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स्टाम्प पर नोटेरी से प्रमाणित तलाकनामा या मुक्ति-पत्र वैध नहीं है।

समस्या-

गोंदिया, महाराष्ट्र से राहुल ने पूछा है

मैं हिन्दू हूँ, मेरा विवाह 2013 में हुआ था। में ने जिला न्यायलाय से 2016 में तलाक की डिक्री पारित करा ली। छह माह बाद दूसरा विवाह किया। दूसरी पत्नी का भी यह दूसरा विवाह है। पर उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पेपर पर मुक्ति का दस्तावेज लिख कर तलाक लिया है, इस बात की जानकारी मुझे शादी के छह माह बाद हुई हैं। मेरी दूसरी पत्नी तलाक लेने के बाद भी अपने पता के घर से भाग गई थी और एक साल अपने पहले पति के साथ रही। अब मुझे मानसिक परेशानी दे रही है, धमकी देती है कि मैं आत्महत्या कर लूंगी। 498 में अन्दर करवा दूंगी वगैरा वगैरा। मुझे शुगर की बीमारी हो गयी है। मेरी बीमारी का फायदा उठा कर मुझे परेशान कर रही है। मैं बेवजह डिप्रेशन में हूँ। मैं उस से मुक्ति पाना चाहता हूँ। क्या मैं अपनी प्रेमिका से शादी कर सकता हूँ?

समाधान-

प ने जब दूसरा विवाह किया तब आप की पत्नी ने कहा कि वह शादीशुदा है और उस का तलाक हो चुका है तो आप को उस की तलाक की डिक्री देख लेनी चाहिए थी। यह जरूरी है। सब को देखनी चाहिए। मुक्ति के दस्तावेज का कोई विधिक मूल्य नहीं है। जैसे ही आप को पता लगा वैसे ही आप को तुरन्त अपनी पत्नी से अलग हो जाना चाहिए था और तुरन्त धारा 11 हिदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह को शून्य एवं अकृत घोषित करने का दावा करना चाहिए था।

प को अब भी अपनी पत्नी से तुरन्त अलग हो जाना चाहिए और उक्त प्रकार से घोषणा का दावा कर देना चाहिए।

प जानते हैं कि आप का विवाह शून्य और अकृत है इस कारण से आप अब किसी अन्य स्त्री से विवाह कर सकते हैं। उस के लिए दूसरे विवाह के शून्य व अकृत घोषित होने की डिक्री की प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

विवाह योग्य उम्र होने से दो वर्ष तक बाल विवाह अकृत कराया जा सकता है।

ChildMarriageसमस्या-

विनोद जाट ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विकास है मेरी जन्मतिथि 26.11.1995 है। मेरी शादी 15.11.2009 को 14 वर्ष की आयु में मेरी नापसंद लडकी के साथ चौरों की तरह रात 2 बजे एकान्त में हिन्दू रिवाज से करवाई गई। लडकी को ना अपनाने के कारण मैं ने बी.कॉम सैकण्ड इयर परीक्षा कर ली और वह अभी 8वीं मे पढ़ती है। मेरी लंबाई 5.10″ है और उसकी 4.5″ से भी कम है। वह मुझे बिलकुल नापसन्द है। उस का व्यवहार बच्चों जैसा है। वह दिखने में एकदम बच्ची लगती है। उस को कुपोषण है। विवाह का उपभोग नहीं किया है। मैं उसे कैसे भी करके छौड चाहता हूँ। लडकी मुझे छोडना नहीं चाहती। मैं उसे 1% भी नही चाहता। कृपया मुझे इस से छुटकारा दिलवायें।

समाधान-

प अपनी पत्नी से छुटकारा चाहते हैं। आप विवाह योग्य उम्र के होने के दो वर्ष की अवधि में अपने जिले के पारिवारिक न्यायालय और पारिवारिक न्यायालय न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष अपने बाल विवाह को अकृत घोषित करने के लिए आवेदन दे सकते हैं। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की परिभाषा के अनुसार आप 21 वर्ष की आयु पूर्ण हो जाने पर वयस्क होंगे। आप की जन्मतिथि के अनुसार आप 26.11.2016 को 21 वर्ष के हो जाएंगे। अर्थात आप दिनांक 26.11.2018 तक अपने विवाह को अकृत घोषित कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन यह काम आप जितना जल्दी हो कर सकते हैं। इस आवेदन को प्रस्तुत करने के लिए आप 18 वर्ष की उम्र प्राप्त करते ही योग्य हो चुके हैं और स्वयं अपने बाल विवाह को अकृत कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

प का विवाह अकृत घोषित किए जाने के साथ ही न्यायालय आप को आप की पत्नी के भरण पोषण के लिए आदेश दे सकता है। लेकिन यह आदेश तब तक ही प्रभावी रहेगा जब तक आप की पत्नी दुबारा विवाह नहीं कर लेती है।

वयस्क होने के पूर्व बाल विवाह को अकृत घोषित कराया जा सकता है।

ChildMarriageसमस्या-

अनिरूद्ध मीना ने सीकर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा बाल विवाह 11 साल की आयु में 2005 में हुआ था। 2013 में मेरा गौना कर दिया गया। अब हमारे आपस में बिलकुल भी नहीं बन रही है। अभी हम ने कोई संतान उत्पन्न नहीं की क्यों कि मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है। मेरे किसी भी दस्तावेज में इस शादी का उल्लेख नहीं है। मैं अपनी पत्नी से तलाक लेना चाहता हूँ। मैं ने इन्टरनेट पर इस से सम्बन्धित जानकारी खोजी तो 2006 का कानून सामने आया। इस में होने वाली अभिवावकों की सजा एवं भरण पोषण के बारे में बताये। क्या जुर्माना देकर सजा से बचा जा सकता है? बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी कौन होता है व कहाँ बैठता है? इस कानून में हुए संशोधन व तलाक की प्रकिया बताइये। जन्म दिनाँक 20/11/1994 ( केन्द्रीय स्तर पर जनजाति)

समाधान-

प तलाक लेना चाहते हैं। लेकिन उस की आवश्यकता नहीं है। आप वयस्क होने के दो वर्ष की अवधि में अपने जिले के पारिवारिक न्यायालय और पारिवारिक न्यायालय न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष अपने विवाह को अकृत घोषित करने के लिए आवेदन दे सकते हैं। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 की परिभाषा के अनुसार आप 21 वर्ष की आयु पूर्ण हो जाने पर वयस्क होंगे। आप की जन्मतिथि के अनुसार आप 20.11.2015 को 21 वर्ष के हो जाएंगे। अर्थात आप दिनांक 19.11.2015 तक अपने विवाह को अकृत घोषित कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

प का विवाह 2005 में हुआ था इस कारण इस कानून में वर्णित अपराधों के लिए किसी को दंडित कराने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है। कोई भी कानून प्रभावी होने से पिछली तिथि की घटनाओं पर प्रभावी नहीं होता है। इस मामले में बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी की कोई भूमिका नहीं है। वैसे जिला मजिस्ट्रेट अर्थात जिला कलेक्टर को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी की शक्तियाँ प्रदान की हुई हैं।

प का विवाह अकृत घोषित किए जाने के साथ ही आप को न्यायालय आप की पत्नी के भरण पोषण के लिए आदेश दे सकता है। लेकिन यह आदेश तब तक ही प्रभावी रहेगा जब तक आप की पत्नी दुबारा विवाह नहीं कर लेती है।

विदुर द्वारा विधवा पुत्रवधु से विवाह शून्य है …

hindu-marriage-actसमस्या-

दिल्ली से विनोद कुमार ने पूछा है-

क विदुर ने अपनी विधवा पुत्रवधु से विवाह किया है। क्या यह कानून के अनुसार वैध है।  क्या उस के मरने के बाद उस की यह पत्नी फैमिली पेंशन पाने की अधिकारी है?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि यह विदुर और उस की विधवा पुत्र वधु किसी व्यक्तिगत विधि से शासित होते हैं। यदि वे हिन्दू विधि से शासित होते हैं तो यह विवाह वैध नहीं है।

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 (iv) के अनुसार वर-वधु प्रतिबंधित रिश्तेदार नहीं हो सकते। अधिनियम की धारा 3 (g) में प्रतिबंधित रिश्तेदारों को परिभाषित किया गया है। इस उपधारा के दूसरे भाग में किसी स्वशाखीय संतान या स्वशाखीय पूर्वज की पत्नी या पति से प्रतिबंधित रिश्ते के रूप में परिभाषित किया गया है। इस तरह किसी व्यक्ति की अपनी ही पुत्रवधु प्रतिबंधित रिश्तेदार है और उस के साथ हुआ विवाह वैध नहीं है। इस तरह के विवाहों को अधिनियम की धारा 11 के अनुसार शून्य माना गया है जो कि विवाह के किसी भी पक्षकार के आवेदन पर निरस्त किया जा सकता है।

र्वोच्च न्यायालय ने यमुनाबाई अनन्तराव आधव बनाम अनन्तराव शिवराम आधव (एआईआर 1988 सुप्रीम कोर्ट 644) में यह निर्णीत किया है कि किसी भी मामले में यदि किसी विवाह की वैधता का प्रश्न उठता है तो न्यायालय धारा पाँच के  भाग (i), (vi) व (v) में वर्णित विवाहों को शून्य घोषित कर सकता है।

स विदुर की मृत्यु के उपरान्त उस की परिवार पेंशन को यदि विभाग देने से मना कर दे और मामला न्यायालय में ले जाया जाए और न्यायालय में यह प्रश्न उठे कि वह वैध पत्नी नहीं थी इस कारण उसे परिवार पेंशन का अधिकार नहीं है तो न्यायालय यह निर्णय दे सकता है कि वह उन का विवाह शून्य होने के कारण वह वैध पत्नी नहीं है और उसे पेंशन पाने का अधिकार नहीं है।

वैध दत्तक ग्रहण निरस्त नहीं किया जा सकता

  विष्णु गोपाल मुच्चल पूछते हैं – – –

मैं ने 12 वर्ष पूर्व अपनी पुत्री को अपने चचेरे भाई को गोद दिया था, क्यों कि उन को कोई संतान नहीं हो सकी थी, उस की पत्नी की बीमारी के कारण अब मेरे भाई और उसकी पत्नी में तलाक होना है। तो क्या मैं अपनी पुत्री वापस ले सकता हूँ?  कृपया सलाह दें।
उत्तर – – – 
विष्णु गोपाल जी,
किसी बालक को गोद देना एक तरफा प्रक्रिया है। हिन्दू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम , 1956 की धारा 15 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि कोई भी दत्तक ग्रहण जो विधि पूर्वक किया गया हो उसे किसी भी दत्तक ग्रहण करने वाले किसी भी माता-पिता या अन्य किसी व्यक्ति द्वारा निरस्त नहीं किया जा सकता। न ही दत्तक ग्रहण किया गया बालक/बालिका स्वयं अपनी प्रास्थिति की घोषणा कर के अपने जन्म के परिवार में लौट सकता है। 
स तरह यह स्पष्ट है कि दत्तक ग्रहण को निरस्त नहीं किया जा सकता है, यदि वह वैध रूप से विधिपूर्वक किया गया हो। दत्तक ग्रहण यदि वैध रूप से नहीं किया गया है। यदि दत्तक ग्रहण में विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया और नियमों का कहीं उल्लंघन किया गया हो तो ऐसे दत्तक ग्रहण को अदालत से अवैध और शून्य घोषित कराया जा सकता है। इस के लिए आप को किसी दीवानी विधि के अच्छे जानकार वकील से संपर्क कर के दत्तक ग्रहण की जाँच करा लें। यदि वे पाते हैं कि दत्तक ग्रहण में कोई विधिक त्रुटि हुई है और वह अवैध घोषित कराया जा सकता है तो इस के लिए न्यायालय में दीवानी वाद प्रस्तुत करें। न्यायालय दत्तक ग्रहण को अवैध और शून्य घोषित कर देगा।

बाल विवाहों के पूर्ण प्रतिषेध के लिए उन्हें प्रारंभ से ही शून्य और अकृत घोषित किया जाए

 क और आखा तीज (अक्षय तृतिया) गुजर गई। इस दिन किए गए दान का पुण्य अक्षय होता है, ऐसी मान्यता है और तमाम हिन्दू धार्मिक पीठें, संत, कथावाचक आदि इस बात का खूब प्रचार भी करते हैं। यह भी मान्यता है कि रजस्वला होने के पूर्व ही कन्या (पुत्री) का कन्यादान कर दिया जाए तो उस से बड़ा दान कुछ नहीं होता। नतीजा यह है कि इन धारणाओं ने आखा तीज को विवाह के लिए अबूझ सावा (विवाह मुहूर्त) बना दिया है। इस दिन थोक में बाल विवाह होते हैं। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात  मध्य प्रदेश और कुछ अन्य प्रांतों में बहुत बड़ी संख्या में बालविवाह  होते रहे हैं। पिछले तकरीबन पैंतीस वर्षों में सामूहिक विवाह होने लगे जिन में बाल विवाह धड़ल्ले से हुए। सांसद और विधायक जो स्वयं कानून बनाते हैं, राजनैतिक दलों के नेता जो बाल विवाह के खिलाफ खूब बोलते हैं, इन सामूहिक विवाह समारोहों में आशीर्वाद देते और वोट पटाते खूब नजर आए। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी जिन पर संवैधानिक रूप से और अपनी सेवाओं के कर्तव्य के एक भाग के रूप में बाल विवाहों को रोकने की जिम्मेदारी है,  इन सामूहिक विवाहों की व्यवस्था करते रहे।

बाल विवाहों का अनिवार्य परिणाम यह सामने आया कि विवाह संबंधी विवादों में भारी वृद्धि हुई। कुछ भी होता है कि लड़की को पिता के घर रोक लिया जाता है, और फिर धारा 125 दं.प्र.सं. में भरणपोषण के मुकदमे से विवाद का अदालत में आरंभ हो जाता है। अब तो अनेक माध्यम हैं जिन के जरिए अदालत जाया जा सकता है। दं.प्र.सं. के अतिरिक्त घरेलू हिंसा अधिनियम और हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लिया जा रहा है। इस से पहले से ही मुकदमों से अटी अदालतों में मुकदमों की संख्या और बढ़ी है। कानून के अंतर्विरोध भी इस का कारण बने हैं। सब से बड़ा अंतर्विरोध है कि हिन्दू विवाह अधिनियम में किसी भी बाल विवाह को अवैध नहीं माना जाता। एक बार संपन्न हो जाने के उपरांत विवाह वैध हो जाता है और उसे बाल विवाह होने के कारण अवैध, अकृत, या शून्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
क और तो यह स्थिति है, दूसरी और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम ने बाल विवाह को अपराधिक कृत्य बनाया हुआ है और सजाओं का प्रावधान किया है, इसे विधि की विडम्बना कहा जाए या फिर विधायिका द्वारा निर्मित विधियों से विधिशास्त्र में उत्पन्न किया गया अंतर्विरोध। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में 18 से कम आयु की स्त्री और 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष के विवाह को वर्जित घोषित किया गया है और ऐसा विवाह करने वाले 18 से अधिक और 21 वर्ष से कम आयु के और उस से अधिक आयु के लड़के को अलग अलग दंडों का भागी घोषित किया गया है। इसी विवाह को कराने वाले पुरोहित और माता-पिता के लिए भी दंडों का विधान किया गया है। इस तरह एक ऐसा कृत्य जिस को करने और कराने वाले वयस्क व्यक्तियों को अपराधी कहा गया है उसी कृत्य के परिणाम विवाह को वैध करार दिया गया है। हिन्दू विवाह और अन्य किसी भी व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत संपन्न बाल विवाह को हर स्थिति में वैध माना गया है। ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों को वही अधिकार प्राप्त हैं जो कि अन्य विवाहों से उत्पन्न संतानों को प्राप्त हैं। 

कानूनी प्रक्रिया में बाधक अनुबंध

कानूनी प्रक्रिया में बाधक अनुबंधों को शून्य माना जाना किसी भी ऐसे राज्य की पहली शर्त होनी चाहिए जिस का शासन कानून के आधार पर चलता है। भारत एक ऐसा ही राज्य है। इस कारण से कल प्रस्तुत कंट्रेक्ट एक्ट की धारा-28 का महत्व बढ़ जाता है। सिद्धान्त यह है कि कोई भी व्यक्ति कंट्रेक्ट कर के खुद को न्यायालयों द्वारा प्रदत्त सुरक्षा से वंचित नहीं कर सकता। (प्रिविकौंसिल-1917) ऐसा अनुबंध जिस के द्वारा कर्मचारी अपनी गलत सेवा-च्युति को चुनौती देने के अधिकार से वंचित कर दे अवैध है।
क्षेत्राधिकार को सीमित करने वाले अनुबंध-
यह कानून का स्थापित सिद्धान्त है कि कोई भी व्यक्ति एक निजि अनुबंध के द्वारा किसी अदालत को क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं कर सकते, इसी तरह वे सामान्य कानून के द्वारा किसी अदालत को प्राप्त क्षेत्राधिकार को समाप्त कर सकते हैं। जैसे इस तरह का कोई भी अनुबंध कि कोई भी विवाद होने पर कोई भी, या कोई एक पक्षकार अदालत में दावा नहीं कर सकेगा एक शून्य होगा।
लेकिन जहां किसी  दावे के लिए दावे का कारण एक से अधिक अदालतों के क्षेत्राधिकार में उत्पन्न  होने की संभावना हो तथा एक से अधिक अदालतों में दावे किए जा सकते हों वहाँ पक्षकार इस तरह का अनुबंध कर सकते हैं कि किसी एक विशेष अदालत को ही क्षेत्राधिकार होगा। क्यों कि इस से दावा करने का अधिकार समाप्त नहीं होता। इस तरह की शर्त होने से कि विवाद होने की दशा में केवल स्थान विशेष की अदालत को ही सुनने का क्षेत्राधिकार होगा, अनुबंध शून्य नहीं हो जाता है। लेकिन इस तरह का अनुबंध मूल कंट्रेक्ट में ही होना चाहिए। एक कंट्रेक्ट के तहत माल सप्लाई करने पर मूल कंट्रेक्ट में इस तरह की शर्त न होने, तथा माल के बिल में इस तरह की शर्त दर्ज होने मात्र से उसे किसी एक अदालत मे दावा करने का कंट्रेक्ट नहीं माना जा सकता।
एक अदालत का क्षेत्राधिकार समाप्त करने और एक अदालत को सम्पूर्ण क्षेत्राधिकार प्रदान करने वाली शर्ते बहुत साफ और आसानी से समझने वाली भाषा में होना चाहिए। किसी भी प्रकार का असमंजस उत्पन्न करने वाली शर्त भी शून्य होगी। ऐसा भी कोई अनुबंध शून्य होगा जिस में कहा गया हो कि किसी एक ही अदालत को क्षेत्राधिकार होगा। भले ही दावा करने का कारण किसी दूसरी अदालत के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो। यह कानून भारत के बारे में है, इस कारण से ऐसा अनुबंध जिस में यह कहा गया हो कि दावा भारत में नहीं बल्कि केवल भारत के बाहर किसी देश की अदालत में ही किया जा सकेगा भी शून्य होगा।  
मियाद को सीमित किये जाने वाले अनुबंध-
किसी प्रकार का दावा करने की मियाद तीन वर्ष हो और यह अनुबंध कर लिया जाए कि विवाद उत्पन्न होने पर एक वर्ष के उपरांत कोई दावा नहीं किया जा सकेगा एक शून्य अनुबंध है। किसी बीमा पॉलिसी में यह शर्त कि एक वर्ष के बाद कोई भी दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा अवैध शर्त है।
किसी फायर इंश्योरेंस पॉलिसी में यह शर्त कि घटना के एक वर्ष बाद कोई भी दावा स्वीकार नहीं किया जा सकेगा एक शून्य अनुबंध है और इस से कोर्ट में कानून द्वारा निर्धारित समय सीमा में दावा करने का अधिकार सीमित नहीं होगा।
अधिकारों को समाप्त  करने वाले अनुबंध-
इस तरह के अनुबंधों में दावा करने का अधिकार पूरी तरह समाप्त होता हो तो ही अनुबंध शून्य होगा। जैसे किसी माल या संपत्ति को हस्तांतरण में प्राप्त करने वाले व्यक्ति के उस हस्तांतरण के अंतर्गत दावों को करने से प्रतिबंधित करने वाले अनुबंध शून्य होंगे।
अपवाद-
इस कानून के अपवादों के अनुसार इस तरह का अनुबंध कि पक्षकारों के बीच कोई भी विवाद होने पर उसे मध्यस्थ को निर्देशित किया जाएगा और उस का निर्णय  मान्य होगा एक शून्य अनुबंध नहीं होगा। लेकिन मध्यस्थ के निर्णय को अदालत  के समक्ष चुनौती दी जा सकेगी। 

व्यापार अवरोधक अनुबंध शून्य हैं

व्यापार में अवरोधक अनुबंध शून्य हैं …

ऐसा प्रत्येक अनुबंध जो किसी भी व्यक्ति के किसी भी वैधानिक वृत्ति (प्रोफेशन), व्यापार या कारोबार करने पर रोक लगाता है, उस सीमा तक अवैध है। 

इस के अपवाद भी हैं …

  • वह व्यक्ति जो किसी व्यापार की प्रतिष्ठा का विक्रय कर दे, क्रेता से यह अनुबंध कर सकेगा कि वह निश्चित की गई स्थानीय सीमाओं में तब तक समान प्रकृति का कारोबार नहीं करेगा, जब तक क्रेता या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे उस बेची गई प्रतिष्ठा का अधिकार उत्पन्न हुआ हो उन निश्चित सीमाओं में समान प्रकृति का कारोबार चलाता रहे; लेकिन यह तभी जब कि उस कारोबार की प्रकृति की दृष्टि से ऐसी सीमाएँ न्यायालय को उचित प्रतीत हों।(धारा-27) 

कंट्रेक्ट कानून की यह धारा यह कहती है कि किसी भी वैधानिक वृत्ति, व्यापार या कारोबार पर किसी अनुबंध के द्वारा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। यह धारा व्यक्ति और संस्थाओं द्वारा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता की रक्षा करती है, अर्थात कोई व्यक्ति चाह कर भी किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का अनुबंध कर के उस के व्यापार को प्रतिबंधित नहीं कर सकता, और न ही कोई स्वयं इस प्रकार के प्रतिबंध से आबद्ध हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति को इस प्रकार किसी अनुबंध में आबद्ध कर भी लिया जाए कि वह किन्हीं सीमाओं में किसी विशिष्ठ प्रकार की वृत्ति, व्यापार या कारोबार नहीं करेगा, तो भी उसे इस के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा। क्यों कि ऐसा अनुबंध कानून की इस धारा के कारण शून्य है, और लागू नहीं कराया जा सकता है।जैसे …

  • एक व्यक्ति नाव द्वारा यात्रियों को नदी के पार ले जाने का व्यवसाय करता था। उस ने दूसरे एक व्यक्ति से यह अनुबंध किया कि वह उसे नियमित रूप से निश्चित राशि अदा करेगा जिस के बदले वह नाव द्वारा य़ात्रियों को नदी पार ले जाने का व्यवसाय नहीं करेगा। यह मामला न्यायालय में जाने पर निर्णय दिया गया कि ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है।
  • एक फैक्ट्री को एक वर्ष तक रेत सप्लाई करने का अनुबंध हुआ जिस में यह शर्त थी कि वह उस क्षेत्र की किसी अन्य फैक्ट्री को इस अवधि में रेत सप्लाई नहीं करेगा। न्यायालय ने माना कि यह अनुबंध  उस अवधि में अन्य फैक्ट्रियों को रेत सप्लाई करने की शर्त की सीमा तक शून्य है। 

नियोजन के मामले – 

लेकिन विशिष्ठ अनुतोष अधिनियम के अंतर्गत प्रदत्त अधिकार के कारण किसी  व्यक्ति पर इस तरह का प्रतिबंध उस का नियोजक लगा सकता है कि वह कंट्रेक्ट की अवधि में (जो कि नौकरी समाप्त होने के बाद की अवधि भी हो सकती है) किसी व्यवसाय या कारोबार में लिप्त नहीं होगा और  किसी अन्य नियोजक के यहाँ ठीक उसी प्रकार की सेवाएं नहीं देगा जैसी कि वह कंट्रेक्ट के द्वारा दे रहा है।

  • एक व्यक्ति नौकरी नहीं छोड़ता बल्कि उसे नियोजक नौकरी से हटा देता है। उस के सर्विस कंट्रेक्ट में यह शर्त थी कि वह समान प्रकार का व्यवसाय नहीं करेगा और न ही किसी अन्य नियोजक के यहाँ समान प्रकार की नौकरी करेगा। यह शर्त उस व्यक्ति पर लागू नहीं होगी।
  • एक नियोजक ने उस के साथ विक्रय प्रतिनिधि के रूप में नौकरी करने वाले कर्मचारी पर यह शर्त लगा दी कि वह नौकरी छोड़ने के बाद एक निश्चित क्षेत्र में किसी दूसरे नियोजक के लिए यही काम नहीं करेगा। न्यायालय ने इस शर्त को शून्य माना। 
  • जर्मनी की एक कंपनी ने एक भारतीय कंपनी से अपने उत्पाद विक्रय करने का कंट्रेक्ट किया और शर्त लगाई कि भारतीय कंपनी कंट्रेक्ट की अवधि समाप्त होने के पाँच वर्ष बाद तक उसी तरह के उत्पादों के विक्रय का व्यवसाय नहीं करेगी। न्यायालय ने इस शर्त को शून्य माना। 

अपवाद-

इस धारा के अंतर्गत अपवाद है कि कोई व्यक्ति यदि अपने व्यवसाय की प्रतिष्ठा का विक्रय करता है, तो वह समान प्रकृति के व्यवसाय को निश्चित स्थानीय सीमाओं में नहीं करने का प्रतिबंध लगाने वाला अनुबंध कर सकता है। लेकिन इस तरह का मामला न्यायालय के समक्ष आने पर न्यायालय उस प्रतिबंध की परीक्षा कर सकता है कि ऐसा प्रतिबंध कही अनुचित तो नहीं है। इस मामले में न्यायालय सामान्य रूप से यह देखेगा कि यह प्रतिबंध कहीं जनहित के विरुद्ध तो नहीं है। जैसे …

  • इस तरह का प्रतिबंध कहीं एक व्यक्ति की इजारेदारी तो स्थापित नहीं करता? जिस से किसी माल या सेवा के मूल्य में वृद्धि होती हो। यदि ऐसा हो रहा है, तो वह प्रतिबंध उचित नहीं माना जाएगा।

गैरकानूनी उद्देश्यों व प्रतिफल के कारण शून्य कंट्रेक्ट

पिछले आलेख कंट्रेक्ट के वैध-अवैध उद्देश्य और प्रतिफल पर ज्ञान जी की टिप्पणी थी…
… मैं तो दो बार पढ़ गया। पर लगता है अब भी मन एकाग्र होने में नहीं आया है, समय लगेगा।

वस्तुतः ज्ञान जी की एकाग्रता में कोई कमी नहीं है। पिछले आलेख में ऐसा कुछ नहीं था, जिस पर एकाग्र हुआ जाता। कंट्रेक्ट कानून की धारा 23 को ज्यों का त्यों उतार दिया गया था। वास्तव में धारा-24 ही उसे काम का बनाती है जो कहती है…

 

यदि किसी अनुबंध के उद्देश्य और प्रतिफल आंशिक रूप से भी गैर-कानूनी हुए तो कंट्रेक्ट शून्य होगा –

यदि एक या अधिक उद्देश्यों के लिए किसी एकल प्रतिफल का कोई अंश, या किसी एक उद्देश्य के लिए एक या अधिक प्रतिफलों में से कोई एक या उस का कोई अंश गैर-कानूनी हो तो कंट्रेक्ट शून्य होगा।

जैसे…. 

नील के वैध निर्माण का, और अन्य वस्तुओँ से गैरकानूनी व्यापार का की ओर से देखरेख करने का वादा करता है। 10,000 रुपए प्रतिवर्ष वेतन देने का वादा करता है। यह कंट्रेक्ट शून्य है क्यों कि के वादों का उद्देश्य और के वादे का लिए प्रतिफल अंशतः गैर कानूनी है। (धारा-24)

धारा-23 में वर्णित कानूनी-गैरकानूनी उद्देश्य किसी भी कंट्रेक्ट के शून्य होने या न होने को विस्तार देते हैं। वास्तव में यह धारा-24 के साथ मिल कर कंट्रेक्ट करने की व्यक्तियों की आजादी को सीमित करती है। इन प्रावधानों का उद्देश्य लोकनीति के विरुद्ध होने वाले कंट्रेक्टों को होने से रोकना है। हम इस विस्तार को अनेक श्रेणियों में बांट सकते हैं।

कानून द्वारा निषेध- यदि किसी उद्देश्य को या प्रतिफल को कानून ने निषिद्ध कर दिया हो तो अंशतः भी वह किसी कंट्रेक्ट में उपस्थित रहने पर कंट्रेक्ट शून्य हो जाएगा। जैसे किसी इंजिनियर से आप इंजिनियरिंग सेवाएँ प्राप्त करने के लिए अनुबंध करते हैं, जब कि वह ऐसे कानून के अंतर्गत पंजीकृत नहीं है जिस में पंजीकरण के बिना वह इंजिनियरिंग सेवाएँ नहीं दे सकता तो यह कंट्रेक्ट शून्य होगा।

कानून के किसी प्रावधान को निष्फल करता हो- यदि कोई उद्देश्य या प्रतिफल कानून के किसी प्रावधान को विफल कर रहा हो तो उस के कारण भी कंट्रेक्ट शून्य हो जाएगा। जैसे किसी व्यक्ति को उस के बेटे या बेटी के ब्याह के लिए दिए गए ऋण का अनुबंध शून्य है यदि उस का बेटा या बेटी शादी के लिए कानून द्वारा निर्धारित उम्र से कम उम्र का है। क्यों कि इस से बालविवाह को रोकने के कानून के प्रावधान विफल हो जाएंगे।

कानून के प्रावधानों का अर्थ व्यक्तिगत कानून भी है- इस प्रावधान के विस्तार में हिन्दू व्यक्तिगत कानून, मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और दूसरे व्यक्तिगत कानून जिन्हें कानून की मान्यता प्राप्त है वे भी सम्मिलित हैं। जैसे कोई हिन्दू किसी महिला का पत्नी की तरह भरण-पोषण करने का वादा करता है, तो यह शून्य कंट्रेक्ट होगा। क्यों कि यह हिन्दू कानून की भावना के विपरीत होगा। एक हिन्दू द्वारा विवाह के रहते दूसरा विवाह करने का कंट्रेक्ट शून्य होगा। एक गैर-मुस्लिम द्वारा मस्ज़िद के लिए संपत्ति वक्फ करने का कंट्रेक्ट शून्य होगा। लेकिन एक मुस्लिम पुरुष द्वारा स्त्री से यह कंट्रेक्ट करना कि वह उस के साथ विवाह होने पर वैवाहिक जीवन काल में दूसरा विवाह नहीं करेगा एक कानूनी कंट्रेक्ट है, क्यों कि यह न तो अनैतिक है, और न ही लोक-नीति के विरुद्ध है।

व्यक्ति या उस की संपत्ति को हानि- यदि सरकार किसी कंट्रेक्टर से सड़क निर्माण का कंट्रेक्ट करती है जिस से किसी व्यक्ति की संपत्ति को हानि पहुँचती है तो वह कंट्रेक्ट शून्य होगा। यदि कोई व्यक्ति किसी को अपमानित करने या शारिरिक चोट पहुँचाने के लिए कोई कंट्रेक्ट करता है तो यह शून्य होगा।

अनैतिक अनुबंध- इस मामले में उच्चतम न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि यहाँ अनैतिकता का अर्थ केवल यौन अनैतिकता है। जैसे किसी व्यक्ति को कुछ भूमि हस्तांतरित करने का वादा किया जाता है कि वह अपनी शादीशुदा बेटी को किसी दूसरे पुरुष के साथ रहने को भेजेगा। तो यह कंट्रेक्ट अनैतिक होने के कारण शून्य होगा। इसी तरह चकला चलाने के लिए किराए पर मकान देने का कंट्रेक्ट भी शून्य होगा।

लोकनीति के विरुद्ध अनुबंध- लोकनीति की कोई स्वीकृत परिभाषा नहीं है। लेकिन अदालतें इन की परीक्षा कर सकती हैं और लोकनीति के विरुद्ध पाए जाने पर कंट्रेक्ट को शून्य घोषित कर सकती हैं। जैसे मेडीकल या किसी भी अध्ययन में प्रवेश के वादे लिए धन देना, किसी जज से अपने हक में फैसला कराने के लिए किसी से धन लेने का कंट्रेक्ट चाहे जज उस में शामिल हो या न हो, पति-पत्नी के बीच निरंतर झगड़ों के कारण पत्नी व बच्चों के अलग रहने और उन के भरण पोषण हेतु निश्चित राशि अदा करने का वादा, सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम वेतन देने का अनुबंध आदि इस श्रेणी के कंट्रेक्ट हैं जो शून्य हैं।

फौजदारी मुकदमा न चलाने का अनुबंध- कोई भी ऐसा अनुबंध जिस में किसी प्रतिफल के लिए ऐसा फौजदारी मुकदमा नहीं चलाने का वादा किया गया हो जिस में समझौते का कोई प्रावधान नहीं है शून्य है, क्यों कि यह लोकनीति के विरुद्ध होगा। किसी महिला के अपहरण के मुकदमे को वापस करने के लिए उसे मुआवजा देने का कंट्रेक्ट शून्य है। ग़बन के किसी शिकायत कर्ता के पक्ष में पुलिस द्वारा ग़बन की गई राशि या अन्य किसी राशि का प्रोमिसरी नोट लिखवा कर शिकायत वापस लेने का अनुबंध शून्य है।

शादी के कंट्रेक्ट- किसी लड़की-या लड़के की शादी के लिए उस के पिता को धन देने का कंट्रेक्ट शून्य है। किसी शादी का संबंध कराने के लिए धन देने-लेने का कंट्रेक्ट शून्य है। किसी को पत्र आदि लिख कर शादी का वायदा करना और उस के साथ घूम-फिर कर लोगों के बीच यह प्रचारित कर देना कि उन की शादी होने वाली है एक वैध कंट्रेक्ट है, दूसरी स्त्री से विवाह कर लेने पर स्त्री को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार है।

गोद के कंट्रेक्ट- किसी महिला से यह अनुबंध करना कि वह कोई पुत्र गोद न लेगी। शून्य है। मासिक वृत्ति के लिए पुत्र को गोद देने का कंट्रेक्ट शून्य है।

जमानत जब्ती पर जुर्माने की राशि अदा करने का कंट्रेक्ट- इस तरह का कंट्रेक्ट लोकनीति के विरुद्ध होने से शून्य है। किसी व्यक्ति की जमानत देने के लिए धन लेने का कंट्रेक्ट शून्य है।

किसी लोक सेवक के साथ ऐसा कर्तव्य करने का कंट्रेक्ट जो उस के लोक सेवक का कर्तव्य करने में बाधक हो शून्य है।

किसी मुकदमे के निर्णय या डिक्री के निष्पादन में देरी करने के लिए प्रतिफल प्राप्त करने का कंट्रेक्ट शून्य है।

किसी वकील द्वारा मुकदमे के परिणाम पर आधारित फीस लेने का कंट्रेक्ट लोकनीति के विरुध्द होने के कारण शून्य है।

 

इस तरह अनेक प्रकार के कंट्रेक्ट हो सकते हैं। जिन्हें अदालत से शून्य घोषित कराया जा सकता है।

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