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दिया हुआ उपहार वापस नहीं मांगा जा सकता।

समस्या-

भावेश जैन ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


2010 में मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को मेरे नाम पर पर एक मोबाइल सिम खरीद कर दी, व्यक्तिगत उपयोग के लिए।  उस सिम को मैंने 2011 में पोस्ट पेड करवा दिया तथा उसके बिल का भुगतान भी में करता था।  जिसके बिल भुगतान की रसीदें मेरे पास हैं। 2016 में उसने मेरे से ब्रेकअप कर लिया तो मैंने उसकी सिम बंद करवा कर उसी नंबर की नयी सिम इशू करवाकर उपयोग करने लग गया हूँ।  क्या मैं ने कोई अपराध किया है? मैं ने उसे एक मोबाइल गिफ्ट किया था क्या मैं उस मोबाइल की मांग कर सकता हूँ ?


समाधान-

सिम अर्थात मोबाइल कनेक्शन आप के नाम था। उस पर आप का स्वामित्व था। आप ने वह अपने पास ले लिया। कोई अपराध नहीं किया।

लेकिन फोन इन्स्ट्रूमेंट आप ने गिफ्ट अर्थात उपहार में दिया था। उपहार का कानून यह है कि वह वापस नहीं होता। उपहारकर्ता अपने उपहार को वापस नहीं मांग सकता।  इस लिए आप का उसे वापस मांगना किसी भी तरह से न तो उचित है और न ही कानूनी।

 

दिया हुआ दान स्वीकार कर लिए जाने के बाद वापस नहीं हो सकता।

Giftसमस्या-

शकुन्तला ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

पिताजी ने सन् 2010 में मकान खरीदा, इसी मकान को पिताजी ने दानपत्र निष्पादित कर पंजीकृत करवा कर बड़ी बेटी को हस्तान्तरित कर दिया। क्या पिता की छोटी बेटी इस मकान में हिस्सा पा सकती है? क्या पिता इस दान को वापस लेने का अधिकार रखते हैं। क्या पिता के देहान्त के बाद छोटी बेटी इस मकान में हिस्सा प्राप्त कर सकती है। अब बड़ी बेटी के पिता इस मकान की कीमत बड़ी बेटी से मांग रहे हैं। बड़ी बेटी भी पिता को मकान की कीमत देना चाहती है। यह राशि दी जाए तो क्या कैसे दी जाए? क्या दस्तावेज लिखवाया जाए?

समाधान-

दि किसी व्यक्ति ने दानपत्र निष्पादित कर उसे पंजीकृत करवा कर कोई अचल संपत्ति किसी को दान कर दी हो, जिसे दान की हो उस ने उस दान को स्वीकार कर लिया हो तथा अचल संपत्ति का कब्जा भी प्राप्त कर लिया हो तो ऐसा दान निरस्त किया जाना संभव नहीं है।

दि बड़ी बेटी ने पिता के दान पत्र को स्वीकार कर उस संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लिया है तो यह दानपत्र निरस्त नहीं किया जा सकता। छोटी बेटी पिता के जीवनकाल में या उन के जीवन के उपरान्त भी इस दान पत्र को निरस्त नहीं करवा सकती है और न ही उस मकान में कोई हिस्सा प्राप्त करना चाहती है। कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किए हुए दान को दान लेने वाले द्वारा स्वीकार करने के बाद वापस नहीं ले सकता है।

दि पिता दान किए हुए मकान का मूल्य अब मांग रहे हैं तो यह कानून के विरुद्ध है वह अब ऐसा नहीं कर सकते। लेकिन यदि पुत्री अपने पिता को धन देना चाहती है तो वह धन किसी अन्य रूप में ही देना होगा। इस धन का हस्तान्तरण किस विलेक के माध्यम से देना चाहिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। कोई अच्छा वकील बड़ी बेटी और पिता से बात कर के निष्पादित दानपत्र का अध्ययन और परिस्थितियों का मूल्यांकन कर के तथा दोनों पक्षों की शंकाओं और कानून को ध्यान में रखते हुए तय कर सकता है कि इस धनराशि के हस्तान्तरण के लिए किस तरह का विलेख लिखना चाहिए।

अपंजीकृत दानपत्र विधि की दृष्टि में शून्य और अकृत है।

ऊसरसमस्या-

संजय कुमार यादव ने उन्नाव उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता जी के पास 4 बीघा जमीन थी। मेरे पिता जी दो भाई हैं। दूसरे भाई की नौकरी पुलिस विभाग मे लग गई है। मेरे चाचा जी के पास कोई जमीन नहीं थी। उन्हों ने पिता जी से किसी तरह से 1 बीघा जमीन दान द्वारा प्राप्त कर ली थी। दान-पत्र पर कुछ गांव के ही लागों ने गवाही के तौर पर नाम भी लिखा है। जिसको रजिस्टर्ड नहीं कराया गया है। कुछ दिनों से चाचाजी पिता जी को परेशान कर रहे हैं, वे चाहते हैं कि पूरी जमीन उनको दे दें। परन्तु पिता जी अब उन्हें कुछ नहीं देना चाहते और वो यह चाहते हैं कि जो 1 बीघा जमीन उन्हों ने चाचाजी को दी थी वह भी वापस ले लें। क्योंकि चाचा जी गांव में रहते नहीं हैं और वो जमीन को बेचना चाहते हैं। क्या कोई तरीका है जिससे हम अपनी जमीन वापस पा सकें?

 

समाधान-

किसी भी स्थाई संपत्ति का दान पत्र यदि संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक का हो तो उसे पंजीकृत होना चाहिए। आप के पिताजी द्वारा लिखा गया दानपत्र इस जरूरी शर्त को पूरा नहीं करता इस कारण वह दानपत्र कानून की निगाह में व्यर्थ है। इस दान पत्र के आधार पर तो राजस्व विभाग के रिकार्ड में नामान्तरण नहीं कराया जा सकता। इस स्थिति के अनुसार उक्त जमीन आज भी आप के पिताजी की ही है। जिसे आप दान समझ रहे हैं वह शून्य और अकृत है।

प के पिता जी को उक्त जमीन के मामले में कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। बस वेउस 4 बीघा जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की स्वयं की है, वह उसे दान, विक्रय तथा वसीयत आदि कर सकती है …

DCF 1.0समस्या-

आगरा, उत्तर प्रदेश से विकास गुप्ता ने पूछा है-

मैं एक शादी शुदा और एक प्राइवेट नौकरी करने वाला लड़का हूँ।  मेरी शादी अभी हाल में ही हुई है। मेरी समस्या यह है कि मैं जिस मकान मैं रहता हूँ वह मेरे पिताजी का है और मेरी माँ के नाम पर है। मेरे घर में मेरे अलावा मेरे दो और शादी शुदा भाई हैं जो अलग रहते हैं। मेरे सबसे बड़े भाई को मेरे पिताजी ने अपना बिज़्नेस शुरू करने के लिए 5,00,000 रुपये दिए थे जिसके बदले मेरे बड़े भाई मेरे पिताजी को हर महीने 9,000 रुपये देते हैं।  मेरे बड़े भाई ने सारा बिज़नेस अपने नाम करवा लिया है और उसी बिज़नेस से उन्होने एक अच्छा मकान भी ले लिया है और वो अपने परिवार के साथ आराम से रहते हैं। लेकिन वो अब हमारे मकान के पीछे भी पड़े हुए हैं। पिताजी को बार बार बटवारे के लिए मनाते रहते हैं। इसीलिए वो पिताजी के लिए कुछ ना कुछ करते रहते हैं। लेकिन मेरे पिताजी ने मेरे लिए कभी भी कुछ नहीं किया। सिर्फ़ 12वीं तक पढ़ाया और छोड़ दिया और कहा अब हमारे पास तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है। मैं और मेरी पत्नी उसी मकान के ऊपर बने एक स्टोर रूम में रहते हैं। मई पूरे दिन भर बाहर नौकरी करता हूँ और मेरे माँ-बाप मेरी पत्नी से पूरे दिन भर घर का सारा काम कराते रहते हैं। जब कि वह गर्भवती है। मैं कुछ बोलता हूँ तो घर से निकाल देने की धमकी देते रहते हैं।  मेरे पास अभी इतनी व्यवस्था भी नहीं है कि मैं अभी अलग जा कर रहूँ।  मुझे डर लगता है कि मेरे पिताजी मेरी माँ को धमका कर सारी संपत्ति बड़े भाई को दे दें और मुझे मेरी पत्नी के साथ निकाल दिया जाए। कई बार मेरे और पिताजी के बीच इसी बात को ले के बहस बी हो चुकी है। लेकिन मेरे पिताजी उसी वक्त पुलिस को बुला लेते हैं और कहते है कि एक बदमाश हमारे घर में जबरन घुसा हुआ है और निकल नहीं रहा है। साथ ही साथ मैं आपको यह भी बताना चाहता हूँ कि मेरी माँ पढ़ी लिखी नहीं है इसी लिए मेरे पिताजी और भाई मेरी मम्मी को धमका कर किसी ना किसी पेपर पर अंगूठा लगवाते रहते हैं। मेरे पिताजी पूरी तरह से मेरे बड़े भाई का साथ दे रहे हैं। मेरा बीच वाला भाई गुड़गाँव में अपनी पत्नी के साथ नौकरी करता है। मैं सिर्फ़ इतना जानना चाहता हूँ कि क्या मेरे बड़े भाई के पास सारी संपत्ति आ जाने के बाद मेरा कुछ भी हक नहीं रह जाएगा? मैं कानूनी रुप से क्या कर सकता हूँ जिस से मेरे 75 वर्षीय पिताजी सारी संपत्ति मेरे बड़े भाई के नाम नहीं करें।

समाधान-

प के माता-पिता की उम्र बहुत अधिक है। ऐसी अवस्था में हर माता पिता सदैव उसी संतान की तरफदारी करने लगता है जिस से उन्हें सेवा कराने और जरूरत पड़ने पर इलाज वगैरह का खर्च करने की प्रत्याशा होती है। आप अभी खुद को अलग जा कर रहने में सक्षम नहीं पाते हैं  तो वे आप से कैसे प्रत्याशा कर सकते हैं। यही कारण है कि वे आप के भाई की तरफदारी करते हैं और आप को नालायक समझ कर व्यवहार करते हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे मकान को आप के भाई को हस्तान्तरित कर देंगे। वे आप के साथ अच्छा व्यवहार भले ही न करें। लेकिन आप को अपनी संपत्ति से पूरी तरह वंचित कर दें कर पाना उन के लिए बहुत कष्टकारी होगा।

प के पिताजी ने मकान आप की माता जी के नाम से खरीदा है। लेकिन कानून यह है कि मकान जिस के नाम से खरीदा गया है उसी का माना जाएगा। ऐसा कोई दावा कि मकान पिताजी के पैसे से खरीदा गया था और उन का है कानून द्वारा नहीं माना जाएगा। इस कारण से आप को यह मान कर चलना चाहिए कि मकान आप की माता जी का है।

किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की अपनी संपत्ति होती है। इस कारण से वह मकान उन की संपत्ति है और वे अपने जीवनकाल में किसी को भी हस्तान्तरित कर सकती हैं। उसे बेच सकती हैं, दान कर सकती हैं। लेकिन यह विक्रय या दान केवल रजिस्टर्ड विलेख के द्वारा ही हो सकता है। यह विलेख जब तक उप पंजीयक के यहाँ उचित स्टाम्प ड्यूटी पर ही पंजीकृत हो सकता है। उत्तर प्रदेश में स्टाम्प ड्यूटी लगभग दस प्रतिशत है। इस तरह यदि आप की माता जी का यह मकान 10 लाख रुपयों की कीमत का है तो उस पर एक लाख रुपया स्टाम्प ड्यूटी देनी पड़ेगी। इस तरह यह मुमकिन नहीं लगता कि आप के भाई और पिताजी माता जी को उपपंजीयक के कार्यालय में ले जा कर मकान आप के भाई के नाम कराने के लिए कोई दानपत्र या विक्रय पत्र लिखा पाएंगे।

दूसरी सूरत यह है कि आप के भाई माता जी की कोई वसीयत करवा लें। यदि वसीयत उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवाई जाती है तो उसे चुनौती देना कठिन है। लेकिन यदि वे कोई अपंजीकृत वसीयत लिखाते हैं तो उसे चुनौती दी जा सकती है। वसीयत से आप की माताजी के जीवन काल में संपत्ति माता जी की ही रहेगी। उन के देहान्त के उपरान्त ही वह उस की होगी जिस के नाम की वसीयत की जाती है। आप की माता जी के देहान्त के बाद यदि कोई वसीयत सामने आए तो उसे इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह उन की स्वतंत्र इच्छा से की गई नहीं है। किसी भी वसीयत को वसीयत करने वाला अपने जीवन काल में निरस्त कर सकता है और अंतिम वसीयत ही मान्य होती है।

दि आप की माता जी उक्त मकान को अपने जीवन काल में विक्रयपत्र या दान पत्र द्वारा हस्तान्तरित नहीं करती हैं और कोई वसीयत भी नहीं करती हैं तो उत्तराधिकार के नियम के अनुसार आपके पिताजी और आप तीनों भाई और यदि आपकी कोई बहिन हो तो वे सब बराबर के हिस्से के अधिकारी होंगे। तब आप अपने हिस्से के लिए बंटवारे का दावा कर सकते हैं। उन के जीते जी तो बँटवारा संभव नहीं है।

प उस मकान में अभी रह रहे हैं। एक तरह से आप अपनी माता जी की अनुमति से वहाँ निवास कर रहे हैं। इस तरह आप एक लायसेंसी हैं। आप को माता जी के जीते जी निकालने का वैधानिक मार्ग यही है कि माता जी एक कानूनी नोटिस दे कर आप का लायसेंस रद्द करें और फिर भी आप के द्वारा मकान खाली न करने पर आप के विरुद्ध मकान खाली करने का दावा करें। इस दावे में भी उनहें कोर्ट फीस देनी पड़ेगी। और दावे का निर्णय होने में भी कम से कम चार पाँच बरस और उस की अपील में भी इतना ही समय लग जाएगा। तब तक वे आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। पुलिस को बुलाने का जो नाटक आप के पिताजी करते हैं वह केवल आप को धमकाना मात्र है। पुलिस आप को वहाँ से निकाल नहीं सकती। आप निर्भीक हो कर अपने भाई और पिता से कह सकते हैं कि आप परिवार के सदस्य की हैसियत से वहाँ रहते हैं आप को भी अपने माता पिता के मकान में रहने का अधिकार है। यदि उन्हें आप को निकालना ही है तो वे आप के विरुद्द मुकदमा कर दें। आप बिना अदालत के आदेश के मकान को खाली नहीं करेंगे। यदि आप के माता-पिता आप की गर्भवती पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते तो आप उन्हें स्पष्ट कहें कि यह उचित नहीं है। यदि आप की पत्नी उन के विरुद्ध घरेलू हिंसा की शिकायत करेगी तो उन्हें फिजूल में परेशानी होगी। इस तरह आप अपनी पत्नी को उत्पीड़न से भी बचा सकते हैं।

भूमि पर कृषक के अधिकार में कमी होने पर रेकार्ड में परिवर्तन करने वाले आदेश की अपील करे।

agricultural-landसमस्या-

इन्दौर, मध्य प्रदेश से अमित ने पूछा है-

क मंदिर है, जिसमें हम वर्षो से निरंतर सेवा, पूजा-अर्चना आज तक करते चले आ रहे हैं। वर्षों पूर्व हमारे पूर्वजों को इस मंदिर के पुजारी की हैसियत से कृषि करने हेतु भुमि का एक विशाल भूखण्ड दान किया गया था। पिताजी बताते हैं कि उस समय राजवंशो का शासन चला करता था। यह जमीन हमें भू-दान आंदोलन में दान में दी गई थी। उस समय से राजस्व अभिलेखों में यह जमीन हमारे पूर्वजों के नाम से ही दर्ज थी। पिछले कई दशकों में उक्त प्रकार से दान में मिली भूमियों को कुछ व्यक्तियों द्वारा अपने स्वार्थवश जमीन की किमत में बेतहाशा वृद्धि होने से विक्रय कर दिया गया।

स स्थिति को देखते हुये वर्ष 1975-76 में आयुक्त महोदय के आदेश द्वारा इस प्रकार की समस्त भूमियों पर भू स्वामी के नाम के साथ साथ कलेक्टर महोदय का नाम बतौर प्रबंधक की हैसियत से दर्ज कर दिया गया। जिससे इस प्रकार की जमीनों के विक्रय को प्रतिबंध किया जा सके।

मेरे द्वारा जब इस भूमि से संबंधित खसरों की प्रमणित प्रति भू अभिलेख विभाग से प्राप्त करने पर ज्ञात हुआ कि वर्तमान में उस भूमि पर हमारे पूर्वजों का नाम हटाते हुये उस भूमि को शासकीय भूमि घोषित कर दिया है। जबकि इस भूमि पर हमारा आज भी कब्जा है और हमारा परिवार उस भूमि पर आज भी खेती कर रहा है। वर्तमान में उस क्षेत्र की यह स्थिति है कि वह क्षेत्र नगर सीमा के भीतर आ चुका है और उसे भूमि से लगे आस पास के क्षेत्र में कॉलोनीयां बन चुकी है और वहाँ पर जनता निवास कर रही है।

में संदेह है कि भविष्य में इस भूमि को सरकार हम से वापस ना ले ले। ऐसी स्थिति में हमारे पास क्या-क्या कानूनी उपचार हो सकते है? जिससे हमारा नाम पुनः बतौर स्वामी के स्थापित हो सकें? यदि इस प्रकार को लेकर न्यायालय में केस लगाते है तो हमें क्या सहायता मिल सकती हैं?

समाधान-

प के परिवार के किसी पूर्वज को जो पुजारी की हैसियत से मंदिर का काम देखता था उसे उक्त भूमि दान की गई। लेकिन उस दान में यह शर्त रही होगी कि आप के पूर्वज और उन के वंशज पुजारी का काम करते रहेंगे और मंदिर के रखरखाव के लिए भी खर्च करेंगे। कानून में किसी भी मूर्ति को एक अवयस्क की तरह माना जाता है। अवयस्क की संपत्ति का प्रबंधन उस के संरक्षक द्वारा किया जाता है। न्यायालयों द्वारा इस तरह के दान को मंदिर की मूर्ति को दान माना गया और मंदिर व भूमि को उस की संपत्ति माना गया तथा पुजारी को उस मूर्ति का संरक्षक माना गया है। इस तरह पुजारी की हैसियत मूर्ति के संरक्षक की हो गई।

नेक इस तरह के संरक्षकों ने इस स्थिति को भाँप कर पहले ही उक्त भूमि का विक्रय कर के उसे स्थानान्तरित कर दिया और पैसा बना लिया। जब कि ऐसी भूमि को स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता।

रकार तो सारी ही भूमि की स्वामी होती है। जिसे भूस्वामी कहा जाता है वह तो उस भूमि का कृषक मात्र होता है। इस तरह मेरा अनुमान है कि कलेक्टर/सरकार भूस्वामी के बतौर और मूर्ति मंदिर का नाम एक कृषक के बतौर दर्ज हुआ होगा। आप के परिवार का नाम वहाँ मूर्ति मंदिर के संरक्षक की हैसियत से रहना चाहिए। लेकिन यदि आप समझते हैं कि उक्त भूमि आप के पूर्वजों से मूर्ति या मंदिर के किसी दायित्व के बिना दान की गई थी तो फिर वह आप की स्वयं की भूमि है।

प को पुराने दान-पत्र से ले कर आज तक के राजस्व रिकार्ड में हुए समस्त परिवर्तनों की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर के किसी राजस्व संबंधी वकील से सलाह लेना चाहिए। वे समस्त रिकार्ड देख कर ही बता सकेंगे कि आप का अधिकार क्या है? यदि किसी प्रकार से आप के अधिकार में कमी हुई है तो राजस्व रिकार्ड में हुए जिस परिवर्तन से ये अन्तर आया है उस परिवर्तन के आदेश के विरुद्ध आप को राजस्व न्यायालय में अपील करना चाहिए। लेकिन इस काम को करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

2005 के पू्र्व हिन्दू सहदायिक संपत्ति में किसी स्त्री को कोई अधिकार नहीं था।

gift propertyसमस्या-

धर्मशाला, जिला काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश से यशपाल सिंह संधू ने पूछा है –

मेरे नानाजी को अपनी पुश्तैनी ज़मीन उन्हें अपने पूर्वजों से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के लागू होने से पहले से बिना किसी वसीयत के वैसे ही उत्तराधिकार में मिली थी, जो कि वास्तव में ही उनकी “पुश्तैनी ज़मीन” थी। उन्होंने इस जमीन को अपने मामा के लड़के को हिबा द्वारा गिफ्ट डीड वर्ष 1960 में कर दी थी क्योंकि मेरी माताजी के अलावा उनकी और कोई संतान नहीं थी और वर्ष 1960 में मेरी माताजी की शादी के बाद शायद उन्होंने सोचा होगा कि उनके मामा का लड़का उनका ‘बेटा’ बन कर सेवा करेगा। परन्तु जहाँ आजकल अपने सगे बेटे ही माँ बाप की सेवा नहीं करते तो उसने कहाँ करनी थी?   एक वर्ष के भीतर ही उसने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया वह उनकी सारी संपत्ति पर हक़ जमाना चाहता था और उन को आये दिन परेशान करने लगा। इसलिए नानाजी ने अपने द्वारा किये गए हिबा को रद्द किये जाने के लिए कोर्ट में केस किया। लेकिन उस ज़माने में उनके मामा का वो लड़का एक नामी वकील के यहाँ नौकरी करता था, तो उनकी पहुँच के आगे अनपढ़ नानाजी की एक नहीं चली और वे तत्कालीन राजस्व और सिविल कोर्ट्स में केस हारते रहे तथा एक दिन दुनिया से ही हार कर वर्ष 1993 में विदा हो गए।  मुझे इस केस की कोई जानकारी नहीं थी कि क्या क्या हुआ था? क्यों कि मैं तो उस वक्त पैदा ही नहीं हुआ था।  इसलिए इतने वर्ष बीत जाने पर भी मैं कोई कारवाई न कर सका। अब सर मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या मेरे माताजी जो अभी जीवित हैं, और अपने पिता की संपत्ति की इकलौती वारिस हैं? क्या वे वर्ष 1960 में उनके पिता द्वारा किये गए उक्त हिबा को कोर्ट में चैलेंज कर सकती हैं?  यदि कोर्ट में केस स्वीकृत हो जाये तो क्या उक्त हिबा निरस्त हो सकता है?

समाधान-

प के नानाजी के पास जो संपत्ति थी वह पुश्तैनी थी। लेकिन उस संपत्ति के वे अकेले सहदायिक थे। उन के न तो कोई भाई था और न ही पुत्र। इस कारण उस संपत्ति में किसी अन्य व्यक्ति को सहादायिकी अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था। परंपरागत हिन्दू विधि के अंतर्गत सहदायिकी अधिकार जन्म से सिर्फ पुत्र, पौत्र या प्रपोत्र को ही प्राप्त हो सकते थे, न कि पुत्रियों को। वैसी स्थिति में उक्त संपत्ति में आप की माता जी को कोई सहदायिकी अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत स्त्री उत्तराधिकारी के होने पर संपत्ति का दाय उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होता है। लेकिन आप की माता जी को तो वह संपत्ति आप के नाना के देहान्त के उपरान्त ही प्राप्त हो सकती थी। जब कि नाना जी ने उस संपत्ति को जीवनकाल में ही दान कर दिया। जिस का उन्हें पूर्ण अधिकार था।

किसी भी दान को केवल कुछ ही मामलों में वापस लिया जा सकता है या निरस्त कराया जा सकता है, अन्यथा दान को निरस्त नहीं कराया जा सकता। आप के नाना उक्त दान को निरस्त कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं। इस लड़ाई को संभवतः वे इसी लिए नहीं जीत सके क्यों कि कानून के अनुसार दान करने वाले की इच्छा के आधार पर कोई दान निरस्त नहीं किया जा सकता। आप की माता जी को उक्त संपत्ति में कभी कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ था। इस कारण वे उसे चुनौती नहीं दे सकती थीं। यदि दान किन्हीं तकनीकी कारणों से अकरणीय होता तो ही आप की माता जी को आप के नाना जी के देहान्त के उपरान्त उक्त दान को निरस्त कराने का अधिकार उत्पन्न होता। लेकिन वह लड़ाई तो आप के नाना जी पहले ही हार चुके थे।

मुझे नहीं लगता कि आप के इस मामले में कोई मार्ग आप के या आप की माता जी के पक्ष में निकल सकता है। आप के नानाजी के द्वारा निष्पादित दानपत्र, तत्कालीन परिस्थितियों और नाना जी द्वारा लड़े गए मुकदमे के आज तक के सभी निर्णयों का अध्ययन करने के बाद ही कोई विधिज्ञ यह निश्चित कर सकता है कि उक्त मामले में दान पत्र को अब इतने समय बाद निरस्त कराया जा सकता है या नहीं।

वसीयत प्राप्त संपत्ति को दुबारा दान में प्राप्त नहीं किया जा सकता।

समस्या-

पटना, बिहार से विकास कुमार ने पूछा है –

मेरे चचेरे मामा जी की कोई संतान नहीं है।  उन्होंने सिर्फ एक लड़की को गोद लिया है जिसकी शादी हो चुकी है।  अब चचेरे मामा की पत्नी ने, जो जमीन उनके नाम पर थी उसको मेरी पत्नी के नाम वसीयत कर दिया।  जिस में दत्तक पुत्र पुतोह कर के उल्लेख किया। इसके बाद मेरे चचेरे मामा की पत्नी का देहांत हो गया। अब मैं चाहता हूँ की वह संपत्ति मेरे पत्नी को बक्शीश में मिले। क्या मेरे चचेरे मामा उस सम्पति को मेरे पत्नी के नाम से बक्शीश में दे सकते है?

समाधान-

gift propertyप की समस्या एक दम काल्पनिक है।  वास्तव में आप चाहते हैं कि उक्त संपत्ति आप की पत्नी के नाम हो जाए। लेकिन वह तो पहले ही आप की पत्नी की हो चुकी है।

प ने बताया कि वह सम्पत्ति आप के चचेरे मामा जी की पत्नी के नाम थी। किसी भी स्त्री की संपत्ति उसी की संपत्ति होती है जिसे वह दान, विक्रय या वसीयत कर सकती है।  आप की मामी जी ने अपनी उक्त संपत्ति को अपने जीवित रहते आप की पत्नी के नाम वसीयत कर दिया। इस वसीयत के रहते आप की मामी जी का देहान्त हो गया। कोई भी वसीयत यदि वह वसीयतकर्ता ने अपने जीवन काल में बदल न दी हो या निरस्त न कर दी हो तो उस के देहान्त के तुरंत बाद प्रभावी हो जाती है। आप के मामले में भी वह वसीयत प्रभावी हो चुकी है। इस तरह वह संपत्ति तो आप की पत्नी की पहले ही हो चुकी है। अब जो संपत्ति आप की पत्नी हो चुकी है उसे आप के मामा जी आप की पत्नी को बख्शीश (दान) कैसे कर सकते हैं।

मुझे लगता है कि आप की शंका इस लिए है कि उस वसीयत में आप की पत्नी का उल्लेख दत्तक पुत्र पतोहू के रूप में होने से निरस्त न मान ली जाए। लेकिन यदि उस वसीयत में आप की पत्नी का नाम पति के रूप में आप का नाम, उम्र व निवास स्थान सही लिखा है तो दत्तक पुत्र पतोहू लिख देने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

दूसरी ओर यदि उक्त वसीयत को निरस्त मान लिया जाए तो फिर आप की मामी जी के देहान्त के उपरान्त उक्त संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के मामाजी नहीं होंगे अपितु आप के मामा जी के साथ साथ उन की दत्तक पुत्री का भी उस में आधा हक होगा। वैसी स्थिति में आप के मामाजी केवल अपने हिस्से की आधी संपत्ति को दान कर सकते हैं। शेष आधी को भी दान करना अवैध होगा।

स कारण से आप को चाहिए कि उस वसीयत को ही वैध मानते हुए आप की पत्नी के नाम उक्त संपत्ति का नामांतरण करवाएँ। यदि आवश्यक हो तो वसीयत को प्रोबेट करवा लें। आप के मामा जी के रहते यह आसान होगा। उन की दत्तक पुत्री आपत्ति नहीं करेगी।

एक व्यक्ति के स्वामित्व की संपत्ति के मामले में पारिवारिक समझौता संभव नहीं।

समस्या-

गाजियाबाद, उत्‍तर प्रदेश से राकेश सूरी ने पूछा है –

कृपया पारिवारिक समझौते (Family Settlement)  के बारे में बतायें और इसका एक ड्राफट/सेम्पल भी बताएँ कि कैसे यह कैसे बनाया जाता है? मैं आपको अपने केस के बारे में बताता हूँ।  मेरे दो बड़े भाई हैं, और मेरे पिता जी की मृत्यु हुये 7 साल से ज्यादा का समय हो चुका है।  मेरी माताजी के जी0डी0ए0 जनता के दो फलेटस् हैं।  वे एक मकान अपने ही बेटों को कम कीमत पर सेल कर रही है और बड़े भाई के नाम रजिस्‍ट्री करवा रही है।  वह ऐसा बड़े बेटे के कहने पर कर रही हैं ताकि उससे जो पैसे मिलेंगे वह उन्हें दूसरे बड़े भाई को देगीं। यह दोनों भाईयों की आपसी सहमति से हो रहा है।  ताकि माता जी के निधन के बाद सपंति विवाद पैदा न हो और मेरी माता जी को भी इसमें कोई परेशानी नहीं है।  लेकिन मेरा यह प्रश्न है कि जो एक मकान बच गया है जिस में मैं और मेरी माता जी रहती हैं।   माता जी और दोनो बडे भाई कहते है जो मकान बच गया है वह तेरा है हम उस मकान मे हम कोई हिस्सा नहीं लेगें।  लेकिन कुछ लोगों से मैं ने बात की तो  वे कह रहे हैं कि आप अभी पारिवारिक समझौता करवा लो।  क्यों कि बाद में भाईयों में मतभेद हो सकते हैं।  जिसके कारण दूसरे बचे हुये मकान पर सपत्ति विवाद पैदा हो सकते हैं।  क्यों कि माता जी बड़े भाई को मकान बेच रही है और उसके पैसे दूसरे बड़े भाई को दे रही है जो कि क्रय-विक्रय होगा।  जिससे यह साबित नहीं किया जा सकता कि सपत्ति को दोनों भाइयों में बाँटा गया हैं। इसलिए आपसे अनुरोध है कि मुझे सही सलाह दें।

समाधान-

Giftगता है कि जो भाई अपने नाम उस मकान को हस्तान्तरित करवाना चाहता है वह उस मकान को खरीदने के लिए गृहऋण भी किसी संस्था से प्राप्त करना चाहता है जिसे वह अपने दूसरे भाई को दे सके। अन्यथा मकान को माता जी एक वसीयत के माध्यम से भी एक बेटे को दे सकती हैं। लेकिन इस तरह मकान उन के जीवनकाल में माताजी के नाम रहेगा और उस पर ऋण प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। इस कारण से रजिस्ट्री में होने वाला व्यय बचाने के बजाय खर्च किया जा रहा है।

दोनों मकान आप की माता जी के स्वामित्व के हैं। एक मकान वे बेच देंगी तो बचे हुए मकान पर माताजी के जीवनकाल के उपरान्त तीनों भाइयों का समान अधिकार होगा। इस कारण से आप को लोगों ने जो सलाह दी है वह उचित दी है। लेकिन आप के मामले में पारिवारिक समझौते की कोई स्थिति नहीं है। यह तब संभव होता है जब संबंधित संपत्ति या संपत्तियोँ में समझौते के सभी पक्षकारों का वर्तमान में अधिकार हो। आप की स्थिति में पारिवारिक समझौते को एक तरह का संपत्ति हस्तान्तरण माना जाएगा और उस पर पूरी स्टाम्प ड्यूटी देनी होगी। उस से अच्छा तो ये है कि दूसरे मकान का विक्रय पत्र के स्थान पर उस के दानपत्र की रजिस्ट्री भी आप के नाम साथ के साथ करवा दी जाए। हाँ उस में यह अवश्य लिखा जाए कि जीवन काल में मकान में निवास का अधिकार माता जी को होगा और पूरे जीवनकाल में आप उन की भरण-पोषण और सेवा सुश्रुषा करेंगे।

माताजी एक मकान को जैसे चाहें वैसे एक बेटे को बेच कर दूसरे को उस का विक्रय मूल्य प्राप्त कर दे सकती हैं। लेकिन यदि सभी कह रहे हैं कि दूसरा मकान केवल आप का होगा। तो आप की माता जी उसे आप के नाम वसीयत कर सकती हैं, जिस में शेष दोनों भाइयों के भी हस्ताक्षर करवा लिए जाएँ और वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा दिया जाए। इस से यह होगा कि मकान पर माताजी के जीवनकाल में उन का स्वामित्व बना रहेगा और उन के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत के कारण आप का हो जाएगा। इस व्यवस्था में एक ही परेशानी है कि माता जी चाहें तो अपने जीवनकाल में इस वसीयत को बदल भी सकती हैं।

स की सम्भावना को समाप्त करने के लिए आप चारों सदस्य मिल कर आप के यहाँ एग्रीमेंट के लिए निर्धारित आवश्यक मूल्य के स्टाम्प पेपर पर एक एमओयू (मेमोरेण्डम ऑफ अण्डरस्टेण्डिंग) हस्ताक्षर करें जिस में यह लिखा जाए कि उन के दो मकान हैं जिसे माता जी ने आधी कीमत पर एक पुत्र को विक्रय कर के उस विक्रय से प्राप्त पैसा दूसरे पुत्र को दे दिया है। दूसरा मकान जिस में वे आप के साथ रहती हैं उस की वसीयत लिख दी है जो उन के जीवनकाल के उपरान्त आप का हो जाएगा। इस एमओयू पर साक्षियों के हस्ताक्षर करवा कर नोटेरी के यहाँ पंजीकृत करवाया जा सकता है। इस प्रकार आप को दान-पत्र के लिए आवश्यक स्टाम्प शुल्क नहीं देना होगा।

दान क्या है? क्या दान में प्राप्त संपत्ति को बेचा जा सकता है?

समस्या-

दान क्या है और क्या दान में प्राप्त संपत्ति को बेचा जा सकता है?

-भव्या, उदयपुर, राजस्थान

समाधान-

प को दान के सम्बन्ध में जानना चाहिए कि विधिक रूप से दान क्या है?

दान भी एक तरह का स्वेच्छा से किया गया चल या अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है जिस में संपत्ति हस्तान्तरित करने वाला व्यक्ति संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति से कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं करता है। संपत्ति हस्तान्तरित करने वाला व्यक्ति दाता तथा प्राप्त करने वाला व्यक्ति दानग्रहीता कहा जाता है। दानग्रहीता द्वारा दान को ग्रहण करने की स्वीकृति दाता  के जीवनकाल में दिया जाना आवश्यक है। दानग्रहीता द्वारा स्वीकृति देने के पूर्व दाता की मृत्यु हो जाए तो ऐसा दान निरस्त हो जाता है। दान के आवश्यक तत्व संक्षेप में निम्न प्रकार हैं-

  1. दान को स्वेच्छा से किया गया होना चाहिए तथा कोई प्रतिफल प्राप्त किया गया नहीं होना चाहिए;
  2. दाता केवल वही संपत्ति दान कर सकता है जिस का वह एक मात्र स्वामी है;
  3. दानग्रहीता को दान स्वीकार होना चाहिए, यह स्वीकृति दाता के जीवन काल में ही दी जानी चाहिए। एक अवयस्क भी दानग्रहीता हो सकता है। संरक्ष अपने अवयस्क प्रतिपाल्य की ओर से दान ग्रहण को स्वीकार कर सकता है लेकिन तभी जब कि दान के साथ कोई दायित्व भी न हो।
  4. चल संपत्ति का दान केवल पंजीकृत विलेख के माध्यम से ही हो सकता है।
  5. दान के साथ दान की गई संपत्ति के उपयोग के संबंध में शर्तें हो सकती हैं।

दान की गई संपत्ति को दानग्रहीता द्वारा विक्रय किए जाने पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहां है लेकिन दान के साथ उस के उपयोग के संबंध में कोई शर्त हो सकती है। आप ने आप के द्वारा इंगित संपत्ति के संबंध में यह नहीं बताया कि संपत्ति क्या है? किस ने किस व्यक्ति को दान की है? क्या दान को स्वीकार किया जा चुका है? और क्या दान के साथ कोई शर्त भी है? यदि दान के साथ कोई शर्त नहीं है तो दान में प्राप्त की गई संपत्ति को विक्रय किया जा सकता है। लेकिन दान में प्राप्त संपत्ति को विक्रय करने और क्रय करने के पहले विक्रेता और क्रेता को यह जान लेना चाहिए कि संपत्ति हस्तान्तरण योग्य है अथवा नहीं।

गैर मुस्लिम द्वारा निष्पादित दानपत्र (हिबानामा) (Gift Deed) पंजीकृत न होने पर निष्प्रभावी है

समस्या-

म पांच भाई हैं, मैं चौथी संतान हूँ। हमारे सबसे छोटे भाई ने जब पिता जी उसके संरक्षण में रहे तो उसने 90 वर्षीय पिताजी से खुद के नाम से पूरी जमीन का हिबानामा 4-4-2012 को करा लिया। मैं क्या करूँ? मुझे रास्ता दिखाएँ।

-योगेन्द्र शुक्ला, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

समाधान-

हिबा मुस्लिम विधि का शब्द है, जिस का अर्थ दान (Gift) है। अक्सर हिन्दू विधि से जो लोग शासित होते हैं वे भी विधिक प्रारूपों में उर्दू के शब्दों का प्रचलन होने से उसे हिबा और दान-पत्र को हिबानामा कहते और लिखते हैं। लेकिन मुस्लिम और हिन्दू विधियों में दोनों का असर भिन्न भिन्न है। मुस्लिम विधि में कोई संपत्ति पैतृक नहीं होती। किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त जो संपत्ति या संपत्ति का भाग किसी व्यक्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त होता है वह उस व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति होती है और उसे वह किसी भी रूप में हस्तांतरित कर सकता है। दान भी एक हस्तान्तरण है इस कारण मुस्लिम व्यक्तिगत विधि से शासित होने वाला व्यक्ति अपनी संपूर्ण संपत्ति या उस के किसी भाग को किसी अन्य व्यक्ति या संस्था आदि को हिबा कर सकता है। हिबा मौखिक भी हो सकता है और लिखित भी हो सकता है और हिबा करने पर किसी तरह की स्टाम्प ड्यूटी देय नहीं होती और न ही उसे उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवाने की आवश्यकता है।

स के विपरीत हिन्दू विधि में कोई संपत्ति पैतृक है तो उसे दान नहीं किया जा सकता। यदि कोई गैर मुस्लिम अपनी किसी अचल संपत्ति को दान करता है तो उस के लिए लिखित दस्तावेज दानपत्र (हिबानामा) का निष्पादित किया जाना आवश्यक है और उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराया जाना भी आवश्यक है। इस तरह यदि कोई गैर मुस्लिम उस की किसी अचल संपत्ति को दान (हिबा) करता है तो यह दान मौखिक नहीं हो सकता और न ही अपंजीकृत दस्तावेज से संपन्न कराया जा सकता है। इस तरह किसी भी गैर मुस्लिम द्वारा निष्पादित किया गया दानपत्र (Gift Deed) यदि वह पंजीकृत नहीं है तो विधि के समक्ष उस का कोई मूल्य नहीं है।

प के मामले में आप ने पिताजी द्वारा जमीन को हिबा करना और हिबानामा निष्पादित करना बताया है। यदि यह संपत्ति पैतृक है तो उसे दान किया जाना तब तक संभव नहीं है जब तक कि समस्त भागीदारों के बीच उस का बँटवारा नहीं हो जाता है। यदि यह संपत्ति जिसका हिबानामा लिखाया गया है वह आप के पिताजी की व्यक्तिगत संपत्ति है तो भी दान-पत्र का पंजीकृत होना आवश्यक है। यदि दस्तावेज दान-पत्र पंजीकृत नहीं है तो उस का कोई मूल्य नहीं है।  यदि आप के भाई ने कोई हिबानामा लिखाया है और पंजीकृत नहीं है तो आप को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि हिबानामा पंजीकृत करवा लिया गया है तो उसे इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि पिताजी की जमीन पैतृक है और दान नहीं की जा सकती।

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