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जनहित याचिकाएँ क्या हैं?

Supreme Court Indiaगाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से अनुज त्यागी ने तीसरा खंबा से पूछा है कि वे एक जनहित याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं। इस के लिए उन्हों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री कार्यालय और मानवाधिकार आयोग को लिखा भी है। लेकिन कहीं से भी उचित उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। यहाँ तक कि मेरी प्रार्थना खारिज या मंजूर करने की सूचना भी नहीं  मिली। मैं जनहित याचिका प्रस्तुत करने की सही प्रक्रिया जानना चाहता हूँ जिस से में अपनी प्रार्थना न्यायालय तक पहुँचा सकूँ। त्यागी जी को जनहित याचिका प्रस्तुत करने की प्रक्रिया बताई जाए उस से पहले यह आवश्यक है कि वे जनहित याचिका क्या है यह जान लें। यहाँ इस आलेख में जनहित याचिका के बारे में सामान्य जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए किया गया कोई भी मुकदमा जनहित याचिका है। यह अन्य सामान्य अदालती मुकदमों से भिन्न है और इस में यह आवश्यक नहीं की पीड़ित पक्ष स्वयं अदालत में जाए।  यह किसी भी नागरिक द्वारा पीडितों के पक्ष में किया गया मुकदमा है। स्वयं न्यायालय भी किसी सूचना पर प्रसंज्ञान ले कर इसे आरंभ कर सकता है। इस तरह के अब तक के मामलों ने कारागार और बन्दी, सशस्त्र सेना, बालश्रम, बंधुआ मजदूरी, शहरी विकास, पर्यावरण और संसाधन, ग्राहक मामले, शिक्षा, राजनीति और चुनाव, लोकनीति और जवाबदेही, मानवाधिकार और स्वयं न्यायपालिका के व्यापक क्षेत्रों को प्रभावित किया है। न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका का विस्तार बहुत हद तक समांतर रूप से हुआ है और जनहित याचिका का मध्यम-वर्ग ने सामान्यत: स्वागत और समर्थन किया है। जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी कानून में परिभाषित नहीं है, यह उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न है।

जनहित याचिका का पहला प्रमुख मुकदमा 1979 में हुसैनआरा खातून और बिहार राय केस में कारागार और विचाराधीन कैदियों की अमानवीय परिस्थितियों से संबद्ध था। यह मामला एक वकील ने राष्ट्रीय दैनिक में बिहार के जेलों में बन्द हजारों विचाराधीन कैदियों के अमानवीय  हाल पर छपी खबर के आधार पर दायर किया गया था। मुकदमे के नतीजे में 40000 से भी अधिक कैदियों को रिहा किया गया। त्वरित न्याय को एक मौलिक अधिकार माना गया, जो उन कैदियों को नहीं दिया जा रहा था। इस सिद्धान्त को बाद के मामलों में भी स्वीकार किया गया।

2001 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), राजस्थान ने भोजन के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित चायिका दायर की। यह याचिका उस समय दायर की गई, जब एक ओर देश के सरकारी गोदामों में अनाज का भरपूर भंडार था, वहीं दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्सों में सूखे की स्थिति एवं भूख से मौत के मामले सामने आ रहे थे। इस केस को भोजन के अधिकार केस के नाम से जाना जाता है। भोजन के अधिकार को न्यायिक अधिकार बनाने के लिए देश की विभिन्न संस्थाएं, संगठन और ट्रेड यूनियनों ने संघर्ष किया है।  यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित व्यक्ति के जीने के अधिकार के आधार पर प्रस्तुत की गई थी।

एम सी मेहता और भारतीय संघ और अन्य (1985-2001) के मामले में न्यायालय ने आदेश दिया कि दिल्ली मास्टर प्लान के तहत और दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए  रिहायशी इलाकों से करीब एक लाख औद्योगिक इकाईयों को बाहर स्थानांतरित किया जाए। इस निर्णय ने वर्ष 1999 के अंत में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में औद्योगिक अशांति और सामाजिक अस्थिरता को जन्म दिया था, और इसकी आलोचना भी हुई थी कि न्यायालय द्वारा आम मजदूरों के हितों की अनदेखी पर्यावरण के लिए की जा रही है। इस मामले से करीब 20 लाख लोग प्रभावित हुए थे। एक अन्य जनहित मामले में उच्चतम न्यायालय ने अक्टूबर 2001 में आदेश दिया था कि दिल्ली की सभी सार्वजनिक बसों को चरणबद्ध तरीके से सिर्फ सीएनजी  ईंधन से चलाया जाए। यह माना गया कि सीएनजी डीजल की अपेक्षा कम प्रदूषणकारी है।

पिछले कुछ वर्षों में उच्चतम न्यायालय में भारत का नाम बदलकर हिंदुस्तान करने, अरब सागर का नाम परिवर्तित कर सिंधु सागर रखने और यहां तक कि राष्ट्रगान को बदलने तक के लिए जनहित याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। अदालत इन्हें ‘हस्तक्षेप करने वालों’ की संज्ञा दे चुकी है और कई बार इन याचिकाओं को खारिज करने का डर भी दिखाया जा चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें यूपी की सीएम मायावती को नोटों की माला पहनाए जाने के मामले की सीबीआई से जांच कराए जाने की मांग की गई थी। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने राय के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और उनकी पत्नी के खिलाफ दायर की गई उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसके तहत लोकायुक्त को इनके खिलाफ कथित डंपर (ट्रक) घोटाले की जांच में तेजी लाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन, जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस बीएस चौहान के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की गई। याचिका में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई गई है जिसमें लिव इन रिलेशन के मामले में राधा-कृष्ण का जिक्र किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वासित जीवन बिता रहे मशहूर पेंटर एम. एफ. हुसैन को अदालत या देश का प्रधानमंत्री भी भारत लौटने पर मजबूर नहीं कर सकता। यह कहते हुए अदालत ने हुसैन के खिलाफ देश में चल रहे आपराधिक मामलों को रद्द करने संबंधी जनहित याचिका भी खारिज कर दी।  इंदौर की एमजी रोड स्थित एक लाख वर्गफुट की आवासीय जमीन को मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह व अन्य उच्च अधिकारियों द्वारा कामर्शियल उपयोग के लिए करोड़ों में बेचे जाने का आरोप लगाने वाली याचिका को भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

PILन्याय पाने के लिए जनहित याचिकाओं और सूचना के अधिकार के तहत कानूनी प्रक्रिया में आई तेजी की तुलना संचार में मोबाइल टेलीफोन और इंटरनेट के विस्तार से की जा सकती है। लेकिन अब ये भय भी सताने लगा कि ये याचिकाएँ महज वक्त की बरबादी करने का साधन भर न बन जाएँ। देश की सर्वोच्च अदालत दशक भर से कई मामलों में इस तरह की याचिकाओं की कड़ी आलोचना भी कर चुकी है। अदालत इन्हें ‘हस्तक्षेप करने वालों’ की संज्ञा दे चुकी है और कई बार इन याचिकाओं को खारिज करने का डर भी दिखाया जा चुका है।

अदालत ने जब न्यायिक क्षेत्र के दायरे की समीक्षा की, तब पाया कि गरीबी, अनदेखी, भेदभाव और निरक्षरता की वजह से समाज के एक बड़े तबके की न्याय तक पहुंच ही नहीं है। तब अदालत ने कहा था, ‘गरीब, वंचित, कमजोर और भेदभाव के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए यह अदालत जनहित याचिका की शुरुआत करती है और इसे और मजबूत बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।’ लेकिन जब निरर्थक याचिकाएँ भी प्रस्तुत होने लगीं तो सर्वोच्च न्यायालय को कुछ नियम भी तय करने पड़े। जैसे अदालतें वास्तविक जनहित याचिकाओं को पूरी गंभीरता दें और उतनी ही गंभीरता से गलत मकसद से दायर की गई याचिकाओं को नकारें। जनहित याचिका पर सुनवाई से पहले याचिका दाखिल करने वाले व्यक्ति की भी अच्छी तरह से जांच परख करनी चाहिए। अदालत को पहले ही याचिका की विषयवस्तु और उससे जुड़े जनहित की समीक्षा करनी चाहिए।

अदालतें यह भी करें कि अमुक जनहित याचिका का सरोकार किसी दूसरी जनहित याचिका से ज्यादा है, ऐसे में अधिक सरोकार वाली याचिका को वरीयता मिलनी चाहिए। अदालत को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी जनहित याचिका से जनता में असंतोष के स्वर न उभरें। इसके साथ ही अदालतों को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कोई जनहित याचिका किसी के व्यक्तिगत फायदे से तो नहीं जुड़ी है। यह भी कि अदालतों को बेवजह की याचिकाओं को नहीं सुनना चाहिए। इसके लिए उन पर आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

अब त्यागी जी को समझ आ गया होगा कि जनहित याचिका क्या है? प्रक्रिया के बारे में हम उन्हें यह बता सकते हैं कि उन के पत्रों का उत्तर देने के लिए कोई भी न्यायालय, प्रधानमंत्री कार्यालय या अन्य कोई कार्यालय बाध्य नहीं है। यदि न्यायालय को लगता कि उन का पत्र महत्वपूर्ण है तो वह मामले पर प्रसंज्ञान ले लेता। फिर भी उन्हें लगता है कि जो मामला वे उठाना चाहते हैं वह महत्वपूर्ण और संवेदनशील है तो वे स्वयं उच्चतम न्यायालय अथवा किसी उच्च न्यायालय के समक्ष अपना मामला उठा सकते हैं। इस के लिए उन्हें वही सब कुछ करना होगा जो एक सामान्य रिट याचिका प्रस्तुत करने के लिए किसी को करना पड़ता है। इस मामले में वे किसी वकील से व्यक्तिगत रूप से मिलें। इस काम में समय और धन दोनों खर्च होंगे। समय तो उन्हें खुद ही देना पड़ेगा धन के लिए वे कुछ अन्य लोगों या संस्था को इस काम में जोड़ सकते हैं या फिर वे स्वयं खर्च कर सकते हैं।  जनहित याचिकाओं पर कुछ अच्छी किताबें उपलब्ध हैं। किसी को भी जनहित याचिका प्रस्तुत करने के पहले इन में कोई एक किताब चुन कर अवश्य पढ़ लेनी चाहिए।

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