Legal Remedies Archive

समस्या-

गौरव मिश्रा ने ग्राम-मोहान, जिला-कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मने और हमारे बड़े भाई जी ने हमारे बड़े ताऊ जी यानी हमारे पिता जी के बड़े भाई से 12.02.2004 को उनके भूमि के 1/2 भाग यानि उनकी संपूर्ण जमीन का पंजीकृत बैनामा कराया था। जिसका दाख़िल ख़ारिज भी हो चुका था। हमारे ताऊ जी का यानी विक्रेता का सन 2015 में स्वर्गवास हो चुका है, अब विक्रेता (ताऊ जी) की इकलौती विवाहित पुत्री कहती है कि हमारे पिता से बैनामा धोखे से फर्ज़ी तरीके से के करा लिया गया है।  उसने किसी के कहने पर पर हमारे खिलाफ (दीवानी न्यायलय) में बैनामा निरस्त करने के लिए 23.02.2018 को मुकदमा डाल दिया है, यानी बैनामा होने के 14 वर्ष बाद।  हम यह जानकारी चाहते हैं कि बैनामा होने के कितने वर्ष बाद तक बैनामा निरस्त कराने के लिये मुकदमा डाला जा सकता है, और जो हमारा मुकदमा चल रहा है उसे ख़ारिज कैसे करायें, जिससे हमारा समय और पैसे बर्बाद ना हो?

समाधान-

प ने और आप के भाई ने अपने ताऊजी से जमीन खरीद ली, उस के विक्रय पत्र का पंजीयन हो गया। इस पंजीयन के 14 वर्ष बाद ताऊजी की पुत्री ने उस विक्रय को धोखे से, फर्जी तरीके से कराने का आरोप लगाते हुए दीवानी वाद संस्थित किया है। आम तौर पर इस तरह का वाद दस्तावेज के निष्पादन की तिथि अर्थात पंजीयन की तिथि के तीन वर्ष की अवधि के भीतर ही किया जा सकता है, उस के उपरान्त नहीं। उस के उपरान्त ऐसा वाद दाखिल होने पर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण ग्रहण के योग्य ही नहीं रहता है और न्यायालय ऐसे वाद को पंजीकृत करने के पूर्व ही निरस्त कर सकता है। लेकिन आप के मामले में वाद को पंजीकृत भी किया गया है और आप को उस के समन भी प्राप्त हो चुके हैं। इस से स्पष्ट है कि वाद को निर्धारित अवधि में लाने के लिए कुछ न कुछ कथन वाद-पत्र में किए गए होंगे। आप को वे कथन यहाँ अपनी में हमें बताने चाहिए थे। जिस से समाधान करने में हमें सुविधा होती।

ह तो स्पष्ट है कि आप के विरुद्ध विक्रय पत्र के पंजीयन को निरस्त कराने के लिए फ्रॉड/ जालसाजी करने का आधार लिया गया है। इस के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 17 में अलग से उपबंध दिए गए हैं। इस में यह कहा गया है कि यदि जालसाजी या किसी त्रुटि से निर्मित किए गए दस्तावेज को प्रतिवादी ने ही छुपा कर रखा है तो उस मामले में लिमिटेशन तब आरंभ होगी जब कि जालसाजी से निर्मित दस्तावेज की जानकारी वादी को होगी। आप के मामले में वाद प्रस्तुत करने के लिए इसी उपबंध का सहारा लिया गया प्रतीत होता है।

दि आप ने भूमि का क्रय करने के बाद दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं किया है और अपने पास रखा है तो निश्चित रूप से आप के ताऊ की पुत्री को तभी उस की जानकारी हुई होगी जब ताऊ जी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति  को उन की पुत्री ने अपने नाम नामांतरण कराना चाहा होगा और जमीन का रिकार्ड देखा होगा। इस तरह आप के ताऊजी की मृत्यु से तीन वर्ष की अवधि में आप के विरुद्ध वाद फ्रॉड के आधार पर ही लाया जा सकता था।

ब इस वाद का समापन केवल और केवल दोनों पक्षों की साक्ष्य के उपरान्त ही किए गए निर्णय से ही हो सकता है। इस का कोई शॉर्टकट नहीं है। मुकदमा आप को लड़ना होगा। उस की अपील भी लड़नी होगी। तब तक लड़ना होगा जब तक खुद वादिनी थक हार कर घर नहीं बैठ जाती है। इस के सिवा कोई उपाय नहीं है।

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समस्या-

टीकाराम राठौर ने एलबीएस नगर, लिंक रोड-03, तहसील व जिला विदिशा – 464001, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मैं एक ऑटोमोबाइल्स की मायकार (भोपाल) प्राइवेट लिमिटेड में लेखपाल के पद पर दिनांक 25 जुलाई 2011 से कार्य कर रहा था। लेकिन 24 अप्रैल 2018 को कंपनी के एच आर ने मुझे ईमेल करके बताया कि मेरी सेवा दिनांक 30 अप्रैल 2018 को समाप्त की जाती है। बजह बताई गई कि मैंने मालिक से फोन पर गलत तरीके से बात की, जो कि बिल्कुल झूठ बताया गया। खैर, मैंने अपना सारा हिसाब मैनेजमेंट को 27 अप्रैल को सौंप दिया हस्ताक्षर के साथ प्रति भी ले ली। मैंने श्रम विभाग विदिशा में शिकायत कर दी वहां से मुझे ग्रैच्युटी की राशि कपनी ने दे दी, सहमति से परंतु मेरा मार्च, अप्रैल माह का वेतन नहीं दिया गया। श्रम विभाग से भी सिर्फ फॉर्मेलटी की जा रही थी। अब श्रम विभाग मेरा केस श्रम न्यायलय भोपाल को भेज रहा है। मैं आपसे जानना चाहता हूं कि मुझे अब क्या करना चाहिए? -मेरी दो माह मार्च,अप्रैल की सैलरी,117 दिन की बकाया छुट्टी, पीएफ भी काटा गया पर ईपीएफ खाते में जमा नहीं किया। बिना नोटिस के निकाल दिया नौकरी से। कुछ लोगों का कहना है कि केस करोगे तो वकील पैसे खीचेंगे और कुछ नहीं होगा। अब मुझे क्या करना चाहिए जिससे मेरा हक मुझे मिल सके?

समाधान-

प को जिस तरीके से नौकरी से निकाला है वह एक स्टिग्मेटिक टर्मिनेशन (दोष मंढ़ते हुए की गयी सेवा समाप्ति) है। बिना आरोप पत्र दिए और जाँच कराए की गयी ऐसी सेवा समाप्ति वैध नहीं है। इसे चुनौती दी जा सकती है और देनी चाहिए। आजकल सेवा की समाप्ति से संबंधित औद्योगिकक विवाद के लिए उपाय यह है कि श्रम विभाग में आप अपनी शिकायत प्रस्तुत करें, शिकायत प्रस्तुत करने के 45 दिनों में शिकायत का कोई परिणाम नहीं निकलने पर श्रम विभाग से शिकायत का प्रमाण पत्र प्राप्त कर सीधे श्रम न्यायालय में अपना विवाद प्रस्तुत करें। श्रम न्यायालय में सेवा की समाप्ति से संबंधित  विवाद का न्याय निर्णयन हो कर अधिनिर्णय पारित कर दिया जाएगा। अब इस के लिए आप वकील करेंगे तो उस की फीस तो देनी होगी। वकील की फीस के अतिरिक्त विभिन्न खर्चों का सवाल है वह मात्र 500-1000 रुपए से अधिक नहीं होंगे। आप अपने वकील से इस काम की पूरी फीस एक बार में तय कर लें और धीरे धीरे देते रहें। वकील अच्छा करें, घटिया वकील न करें।

प का दो माह का वेतन अदा नहीं किया गया है तो उस की वसूली के लिए श्रम विभाग में वेतन भुगतान अधिकारी के यहाँ वेतन अदायगी का प्रार्थना पत्र वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत कर दें। बकाया अवकाश की राशि भी इसी प्रार्थना पत्र में जोड़ी जा सकती है।

पीएफ अंशदान की कटौती आप के वेतन से करने के उपरान्त उसे पीएफ स्कीम में जमा न करना अमानत में खयानत का अपराध है। आप अपना पीएफ नंबर अंकित करते हुए इस बात की शिकायत पीएफ कमिश्नर को कर सकते हैं। विभाग आप के नियोजक के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट करवा सकता है। यदि विभाग कोई कार्यवाही न करे तो आप पुलिस को एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं, पुलिस के भी कोई कार्यवाही न करने पर आप स्वयं संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सीधे परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

सफसइस

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समस्या-

वंदना श्रीवास्तव ने सागर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पति ने अपनी पहली पत्नी के होते हुए मेरे से शादी की। मुझे उनकी पहली पत्नी के बारे मे कुछ भी जानकारी नहीं थी। उनके दो बच्चे भी हैं। अब वो मुझे छोड़ कर अपनी पहली पत्नी के साथ रहते हैं और उनकी पहली पत्नी मुझे गंदा गंदा गाली गुफ्ता करती है। मेरे भी दो बेटे हैं, मेरे पति कभी भी मुझे ज़रूरत भर का पैसा नहीं देते हैं और लिए मे मेरा पूरा गहना जो मेरे मा पापा दिए थे वो भी ले लिए हैं. क्या मेरा और मेरे बच्चो का उनके या उनकी संपाति पे कोई अधिकार न्ही है? मुझे कुछ सुझाव दीजिए कि मैं क्या करूं?

समाधान-

वंदना जी, यह तो हो सकता है कि आप को  विवाह के पहले पति की पहली पत्नी और उस के बच्चों के बारे में पता नहीं हो। पर आप को अपने खुद के दो बच्चे होने तक पता नहीं लगा हो। आप आज यह शिकायत तब कर रही हैं जब आप को इस विवाह से खुद के और बच्चों के पालन पोषण में समस्या आने लगी है। कानून का कायदा है कि जब भी आप को पता लगे कि आप के साथ कुछ अन्याय हुआ है, कोई अपराध हुआ है आप तुरन्त कानून की मदद लें। जितना आप देरी करती जाएंगी आप के लिए कानूनी उपाय मुश्किल होता जाएगा। अब यह साबित करना बहुत कठिन है कि पहली पत्नी और बच्चों के बारे में आप को अब पता लगा हो। यदि आप पहली पत्नी और बच्चों के बारे में जानकारी होते ही पुलिस को रिपोर्ट करती तो वह आप के पति का अत्यन्त गंभीर अपराध था उन्हें सजा हो सकती थी।

ह आप स्पष्ट रूप से से समझ लें कि पहली पत्नी होते हुए आप के साथ किया गया विवाह वैध नहीं है और आप को वैध पत्नी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं। लेकिन आप के दोनों बच्चें वैध हैं उन्हें अपने पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है इस के लिए वे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में तथा संरक्षक एवं पतिपाल्य अधिनियम के अंतर्गत भरण पोषण के लिए प्रतिमाह धनराशि प्राप्त करने के लिए कार्यवाही कर सकते हैं। वे यदि नाबालिग हैं तो उन की ओर से आप को अपने पति के विरुद्ध कार्यवाही करने का आधिकार है, यह कार्यवाही आप कर सकती हैं।

प भी अपने पति के साथ रही हैं या फिर पति आप के पास रहे हैं, इस कारण से आप भी अपने पति से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं और उन से अपने व बच्चों के लिए पृथक आवास की व्यवस्था करने और आप के खुद के भरण पोषण के लिए मासिक राशि निश्चित करवा सकती हैं।

प के पति के बच्चों को वे चाहें पहली पत्नी से हों या फिर आप से उन्हें या आप को या आप के पति की पहली पत्नी को पति की स्वअर्जित संपत्ति पर उ नके जीतेजी कोई अधिकार नहीं है। लेकिन यदि वे उन की मृत्यु के समय कोई संपत्ति बिना वसीयत किए छोड़ते हैं तो उस संपत्ति में आप के दोनो बच्चों और पहली पत्नी और उस के बच्चों को समान अधिकार प्राप्त होगा, प्रत्येक को 1/5 हिस्सा मिलेगा। लेकिन उस संपत्ति में आपका कोई अधिकार नहीं होगा। यदि कोई पुश्तैनी संपत्ति है और उस में आप के पति का हिस्सा है तो उस  में आप के बच्चे हिस्सा मांग सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं। उन्हें उस संपत्ति मे हिस्सा प्राप्त होगा या नहीं यह अभी नहीं कहा जा सकता क्यों कि इस मामले में दोनों तरह की राय न्यायालयों ने व्यक्त कर रखी है। पर हमारे हिसाब से अवैध पत्नी के बच्चों को भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।

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मुकदमों में देरी अदालतों की बहुत कम संख्या के कारण होती है।

December 5, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

संजु देवी ने गांव- ऱानोली, तहसील- खाटुश्यामजी, जिला- सीकर, राजस्थान से पूछा है-,

मैं अपने पिता की सबसे छोटी पुत्री हूँ। मेरे पिता की मौत बचपन में हो चुकी थी। शादी के बाद मैंने पिता की पैतृक संपति में हिस्से का वाद दो साल पहले कर दिया था। लेकिन मेरे भाई ने अभी तक न्यायालय में कोई जवाब नहीं दिया। इस तरह मेरे केस को कमजोर कर दिया गया है? न्यायालय के स्टे के बाद भी मेरी माँ का सम्पूर्ण भूमि से हकत्याग करवा कर अपने नाम पर चढवाने की कोशिश की गई है।  लेकिन मैंने पटवारी को पूरी बात बताकर उस हकत्याग को निरस्त करवाने के लिये एक और वाद दायर किया है, अब मेरी मॉ चल बसी है। क्या मेरे केस का कुछ भविष्य है? स्टे के बाद भी वो लोग मुझे नुकसान पहुँचाने की पूरी कोशिशें कर के मुझे एक तरह से बेदखल करना चाहते हैं। सर मार्गदर्शन देवे।

समाधान-

प की समस्या भारत के तमाम न्यायार्थियों की समस्या है।  हमारे देश में न्यायालयों की बहुत कमी है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 140 से अधिक अदालतें हैं, जब कि भारत में 10 लाख की आबादी पर केवल मात्र 12-13 अदालतें हैं। ऐसी स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका के मुकाबले में हमारी अदालतों पर 10 गुना से भी अधिक मुकदमों के निपटारे का बोझा है। हमारे यहाँ कम अदालतें होने का एक कारण यह है कि हमारी सरकारें अदालतों की संख्या को बढ़ाने पर कोई रुचि नहीं लेतीं क्यों कि वे समझती हैं कि अदालते बढ़ा देने से उनकी पार्टी को अगले चुनाव में मिलने वाले वोटों में कोई इजाफा नहीं होने वाला है। वे सारे फण्डस को इस तरह उपयोग में लेते हैं जिस से वे अगले चुनाव में वोट प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल कर सकें।

दालतें इन मुकदमों को निपटाने के लिए कोशिश भी करती है। अधिक मुकदमे होने और पुराने मुकदमों की भरमार होने के कारण नए मुकदमों में जरा जरा सी बात के लिए पेशी की तारीख बदल दी जाती है। इस वर्ष उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने सभी अधीनस्थ न्यायालयों को निर्देश दिए हैं कि वे साल के अंत तक 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों का निपटारा कर दें। इस के बावजूद बहुत सी अदालतें ऐसी हैं जहाँ 20 वर्षे से अधिक पुराने मुकदमो का निपटारा भी नहीं हो सकेगा।

प के मामले में हो सकता है कि आपके भाइयों ने अदालत के सम्मन लेने में ही देरी की हो। इस कारण कुछ पेशियाँ हो गयी हों वर्ना अब यह नियम है कि प्रतिवादी की तामील होने के 90 दिनों के भीतर उसे अनिवार्य रूप से जवाब दावा पेश करना होगा। यदि 90 दिनों के भीतर जवाब दावा पेश न हुआ हो तो आप अदालत पर दबाव बनाएं कि वह प्रतिवादीगण के जवाब के अवसर को समाप्त करते हुए आगे की कार्यवाही करे।

प सोच रही हैं कि देरी करने से आप का मुकदमा कमजोर हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है। बस आप यह ध्यान रखें कि आप का वकील अच्छा हो और पैरवी में किसी तरह की कमजोरी या भूल न हो। यह आप की स्वयं की मुस्तैदी से ही संभव है। नतीजें में देरी हो सकती है लेकिन  नतीजा आप के पक्ष में आएगा।

हाँ तक पूरी न्याय व्यवस्था को गति प्रदान करने की बात है तो उस के लिए जरूरी है कि जनता का दबाव भी राजनेताओँ और राज्य सरकार पर होना चाहिए। अभी अवय्स्क बालिकाओं के प्रति यौन अपराधों के मामले में दबाव था तो सरकारों को इस तरह की नयी अदालतें बड़ी संख्या में खोलनी पड़ीं हैं। इस से उस तरह के अपराधों में साल-छह माह में ही फैसले आने लगेंगे। इसी तरह का दबाव समूची न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पड़े तो बात बन सकती है, पर वह पूरे देश के स्तर का मसला है।

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समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मारे दादा जी ने ज़मीन खरीदी उस वक़्त के उनके हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी रजिस्ट्रार ऑफिस में किए थे। लेकिन जब हम ने इस के बारे मे हमारे भाइयों से पूछा तो उन्होने कहा कि ये ज़मीन हमारे दादा जी ने उनको बेच दी थी। फिर जब हम ने बेचान की रजिस्ट्री की कॉपी निकलवाई तो पता चला कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री में उन के सिग्नेचर हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी मैच नहीं करते हैं। इस की हम ने एफएसएल जाँच भी करवायी है. एफएसएल की रिपोर्ट में भी ये मैच नहीं हुए हैं। कृपया हम को बताएँ कि हम क्या कर सकते हैं।

समाधान-

किसी भी मामले में कानूनी सलाह लेते समय यह आवश्यक है कि जिस विधि विशेषज्ञ से आप सलाह ले रहे हैं उस के समक्ष सभी तथ्य रखे जाएँ। आपने आपके इस मामले में दादाजी द्वारा जमीन खरीदे जाने के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि तथा फिर दादाजी द्वारा भाइयों के नाम किए गए विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि नहीं बताई है। एफएसएल की रिपोर्ट कब आई है इस की तिथि भी नहीं बताई है। हर उपाय प्राप्त करने के लिए न्यायालय के ममक्ष कार्यवाही करे की एक निश्चित समयावधि होती है और कोई भी उपाय केवल सही समय पर नहीं करने के कारण असफल हो सकता है।

हली बात आप को यह देखनी चाहिए कि जब आप के दादा जी ने जमीन खरीदी थी तब रजिस्ट्री पर उन के हस्ताक्षर हुए थे क्या? यदि उन के हस्ताक्षर उस रजिस्ट्री पर हुए थे तो बेचान की रजिस्ट्री पर हुए उन के हस्ताक्षर पूर्व के हस्ताक्षरों से मिलने चाहिए थे और साथ ही अंगूठा निशानी भी मेल खानी चाहिए थी। इस का एक ही अर्थ हो सकता है कि भाइयों ने किसी अन्य व्यक्ति को आपके दादाजी बना कर रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली हो। यदि इस की जरा सी भी संभावना है तो यह गंभीर अपराध है क्यों कि इस में फर्जी दस्तावेज का निर्माण कर के छल हुआ है। इस में अनेक अपराध एक साथ हुए हैं।आप इस की रिपोर्ट पुलिस को करवा सकते हैं और पुलिस के कार्यवाही न करने पर परिवाद प्रस्तुत कर सीधे न्यायालय को कह सकते हैं कि इस मामले को दर्ज कर पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाए।

दि आप को पक्का है कि जो रजिस्ट्री आपके दादा की ओर से भाइयों के नाम हुई है वह फर्जी है और उस में छल हुआ है तो आप इसी आधार पर उस कूटरचित रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं और जमीन का बंटवारा करा कर अपने हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिए जाने के लिए राजस्व न्यायालय में विभाजन का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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समस्या-

अजय कोशले ने तिकरापारा, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मै शासकीय सेवा मे साल 2009 से कार्यरत हूँ। मेरे सेवा में आने के लगभग 9 साल बाद मेरा पुलिस चरित्र सत्यापन कराया गया जिस में मेरे विरुद्ध साल 2007 में (जुआ एक्ट-13 क) के तहत 100 रुपये का अर्थदंड होना पाया गया। अनुप्रमाणन फार्म भरते समय इस बात का ध्यान न रहने के कारण मेरे द्वारा अनुप्रमाणन फार्म में इस तथ्य दर्शाया नही गया था। अब इस बात की वजह से मेरे विभाग मे मुझे सेवा से वंचित कर दिया जाऊंगा, इस तरह की बाते हो रही है। कृपया मुझे मार्गदर्शन देने का कष्ट करें कि क्या मै सेवा में रहने योग्य हूँ अथवा नहीं? इस तथ्य से संबंधित यदि कोई क़ानूनी नियम अथवा न्यायालयीन आदेश है तो कृपया मुझे अवगत कराए जाने का विनम्र निवेदन है, जिससे मुझे सेवा से वंचित न किया जा सके।

समाधान-

भी आप का पुलिस चरित्र सत्यापन विभाग द्वारा कराया गया है, इस सत्यापन की वजह क्या है यह आपने यहाँ नहीं बताई है। केवल इस तरह के सत्यापन में आप के बताई वजह से आप को दोषी पाने और 100 रुपए के अर्थदंड़ से दंडित किए जाने का तथ्य आया है। अब आप को यह चिन्ता सता रही है कि आप ने इस तथ्य को पूर्व में अनुप्रमाणन फार्म में प्रदर्शित नहीं किया था और इस वजह से आप को सेवा से वंचित कर दिया जाएगा।

किसी भी शासकीय कर्मचारी को जो विगत 9 वर्ष से सेवा में इतनी आसानी से नौकरी से नहीं हटाया जा सकता। इस के पहले यह जाँच की जाएगी कि क्या किसी कर्मचारी को अनुप्रमाणन फार्म में यह तथ्य बताना जरूरी था, और क्या यह तथ्य कर्मचारी ने जानबूझ कर छुपाया है? यदि यह माना जाता है कि कर्मचारी द्वारा यह तथ्य अनुप्रमाणन में बताना जरूरी था और उसे जानबूझ कर छुपाया गया है तो फिर आप को कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा। तभी आप की असली चिंता आरंभ होगी।

ब आप को ऐसा कोई कारण बताओ नोटिस मिले या आरोप पत्र मिते तो तुरन्त किसी अच्छे वकील से मिल कर उस का जवाब लिखाएँ, जरूरत हो तो जवाब को प्रमाणित करने के लिए शपथ पत्र और दस्तावेज भी उस के साथ संलग्न करें। हमारा मानना है कि मात्र इस कारण से आप की नौकरी नहीं छीनी जा सकती है। फिर भी सतर्क रहना जरूरी है। यदि आप को कारण बताओ नोटिस मिलता है तो आप तीसरा खंबा पर उस के तथ्य बताते हुए पुनः समाधान के लिए अपनी समस्या भेज सकते हैं।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

समस्या-

इन्‍द्र कुमार कंचनवार ने ग्राम बरघाट, ‍जिला सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता की दो पत्नियां थी।  एक पत्नी से 1 संतान। पहली पत्नू की मृत्‍यु के बाद मेरी माता जी से विवाह हुआ जिन से 2 बेटी एवं 2 बेटे हुए। मेरी सौतेली बहन को उसका हिस्‍सा 1974 में जब मेरा जन्‍म भी नहीं हुआ था, त‍ब उसे दे ‍दिया गया था ‍किन्‍तु उसे ‍बिक्री पत्र के माध्‍यम से ‍हिस्‍सा दिया गया। चूंकि मेरे पिता जी अनपढ थे, उन्‍हे लोगों न जबरन बहका दिया कि कहीं उस सौतेली संतान से तुम्‍हारा पुत्र वापस न जमीन ले ले इसलिए उसे रजिस्‍टरी कर के दे दो, ताकि वह वापस न ले सके। इसके बाद बहुत सालों तक अच्‍छा चल रहा था। ‍किन्‍तु बाद में हमारी सौतेली बहन से न बन पाने के कारण, वह अपना ‍हिस्‍सा लेना चाह रही है। ‍किन्‍तु मेरी ‍पिता जी ने अपने जीते हुए बाकी बची हुए जमीन को सन 1987 में हम दो भाईयों को आपसी बटवारा नामा के नाम से रजिस्‍टर्ड करवा के बटवारा कर ‍दिया गया है। क्‍या वह ‍हिस्‍सा ले सकती है। उसका नाम ‍रिकार्ड में कभी भी नहीं रहा है और न ही है कृपया समस्‍या का हल बताने का कष्‍ट करें।

समाधान-

पनी संपत्ति का जो हिस्सा आप के पिता ने आप की सौतेली बहिन को स्थानांतरित किया उसे आप हिस्सा कह रहे हैं, अपनी सुविधा से क्यों कि लिखित में तो वह बिक्री-पत्र है। आप की सौतेली बहिन उसे गिफ्ट भी कह सकती है। इस तरह तो विवाद सुलझने से रहा।

प के पिता की यह संपत्ति स्वअर्जित है तो फिर जो उन्हों ने रजिस्टर्ड बंटवारा नामा किया है वह अंतिम है। इस बंटवारे के कारण पिता की मृत्यु के समय आप के पिता के नाम कोई संपत्ति शेष रही नहीं थी तो आप की बहिन किस में हिस्सा मांगेगी?  किसी की मृत्यु के समय कोई संपत्ति या ऋण न हो तो उसका उत्तराधिकार भी नहीं हो सकता।आप की बहिन केवल आप को धमका सकती है, दिखाने को शिकायत मुकदमा कर सकती है पर उसे मिलेगा कुछ भी नहीं।

लेकिन यदि आप के पिता की संपत्ति पुश्तैनी-सहदायिक है अर्थात वह 17 जून 1956 के पहले किसी पूर्वज से आप के पिता या उन के पूर्वज को उत्तराधिकार में मिली थी तो स्थिति कुछ विकट हो सकती है। वैसी स्थिति में उस संपत्ति में से आप के पिता बेटी को केवल अपने हिस्से के बराबर ही हस्तांतरित कर सकते थे उस से अधिक नहीं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह हस्तांतरण कब किया गया था। आप  की सौतेली बहिन यदि हिस्से का दावा करती है तो उसे पूर्व में हस्तांतरित संपत्ति का प्रश्न भी उठेगा क्यों कि हिस्से का दावा तो तभी किया जा सकता है जब कि वह पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो। हमें नहीं लगता कि आप की सौतेली बहिन अब कोई हिस्सा ले सकती है। हाँ दावे के बहाने आप से अदलतों में कसरत जरूर करवा सकती है। जब वह दावा करें तब किसी अच्छे वकील से सलाह लीजिएगा।

में लगता है कि आप की सौतेली बहिन आप के व्यवहार से नाराज है। हो सकता है कभी किसी शादी ब्याह में उसे पर्याप्त मान न मिला हो।  बहिनें मान मनौवल से मान जाती हैं। तो उसे मान दीजिए, पिछली गलती के लिए माफी मांग लें। उसी से आप का काम बन जाएगा।

समस्या-

नितिका चौहान ने ग्राम खेडली, पोस्ट भद्रबाद, जिला हरिद्वार, उत्तराखंड से पूछा है-

मेरा जन्म 1992 में हुआ था। मेरे मेरे दादाजी के दो पुत्र मेरे ताऊजी आदित्य कुमार और मेरे पिताजी रविंद्र कुमार थे। मैं रविंद्र कुमार जी की इकलौती संतान हूँ। मेरे पिताजी रविंद्र कुमार जी का देहांत 1994 में हो गया था।  उसके पश्चात मेरे दादा जी का देहांत 2011 में हो गया। मेरे दादाजी के बैंक खाते में जो धनराशि थी, मेरे दादाजी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी ने उसको निकाल लिया और उसमें मुझे कोई हिस्सा नहीं दिया। मुझे बैंक जाकर पता चला कि मेरे ताऊजी ने परिवार रजिस्टर की जो नकल वहां लगाई थी उसमें मेरे ताऊजी ने मुझे अपनी पुत्री दर्शाते हुए बैंक खाते से धनराशि प्राप्त कर ली है।  मैं जानना चाहती हूं कि क्या उस धनराशि पर मेरा भी उतना ही हक था, जितना कि मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी का था।

समाधान-

बिलकुल आप ने सही कहा। उस धनराशि पर आप का उतना ही अधिकार था जितना की आप के ताउजी को था। किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत तय होता है। धारा 8 में सब से पहले उन लोगों का बराबर का अधिकार होता है जो अधिनियम की अनुसूची की प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हों। उस में पुत्र और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र-पुत्री एक साथ रखे गए हैं। क्यों कि आप अपने पिता की इकलौती संतान हैं तो आप का अपने दादाजी की संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि आप के ताऊजी को है।

बैंक किसी भी प्रकार से आप के ताऊ जी को यह धन नहीं देता और उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की मांग करता। लेकिन आप के ताऊजी ने आप को अपनी पुत्री बता दिया। जीवित पुत्र की पुत्री तो प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी नहीं है इस कारण बैंक ने वह धन आप के ताऊजी को दे दिया।

लेकिन इस तरह गलत सूचना दे कर बैंक से धन प्राप्त करना धारा 402 भारतीय दंड संहिता व अन्य कुछ धाराओं के अंतर्गत अत्यन्त गंभीर अपराध है। यदि आप पुलिस में रिपोर्ट करें या पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद करें और आप के ताऊजी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित हो तो उन्हें हर हाल में कारावास की सजा हो जाएगी।

स के अतिरिक्त आप जितना धन आप के ताऊजी ने बैंक से प्राप्त किया है उस के आधे धन और वह धन प्राप्त करने से लेकर उस की अदायगी तक के ब्याज प्राप्त करने के लिए आप दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

समस्या-

हरगोबिंद सिंह ने ग्राम पो. मालारामपुरा, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से पूछा है-

त्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने किसी महिला से शादी कर ली, तो इस पुरुष की मौत के बाद इस दूसरी जीवित पत्नी का जमीन-संपत्ति पर क्या हक होगा? मृत पुरुष के दोनों पत्नियों से दो-दो बच्चे इसी पुरूष की संतान हैं।

समाधान-

पुरुष ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह किया है इस तरह दूसरी पत्नी उस की उसी तरह वैध पत्नी है जैसे पहली पत्नी वैध थी। इस कारण इस दूसरी पत्नी को वही अधिकार प्राप्त होंगे जो अधिकार पहली पत्नी को उस के पति के मरने के बाद हासिल होते।

इस पुरुष की दो  संतानें पहली पत्नी से और दो ही संतानें दूसरी पत्नी से हैं। इस कारण से उस की चारों ही सन्ताने भी वैध संतानें हैं। दूसरी पत्नी से उत्पन्न होने वाली संतानों को भी उसी तरह अधिकार प्राप्त होंगे जैसे पुरुष की पहली पत्नी से मृत्यु नहीं हुई थी और बाद वाली दोनों संतानों का जन्म भी पहली पत्नी से ही हुआ है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से मृत हिन्दू पुरुष का उत्तराधिकार तय होगा। यदि खेती की जमीन है तो उस का उत्तराधिकार भी धारा 8 से ही तय होगा। इस धारा के अनुसार माता (यदि जीवित हो तो), पत्नी और सभी सन्तानों को बराबर उत्तराधिकार प्राप्त होगा। आप के मामले में लगता है कि माता जीवित नहीं है। वैसी स्थिति में प्रथम श्रेणी के पाँच उत्तराधिकारी हैं। चारों संतानें और पत्नी। पाँचों में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। खेती की जमीन में मृत्यु के कारण खुलने वाले नामान्तरण (फौती इन्तकाल) में पाँचों के नाम 1/5 हिस्सा दर्ज होगा। शेष अचल संपत्ति में भी पाँचो को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

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