विवाह Archive

बाल विवाह कैसे रुकवाएँ?

February 8, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

प्रेम प्रजापत ने करौली, राजस्थान से पूछा है-

सर हमारे परिवार में लड़की का विवाह 15-16 कि उम्र में कर दिया जाता है, सर ऐसे विवाह को रोकने के लिए क्या किया जाए?

समाधान-

बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है। जिस के अनेक कारणों में से अशिक्षा एक महत्वपूर्ण कारण है। हो सकता है आप के परिवार में बाल विवाह एक प्रथा के रूप में जकड़न बनाए हुए हो। तो इस का कारण यह भी हो सकता है कि आप के परिवार में शिक्षा कम हो और बच्चों को अधिक न पढ़ाया जाता हो। इस के लिए आप परिवार में यह संघर्ष छेड़ सकते हैं कि बच्चे हायर सैकण्डरी तक जरूर पढ़ेंगे और तब तक विवाह न होगा। हायर सैकण्डरी पास होने तक आम तौर पर उम्र 18 वर्ष हो जाती है। आप यदि थोड़े भी पढ़े लिखे हैं तो आप अपने परिजनों को समझा सकते हैं कि बाल विवाह से कितनी बुराइयाँ हैं? जितने वे लोग इस में लाभ देखते हैं उस से अधिक उन्हें बुराइयाँ बताई जा सकती हैं। इस तरह आप परिवार में एक माहौल बना सकते हैं। एक व्यक्ति भी बाल विवाह के विरुद्ध परिवार में तन कर खड़ा हो जाए तो ये करना असंभव हो सकता है। आप कोशिश करें।
आप की तमाम कोशिशों के बाद भी यदि परिवार को बाल विवाह करने से रोका जाना संभव नहीं हो तो आप कानून का सहारा ले सकते हैं। इस के लिए बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम-2006 की धारा 13 व 14 निम्न प्रकार हैं-

13. बाल-विवाहों को प्रतिषिद्ध करने वाला व्यादेश जारी करने की न्यायालय की शक्ति- 
(1) इस अधिनियम में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, यदि प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट का बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी के आवेदन पर, या किसी व्यक्ति से परिवाद के माध्यम से या अन्यथा सूचना प्राप्त होने पर यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के उल्लंघन में बाल-विवाह तय किया गया है या उसका अनुष्ठान किया जाने वाला है, तो ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसे किसी व्यक्ति के, जिसके अंतर्गत किसी संगठन का सदस्य या कोई व्यक्ति संगम भी है, विरुद्ध ऐसे विवाह को प्रतिषिद्ध करने वाला व्यादेश निकालेगा।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई परिवाद, बाल-विवाह या बाल-विवाहों का अनुष्ठापन होने की संभाव्यता से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी या विश्वास का कारण रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा और युक्तियुक्त जानकारी रखने वाले किसी गैर-सरकारी संगठन द्वारा किया जा सकेगा।
(3) प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट का न्यायालय किसी विश्वसनीय रिपोर्ट या सूचना के आधार पर स्वप्ररेणा से भी संज्ञान कर सकेगा।
(4) अक्षय तृतीया जैसे कतिपय दिनों पर, सामूहिक बाल-विवाहों के अनुष्ठापन का निवारण करने के प्रयोजन के लिए, जिला मजिस्ट्रेट उन सभी शक्तियों के साथ, जो इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी को प्रदत्त हैं, बाल-विवाह प्रतिषेध अधिकारी समझा जाएगा।
(5) जिला मजिस्ट्रेट को बाल-विवाहों के अनुष्ठापन को रोकने या उनका निवारण करने की अतिरिक्त शक्तियां भी होंगी और इस प्रयोजन के लिए, वह सभी समुचित उपाय कर सकेगा और अपेक्षित न्यूनतम बल का प्रयोग कर सकेगा।
(6) उपधारा (1) के अधीन कोई व्यादेश किसी व्यक्ति या किसी संगठन के सदस्य या व्यक्ति संगम के विरुद्ध तब तक नहीं निकाला जाएगा जब तक कि न्यायालय ने, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति, संगठन के सदस्यों या व्यक्ति संगम को पूर्व सूचना न दे दी हो और उसे/या उनको व्यादेश निकाले जाने के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का अवसर न दे दिया हो :
परंतु किसी अत्यावश्यकता की दशा में, न्यायालय को, इस धारा के अधीन कोई सूचना दिए बिना, अंतरिम व्यादेश निकालने की शक्ति होगी।
(7) उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी व्यादेश की, ऐसे पक्षकार को, जिसके विरुद्ध व्यादेश जारी किया गया था, सूचना देने और सुनने के पश्चात् पुष्टि की जा सकेगी या उसे निष्प्रभाव किया जा सकेगा।
(8) न्यायालय, उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी व्यादेश को या तो स्वप्रेरणा पर या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर विखण्डित या परिवर्तित कर सकेगा।
(9) जहां कोई आवेदन उपधारा (1) के अधीन प्राप्त होता है, वहां न्यायालय आवेदक को, या तो स्वयं या अधिवक्ता द्वारा, अपने समक्ष उपस्थित होने का शीघ्र अवसर देगा, और यदि न्यायालय आवेदक को सुनने के पश्चात् आवेदन को पूर्णतः या भागतः नामंजूर करता है तो वह ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगा।
(10) जो कोई, यह जानते हुए कि उसके विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन व्यादेश जारी किया गया है, उस व्यादेश की अवज्ञा करेगा, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा :
परंतु कोई स्त्री कारावास से दंडनीय नहीं होगी।

14. व्यादेशों के उल्लंघन में बाल-विवाहों का शून्य होना–
धारा 13 के अधीन जारी किए गए व्यादेशों के उल्लंघन में, चाहे वह अंतरिम हो या अंतिम, अनुष्ठापित किया गया कोई बाल-विवाह प्रारंभ से ही शून्य होगा।

आप के परिवार में जिस का विवाह होने वाला हो उसके शिक्षा का प्रमाण पत्र जिस में उस की जन्मतिथि हो, या फिर उस का जन्म प्रमाण पत्र, या आधार कार्ड आदि की प्रतिलिपि आप आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। इस के साथ ही विवाह के लिए छपा निमंत्रण पत्र या फिर पोस्ट कार्ड आदि पर परिवार के लोगों दवारा भेजा गया कोई पोस्टकार्ड आदि मूल या उस की प्रतिलिपि प्राप्त कर सकते हैं। ये दोनों दस्तावेज प्रथम दृष्टया ये साबित कर देते हैं कि बाल विवाह आयोजित किया जा रहा है। इन दोनों दस्तावेजों के साथ आप क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट को धारा 13 (2) के अंतर्गत परिवाद (शिकायत) प्रस्तुत कर सकते हैं कि बालविवाह को रुकवाया जाए। आप की शिकायत पर बाल विवाह करा रहे लोगों को समन जारी कर जवाब देने के लिए बुलाया जा सकता है, साथ ही बाल विवाह रोकने के लिए अन्तरिम रूप से निषेधादेश जारी कराया जा सकता है। इस के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट जो कि हर जिले का कलेक्टर भी होता है उसे बाल विवाह रुकवाने के विशेष अधिकार प्राप्त हैं, वे भी बाल विवाह को रुकवा सकते हैं। आप दोनों स्थानों पर एक साथ शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। या न्यायिक मजिस्ट्रेट से अस्थायी निषेधादेश जारी करवा कर उस की प्रतिलिपि देते हुए जिला मजिस्ट्रेट से आवेदन दे सकते हैं इस आदेश की पालना में विवाह रुकवाया जाए।

धारा -14 में यह प्रावधान है कि निषेधादेश जारी होने के बाद यदि कोई विवाह संपन्न भी हो जाए तो वह बाल विवाह प्रारंभ सै ही शून्य होगा। इस तरह एक बार आपने यदि प्रयत्न कर के परिवार में बाल विवाह रुकवा दिया तो फिर हमेशा के लिए यह प्रथा समाप्त हो जााएगी। लेकिन पहले व्यक्तिगत रूप से पूरे परिवार को समझाने का अभियान चलाना पड़ेगा। जिस से परिवार के सदस्यचों में आपसी वैमनस्य न पैदा हो।

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समस्या-

अपूर्वा पांडेय ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी जन्मतिथि 30-04-1992 है, मेरा विवाह 5 मार्च 2018 को हिन्दू रीति रिवाज से संपन्न हुआ था।  विवाह के बाद सब कुछ अच्छा चल रहा था। पर अगस्त 2018 में रक्षाबंधन में मेरी पत्नी मायके गई फिर वो वापस नहीं लौटी। मायके मे मेरा साडू भाई पहले से घर जमाई रहता है। वो मेरी सास और मेरी पत्नी को मेरे खिलाफ भड़काता है और मेरी पत्नी उसी की बातों मे चल रही है।  मेरा और मेरी पत्नी का कभी कोई विवाद नहीं हुआ।  मैं अपनी पत्नी को लेने कई बार उसके मायके भी गया। पर उसने मेरे साथ आने से मना कर दिया। फिर मेरे पेरेंट्स उसको लेने गए। फिर भी वो उनके साथ नहीं आई।  फिर मैंने पुलिस अधीक्षक जबलपुर को इसकी सूचना दी और महिला परामर्श केंद्र मे सूचना दी। पर वहाँ भी वो कॉउंसलिंग के लिए नहीं आयी।  तब मैंने फैमिली कोर्ट में धारा 9 का आवेदन किया। तब कोर्ट के समन लेटर को लेने से उसने इंकार कर दिया। कोर्ट ने मेरे पक्ष मे एक तरफा फैसला कर दिया और मुझे धारा 9 की डिक्री दे दी। अभी तक मेरी पत्नी ने मेरे खिलाफ कोई केस या रिपोर्ट नहीं की है। पर उनके जिला न्यायालय के अधिवक्ता के माध्यम से मुझे एक लीगल नोटिस भिजवाया है। जिसमें वो लोग बोल रहे है कि मेरी पत्नी अभी नाबालिग है और आरोप लगा रहे है कि मैंने सब कुछ जानते हुए दबाव बनाकर उससे विवाह किया। अतः ये विवाह शून्यकरणीय है, और मेरी पत्नी के बालिग होने पर वो मेरे खिलाफ कार्यवाही करेंगे।  मुझे मेरी पत्नी की जन्मतिथि ज्ञात नहीं है क्योंकि विवाह सामाजिक रीतिरिवाज से संपन्न हुआ था विवाह के पहले मैं अपनी पत्नी को नहीं जानता था जो भी हुआ हम दोनों के घरवालों के पसंद से हुआ, इतना जरूर ज्ञात है कि सगाई के समय जब मैं पहली बार लड़की से मिला था तो उसने अपनी उम्र मुझे 19 वर्ष बताई थी और यहाँ तक जब बाद मैं उन लोगो ने विवाद किया और उन्होंने 100 नंबर डायल कर पुलिस बुलाई तो उसके रजिस्टर मे भी लड़की ने अपनी उम्र 19 ही लिखवाई उसमे हम दोनों ने साइन भी किये, अतः इसके अनुसार मुझे लड़की की उम्र अभी तक 19 वर्ष ही ज्ञात है, और विवाह के पहले से उसके परिवार वाले भी यही बोलते आ रहे है। मेरी माँ और मेरी पत्नी की माँ बचपन की मित्र है, मित्र होने की वजह से मेरी माँ ने उनपर बहुत भरोसा किया, और ऐसा भी हो सकता है कि लड़की की वास्तविक उम्र 19 ही हो किन्तु उसके डॉक्यूमेंट मे उसकी उम्र कम दर्शायी गयी हो, अतः मुझे इसका बारे मैं कुछ ज्ञात नहीं है। मुझे कोई उचित सलाह दे क्योंकि धारा 9 की डिक्री मैं प्राप्त कर चुका हूँ। जिसमें कोर्ट ने उसे 30 दिन के अंदर अपने विवाह संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए आदेश दिया है। अतः क्या मुझे यदि वो 30 दिन मैं नहीं आती है तो क्या डाइवोर्स के लिए फाइल करना चाइये और यदि डाइवोर्स फाइल करना चाइये तो कहां करना चाहिये। क्या वही कोर्ट डाइवोर्स ग्रांट करेगी जिसने मुझे धारा 9 की डिक्री ग्रांट करी है। क्योंकि मैं मूलत: रहने वाला उत्तराखंड से हूँ और जबलपुर में हॉस्पिटल में डेंटल सर्जन के पद पर हूँ। मेरे वैवाहिक कारणों से मेरे कैरियर पर भी असर पड़ा है और मैनेजमेंट ने मुझे त्यागपत्र देने  के लिए आदेश दिया है तो मैं अपने गृह प्रदेश जा रहा हूँ।

समाधान-

जब आप की पत्नी ने नोटिस के माध्यम से यह जाहिर किया है कि वह विवाह को अकृत घोषित करने के लिए आवेदन करेगी। इस का अर्थ यह है कि वह अभी 18 वर्ष की नहीं हुई है। लेकिन आप को अब विवाह विच्छेद का आवेदन ही प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन विवाह को 5 मार्च 2018 को एक वर्ष पूर्ण होगा। उस के बाद ही आप विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। उस के पहले नहीं। दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए डिक्री पारित होने के उपरान्त यदि डिक्री की पालना में प्रत्यास्थापन न हुआ हो तो एक वर्ष पूर्ण होने के बाद ही इस आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की जा सकती है। वर्तमान परिस्थिति में आप के पास यदि विवाह विच्छेद का कोई अन्य आधार नहीं है तो आप विवाह विच्छेद की डिक्री के लिए आवेदन प्रस्तुत नहीं कर सकते।

हमारे विचार में आप को तुरन्त अपनी पत्नी की ओर से दिए गए नोटिस का उत्तर दिलवा कर स्पष्ट करना चाहिए कि आप ने कोई दबाव नहीं डाला बल्कि पत्नी पक्ष के द्वारा आप को धोखे में रखा गया है, और अभी भी नोटिस में उम्र नहीं बताई है। इस के अतिरिक्त आप को दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए पारित डिक्री की पालना के लिए निष्पादन कराने का आवेदन करना चाहिए। इस प्रक्रिया को एक साल चलाते रहें और उस के बाद प्रत्यास्थापन न होने के आधार पर विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर दें।

यदि इस बीच पत्नी की ओर से विवाह को अकृत या शून्य घोषित करने का कोई आवेदन प्रस्तुत किया जाता है और उसकी सूचना आप को मिलती है तो आप उसी आवेदन में काउंटर क्लेम प्रस्तुत करते हुए अपने आधारों पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करने की प्रार्थना कर सकते हैं।

आप विवाह विच्छेद का आवेदन केवल वहाँ प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ आप का विवाह हुआ है या फिर जहाँ आपने अंतिम बार साथ साथ निवास किया है।

समस्या –

दिनेश नेताम ने टिल्डा, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मैं एक जनजाति परिवार से हूँ, मेरा विवाह 2011 में सामाजिक रीति से हुआ था। बाद में पता चला कि मेरी पत्नी और उस के परिवार के लोग अनुसूचित जाति के हैं और हम लोग अनुसूचित जनजाति के।  लेकिन दोनों समाज में बेटी रोटी व्यवहार बहुत पहले से मान्य है। मेरी पत्नी ने मेरे पूरे परिवार के ऊपर दहेज प्रथा का केस लगाया उसे मैं जीत चुका हूँ, फिर अपील की उसे भी मैं जीत चुका हूँ। अब मुकदमा हाईकोर्ट चला गया है। मैं इतना जानना चाहता हूँ कि मेरी प्तनी अनुसूचित जाति की है जिस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। क्या मैं इस विवाह को न्यायालय से निरस्त करवा सकता हूँ। मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

आप की समस्या जटिल है। जहाँ तक जनजाति का प्रश्न है उस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप की जनजाति में एक खास अनुसूचित जाति की लड़की से विवाह को मान्यता प्राप्त है।  इस कारण आप का विवाह आप की जनजाति की सहमति से संपन्न हुआ है और आप की जनजाति ने उसे मान्य भी कर दिया है। इस कारण आप पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप का विवाह आप की परंपरा से ही हुआ है।

ऐसी परिस्थिति में आप को अपनी जनजाति पंचायत में मामला ले जाना चाहिए और वहाँ जनजातीय विधि से पंचायत बैठा कर तलाक, झगड़ा आदि का मामला निर्णीत कराना चाहिए। जब पंचायत मामले को सुलझा ले तो पंचायत से प्रमाण पत्र ले कर पारिवारिक न्यायालय में विवाह विच्छेद की घोषणा का वाद संस्थित करना चाहिए।

इस तरह के मामले पर किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की नजीर उपलब्ध नहीं है। यदि है भी तो हमारी नजर में तलाश करने पर भी नहीं आई है। इस कारण हो सकता है आप की पत्नी विरोध करे कि पंचायत द्वारा दिया गया निर्णय अवैध है और आप का विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होता है। पर हमारी राय में  आप की पत्नी का यह तर्क मान्य नहीं हो सकेगा।

रणनीतिक रूप से आप पहले हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें। यदि वहाँ जवाब में यह आए कि हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। तो आप वहाँ से उस के जवाब की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर अपने पास रखें और उस के बाद हमारे द्वारा ऊपर सुझाई गयी प्रक्रिया का अनुसरण कर सकते हैं।

समस्या-

सत्यम ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी एक फ्रेंड है, उसका हस्बैंड उसको मारता पीटता है, मेंटली टॉर्चर करता है, बिना बात के ही लड़ता रहता है। आज तो उसने हद ही कर दी, सुबह से बिना बात के लड़ने लगा और बोलता है कि मेरे घर में सिगड़ी नहीं चलना चाहिए। वाइफ बोलती है, सिगड़ी ना जलाओ तो मर जाऊं क्या ठंड में। तो हस्बैंड बोलता है कि मर जा, अब यदि सिगड़ी जलाई तो वही सिगड़ी तेरे ऊपर डाल दूंगा जलती हुई। उस लड़की की लाइफ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। घर से निकलने नहीं देता। किसी रिलेटिव पहचान वालों के यहां जाने नहीं देता। कहता है कि मैं जिस से बोलूंगा उससे मिलेगी, उससे बात करेगी, नहीं तो किसी से नहीं करेगी। बिना बात के लड़ता रहता है। लड़की को डिवोर्स भी नहीं देता है, बोलता है कि मैं तुझे छोड़ने नहीं दूंगा। सबसे ज्यादा शक करता। उसको कहीं आना जाना नहीं देता और मारने के लिए हाथ उठाता है। एक दो बार मारा भी। लड़के की फिजिकल रिलेशन किसी और के साथ है शायद। वह दूसरी लड़के को घर में लाना चाहता है। लड़की बोलती है कि तेरे को देख के साथ रहना है, जिसको लाना है ले आ। बस मुझे शांति से रहने दे। इस पर लड़का बोलता कि मैं ना तुझे जीने दूंगा, ना मरने दूंगा। लड़की करे तो क्या करे? लड़की के पास कोई सबूत नहीं है कि उसका हस्बैंड कहीं और रिलेशन में है। लड़की का साथ देने वाला कोई नहीं है कि वह अपने हस्बैंड के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा सके। लड़की तो अपने हस्बैंड से बात करना पसंद नहीं करती, तो क्या करें? कोई रास्ता बताइए।

समाधान-

लड़की के साथ घरेलू हिंसा हो रही है। भंयकर अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार किया जा रहा है। मारपीट भी हुई है। यह सब विवाह विच्छेद के लिए पर्याप्त है। इस के अलावा धारा 498ए आपीसी में संज्ञेय अपराध भी है, जिस की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यह रिपोर्ट कोई भी परिजन या मित्र भी कर सकता है।

न्यायालय में किसी भी मामले में निर्णय होने में हमारे यहाँ समय लगता है। इस का मुख्य कारण हमारे मुल्क के पास जरूरत की चौथाई अदालतें भी नहीं होना है। अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 140 अदालतें हैं जब कि भारत में मात्र 12 इस तरह वहाँ के अनुपात में हमारी अदालतों की संख्या 8 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सभी तरह के विक्टिम पुलिस या न्यायालय के पास जाने के बजाए यातनाएँ भुगतते रहते हैं। इसी कारण अनेक प्रकार के अपराध पलते रहते हैं। हर रिपोर्ट कराने आने वाले को हतोत्साहित करती है कि रिपोर्ट कराने के बजाए भुगतते रहो, क्यों कि उसे भी अपने रिकार्ड में अपराध कम दिखाने होते हैं।

जहाँ तक स्त्रियों का मामला है वे तब तक पुलिस के पास जाने में झिझकती हैं जब तक कि उन्हें यह पक्का विश्वास न हो जाए कि उन के पास जीवन जीने और सुरक्षा के पर्याप्त विकल्प हैं। जब कभी कोई परिचित इस तरह की रिपोर्ट करा भी दे तो स्त्रियाँ पुलिस के या अपने पति व ससुराल वालों के दबाव के कारण टूट जाती हैं और कह देती हैं कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहती। वैसी स्थिति में वह परिचित बहुत बुरी स्थिति में फँस जाता है। अक्सर लड़की के मायके वाले भी उस का साथ नहीं देते, क्यों कि हमारा तो विचार ही यह है कि लड़कियाँ परायी होती हैं। इस विचार के अनुसार लड़कियाँ समाज में सब के लिए पराई होती हैं, वे कभी किसी की अपनी नहीं होतीं।

इस मामले में यदि आप मन, वचन कर्म से चाहते हैं कि लड़की उन यातनाओं से मुक्त हो अच्छा जीवन जिए तो आप को उसे विश्वास दिलाना होगा कि उस के पास सुरक्षित जीवन  जीने के न्यूनतम वैकल्पिक साधन हैं। आप को भी प्रयास करना होगा कि वह किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। तभी वह यह लड़ाई लड़ सकती है। यदि आप आश्वस्त हैं कि लड़की को न्यूनतम वैकल्पिक जीवन साधन उपलब्ध होने का विश्वास दिला सकते हैं तो आप पुलिस को रिपोर्ट करें, पुलिस कार्यवाही न करे तो एस.पी. को मिलें। यदि फिर भी काम न चले तो मजिस्ट्रेट को शिकायत दें। लड़की को उस के पति की कारा से मुक्ति दिलाएँ।

लड़की के मुक्त हो जाने पर उस की ओर से विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन, धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण के लिए परिवार न्यायलय में आवेदन प्रस्तुत कराएँ। घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण, वैकल्पिक आवास तथा लड़की के आसपास न फटकने के लिए निषेधात्मक आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं। इस से लड़की को जो मदद आप अभी उपलब्ध करा रहे हैं उस की जरूरत कम हो जाएगी।  आप लड़की को कोई नियोजन दिला कर उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें। उसे नियोजन मिल जाने पर वह स्वावलंबी हो जाएगी। जब उस का विवाह विच्छेद हो जाए तो वह निर्णय कर सकती है कि उसे एकल स्त्री की तरह जीना है अथवा एक अच्छा जीवन साथी तलाश कर उस के साथ जीवन व्यतीत करना है।

राजस्थान की मीना जनजाति में तलाक

December 23, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

एक मीना पंचायत

समस्या-

रजत ने करौली, राजस्थान से पूछा है-

मैं मीना जाति से हूँ। मैं पत्नी से तलाक़ चाहता हूँ। हम दोनो सरकारी नौकरी मैं हैं। पत्नी का स्वभाव क्रूर प्रकृति का है, मेरी सास व साले का हमारे बीच दखल है। ये लोग दहेज का केस करने की धमकी देते हैं। पत्नी कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है, जैसे चलती बाइक से कूद जाना, मेरी बिना सहमति व जानकारी के 4 बार गर्भपात करवा देना जिसके हॉस्पिटल के जाँच के पेपर मेरे पास हैं। इस कृत्य के लिए मैने लीगल नोटिस दिनांक 02 मई 2018 को भिजवाया था। लेकिन उसने रजिस्टर्ड डाक को डाकिये से लेने से इनकार कर दिया था। अब पिछले 6 महीने से मेरे 2 साल के पुत्र को पत्नी ने अपनी मां के पास छोड़ रखा हैं व खुद नौकरी करती है। बालक से मुझे जब भी मिलने गया तो पत्नी की मां छुपा देती है। पत्नी द्वारा साल भर पहले मुझे दहेज लेने का नोटिस दिया व उसके बाद नौकरी के लिए शपथ पत्र दिया कि विवाह के समय दहेज न तो लिया गया और न ही दिया गया। पत्नी से मुझे किसी भी स्थति में तलाक़ चाहिये।  सामाजिक पंचायत के अलावा तलाक़ के लिए क्या सीधे कोर्ट में आवेदन किया जा सकता है?

समाधान-

आप मीना जाति से हैं जो कि राजस्थान में एक घोषित अनुसूचित जनजाति है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 के अनुसार आप की जाति पर यह अधिनियम प्रभावी होना चाहिए, किन्तु इसी धारा की उपधारा (2) में यह उपबंधित है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के क्लॉज (25) में घोषित अनुसूचित जनजातियों पर इस अधिनियम का कोई उपबंध प्रभावी नहीं होगा। इस तरह हिन्दू विवाह अधिनियम आप के विवाह पर प्रभावी नहीं है। आप पर परंपरागत विधि ही प्रभावी होगी जो कि आप की जाति में निरन्तर तथा समान रूप से प्रचलित है।

आप की मीना जाति की परंपरागत विधि है कि विवाहित युगल के बीच विवाह विच्छेद केवल पंच पटेल ही स्वीकृत कर सकते हैं। इस कारण आप को अपने पंच पटेलों की पंचायत ही बुलानी होगी, उसी में तलाक संभव है अन्य किसी प्रकार से नहीं।

पंच पटेलों द्वारा तलाक स्वीकृत या अस्वीकृत कर देने के बाद आप पारिवारिक न्यायालय में जा कर घोषणा का वाद संस्थित कर सकते हैं कि अब आप दोनों वैवाहिक संबंध में नहीं रहे हैं, और इस आशय की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।  यदि आप सीधे ही न्यायालय में आवेदन करेंगे तो वह क्षेत्राधिकार न होने के कारण निरस्त हो जाएगा।

समस्या-

वंदना श्रीवास्तव ने सागर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पति ने अपनी पहली पत्नी के होते हुए मेरे से शादी की। मुझे उनकी पहली पत्नी के बारे मे कुछ भी जानकारी नहीं थी। उनके दो बच्चे भी हैं। अब वो मुझे छोड़ कर अपनी पहली पत्नी के साथ रहते हैं और उनकी पहली पत्नी मुझे गंदा गंदा गाली गुफ्ता करती है। मेरे भी दो बेटे हैं, मेरे पति कभी भी मुझे ज़रूरत भर का पैसा नहीं देते हैं और लिए मे मेरा पूरा गहना जो मेरे मा पापा दिए थे वो भी ले लिए हैं. क्या मेरा और मेरे बच्चो का उनके या उनकी संपाति पे कोई अधिकार न्ही है? मुझे कुछ सुझाव दीजिए कि मैं क्या करूं?

समाधान-

वंदना जी, यह तो हो सकता है कि आप को  विवाह के पहले पति की पहली पत्नी और उस के बच्चों के बारे में पता नहीं हो। पर आप को अपने खुद के दो बच्चे होने तक पता नहीं लगा हो। आप आज यह शिकायत तब कर रही हैं जब आप को इस विवाह से खुद के और बच्चों के पालन पोषण में समस्या आने लगी है। कानून का कायदा है कि जब भी आप को पता लगे कि आप के साथ कुछ अन्याय हुआ है, कोई अपराध हुआ है आप तुरन्त कानून की मदद लें। जितना आप देरी करती जाएंगी आप के लिए कानूनी उपाय मुश्किल होता जाएगा। अब यह साबित करना बहुत कठिन है कि पहली पत्नी और बच्चों के बारे में आप को अब पता लगा हो। यदि आप पहली पत्नी और बच्चों के बारे में जानकारी होते ही पुलिस को रिपोर्ट करती तो वह आप के पति का अत्यन्त गंभीर अपराध था उन्हें सजा हो सकती थी।

ह आप स्पष्ट रूप से से समझ लें कि पहली पत्नी होते हुए आप के साथ किया गया विवाह वैध नहीं है और आप को वैध पत्नी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं। लेकिन आप के दोनों बच्चें वैध हैं उन्हें अपने पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है इस के लिए वे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में तथा संरक्षक एवं पतिपाल्य अधिनियम के अंतर्गत भरण पोषण के लिए प्रतिमाह धनराशि प्राप्त करने के लिए कार्यवाही कर सकते हैं। वे यदि नाबालिग हैं तो उन की ओर से आप को अपने पति के विरुद्ध कार्यवाही करने का आधिकार है, यह कार्यवाही आप कर सकती हैं।

प भी अपने पति के साथ रही हैं या फिर पति आप के पास रहे हैं, इस कारण से आप भी अपने पति से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं और उन से अपने व बच्चों के लिए पृथक आवास की व्यवस्था करने और आप के खुद के भरण पोषण के लिए मासिक राशि निश्चित करवा सकती हैं।

प के पति के बच्चों को वे चाहें पहली पत्नी से हों या फिर आप से उन्हें या आप को या आप के पति की पहली पत्नी को पति की स्वअर्जित संपत्ति पर उ नके जीतेजी कोई अधिकार नहीं है। लेकिन यदि वे उन की मृत्यु के समय कोई संपत्ति बिना वसीयत किए छोड़ते हैं तो उस संपत्ति में आप के दोनो बच्चों और पहली पत्नी और उस के बच्चों को समान अधिकार प्राप्त होगा, प्रत्येक को 1/5 हिस्सा मिलेगा। लेकिन उस संपत्ति में आपका कोई अधिकार नहीं होगा। यदि कोई पुश्तैनी संपत्ति है और उस में आप के पति का हिस्सा है तो उस  में आप के बच्चे हिस्सा मांग सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं। उन्हें उस संपत्ति मे हिस्सा प्राप्त होगा या नहीं यह अभी नहीं कहा जा सकता क्यों कि इस मामले में दोनों तरह की राय न्यायालयों ने व्यक्त कर रखी है। पर हमारे हिसाब से अवैध पत्नी के बच्चों को भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।

समस्या-

हरगोबिंद सिंह ने ग्राम पो. मालारामपुरा, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से पूछा है-

त्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने किसी महिला से शादी कर ली, तो इस पुरुष की मौत के बाद इस दूसरी जीवित पत्नी का जमीन-संपत्ति पर क्या हक होगा? मृत पुरुष के दोनों पत्नियों से दो-दो बच्चे इसी पुरूष की संतान हैं।

समाधान-

पुरुष ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह किया है इस तरह दूसरी पत्नी उस की उसी तरह वैध पत्नी है जैसे पहली पत्नी वैध थी। इस कारण इस दूसरी पत्नी को वही अधिकार प्राप्त होंगे जो अधिकार पहली पत्नी को उस के पति के मरने के बाद हासिल होते।

इस पुरुष की दो  संतानें पहली पत्नी से और दो ही संतानें दूसरी पत्नी से हैं। इस कारण से उस की चारों ही सन्ताने भी वैध संतानें हैं। दूसरी पत्नी से उत्पन्न होने वाली संतानों को भी उसी तरह अधिकार प्राप्त होंगे जैसे पुरुष की पहली पत्नी से मृत्यु नहीं हुई थी और बाद वाली दोनों संतानों का जन्म भी पहली पत्नी से ही हुआ है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से मृत हिन्दू पुरुष का उत्तराधिकार तय होगा। यदि खेती की जमीन है तो उस का उत्तराधिकार भी धारा 8 से ही तय होगा। इस धारा के अनुसार माता (यदि जीवित हो तो), पत्नी और सभी सन्तानों को बराबर उत्तराधिकार प्राप्त होगा। आप के मामले में लगता है कि माता जीवित नहीं है। वैसी स्थिति में प्रथम श्रेणी के पाँच उत्तराधिकारी हैं। चारों संतानें और पत्नी। पाँचों में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। खेती की जमीन में मृत्यु के कारण खुलने वाले नामान्तरण (फौती इन्तकाल) में पाँचों के नाम 1/5 हिस्सा दर्ज होगा। शेष अचल संपत्ति में भी पाँचो को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

समस्या-

प्रतापचंद्र ने ग्राम करवनियां, ब्लाक नगवां, जिला सोनभद्र (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी बहन कंचन का केस अप्रैल 2016 से ही रावर्ट्सगंज जिला न्यायालय में चल रहा है। 2013 में बस्ती जिले के करमांव निवासी किसोर चंद्र मणी से उसकी शादी हिंदू रिवाज से हुई थी, जिसके बाद तीन बार वह क्रमशः 1 सप्ताह, 1 माह, 3 माह के लिए, ससुराल गयी है। उसे बार बार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उस पर जानलेवा हमला किया गया, उसके पति का उसकी भाभी से संबंध है, इसका विरोध करने पर परिवार वालों ने इसे भी देवर से संबंध रखने की सलाह दे डाली। तीन साल तक सुलह-समझौता करवा कर दोनो पक्षों द्वारा मामले को हल करने की भरसक कोशिश की गई, पर हल न निकला। दहेज की मांग व शारिरिक प्रताड़ना और भी बढ़ती गई।  जब उसे जान से मार देने की कोशिश की गई तब से वह अपने मायके में ही है, और वह उससे तलाक लेना चाहती है। पहले मिल कर बातचीत से तलाक़ का मामला हल न होने पर, साल 2016 अप्रैल में हम लोग की तरफ से दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा तथा गुजाराभत्ता लड़के पक्ष वालों पर मुकदमा कर दिया गया। लड़के वाले पहले की ही तरह अब भी धोखाधड़ी वाली बात करते हैं कि अब सब ठीक हो जायेगा विदाई कर दो। पर लड़की का स्टैंड क्लीयर है- कि मुझे तलाक़ चाहिए। दो-ढाई सालों में कोर्ट में वे लोग पेशी पर अबतक तीन या चार बार ही आये हैं, किंतु उनका कुछ नहीं हुआ। अक्टूबर 23, 2018 को मेंटेनेंस (125) का फैसला आया पर कोर्ट द्वारा तय रू. 2500 गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है, बाकी दो केसों का क्या हुआ वकील कुछ नहीं बताता। मुझे जानकारी नहीं है। मै बाहर ही रहता हूँ गाजियाबाद. कृपया बतायें की अब कोर्ट क्या करेगी? या हमें क्या करना होगा। ताकि जल्दी से मामले का निपटारा हो?

समाधान-

2013 में शादी हुई, बहिन तीन बार में कुल मिला कर चार माह एक सप्ताह ससुराल में रह रही है। उसी में इतने झगड़े हैं। आप ने जब सुलह समझौते की बात शुरू की तभी आप को ये सारे मुकदमें और तलाक का मुकदमा कर देना चाहिए था। सुलह समझौते की बातचीत तो मुकदमों के लंबित रहते भी चल सकती थी।

दो-ढाई साल पहले 2016 आप की बहिन की और से तीन मुकदमे किए गए हैं।  अब आप को जल्दी पड़ी है। तीनों मुकदमों में सामने वाले पक्ष को जवाब देने का मौका होगा, आप की साक्ष्य होगी, उस की साक्ष्य होगी फिर बहस और फिर फैसला होगा। समय तो लगेगा। यह अमरीका नहीं है जहाँ दस लाख की आबादी पर 140 अदालतें हों, यहाँ इतनी आबादी पर 12-13 अदालतें हैं। लोग ज्यादा अदालतों के लिए तो लड़ेंगे नहीं, वोट देंगे तब हिन्दू मुसलमान हो जाएँगे। तो ऐसे ही भुगतना होगा।

आप की बहिन को तलाक चाहिए और अभी तक तलाक का मुकदमा तक नहीं किया है। तलाक कैंसे मिलेगा? जिस दिन आप को यह पता लगा कि पति के उस की भाभी के साथ संबंध है और बहिन को भी देवर के साथ संबंध रखने की सलाह दी गयी है तभी आप को तुरन्त तलाक का मुकदमा करवाना चाहिए था। अब भी बहिन के लिए तलाक चाहते हैं तो उस के लिए मुकदमा तुरन्त करें। आप ने 2013 से 5 साल बहिन के जीवन के बरबाद हो चुके हैं। थोड़ा धैर्य रखिए नतीजे भी आएँगे। न्याय ऐसी चीज नहीं है जो जाए और बाजार से खरीद लाए, बस काम खत्म। समय तो लगेगा।

आप खुद अपनी बहिन के वकील से दैनन्दिन संपर्क में नहीं हैं। एक बार जाइए, उस से मिलिए और विस्तार से बात कीजिए। उसे कहिए कि आप उस से फोन पर पूछताछ करते रहेंगे। तो वकील सब कुछ बताएगा। यदि एक दो मुलाकातों के बाद लगे कि वकील ठीक से काम नहीं कर पा रहा है तो किसी अच्छे वकील को कर लें। हालांकि वकील बदलने से मुकदमे में लगने वाला समय कम होगा ऐसा लगता नहीं है।

समस्या-

रोशनी खातून ने ग्राम हमीरपुर जिला कटिहार, बिहार से पूछा है-

मैं मुस्लिम धर्म से हूँ। मेरी शादी 7 महीने पहले हुई थी मेरे पति मेरे साथ मारपीट और दहेज़ की मांग करते थे।  उसके खिलाफ महिला थाना में आवेदन दिया।  थाने में उस ने दरोगा को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। एक एफिडेविट दिया कि मारपीट नहीं करेंगे और पति-पत्नी की तरह रहेंगे और थाने से ही मेरी विदाई हुई। ससुराल पहुँचने के बाद फिर से वही ताने, मारपीट, दहेज़ की डिमांड होने लगी। फिर मैंने अपनी माँ को फ़ोन कर के बताया तो वो मुझे ससुराल से मायके ले आयी।

अब मैं 2 महीने से गर्भवती हूँ , इसकी सूचना अपने पति को फ़ोन करके दी तो कहता है मैंने तुमसे शादी ही नहीं की है, तो ये मेरा बच्चा कैसा हुआ। अब मैं क्या करूँ? गर्भपात कराऊँ या बच्चे को इस दुनिया में आने दूँ। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा ? मेरे पति मुझसे शादी सिर्फ दहेज़ के लिए किये थे।

अब वो दूसरी शादी करने वाले हैं। क्या वो मुझसे बिना तलाक लिए शादी कर सकता है?  इस बच्चे का क्या करूँ?  उसपर कौन सा केस करूँ।  केस कितने सालों तक चलेगा? क्या शादी में दिया हुआ सामान वो वापस करेगा? समाज में मेरे परिवार की बदनामी हो रही है, इसलिए मैं आत्महत्या करने की सोच रही हूँ क्यूंकि क़ानून से न्याय मिलने में मुझे पता नहीं कितने साल लग जाएंगे। कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प के विवाह को सात माह हुए हैं और उस में आप पर तमाम कहर टूट पड़े हैं। आप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को ले कर आत्महत्या करने की सोचना बिलकुल भी ठीक नहीं है। आपने और न ही आप के परिवार ने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिस से बदनामी हो।  बदनामी तो उस शख्स और परिवार की होनी चाहिए जिस ने आप के साथ इंसान की तरह नहीं। होता यह है कि जब भी कोई गलत काम करता है तो उस का परिणाम आने के पहले ही झूठा प्रचार आरंभ कर देता है। इस से पीड़ित पक्ष को लगता है कि उस की बदनामी हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप को चाहिए कि आप धीरज रखें और अपने विरुद्ध हुई ज्यादतियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें।

आप को जब एक बार शपथ पत्र दे कर आप का पति ले गया था और उस के विपरीत उस ने व्यवहार किया है तो आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। आप का कहना है कि पहले पुलिस ने पैसा खा कर काम नहीं किया। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। आम तौर पर पुलिस को यह निर्देश हैं कि पहली बार में पति पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। उस दफे भी आप यदि जाने से इन्कार कर देतीं तो पुलिस किसी हालत में समझौता नहीं कराती। हो सकता है यह करते हुए भी पुलिस के किसी अधिकारी ने सामने वाले पक्ष से पैसा लिया हो। लेकिन आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए कि आपके साथ फिर से मारपीट हुई है, ताने मारे गए हैं, दहेज मांगा गया है जिस के कारण आपको पति का निवास छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। पति ने आप का तमान स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया है इस तरह पति ने धारा 323, 498ए, 406 आईपीसी का अपराध किया है। । यदि थाना रिपोर्ट करने से मना करे तो वही रिपोर्ट एक पत्र के साथ रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से एस.पी. को भेजनी चाहिए। यदि फिर भी कोई कार्यवाही न हो तो  मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकील की मदद से परिवाद दाखिल करना चाहिए। इस के अलावा मजिस्ट्रेट के न्यायालय में तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आवेदन दे कर भऱण पोषण की मासिक राशि की मांग करनी चाहिए।

यह सही है कि मुस्लिम विधि में चार विवाह तक किए जा सकते हैं। लेकिन यह भी प्रावधान है कि सभी पत्नियों को एक जैसा व्यवहार मिलना चाहिए तथा दूसरी शादी के लिए पहली की सहमति होनी चाहिए। आप चाहें तो दूसरा विवाह रुकवाने के लिए दीवानी अदालत से स्थायी व अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद व प्रार्थना कर सकती हैं। यदि फिर भी पति दूसरा विवाह कर ले तो आप को हक है कि आप भी अदालत से तलाक के लिए प्रार्थना पत्र दे कर तलाक ले सकें।

जहाँ तक गर्भ रह जाने की बात है। बच्चे का भविष्य तो अभी अनिश्चित ही है। पिता गंभीर नहीं है तो उसे पिता का प्रेम और स्नेह तो मिलने से रहा। वैसी स्थिति में हमारी नजर में उस का दुनिया में आना ठीक नहीं है। फिर भी यह निर्णय तो केवल माँ ही ले सकती है कि उसे अपनी संतान को दुनिया में लाना है या नहीं। यदि अभी गर्भाधान को तीन माह नहीं हुए हैं तो स्वैच्छिक गर्भपात कराया जा सकता है।

जहाँ तक मुकदमों के चलने के समय की बात है तो यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वहाँ अदालतों में कितने मुकदमें हैं। कितने ही मुकदमे चल रहे हों पर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आपके पास यही रास्ता है और आपको मजबूती के साथ इस लड़ाई को लड़ना चाहिए। आप अवश्य जीतेंगी।

Nullity

समस्या-

मेरी छोटी बहन प्रियंका तोमर ने  4 जनवरी 2018  को शुभम सूर्यवंशी से प्रेम विवाह किया था। मेरी बहन सामान्य वर्ग से है और शुभम एसी/एसटी वर्ग से। शादी के बाद मेरी बहन को पता चला की शुभम पहले से ही शादीशुदा है और  डिवोर्स के लिए तारीख पर जाता है! लेकिन शुभम के परिवार वालों ने उस लड़की के बारे में कुछ नहीं बताया है जिससे शुभम की पहले शादी हुई थी। अब मेरी बहन मेरे घर वापस आ चुकी है और वह शुभम से तलाक लेना चाहती है तो उसके तलाक लेने की क्या विधि रहेगी? या हम इसकी शादी को शून्य घोषित करवा सकते हैं? दोनों ही स्थिति में क्या प्रोसेस रहेगी? मेरी मम्मी द्वारा उन्हें सोने के कुछ जेवर भी दिए गए थे, वह भी उन्होंने वापस नहीं किए। हमने थाने में जाकर रिपोर्ट करने की कोशिश की। लेकिन थाने वालों ने हमारी रिपोर्ट नहीं लिखी और कहा कि वह तुम्हें एसी/एसटी केस में फंसा देंगे। तुम उनके ऊपर कोई कार्यवाही मत करो और कोर्ट में जाकर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करो या फिर आपसी सहमति से तलाक ले लो। कृपया आप हमारा मार्गदर्शन करें।

– गोलू तोमर, एम/23, रतन आवा न्यूज

समाधान-

किसी हिन्दू विवाह में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (i), (iv) तथा (v) की शर्तों का उल्लंघन किया गया हो तो वह विवाह शून्य होता है। इन तीन शर्तों में पहली (i) शर्त यही है कि विवाह के किसी भी पक्षकार का जीवनसाथी जीवित नहीं होना चाहिए। आप की बहिन के मामले में यही हुआ है। जब विवाह हुआ तब आप की बहिन के पति की पहली पत्नी जीवित थी और उस से तलाक नहीं हुआ था। जिस के कारण आप की बहिन का विवाह शून्य है। इस के लिए आप की बहिन हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत परिवार न्यायालय में विवाह की शून्यता की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर के डिक्री प्राप्त कर सकती है। इस के लिए चाहिए कि आप बहिन के पति का जिस अदालत में मुकदमा चल रहा है उस अदालत से उस मुकदमे की पत्रावली की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर आवेदन के साथ ही न्यायालय में प्रस्तुत करें।

प की माँ के द्वारा आप की बहिन को जो सोने के बिस्कुट दिए थे वे तथा अन्य सभी उपहार जो आप की बहिन को विवाह या उस के उपरान्त दिए गए हों आप की बहिन का स्त्री-धन हैं। आप की बहिन उन्हें वापस मांग सकती हैं और नहीं लौटाने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध है। पुलिस को इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कर लेना चाहिए। लेकिन पूरे भारत में पुलिस का रवैया उस के पास किसी अपराध की रिपोर्ट दर्ज करने जाने वाले व्यक्ति के प्रति यही रहता है कि वे उसे रिपोर्ट न करने और मामले को बाहर ही सलटाने के लिए कहते हैं इस के लिए वे तरह तरह के डर भी दिखाते हैं। आप की बहिन के साथ जिस तरह का अपराध उस के कथित पति और उस के परिवार ने किया है उस के बाद वे एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत कोई रिपोर्ट करेंगे भी तो उस का कोई मूल्य नहीं होगा। पुलिस केवल अपने यहाँ दर्ज अपराधों की संख्या को कम रखने के लिए इस तरह करती है। यदि पुलिस थाने ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना किया है तो आप रजिस्टर्ड एडी डाक से अपना परिवाद एस.पी. पुलिस को प्रेषित करें। उस की रसीद और प्राप्ति स्वीकृति यदि लौट आए तो सुरक्षित रखें और एक सप्ताह में कार्यवाही न होने पर सीधे न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत करें। न्यायालय आप की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पुलिस को आदेश दे देगा। एस.पी. और न्यायालय को प्रस्तुत होने वाले परिवाद में स्पष्ट रूप से कहें कि पुलिस ने एससी एसटी एक्ट की कार्यवाही होने का डर दिखाते हुए रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया है।


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