कब्जा Archive

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

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समस्या-

स्वाति साहू ने राजा तालाब, गाँधी चौक, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे दादा जी ने अपने स्वयं के पैसे से लिये हुए मकान में मेरी बेवा माता जी और हम पांच बहनों को अपने साथ रखा है, पिछले 30 साल से। दादा जी का निधन होने पर मेरे बड़े पापा और चाचा हम लोगों को घर खाली करने के लिए धमकी दे रहे हैं। दादा जी ने मम्मी के नाम पर वसीयत किये हैं। पर वो रजिस्टर्ड नहीं हुआ है, नोटरी से अटेस्टेड कराया है। जो कि तहसील में मान्य नही है। हमे क्या करना चाहिए जिससे हमें कोई घर से निकाल न पाए?

समाधान-

दादाजी की वसीयत के अनुसार मकान आप की मम्मी का है और आप को वहाँ से निकाला जाना गैर कानूनी होगा। इस कारण से आप सभी वहाँ से निकलने से साफ मना कर दें। बड़े पापा और चाचा वगैरा से कह दें कि वे यदि यह समझते हैं कि वे मकान खाली कराने के अधिकारी हैं तो अदालत में दावा करें, यदि अदालत से फैसला हो जाता है कि मकान हमें खाली करना होगा तो कर देंगे। पर किसी के कहने से न करेंगे।

किसी भी वसीयत का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है, यहाँ तक कि किसी स्टाम्प पेपर तक पर होना जरूरी नहीं है। वसीयत एक खाली कागज पर भी लिखी जा सकती है। आप को किस ने कह दिया कि यह तहसील में मान्य नहीं है? वसीयत पर वसीयत करने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए और दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए जिन की उपस्थिति में वह वसीयत की गयी हो. नोटेरी से अटेस्टेशन हुआ है इस से नोटेरी एक और गवाह हो गया है तथा नोटेरी का रजिस्टर वसीयत के सही होने का एक ठोस सबूत है। इस वसीयत को आप लोग जब भी कोई मुकदमा चलेगा तब अदालत में गवाहों के बयान से प्रमाणित करा सकते हैं।

आप के चाचा ताऊ को उन के पिता की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने का आधिकार है। लेकिन आप की माँ के नाम मकान की वसीयत है तो उसे प्राप्त करने का चाचा ताऊ का अधिकार समाप्त हो चुका है।  यदि आप को लगता हो कि आप के चाचा, ताऊ जबरन आप को मकान से बेदखल कर सकते हैं तो आप अदालत में दावा कर के गैर कानूनी तरीके से मकान से बेदखल करने पर रोक लगाने के लिए स्थायी और अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

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समस्या-

रियाज़ुद्दीन ने बिलासपुर, जिला गौतम बुद्ध नगर, (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरे ससुर साहब ने 15 साल पहले एक प्लॉट खरीदा था शाइन बाग दिल्ली में उस समय किसी व्यक्ति ने मेरे ससुर साहब से कह कर कि एक ग़रीब फैमिली है अपने यहाँ रेंट पर रख लो। उन्होंने उस को रख लिया, वो भी विना रेंट के  15 साल तक उस से कोई किराया भी नहीं लिया। अब उनको उस प्लाट पर निर्माण करना है। लेकिन वह औरत उस प्लाट को खाली नहीं कर रही। बोलती है मुझ को दो फ्लोर बना कर दो या आधा मकान दो। मेरी पास इस के पेपर हैं, सब कुछ है, और एक दो बदमाशों से भी जा कर मिल ली है वो। उस औरत के आदमी की मृत्यु भी हो चुकी है। अब हम क्या कर सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें।

समाधान-

रियाजुद्दीन जी, अपनी किसी संपत्ति पर जब भी किराएदार या लायसेंसी के रूप में किसी को व्यक्ति को कब्जा दिया जाए तो उस की लिखित संविदा की जानी चाहिए, जिस पर दोनों पक्षकारों के सिवा कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों।  बेहतर हो यदि उस संविदा को उचित मूल्य के गैरन्यायिक स्टाम्प पर लिखा जाए और नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। नोटेरी के रजिस्टर में पक्षकारों के साथ-साथ गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए जाएँ। इस दस्तावेज को सुरक्षित रखा जाए। इस से भविष्य में यह साबित करने में आसानी रहे कि भूमि या परिसर किराए पर या लायसेंस पर उपयोग के लिए दिया गया था। यदि आप के ससुर साहब के पास इस तरह का कोई दस्तावेज या मामूली लिखत भी हो तो इस स्थिति में वह काम आएगा। यदि कोई भी दस्तावेज नहीं हो तो वहाँ जिस का कब्जा है उसकी किसी तरह की अभिस्वीकृति हो जिस का कोई सीधा या परिस्थिति जन्य सबूत हो।

यदि यह सब नहीं है तो यह माना जाएगा कि आप के ससुर ने उक्त संपत्ति को खुला छोड़ दिया था और फिर वर्तमान कब्जाधारी उस पर अपना काम करने लगा और आप के ससुर ने 12 वर्ष से अधिक से उस संपत्ति पर अपना कोई दावा नहीं किया। अवधि अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार 12 वर्ष से अधिक का कोई कब्जा हो जाने पर उस से कब्जा वापस लेने के लिए दावा नहीं किया जा सकता। इसी को एडवर्स पजेशन कहा जाता है। यदि उस से जबरन कब्जा लिया जाता है तो यह गैर कानूनी होगा और वर्तमान कब्जाधारी धारा  145 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कब्जा वापसी का प्रार्थना पत्र दे सकता है और उसे कब्जा वापस दिलाया जा सकता है।

आप के ससुर साहब के पास उस प्लाट के स्वामित्व का कोई सबूत जरूर होगा। उस के साथ यदि आप उस कब्जाधारी का कब्जा 12 वर्ष से कम का साबित कर सकें, या फिर यह साबित कर सकें कि वह जमीन / परिसर किराए पर दिया गया था और कम से कम एक बार किराया जरूर लिया गया था। तो आप को दीवानी का कोई अच्छा वकील उस प्लाट पर अपना कब्जा वापस प्राप्त करने का रास्ता सुझा सकता है। इसलिए हमारा सुझाव है कि आप ये सब सबूत या गवाही इकट्ठा करें और फिर किसी अच्छे दीवानी काम करने वाले वकील से मिलें और रास्ता निकालें। वैसे हमें लगता है कि इस जमीन का कब्जा वापस लिया जा सकता है। कानूनी रास्ते में अभी हमारे देश में बहुत समय लगता है। इस कारण लोग मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाने के स्थान पर बहुत कम प्रतिफल में समझौते करना पसंद करते हैं। यदि आप को लगे कि कोई सबूत नहीं हैं जिस से कानूनी तरीके से संपत्ति को वापस लिया जा सके तो बेहतर है कि आपस में ऊंच नीच कर के ही किसी तरह से संपत्ति वापस प्राप्त की जाए। पूरी नहीं तो आधी ही प्राप्त की जाए।

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समस्या-

मेरे पति की असामयिक मृत्यु हो गयी है।  मेरे पति को पैतृक संपत्ति में 4 बीघा जमीन हिस्से में आई थी।  क्या मेरे पति की मृत्यु के बाद मेरा कोई हक उस पैतृक संपत्ति में बनेगा अथवा नही?  मैंने अभी कोई दूसरी शादी नही की है। अगर मेरे मां बाप मेरी दूसरी शादी कर देते हैं तो मेरा पैतृक संपत्ति जो मेरे पति की थी क्या मैं उस पर दावा कर सकती हूँ?

-लता देवी,  2/881 कोर्ट रॉड सहारनपुर

समाधान-

प के पति की जो भी स्वअर्जित संपत्ति थी अथवा पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति में जो भी उन का हिस्सा था वह आप के पति की मृत्यु के साथ ही उत्तराधिाकार में आप को प्राप्त हो चुका है। आप उसे प्राप्त करने के लिए दावा कर सकती हैं।

यदि आप दूसरा विवाह करती हैं तो भी आप का इस संपत्ति पर यह अधिकार बना रहेगा। वह आप के विवाह करने से समाप्त नहीं होगा। आप चाहें तो विवाह के बाद भी दावा कर सकती हैं। लेकिन आप को यह दावा समय रहते करना चाहिए। क्यों कि अक्सर ऐसा होता है कि आप दावा करते हैं तब तक दावा करने की कानूनी समयावधि समाप्त हो जाती है और आप दावा करने से वंचित हो सकती हैं। इस कारण आप को चाहिए कि तुरन्त किसी वकील से परामर्श कर के कार्यवाही करें।

समस्या-

मखदूमपुर गोमती नगर विस्तार लखनऊ से संतपाल ने पूछा है-

मेरे पिता जी पिता के नाम एक ४ बिस्वा प्लाट है।  पर उस प्लाट मे एक व्यक्ति ३५ साल से घर बनवाकर रह रहा है । अब वह अपना हक बताता है इस स्थिति मे उसे किस प्रकार घर से बेदखल किया जाये।

समाधान-

मारे पास अक्सर आप के जैसे सवाल आते है ंकि हमारी पुश्तैनी, या दादा जी की, या पिताजी की जमीन है उस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर के 15, 20, 25, 35 या अधिक वर्ष से मकान बना लिया है या उस पर खेती कर रहे हैं या फिर और कुछ कर रहे हैं।

भाई जब किसी ने आप की जमीन पर कब्जा किया और वहाँ अपना निर्माण या काम करने लगा तब क्या आप सोए हुए थे? और फिर उस के बाद अभी तक 12-13 या उस से अधिक सालों से क्या आप और आप के तमाम परिवार वाले सोए रहे? आपने सुना होगा कि सोते रहने वाले सब कुछ खो देते हैं।

आप बताइए कि आप की सम्पत्ति पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है लेकिन संपत्ति अभी तक आप के स्वामित्व की है तो आप को चाहिए क्या? आप उस का कब्जा ही तो वापस लेना चाहते हैं? यदि आप कब्जा वापस लेना चाहते हैं तो आप को अचल संपत्ति के कब्जे के लिए वाद संस्थित करना पड़ेगा। वैसी स्थिति में कब्जा आप के हाथ से निकल जाने की तिथि से केवल 12 वर्ष की अवधि में आप ऐसा कर सकते हैं।  इस से अधिक अवधि हो जाने पर आप का अचल संपत्ति के कब्जे का वाद इसलिये खारिज हो जाएगा कि आप ने दावा करने की निर्धारित अवधि में यह दावा पेश नहीं किया।

आप सभी इसे ठीक से पढ़ लें, और हमें ऐसे सवाल न भेजें जिन में आप अपनी अचल संपत्ति पर 12 वर्ष से पहले हो चुके कब्जे को वापस लेना चाहते हों। हम आज के बाद से इस तरह के सवालों का कोई उत्तर नहीं देंगे।

समस्या-

निशी ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या 25 वर्ष पूर्व शपथ पत्र के माध्यम से बक्शीश या दान में दी गई अचल सम्पत्ति जिसे ग्रहिता ने स्वीकार कर निर्माण किया और वर्तमान में भी काबिज है को दानदाता अपने जीवन में किसी अन्य के नाम पंजीकृत कर सकता या सकती है? जिसका पता ग्रहिता को दाता की मौत के बाद चले, तो क्या उससे वह सम्पत्ति पंजीकृत कराये दूसरे व्यक्ति को मिल जायेगी या होगी जबकि दानग्रहिता जीवित है और सम्पत्ति पर काबिज है?

समाधान-

चल संपत्ति का दान या बख्शीश शपथ पत्र के माध्यम से नहीं हो सकता। दान और बख्शीश संपत्ति का अंतरण हैं और संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक होने के कारण उस का पंजीकृत होना आवश्यक है। आप  दान या बख्शीश पंजीकृत विलेख से नहीं होने के कारण अमान्य है। लेकिन यह दस्तावेज बताता है कि दान प्राप्तकर्ता को उक्त संपत्ति का कब्जा खुद उस के मालिक ने दिया था। कब्जे को 25 वर्ष हो चुके हैं। 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने तथा उस पर ग्रहीता द्वारा निर्माण कार्य भी कराया गया है।

यदि उक्त संपत्ति मूल स्वामी के द्वारा किसी को पंजीकृत विलेख से हस्तांतरित कर भी दी गयी हो तब भी उस का कब्जा तो वास्तविक रूप से नहीं दिया गया है। हस्तांतरण से संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त करने वाले को ग्रहीता से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित करना होगा। यह वाद मियाद के बाहर होने के कारण निरस्त हो सकता है। क्यों कि 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने से ग्रहीता का कब्जा प्रतिकूल हो चुका है और उस से संपत्ति का कब्जा मूल स्वामी या हस्तान्तरण से स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति मियाद के बाहर होने से प्राप्त करने में अक्षम रहेगा।

कब्जा किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का प्राथमिक साक्ष्य है।

October 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

घनश्याम गहलोत ने गंगापुर, भीलवाड़ा राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा परिवार एक मकान में 70 वर्षो से बिना किराए के निवास कर रहा है, बिजली का बिल मेरे दादाजी के नाम पर है जिनका स्वर्गवास हो गया है। अब हमारे पास इस मकान के स्वामित्व के लिए क्या अधिकार है?

समाधान-

कान का बिजली कनेक्शन आप के दादाजी के नाम है। आप पुराने से पुराना दस्तावेज प्राप्त कर के सुरक्षित रखिए जिस से आप दादाजी के नाम के बिजली कनेक्शन को साबित कर सकें। उक्त मकान आप के दादाजी के उत्तराधिकारियों के स्वामित्व की संपत्ति ही मानी जाएगी क्यों कि उन का उस संपत्ति पर 70 वर्ष से अबाधित कब्जा है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 में यह प्रावधान है कि –

Burden of proof as to ownership:

When the question is whether any person is owner of anything of which he is shown to be in possession, the burden of proving that he is not the owner is on the person who affirms that he is not the owner.

यदि कभी यह प्रश्न उठे कि क्या कोई व्यक्ति उस संपत्ति का स्वामी है जो उस के कब्जे में है तो यह साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जो यह कहता हो कि यह संपत्ति उस व्यक्ति की नहीं है।

यदि आप का परिवार उस मकान में विगत 70 वर्षों से अबाधित रूप से निवास कर रहा है तो उस मकान के स्वामी आप ही हैं। यदि कोई इस बात पर आपत्ति करता है तो उसे साबित करना पड़ेगा कि आप उस के स्वामी नहीं है। इस तरह पूरी दुनिया में यह सिद्धान्त प्रचलित है कि कब्जा किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का प्रथम दृष्टया सबूत है। इसीलिए कहा जाता है ‘कब्जा सच्चा दावा झूठा’।

समस्या-

अब्दुल्लाह ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी तीन भाई हैं और शुरु से साथ रहते आये हैं। अब वो अलग हुये तो एक भाई ने जो सबसे बड़ा है जमीन के कुछ हिस्से पर बराबर न लेकर ज्यादा कब्ज़ा कर लिया है। अब पहले की जमीन है न उनके पास किसी तरह का कागज है न हमारे पास। पीढी दर पीढी ऐसे ही चला आ रहा था। क्या पिताजी अपने हिस्से की सही जमीन पा सकते हैं? और जो अभी कब्जे में है उसकी रजिस्ट्री कैसे कराई जाये?

समाधान-

क लंबे समय से कब्जा अचल संपत्ति के स्वामित्व का सब से प्राथमिक और मजबूत सबूत है। इस कारण संपत्ति के स्वामित्व का दस्तावेज न होने से परेशान नहीं हों। बंटवारा आपस में हुआ है इस कारण उस का पंजीकृत होना जरूरी है। यदि नहीं होता है तो बाद में कभी भी समस्या आ सकती है। इस कारण पहली जरूरी बात तो यह है कि आप के पिता व उन के भाइयों के बीच बंटवारा विलेख लिखा जा कर उसे पंजीकृत करा लिया जाए। बंटवारा विलेख की दो अतिरिक्त प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर शेष दो भाई रख लें। इस तरह संपत्ति का एक पंजीकृत दस्तावेज हासिल हो सकता है। यह कर लेना चाहिए।

आप के पिता को जमीन कम मिली है इस से केवल आपको ही असंतोष है या आप के पिता को भी है। साझे में कई बार बंटवारे के समय जो थोड़ा बहुत हिस्सा जो कम अधिक होता है उस का कोई न कोई कारण होता है। एक ही जमीन के एक हिस्से की कीमत कम और दूसरे की अधिक होती है। पहले इस का कारण पता कर लें। यदि फिर भी लगता है कि गलत हो रहा है तो बंटवारे का वाद दाखिल करें। बंटवारा कानून के अनुसार हो जाएगा।जब बंटवारे की डिक्री होगी तब संपत्ति के संबंध में एक दस्तावेज भी हो जाएगा।

विक्रय निरस्त करने, विभाजन और पृथक हिस्से के कब्जे का वाद

September 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कल्पना ने फरीदाबाद, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने अपनी पैतृक जमींन अपनी पुत्र वधू के नाम 6 वर्ष पूर्व बेच दी। पिताजी को किसी प्रकार की आर्थिक आवश्यकता नहीं थी तथा पुत्र वधू किसी प्रकार की आय नहीं करती थी। अब मेरे पिताजी और मेरा बड़ा भाई मुझे, मेरे बच्चों व मेरे पति का मान सम्मान नहीं करते व हमें गाली-गालोंज भी करते है। .क्या अब मैं अपना हक/ ज़मीन वापस ले सकती हूँ?  समाज में बेटी के मान-सम्मान का भी प्रश्न है। कृपया राह सुझाएँ।

समाधान-

प पहले जाँच लें कि जमीन पैतृक ही है। कौन सी जमीन पैतृक है जिस में संतानों का जन्म से अधिकार होता है इस पर तीसरा खंबा पर पहले पोस्टें लिखी जा चुकी हैं, उन्हें सर्च कर के पढ़ लें। लड़कियों को 2005 से पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला है। आप की जमीन की बिक्री बाद में हुई है। इस तरह आप जमीन के विक्रय को चुनौती दे सकती हैं। इस मामले में लिमिटेशन की बाधा भी नहीं आएगी। यदि पिता किसी संतान का का हक किसी और को दे देता है तो वाद 12 वर्ष तक की अवधि में किया जा सकता है। आप को चाहिए कि आप विक्रय पत्र निरस्त करवाने तथा संपत्ति का बँटवारा कर आप का हिस्सा अलग करते हुए उस का पृथक कब्जा आप को देने का वाद दीवानी न्यायालय में संस्थित करें।

 

कब्जा बहुत पुराना है, मकान से बेदखल नहीं किया जा सकता।

August 31, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैलूसिंह ने अमरसर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

खातेदारी की जमीन है जिस पर मेरे पिता जी का ४० साल से पूर्णतः कब्जा है यह खातेदारी सामान्य जाति की है हम भी सामान्य से हैं। कब्जे के सुरूआती समय से २० साल तक इस जमीन का उपयोग चारा डालने व अन्य कार्यो के लिए होता था लेकिन अब २० साल से उस जमीन पर हमारा घर बना हुआ है। यह घर व घर में उपस्थित सभी चल, अचल संपति मेरे पिता जी की है। इस जमीन पर सन् २०१० मे गांव की पंचायत दवारा मेरे माता जी के नाम से इंदिरा आवास योजना के अन्तर्गत पक्का मकान बनाने का लाभ मिला था और बिजली कनेक्शन मेरे पिता जी के नाम से है आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आइडी, आवश्यक सभी दस्तावेज इसी वार्ड व इसी जगह के आधार पर हैँ। आज तक इस जमीन से संबंधित कोर्इ विवाद न्यायालय मे विचाराधीन नहीं है। अब ३ साल से खातेदारी जिन लोगों के नाम है वो लोग हमे बात बात पर बहुत परेशान करते है वह लोग हमे धमकी देते है कि हम तुम्हे हमारी जमीन से बेदखल कर देंगे हमको हर बात मे दबाव मे रखते हैं।

समाधान-

आप को इस मामले में डर कर रहने की जरूरत नहीं है। यदि वे लोग आप को धमकी देते हैं तो उस की रिपोर्ट पुलिस में कराएँ। आप अदालत में दावा पेश कर के विधिविरुद्ध रीति से आप को बेदखल करने के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त कर सकते हैं। आप का कब्जा उस मकान पर इतना पुराना है कि आप अपने कब्जे की सुरक्षा एडवर्स पजेशन के आधार पर कर सकते हैं। यह बात वे लोग भी जानते हैं इस कारण कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करते हैं। केवल आप को डरा धमका कर अपना मतलब निकालना चाहते हैं। इस का एक मात्र उपाय पहले अपने मन से सभी प्रकार का डर निकालें और परिस्थितियों का ठीक से मुकाबला करें। आप के मकान को कोई आप से नहीं छीन सकता।

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