क्या करना चाहिए जिससे जमीन बची रहे? क्या मुझे कोर्ट कि सहारा लेना चाहिए? कोर्ट से मुझे क्या मदद मिल सकती है? मेरे पिताजी की भी मृत्यु हो चुकी है। हम अपने माता पिता कि तीन संताने हैं।  मैं और मेरी दो बहनें जिन की शादी मैं कर चूका हूँ, अभी मेरी दादी जीवित है और वसीयत जॉइंट है।

समाधान-

प के दादा दादी ने संयुक्त वसीयत की है। इस का अर्थ यह है कि एक ही दस्तावेज में दोनों ने अपनी वसीयत अंकित कर दी है। वसीयत में क्या लिखा है यह आप ने नहीं बताया। बिना वसीयत को पूरा पढ़े कुछ नहीं कहा जा सकता है। यदि आप के नाम दादा जी ने अपनी संपत्ति देना लिखा है तो दादी का नाम भी नामान्तरण में नहीं चढ़ना चाहिए था।  अक्सर संयुक्त वसीयत में यह लिखा होता है कि पति पत्नी में से किसी का देहान्त हो जाए, संपत्ति दूसरे को प्राप्त होगी तथा दोनों की मृत्यु के बाद वसीयती को प्राप्त होगी। यदि ऐसा है और संपत्ति दादा के नाम थी तो अब केवल आप की दादी को मिलनी चाहिए तथा दादी के जीवनकाल के बाद आप को।

दि नामान्तरण में वसीयत को आधार नहीं बनाया गया है तो फिर यह भी हो सकता है कि आप की माँ ने पहले आवेदन दिया हो और आपका आवेदन प्रस्तुत होने के पहले वसीयत को देखे बिना ही उत्तराधिकार कानून के अन्तर्गत नामान्तरण कर दिया गया हो।

लेकिन यदि वसीयत के विरुद्ध नामान्तरण हो गया है तो आप को तुरन्त उस नामान्तरण आदेश की अपील करनी चाहिए। अपील में वे सारे तर्क रखने चाहिए जो इस मामले में आप रखना चाहते हैं। इसी अपील के साथ आप को अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत करते हुए अपीलीय अधिकारी से यह निवेदन करना चाहिए कि जब तक अपील का निर्णय न हो जाए। जमीन या उस के हिस्से को कोई भी व्यक्ति विक्रय न करे तथा किसी भी रूप में उस का हस्तान्तरण न करे। समय निकल जाने पर आप अपील नहीं कर सकेंगे। इस कारण किसी भी स्थानीय वकील से संपर्क कर तुरन्त अपील प्रस्तुत करें।

सूचना आवेदन का उत्तर न मिलने और अपील न लेने पर राज्य सूचना आयोग को शिकायत करें

समस्या-

झुंझुनूं, राजस्थान से गोपाल सिंह चौहान ने पूछा है –

RTIमैने सूचना के अधिकार के अन्‍तर्गत दिनांक 3.3.2013 को ग्राम सेवा सहकारी समिति से सूचना हेतु व्‍यक्तिश: समिति के मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी जो कि लोक/ सहायक सूचना अधिकारी भी है को देने पर लेने से ही इन्‍कार करने पर जरिये रजिस्‍टर्ड पत्र समिति के मुख्‍य कार्यकारी को भिजवा दिया। परन्‍तु कोई जवाब नहीं मिला।  प्रथम अपील समिति के ही अध्‍यक्ष जो प्रथम अपील लोक सूचना अधिकारी भी है को देने पर उसने भी मेरा प्रार्थना पत्र लेने से इन्‍कार कर दिया। इसके इन्‍कार करने पर श्रीमान जिला कलक्‍टर को अपनी शिकायत दर्ज करवाई। श्रीमान जिला कलेक्‍टर महोदय द्वारा मेरा प्रार्थना पत्र जिले के प्रशासन अधिकारी उप रजिस्‍ट्रार सहकारी समितियॉं झुंझुनूं को भिजवा दिया श्रीमान उप रजिस्‍ट्रार महोदय द्वारा समिति के मुख्‍यकार्यकारी अधिकारी को सूचना देने हेतु निर्देशित किया परन्‍तु अब भी सूचना उपलब्‍ध नहीं करवाई जा रही है। ऐसी परिस्थिति में मेरे द्वारा चाही गई सूचना कैसे प्राप्‍त की जा सकती है कृपया मार्गदर्शन प्रदान करे।

समाधान-

प को सूचना अधिकारी ने नियत समय में कोई उत्तर नहीं दिया। तथा प्रथम अपील लोक सूचना अधिकारी ने प्रार्थना पत्र लेने से इन्कार कर दिया है। आप को चाहिए था कि आप इस की शिकायत राज्य सूचना आयोग को करते।

जिला कलेक्टर को आप ने शिकायत की है उस का कोई लाभ आप को होने वाला नहीं है। आप के पास अभी भी समय है आप तुरन्त सूचना हेतु आवेदन रजिस्ट्री की रसीद, पोस्टल आर्डर जो आप ने शुल्क के लिए नत्थी किया था, अपील का आवेदन जो नहीं लिया गया और जिला कलेक्टर को की गई शिकायत और उस के आदेश की प्रतियाँ संलग्न करते हुए सीधे राज्य सूचना आयोग को अपनी शिकायत प्रस्तुत करें।

अपील और पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) में क्या अन्तर है?

समस्या-

पील और रिवीजन पिटीशन में क्या अंतर है? लोग राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपील या रिवीजन क्यों प्रस्तुत करते हैं?

-बबीता वाधवानी, जयपुर, राजस्थान

समाधान-

प की समस्या एक उपभोक्ता विवाद से संबंधित है।  हमारे यहाँ उपभोक्ता विवादों को सुलझाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 अधिनियमन किया गया है। इस अधिनियम की धारा-12 सपठित धारा 11 (1) के अंतर्गत कोई भी उपभोक्ता 20 लाख रुपए तक के मूल्य के उपभोक्ता विवाद की शिकायत जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच को प्रस्तुत कर  सकता है।  20 लाख से अधिक और अधिनियम की धारा-17 (a) (i)  के अंतर्गत एक करोड़ रुपये तक के मूल्य के उपभोक्ता विवाद की शिकायत राज्य उपभोक्ता आयोग को तथा अधिनियम की धारा-21 (a) (i)  के अंतर्गत एक करोड़ से अधिक मूल्य के उपभोक्ता विवाद की शिकायत राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग को प्रस्तुत कर सकता है।

किसी भी उपभोक्ता विवाद में जिला मंच द्वारा दिए गए अंतिम आदेश की अपील अधिनियम की धारा-17 (a) (ii)  के अंतर्गत राज्य आयोग को प्रस्तुत की जा सकती है। जिस में वह अंतिम आदेश पारित कर सकता है।  इसी तरह राज्य आयोग द्वारा किसी उपभोक्ता विवाद में अधिनियम की धारा-17 (a) (i)  के अंतर्गत ग्रहण की गई उपभोक्ता विवाद में दिए गए आदेश की अपील राष्ट्रीय आयोग को अधिनियम की धारा-21 (a) (ii)  के अंतर्गत प्रस्तुत की जा सकती है। राष्ट्रीय आयोग द्वारा अधिनियम की धारा-21 (a) (i)  के अंतर्गत ग्रहण किए गए उपभोक्ता विवाद के अंतिम आदेश की अपील अधिनियम की धारा-23 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को प्रस्तुत की जा सकती है।

दि किसी उपभोक्ता विवाद में जिला मंच द्वारा अंतिम आदेश पारित किया जाता है और राज्य आयोग के समक्ष उस आदेश की अपील प्रस्तुत की जाती है तथा राज्य आयोग उस अपील में अपील को स्वीकार करते हुए अथवा उसे अस्वीकार करते हुए  कोई आदेश पारित करता है तो राज्य आयोग द्वारा अपील का निस्तारण करते हुए दिए गए आदेश की कोई अपील करने का कोई उपबंध उपभोक्ता संरक्षण में नहीं दिया गया है। इस का सीधा अर्थ यह है कि इस अधिनियम में दूसरी अपील करने का कोई अधिकार किसी पक्षकार को प्रदान नहीं किया गया है। ऐसी अवस्था में यदि राज्य आयोग द्वारा किसी अपील का निस्तारण करते हुए कोई आदेश दिया जाता है और उस से किसी पक्षकार को कोई नाराजगी है तो वह अपील प्रस्तुत नहीं कर सकता और उसे इस अधिनियम में दिए गए अन्य उपाय का सहारा लेना पड़ेगा।

पभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा  21 (b) द्वारा राष्ट्रीय आयोग को यह क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है कि वह किसी भी राज्य आयोग के समक्ष लंबित या उस के द्वारा निर्णीत किए गए किसी मामले में राज्य आयोग द्वारा उसे कानून से प्रदत्त नहीं किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग करने पर या उसे प्रदत्त किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में असफल रहने पर  अथवा अवैधानिक रूप से या तात्विक अनियमितता के साथ क्षेत्राधिकार का उपयोग करने पर रिकार्ड मंगा सकता है और उचित आदेश पारित कर सकता है। इसी अधिकार को पुनरीक्षण (रिविजन) कहा जाता है।

स प्रकार जब अपील का उपचार उपभोक्ता विवाद के किसी पक्षकार को उपलब्ध नहीं होता है तो वह रिविजन पिटीशन या पुनरीक्षण याचिका के उपचार का प्रयोग करता है।  अपील तथा पुनरीक्षण याचिका में न्यायालय का क्षेत्राधिकार भिन्न होता है।  जहाँ अपील में विवेच्य आदेश के विरुद्ध सभी बिन्दुओं पर विचार किया जा सकता है वहाँ पुनरीक्षण याचिका में न्यायालय केवल इसी बात पर विचार कर सकता है कि क्या राज्य आयोग ने  उसे कानून से प्रदत्त नहीं किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग किया है या वह उसे प्रदत्त किए गए क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में असफल रहा है अथवा उस ने अवैधानिक रूप से या तात्विक अनियमितता के साथ क्षेत्राधिकार का उपयोग किया है।

गलत नामान्तरण को चुनौती दें और उसे निरस्त कराएँ

समस्या-

मेरे दादा जी 4 भाई थे। दादा जी सबसे छोटे भाई के कोई लडका नहीं था।  उनकी केवल एक लडकी थी।  उन्होंने अपनी लडकी के लडके को कानूनी रूप से गोद लिया हुआ था। उस लडके के पिता के नाम की जगह सभी जगह उन्हीं का नाम लिखा हुआ है।  सबसे छोटे दादा जी का स्वर्गवास अप्रेल 2002 में हो गया है।  2003 तक सभी भाइयों का स्वर्गवास हो गया है।  तीसरे नम्बर के भाई के लडके ने लेखपाल से मिलकर उनके 4 एकड़ खेत को अपने पिता के नाम 2002 में करवा दिया था।  जिसका पता सन 2007 में चला।  दादा जी के गोद लिये लडके का व्यवहार ठीक नहीं है।  वह उनकी लडकी से अलग रह रहा है।  तीसरे नम्बर के भाई के लडके उनकी सारी अचल सम्पति पर खुद का कब्जा कर रखा है वह न तो उनकी लडकी को कुछ दे रहे हैं ना ही गोद लिये लडके को।  मैं जानना चाहता हूँ कि कानूनी रूप से उनकी सम्पति पर किसका हक है? इस स्थिति में और भाई के लडके क्या कर सकते हैं?

-एस.सी.शुक्ला, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश

समाधान-

प का मामला उत्तर प्रदेश में स्थित कृषि भूमि के संबंध में है।  इस मामले में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी न हो कर उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम के उपबंध प्रभावी होंगे।  इस इस अधिनियम के अनुसार  किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त यदि उस की विधवा और पुत्र जीवित हैं तो समस्त कृषिभूमि विधवा और पुत्रों का समान अधिकार होगा।  किसी पुत्री को अथवा अन्य रिश्तेदारों को उस भूमि को प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है।

स मामले में आप के छोटे दादा जी के कोई पुत्र था ही नहीं।  उन की विधवा का आप ने उल्लेख नहीं किया है। यदि छोटे दादा जी की पत्नी जीवित नहीं हैं और गोद लिए हुए पुत्र को वे सभी अधिकार हैं जो कि उन के औरस पुत्र को होते।  इस तरह उनका गोद लिया हुआ पुत्र ही उन की कृषि भूमि का अधिकारी है।

लेकिन आप का कहना है कि तीसरे क्रम के दादा जी के पुत्र ने किसी तरह छोटे दादा जी का उक्त खेत अपने पिता के नाम करवा लिया था।  आप को सब से पहले तो यह पता करना पड़ेगा कि यह कैसे हुआ।  इस के लिए आप को इस नामान्तरण को देखना होगा। यदि नामान्तरण में कोई दोष है तो उसे चुनौती देनी होगी।  लेकिन इस नामान्तरण को वही चुनौती दे सकता है जिस का उक्त भूमि में अधिकार हो।  यहाँ केवल गोद पुत्र ही उक्त भूमि का अधिकारी है।  इस कारण से अन्य भाइयों के पुत्र इस मामले में कुछ भी कहने में असमर्थ हैं।

दि यह मान लिया जाए कि आप के सब से छोटे दादा जी ने किसी भी व्यक्ति को गोदन नहीं लिया था तो फिर उक्त नामान्तरण निरस्त हो जाने पर आप के शेष सभी दादा जी उक्त भूमि के समान अधिकारी होते।  सभी दादा जी का देहान्त हो जाने से उन के पुत्र अपने अपने पिता के हिस्से के अधिकारी होते। ऐसी स्थिति में सभी दादा जी के पुत्रों में से कोई भी उक्त नामान्तरण को चुनौती दे सकता है। इस के लिए उक्त नामान्तरण को निरस्त करवाने के लिए उसे अपील दाखिल करनी होगी। नामान्तरण निरस्त होने पर भूमि पुनः आप के स्वर्गीय छोटे दादाजी के नाम आएगी और तब तहसलीदार शेष दादाजी और उन के उत्तराधिकारियों के नाम नामान्तरण करेगा।  इस मामले में आप को अपने किसी स्थानीय वकील से जो कि राजस्व मामलों की वकालत करता हो उस से सलाह लेनी चाहिए।  उस के बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए।

498ए भा.दं.संहिता के मामले में अपील के स्तर पर राजीनामे आधार पर दंड समाप्त किया जा सकता है

समस्या-

मेरे सरकारी सेवारत मित्र को 498-क में सज़ा हुई है।  निचली अदालत में लड़की वाले दहेज का सामान और पैसा वापिस करने की शर्त पर राज़ीनामा करने हेतु मान गये थे।  किंतु उस समय मेरे मित्र नहीं माने।  अब सज़ा के बाद मामला सत्र न्यायालय में है।  अब मेरे मित्र लड़की वालों की शर्तों को मानकर राज़ीनामा करना चाहता है, ये विधि द्वारा कैसे संभव है?  क्या राज़ीनामा ना होने की दशा में सत्र न्यायालय से सज़ा की पुष्टि होने पर मेरे मित्र को जेल जाना पड़ेगा?  और क्या सत्र न्यायालय से सज़ा की पुष्टि के बाद मेरे मित्र की सरकारी नौकरी सदा के लिए जा सकती है?

-के.पी. सिंह, सतना, मध्यप्रदेश

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि राजीनामे की शर्तें क्या होंगी? फिर भी अपील के स्तर पर धारा 498ए भा. दं. संहिताके मामले में राजीनामा संभव है।  लेकिन राजीनामा प्रस्तुत करने के साथ ही यह तय करना होगा कि पति-पत्नी जिन के बीच में विवाद है क्या साथ रहने को सहमत हैं या अलग होने पर सहमत हो गए हैं और उन्हों ने सहमति से तलाक के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है।

दोनों ही स्थितियों में दोनों पक्षों के मध्य कोई लिखित अनुबंध गवाहों के सामने लिखा जाना चाहिए और उसे कम से कम नोटेरी पब्लिक से तस्दीक करा लेना चाहिए।  एक बार उक्त अनुबंध तस्दीक करवा लेने पर उस के अनुसार साथ रहना आरंभ करना चाहिए या फिर तलाक के लिए न्यायालय में आवेदन कर देना चाहिए। इस के उपरान्त दोनों को अपने अपने शपथ पत्र के साथ न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए कि इन परिस्थितियों में अपीलार्थियों को दंडादेश निरस्त कर दिया जाए। इस मामले में आप मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का मातादीन एवं अन्य बनाम राज्य के मामले में दिया गया निर्णय न्यायालय को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं। यह निर्णय यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है।

वकील की फीस और मुकदमों का खर्च

कील की फीस और मुकदमों का खर्च इतना बढ़ गया है कि बहुत से लोग अब अदालत का रुख करने से बचने लगे हैं। लोगों ने सोचा था कि चैंक बाउंस पर फौजदारी मुकदमा करने का कानून आ जाने से अब रुपया वसूल करना आसान हो जाएगा। लेकिन कोई भी वकील इस तरह के मुकदमों को बिना पाँच हजार रुपया फीस लिए बिना करना नहीं चाहता। मुवक्किल वकील को दस प्रतिशत से अधिक फीस देना नहीं चाहता। नतीजा ये हुआ कि कोई वकील पचास हजार रुपए से कम का चैक बाउंस का मुकदमा नहीं करना चाहता। इस का एक नतीजा और यह भी हो रहा है कि जरूरत पड़ने पर किसी को कोई छोटी धनराशि उधार देना नहीं चाहता। खैर, चैक बाउंस के मुकदमे में तो जीतने पर चैक की दुगनी राशि के बराबर तक की वसूली होने की संभावना रहती है जिस से मूल रकम के साथ साथ मुकदमा खर्चा और वकील को दी जाने वाली फीस और रकम का ब्याज पट जाने की गुंजाइश रहती है। लेकिन दीवानी मुकदमों में तो एक सच्चे पक्षकार को मुकदमा जीतने के बाद मुकदमे का खर्चा तक मिलने की गुंजाइश नजर नहीं आती। मसलन मकान मालिक यदि बकाया किराए के साथ मकान खाली कराने का मुकदमा करे और मुकदमा डिक्री हो जाए और मकान खाली हो जाए तो उसे बकाया किराए और खर्चा मुकदमा वसूल करने का इरादा त्याग देना पड़ता है। पिछले दिनों ऐेसे ही एक मामले में मुकदमा अंतिम स्तर पर पंहुँचने के साथ ही किराएदार ने चुपचाप मकान खाली कर दिया। अदालत में उस के वकील ने कहा कि उस के मुवक्किल ने मकान खाली कर दिया है इस लिए मुकदमा खारिज कर दिया जाए। जब कि मकान मालिक कह रहा है कि उस का आठ बरस का बिजली पानी का पैसा बाकी है जो लाख रुपए से अधिक है और किराएदार ने उसे फिजूल ही आठ बरस परेशान किया है। उसे बिजली पानी का पैसा ब्याज सहित मिलना चाहिए और खर्चा मुकदमा भी मिलना चाहिए। इधर निचली दीवानी अदालतों में खर्चा मुकदमा दिलाने के मामले में यह रवैया आम देखने को मिल रहा है कि वे निर्णय में कहती हैं कि दोनों पक्ष खर्चा मुकदमा अपना अपना भुगतेंगे।

भी कभी ऐसा भी होता है कि खर्चा मुकदमा ही इतना होता है कि साधारण पक्षकार की आँखें उसे सुन कर ही चौड़ा जाएँ।  संजीव कुमार जैन बनाम रघुवीर शरण चेरिटेबल ट्रस्ट एवं अन्य के ऐसे  ही मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय को पिछले वर्ष सुनवाई करनी पड़ी। इस मामले में संजीव कुमार रघुवीर शरण चेरिटेबल ट्रस्ट की कनॉट प्लेस स्थित इमारत के प्रथम तल पर तथा मध्य तल की दो इकाइयों में किराएदार था। 1986 में उस ने ट्रस्ट की अनुमति से मध्य तल से प्रथम तल तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया। बाद में ट्रस्ट ने मध्य तल को खाली कराने का मुकदमा किया और उस का खाली कब्जा संजीव कुमार जैन से प्राप्त कर लिया। लेकिन उस ने दावा किया कि मध्य तल से प्रथम तल तक उस के द्वारा बनाई गई सीढ़ियों पर हो कर उसे अपने प्रथम तल पर स्थित इकाई में जाने का अधिकार है। संजीव ने  उसे इन सीढ़ियों के प्रयोग से ट्रस्ट द्वारा न रोके जाने के लिए स्थाई व्यादेश  प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत किया। उसे अंतरिम सुरक्षा मिली लेकिन फिर न्यायालय ने इस आदेश को निरस्त कर दिया। संजीव ने उच्च न्यायालय के समक्ष अपील दाखिल की जो छह साल तक चलती रही। अंतिम बहस के दौरान खंड पीठ ने सुझाव दिया कि सारा मामला व्यावसायिक है इस कारण से सफलता प्राप्त करने वाले पक्षकार को  असफल पक्षकार के द्वारा मुकदमे का ख्रर्चा देना चाहिए। इस पर दोनों पक्षों ने सहमति जताई। न्यायालय ने निर्णय को सुरक्षित रखते हुए दोनों पक्षकारों से केवल अपील के खर्च का विवरण प्रस्तुत करने को कहा। संजीव ने अपना मेमों प्रस्तुत किया जिस में उस ने बताया कि उस का वकीलों की फीस अदा करने पर रुपए 25,50,000/- खर्च हुआ है। ट्रस्ट ने अपने वकील की फीस रुपए 45,28,000/- बताई। न्यायालय ने संजीव की अपील को खारिज करते हुए आदेश दिया कि वह छह माह में ट्रस्ट को रुपए  45,28,000/- अदा करे। संजीव ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गुणावगुण पर और मुकदमा खर्च के भुगतान पर अपील प्रस्तुत कर चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपील को केवल मुकदमा खर्च के मामले में अनुमति प्रदान की।

 सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लिया। उस ने दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 35, 35-क, 35-ख तथा आदेश 20-क का उल्लेख किया और सर्वोच्च न्यायालय के  सलेम एडवोकेटस् बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ के मामले में दिए गए पूर्व निर्णय का उल्लेख किया कि न्यायालय अक्सर मामलों में विजयी पक्ष को मुकदमा खर्च न दिला कर सभी पक्षकारों को अपना अपना खर्च भुगतने का आदेश देती है जो गलत है इस तरह निराधार मामले न्यायालय के सामने लाने वाले लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। न्यायालय यदि खर्च दिलाती भी हैं तो वे वास्तविक न हो कर नाममात्र के होते हैं जिस से न तो किसी पक्षकार को राहत मिलती है और न असफल पक्षकार पर दबाव आता है।  इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि मुकदमा खर्च वास्तविक होना चाहिए और उसे दिलाएजाने का उचित कारण होना चाहिए। वह जीतने वाले पक्षकार की मर्जी पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। वकीलों को सामान्य रूप से दी जाने वाली फीस खर्च के रूप में दिलाई जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने  विधि आयोग, संसद और उच्च न्यायालयों को खर्चा मुकदमा दिलाए जाने के लिए उचित उपबंध बनाए जाने का सुझाव दिया। इस मामले में उच्च न्यायालय के प्रावधानों के अनुसार दिलाया जाने वाला मुकदमा खर्च तथा 3000/- रुपए दंडात्मक खर्च दिलाए जाने का और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष की गई अपील में कोई खर्च नहीं दिलाए जाने का आदेश दिया।

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