Marriage Archive

समस्या-

वंदना श्रीवास्तव ने सागर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पति ने अपनी पहली पत्नी के होते हुए मेरे से शादी की। मुझे उनकी पहली पत्नी के बारे मे कुछ भी जानकारी नहीं थी। उनके दो बच्चे भी हैं। अब वो मुझे छोड़ कर अपनी पहली पत्नी के साथ रहते हैं और उनकी पहली पत्नी मुझे गंदा गंदा गाली गुफ्ता करती है। मेरे भी दो बेटे हैं, मेरे पति कभी भी मुझे ज़रूरत भर का पैसा नहीं देते हैं और लिए मे मेरा पूरा गहना जो मेरे मा पापा दिए थे वो भी ले लिए हैं. क्या मेरा और मेरे बच्चो का उनके या उनकी संपाति पे कोई अधिकार न्ही है? मुझे कुछ सुझाव दीजिए कि मैं क्या करूं?

समाधान-

वंदना जी, यह तो हो सकता है कि आप को  विवाह के पहले पति की पहली पत्नी और उस के बच्चों के बारे में पता नहीं हो। पर आप को अपने खुद के दो बच्चे होने तक पता नहीं लगा हो। आप आज यह शिकायत तब कर रही हैं जब आप को इस विवाह से खुद के और बच्चों के पालन पोषण में समस्या आने लगी है। कानून का कायदा है कि जब भी आप को पता लगे कि आप के साथ कुछ अन्याय हुआ है, कोई अपराध हुआ है आप तुरन्त कानून की मदद लें। जितना आप देरी करती जाएंगी आप के लिए कानूनी उपाय मुश्किल होता जाएगा। अब यह साबित करना बहुत कठिन है कि पहली पत्नी और बच्चों के बारे में आप को अब पता लगा हो। यदि आप पहली पत्नी और बच्चों के बारे में जानकारी होते ही पुलिस को रिपोर्ट करती तो वह आप के पति का अत्यन्त गंभीर अपराध था उन्हें सजा हो सकती थी।

ह आप स्पष्ट रूप से से समझ लें कि पहली पत्नी होते हुए आप के साथ किया गया विवाह वैध नहीं है और आप को वैध पत्नी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं। लेकिन आप के दोनों बच्चें वैध हैं उन्हें अपने पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है इस के लिए वे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में तथा संरक्षक एवं पतिपाल्य अधिनियम के अंतर्गत भरण पोषण के लिए प्रतिमाह धनराशि प्राप्त करने के लिए कार्यवाही कर सकते हैं। वे यदि नाबालिग हैं तो उन की ओर से आप को अपने पति के विरुद्ध कार्यवाही करने का आधिकार है, यह कार्यवाही आप कर सकती हैं।

प भी अपने पति के साथ रही हैं या फिर पति आप के पास रहे हैं, इस कारण से आप भी अपने पति से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं और उन से अपने व बच्चों के लिए पृथक आवास की व्यवस्था करने और आप के खुद के भरण पोषण के लिए मासिक राशि निश्चित करवा सकती हैं।

प के पति के बच्चों को वे चाहें पहली पत्नी से हों या फिर आप से उन्हें या आप को या आप के पति की पहली पत्नी को पति की स्वअर्जित संपत्ति पर उ नके जीतेजी कोई अधिकार नहीं है। लेकिन यदि वे उन की मृत्यु के समय कोई संपत्ति बिना वसीयत किए छोड़ते हैं तो उस संपत्ति में आप के दोनो बच्चों और पहली पत्नी और उस के बच्चों को समान अधिकार प्राप्त होगा, प्रत्येक को 1/5 हिस्सा मिलेगा। लेकिन उस संपत्ति में आपका कोई अधिकार नहीं होगा। यदि कोई पुश्तैनी संपत्ति है और उस में आप के पति का हिस्सा है तो उस  में आप के बच्चे हिस्सा मांग सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं। उन्हें उस संपत्ति मे हिस्सा प्राप्त होगा या नहीं यह अभी नहीं कहा जा सकता क्यों कि इस मामले में दोनों तरह की राय न्यायालयों ने व्यक्त कर रखी है। पर हमारे हिसाब से अवैध पत्नी के बच्चों को भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए।

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समस्या-

हरगोबिंद सिंह ने ग्राम पो. मालारामपुरा, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से पूछा है-

त्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने किसी महिला से शादी कर ली, तो इस पुरुष की मौत के बाद इस दूसरी जीवित पत्नी का जमीन-संपत्ति पर क्या हक होगा? मृत पुरुष के दोनों पत्नियों से दो-दो बच्चे इसी पुरूष की संतान हैं।

समाधान-

पुरुष ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह किया है इस तरह दूसरी पत्नी उस की उसी तरह वैध पत्नी है जैसे पहली पत्नी वैध थी। इस कारण इस दूसरी पत्नी को वही अधिकार प्राप्त होंगे जो अधिकार पहली पत्नी को उस के पति के मरने के बाद हासिल होते।

इस पुरुष की दो  संतानें पहली पत्नी से और दो ही संतानें दूसरी पत्नी से हैं। इस कारण से उस की चारों ही सन्ताने भी वैध संतानें हैं। दूसरी पत्नी से उत्पन्न होने वाली संतानों को भी उसी तरह अधिकार प्राप्त होंगे जैसे पुरुष की पहली पत्नी से मृत्यु नहीं हुई थी और बाद वाली दोनों संतानों का जन्म भी पहली पत्नी से ही हुआ है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से मृत हिन्दू पुरुष का उत्तराधिकार तय होगा। यदि खेती की जमीन है तो उस का उत्तराधिकार भी धारा 8 से ही तय होगा। इस धारा के अनुसार माता (यदि जीवित हो तो), पत्नी और सभी सन्तानों को बराबर उत्तराधिकार प्राप्त होगा। आप के मामले में लगता है कि माता जीवित नहीं है। वैसी स्थिति में प्रथम श्रेणी के पाँच उत्तराधिकारी हैं। चारों संतानें और पत्नी। पाँचों में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। खेती की जमीन में मृत्यु के कारण खुलने वाले नामान्तरण (फौती इन्तकाल) में पाँचों के नाम 1/5 हिस्सा दर्ज होगा। शेष अचल संपत्ति में भी पाँचो को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

समस्या-

प्रतापचंद्र ने ग्राम करवनियां, ब्लाक नगवां, जिला सोनभद्र (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी बहन कंचन का केस अप्रैल 2016 से ही रावर्ट्सगंज जिला न्यायालय में चल रहा है। 2013 में बस्ती जिले के करमांव निवासी किसोर चंद्र मणी से उसकी शादी हिंदू रिवाज से हुई थी, जिसके बाद तीन बार वह क्रमशः 1 सप्ताह, 1 माह, 3 माह के लिए, ससुराल गयी है। उसे बार बार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उस पर जानलेवा हमला किया गया, उसके पति का उसकी भाभी से संबंध है, इसका विरोध करने पर परिवार वालों ने इसे भी देवर से संबंध रखने की सलाह दे डाली। तीन साल तक सुलह-समझौता करवा कर दोनो पक्षों द्वारा मामले को हल करने की भरसक कोशिश की गई, पर हल न निकला। दहेज की मांग व शारिरिक प्रताड़ना और भी बढ़ती गई।  जब उसे जान से मार देने की कोशिश की गई तब से वह अपने मायके में ही है, और वह उससे तलाक लेना चाहती है। पहले मिल कर बातचीत से तलाक़ का मामला हल न होने पर, साल 2016 अप्रैल में हम लोग की तरफ से दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा तथा गुजाराभत्ता लड़के पक्ष वालों पर मुकदमा कर दिया गया। लड़के वाले पहले की ही तरह अब भी धोखाधड़ी वाली बात करते हैं कि अब सब ठीक हो जायेगा विदाई कर दो। पर लड़की का स्टैंड क्लीयर है- कि मुझे तलाक़ चाहिए। दो-ढाई सालों में कोर्ट में वे लोग पेशी पर अबतक तीन या चार बार ही आये हैं, किंतु उनका कुछ नहीं हुआ। अक्टूबर 23, 2018 को मेंटेनेंस (125) का फैसला आया पर कोर्ट द्वारा तय रू. 2500 गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है, बाकी दो केसों का क्या हुआ वकील कुछ नहीं बताता। मुझे जानकारी नहीं है। मै बाहर ही रहता हूँ गाजियाबाद. कृपया बतायें की अब कोर्ट क्या करेगी? या हमें क्या करना होगा। ताकि जल्दी से मामले का निपटारा हो?

समाधान-

2013 में शादी हुई, बहिन तीन बार में कुल मिला कर चार माह एक सप्ताह ससुराल में रह रही है। उसी में इतने झगड़े हैं। आप ने जब सुलह समझौते की बात शुरू की तभी आप को ये सारे मुकदमें और तलाक का मुकदमा कर देना चाहिए था। सुलह समझौते की बातचीत तो मुकदमों के लंबित रहते भी चल सकती थी।

दो-ढाई साल पहले 2016 आप की बहिन की और से तीन मुकदमे किए गए हैं।  अब आप को जल्दी पड़ी है। तीनों मुकदमों में सामने वाले पक्ष को जवाब देने का मौका होगा, आप की साक्ष्य होगी, उस की साक्ष्य होगी फिर बहस और फिर फैसला होगा। समय तो लगेगा। यह अमरीका नहीं है जहाँ दस लाख की आबादी पर 140 अदालतें हों, यहाँ इतनी आबादी पर 12-13 अदालतें हैं। लोग ज्यादा अदालतों के लिए तो लड़ेंगे नहीं, वोट देंगे तब हिन्दू मुसलमान हो जाएँगे। तो ऐसे ही भुगतना होगा।

आप की बहिन को तलाक चाहिए और अभी तक तलाक का मुकदमा तक नहीं किया है। तलाक कैंसे मिलेगा? जिस दिन आप को यह पता लगा कि पति के उस की भाभी के साथ संबंध है और बहिन को भी देवर के साथ संबंध रखने की सलाह दी गयी है तभी आप को तुरन्त तलाक का मुकदमा करवाना चाहिए था। अब भी बहिन के लिए तलाक चाहते हैं तो उस के लिए मुकदमा तुरन्त करें। आप ने 2013 से 5 साल बहिन के जीवन के बरबाद हो चुके हैं। थोड़ा धैर्य रखिए नतीजे भी आएँगे। न्याय ऐसी चीज नहीं है जो जाए और बाजार से खरीद लाए, बस काम खत्म। समय तो लगेगा।

आप खुद अपनी बहिन के वकील से दैनन्दिन संपर्क में नहीं हैं। एक बार जाइए, उस से मिलिए और विस्तार से बात कीजिए। उसे कहिए कि आप उस से फोन पर पूछताछ करते रहेंगे। तो वकील सब कुछ बताएगा। यदि एक दो मुलाकातों के बाद लगे कि वकील ठीक से काम नहीं कर पा रहा है तो किसी अच्छे वकील को कर लें। हालांकि वकील बदलने से मुकदमे में लगने वाला समय कम होगा ऐसा लगता नहीं है।

समस्या-

रोशनी खातून ने ग्राम हमीरपुर जिला कटिहार, बिहार से पूछा है-

मैं मुस्लिम धर्म से हूँ। मेरी शादी 7 महीने पहले हुई थी मेरे पति मेरे साथ मारपीट और दहेज़ की मांग करते थे।  उसके खिलाफ महिला थाना में आवेदन दिया।  थाने में उस ने दरोगा को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। एक एफिडेविट दिया कि मारपीट नहीं करेंगे और पति-पत्नी की तरह रहेंगे और थाने से ही मेरी विदाई हुई। ससुराल पहुँचने के बाद फिर से वही ताने, मारपीट, दहेज़ की डिमांड होने लगी। फिर मैंने अपनी माँ को फ़ोन कर के बताया तो वो मुझे ससुराल से मायके ले आयी।

अब मैं 2 महीने से गर्भवती हूँ , इसकी सूचना अपने पति को फ़ोन करके दी तो कहता है मैंने तुमसे शादी ही नहीं की है, तो ये मेरा बच्चा कैसा हुआ। अब मैं क्या करूँ? गर्भपात कराऊँ या बच्चे को इस दुनिया में आने दूँ। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा ? मेरे पति मुझसे शादी सिर्फ दहेज़ के लिए किये थे।

अब वो दूसरी शादी करने वाले हैं। क्या वो मुझसे बिना तलाक लिए शादी कर सकता है?  इस बच्चे का क्या करूँ?  उसपर कौन सा केस करूँ।  केस कितने सालों तक चलेगा? क्या शादी में दिया हुआ सामान वो वापस करेगा? समाज में मेरे परिवार की बदनामी हो रही है, इसलिए मैं आत्महत्या करने की सोच रही हूँ क्यूंकि क़ानून से न्याय मिलने में मुझे पता नहीं कितने साल लग जाएंगे। कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प के विवाह को सात माह हुए हैं और उस में आप पर तमाम कहर टूट पड़े हैं। आप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को ले कर आत्महत्या करने की सोचना बिलकुल भी ठीक नहीं है। आपने और न ही आप के परिवार ने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिस से बदनामी हो।  बदनामी तो उस शख्स और परिवार की होनी चाहिए जिस ने आप के साथ इंसान की तरह नहीं। होता यह है कि जब भी कोई गलत काम करता है तो उस का परिणाम आने के पहले ही झूठा प्रचार आरंभ कर देता है। इस से पीड़ित पक्ष को लगता है कि उस की बदनामी हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप को चाहिए कि आप धीरज रखें और अपने विरुद्ध हुई ज्यादतियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें।

आप को जब एक बार शपथ पत्र दे कर आप का पति ले गया था और उस के विपरीत उस ने व्यवहार किया है तो आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। आप का कहना है कि पहले पुलिस ने पैसा खा कर काम नहीं किया। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। आम तौर पर पुलिस को यह निर्देश हैं कि पहली बार में पति पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। उस दफे भी आप यदि जाने से इन्कार कर देतीं तो पुलिस किसी हालत में समझौता नहीं कराती। हो सकता है यह करते हुए भी पुलिस के किसी अधिकारी ने सामने वाले पक्ष से पैसा लिया हो। लेकिन आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए कि आपके साथ फिर से मारपीट हुई है, ताने मारे गए हैं, दहेज मांगा गया है जिस के कारण आपको पति का निवास छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। पति ने आप का तमान स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया है इस तरह पति ने धारा 323, 498ए, 406 आईपीसी का अपराध किया है। । यदि थाना रिपोर्ट करने से मना करे तो वही रिपोर्ट एक पत्र के साथ रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से एस.पी. को भेजनी चाहिए। यदि फिर भी कोई कार्यवाही न हो तो  मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकील की मदद से परिवाद दाखिल करना चाहिए। इस के अलावा मजिस्ट्रेट के न्यायालय में तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आवेदन दे कर भऱण पोषण की मासिक राशि की मांग करनी चाहिए।

यह सही है कि मुस्लिम विधि में चार विवाह तक किए जा सकते हैं। लेकिन यह भी प्रावधान है कि सभी पत्नियों को एक जैसा व्यवहार मिलना चाहिए तथा दूसरी शादी के लिए पहली की सहमति होनी चाहिए। आप चाहें तो दूसरा विवाह रुकवाने के लिए दीवानी अदालत से स्थायी व अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद व प्रार्थना कर सकती हैं। यदि फिर भी पति दूसरा विवाह कर ले तो आप को हक है कि आप भी अदालत से तलाक के लिए प्रार्थना पत्र दे कर तलाक ले सकें।

जहाँ तक गर्भ रह जाने की बात है। बच्चे का भविष्य तो अभी अनिश्चित ही है। पिता गंभीर नहीं है तो उसे पिता का प्रेम और स्नेह तो मिलने से रहा। वैसी स्थिति में हमारी नजर में उस का दुनिया में आना ठीक नहीं है। फिर भी यह निर्णय तो केवल माँ ही ले सकती है कि उसे अपनी संतान को दुनिया में लाना है या नहीं। यदि अभी गर्भाधान को तीन माह नहीं हुए हैं तो स्वैच्छिक गर्भपात कराया जा सकता है।

जहाँ तक मुकदमों के चलने के समय की बात है तो यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वहाँ अदालतों में कितने मुकदमें हैं। कितने ही मुकदमे चल रहे हों पर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आपके पास यही रास्ता है और आपको मजबूती के साथ इस लड़ाई को लड़ना चाहिए। आप अवश्य जीतेंगी।

Nullity

समस्या-

मेरी छोटी बहन प्रियंका तोमर ने  4 जनवरी 2018  को शुभम सूर्यवंशी से प्रेम विवाह किया था। मेरी बहन सामान्य वर्ग से है और शुभम एसी/एसटी वर्ग से। शादी के बाद मेरी बहन को पता चला की शुभम पहले से ही शादीशुदा है और  डिवोर्स के लिए तारीख पर जाता है! लेकिन शुभम के परिवार वालों ने उस लड़की के बारे में कुछ नहीं बताया है जिससे शुभम की पहले शादी हुई थी। अब मेरी बहन मेरे घर वापस आ चुकी है और वह शुभम से तलाक लेना चाहती है तो उसके तलाक लेने की क्या विधि रहेगी? या हम इसकी शादी को शून्य घोषित करवा सकते हैं? दोनों ही स्थिति में क्या प्रोसेस रहेगी? मेरी मम्मी द्वारा उन्हें सोने के कुछ जेवर भी दिए गए थे, वह भी उन्होंने वापस नहीं किए। हमने थाने में जाकर रिपोर्ट करने की कोशिश की। लेकिन थाने वालों ने हमारी रिपोर्ट नहीं लिखी और कहा कि वह तुम्हें एसी/एसटी केस में फंसा देंगे। तुम उनके ऊपर कोई कार्यवाही मत करो और कोर्ट में जाकर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करो या फिर आपसी सहमति से तलाक ले लो। कृपया आप हमारा मार्गदर्शन करें।

– गोलू तोमर, एम/23, रतन आवा न्यूज

समाधान-

किसी हिन्दू विवाह में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (i), (iv) तथा (v) की शर्तों का उल्लंघन किया गया हो तो वह विवाह शून्य होता है। इन तीन शर्तों में पहली (i) शर्त यही है कि विवाह के किसी भी पक्षकार का जीवनसाथी जीवित नहीं होना चाहिए। आप की बहिन के मामले में यही हुआ है। जब विवाह हुआ तब आप की बहिन के पति की पहली पत्नी जीवित थी और उस से तलाक नहीं हुआ था। जिस के कारण आप की बहिन का विवाह शून्य है। इस के लिए आप की बहिन हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत परिवार न्यायालय में विवाह की शून्यता की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर के डिक्री प्राप्त कर सकती है। इस के लिए चाहिए कि आप बहिन के पति का जिस अदालत में मुकदमा चल रहा है उस अदालत से उस मुकदमे की पत्रावली की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर आवेदन के साथ ही न्यायालय में प्रस्तुत करें।

प की माँ के द्वारा आप की बहिन को जो सोने के बिस्कुट दिए थे वे तथा अन्य सभी उपहार जो आप की बहिन को विवाह या उस के उपरान्त दिए गए हों आप की बहिन का स्त्री-धन हैं। आप की बहिन उन्हें वापस मांग सकती हैं और नहीं लौटाने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध है। पुलिस को इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कर लेना चाहिए। लेकिन पूरे भारत में पुलिस का रवैया उस के पास किसी अपराध की रिपोर्ट दर्ज करने जाने वाले व्यक्ति के प्रति यही रहता है कि वे उसे रिपोर्ट न करने और मामले को बाहर ही सलटाने के लिए कहते हैं इस के लिए वे तरह तरह के डर भी दिखाते हैं। आप की बहिन के साथ जिस तरह का अपराध उस के कथित पति और उस के परिवार ने किया है उस के बाद वे एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत कोई रिपोर्ट करेंगे भी तो उस का कोई मूल्य नहीं होगा। पुलिस केवल अपने यहाँ दर्ज अपराधों की संख्या को कम रखने के लिए इस तरह करती है। यदि पुलिस थाने ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना किया है तो आप रजिस्टर्ड एडी डाक से अपना परिवाद एस.पी. पुलिस को प्रेषित करें। उस की रसीद और प्राप्ति स्वीकृति यदि लौट आए तो सुरक्षित रखें और एक सप्ताह में कार्यवाही न होने पर सीधे न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत करें। न्यायालय आप की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पुलिस को आदेश दे देगा। एस.पी. और न्यायालय को प्रस्तुत होने वाले परिवाद में स्पष्ट रूप से कहें कि पुलिस ने एससी एसटी एक्ट की कार्यवाही होने का डर दिखाते हुए रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया है।

समस्या-

मेरा विवाह तलाकशुदा लड़की से हुआ है जिसकी आयु 38 वर्ष है मेरी 28 वर्ष है। विवाह का पंजीयन नगर पालिका में हुआ है, जिस में डिवोर्स का कोई हवाला नहीं दिया गया है। मेरी पत्नी सरकारी अध्यापिका हे और मैं बेरोजगार हूँ। मेरी शादी में मैंने किसी प्रकार का दहेज नहीं लिया है, एक बैड एक चादर तक नहीं ली। बस एक अंगूठी ली बस। वह ससुराल में बहुत कम आती है। ज्यदा खुद के माता पिता के पास रहती है और मैं भी उन के माता पिता के पास ही रहता हूँ। वह खुद के रिकॉर्ड में कहीं पति का नाम मांगते हैं तो नहीं भरती। इनकम टैक्स में रिबेट के लिए कोई पालिसी करती है तो रिबेट के लिए परामर्श लेते हैं और कहते हैं कि पति पत्नी के नाम पालिसी ले लो, उसमें वह अपने पापा को नामिनी बनाती है, कहीं भी नॉमिनी में मेरा नाम नहीं भरती। उस की आय 40000 रुपए प्रतिमाह से अधिक है। यदि ऐसे में तलाक मेरी ओर लिया जाता है तो भरण पोषण या आर्थिक दंड देना होगा क्या?

-दौलतराम, खंडवा, म.प्र.

समाधान-

पने विवाह अपनी मर्जी से किया। आप बेरोजगार थे तो आपत्ति आप की पत्नी को होनी चाहिए थी। पत्नी की उम्र अधिक है तो आप को पता था। वह सरकारी कर्मचारी है यह भी आप को पता था। वह तलाकशुदा है यह भी आप को पता था। वह अपने माता पिता के साथ रहती है, आप भी उस के साथ रहते हैं इस में क्या परेशानी है। आप का सारा खर्च आप की पत्नी उठाती है तो इस में आपको कोई आपत्ति नहीं है। जो वह कमाती है उस की सम्पत्ति है। उसे वह कैसे रखती है या उस में किस को वह नोमिनी बनाती है यह उस का अधिकार है। न तो किसी पति को और न ही किसी पत्नी को यह अधिकार है कि वह अपने जीवनसाथी को बाध्य कर सके कि वह उसे नोमिनी बनाए। आप नोमिनी क्यों बनना चाहते हैं? नोमिनी तो पालिसी लेने वाले की मृत्यु पर पालिसी का पैसा लेने वाला होता है लेकिन वह उस धन का मालिक नहीं होता। धन तो उसी को मिलता है जो उत्तराधिकारी होता है। आप के इस तरह के सवाल करने से तो ऐसा लगने लगेगा कि आप बिना कुछ किए धरे अपनी पत्नी की कमाई पर अपना जीवन जीना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि पत्नी अपनी सारी संपत्ति आप के नाम कर दे। विवाह में यह उचित नहीं है। आप अपनी पत्नी पर किसी तरह का संदेह करने के स्थान पर उस पर भरोसा करते हुए उस के साथ प्रेम पूर्वक एक अच्छे जीवनसाथी की तरह रह सकते हैं।

आप को और तो कोई शिकायत अपनी पत्नी से है नहीं। आप के पास तलाक का कोई आधार नहीं है। नोमिनी नहीं बनाना कोई आधान नहीं हो सकता। यदि पति या पत्नी को ही नोमिनी बनाने या न बनाने के नाम पर तलाक होने लगें तो देश की आधी शादियाँ अब तक टूट जानी चाहिए थीं। आप को तलाक मिल ही नहीं सकता। वह तभी मिल सकता है जब कि आपकी पत्नी सहमति से आपको तलाक देने को तैयार हो। ऐसे में तो आप दोनों तय करेंगे कि भऱण पोषण किस को कितना देना है और देना है या नहीं देना है।

समस्या-

विवाहित हिन्दू स्त्री का इस्लाम धर्म अपनाने के बाद क्या उसके पहले पति से विवाह रहता है या टूट जाता है, वह दूसरी शादी के लिए तलाक ले या नहीं?

-सुलेमान,  तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ राज्य राजस्थान

समाधान-

को भी हिन्दू स्त्री-पुरुष जब एक बार हिन्दू विधि से विवाह कर लेते हैं तो वे दोनों उस विवाह में तब तक रहते हैं जब तक कि उस विवाह के विच्छेद की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती है। यदि उन में से कोई भी धर्म परिवर्तन कर लेता है तब भी यह विवाह बना रहता है, वे साथ साथ रह सकते हैं।।  किन्तु धर्म परिवर्तन से धर्म परिवर्तन करने वाले के पति या पत्नी को यह अधिकार उत्पन्न हो जाता है कि वह धर्म परिवर्तन के आधार पर अपने साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सके और वह  हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(ii) में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकता है और साथी के धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है। तब वह दूसार विवाह कर सकता/ सकती है।

यदि आप का प्रश्न यह है कि किसी स्त्त्री द्वारा इस्लाम ग्रहण कर लेने के बाद उसे दूसरा विवाह करने के लिए अपने पूर्व पति से तलाक लेना जरूरी तो नहीं? तो उस का उत्तर यह है कि उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा कर अपने पूर्व पति से  विवाह विच्छेद करना होगा। इस्लाम धर्म के अनुसार भी एक स्त्री एक विवाह में रहते हुए निकाह नहीं कर सकती। उसे पहले पूर्व विवाह से तलाक लेना पड़ेगा और फिर इद्दत की अवधि भी व्यतीत करनी होगी। इस मामले में हिन्दू स्त्री को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाने के बाद भी अपने हिन्दू पति से हिन्दू विधि से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करनी होगी। डिक्री पारित होने के उपरान्त इद्दत की अवधि गुजर जाने पर ही वह इस्लामी शरीयत के अनुसार निकाह कर सकती है।

 

हिंसा के बाद ससुराल से निकाल देने पर स्त्री के पास विधिक उपाय।

September 12, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अनामिका ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे सास ससुर और जेठानी दवारा मुझे बहुत टॉर्चर किया गया। दहेज के लिए “कम लाई हो” के ताने दिए गए और जेठानी और सास ने मुझे मारा भी है। मेरे पति सब देखते हुए भी कुछ नहीं बोले, उन लोगो को। मेरे पति और जेठानी के बीच नाजायज़ संबंध है। इसका विरोध करने पर उन लोगो ने मुझे घर से निकाल दिया है। अब मैं क्या करूँ? मेरे पति उस औरत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और मुझे तलाक़ दे रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ? कृपया उचित सलाह दीजिए।

समाधान –

र उस महिला की समस्या घर है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और यदि है तो उस के बाद भी वह अपनी रिश्तेदारियों से अलग किसी मित्र समूह में नहीं है। वस्तुतः  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस का जन्म समूह में हुआ है और वह समूह के बिना नहीं रह सकता। एक स्त्री विवाह तक मायके में रहती है तब उस के साथ परिवार होता है। जैसे जैसे वह बड़ी होती है परिवार को इस की चिन्ता सताने लगती है कि अब उस की विदाई का समय आ गया है और वह विवाह कर के उसे विदा कर देता है। कुछ ही परिवार हैं जो यह सोचते हैं कि स्त्री को पहले आत्मनिर्भर बनाना चाहिए और उस के पास आत्मनिर्भर मित्रो का एक समूह भी होना चाहिए। स्त्री के लिए ये दो चीजें सब से अधिक जरूरी हैं। जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता या कम से कम ध्यान दिया जाता है। अभी आप के पास ये दो चीजें होतीं तो आप को कोई परेशानी नहीं होती, आप खुद अपनी समस्या से मुकाबला कर सकती थीं। आप ने अपनी समस्या में अपनी आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर मित्र समूह और मायके के बारे में कुछ नहीं बताया है।

आप के पति के अपनी भाभी के साथ संबंध वाली समस्या का कानून के पास कोई हल नहीं है। आप के साथ जो कुछ हुआ है उस के बाद आप का उस परिवार से संबंध तोड़ना, पति से तलाक लेना और टॉर्चर के लिए ससुराल वालों को सजा दिलाना ही आप का उपाय है। इस के लिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दे कर अपनी सुरक्षा, पृथक आवास की सुविधा और भरण पोषण की राशि प्रतिमाह प्राप्त करने के लिए तुरन्त आवेदन करना चाहिए। आप अपने साथा हुई हिंसा के लिए तथा आप के स्त्रीधन को पाने के लिए जो आप के पति के पास या ससुराल में रह गया है धारा 498ए तथा 406 भारतीय दंड संहिता में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती हैं और पुलिस द्वारा यथोचित कार्यवाही न करने पर न्यायलाय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के साथ ही धारा 13  हिन्दू विवाह अधिनियम में अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन  तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण राशि प्रतिमाह पाने के लिए आवेदन करने के उपाय आप के पास उपलब्ध हैं। बेहतर है कि आप अपने निकट के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर ये सब उपाय करने का प्रयत्न करें, देरी न करें।

समस्या-

मेरे ऊपर धारा 498a आईपीसी तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में प्रकरण लंबित हैं, साक्ष्य हो चुकी है, साक्ष्य में उन्होंने दहेज देना स्वीकार किया है, दहेज देना अपराध है, कार्यवाही कैसे हो उन पर?

-रामकिशोर, मारवाड़ी का बाग, उनाव रोड, जिला दतिया, मध्य प्रदेश

समाधान-

हेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और दहेज देना तथा दहेज लेने या देने के लिए प्रतिज्ञा या संविदा करना अपराध है। इस अपराध के लिए अभियुक्त को अपराध साबित हो जाने पर छह माह तक का कारावास और 5 हजार तक के जुर्माने का दंड दिया जा सकता है। यह अपराध जमानतीय है और प्रसंज्ञेय नहीं है, अर्थात इस में प्रसंज्ञान लेने पर अभियुक्त को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए जमानती वारंट ही जारी किया जा सकता है तथा न्यायालय में उपस्थित होने पर उसे जमानत पेश करने पर हिरासत में नहीं लिया जा सकता है।

इस अपराध का परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में ही प्रस्तुत किया जासकता है और मजिस्ट्रेट को अपराध घटित होने के 1 वर्ष की अवधि में प्रसंज्ञान लेने का अधिकार है उस के पश्चात नहीं जिस का सीधा अर्थ है कि यह अपराध घटित होने के एक वर्ष की अवधि में यदि सक्षम न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत नहीं किया गया तो फिर इस अपराध के संबंध में कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं है। आप के मामले में यदि दहेज देने की अभिस्वीकृति में एक वर्ष पूर्व दहेज देना स्वीकार किया गया है तो कोई कार्यवाही किया जाना संभव नहीं होगा।

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

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