Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

लिव इन रिलेशन न्यायपालिका की कम समय में वैवाहिक विवादों का निपटारा करने की अक्षमता से उपजा है।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

लिव इन रिलेशन में कोई कानूनी दायित्व या अधिकार नहीं।

rp_judicial-sep8.jpgसमस्या-

राकेश अग्रवाल ने गंगानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी छोटी बहन की शादी समाज मे होने के बाद जीजाजी के सेठ जी (स्वंय भी विवाहित) ने बहन को फँसाकर जीजाजी से रिश्ता मौखिक तोडाकर ता उम्र साथ निभाने का वादा करते हुए उस के दोनों लड़को व एक लड़की सहित अपना कर (वर्ष २००० से) अलग रखकर दोनो पत्नियों से संबध बनाये हुए हैं। सिर्फ भरण पोषण योग्य राशि भी देते हैं, रहने का मकान सेठजी के नाम पर है। उम्र के साथ अय्याशी बढ़ने के साथ बहन से मोह भंग हो रहा है, शहर का प्रतिष्ठित और प्रमुख व्यापारी होने के बाद भी मेरे भान्जो को कहीं व्यापार में सेट नहीं कर रहा है ना ही पिता जैसा प्यार देता है। लिव इन रिलेशनशिप के चलते अब मेरी बहन व उसके बच्चो का भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है। बहन के नाम पर कुछ नहीं किया ना उस ने कुछ करवाया। बहन से जीवन में बडी भारी गलती तो हो गयी पर अब अपने व बच्चो के भविष्य के लिये क्या करना चाहिये? अगर उसका कोई कानूनी अधिकार बनता है तो उसके लिये क्या करना होगा

समाधान-

क हिन्दू विवाह में पत्नी को भरण पोषण का और मृत्यु के उपरान्त पति की संपत्ति में उत्तराधिकार के सिवा और कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता। यदि पति अपनी सारी संपत्ति को वसीयत कर दे तो पत्नी उत्तराधिकार से भी वंचित हो जाती है। तब लिव इन रिलेशन में किसी अधिकार की मांग कैसे की जा सकती है। लिव इन रिलेशन बिना किसी दायित्व और अधिकार के एक दूसरे के साथ रहने का समझौता है। इस में किसी तरह का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता। दोनों पक्ष अपने लिए स्वयं जिम्मेदार होते हैं। एक लंबे समय तक साथ रहने और पत्नी के जैसा व्यवहार करने के कारण स्त्री को अपने साथी से भरण पोषण कराने का अधिकार है, इस से अधिक कुछ भी नहीं।

हाँ तक आप की बहिन के बच्चों का प्रश्न है, वे बालिग हो चुके होंगे या हो जाएंगे। सेठ जी आप की बहिन और बच्चों का भरण पोषण कर ही रहे हैं। बालिग हो जाने के बाद तो हिन्दू माता पिता पर भी अपने बच्चों के भरण पोषण करने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है। फिर लिव इन रिलेशन में रहने पर स्त्री के पति से उत्पन्न बच्चों का दायित्व लिव इन रिलेशन वाले पति पर नहीं डाला जा सकता।

लिव इन रिलेशन का अर्थ ही यह है कि स्त्री और पुरुष सब कानूनी दायित्वों से अलग हैं और केवल अपनी इच्छा से साथ रह रहे हैं। इस में किसी तरह का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता। यदि इस में किसी प्रकार का कोई अधिकार उत्पन्न होगा तो यह भी विवाह का ही एक प्रकार हो जाएगा लिव इन रिलेशन नहीं रहेगा।

मौसी की पु्त्री से सपिण्ड संबंध है और यह विवाह हिन्दू विधि में अकृत है।

rp_sex.jpgसमस्या-

सोनू सिंह ने हाजीपुर बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं ने अपनी मौसी की पुत्री से 01-12-14 को विवाह कर लिया। लेकिन मेरी माँ और मेरी पत्नी के पापा ने सीजेएम कोर्ट में धारा 5 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन दिया। हम ने मुकदमा लड़ा भी है, लेकिन अदालत ने हमारी शादी को तोड़ दिया है। अब मैं क्या करूँ कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प का मौसी की पुत्री से संबंध सपिण्ड है और यह विवाह प्रतिबंधित रिश्तेदारी में होने के कारण हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत अवैध था। इस कारण न्यायालय ने उसे अवैध घोषित कर दिया है। अब आप दोनों विवाहित नहीं माने जाएंगे। लेकिन यदि आप दोनों पति पत्नी एक साथ रह रहे हैं तो कानूनन साथ रहने में किसी तरह की कोई बाधा नहीं है। क्यों कि यह अपराध नहीं है। इस से यही अन्तर पड़ेगा कि आप दोनों को पति पत्नी नहीं माना जाएगा। आप की होने वाली संतान को तो आप दोनों की ही संतान माना जाएगा लेकिन उसे पुश्तैनी संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो सकेगा।

प दोनों का साथ रहना अब लिव-इन-रिलेशन माना जाएगा। लंबे समय तक साथ रहने और समाज में पति पत्नी की तरह व्यवहार करने के कारण। सभी मामलों में आप दोनों को पति पत्नी माना जाएगा सिवाय इस के कि आप दोनो हिन्दू विवाह रीति से विवाहित नहीं हैं। हमारे ज्ञान में इस तरह का विवाह इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में मान्य नहीं है। लेकिन यदि आप आपस में पति पत्नी कहलाने के लिए इस्लाम धर्म भी ग्रहण करेंगे तो इस धर्म परिवर्तन को वैध नहीं कहा जा सकता क्यों कि यह केवल पति पत्नी के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए होगा। आप दोनों का हिन्दू विवाह पहले ही अवैध घोषित हो चुका है। इस कारण भी यह धर्म परिवर्तन आप दोनों के इस रिश्ते को कोई वैधानिकता प्रदान नहीं करेगा।

विवाह नहीं, तो तलाक कैसा

मैं एक हिन्दू परिवार से हूँ और लगभग साढ़े आठ साल पहले मुझे एक मुस्लिम लड़की से प्रेम हो गया। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनी की मुझे उस के साथ रहना आरंभ करना पड़ा। हमारी कभी कोई शादी नहीं हुई। न आर्यसमाज में, न कोर्ट में और न ही कोई निकाह हुआ। लेकिन साथ रहने के कारण उस का नाम मेरे राशनकार्ड, वोटर लिस्ट, बच्चे के स्कूल में मेरी पत्नी के रूप में लिखा है। मैंने कभी इस का विरोध नहीं किया क्यों कि सभी तरीके से हम पति पत्नी की तरह ही रहते थे।

स का बर्ताव मेरे प्रति बहुत ही बुरा और निन्दनीय हो चला है। वह अपने साथ हुई सभी खराब बातों के लिए मुझे जिम्मेदार बताती है। लगभग हर रोज हमारे बीच झगड़ा होता है। वह पुलिस थाने तक चली जाती है। उस का व्यवहार बहुत हिंसक है। उस की मेरे परिवार से ही नही पास पड़ौस वालों से भी नहीं बनती। दो बार उस का झगड़ा आस-पास वालों से हो चुका है। जिस के कारण मुजे थाने में जा कर समझौता करना पड़ा। उस ने एक बार मेरे खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की जो आपसी समझौते से समाप्त हुई।

मैं उस के इस बर्ताव से परेशान हो कर पिछले चार माह से ब्वाय्ज होस्टल में रह रहा हूँ। मैं उस से तलाक लेना चाहता हूँ लेकिन वह मुझे 498-ए की धमकी देती है और उस की पहुँच राजनैतिक दलों तक भी है जिस के कारण मुझे अपने भविष्य के प्रति डर लगा रहता है।

मैं अपनी एक मित्र से विवाह करना चाहता हूँ लेकिन वकील साहब ने कहा है कि बिना तलाक के आप विवाह नहीं कर सकते। मैं ने हिम्मत कर के उन के व्यवहार को और घऱेलू हिंसा, मानसिक व शारीरिक संताप को आधार बना कर तलाक के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया लेकिन मुझे सही निर्देश नहीं मिल पा रहा है। मेरी एक साढ़े आठ वर्ष की बेटी भी है जिस का भविष्य मुझे उस के साथ अंधकारमय लगता है। कृपया सलाह दें मुझे क्या करना चाहिए?

-अनुतोष मजूमदार, भिलाई छत्तीसगढ़

सलाह-

प ने सब से बड़ी गलती तो यह की है कि आप ने तलाक की अर्जी दाखिल कर दी है। यदि इस अर्जी का नोटिस जारी न हुआ हो तो उसे तुरंत वापस ले लें, अर्थात उसे एज विद्ड्रॉन निरस्त करवा लें। तलाक की अर्जी में सब से पहले यह लिखना पड़ता है कि दोनों पक्षकारों पर कौन सी व्यक्तिगत विधि लागू होती है तथा विवाह कब और किस विधि से संपन्न हुआ है। आप ने भी तलाक की अर्जी में यह सब लिखा होगा। आप उसे किसी भी प्रकार से साबित नहीं कर सकते। आप हिन्दू हैं और आप की साथी मुस्लिम इस कारण हिन्दू या मुस्लिम विधि से कोई भी विवाह आप दोनों के बीच तब तक संपन्न नहीं हो सकता है जब तक कि आप दोनों में से कोई एक अपना धर्म परिवर्तन न कर ले। यदि आप हिन्दू धर्म त्याग कर मुस्लिम हो जाते तो आप के बीच मुस्लिम विधि से निकाह संपन्न हो सकता था। यदि आप की साथी हिन्दू हो जाती तो हिन्दू विधि से विवाह हो सकता था। आप के बीच विवाह की एक ही रीति से हो सकता था वह विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह अधिकारी के समक्षन पंजीकरण करवा कर वह हुआ नहीं है। इस कारण से आप दोनों के बीच कोई विवाह संपन्न नहीं हुआ है। जब विवाह ही संपन्न नहीं हुआ है तो फिर तलाक या विवाह विच्छेद के लिए कोई मुकदमा चल ही नहीं सकता। केवल आप के द्वारा प्रस्तुत याचिका के उत्तर में आप की साथी आप के इस अभिवचन को स्वीकार कर ले कि विवाह आप के द्वारा बताई गई विधि से संपन्न हुआ है तो न्यायालय यह मान लेगा कि विवाह हुआ है। न्यायालय के मान लेने से आप की मुसीबतें कई गुना बढ़ जाएंगी।

चूंकि आप का विवाह संपन्न नहीं हुआ है इस कारण से आप अपनी नई मित्र से विवाह कर सकते हैं उस में कोई बाधा नहीं है। आप ऐसा तुरंत कर सकते हैं। आप इस के लिए आर्य समाज की पद्धति या परंपरागत हिन्दू विवाह की विधि अपना सकते है या फिर विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह कर सकते हैं।

प का आप के साथी के साथ विवाह संपन्न नहीं हुआ है इस कारण से आप की साथी आप के विरुद्ध धारा 498-ए भा.दं.संहिता का मुकदमा नहीं कर सकती।  यदि वह करती है तो उसे इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि आप के बीच कोई वैवाहिक संबंध नहीं रहा है। लेकिन आप की साथी घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत राहत प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकती है और राहत भी प्राप्त कर सकती है। लेकिन वह भी उस के लिए इतना आसान नहीं होगा।

स सब के बाद आप के लिए केवल एक समस्या रह जाएगी कि आप की बेटी उस की माता के साथ रह रही है। आप को उस की कस्टडी प्राप्त करने में बहुत बाधाएँ आएंगी। आम तौर पर पुत्री की कस्टडी पिता को नहीं मिलती है। 18 वर्ष की उम्र की होने पर वह इच्छानुसार किसी के भी पास रह सकती है। लेकिन उस के पूर्व माता की कस्टडी से पिता को पुत्री तभी मिल सकती है जब कि पिता अदालत के समक्ष ठोस सबूतों के आधार पर यह साबित कर दे कि उस का भविष्य माता के पास असुरक्षित है और पिता के पास वह सुरक्षित रह सकती है और उस का लालन पालन पिता अच्छे से कर सकता है। यह साबित करना आप के लिए लोहे के चने चबाना सिद्ध हो सकता है।

विवाह की प्रकृति का संबंध क्या है? लिव-इन-रिलेशन से वह कैसे भिन्न है?

खबारों में उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय की बहुत चर्चा है जिस में लिव-इन-रिलेशन में गुजारा भत्ता दिए जाने के मानदंड तय करने का उल्लेख है। यह एक महत्वपूर्ण निर्णय है। विवाह की संस्था को कानूनी मान्यता प्राप्त है। लेकिन विवाहेतर संबंध को कानून ने अभी तक मान्यता नहीं दी है। कहा यह जा रहा है कि लिव-इन-रिलेशन पश्चिम से आया है जिस का रूप महानगरों में दिखाई देने लगा है। लेकिन भारतीय समाज में भी विवाहेतर संबंध सदियों से मौजूद रहे हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम-1955 के अस्तित्व में आने के पहले हिन्दू एकाधिक विवाह कर सकते थे और सभी विवाहित पत्नियों को समान अधिकार प्राप्त होते थे। उक्त कानून के अस्तित्व में आने के बाद भी लोगों का एकाधिक विवाह करने पर पूरी तरह से रोक नहीं लग सकी है। लेकिन स्थिति यह है कि अब एक विवाह के बाद यदि जीवन साथी जीवित है और उस से कानूनी रूप से विवाह विच्छेद नहीं हुआ है तो दूसरी स्त्री के साथ विवाह को अवैध माना जा रहा है और दूसरी स्त्री को कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हैं। हमारे समाज की संरचना ऐसी है कि फिर भी इस तरह के संबंध अस्तित्व में आ रहे हैं। पति-पत्नी में झगड़ा हो चुका है, सुलझाने के अनेक प्रयासों के उपरांत भी सुलह संभव नहीं हो सकी। अदालत में मुकदमे चल रहे हैं। पत्नी विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त होने की प्रतीक्षा कर रही है। पति को भी जानकारी है कि अब पत्नी से उस की सुलह नहीं हो सकती। उसे दूसरी गृहस्थी बसानी ही है। लेकिन अदालत से निर्णय नहीं हो रहा है। पति दूसरी पत्नी की तलाश में लग गया है। उसी जाति समाज में उसे लड़की मिल जाती है, लड़की के माता-पिता इस विश्वास पर कि पहली पत्नी से तलाक होते ही उन की लड़की को पत्नी के कानूनी अधिकार मिल जाएँगे, विवाह के लिए तैयार हो जाते हैं। गुपचुप तरीके से विवाह हो जाता है दोनों साथ रहने लगते हैं, यहाँ तक कि संताने हो जाती हैं। पत्नी से तलाक हो जाने के बाद पति अपने दूसरे विवाह को कानूनी रूप दे सकता है। लेकिन यदि पहली पत्नी से असंभव प्रतीत होने वाली सुलह हो जाए, या फिर किन्हीं कारणों से दूसरी पत्नी के साथ विवाद उत्पन्न हो जाए तो यह दूसरी पत्नी क्या करे? उस के क्या कानूनी अधिकार होने चाहिए? यह सभी प्रश्न ऐसे हैं जिन का हल विधायिका को तलाश करना है। लेकिन जब तक कोई कानून अस्तित्व में आए तब तक इन परिस्थितियों का हल अदालतों को खोजना पड़ेगा।
विधायिका ने ऐसी ही परिस्थितियो के लिए 2005 में स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा कानून बनाते समय कुछ प्रावधान बनाने का प्रयत्न किया। इस कानून के अंतर्गत वे स्त्रियाँ राहत प्राप्त करने की अधिकारी हैं जिन के साथ पुरुष का कोई घरेलू संबंध है या रहा है। इस घरेलू संबंध पद में विवाह की प्रकृति का संबंध भी सम्मिलित किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने इस चर्चित निर्णय में विवाह की प्रकृति के संबंध को ही परिभाषित करने का प्रयत्न किया है। यहाँ हम चर्चित मामले के तथ्यों के साथ न्यायालय की विवेचना को संक्षेप में समझने का प्रयत्न करेंगे। 
त्चीअम्मा ने वर्ष 2001 में परिवार न्यायालय के समक्ष धारा 125 दं.प्र.सं. के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया कि उस का विवाह वैलूसामी के साथ दिनांक14 सितंबर 1986 को संपन्न हुआ था। उस के बाद वैलुसाम
ी उस के पिता के घर उस के साथ दो-तीन वर्ष तक साथ रहा, फिर उस ने घर छोड़ दिया और अपने जन्मस्थान पर रहने लगा। लेकिन वह कभी-कभी आ कर उस के पिता के घर उस से मिल कर जाता था। इस तरह वैलूसामी ने उसे त्याग दिया। उस के पास आजीविका का कोई साधन नहीं है, जब कि वैलूसामी द्वितीय श्रेणी अध्यापक है, उसे वैलूसामी से गुजारा भत्ता दिलाया जाए। परिवार न्यायालय से उस ने प्रार्थना की कि उसे वैलूसामी से 500 रुपए प्रतिमाह गुजारा-भत्ता दिलाया जाए।
वैलूसामी का कहना था कि उस का विवाह तो 25.08.1980 को लक्ष्मी के साथ हो चुका ता जिस से उसे एक पुत्र भी है जो ऊटी में इंजिनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा है। उस ने अपने शपथ पत्र के साथ राशनकार्ड, मतदाता परिचयपत्र, उस के पुत्र का स्थानांतरण प्रमाण पत्र, पत्नी लक्ष्मी का अस्पताल से डिस्चार्ज होने का टिकट तथा विवाह के चित्र प्रस्तुत किए। परिवार न्यायालय ने साक्ष्य के उपरांत माना कि वैलूसामी का विवाह पत्चीअम्मा के साथ हुआ था न कि लक्ष्मी के साथ। उच्च न्यायालय ने भी निष्कर्ष को यथावत रखा। वैलूसामी ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की।
च्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में सब से पहले तो यह कहा कि परिवार न्यायालय ने अपने निर्णय में लक्ष्मी के वैलूसामी के साथ विवाह को अकृत करार दिया है। इस तरह एक ऐसी महिला के विवाह के संबंध में घोषणा की गई है जिसे मामले में पक्षकार ही नहीं बनाया गया था। इस तरह की गई घोषणा का कोई विधिक मूल्य नहीं है। यदि यह घोषणा नहीं की जाती तो पत्चीअम्मा के साथ हुआ उस का विवाह वैध नहीं ठहराया जा सकता था। क्यों कि फिर वैलूसामी हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार लक्ष्मी के साथ हुए विवाह के समाप्त हुए बिना दूसरा विवाह नहीं कर सकता था। यदि उस ने किया भी तो वह एक वैध विवाह नहीं है। निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने अपनी ही तीन न्यायाधीशों की बैंच द्वारा विमला बनाम वीरूस्वामी के प्रकरण में दिए गए निर्णय का उदाहरण देते हुए कहा कि इस निर्णय के द्वारा धारा 125 के अंतर्गत एक अवैध विवाह की पत्नी को गुजारा भत्ता प्राप्त करने की अधिकारी नहीं माना है। सविताबेन सोमाबाई भाटिया बनाम गुजरात सरकार के मुकदमे में दिए गए निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि किसी विवाहित पुरुष के साथ अवैध विवाह होने पर स्त्री दुर्भाग्यशाली हो सकती है लेकिन अदालत उसे कोई राहत प्रदान नहीं कर सकती। इस तरह के मामलों में गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार केवल विधायिका द्वारा निर्मित कानून से ही मिल सकता है।
च्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मामले में लक्ष्मी के साथ हुए वैलूसामी के विवाह को अवैध या अकृत घोषित कराए बिना पत्चीअम्मा वैलूसामी की वैध पत्नी होने का दावा नहीं कर सकती और वैध विवाह के बिना कोई भी स्त्री धारा 125 दं.प्र.संहिता के अतंर्गत पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने की अधिकारी नहीं हो सकती। उच्चतम  न्यायालय ने स्त्रियों के विरद्ध घरेलू हिंसा अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत भी विचार किया। जिस में घरेलू संबंध पद में विवाह की प्रकृति का संबंध भी सम्मिलित किया गया है। कानून में इस संबंध को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है इस कारण से उच्चतम न्यायालय ने महसूस किया कि इस संबंध में एक अधिकारिक निर्णय की आवश्यकता है। इस संबंध को लिव-इन-रिलेशन मानते हुए उच्चतम न्यायालय ने भारत के नगरों में इस तरह
के बन रहे संबंधों और पाश्चात्य देशों में इस तरह के संबंधों और पाश्चात्य देशों के न्यायालयों द्वारा प्रदान किए गए निर्णयों पर भी विचार किया। उच्चतम न्यायालय ने रेखांकित किया कि जैसे एक विवाहिता द्वारा मांग किए जाने वाले गुजारा भत्ता को एलीमनी कहा जाता है उसी तरह पाश्चात्य देशों में लिव-इन-रिलेशन के आधार पर मांगे जाने वाले गुजारा भत्ता को पैलीमनी कहा जा रहा है।  लेकिन इस मा्मले में यह विचार नहीं किया जा सकता कि पत्चीअम्मा को किसी लिखित, या  मौखिक या व्यवहार जनित संविदा के आधार पर पैलीमनी दिलाई जा सकती है या नहीं, क्यों कि यहाँ ऐसा दावा ही नहीं किया गया है।
च्चतम न्यायालय ने घरेलू हिंसा कानून में वर्णित पद “विवाह की प्रकृति के सम्बन्ध” को परिभाषित करते हुए कहा है कि औपचारिक विवाह के बिना बने संबंधों में यदि….
क-युगल का समाज के समक्ष व्यवहार ऐसा है जैसा कि विवाहित युगल का होता है;
ख- उन्हों ने विवाह के योग्य न्यूनतम आयु अर्जित कर ली हो;
ग- अन्यथा भी वे विवाह के योग्य हों, जैसे दोनों का अविवाहित होना; तथा
घ- दोनों दुनिया के समक्ष एक उचित समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों।
तो ऐसे संबंध को “विवाह की प्रकृति का सम्बन्ध” माना जा सकता है।
इस तरह सभी लिव-इन-रिलेशनशिप को “विवाह की प्रकृति का सम्बन्ध” माना जा सकता है यदि वे उक्त शर्तों को पूरा करते हों।

लिव-इन-रिलेशन के अपराध होने, न होने पर एक निरर्थक बहस

मंगलवार को मीडिया में जब यह खबर आई कि “सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पूर्ण पीठ ने यह कहा है कि वयस्क स्त्री-पुरुष यदि साथ रहते हैं और यौन संबंध स्थापित करते हैं तो यह अपराध नहीं है,” तो इस पर देश भर में एक तूफान उठ खड़ा हुआ है। इस निर्णय की निंदा की जा रही है। इस मामले में राधा-कृष्ण का उल्लेख किए जाने पर भी लोगों को घोर आपत्ति है। राजस्थान के समाचार पत्र ‘राजस्थान पत्रिका’ ने तो इस पर एक सर्वेक्षण भी कल के संस्करण प्रस्तुत किया है। इंदौर उच्च न्यायालय में तो कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध एक रिट याचिका भी प्रस्तुत की गई है। यह भी कहा जा रहा है कि इस मामले में ‘राधा-कृष्ण’ के उल्लेख पर तो सु्प्रीम कोर्ट को क्षमा मांगते हुए अपने कथन को वापस ले लेना चाहिए।
मेरे पास शाम को एक सज्जन का फोन आया। ये सज्जन अक्सर लोगों को गीता की प्रतियाँ भेंट करते हैं। वे कहने लगे कि यह तो जगत विख्यात है कि कृष्ण 12 वर्ष की आयु में गोकुल से मथुरा चले गए थे और फिर वापस लौट कर नहीं आए। यदि उन का राधा के साथ प्रेम था भी तो वह बाल्यावस्था का प्रेम था और उसे तो किशोर प्रेम भी नहीं कहा जा सकता। फिर कहीं भी किसी भी पौराणिक आख्यान में यह नहीं है कि राधा कृष्ण साथ रहे हों। वे अपने-अपने घरों पर रहते थे। यह अवश्य है कि वे आपस में मिलते थे। ये सज्जन कहने लगे कि मैं मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखना चाहता हूँ कि आप को तो कृष्ण के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है और गीता भेंट करना चाहता हूँ। मैं ने उन्हें कहा कि आप की बात सच हो सकती है लेकिन राधा-कृष्ण के जितने चित्र गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित ग्रंथों और चित्रावलियों में प्रकाशित हुए हैं उन में से 80 प्रतिशत से अधिक में  राधा-कृष्ण को वयस्क प्रदर्शित किया गया है उस पर तो कोई आपत्ति नहीं करता।

ब से मैं ने यह समाचार और इस पर प्रतिक्रियाएँ जानी हैं, मैं सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तलाश कर रहा हूँ। आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय उसी दिन अथवा अगले दिन इंटरनेट पर अपलोड हो जाते हैं। लेकिन 23 मार्च से आज तक भी यह निर्णय इंटरनेट पर अपलोड नहीं हुआ है। आज जब मैं ने इंटरनेट पर इस से संबंधित सामग्री सर्च की तो आईबीएन खबर का समाचार पढ़ने को मिला। जिस में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह बात सुनवाई के दौरान कही है और निर्णय सुरक्षित रखा गया है। इस का सीधा अर्थ .यह है कि निर्णय अभी दिया ही नहीं गया है और मीडिया में जो खबरें निकल कर सामने आई हैं वे सब सम्वाददाताओं द्वारा दी गई खबरें हैं। यह हो सकता है कि कोई सम्वाददाता स्वयं सुनवाई के समय न्यायालय में उपस्थित रहा हो हालांकि इस की संभावना कम है। इस तरह यह समाचार जो लोगों के सामने आया है या तो पक्षकारों द्वारा या फिर उन के वकीलों द्वारा जो कुछ सम्वाददाताओं को कहा है उन पर आधारित है। जब सारी बात मौखिक है तो यह सुनिश्चित करना भी कठिन है कि सु्प्रीम कोर्ट ने सुनवाई के समय क्या कहा था और किस संदर्भ में राधा-कृष्ण का उल्लेख किया था।निश्चित रूप से इस तरह के समाचार पर बवाल उठ खड
़ा होना अत्यंत खेद जनक है। मुझे तो लगता है कि हमारा मीडिया न्यायालयों के समाचार प्रकाशित करने में बहुत उतावला है और अक्सर इस तरह के मामलों में समाचार प्रकाशित कर सनसनी पैदा करता रहता है। मेरा तो मत है कि किसी मामले पर जब तक सुप्रीम कोर्ट अपना निर्णय जारी नहीं कर देती है माध्यमों को संयम बरतते हुए इस तरह के समाचारों का प्रकाशन नहीं करना चाहिए।  यदि न्यायाधीशों ने राधा-कृष्ण के संबंद में कोई आपत्तिजनक बात खुली अदालत में कही है तो वह उन की भी गलती है। उन्हें भी समझना चाहिए कि जब वे न्यायाधीश की पीठ पर आसीन होते हैं तो उन  के बोले हुए एक-एक शब्द पर पूरे समाज, देश और दुनिया की निगाह रहती है। उन्हें कुछ भी कहने के पहले अपने कहे हुए के असर के बारे में ध्यान रखना चाहिए। आखिर भारत एक जनतांत्रिक देश है।

हाँ तक लिव-इन-रिलेशन का मामला है तो हमारा कानून किसी भी वयस्क स्त्री-पुरुष के यदि वे अविवाहित हैं या उन के विवाहित जीवन-साथी जीवित नहीं रहे हैं, या उन का तलाक हो चुका है, या  सात वर्ष से विवाहित जीवन-साथी लापता हैं, तो उन के साथ रहने और सहमति से यौन संबंध बनाने को अपराध घोषित नहीं करता।  अदालतें केवल कानून की व्याख्या करती हैं। कोई कानून यदि संविधान के विरुद्ध हो तो उसे अवैध घोषित करती हैं। वे कानून की निर्मात्री नहीं हैं। किसी भी कानून को बनाना, उसे निरसित करना और संविधान में संशोधन करना संसद, विधानसभाओं और राष्ट्रपति का काम है। यदि किसी कृत्य और अकृत्य को अपराध की श्रेणी में रखे जाने का कोई कानून नहीं है तो इस का दोष न्यायपालिका या न्यायाधीशों का नहीं है। वे तो वही अभिव्यक्त कर सकते हैं जो कि कानून में लिखा है। मेरे विचार में सारी बहस निरर्थक है, जिसे मीडिया ने सनसनी पैदा करने और अपने उत्पादन को बिकाऊ बनाने के लिए खड़ा किया है।   लोग अपने-अपने महत्व को स्थापित करने के लिए इस बहस को हवा दे रहे हैं।

पति-पत्नी की भांति अनेक वर्षों के सहवास के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री-पुरुष को विवाहित माना

 सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में चालम्मा बनाम तिलगा के मुकदमें दिए गए निर्णय में कहा है कि स्त्री-पुरुष के पति-पत्नी की भांति अनेक वर्षों तक सहवास करने के आधार पर न्यायालय यह निष्कर्ष दे सकती है कि वे विवाहित थे।
के. टी. सुब्रह्मण्यम कर्नाटक पॉवर कॉरपोरेशन का कर्मचारी था। उस ने भारतीय जीवन बीमा निगम से चार जीवन बीमा पॉलिसियाँ ली थीं जिस में उस ने अपनी माँ चालम्मा को नामित बनाया। उस की मृत्यु के उपरांत तिलगा और उस के दो पुत्रों ने  बीमा पॉलिसियों के अंतर्गत मृत्यु दावा की राशि प्राप्त करने के लिए सिबिल जज सागर के न्यायालय में आवेदन किया। माँ चालम्मा ने उस में पक्षकार बनने की अर्जी दी और उसे भी पक्षकार बना लिया।  तिलगा का कहना था कि वह सुब्रह्मण्यम की पत्नी थी और उस के दोनों बेटों का उसी से जन्म हुआ है। जब कि माँ चालम्मा का कहना था कि तिलगा ने कभी उस के बेटे से विवाह ही नहीं किया। इस मामले में मूल प्रश्न यही था कि क्या तिलगा का विवाह मृतक के साथ हुआ था। 
मुकदमें में सबूतों से यह प्रमाणित हुआ कि तिलगा और मृतक ने तीन वर्ष नौ माह उन्नीस दिन तक एक ही क्वार्टर में  निवास किया था और समाज ने उन्हें पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था। जज ने निर्णय दिया कि इस आधार पर साबित हुआ कि वे दोनों पति-पत्नी थे और उन में विवाह हुआ था।  चालम्मा ने इस निर्णय की अपील जिला जज के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जहाँ यह निर्णय बरकरार रहा। चालम्मा ने उच्चन्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत की जो निरस्त कर दी गई और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। 
.
सुप्रींम कोर्ट में चालम्मा के वकील का तर्क था कि तिलगा को यह साबित करना चाहिए था कि उस की विधिपूर्वक मृतक के साथ विवाह हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्य की विवेचना करते हुए कहा कि मृतक जब नौकरी में आया तो उस ने खुद को अविवाहित दर्ज कराया था किंतु उस ने क्वार्टर आवंटित कराते समय स्वयं को विवाहित बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 50 और 114  के अंतर्गत न्यायालय द्वारा पक्षकारों के आचरण और व्यवहार से विवाह के तथ्य को प्रमाणित माना जा सकता है।  इस मामले में मृतक और तिलगा का अनेक वर्षों तक साथ रहना प्रमाणित हुआ है और समाज ने उन्हें पति-पत्नी के रूप में ही जाना है। इस आधार पर दोनों के विवाहित होने का तथ्य प्रमाणित माना जाता है।



पूरा मूल निर्णय यहाँ पढ़ा जा सकता है।

लिव-इन संबंधों को एक बार और सुप्रीमकोर्ट की मान्यता

छह माह पूर्व जब महाराष्ट्र सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में लिव-इन-रिलेशनशिप को सम्मिलित करने का प्रस्ताव किया था तो माध्यमों में वह चर्चा का विषय बना था। तीसरा खंबा पर भी कुल पाँच आलेख
(1), (2), (3), (4), (5)  इस संबंध में लिखे गए थे।  इन में यह स्पष्ट किया गया था कि अनेक मामलों में इन संबंधों को वर्षो से कानूनी मान्यता प्राप्त है।   अब सुप्रीम कोर्ट ने दिनांक 29 अप्रेल 2009 को निर्णय सुनाते हुए  एक और मामले में लिव-इन-रिलेशनशिप को मान्यता दी है।

इस मामले में पति और उस के दो संबंधियों के विरुद्ध धारा 498 ए एवं धारा 34 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत माका मामला दर्ज हुआ था।  पति लापता हो जाने से शेष दो व्यक्तियों के विरुद्ध विचारण हुआ और दोनों को दोषमुक्त घोषित कर दिया गया जब कि पति के विरुद्ध मामला लंबित रहा।  इस बीच पति ने उच्चन्यायालय के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत एक पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत कर कहा कि क्यों कि वह  पहले से विवाहित था इस लिए परिवादी स्त्री उस की वैधानिक रूप से विवाहित पत्नी नहीं है।  इस कारण से मामले के तथ्यों पर धारा 498 ए प्रभावी नहीं है और उस के विरुद्ध अभियोजन को निरस्त किया जाए।  उच्च न्यायालय इस याचिका को मात्र इस कारण से निरस्त कर दिया कि इस में तथ्यों के विवादित प्रश्न निहीत हैं।  उच्च न्यायालय के इस निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की गई।  सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिपति डॉ. अरिजित पसायत और असोक कुमार गांगुली ने मामले की सुनवाई की डॉ. अरिजित पसायत ने इस मामले में निर्णय दिया।

इस निर्णय में विवाह की संपूर्ण व्याख्या करते हुए तथा पूर्व में दिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों को उदृत करते हुए विस्तार से ऐसे विवाह से उत्पन्न परिस्थितियों पर चर्चा की गई जो कि किसी तकनीकी कारण से अवैध घोषित कर दिया गया हो।   अंत में इस निर्णय पर पहुंचा गया कि धारा 498ए तथा धारा 304बी भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दंडनीय अपराधों के मामले में इस तथ्य  से कोई अंतर नहीं पड़ेगा कि ऐसा विवाह किसी तकनीकी कारण से अवैध है।  क्यों कि इन अपराधों का मूल उद्देश्य वैवाहिक संबंधों के अंतर्गत किसी स्त्री के विरुद्ध की जा रही क्रूरता से है।  लेकिन यह सिद्धान्त धारा 494 भारतीय दंड संहिता के मामले में यह सिद्धान्त लागू नहीं होगा।  इस तरह इस निर्णय से लिव-इन-रिलेशनशिप को धारा 498ए तथा 304बी के मामलो में सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दे दी है।

क्या वे अपनी लिव-इन-रिलेशनशिप को विवाह में बदल सकते थे?

वह अस्पताल में नर्स है और मैं मेल नर्स। उस का भी कोई नहीं और मेरा भी कोई नहीं।

मैं ने पूछा -कोई नहीं?

-होने को सब कोई हैं, माता-पिता थे, उन का देहान्त हो गया। भाई हैं, बहने हैं। पर उन में कोई मेरा नहीं।

-कैसे?

-यह अलग कहानी है। बाद में बताऊंगा। पहले हम एक तरफ तसल्ली से बैठेंगे, खड़े-खड़े बात नहीं हो सकेगी।

यह मेरे एक सहायक के विवाह की दावत थी। दूल्हा-दुल्हिन मंच पर बैठे थे। डीजे की रोशनियों और शोर में कुछ बच्चे उछल-कूद कर रहे थे कुछ तल्लीनता से नाच रहे थे। मुझे दावत छोड़ने में अभी समय था। अपने सहायक की दावत में पूरे समय न रहना उचित नहीं होता। हम इन सब से दूर एक कोने में आ कर कुर्सियों पर बैठ गए।

वह एक पचास पार का अधेड़ था। उस ने कहना शुरु किया।

-नर्स बीमार हो गई। उस को संभालने वाला कोई नहीं। मैं ने ही उसे संभाला। वह मेरा अहसान मानने लगी। मेरे नजदीक आ गई। उसे पता था मैं अकेला रहता हूँ। वह मेरे यहाँ आने लगी। एक दिन मैं बीमार था, ड्यूटी नहीं जा सका। कोई खबर भी अस्पताल को नहीं दे सका। वह मेरे घर आ गई। मुझे तेज बुखार में देखा। डाक्टर को बुला कर मुझे दिखाया। वह मियादी बुखार निकला। वह रात भर मेरे यहाँ रही मुझे संभाला। दूसरे दिन उस ने भी छुट्टी कर ली। तीसरे दिन मेरी हालत स्थिर हुई तो मैं ने जबरन उसे ड्यटी भेजा। मेरा अपना कोई मुझे संभालने नहीं आया। वह कोई पन्द्रह दिन मेरे यहाँ ही रही। बाद में स्थिति यह हुई कि हम साथ ही रहने लगे। उस का स्थानांतरण दूसरे अस्पताल में हो गया। हमें साथ रहते कोई पाँच बरस हो गए हैं। हम दोनों का एक दूसरे के अलावा कोई नहीं है।

मैं समझ गया कि यह एक सहावासी रिश्ता (लिव-इन रिलेशन) है।

मैं यह चाहता हूँ कि मेरे मरने के बाद मेरी सारी जायदाद उसे ही मिले। मैं यह भी चाहता हूँ कि मेरी नौकरी के लाभ मेरी पेंशन आदि भी उसे ही मिलें।

मैं ने कहा- सब कुछ उस के नाम वसीयत कर दो। वसीयत की रजिस्ट्री करा दो। पर नौकरी के सारे लाभ तो तभी मिलेंगे जब वह तुमसे शादी कर ले और तुम्हारी पत्नी हो जाए। तुम दोनों शादी क्यों नहीं कर लेते?

उस में दो अड़चनें हैं। मैं शादी नहीं कर सकता।

मैं ने पूछा -क्या अड़चन?

मैं जब पैदा हुआ तभी मेरे माँ-बाप जान गए थे कि मैं कभी शादी नहीं कर सकूंगा। मैं उस के काबिल नहीं था। उन्हों ने मुझे नौ-दस की उम्र में हिजड़ों के साथ कर दिया। पर मुझे स्कूल अच्छा लगता था। मुझे हिजड़ों ने ही पढ़ाया। मैं उन का लिखने पढ़ने का काम करता। उन्हें नर्सों की हमेशा जरूरत होती थी। उन्हों ने मुझे नर्सिंग का कोर्स करवा दिया। मैं ने प्रार्थना पत्र दिया तो सरकारी अस्पताल में नर्स हो गया।

ऐसी क्या कमी थी तुम में?

मेरे यौन अंग ही नहीं है। कैसे शादी करूं उस से?

सब दस्तावेजों में क्या लिखा है? पुरुष?

हाँ वहाँ तो पुरुष ही लिखा है। लेकिन सब को पता है मैं क्या हूँ।

-तो तुम पुरुष लिख कर उस से शादी क्यों नहीं कर लेते?

-वह तो बहुत कहती है। पर मैं उस की आजादी नहीं छीनना चाहता। अभी वह स्वतंत्र है। वह चाहे जिस से शादी कर सकती है। मैं यह चाहता भी हूँ कि वह किसी से शादी कर ले। लेकिन वह ही किसी और से शादी नहीं करना चाहती।

-तुम उस से शादी कर लो। बाकायदा जिला कलेक्टर जो विवाह रजिस्ट्रार भी है के यहाँ नोटिस दे कर शादी कर लो। वहाँ रजिस्टर भी हो जाएगी। प्रमाण पत्र अपने विभाग में पेश कर दो। उसे सब लाभ मिल जाएँगे।

-संकट यह है कि मेरे विभाग में मेरी असलियत सभी जानते है। वहाँ तो कोई कुछ नहीं कहेगा। लेकिन मेरे लाभों के लिए मेरे भाई वगैरह मेरे मरने के बाद जरूर दरख्वास्त देंगे। पेंशन किसी को नहीं मिलेगी। लेकिन दूसरे लाभों के लिए वे यह सब करेंगे।

मैं सोच में पड़ गया कि उसे क्या जवाब दूँ? हो सकता है कि कानून इसे शादी माने ही नहीं। फिर भी मैं ने दृढ़ता पूर्वक कहा कि -तुम शादी कर लो।

वह गुम सुम हो गया। फिर कहने लगा  -उस की शादी करने की आजादी छिन जाएगी।

उस की उम्र क्या है? मैं ने पूछा।

-पैंतालीस से ऊपर होगी।

अब वह इस आजादी का उपभोग नहीं करेगी। तुम शादी कर लो। तुम्हारे बाद कोई कुछ साबित नहीं कर सकता।

इतने में कोई मुझे बुलाने आ गया। हम उस एकांत से उठ लिए। कोई दो बरस हो गए हैं, इस बात को। वह मुझे नहीं मिला, और न ही उस की कोई खबर। मैं नहीं जानता उन्हों ने क्या किया। पर मेरे जेहन में यह प्रश्न आज भी है कि क्या वे शादी कर सकते थे?  और क्या उन की शादी को शून्य माना जा सकता था?

लिव-इन-रिलेशनशिप और सदी पहले की कानून की गलियाँ

कल के आलेख नाता, नातरा और लिव-इन-रिलेशनशिप  पर एक बहुत प्यारी टिप्पणी बहुत प्रिय साथी से मिली।  ६५% का आंकडा आप कहाँ से लाये, यह तो मुझे नही मालूम ! मगर यह ग़लत ही नहीं भ्रामक भी है ! ५-१० % तक कहते तो भी कुछ हद तक ठीक रहता ! …….. ” 

मैं ने  साथी को स्रोत बताया। बाद में यह टिप्पणी टिप्पणी कर्ता ने तीखी मान कर हटा ली। मैं ने उन्हें कहा इस की आवश्यकता नहीं थी। मैं आहत नहीं हुआ। मैं इस के लिए तैयार था। क्यों कि मुझे पता है। हम मध्यवर्गीय सवर्ण जीवन बिताने वाले लोगों को बहुत सी बातों का आभास तक भी नहीं होता। बाद में देर रात बैरागी जी की टिप्पणी से मेरी बात को समर्थन मिला और उस के बाद अजित वडनेरकर जी की टिप्पणी ने उसे मजबूत किया। हालांकि अजित जी का मानना था कि यह प्रथा राजस्थान और मालवा के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। पर वास्तव में यह प्रथा समूचे भारत में कुछ न कुछ विविधता के साथ बहुमत समाज में मान्यता प्राप्त है। इस के सबूत भी मौजूद हैं। खैर!


आज मैं आप को एक शताब्दी के भी पहले के पंजाब में लिए चलता हूँ, जहाँ कानून और अदालतों से लिव-इन-रिलेशन को समर्थन मिला। क्यों कि इन पति-पत्नी के रिश्ते और विवाह का संपत्ति के साथ चोली दामन का साथ है। अपितु यह कहा जाना सत्य होगा कि संपत्ति ही विवाह संस्था की जनक है। पुरुष सत्तात्मक परिवार में  संपत्ति पुत्र को ही मिले इस के लिए यह आवश्यक था कि मृतक का पुत्र कौन है? यह निर्धारित करने का एक मात्र तरीका ही यही था कि जो स्त्री विवाह बना कर पुरुष के साथ रहे, उस विवाह की अवधि में उत्पन्न संताने उस पुरुष की संताने मानी जा सकती हैं। जहाँ विवाह नहीं होगा वहाँ संतान की उत्पत्ति को संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा। यह मेरी नहीं अधिकांश समाजशास्त्रियों का कथन है। 

एक सदी पूर्व पंजाब की अदालतों के मुकदमों के कुछ वाक्यांशों के हिन्दी अनुवाद उन के जर्नल के वर्ष व पृष्ट सहित मैं यहाँ दे रहा हूँ। 

मुलाहिजा फरमाएँ…..

  • लगातार सहावास यह मानने के लिए पर्याप्त है कि स्त्री-पुरुष के मध्य वैवाहिक रिश्ता है। जहाँ यह माना लिया जाता है कि वे स्थाई रुप से साथ रहेंगे, वहाँ साथ रहना उन के बीच वैवाहिक रिश्ते का अच्छा  सबूत है, चाहे वह विवाह नहीं हो। … 29 P.R. 1883.
  • एक हिन्दू जाट एक विधवा के साथ 15 वर्ष रहा और उन के पुत्र भी हैं, वहाँ विवाह का कोई समारोह नहीं हुआ। यह विवाह मानने के लिए एक अच्छा सबूत है और यहाँ यह साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं कि उन के विवाह का कोई समारोह हुआ था। … 38 P.R. 1879; see also C.A. 911 of 1879; 26 P.r. 1880
  • एक विधवा स्त्री और पुरुष के मध्य लगातार सहावास (इस मामले में 30 वर्ष) बिना किसी समारोह के भी विवाह के समान है। उन की संतान वैध मानी जाएगी। … 49 P.R. 1890.
  • लेकिन इस सिद्धान्त के अनुसार एक स्त्री के साथ सहावास जिस का पति जीवित है, विवाह के समान नहीं मानी जाएगी। ऐसे सहावास से उत्पन्न संतान को वैधता प्रदान करना बुरा रिवाज होगा जिसे अदालतों को मान्यता नहीं देनी चाहिए। … 49 P.R. 1890.
  • गुरदास पुर जिले का एक हिन्दू जाट अपनी पत्नी को यह कह कर कि वह किसी के भी साथ जा कर रह सकती है अपना गाँव छोड़ गया। पत्नी दूसरे पुरुष के साथ पत्नी की तरह रहने लगी। पूर्व पति के वापस आ जाने पर उस ने पत्नी पर कोई दावा नहीं किया। यहाँ उचित अनुमान किया गया कि गाँव छोड़ने पर उस ने अपनी पत्नी पर अधिकार छोड़ दिया था जो कि तलाक के समान था। इस कारण से उस का दूसरे पुरुष के साथ सहावास करने को विवाह माना गया। …  73 P.R. 1897.
  • जहाँ एक मृतक मालिक एक विधवा के साथ पति की तरह रहता रहा और लोग उन्हें पति-पत्नी की तरह मानते रहे वहाँ उस की मृत्यु के उपरांत उन की संतान को उस पुरुष की संतान मान कर रेवेन्यू रिकॉर्ड में उस का नाम दर्ज किया गया। यहाँ यह प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं थी कि उन के बीच कोई औपचारिक समारोह हुआ  था। …  13 P.R. 1898
  • जहाँ स्थाई प्रकृति का संबंध लम्बे समय तक एक जाट पुरुष और ब्राह्मण स्त्री के बीच साबित हो चुका है। पुरुष द्वारा स्त्री के साथ पत्नी की तरह व्यवहार किया है। वहाँ संतान को उन का पुत्र माना जाएगा। औपचारिक समारोह की कोई आवश्यकता नहीं है। … 50 P.R. 1900.
  • एक स्त्री एक जाट पुरुष के साथ 18 वर्ष रही, अनेक संताने हुईं, लड़कियों की शादियाँ बिरादरी में हो गई। वह उस की कानूनी रुप से पत्नी ही मानी जाएगी और पुरुष की मृत्यु के 280 दिन पूरे होने तक उस स्त्री से उत्पन्न संतान उसी पुरुष की संतान मानी जाएगी। … 51 P.R. 1900.
  • लगातार सहावास विवाह का अनुमान उत्पन्न करता है। जहाँ एक स्त्री एक पुरुष के साथ 10 या 12 वर्ष एक ही घर में साथ रही हो वहाँ उसे विवाहित ही माना जाएगा। … 135 P.R. 1907.
  • जहाँ 40 वर्ष तक महिला पुरुष की मृत्यु तक सहावास में रही है वहाँ उसे उस पुरुष की पत्नी माना जाना उचित है औपचारिक विवाह का प्रमाण आवश्यक नहीं। … 65 P.R. 1911; see also 1921, 3 Lah. L.J. 317
  • जब स्त्री-पुरुष लम्बे समय तक सहावासी रहे हों तो हमेशा यही अनुमान किया जाएगा कि वे दोनों पत्नी हैं। … 49 P.R. 1903.और 61 P.R. 1905.

*                                                                                                                                                                *

महाराष्ट्र सरकार ने सहावासी रिश्ते की महिलाओं के लिए धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता में गुजारा भत्ता हेतु किए जाने वाले संशोधन को अभी ठण्डे बस्ते में डाल देने का फैसला किया है। यह एक प्रगतिशील कदम था जिस से पैर पीछे ले लिया गया है। समाज अपने तरीके से परिस्थितियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ता है। राज्य को उसे नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने पड़ते हैं। वह अराजकता को एक सीमा तक ही बर्दाश्त कर सकता है। देर सबेर राज्य को कानून बनाने ही पड़ेंगे। मार्क्स-एंगेल्स समेत दुनियाँ के अनेक दार्शनिकों ने भविष्य में राज्य का लोप होने की घोषणा की है। हमारे आचार्य बृहस्पति के इस कथन के अनुसार कि जो पैदा हुआ है वह मरेगा, हम भी माने लेते हैं कि राज्य नाम की यह संस्था कभी न कभी विलुप्त हो ही जाएगी। लेकिन आने वाले दस पंद्रह दशकों में इस का लोप नहीं होने जा रहा है। जब तक रहेगा राज्य अपना काम तो करेगा ही।

इस श्रंखला को यहाँ विराम दे रहा हूँ।  फिर भी परिवार के विषय पर तीसरा खंबा और अनवरत पर आप को आलेख पढ़ने को मिलते रहेंगे।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada