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सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों/ स्त्रियों का अधिकार

समस्या-

मोहिनी देवी ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रदादा द्वारा खरीदी गयी कृषि भूमि है जो 1956 के पूर्व खरीदी गयी है, परदादा की मृत्यु 1956 के पूर्व हुई है, मृत्यु पश्चात दादा के नाम हो गयी, दादा की मृत्यु 1956 के बाद हुई है और मेरे पिता की मृत्यु 1993 में हुई है। कृपया मुझे ये बताये की उक्त भूमि में मेरे पिता की मृत्यु पश्चात पुत्रियों का अधिकार उक्त कृषि भूमि में है क्या? इस कृषि भूमि में मेरे पिता द्वारा कोई वसीयत नही बनायीं गयी है?

समाधान-

क्त कृषि भूमि में आप का तथा आपके पिता की अन्य पुत्रियों का अधिकार है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हुआ था। इस अधिनियम की धारा-6 में यह व्यवस्था थी कि जो संपत्ति सहदायिक है उस का उत्तराधिकार सर्वाइवरशिप से अर्थात प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार ही होता रहेगा न कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार।  सहदायिक संपत्ति का अर्थ था जो संपत्ति किसी पुत्र को उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हो वह सहदायिक है और उस में उस  पुरुष सन्तानों और उन की पुरुष सन्तानों को जन्म से अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आपके परदादा की स्वयं की खरीदी हुई कृषि भूमि 1956 के पूर्व उन की मृत्यु के कारण आप के दादा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इस तरह यह संपत्ति सहदायिक हो गयी और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के उपरान्त भी उस में आप के पिता और यदि उन का कोई भाई हुआ तो उस को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता रहा। किन्तु आप को व आप की अन्य बहनों को यह अधिकार जन्मसे प्राप्त नहीं हुआ।

इस तरह की सहदायिक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले किसी पुरुष की मृत्यु होने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति के दाय के उत्तरजीविता (सर्वाइवरशिप) के नियम के अनुसार होता था। किन्तु इसी अधिनियम की धारा-6 में यह प्रावधान था कि ऐसे पुरुष की मृत्यु के समय अधिनियम की अनुसूची प्रथम में वर्णित कोई ऐसी स्त्री उत्तराधिकारी या ऐसी स्त्री के माध्यम से अपना उत्तराधिकार क्लेम करने वाला पुरुष उत्तराधिकारी हुआ तो उस के हिस्से का दाय उस पुरुष की वसीयत के द्वारा और वसीयत न होने पर अधिनियम के अनुसार होगा।

आपके पिता की मृत्यु 1993 में हुई तब आप और आप की बहने मौजूद थीं। इस कारण आप के दादा की छोड़ी हुई संपत्ति में जो हिस्सा आप के पिता को प्राप्त हुआ था वह पुश्तैनी होने पर भी उस का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार हुआ और आप को तथा आप की बहनो को पिता की संपत्ति में उन की मृत्यु के उपरान्त हिस्सा प्राप्त हुआ।जब कि आप के भाई को उसी संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त था। उस को जितना अधिकार जन्म से प्राप्त हो चुका था। इस कारण आपके पिता की छोड़ी हुई अविभाजित संपत्ति में आप को आपके पिता की मृत्यु के दिन से ही उत्तराधिकार के कारण हिस्सा प्राप्त है। यदि आप का कोई भाई जीवित है  तो उसे भी उस संपत्ति में आप के ही समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन आपके भाई की कोई पुत्री 2005 के पहले पैदा हो चुकी है तो उसे 2005 में धारा 6 में किए गए संशोधन के प्रभावी होने की तिथि से आप के भाई के जीवनकाल में ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, और यदि भाई की कोई पुत्री 2005 के संशोधन के प्रभावी होने के बाद जन्मी है तो उसे जन्म से इस सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

अपना उत्तराधिकार स्थापित करने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा।

lawसमस्‍या-

राजीव कोठारी ने गुना, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी का गुना नगरपालिका में लेखापाल के पद परसेवारत रहते हुए करीब डेढ़ साल पहले स्‍वर्गवास हो चुका है। 12-13 सालपहले हमारी मां का स्वर्गवास हो गया था।दो साल पहले नगरपालिकाद्वारा कुछ कर्मचारियों को नगरपालिका की जमीन पर किश्‍तों में भूखंड आवंटितकिये गए थे जिसमें एक भूखंड मेरे पिताजी ने भी क्रय किया था। भूखंड हमारेपिताजी के नाम पर ही है। पिताजी के स्‍वर्गवास होने के बाद हमारी सौतेलीमां ने उस भूखंडके लिए नगरपालिका में नामांतरण के लिए आवेदन दिया किउनके नाम से भूखंड का नामांतरण किया जावे जिस पर हम हम दोनोंभाईयों ने आपत्ति उस पर दर्ज कराई थी और भूखंड का नामांतरण हम दोनों भाइयोंके नाम करने लिए आवेदन भी दिया था लेकिन आज दिनांक तक नामांतरण नहीं कियागया। कई बार नगरपालिका में संपर्क भी किया लेकिन नगरपालिका अधिकारी कहते हैंकि उस का नामांतरण हमारी सौतेली मां के नाम पर ही होगा एवं उनकी अनुकंपानियुक्ति एवं उनके देय स्‍वत्वों के लिए भी हम ने कई आवेदन दिए लेकिन आजदिनांक तक न तो अनुकंपा नियुक्ति दी गई और न ही उनके किसी भी देय स्‍वत्‍वका भुगतान हमें किया गया। जब कि हमारे पिताजी ने अपने जीवनकाल में ही उन केसर्विस रिकार्ड में नोमिनी के रूप में हम दोनो भाइयों को नियुक्‍त किया है।जो कि हम ने नगरपालिका से सूचना के अधिकार के तहत प्राप्‍त किये हैं। सौतेली मां से दो पुत्रियां भी हैं जो कि अभी नाबालिग हैं। अत: नोमीनेशनहमारे नाम होने के बाद भी हमारे पिताजी के देय स्‍वत्‍वों का पूरा पैसानगरपालिका अधिकारी ने हमारी सौतेली मां के खाते में जमा करा दिया है औरहमें कुछ नहीं दिया है। जब कि हमारी मां के पूर्व पति अभी भी जीवित हैं जिनसेहमारी सौतेली मां ने अभी तक विवाह विच्छेद नहीं लिया है। अत: हमें उचित मार्गदर्शनदें कि अब हमें भूखंड नामांतरण के लिए क्‍या करना चाहिए? क्‍यों कि पूरापैसा उनके नाम पर जमा करा दिया गया और भूखंड भी उनके नाम पर करने की बातकरते हैं और अनुकंपा के बारे में कहते हैं कि जब तक हमारी सौतेली मां नहींकहेगी अनुकंपा नियुक्ति भी नहीं दी जावेगी। अत: हम दोनों भाई स्‍नातकोत्‍तरशिक्षा पूर्ण कर चुके हैं और दोनों ही बेरोजगार है ऐसी स्‍थति में अब हमेंक्‍या करना चाहिए?

 

समाधान-

प ने बताया है कि आप की सौतेली मां का पूर्व पति जीवित है जिस से उन का विवाह विच्छेद नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में आप के पिता का आप की सौतेली माँ के साथ विवाह या नाता अवैध है। वे आप के पिता की वैध पत्नी नहीं हैं और उन्हें आप के पिता का किसी प्रकार का कोई उत्तराधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। सौतेली मां से उत्पन्न पुत्रियों के जैविक पिता आप के पिता ही हैं तो उन्हें आप के पिता का उत्तराधिकार प्राप्त होगा और यदि उन के जैविक पिता कोई और हैं तो उन्हें भी आप के पिता का उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होगा।

सी स्थिति में नगर पालिका ने जो पैसा आप की सौतेली मां के खाते में जमा कराया है वह गलत कराया है। आप को चाहिए कि आप नगरपालिका आप की सौतेली माता और उस की नाबालिग पुत्रियों को पक्षकार बनाते हुए एक दीवानी वाद प्रस्तुत करें जिस में आप यह दावा करें कि आप की कथित सौतेली माँ आप के पिता की वैध पत्नी नहीं हैं और उन्हें कोई उत्तराधिकार प्राप्त नहीं हुआ है, तथा उनसे उत्पन्न पुत्रियाँ भी आप के पिता की पुत्रियाँ नहीं हैं। इस कारण उन्हें दिया गया पैसा भूखंड का स्वामित्व तथा अनुकंपा नियुक्ति आप दोनों भाई प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

स वाद को प्रस्तुत करने के पहले कम से कम 60 दिन का नोटिस आप को नगरपालिका को दिलाना पड़ेगा जिस में सभी तथ्यों सहित वादकारण का उल्लेख करना आवश्यक है। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से सहायता प्राप्त करनी होगी। आप किसी अच्छे स्थानीय वकील से संपर्क कर के नोटिस दिलवा कर दीवानी वाद प्रस्तुत कराएँ।

दादा से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति में मृत बुआ के उत्तराधिकारियों का हक है।

lawसमस्या-

हस्तीमल ने नागौर, राजस्थान से पूछा है-

मेरा घर मेरे पिताजी के नाम रजिस्टरित है (मेरी दादी औरमेरी बुआ से तर्कनामे से, एक बुआ का देहान्त हो गया) यह घर मेरेदादाजी को उनके पिताजी से बख्शीश में मिला था। अब मैं ने नगरपरिषद मेग्राण्ट एक्ट के तहत पट्टे के लिए आवेदन किया है तो मेरी स्वर्गवासी बुआ केलड़के ने आपत्ति दर्ज करवाई है। क्या उसका हक बनता है?उसने वकील से मुझे नोटिस भेजा है मुझे क्या करना चाहिए।

 

समाधान-

क्त मकान आप के दादा जी को उन के पिता जी से बख्शीश (गिफ्ट) में प्राप्त हुआ था। इस तरह वह आप के दादा जी की स्वअर्जित संपत्ति हुई। यह संपत्ति दादा जी के देहान्त के उपरान्त उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई। जिस में आप के पिता जी, आप की दादी तथा दो बुआएँ सम्मिलित थीं।

प की दो बुआओँ में से एक का देहान्त हो चुका है जो आप के दादा जी के जीवनकाल में हुआ या फिर दादा जी के देहान्त के बाद हुआ यह आप ने प्रकट नहीं किया है। लेकिन यदि पिता की मृत्यु के समय पुत्री जीवित हो तो वह उत्तराधिकारी होती है, यदि वह जीवित नहीं हो तो उस के पुत्र-पुत्री उत्तराधिकारी हैं। इस तरह हर हाल में आप की मृत बुआ के उत्तराधिकारियों को आप के दादा जी से उत्तराधिकार प्राप्त हुआ है और इस मकान में उन का हिस्सा है।

प की दादी तथा एक बुआ ने आप के पिता के नाम उन के हिस्सों का हक त्याग कर दिया है। इस से उन के हिस्से उन्हें प्राप्त हो गए हैं। लेकिन मृत बुआ का हिस्सा आप के पिता को प्राप्त नहीं हुआ है। इस तरह आप की मृत बुआ के पुत्रों ने उक्त मकान में अपने हिस्से का जो दावा किया है वह सही है। अच्छा हो आप के पिता आप की मृत बुआ के उत्तराधिकारियों आप को फूफा, उन के पुत्रों व पुत्रियों सभी के साथ आपसी बातचीत कर के मकान की कीमत का मूल्यांकन कर के उन का जो भी हिस्सा बनता है उस की कीमत दे कर उन के हिस्से का पंजीयन अपने पिता के नाम करवा लें। यही एक मात्र उपाय आप के लिए श्रेष्ठ है।

प ने यह भी नहीं बताया है कि आप के पिता जीवित हैं या नहीं। यदि जीवित हैं तो ठीक है, अन्यथा उन के हिस्से का भी उत्तराधिकार निश्चित हो चुका होगा और उन के हिस्से की संपत्ति में भी आप के अलावा आप के पिता जी के उत्तराधिकारियों आप की माता जी, व भाई बहनों का हिस्सा पैदा हो चुका होगा। आप जो भी प्रबंधन करें सोच समझ कर करें और इस संबंध में स्थानीय वकील से भी राय कर लें जो आप के दस्तावेज देख कर तथा सारे तथ्य जान कर आप को उचित सलाह दे सके।

सहदायिक संपत्ति और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम-1956 के उपबंध . . .

अजय जी खुद एक वकील हैं. उन्हों ने परंपरागत हिन्दू विधि तथा उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के बाद की उस की स्थिति पर प्रश्न पूछे हैं। हम यहाँ तीसरा खंबा पर ऐसी बहस को महत्वपूर्ण मानते हैं।  उन के प्रश्न और तीसरा खंबा के उत्तर यहाँ प्रस्तुत हैं। लेकिन यदि वर्तमान में इन कानूनों की व्याख्या के संबंध में कोई भिन्न राय रखता हो तो उसे अपने विचार खुल कर यहाँ रखने चाहिए जिस से सही व्याख्या तक पहुँचा जा सके।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

जयपुर, राजस्थान से अजय ने पूछा है –

मैं एक वकील हूँ, मै यह जानना चाहता हूं कि परंपरागत हिन्दू विधि यही है कि यदि किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो वह पैतृक संपत्ति है। इस में पौत्रों व परपौत्रों का भी हिस्सा होता है। लेकिन 1956 में उत्तराधिकार अधिनियम आ जाने के उपरान्त स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। पुत्रियों और पत्नी को भी पिता का उत्तराधिकारी घोषित कर दिए जाने से ऐसी संपत्ति में पोत्रों के अधिकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया। फिर 2005 में उत्तराधिकार अधिनियम में पुनः संशोधन हो जाने पर स्थिति में फिरसे परिवर्तन हुआ।

दादा जी का देहान्त 2001 में हुआ । पिता जी की कोई बहन या बहनें नहीं हैं। दादा जी ने इसे स्वयं अर्जित किया था तो क्या 1. 2005 में उत्तराधिकार अधिनियम में पुनः संशोधन हो जाने पर फिर से क्या परिवर्तन हुआ? 2. क्या दादा जी कि संपत्ति में पोत्रों का भी हिस्सा होता है?

समाधान-

अजय जी,

त्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा-6 (1) का तथा धारा 8 की व्य़ाख्या सर्वोच्च न्यायालय ने 29 सितम्बर 2006 को Sheela Devi And Ors vs Lal Chand And Anr के प्रकरण में दिए गए निर्णय में की है। यह माना है कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 परंपरागत हिन्दू  हिन्दू विधि पर अधिप्रभावी होगा। लेकिन इस अधिनियम की धारा-8 इस अधिनियम के प्रभावी होने के पहले के काल पर प्रभावी होगा। लेकिन धारा-6 केवल सहदायी संपत्तियों के मामले में आकर्षित होगी।

प के मामले में दादा जी के पास जो भी संपत्ति थी वह स्वअर्जित थी। इस कारण धारा 6 (1) प्रभावी नहीं होगी और उन की संपत्ति का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। अकेले पुत्र होने के कारण सारी संपत्ति के पिता स्वामी होंगे। लेकिन अनुसूची की प्रथम श्रेणी में पौत्र संम्मिलित नहीं होने के कारण पौत्र का उस पर कोई अधिकार नहीं होगा। इस तरह पोत्र का पिता को दादा से मिली संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होगा।

2005 के संशोधन से धारा-6 को पूरी तरह परिवर्तित कर दिया गया है। अब सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों को भी पुत्रों के समान अधिकार दिया गया है। लेकिन यह अधिकार केवल सहदायिक संपत्ति में ही है। इस कारण हमें यह देखना होगा कि जिस संपत्ति के संबंध में विचार किया जा रहा है वह 2005 में सहदायिक थी या नहीं। आपके मामले में 2005 में जो संपत्ति पिता के पास थी उस में पौत्र का कोई हिस्सा नहीं था। इस कारण वह सहदायिक संपत्ति नहीं थी और इस संशोधन से उस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।

स तरह हम देखते हैं कि 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने की तिथि 17.06.1956 के पूर्व तक जो संपत्तियाँ सहदायिक थीं। वे ही बाद में भी बनी रह गईं। कोई नई संपत्ति सहदायिक न हो सकी। क्यों कि स्वअर्जित संपत्ति का दाय अधिनियम के अनुसार होने लगा जिस में पौत्रों और प्रपोत्रों का कोई हिस्सा नहीं था। जिस के हिस्से में जो संपत्ति आई वह भी उस की व्यक्तिगत संपत्ति ही रह गई। इस तरह किसी भी मामले में हमें यह देखना होगा कि प्रश्नगत संपत्ति क्या दिनांक 17.06.1956 के पूर्व सहदायिक थी या नहीं। यदि कोई संपत्ति उक्त तिथि के पूर्व सहदायिक नहीं थी तो तो उक्त तिथि के बाद वह सहदायिक संपत्ति में परिवर्तित नहीं हो सकती थी।

पिता को दादा से उत्तराधिकार में मिली संपत्ति पर पुत्र का कोई अधिकार नहीं।

समस्या-

इन्दौर, मध्य प्रदेश से अजय ने पूछा है –

क्या पिता अपने पुत्र को दादा की (अविभाजित) संपत्ति के अधिकार से वंचित कर सकता है?  दादा जी ने इसे स्वयं अर्जित किया था।  दादा जी का देहान्त सन् 2000 में हुआ है।  पिता ने दादा की (अविभाजित) संपत्ति बेच कर कंपनी से  तीन नौकरी ली है।  हम 3 भाई और 1 बहन हैं, बड़ा भाई विवाहित है, पिता ने 2 नौकरी बड़े भाई (विवाहित) को दे दी, 1 नौकरी मुझसे छोटे भाई को दे दी। मुझे और सबसे छोटे भाई और एक बहन को नौकरी से वंचित कर दिया है।  क्या मेरा कोई हक नही बनता है?

समाधान-

दिनांक 17 जून 1956 को भारत में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हो गया था। इसे प्रभावी हुए अब 57 वर्ष व्यतीत होने जा रहे हैं। इस अधिनियम के पूर्व हिन्दू विधि में यह नियम था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी स्वअर्जित संपत्ति को वसीयत नहीं करता था तो वह उत्तराधिकार में उस के पुरुष वंशजों को प्राप्त हो जाती थी। ऐसी संपत्ति में उस के चार पीढ़ी तक के उत्तराधिकारियों को अधिकार प्राप्त होता था और बिना विभाजन के उसे कोई विक्रय नहीं कर सकता था। लेकिन इस अधिनियम के आने के बाद यह नियम परिवर्तित हो गया।

ब किसी भी व्यक्ति की स्वअर्जित संपत्ति उस के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों अर्थात पत्नी/पति, व पुत्र-पुत्रियों को प्राप्त होने लगी। उस संपत्ति में उत्तराधिकारियों का हिस्सा होने लगा। लेकिन उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकारियों का अधिकार जो पहले ऐसी संपत्ति में होता था समाप्त हो गया।

प के दादा जी का देहान्त सन् 2000 में हुआ। वसीयत न होने की स्थिति में वह संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो गई। आप के पिता को जो संपत्ति अपने दादा जी से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई उस में आप के पिता जी के उत्तराधिकारियों का कोई अधिकार नहीं है। आप के पिता उस संपत्ति को विक्रय कर सकते हैं। आप के पिता ने उस संपत्ति को बेच कर उस की कीमत और विक्रेता से अपने परिवार के कुछ सदस्यों के लिए रोजगार प्राप्त कर लिया। इस में कानून की दृष्टि में कुछ भी उचित नहीं हुआ। क्यों कि उस संपत्ति पर आप के पिता के उत्तराधिकारियो का कोई अधिकार नहीं था। आप को उक्त संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था। इस कारण आप को पिता द्वारा उक्त संपत्ति को बेच कर अपने और अपने परिवार के कुछ सद्स्यों को लाभ पहुँचाने के निर्णय में दखल देने का कोई अधिकार नहीं था और आप अब भी उस अधिकार को कोई चुनौती नहीं दे सकते।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने के उपरान्त पुरुष मृतक से प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी नहीं है उसे वसीयत किया जा सकता है

समस्या-

बरेली उत्तरप्रदेश से पी.के. सक्सैना पूछते हैं-

क्या हिन्दू कानून में उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति होती है? उस में पत्नी और संतानों आदि के अधिकार भी सम्मिलित होते हैं?   क्या कोई उत्तराधिकार से प्राप्त सम्पति को वसीयत कर सकता है?  यदि किसी ने वसीयत कर दी हो तो क्या करे?

समाधान-

उत्तराधिकार अधिनियम 1956 दिनांक 17.06.1956 से प्रभावी हुआ है। इस कानून के प्रभावी होने के पूर्व तक स्थिति यह थी कि हिन्दू उत्तराधिकारी को उस के पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति होती थी तथा उस में उत्तराधिकारी के पुत्र पौत्र आदि का अधिकार भी होता था। लेकिन उक्त कानून के प्रभावी होने के साथ ही इस व्यवस्था का अंत हो गया। किसी भी मृतक की संपत्ति यदि उस ने उस के संबंध में कोई वसीयत नहीं की हो तो वह संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ किसी पुरुष मृतक की संपत्ति उस की माता, पत्नी, पुत्रों व पुत्रियों को समान भाग में उत्तराधिकार में प्राप्त होती है। उत्तराधिकारी को प्राप्त संपत्ति उस की अपनी संपत्ति होती है जिसे वह वसीयत कर सकता है।

सी संपत्ति या किसी भी संपत्ति को वसीयत करने के उपरान्त यदि व्यक्ति चाहे तो अपने जीवनकाल में अपनी वसीयत बदल सकता है।  एक ही संपत्ति के संबंध में किसी भी व्यक्ति की एक से अधिक वसीयतें होने पर उस की अंतिम वसीयत प्रभावी होती है। वसीयतकर्ता की मृत्यु के साथ ही उस की संपत्ति पर वसीयती का अधिकार होता है, उत्तराधिकारी का नहीं।

पिता को नई परिस्थितियाँ समझा कर बीच की राह निकालने का प्रयत्न करें

समस्या-

मै शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हूँ। मुझे मासिक ९००० वेतन मिलता है।  मैं अपने घर से बहूत दूर था तब तक तो ठीक था। माह में खर्च के लिए रूपये भी देता था। मैं ने अपने ही खर्च पर बहन की और अपनी शादी किया।  घर भी बनाया जिस में उन्होंने एक रुपया तक का मुझे सहयोग नहीं दिया।  मेरे पिता जी के पास कृषि भूमि भी है, मेरे नाम पर भी कृषि भूमि है। परन्तु सभी की देख रेख वे ही करते हैं। मुझे उसका कुछ भी नहीं देते जब मै अपना स्थानांतरण करवा कर घर आया तो मुझे घर में रहने नहीं दिया।  आज मैं घर से बाहक दूसरी जगह पर किराये के मकान में रहता हूँ।   मैं शारीरिक रूप से एक पैर से विकलांग भी हूँ।  मेरी समस्या है कि  मेरे पिता मुझ से मेरे वेतन का आधा हिस्सा मांगते हैं। यह कहाँ तक सही है? मेरा कहना है कि मैं आधा क्या पूरा दूंगा, परन्तु मुझे घर में रहने दो या चावल दो,  मै खर्चा देने के लिए तैयार हूँ। अभी घर में माता पिता एवं एक अविवाहित भाई है।  कृषि भूमि उनके लिए काफी है।  यदि मुझे आधा वेतन देना होगा तो मेरा परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो जायेगा। मैं विकलांग होने कारण कोई अन्य काम करने में असमर्थ हूँ। |कृपया उचित सलाह दीजिये। ताकि मेरी मानसिक परेशानी दूर हो सके।

समाधान-

मारे यहाँ हिन्दू परिवारों में पुराने जमाने में संयुक्त परिवार और संयुक्त परिवार की संपत्ति का सिद्धान्त रहा है जो हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के आने के बाद समाप्तप्रायः हो चला है। आप के पिता की समझ है कि आप का परिवार एक संयुक्त परिवार है। उस के सभी सदस्यों और संपत्ति से हुई आय परिवार की संपत्ति है और जब तक वे परिवार के मुखिया हैं उस का प्रबंध करने का अधिकार उन का है। उन के सामने संभवतः अभी दायित्व हैं। आप के छोटे भाई का विवाह करना है, हो सकता है और भी दायित्व हों। वे इसी के लिए बचा कर कुछ धन संग्रह कर लेना चाहते हैं। जमीन और अन्य साधनों से आय इतनी पर्याप्त नहीं है कि वे धन संग्रह कर सकें। यही कारण है कि वे आप को परिवार के साथ नहीं रखना चाहते। परिवार में रहते ही आप के परिवार का खर्च और बढ़ जाएगा। वे उसी के लिए आप का आधा वेतन चाहते हैं। यही कारण है कि वे आप की जमीन को भी अभी अपने कब्जे में रखना चाहते हैं।

लेकिन कानूनी स्थितियाँ बदल चुकी हैं।  कानून परिवार को संयुक्त नहीं मानता। आप भी समझते हैं कि आप जितनी मदद परिवार की कर सकते हैं कर चुके हैं। आगे आप की भी जीवन है, आप का भी दायित्व है। उस के लिए आप कुछ बचा कर रखना चाहते हैं। आप का जीवन स्तर परिवार से कुछ सुधरा हुआ है आप उसे खोना नहीं चाहते। इस कारण आप चाहते हैं कि आप को अपनी जमीन की उपज मिले। हालाँकि आप जमीन पर खेती करने में असमर्थ हैं।

प के पिता और आप दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों ने आप दोनों के बीच एक द्वन्द उत्पन्न कर दिया है। आप दोनों को ही अपने अपने स्थान से कुछ हटना पड़ेगा और बीच में आ कर समझौता करना पडेगा। आप को पिता से कहना पड़ेगा कि आप की जमीन में जो खेती की जा रही है उस का मुनाफा प्राप्त करना आप का हक है। वह उन्हें आप को दे देना चाहिए। उस के अतिरिक्त आप परिवार की जो संयुक्त संपत्ति है उस में से कोई हिस्सा अभी नहीं चाहते हैं। यदि आप उन के साथ मकान में आ कर रहेंगे तो उस से आप के पास कुछ बचत होगी और आप उन की मदद भी कर पाएंगे। यदि पिता के कथनानुसार चले तो फिर न बचत होगी और न आप उन की मदद कर पाएंगे।

प अपने पिता को ठीक से समझाएँ। यदि हो सके तो कुछ अन्य लोग जिन पर आप के पिता विश्वास कर सकते हैं उन की मदद ले कर अपने पिता को नई परिस्थितियों को समझाने की कोशिश करेंगे तो यह मामला घर में बातचीत और आपसी समझ से हल हो सकता है। अन्यथा कोर्ट कचहरी में तो समय भी लगता है और दोनों पिता-पुत्र का पैसा बरबाद होगा। यदि यही पैसा बचेगा तो परिवार के काम आएगा। मुझे लगता है कि आप के पिता इतनी समझ तो रखते ही होंगे कि आप के द्वारा समझाई बात को समझ सकेंगे, शायद वे भी कोर्ट कचहरी पसंद नहीं करें और इस नौबत को टालने का प्रयत्न करें। यदि फिर भी नहीं समझ पाते हैं तो आप के पास अपने अधिकारों के लिए न्यायालय में गुहार लगाने के सिवा कोई चारा नहीं रहेगा।

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