Contract Archive

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

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समस्या-

रियाज़ुद्दीन ने बिलासपुर, जिला गौतम बुद्ध नगर, (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरे ससुर साहब ने 15 साल पहले एक प्लॉट खरीदा था शाइन बाग दिल्ली में उस समय किसी व्यक्ति ने मेरे ससुर साहब से कह कर कि एक ग़रीब फैमिली है अपने यहाँ रेंट पर रख लो। उन्होंने उस को रख लिया, वो भी विना रेंट के  15 साल तक उस से कोई किराया भी नहीं लिया। अब उनको उस प्लाट पर निर्माण करना है। लेकिन वह औरत उस प्लाट को खाली नहीं कर रही। बोलती है मुझ को दो फ्लोर बना कर दो या आधा मकान दो। मेरी पास इस के पेपर हैं, सब कुछ है, और एक दो बदमाशों से भी जा कर मिल ली है वो। उस औरत के आदमी की मृत्यु भी हो चुकी है। अब हम क्या कर सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें।

समाधान-

रियाजुद्दीन जी, अपनी किसी संपत्ति पर जब भी किराएदार या लायसेंसी के रूप में किसी को व्यक्ति को कब्जा दिया जाए तो उस की लिखित संविदा की जानी चाहिए, जिस पर दोनों पक्षकारों के सिवा कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों।  बेहतर हो यदि उस संविदा को उचित मूल्य के गैरन्यायिक स्टाम्प पर लिखा जाए और नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। नोटेरी के रजिस्टर में पक्षकारों के साथ-साथ गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए जाएँ। इस दस्तावेज को सुरक्षित रखा जाए। इस से भविष्य में यह साबित करने में आसानी रहे कि भूमि या परिसर किराए पर या लायसेंस पर उपयोग के लिए दिया गया था। यदि आप के ससुर साहब के पास इस तरह का कोई दस्तावेज या मामूली लिखत भी हो तो इस स्थिति में वह काम आएगा। यदि कोई भी दस्तावेज नहीं हो तो वहाँ जिस का कब्जा है उसकी किसी तरह की अभिस्वीकृति हो जिस का कोई सीधा या परिस्थिति जन्य सबूत हो।

यदि यह सब नहीं है तो यह माना जाएगा कि आप के ससुर ने उक्त संपत्ति को खुला छोड़ दिया था और फिर वर्तमान कब्जाधारी उस पर अपना काम करने लगा और आप के ससुर ने 12 वर्ष से अधिक से उस संपत्ति पर अपना कोई दावा नहीं किया। अवधि अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार 12 वर्ष से अधिक का कोई कब्जा हो जाने पर उस से कब्जा वापस लेने के लिए दावा नहीं किया जा सकता। इसी को एडवर्स पजेशन कहा जाता है। यदि उस से जबरन कब्जा लिया जाता है तो यह गैर कानूनी होगा और वर्तमान कब्जाधारी धारा  145 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कब्जा वापसी का प्रार्थना पत्र दे सकता है और उसे कब्जा वापस दिलाया जा सकता है।

आप के ससुर साहब के पास उस प्लाट के स्वामित्व का कोई सबूत जरूर होगा। उस के साथ यदि आप उस कब्जाधारी का कब्जा 12 वर्ष से कम का साबित कर सकें, या फिर यह साबित कर सकें कि वह जमीन / परिसर किराए पर दिया गया था और कम से कम एक बार किराया जरूर लिया गया था। तो आप को दीवानी का कोई अच्छा वकील उस प्लाट पर अपना कब्जा वापस प्राप्त करने का रास्ता सुझा सकता है। इसलिए हमारा सुझाव है कि आप ये सब सबूत या गवाही इकट्ठा करें और फिर किसी अच्छे दीवानी काम करने वाले वकील से मिलें और रास्ता निकालें। वैसे हमें लगता है कि इस जमीन का कब्जा वापस लिया जा सकता है। कानूनी रास्ते में अभी हमारे देश में बहुत समय लगता है। इस कारण लोग मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाने के स्थान पर बहुत कम प्रतिफल में समझौते करना पसंद करते हैं। यदि आप को लगे कि कोई सबूत नहीं हैं जिस से कानूनी तरीके से संपत्ति को वापस लिया जा सके तो बेहतर है कि आपस में ऊंच नीच कर के ही किसी तरह से संपत्ति वापस प्राप्त की जाए। पूरी नहीं तो आधी ही प्राप्त की जाए।

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समस्या-

ईशा ने झारिया, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक 2 साल की लड़की को गोद लेना चाहती हूूँ जो मेरे रिश्ते में ही आती है,  लेकिन कानूनी रूप से नहीं। मैं उसे हायार एजुकेशन देकर सेल्फ़ डिपेंड बनाना चाहती हूँ और विवाह का दायित्व लेना चाहती हूँ। लेकिन भविष्य में अपनी संपत्ति का कोई अधिकार उसे नहीं देना चाहती हूँ। मेरा स्वयं का एक बेटा है। क्या ऐसा संभव है।

समाधान-

क्यों कि आप का स्वयं का एक पुत्र है इस कारण से आप किसी भी संतान को विधिक रुप से गोद नहीं ले सकती हैं। आप ऐसा खुद भी नहीं करना चाहती हैं। इस कारण इसे गोद लेना तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जो कुछ आप उस के लिए करना चाहती हैं वह भी एक उत्तम विचार है। इस के लिए यदि उस लड़की के माता पिता तैयार हों तो ऐसा आपस में संविदा के माध्यम से किया जा सकता है।

लड़की के माता पिता और आप व आपके पति के मध्य एक लिखित संविदा निष्पादित हो जाए जो एग्रीमेंट के लिए आवश्यक स्टाम्प पर लिखी जाए और बाद में नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। इस दस्तावेज को उप पंजीयक के यहाँ भी एक संविदा के रूप में पंजीकृत कराया जा सकता है। इस संविदा के अनुसार लड़की के माता पिता लड़की की अभिरक्षा उस के विवाह तक के लिए आप को देंगे। आप लड़की की परवरिश अपनी स्वयं की संतान की तरह करेंगी, उसे स्वावलंबी बनाने की कोशिश करेंगी और उस के विवाह योग्य होने पर विवाह का व्यय उठाएंगी। बदले में उस के माता पिता अपनी बेटी की अभिरक्षा का दावा नहीं करेंगे। इस एग्रीमेंट की एक शर्त यह भी होगी कि वह लड़की कभी भी स्वयं को आप की पुत्री होने का दावा नहीं करेगी, आप की संपत्ति पर अथवा बाद में उत्तराधिकारी के रूप में किसी तरह का दावा नहीं करेेगी। इस तरह की संविदा होने के बाद आप लड़की को अपनी अभिरक्षा में ला सकती हैं।

आप से अब मकान का कब्जा कोई छीन नहीं सकता।

November 1, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_property1.jpgसमस्या-

शब्बीर खान ने रीठी, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे पूर्वजों ने 25 वर्ष पहले कच्चा लेख लिखवा कर भूमि खरीदी और मकान बना कर रहने लगे। जिस से भूमि खरीदी थी वह अब अपना हक बता कर कब्जा खाली कराना चाहता है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

ह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चा लेख जो लिखा गया है उस में क्या लिखा है। यदि उस में जमीन बेचने का लिखा है और बेचने की रकम प्राप्त कर कब्जा देने की बात लिखी है तो वह एक एग्रीमेंट है। जिस के अनुसार धन दे कर तथा विक्रेता ने कब्जा दे कर आंशिक रूप से एग्रीमेंट का पालन कर दिया है। यदि ऐसा है तो आप से उक्त प्लाट का कब्जा कोई भी नहीं छीन सकता। आप चुपचाप रहें और विक्रेता को कब्जा वापस प्राप्त करने के लिए कानूनी कार्यवाही करने दें। वैसे भी आप का कब्जा 25 वर्ष का है इस तरह आप का प्रतिकूल कब्जा भी उक्त संपत्ति पर है।

यदि विक्रेता किसी प्रकार से आप को तंग करे तो आप पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि आप को ऐसी आशंका हो कि विक्रेता जबरन आप को बेदखल कर सकता है तो आप जबरन बेदखली के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित कर अस्थाई निषेधाज्ञा व स्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस संबंध में आप को किसी स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करनी चाहिए। स्थानीय वकील दीवानी मुकदमों के मामले में जानकार और अनुभवी हो तो बेहतर होगा।

 

सगाई तोड़ना अपमान हो सकता है।

October 28, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_agni_fera1.pngसमस्या-

विकास ने हरिद्वार, उतराखण्ड से उत्तराखंड राज्य की समस्या भेजी है कि-

शादी से पहले ही यदि रिश्ता वधु पक्ष द्वारा एक तरफा समाप्त कर दिया जाये। वर पक्ष रिश्ता समाप्त करने की बात से सहमत नहीं हो। 27 नवम्बर को शादी होना पूर्व में दोनों पक्षो ने मिलकर तय किया था। वर पक्ष ने अपनी ओर की लगभग सभी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। क्या माननीय न्यायालय उनकी शर्तों को हमें मानने के लिए बाध्य कर सकती है। क्या एक तरफा रिश्ता हटाने पर हम तैयारियों के एवज में क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकते है? क्या मानसिक दुःख पहुचाने का भी कोई मामला बनता है? क्या मानहानि का भी कोई विषय इस में है? इस विषय में क्या उचित कानूनी कदम सिलसिलेवार उठाना चाहिए?

समाधान-

विवाह करने का वायदा हुआ और कन्या पक्ष ने विवाह के इस वायदे को तोड़ते हुए विवाह संपन्न करने से इन्कार कर दिया। इस बीच तैयारियाँ हो गयीं और उन पर खर्च हुआ। मानसिक संताप भी पहुँचा। अब कन्या पक्ष की शर्तें यहाँ कैसे आ गयीं। यदि आई हैं तो क्या हैं? इस का अर्थ यह है कि कन्या पक्ष ने विवाह संपन्न कराने से इन्कार कर दिया है और उन की कुछ शर्तें हैं जिन्हें मान लेने पर वे विवाह संपन्न कराने को तैयार हैं। आप ने बात को कुछ भी नहीं खोला है इस कारण विशिष्ट रूप से कोई उपाय बता पाना संभव नहीं है।

दि वर पक्ष समझता है कि कन्या पक्ष द्वारा रखी गई शर्तें उचित और वैध नहीं हैं तो फिर यह मामला तैयारियों के कारण हुए आर्थिक नुकसान, अपमान और मानसिक संताप के लिए क्षतिपूर्ति का बनता है। अपमान के लिए अपराधिक मामला भी हो सकता है।

स मामले में कन्या पक्ष को नोटिस दिया जा सकता है कि वह क्षतिपूर्ति करे अन्यथा वर पक्ष उन के विरुद्ध क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करेगा और अपमान के लिए अपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराएगा। यदि दोनों पक्षों के मध्य कोई समझौता नहीं होता है तो दोनों प्रकार के प्रकरण दर्ज कराए जा सकते हैं। लेकिन दोनों मामलों में स्थानीय वकील की सेवाएँ सलाह और मुकदमों की पैरवी के लिए प्राप्त करना उचित होगा।

खरीददार सावधान!

October 4, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Vagetable marketसमस्या-

चनेश राम साहू ने ग्राम पुरूँगा, रायगढ, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक आदमी से नमकीन बनाने की पुरानी मशीन क्रय की। अपने घर मशीन लाया उस मशीन से मैं ने एक भी दिन समान नही बनाया और मशीन बिगड़ गई। धोखा से मशीन को मेरे पास बेचा अब मैं मशीन को वापस करना चाहता हूँ। लेकिन वह मशीन वापस लेने से इंकार कर रहा है। उसे मशीन वापस करने के लिए क्या करूं?

समाधान

प ने पुरानी मशीन खरीदी है। आप को मशीन खुद पूरी तरह से जाँच परख कर लेनी चाहिए थी। किसी भी सौदे में हमेशा खरीददार को सावधान रहना चाहिए। उसे चाहिए कि वह जो भी वस्तु खरीदे वह जाँच परख कर खरीदे।

फिर भी यदि आप को लगता है कि मशीन पहले से खराब थी और बेचने वाले ने धोखे से खराब मशीन बेच दी है तो यह सीधे सीधे धोखाधड़ी है और अपराध है। आप वकील से मिल कर बेचने वाले को नोटिस दिलाइए कि उस ने आप को कबाड़ मशीन को अच्छा बता कर बेच कर आप के साथ धोखा किया है, यदि उस ने मशीन वापस ले कर आप से कींमत के रूप में प्राप्त की गयी आप उस के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट कराएंगे या अदालत में परिवाद पेश करेंगे। यदि फिर भी कोई बात न बने तो पुलिस रिपोर्ट कराएँ या परिवाद प्रस्तुत करें।

विक्रेता वही वस्तु विक्रय कर सकता है जो उस के पास है।

February 12, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

agreementसमस्या-

गजेन्द्र कुमार मीना ने ऑफिस नं. 9, प्रथम तल डीडीए मार्केट, जीएच-4 पश्चिम विवाह दिल्ली से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं ने अभी एक अलवर राजस्थान में एक जमीन खरीदी है 110 वर्ग गज, परन्तु रजिस्ट्री नही हुई है, नोटरी का एग्रीमेंट हुआ है। रजिस्ट्री में लिखा गया है कि ये जमीन मंदिर माफ़ी की आराजी महाराज की है, जिस पर विक्रेता का कब्जा है। क्या आप मुझे बतायेंगे कि मंदिर माफ़ी (नाम) की जमीन की रजिस्ट्री नहीं होती है तो मेरा एग्रीमेंट कानून जायज है या नहीं?

समाधान-

प इतना तो समझते ही होंगे कि जो चीज आप की नहीं है उसे आप बेच नहीं सकते। यदि आप किसी ऐसी वस्तु को मुझे बेचने का करार करते हैं जो आप की नहीं है तो वह करार सही नहीं होगा। लेकिन वह वस्तु आप के कब्जे में है और जब तक वह आप के कब्जे में है आप उस के माध्यम से हर वर्ष कुछ कमाई कर लेते हैं या उस वस्तु का उपयोग कर सकते हैं तो वैसी स्थिति में उस वस्तु का कब्जा भी मूल्यवान हो उठता है। यदि आप यह कहते हुए कि इस वस्तु पर मेरा स्वामित्व तो नहीं है लेकिन इस का कब्जा मेरे पास है और यह वस्तु मैं आप को दे रहा हूँ तो वह वस्तु मेरे स्वामित्व की तो नहीं होगी। लेकिन जब तक वह मेरे कब्जे में रहेगी मैं उस का उपयोग कर सकता हूँ या उस से लाभ कमा सकता हूँ।

ऐसी ही स्थिति आप के इस एग्रीमेंट की है। विक्रेता आप को स्पष्ट रूप से कह रहा है कि उस जमीन पर उस का स्वामित्व नहीं है, केवल कब्जा है जिसे वह आप को बेच रहा है। अब आप के पास जब तक वह जमीन कब्जे में है आप उस का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप उस जमीन का स्वामित्व नहीं अपितु उस का केवल कब्जा खरीद रहे हैं।

जहाँ तक रजिस्ट्री का प्रश्न है तो आप के इस एग्रीमेंट की रजिस्ट्री हो भी सकती है। क्यों कि इस एग्रीमेंट में कुछ बी नाजायज या गैर कानूनी नहीं है। उस व्यक्ति के पास केवल कब्जा था और वह आप को वही विक्रय कर सकता है। लेकिन एग्रीमेंट या विक्रय पत्र के पंजीयन से भी आप को केवल कब्जा ही मिलेगा न कि उस जमीन का स्वामित्व। उस जमीन का स्वामित्व तो तभी मिल सकता है जब कि उस जमीन का स्वामी उस वस्तु को आप को विक्रय कर दे। जब तक उस जमीन को आप से वापस लेने के लिए उस का स्वामी कोई कानूनी कार्यवाही कर के आप से उस का कब्जा नहीं ले लेता है तब तक आप उस जमीन का उपयोग कर सकते हैं।

copyright1समस्या-

प्रदीप शेरावत ने नजफगढ़, नई दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

क्या कोई व्यक्ति उन रचनाओं का, जो सार्वजनिक डोमेन में है, किसी अन्य भाषा में अनुवाद कर पुनः प्रकाशित करा सकता है? अगर उस से पहले किसी अन्य व्यक्ति या प्रकाशक ने उस रचना का अनुवाद कर के प्रकाशित किया हुआ है, तो क्या वह व्यक्ति या प्रकाशक बाद में अनुवाद करने वाले पर कोई क़ानूनी कारवाही कर सकता है? अथवा भाषा शैली की चोरी का इल्जाम लगा सकता है? क्यूंकि अनुवाद कितने ही लोगों द्वारा किया जाए पर सभी अनुवाद मूल रचना के अनुसार ही होंगे। सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध रचनाओं को पुनः प्रकाशित करने के लिए किन-किन बातों और नियमों का ध्यान रखना चाहिए, ताकि किसी भी तरह की कानूनी उलझनों से बचा जा सके?

समाधान-

किसी भी रचना का सार्वजनिक डोमेन में होने का कोई कानूनी अर्थ नहीं है। आप को पहले यह जानना चाहिए कि उस रचना पर किसी का कापीराइट जीवित है या नहीं है। यदि उस रचना पर किसी का कोई कापीराइट है तो उस का किसी भी तरह का कोई उपयोग बिना कापीपाइट धारक की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।

दि आप किसी ऐसी रचना का अनुवाद कर रहे हैं जिस पर किसी तरह का कोई कापीराइट नहीं है तो उस में परेशान होने की किसी तरह की कोई आवश्यकता तब तक नहीं है जब तक अनुवाद करने में आप ने पूर्व में हो चुके अनुवादों की सहायता न ली हो। क्यों कि यह संभव ही नहीं है कि एक रचना का कोई दो व्यक्ति अनुवाद करें और वे दोनों कहीं भी हू-ब-हू हो जाएँ। किसी भी भाषा के शब्दकोष एक हो सकता है लेकिन उसी भाषा का हर व्यक्ति का शब्दभंडार भिन्न भिन्न और अभिव्यक्ति का तरीका भी भिन्न होता है।

क्या क्या कार्यवाहियाँ की जा सकती हैं? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाना संभव नहीं है। कोई भी व्यक्ति यदि उसे किसी को परेशान करना हो तो किसी भी तरह की कोई भी मिथ्या कार्यवाही भी कर सकता है। उस का इलाज यही है कि उस का प्रतिवाद किया जाए और इस प्रकार संस्थित कार्यवाही को निरस्त कराया जाए। इस कारण इस तरह की समस्याओं पर तभी विचार किया जाना चाहिए जब ऐसी कार्यवाही हो कर सामने आ जाए। आप को केवल यह सावधानी बरतनी है कि आप का आशय सही हो। यदि आप किसी भी कार्य को बिना किसी दुराशय और सदाशयता के साथ करेंगे और किसी के अधिकार का अतिक्रमण नहीं करेंगे तो आप के विरुद्ध की गई किसी भी कार्यवाही का आसानी से प्रतिवाद किया जा सकेगा।

एग्रीमेण्ट या कांट्रेक्ट लिखित ही होने चाहिए …

December 19, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

No employmentसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क प्राइवेट ब्राइट स्टेप ट्रेनिंग सेन्टर (एजेंसी) ने एनएसडीसी भारत सरकार के दी नेशनल स्किल सर्टिफिकेशन एण्ड मोनेटरी रिवार्ड स्कीम के अन्तर्गत छात्रों को स्किल ट्रेनिंग देने के लिए मुझे लड़के लड़कियों के फार्म (प्रार्थना पत्र) लेने को कहा और प्रति छात्र 500 रुपए देने को कहा। छात्रों की स्कोलरशिप सीधे जीरो बैलेंस पर खुले बैंक खातों में आ गई। एजेंसी को प्रति छात्र 10000 रुपए मिले उन्हें स्किल करने के लिए। एजेंसी ने मुझे मेरे मेहनताने के 21000 रुपए मिलने थे जो देने से एजेंसी ने इन्कार कर दिया। कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं हुआ था। मैं बेरोजगार हूँ, मैं क्या करूँ?

समाधान-

जेंसी ने आप के साथ एक एग्रीमेंट किया था कि आप उन के लिए छात्र जुटाएंगे, वे प्रति छात्र आप को 500 रुपया देंगे। आप ने अपनी सेवाएँ दे दीं लेकिन उन्होने आप को आप की सेवाओँ की कीमत अदा नहीं की। इस तरह उन्हों ने इस एग्रीमेंट का उल्लंघन किया। कानूनी रूप से आप उन के विरुद्ध रुपए 21000 की वसूली का दीवानी वाद न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन जो भी दीवानी मुकदमा दाखिल करता है यह उस की जिम्मेदारी है कि वह एग्रीमेंट को साबित करे।

चूँकि आप के पास लिखित एग्रीमेंट नहीं है, वह मौखिक था। उस का कोई गवाह भी नहीं है। वैसी स्थिति में आप किसी तरह यह साबित नहीं कर पाएंगे कि आप के व एजेंसी के मध्य कोई एग्रीमेंट हुआ था। आप का वाद सबूतों के अभाव में खारिज हो जाएगा। इसी कारण कोई भी एग्रीमेंट मौखिक नहीं होना चाहिए। हर एग्रीमेंट लिखित होना चाहिए और उस के ऐसे गवाह भी होने चाहिए जो ये कह सकें कि उन के सामने ऐसा एग्रीमेंट हुआ था। इस के साथ इस बात का भी कोई हिसाब होना चाहिए कि वे फार्म आपने ही भरवाए थे। क्यों कि एग्रीमेंट के साथ साथ आप को यह भी साबित करना होगा कि एग्रीमेंट के अनुसार आप ने कितना काम किया था और कितना पैसा आप का बनता है।

क तरह से यह छल है। लेकिन छल यदि संपत्ति के संबंध में किया जाए तो ही अपराध कहलाता है। यदि कोई छल कर के किसी के काम करा ले और पैसा न दे तो यह हरकत भारतीय कानून के अन्तर्गत अपराध नहीं है। वैसी अवस्था में इस तरह का छल एक आम बात है। हमारे पास इस तरह की समस्याएँ ले कर लोग प्रतिदिन आते हैं लेकिन चूंकि यह न तो दंडनीय अपराध है और न ही कांट्रेक्ट व काम करने का कोई सबूत इस कारण हम किसी की कोई मदद नहीं कर पाते। इस लिए जब भी किसी तरह का एग्रीमेंट या कांट्रेक्ट हो वह लिखित होना चाहिए और उस के गवाह भी होने चाहिए वर्ना लोग ऐसे ही छले जाते रहेंगे।

क्रेता सावधान

October 15, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

housing colonyसमस्या-

भूपेन्द्र सिंह ने रुद्रपुर, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

हाँ मैं रहता हूँ वहाँ एक रियल एस्टेट डेवलपर कंपनी एक कॉप्लेक्स बना कर सेल कर रही है। मैं ने जब वहाँ जा कर उस प्रोजेक्ट के बारे में पता किया तो पता चला कि जिस ज़मीन पर वो बिल्डिंग बना कर सेल की जा रही है वो ज़मीन उनकी मालिकी की नहीं है बल्कि 99 वर्ष की लीज़ पर मिली है। मैं जानना चाहता हूँ कि क्या बिल्डर ऐसा कर सकता है कि जिस ज़मीन का वो मालिक नहीं है उस ज़मीन पर फ्लेट बना कर लोगों को विक्रय कर दे? क्योंकि जो लोग फ्लेट ख़रीदेंगे ऐसा समझ रहे हैं कि उन्हें उस फ्लेट की मालिकी मिल रही है। क्या कोई कानूनी कार्यवाही की जा सकती है बिल्डर के खिलाफ?

समाधान-

कृषि भूमि के संबंध में सिद्धान्त यह है कि सारी जमीन सरकार की है और कृषक उस का केवल किराएदार कृषक है जो लगान के रूप में किराया देता है। जब किसी नगर या गाँव का विस्तार होता है तो इसी कृषि भूमि पर होता है। ऐसी कृषि भूमि की किस्म को बदला जाता है वह कृषि भूमि से नगरीय/आबादी भूमि में परिवर्तित हो जाती है और नगर विकास न्यास, नगर पालिका या ग्राम पंचायत को सौंप दी जाती है। उस भूमि का की स्वामी सरकार होती है ये संस्थाएँ केवल उसे रेगुलेट करती हैं। अब ऐसी भूमि को सरकार कभी भी विक्रय नहीं करती। अपितु उसे 99 वर्ष की लीज पर ही स्थानान्तरित करती है। 99 वर्ष के लिए ही लीज पर ही विक्रय की जाती है। बाद में उस पर यदि कोई ऐसा भवन बन जाता है जिस की आयु 99 वर्ष के बाद भी बनी रहती है तो सरकार उस लीज को आगे नवीकरण कर सकती है।

कोई भी ऐसी भूमि पर जो लीज पर प्राप्त की गई है प्रोजेक्ट बना सकता है और नगरीय निकाय से अनुमति प्राप्त कर के फ्लेट बना कर विक्रय कर सकता है। जब फ्लेट विक्रय होता है तो उस भूमि पर बने फ्लेटों के स्वामियों के पास उस इमारत की पूरी जमीन के उतने अंश का स्वामित्व होता है जितने अंश पर उन का फ्लेट बना होता है।

वैसे भी आजकल जो इमारतें बन रही हैं वे कंक्रीट के उपयोग से बनती हैं जिन की उम्र् 99 वर्ष से कम की होती है। कोई भी बहुमंजिली इमारत 90 वर्ष से अधिक उम्र की नहीं होती। इस अवधि के बहुत पहले ही विकास की आवश्यकताओं के अनुरूप उस बिल्डिंग को गिराया जा कर उस के स्थान पर नया निर्माण होने लगता है। वैसी स्थिति में उस बिल्डिंग के फ्लेट स्वामियों को उन के फ्लेट की कीमत से बहुत अधिक मुआवजा प्राप्त हो जाता है। आज कल यह सब सब की जानकारी में हो रहा है। प्रोजेक्ट निर्माता बिल्डर किसी तरह की कोई बेईमानी नहीं कर रहा है उस के दस्तावेजों में यह स्पष्ट है कि भूमि लीज की है। आप ने जानकारी करने का प्रयत्न किया तो आप को पता लग गया कि जमीन लीज की है, फ्री होल्ड की नहीं है। फिर ‘क्रेता सावधान’ का सिद्धान्त तो है ही। क्रेता जब भी कोई संपत्ति क्रय करे तब सब कुछ जाँच परख कर करे। ऐसे बिल्डर के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही इस आधार पर किया जाना संभव नहीं है।

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