विभाजन Archive

समस्या-

भागलपुर, बिहार से अभिषेक शर्मा ने पूछा है-

मारा पुश्तैनी मकान है और मेरे पिताजी हमें अपने मकान में जाने नहीं देते हैं, इसलिए हम 10 बरसों से बाहर रह रहे हैं। जब मैं अपने पिताजी से अपना हक़ हिस्सा माँगने के लिए गया तो मेरे पिताजी ने एक स्टाम्प पेपर बनवा के रखा था,जिस पर लिखा था कि मैं अपनी मर्ज़ी से प्रॉपर्टी कुछ पैसे के लिए पिता के ना कर रहा हूँ और उन्होने हस्ताक्षर करवा कर मुझे बेदखल कर दिया। क्या मैं अपनी प्रॉपर्टी वापस ले सकता हूँ, उनके उपर 420 का केस कर सकता हूँ। मेरे पिताजी ने सिग्नेचर प्रेशर डाल कर के मुझसे ज़बरदस्ती करवाया है, इस घटना को एक साल हो गया। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, अब अपना हिस्सा कैसे ले सकते हैं?

समाधान-

भिषेक जी, आप के पिता ने आप से एक वर्ष पूर्व दबाव डाल कर जबरन आप से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवा लिए। इस दस्तावेज में मकान में अपना हिस्सा पैसा ले कर छोड़ने की बात लिखा जाना आप बताते हैं। लेकिन आपने यह नहीं बताया कि कितना पैसा लेना लिखा है? आप पिता के विरुद्ध 420 का केस करने की इच्छा रखते हैं, पर इस में 420 जैसा क्या है? फिर आप उस की शिकायत एक साल बाद कैसे कर सकते हैं? इस तरह की शिकायत इतने दिन बाद करने का आधार क्या है? इस कारण धारा 420 या किसी अन्य अपराधिक मामले की रिपोर्ट करना तो इस मामले में बिलकुल असंभव है। आप करेंगे तो भी उस का कोई नतीजा नहीं निकलेगा।

यदि आप की संपत्ति पुश्तैनी है और उस में आप का भी हिस्सा है इस बात की पुष्टि इस बात से होती है कि आप के पिता ने स्टाम्प पर लिखवा कर वह हिस्सा छुड़वाने की कोशिश की है।

किसी भी पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में बच्चे का जन्म से ही अधिकार होता है। आप का भी उस संपत्ति में जन्म से अधिकार है और आप का हिस्सा उस संपत्ति में है। यह हिस्सा रजिस्ट्रार के कार्यालय में विक्रय पत्र या रिलीज डीज निष्पादित कर उस का पंजीयन कराए बिना पिता के हक में चला जाना संभव नहीं है। आप के पिता द्वारा स्टाम्प पर लिखा लिए जाने के बावजूद भी आप का हिस्सा आप का ही है। अब आप का हिस्सा प्राप्त करने के लिए आप अपने पिता के विरुद्ध बंटवारे का दावा दीवानी न्यायालय में कर सकते हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप आप के क्षेत्र के जिला न्यायालय में जा कर किसी अच्छे दीवानी वकील से मिलें और विभाजन का वाद पेश करवाएँ। इसी तरीके से आप पुश्तैनी जायदाद में हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।

सहदायिक संपत्ति कभी अपना चरित्र नहीं खोती।

November 20, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

दीपक शर्मा ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-  

मेरे दादा जी तीन भाई थे तीनो भाइयों का मौखिक बंटवारा हुआ था और सम्पति के अलग अलग भाग पर अपना अपना कब्जा था, परंतु कोई रजिस्टर्ड बंटवारा नहीं हुआ था।, उन में से एक भाई व उन की पत्नी का 1961 में बिना औलाद स्वर्गवास हो गया। मेरे दादा जी से पिता जी (पिता जी का जन्म 1938) को एक सम्पति मिली दादा जी का स्वर्गवास 1966 में हो गया, उस के बाद मेरा जन्म 1969 में हुआ। हम दो भाई हैं, दूसरा भाई 5 साल छोटा है, दादी का स्वर्गवास 1985 में हुआ था, माँ का भी स्वर्गवास 2005 में हो गया।  मेरे पिता जी के एक भाई व एक बहन हैं, पर मेरे पिता जी ने अपने भाई व बहन को भी कुछ भी नही दिया। अब पिताजी मुझे भी कुछ भी नही देना चाहते। छोटा भाई व पिताजी मिलकर ये सम्पति किसी को बेचकर या गिफ्ट दिखाकर रुपये लेना चाहते हैं। अभी पूरी सम्पति किराये पर दे रखी हैं, किराया पिताजी ही लेते हैं ,पिता जी का ही कब्जा है।  पिता जी के भाई व पिता जी की बहन इस मामले से दूर रहना चाहते हैं। क्या मेरे दादा जी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले होने की वजह से मेंरा इस सम्पति में कोई अधिकार नही होगा? परंतु मेरे जन्म के वक्त दादी तो थी। क्या में न्यायालय में केस कर सकता हूं और कौन से सक्शन के तहत में केस करु?

समाधान-

प के दादाजी तीन भाई थे उन में किसी संपत्ति का मौखिक बँटवारा हुआ, अर्थात वह संपत्ति संयुक्त थी और संभवतः वह उन्हें उन के पिता से प्राप्त हुई थी। यदि दादाजी के पिता जी का देहान्त 1956 के पहले हो चुका था तो इस तरह तीनों भाइयों को प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी और सहदायिक थी।  एक बार जो संपत्ति सहदायिक हो जाती है वह अपनाा सहदायिक होने का तब तक कभी अपना चरित्र नहीं खोती जब तक कि वह किसी अन्य व्यक्ति को उत्तराधिकार के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से हस्तान्तरित न हो जाए।

 

स तरह आप के दादाजी व उन के भाइयों को उस में जन्म से अधिकार प्राप्त था। तीन में से एक भाई का स्वर्गवास बिना वारिस हो गया। उन की संपत्ति भी दोनों भाइयों को मिल गयी होगी या उस का क्या हुआ आप बेहतर जानते हैं। आप के पिता को दादाजी से कुछ संपत्ति मिली यदि पिताजी को मिली हुई संपत्ति उसी संपत्ति का एक भाग है जो कि उन के दादा जी को उन के पिता से मिली थी तो पिता के पास जो भी संपत्ति है उस में आप का भी जन्म से हिस्सा है।

 

ब आप का कहना है कि वह संपत्ति  आप के पिताजी ने किराए पर दे रखी है और किराया खुद प्राप्त करते हैं, और वे उसी संपत्ति को बेच कर या गिफ्ट कर के रुपए प्राप्त करना चाहते हैं और आप को कुछ नहीं देना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो आप तुरन्त जिस जिले में संपत्ति मौजूद है उस जिले के जिला न्यायाधीश के न्यायालय में संपत्ति के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।  इस वाद के साथ ही आप एक अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र भी उसी न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप आदेश प्राप्त कर सकते हैं कि बंटवारा हो जाने तक आप के पिता इस संपत्ति को विक्रय, दान या किसी अन्य प्रकार से हस्तान्तरित नहीं करें। इसी वाद में आप रिसीवर नियुक्त करने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं जो संपत्ति से होने वाली आय को अपने पास रखे और बाद में न्यायालय के आदेश के अनुसार उस के हिस्से उस संपत्ति के सभी स्वामियों को उन के हिस्से के अनुपात में दिए जा सकें। आप को इस मामले में अपने यहाँ के किसी अनुभवी दीवानी मामलों के वकील से परामर्श करना चाहिए और उसकी सहायता से यह वाद संस्थित करना चाहिए।

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

समस्या-

अभिषेक शर्मा ने  भागलपुर बिहार से पूछा है-

मेरा पुश्तैनी मकान है जिस पर मेरे पिताजी ने अपनी मर्जी से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवाया कि तुम अपनी मर्जी से अपना हिस्सा दे रहे हो,पर मेरी मर्जी नहीं थी। मुझ से टॉर्चर कर के कुछ पैसे दे कर हस्ताक्षर करवाए। क्या अब मैं अपना हिस्सा ले सकता हूँ क्या? हस्ताक्षर मेरे और दो गवाहों के हैं। कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के पिता ने आप का अपना हिस्सा उन के हक में छोड़ने के लिए आप से कोई दस्तावेज लिखाया है। इस तरह उन्हों ने आप का हिस्सा अपने नाम हस्तान्तरित करने का प्रयत्न किया है। 100 रुपए से अधिक मूल्य की किसी भी अचल संपत्ति या उस के हिस्से का हस्तान्तरण बिना उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत दस्तावेजके बिना होना असंभव है।

आप के पिता को यही करना था तो या तो अपने नाम रिलीज डीड आप से निष्पादित करवा कर उस का पंजीकरण करवाना था। चूँकि आप को उन्हों ने कुछ पैसे भी दिए हैं तो यह एक प्रकार से भूमि का विक्रय भी है जिस का भी पंजीकरण होना जरूरी था। पंजीकरण के लिए यह आवश्यक था कि आप को उपपंजीयक के समक्ष ले जाया जाए और वहाँ के रजिस्टरों पर तथा दस्तावेज की दूसरी प्रति पर भी आप के हस्ताक्षर कराए जाएँ।

यदि इस तरह का कोई हस्तान्तरण दस्तावेज पंजीकृत नहीं हुआ है तो पिता द्वारा इस तरह का दस्तावेज लिखा लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप पुश्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त करना चाहते हैं तो तुरन्त बंटवारे तथा अपना हिस्सा अलग कर उस का पृथक कब्जा देने के लिए वाद सक्षम न्यायालय में संस्थित करें, तथा उक्त संपत्ति या उस के किसी भी हिस्से को बेचने या किसी भी प्रकार से खुर्द-बुर्द करने पर रोक लगवाएँ।

समस्या-

परमजीत खन्ना ने मरीवाला टाउन, मणिमाजरा, चंडीगढ़ से पूछा है-

म दो भाई बहन हैं। मेरे पापा को मेरे दादा जी से 1974 में संपत्ति विरासत में मिली थी। मेरे दादा जी को 1911 मे मेरे परदादा जी से संपत्ति विरासत मे मिली थी। मेरे पापा ने आधी संपति बेच दी। आधी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के नाम कर दी। मेरे पापा की मृत्यु 2016 मे हो गयी मेरे भाई  ने संपत्ति अपने नाम करवा ली। क्या इस संपत्ति में मेरा हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

बिलकुल आप को पिता और दादा से आई इस पुश्तैनी संपत्ति में आप का हिस्सा प्राप्त हो सकता है.

आप को इतना करना होगा कि आप जो संपत्ति आपके दादा जी को विरासत में उन के पिता से प्राप्त हुई थी उस का तथा आप के दादा जी जो संपत्ति उन के पिता से विरासत में मिली थी उस का रिकार्ड या सबूत जुटाना होगा। क्यों कि आप के हिस्से का निर्धारण उसी के आधार पर किया जा सकता है। फिलहाल हम आप के द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर हमारी राय बता रहे हैं।

आप के पापा को जो संपत्ति 1974 में विरासत में मिली थी वह पुश्तैनी और सहदायिक संपत्ति थी। इस तरह उस संपत्ति में उन की संतानों का जन्म से ही अधिकार उत्पन्न हो गया था। 2005 में पारित कानून से पुत्रियों को भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार उत्पन्न हो गया है। इस तरह आप के पिता ने पुश्तैनी संपत्ति में जो हिस्सा बेचा वह उन का हिस्सा बेचा है। जो बचा उस में आप का व भाई का हिस्सा मौजूद था।

आपके पिता ने वसीयत से जो संपत्ति आप के भाई को दी है वह वसीयत करना उचित नहीं है। आप के पिता केवल अपने हिस्से की जमीन वसीयत कर सकते थे। न कि पुत्र व पुत्री के हिस्से की जमीन। इस तरह वसीयत का कोई मूल्य नहीं है। आप के पिता को जो कुछ विरासत में  मिला था उस की एक तिहाई संपत्ति आप का हिस्सा है और आप उसे प्राप्त करने के लिए बंटवारे का वाद अपने भाई के विरुद्ध कर सकती हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकती हैं।

समस्या-

सोनू कुमार ने सलेमपुर, जिला देवरिया, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मारी एक सौतेली बहन है, पिताजी के मर जाने के बाद वो प्रॉपर्टी में हिस्सा मांग रही है। जबकि माँ अभी जिन्दा है।  वो धमका रही है।  क्या वो प्रॉपर्टी में हिस्सेदार है या नहीं? कृपया बताएँ?

समाधान-

प के पिता की मृत्यु के साथ ही आप के पिता की संपत्ति के लिए उत्तराधिकार खुल चुका है। उन की जो भी संपत्ति है उस में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत सभी उत्तराधिकारियों के अधिकार निश्चित हो चुके हैं।

आप के पिता की मृत्यु के बाद उन की जीवित पत्नी अर्थात आप की माता जी तथा सभी संतानों का बराबर का हक उन की संपत्ति में उत्पन्न हो गया है और कोई भी उत्तराधिकारी आप के पिता द्वारा छोड़ी गयी संपत्ति के बंटवारे की मांग कर सकता है।

आप की सौतेली बहिन का भी अपने पिता की संपत्ति में अधिकार उत्पन्न हो चुका है। वह आप से उस के अधिकार की मांग कर रही है तो आप आपसी सहमति से बंटवारा कर के उसे उस का हिस्सा दे सकते हैं। या उस के हिस्से के बराबर धन उसे दे कर उस का हिस्सा शेष सभी या किसी एक उत्तराधिकारी के पक्ष में रिलीज करवा कर इस विवाद का निपटारा कर सकते हैं। अन्यथा स्थिति में आप की सौतेली बहिन बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

समस्या-

मेरे पिताजी दो भाई थे, जिनके पास एक पुश्तैनी जमीन 14×70 स्क्वायर फुट की थी जिसके खसरे में मेरे दादा का  नाम दर्ज है। दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से 40 वर्ष पूर्व जमीन का बंटवारा आधा-आधा कर लिया किन्तु कोई विलेख नही लिखवाया। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के 14×35 के प्लाट पर स्वयं के खर्च से 40 वर्ष पूर्व मकान बनवा लिया था तथा जिसका किसी ने विरोध नही किया था, जिसका गृहकर 38 वर्षो से पिताजी के नाम से ही जमा होता है, पिताजी जी की मृत्यु के बाद मेरे नाम से गृहकर जमा होता है और मकान पर मेरा ही कब्जा है। मेरे चाचा जिनके हिस्से में 14×35 का प्लाट था उन्होंने अपने हिस्से के प्लाट में अभी तक कोई निर्माण नही करवाया  और उनकी मृत्यु भी हो चुकी है। अब विवाद का विषय ये है कि चाचा का पुत्र 40 वर्ष पूर्व हुए आपसी बंटवारे को नही मान रहा, उसका कहना है कि चूंकि 14×70 के पूरे प्लाट का खसरा उसके दादा के (पिता के पिता) नाम पर है और बंटवारे का कोई विलेख नही इसलिए घर का और खाली जमीन का बंटवारा करो और अपने घर मे से हमको भी हिस्सा दो। छोटे दादा के पुत्र द्वारा झूठे केस में फसाने की साजिश की जा रही और मारने की धमकी दी जा रही। क्या कानूनी तौर पर वह मेरे दादा जी का मकान हड़प सकता है? सर हमारे पास घर के 38 वर्षों का गृहकर की रसीद (जो पिताजी के नाम से है), घर का 12 वर्षों का बिजली का बिल (मेरे स्वयं के नाम से),16 वर्षो का जलकर की रसीद (पिताजी के नाम पर), पिताजी का राशन कार्ड, माताजी का राशन कार्ड और मेरे दादाजी के नाम वाला नगर पंचायत आफिस से जारी 14×35 स्क्वायर फुट के प्लाट (जिसमे पिताजी के द्वारा बनवाया मकान है) का खसरा है। क्या कानूनी तौर पर चाचा का पुत्र मेरे मकान पर कब्जा पा सकता है?

-मोनू अहमद,  नगर पंचायत रुद्रपुर, जिला-देवरिया, (उ. प्र.)

समाधान-

दि 40 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था तो उस के गवाह अवश्य होंगे। आवश्यकता पड़ने पर साक्षियों  के बयान करवा कर बंटवारे को साबित किया जा सकता है। इस संबंध में आप Karpagathachi And Ors vs Nagarathinathachi 1965 AIR 1752 के प्रकरण को देखें। आप के पास पिताजी के नाम से 38 वर्ष से गृहकर की रसीद है। घर बनाने के बाद ही तो गृहकर आरंभ हुआ है यह एक सहायक सबूत है जो कहता है कि मकान बने हुए हिस्से पर आपका इतने लंबे समय से कब्जा है। 16 वर्षों का जलकर र 12 वर्ष से बिजली के बिल भी सहायक सबूत हैं। आप अच्छे से बंटवारा और मकान का निर्माण साबित कर सकते हैं। प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) के तर्क का भी सहारा लिया जा सकता है। इस तरह कानूनी रूप से आपके मकान को हड़प करना इतना आसान नहीं है।

आप अपने चचेरे भाई को कह दीजिए कि वह दुबारा से बंटवारा चाहता है तो बंटवारे का दावा कर दे। फैसला अदालत में हो। आप यदि मुकदमे को मुस्तैदी से लड़ेंगे तो आप की संपत्ति आपके पास ही रहेगी।

समस्या-

मेरी पत्नी बबीता देवी (68 वर्ष) एक पैर से विकलांग है। मेरे बाबा अंबिका सिंह जिनको 1940 में 7 एकड़ 42 डिसमिल जमीन उनके हिस्से में प्राप्त हुआ था। मेरे पिता दो भाई थे मेरे पिता का नाम वेशर सिंह और मेरे चाचा का नाम वादों सिंह। मेरी चाचा वादों सिंह ने विवाह नहीं किया था। मेरे चाचा वादों सिंह ने 3 एकड़ 42 डिसमिल जमीन 1948 में खरीदा था मेरे चाचा वादों सिंह की मृत्यु 2004 में हुई। उनके मरणोपरांत वह जमीन अभी मेरे पास है। क्या मेरे चाचा के द्वारा जो जमीन मुझे मिला उस पर मेरे पुत्र या पुत्री का अधिकार है। जिस वक्त मेरे चाचा ने जमीन खरीदा था उस वक्त वो संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे किंतु उनके द्वारा खरीदे गए जमीन के केवाला पर सिर्फ उन्हीं का नाम है, मेरे पिताजी का नाम नहीं है। मुझे 3 पुत्र पैदा हुऐ परंतु तीनो जन्म के समय मृत पाए गए, तीनों की मृत्यु पेट में ही हो गई थी। फिर मुझे दो पुत्रियां हुई। क्या उन मृत पुत्रों का भी कोई हिस्सा हमारे संपत्ति में होता है? यदि हां तो फिर क्या वह हिस्सा मेरी पत्नी को स्थानांतरित होगा? मेरी पुत्री ने मुझ पर टाइटल पार्टीशन सूट किया है। उसका हिस्सा इस संपत्ति में कितना हो सकता है । जबकि 7 एकड़ 42 डिसमिल जो कि मेरे बाबा का हिस्सा था, उस में मेरे चाचा का जो हिस्सा होता है वह तो मेरा पर्सनल प्रॉपर्टी कहलायेगा।

उमेश सिंह vishnukr1506@gmail.com

समाधान-

आप के दादा अम्बिका सिंह को 2014 में जो जमीन उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह आप की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति है। इस संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता से तय होगा। 2005 से पुत्रियाँ भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखने लगी हैं। इस कारण आप की पुत्री आप की सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने की अधिकारी है। आप के पुत्र मृत पैदा हुए इस कारण उन का कोई अलग से हिस्सा नहीं है। वह हिस्सा आपकी पत्नी को प्राप्त नहीं होगा।  दादा की जमीन में आप के चाचा का हिस्सा भी आप को मिल गया है। लेकिन वह फिर भी आप की स्वअर्जित संपत्ति नहीं है क्यों कि वह आपको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है।  आप की पुत्री इस भूमि में अपना हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है। उस का हिस्सा कुल जमीन में 1/3 ही होगा। आप के चाचा ने जो हिस्सा खुद खरीदा है और जिस का केवाला उन के नाम है वह जमीन आप की स्वअर्जित मानी जाएगी और आप के जीतेजी उस में किसी को हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस जमीन में आप की पुत्री कोई भी हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

समस्या-

मेरे दादाजी तीन भाई है और उन सभी ने क़ानूनी रूप से कोई बँटवारा किए बगैर आपसी सहमती से अपनी सुविधानुसार संपत्ति का बँटवारा कर लिया था और अभी तक खसरा नंबर मे भी दादाजी समेत उनके दोनो भाइयो का भी नाम है, दादाजी की दो संतान है एक पिताजी और दूसरी बुआजी, पिताजी ने दो शादियाँ की थी, पहली पत्नी से तीन लड़कियाँ और एक लड़का है सभी लड़कियो की शादियाँ हो चुकी है और मेरा सौतेला भाई और सौतेली माँ दादी और दादाजी के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने चार कमरो के मकान मे रहते है, पिताजी ने पाँच कमरो का मकान  बनवाया था जिसमे से दो कमरे पिताजी ने किराए से दुकान चलाने हेतु गाँव के ही एक व्यक्ति को सन २००५ मे दे दिए थे जिसका किराया दादाजी ही लेते रहे है और आज तक ऐसा ही चल रहा है और बाकी बचे तीन कमरो मे माँ, मैं और मेरा भाई रहते है| पिताजी के देहांत (२०११) के बाद जब हमने किराए से दी हुई दुकान को खाली कराना चाहा तो दादाजी ने आपत्ति करते हुए कहा की ये मेरा मकान है और जब हम चाहेंगे तभी खाली होगा, इसी तरह से जब हमने मकान का विस्तार करना चाहा तब भी उन्होने आपत्ति करते हुए कहा की तुम लोगो का कोई हिस्सा नही है, और अपने जीते जी मै बँटवारा भी नही करूँगा, क़ानूनी रूप से बँटवारा करने के लिए जब हम सरपंच के पास खानदानी सजरा बनवाने के लिए गये तो वहाँ से भी नकारात्मक जवाब मिला, दरअसल दादाजी हम लोगो को ज़मीन – जायदाद मे से कोई हिस्सा ही नही देना चाहते और लोगो के बहकावे मे आकर दादाजी संपत्ति को बिक्री करने की तथा मेरे सौतेले भाई के नाम करने की योजना बना रहे है अगर ऐसा हुआ तो हम लोग सड़्क पर आ जाएँगे, कृपया सलाह दें कि –
 (१) संपत्ति का बँटवारा कैसे होगा|
 (२) क्या हमारे दादाजी की संपत्ति मे उनके दोनो भाइयो का भी हिस्सा है|
 (३) हम किरायेदार से किराए की दुकान को कैसे खाली करवा सकते है |

– प्रदीप कुमार ज़ायसवाल, गाँव – सिहावल, पोस्ट- सिहावल, तहसील – सिहावल, थाना – अमिलिया, जिला- सीधी (मध्य प्रदेश)

समाधान-

प के दादाजी और उन के भाइयों के बीच बँटवारा कानूनी तौर पर नहीं हुआ था। बल्कि उन्होंने परिवार के अंदर एक अन्दरूनी व्यवस्था बना रखी थी। उस के अंतर्गत कुछ लगो कहीं काम करते थे और कहीं रहते थे। बँटवारा आज तक नहीं हुआ आप को बँटवारा कराने के लिए बँटवारे का दीवानी/ राजस्व वाद संस्थित करना होगा।  चूंकि दादाजी व उन के भाइयों के बीच बंटवारा नहीं हुआ था इस कारण संपूर्ण संपत्ति जो तीनों भाइयों की संयुक्त रूप से थी उस का बंटवारा इस बंटवारे में होगा। इस में आप के दादा जी के अतिरिक्त शेष दो दादाजी को जो संपत्ति अलग कर के दी गयी थी उस का भी बंटवारा होगा। यह वाद संस्थित करने के साथ ही संपत्ति का कोई भी हिस्सेदार किसी संपत्ति को बेच कर खुर्दबुर्द न करे इस के लिए अदालत से स्टे प्राप्त किया जा सकता है।

आप के  दादाजी की अलग से कोई संपत्ति नहीं है बल्कि तीनों दादाओँ की संयुक्त संपत्ति है इस कारण तीनों  भाइयों की संपत्ति में तीनों का हिस्सा है।

यदि किराएदार को आप के पिताजी ने दुकान किराए पर दी है तो उस के संबंध में आप के पिता ही लैंडलॉर्ड माने जाएँगे और वे दुकान खाली कराने के लिए दीवानी न्यायालय में दावा संस्थित कर सकते हैं।

आप को किसी स्थानीय वकील को सभी दस्तावेज दिखा कर परामर्श प्राप्त कर के तुरन्त कार्यवाहियाँ करनी चाहिए।

 

 

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