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विवाह विच्छेद का आवेदन विवाह अथवा अंतिम सहनिवास के स्थान पर ही प्रस्तुत किया जाएगा।

समस्या-

अपूर्वा पांडेय ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी जन्मतिथि 30-04-1992 है, मेरा विवाह 5 मार्च 2018 को हिन्दू रीति रिवाज से संपन्न हुआ था।  विवाह के बाद सब कुछ अच्छा चल रहा था। पर अगस्त 2018 में रक्षाबंधन में मेरी पत्नी मायके गई फिर वो वापस नहीं लौटी। मायके मे मेरा साडू भाई पहले से घर जमाई रहता है। वो मेरी सास और मेरी पत्नी को मेरे खिलाफ भड़काता है और मेरी पत्नी उसी की बातों मे चल रही है।  मेरा और मेरी पत्नी का कभी कोई विवाद नहीं हुआ।  मैं अपनी पत्नी को लेने कई बार उसके मायके भी गया। पर उसने मेरे साथ आने से मना कर दिया। फिर मेरे पेरेंट्स उसको लेने गए। फिर भी वो उनके साथ नहीं आई।  फिर मैंने पुलिस अधीक्षक जबलपुर को इसकी सूचना दी और महिला परामर्श केंद्र मे सूचना दी। पर वहाँ भी वो कॉउंसलिंग के लिए नहीं आयी।  तब मैंने फैमिली कोर्ट में धारा 9 का आवेदन किया। तब कोर्ट के समन लेटर को लेने से उसने इंकार कर दिया। कोर्ट ने मेरे पक्ष मे एक तरफा फैसला कर दिया और मुझे धारा 9 की डिक्री दे दी। अभी तक मेरी पत्नी ने मेरे खिलाफ कोई केस या रिपोर्ट नहीं की है। पर उनके जिला न्यायालय के अधिवक्ता के माध्यम से मुझे एक लीगल नोटिस भिजवाया है। जिसमें वो लोग बोल रहे है कि मेरी पत्नी अभी नाबालिग है और आरोप लगा रहे है कि मैंने सब कुछ जानते हुए दबाव बनाकर उससे विवाह किया। अतः ये विवाह शून्यकरणीय है, और मेरी पत्नी के बालिग होने पर वो मेरे खिलाफ कार्यवाही करेंगे।  मुझे मेरी पत्नी की जन्मतिथि ज्ञात नहीं है क्योंकि विवाह सामाजिक रीतिरिवाज से संपन्न हुआ था विवाह के पहले मैं अपनी पत्नी को नहीं जानता था जो भी हुआ हम दोनों के घरवालों के पसंद से हुआ, इतना जरूर ज्ञात है कि सगाई के समय जब मैं पहली बार लड़की से मिला था तो उसने अपनी उम्र मुझे 19 वर्ष बताई थी और यहाँ तक जब बाद मैं उन लोगो ने विवाद किया और उन्होंने 100 नंबर डायल कर पुलिस बुलाई तो उसके रजिस्टर मे भी लड़की ने अपनी उम्र 19 ही लिखवाई उसमे हम दोनों ने साइन भी किये, अतः इसके अनुसार मुझे लड़की की उम्र अभी तक 19 वर्ष ही ज्ञात है, और विवाह के पहले से उसके परिवार वाले भी यही बोलते आ रहे है। मेरी माँ और मेरी पत्नी की माँ बचपन की मित्र है, मित्र होने की वजह से मेरी माँ ने उनपर बहुत भरोसा किया, और ऐसा भी हो सकता है कि लड़की की वास्तविक उम्र 19 ही हो किन्तु उसके डॉक्यूमेंट मे उसकी उम्र कम दर्शायी गयी हो, अतः मुझे इसका बारे मैं कुछ ज्ञात नहीं है। मुझे कोई उचित सलाह दे क्योंकि धारा 9 की डिक्री मैं प्राप्त कर चुका हूँ। जिसमें कोर्ट ने उसे 30 दिन के अंदर अपने विवाह संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए आदेश दिया है। अतः क्या मुझे यदि वो 30 दिन मैं नहीं आती है तो क्या डाइवोर्स के लिए फाइल करना चाइये और यदि डाइवोर्स फाइल करना चाइये तो कहां करना चाहिये। क्या वही कोर्ट डाइवोर्स ग्रांट करेगी जिसने मुझे धारा 9 की डिक्री ग्रांट करी है। क्योंकि मैं मूलत: रहने वाला उत्तराखंड से हूँ और जबलपुर में हॉस्पिटल में डेंटल सर्जन के पद पर हूँ। मेरे वैवाहिक कारणों से मेरे कैरियर पर भी असर पड़ा है और मैनेजमेंट ने मुझे त्यागपत्र देने  के लिए आदेश दिया है तो मैं अपने गृह प्रदेश जा रहा हूँ।

समाधान-

जब आप की पत्नी ने नोटिस के माध्यम से यह जाहिर किया है कि वह विवाह को अकृत घोषित करने के लिए आवेदन करेगी। इस का अर्थ यह है कि वह अभी 18 वर्ष की नहीं हुई है। लेकिन आप को अब विवाह विच्छेद का आवेदन ही प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन विवाह को 5 मार्च 2018 को एक वर्ष पूर्ण होगा। उस के बाद ही आप विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। उस के पहले नहीं। दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए डिक्री पारित होने के उपरान्त यदि डिक्री की पालना में प्रत्यास्थापन न हुआ हो तो एक वर्ष पूर्ण होने के बाद ही इस आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की जा सकती है। वर्तमान परिस्थिति में आप के पास यदि विवाह विच्छेद का कोई अन्य आधार नहीं है तो आप विवाह विच्छेद की डिक्री के लिए आवेदन प्रस्तुत नहीं कर सकते।

हमारे विचार में आप को तुरन्त अपनी पत्नी की ओर से दिए गए नोटिस का उत्तर दिलवा कर स्पष्ट करना चाहिए कि आप ने कोई दबाव नहीं डाला बल्कि पत्नी पक्ष के द्वारा आप को धोखे में रखा गया है, और अभी भी नोटिस में उम्र नहीं बताई है। इस के अतिरिक्त आप को दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए पारित डिक्री की पालना के लिए निष्पादन कराने का आवेदन करना चाहिए। इस प्रक्रिया को एक साल चलाते रहें और उस के बाद प्रत्यास्थापन न होने के आधार पर विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत कर दें।

यदि इस बीच पत्नी की ओर से विवाह को अकृत या शून्य घोषित करने का कोई आवेदन प्रस्तुत किया जाता है और उसकी सूचना आप को मिलती है तो आप उसी आवेदन में काउंटर क्लेम प्रस्तुत करते हुए अपने आधारों पर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करने की प्रार्थना कर सकते हैं।

आप विवाह विच्छेद का आवेदन केवल वहाँ प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ आप का विवाह हुआ है या फिर जहाँ आपने अंतिम बार साथ साथ निवास किया है।

अनु.जनजातीय व अनु.जातीय के मध्य विवाह के विच्छेद के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं।

समस्या –

दिनेश नेताम ने टिल्डा, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मैं एक जनजाति परिवार से हूँ, मेरा विवाह 2011 में सामाजिक रीति से हुआ था। बाद में पता चला कि मेरी पत्नी और उस के परिवार के लोग अनुसूचित जाति के हैं और हम लोग अनुसूचित जनजाति के।  लेकिन दोनों समाज में बेटी रोटी व्यवहार बहुत पहले से मान्य है। मेरी पत्नी ने मेरे पूरे परिवार के ऊपर दहेज प्रथा का केस लगाया उसे मैं जीत चुका हूँ, फिर अपील की उसे भी मैं जीत चुका हूँ। अब मुकदमा हाईकोर्ट चला गया है। मैं इतना जानना चाहता हूँ कि मेरी प्तनी अनुसूचित जाति की है जिस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। क्या मैं इस विवाह को न्यायालय से निरस्त करवा सकता हूँ। मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

आप की समस्या जटिल है। जहाँ तक जनजाति का प्रश्न है उस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप की जनजाति में एक खास अनुसूचित जाति की लड़की से विवाह को मान्यता प्राप्त है।  इस कारण आप का विवाह आप की जनजाति की सहमति से संपन्न हुआ है और आप की जनजाति ने उसे मान्य भी कर दिया है। इस कारण आप पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप का विवाह आप की परंपरा से ही हुआ है।

ऐसी परिस्थिति में आप को अपनी जनजाति पंचायत में मामला ले जाना चाहिए और वहाँ जनजातीय विधि से पंचायत बैठा कर तलाक, झगड़ा आदि का मामला निर्णीत कराना चाहिए। जब पंचायत मामले को सुलझा ले तो पंचायत से प्रमाण पत्र ले कर पारिवारिक न्यायालय में विवाह विच्छेद की घोषणा का वाद संस्थित करना चाहिए।

इस तरह के मामले पर किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की नजीर उपलब्ध नहीं है। यदि है भी तो हमारी नजर में तलाश करने पर भी नहीं आई है। इस कारण हो सकता है आप की पत्नी विरोध करे कि पंचायत द्वारा दिया गया निर्णय अवैध है और आप का विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होता है। पर हमारी राय में  आप की पत्नी का यह तर्क मान्य नहीं हो सकेगा।

रणनीतिक रूप से आप पहले हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें। यदि वहाँ जवाब में यह आए कि हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। तो आप वहाँ से उस के जवाब की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर अपने पास रखें और उस के बाद हमारे द्वारा ऊपर सुझाई गयी प्रक्रिया का अनुसरण कर सकते हैं।

घरेलू हिंसा और अमानवीय क्रूरता से पीड़ित स्त्री को मदद करें और मुक्त कराएँ।

समस्या-

सत्यम ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी एक फ्रेंड है, उसका हस्बैंड उसको मारता पीटता है, मेंटली टॉर्चर करता है, बिना बात के ही लड़ता रहता है। आज तो उसने हद ही कर दी, सुबह से बिना बात के लड़ने लगा और बोलता है कि मेरे घर में सिगड़ी नहीं चलना चाहिए। वाइफ बोलती है, सिगड़ी ना जलाओ तो मर जाऊं क्या ठंड में। तो हस्बैंड बोलता है कि मर जा, अब यदि सिगड़ी जलाई तो वही सिगड़ी तेरे ऊपर डाल दूंगा जलती हुई। उस लड़की की लाइफ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। घर से निकलने नहीं देता। किसी रिलेटिव पहचान वालों के यहां जाने नहीं देता। कहता है कि मैं जिस से बोलूंगा उससे मिलेगी, उससे बात करेगी, नहीं तो किसी से नहीं करेगी। बिना बात के लड़ता रहता है। लड़की को डिवोर्स भी नहीं देता है, बोलता है कि मैं तुझे छोड़ने नहीं दूंगा। सबसे ज्यादा शक करता। उसको कहीं आना जाना नहीं देता और मारने के लिए हाथ उठाता है। एक दो बार मारा भी। लड़के की फिजिकल रिलेशन किसी और के साथ है शायद। वह दूसरी लड़के को घर में लाना चाहता है। लड़की बोलती है कि तेरे को देख के साथ रहना है, जिसको लाना है ले आ। बस मुझे शांति से रहने दे। इस पर लड़का बोलता कि मैं ना तुझे जीने दूंगा, ना मरने दूंगा। लड़की करे तो क्या करे? लड़की के पास कोई सबूत नहीं है कि उसका हस्बैंड कहीं और रिलेशन में है। लड़की का साथ देने वाला कोई नहीं है कि वह अपने हस्बैंड के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा सके। लड़की तो अपने हस्बैंड से बात करना पसंद नहीं करती, तो क्या करें? कोई रास्ता बताइए।

समाधान-

लड़की के साथ घरेलू हिंसा हो रही है। भंयकर अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार किया जा रहा है। मारपीट भी हुई है। यह सब विवाह विच्छेद के लिए पर्याप्त है। इस के अलावा धारा 498ए आपीसी में संज्ञेय अपराध भी है, जिस की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यह रिपोर्ट कोई भी परिजन या मित्र भी कर सकता है।

न्यायालय में किसी भी मामले में निर्णय होने में हमारे यहाँ समय लगता है। इस का मुख्य कारण हमारे मुल्क के पास जरूरत की चौथाई अदालतें भी नहीं होना है। अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 140 अदालतें हैं जब कि भारत में मात्र 12 इस तरह वहाँ के अनुपात में हमारी अदालतों की संख्या 8 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सभी तरह के विक्टिम पुलिस या न्यायालय के पास जाने के बजाए यातनाएँ भुगतते रहते हैं। इसी कारण अनेक प्रकार के अपराध पलते रहते हैं। हर रिपोर्ट कराने आने वाले को हतोत्साहित करती है कि रिपोर्ट कराने के बजाए भुगतते रहो, क्यों कि उसे भी अपने रिकार्ड में अपराध कम दिखाने होते हैं।

जहाँ तक स्त्रियों का मामला है वे तब तक पुलिस के पास जाने में झिझकती हैं जब तक कि उन्हें यह पक्का विश्वास न हो जाए कि उन के पास जीवन जीने और सुरक्षा के पर्याप्त विकल्प हैं। जब कभी कोई परिचित इस तरह की रिपोर्ट करा भी दे तो स्त्रियाँ पुलिस के या अपने पति व ससुराल वालों के दबाव के कारण टूट जाती हैं और कह देती हैं कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहती। वैसी स्थिति में वह परिचित बहुत बुरी स्थिति में फँस जाता है। अक्सर लड़की के मायके वाले भी उस का साथ नहीं देते, क्यों कि हमारा तो विचार ही यह है कि लड़कियाँ परायी होती हैं। इस विचार के अनुसार लड़कियाँ समाज में सब के लिए पराई होती हैं, वे कभी किसी की अपनी नहीं होतीं।

इस मामले में यदि आप मन, वचन कर्म से चाहते हैं कि लड़की उन यातनाओं से मुक्त हो अच्छा जीवन जिए तो आप को उसे विश्वास दिलाना होगा कि उस के पास सुरक्षित जीवन  जीने के न्यूनतम वैकल्पिक साधन हैं। आप को भी प्रयास करना होगा कि वह किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। तभी वह यह लड़ाई लड़ सकती है। यदि आप आश्वस्त हैं कि लड़की को न्यूनतम वैकल्पिक जीवन साधन उपलब्ध होने का विश्वास दिला सकते हैं तो आप पुलिस को रिपोर्ट करें, पुलिस कार्यवाही न करे तो एस.पी. को मिलें। यदि फिर भी काम न चले तो मजिस्ट्रेट को शिकायत दें। लड़की को उस के पति की कारा से मुक्ति दिलाएँ।

लड़की के मुक्त हो जाने पर उस की ओर से विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन, धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण के लिए परिवार न्यायलय में आवेदन प्रस्तुत कराएँ। घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण, वैकल्पिक आवास तथा लड़की के आसपास न फटकने के लिए निषेधात्मक आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं। इस से लड़की को जो मदद आप अभी उपलब्ध करा रहे हैं उस की जरूरत कम हो जाएगी।  आप लड़की को कोई नियोजन दिला कर उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें। उसे नियोजन मिल जाने पर वह स्वावलंबी हो जाएगी। जब उस का विवाह विच्छेद हो जाए तो वह निर्णय कर सकती है कि उसे एकल स्त्री की तरह जीना है अथवा एक अच्छा जीवन साथी तलाश कर उस के साथ जीवन व्यतीत करना है।

वैवाहिक विवाद में मुकदमा तुरन्त करें, सुलह की कार्यवाही तो मुकदमे के लंबित रहते भी हो सकती है।

समस्या-

प्रतापचंद्र ने ग्राम करवनियां, ब्लाक नगवां, जिला सोनभद्र (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी बहन कंचन का केस अप्रैल 2016 से ही रावर्ट्सगंज जिला न्यायालय में चल रहा है। 2013 में बस्ती जिले के करमांव निवासी किसोर चंद्र मणी से उसकी शादी हिंदू रिवाज से हुई थी, जिसके बाद तीन बार वह क्रमशः 1 सप्ताह, 1 माह, 3 माह के लिए, ससुराल गयी है। उसे बार बार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उस पर जानलेवा हमला किया गया, उसके पति का उसकी भाभी से संबंध है, इसका विरोध करने पर परिवार वालों ने इसे भी देवर से संबंध रखने की सलाह दे डाली। तीन साल तक सुलह-समझौता करवा कर दोनो पक्षों द्वारा मामले को हल करने की भरसक कोशिश की गई, पर हल न निकला। दहेज की मांग व शारिरिक प्रताड़ना और भी बढ़ती गई।  जब उसे जान से मार देने की कोशिश की गई तब से वह अपने मायके में ही है, और वह उससे तलाक लेना चाहती है। पहले मिल कर बातचीत से तलाक़ का मामला हल न होने पर, साल 2016 अप्रैल में हम लोग की तरफ से दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा तथा गुजाराभत्ता लड़के पक्ष वालों पर मुकदमा कर दिया गया। लड़के वाले पहले की ही तरह अब भी धोखाधड़ी वाली बात करते हैं कि अब सब ठीक हो जायेगा विदाई कर दो। पर लड़की का स्टैंड क्लीयर है- कि मुझे तलाक़ चाहिए। दो-ढाई सालों में कोर्ट में वे लोग पेशी पर अबतक तीन या चार बार ही आये हैं, किंतु उनका कुछ नहीं हुआ। अक्टूबर 23, 2018 को मेंटेनेंस (125) का फैसला आया पर कोर्ट द्वारा तय रू. 2500 गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है, बाकी दो केसों का क्या हुआ वकील कुछ नहीं बताता। मुझे जानकारी नहीं है। मै बाहर ही रहता हूँ गाजियाबाद. कृपया बतायें की अब कोर्ट क्या करेगी? या हमें क्या करना होगा। ताकि जल्दी से मामले का निपटारा हो?

समाधान-

2013 में शादी हुई, बहिन तीन बार में कुल मिला कर चार माह एक सप्ताह ससुराल में रह रही है। उसी में इतने झगड़े हैं। आप ने जब सुलह समझौते की बात शुरू की तभी आप को ये सारे मुकदमें और तलाक का मुकदमा कर देना चाहिए था। सुलह समझौते की बातचीत तो मुकदमों के लंबित रहते भी चल सकती थी।

दो-ढाई साल पहले 2016 आप की बहिन की और से तीन मुकदमे किए गए हैं।  अब आप को जल्दी पड़ी है। तीनों मुकदमों में सामने वाले पक्ष को जवाब देने का मौका होगा, आप की साक्ष्य होगी, उस की साक्ष्य होगी फिर बहस और फिर फैसला होगा। समय तो लगेगा। यह अमरीका नहीं है जहाँ दस लाख की आबादी पर 140 अदालतें हों, यहाँ इतनी आबादी पर 12-13 अदालतें हैं। लोग ज्यादा अदालतों के लिए तो लड़ेंगे नहीं, वोट देंगे तब हिन्दू मुसलमान हो जाएँगे। तो ऐसे ही भुगतना होगा।

आप की बहिन को तलाक चाहिए और अभी तक तलाक का मुकदमा तक नहीं किया है। तलाक कैंसे मिलेगा? जिस दिन आप को यह पता लगा कि पति के उस की भाभी के साथ संबंध है और बहिन को भी देवर के साथ संबंध रखने की सलाह दी गयी है तभी आप को तुरन्त तलाक का मुकदमा करवाना चाहिए था। अब भी बहिन के लिए तलाक चाहते हैं तो उस के लिए मुकदमा तुरन्त करें। आप ने 2013 से 5 साल बहिन के जीवन के बरबाद हो चुके हैं। थोड़ा धैर्य रखिए नतीजे भी आएँगे। न्याय ऐसी चीज नहीं है जो जाए और बाजार से खरीद लाए, बस काम खत्म। समय तो लगेगा।

आप खुद अपनी बहिन के वकील से दैनन्दिन संपर्क में नहीं हैं। एक बार जाइए, उस से मिलिए और विस्तार से बात कीजिए। उसे कहिए कि आप उस से फोन पर पूछताछ करते रहेंगे। तो वकील सब कुछ बताएगा। यदि एक दो मुलाकातों के बाद लगे कि वकील ठीक से काम नहीं कर पा रहा है तो किसी अच्छे वकील को कर लें। हालांकि वकील बदलने से मुकदमे में लगने वाला समय कम होगा ऐसा लगता नहीं है।

पालिसी में नोमिनी न बनाना विवाह विच्छेद का आधार नहीं हो सकता।

समस्या-

मेरा विवाह तलाकशुदा लड़की से हुआ है जिसकी आयु 38 वर्ष है मेरी 28 वर्ष है। विवाह का पंजीयन नगर पालिका में हुआ है, जिस में डिवोर्स का कोई हवाला नहीं दिया गया है। मेरी पत्नी सरकारी अध्यापिका हे और मैं बेरोजगार हूँ। मेरी शादी में मैंने किसी प्रकार का दहेज नहीं लिया है, एक बैड एक चादर तक नहीं ली। बस एक अंगूठी ली बस। वह ससुराल में बहुत कम आती है। ज्यदा खुद के माता पिता के पास रहती है और मैं भी उन के माता पिता के पास ही रहता हूँ। वह खुद के रिकॉर्ड में कहीं पति का नाम मांगते हैं तो नहीं भरती। इनकम टैक्स में रिबेट के लिए कोई पालिसी करती है तो रिबेट के लिए परामर्श लेते हैं और कहते हैं कि पति पत्नी के नाम पालिसी ले लो, उसमें वह अपने पापा को नामिनी बनाती है, कहीं भी नॉमिनी में मेरा नाम नहीं भरती। उस की आय 40000 रुपए प्रतिमाह से अधिक है। यदि ऐसे में तलाक मेरी ओर लिया जाता है तो भरण पोषण या आर्थिक दंड देना होगा क्या?

-दौलतराम, खंडवा, म.प्र.

समाधान-

पने विवाह अपनी मर्जी से किया। आप बेरोजगार थे तो आपत्ति आप की पत्नी को होनी चाहिए थी। पत्नी की उम्र अधिक है तो आप को पता था। वह सरकारी कर्मचारी है यह भी आप को पता था। वह तलाकशुदा है यह भी आप को पता था। वह अपने माता पिता के साथ रहती है, आप भी उस के साथ रहते हैं इस में क्या परेशानी है। आप का सारा खर्च आप की पत्नी उठाती है तो इस में आपको कोई आपत्ति नहीं है। जो वह कमाती है उस की सम्पत्ति है। उसे वह कैसे रखती है या उस में किस को वह नोमिनी बनाती है यह उस का अधिकार है। न तो किसी पति को और न ही किसी पत्नी को यह अधिकार है कि वह अपने जीवनसाथी को बाध्य कर सके कि वह उसे नोमिनी बनाए। आप नोमिनी क्यों बनना चाहते हैं? नोमिनी तो पालिसी लेने वाले की मृत्यु पर पालिसी का पैसा लेने वाला होता है लेकिन वह उस धन का मालिक नहीं होता। धन तो उसी को मिलता है जो उत्तराधिकारी होता है। आप के इस तरह के सवाल करने से तो ऐसा लगने लगेगा कि आप बिना कुछ किए धरे अपनी पत्नी की कमाई पर अपना जीवन जीना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि पत्नी अपनी सारी संपत्ति आप के नाम कर दे। विवाह में यह उचित नहीं है। आप अपनी पत्नी पर किसी तरह का संदेह करने के स्थान पर उस पर भरोसा करते हुए उस के साथ प्रेम पूर्वक एक अच्छे जीवनसाथी की तरह रह सकते हैं।

आप को और तो कोई शिकायत अपनी पत्नी से है नहीं। आप के पास तलाक का कोई आधार नहीं है। नोमिनी नहीं बनाना कोई आधान नहीं हो सकता। यदि पति या पत्नी को ही नोमिनी बनाने या न बनाने के नाम पर तलाक होने लगें तो देश की आधी शादियाँ अब तक टूट जानी चाहिए थीं। आप को तलाक मिल ही नहीं सकता। वह तभी मिल सकता है जब कि आपकी पत्नी सहमति से आपको तलाक देने को तैयार हो। ऐसे में तो आप दोनों तय करेंगे कि भऱण पोषण किस को कितना देना है और देना है या नहीं देना है।

हिन्दू धर्म त्याग कर इस्लाम ग्रहण कर लेने मात्र से उस का पूर्व विवाह समाप्त नहीं हो जाता, उसे दूसरा विवाह करने के लिए विवाह विच्छेद कराना होगा।

समस्या-

विवाहित हिन्दू स्त्री का इस्लाम धर्म अपनाने के बाद क्या उसके पहले पति से विवाह रहता है या टूट जाता है, वह दूसरी शादी के लिए तलाक ले या नहीं?

-सुलेमान,  तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ राज्य राजस्थान

समाधान-

को भी हिन्दू स्त्री-पुरुष जब एक बार हिन्दू विधि से विवाह कर लेते हैं तो वे दोनों उस विवाह में तब तक रहते हैं जब तक कि उस विवाह के विच्छेद की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती है। यदि उन में से कोई भी धर्म परिवर्तन कर लेता है तब भी यह विवाह बना रहता है, वे साथ साथ रह सकते हैं।।  किन्तु धर्म परिवर्तन से धर्म परिवर्तन करने वाले के पति या पत्नी को यह अधिकार उत्पन्न हो जाता है कि वह धर्म परिवर्तन के आधार पर अपने साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सके और वह  हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(ii) में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकता है और साथी के धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है। तब वह दूसार विवाह कर सकता/ सकती है।

यदि आप का प्रश्न यह है कि किसी स्त्त्री द्वारा इस्लाम ग्रहण कर लेने के बाद उसे दूसरा विवाह करने के लिए अपने पूर्व पति से तलाक लेना जरूरी तो नहीं? तो उस का उत्तर यह है कि उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा कर अपने पूर्व पति से  विवाह विच्छेद करना होगा। इस्लाम धर्म के अनुसार भी एक स्त्री एक विवाह में रहते हुए निकाह नहीं कर सकती। उसे पहले पूर्व विवाह से तलाक लेना पड़ेगा और फिर इद्दत की अवधि भी व्यतीत करनी होगी। इस मामले में हिन्दू स्त्री को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाने के बाद भी अपने हिन्दू पति से हिन्दू विधि से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करनी होगी। डिक्री पारित होने के उपरान्त इद्दत की अवधि गुजर जाने पर ही वह इस्लामी शरीयत के अनुसार निकाह कर सकती है।

 

हिंसा के बाद ससुराल से निकाल देने पर स्त्री के पास विधिक उपाय।

समस्या-

अनामिका ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे सास ससुर और जेठानी दवारा मुझे बहुत टॉर्चर किया गया। दहेज के लिए “कम लाई हो” के ताने दिए गए और जेठानी और सास ने मुझे मारा भी है। मेरे पति सब देखते हुए भी कुछ नहीं बोले, उन लोगो को। मेरे पति और जेठानी के बीच नाजायज़ संबंध है। इसका विरोध करने पर उन लोगो ने मुझे घर से निकाल दिया है। अब मैं क्या करूँ? मेरे पति उस औरत को छोड़ने को तैयार नहीं हैं, और मुझे तलाक़ दे रहे हैं। मैं क्या कर सकती हूँ? कृपया उचित सलाह दीजिए।

समाधान –

र उस महिला की समस्या घर है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और यदि है तो उस के बाद भी वह अपनी रिश्तेदारियों से अलग किसी मित्र समूह में नहीं है। वस्तुतः  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उस का जन्म समूह में हुआ है और वह समूह के बिना नहीं रह सकता। एक स्त्री विवाह तक मायके में रहती है तब उस के साथ परिवार होता है। जैसे जैसे वह बड़ी होती है परिवार को इस की चिन्ता सताने लगती है कि अब उस की विदाई का समय आ गया है और वह विवाह कर के उसे विदा कर देता है। कुछ ही परिवार हैं जो यह सोचते हैं कि स्त्री को पहले आत्मनिर्भर बनाना चाहिए और उस के पास आत्मनिर्भर मित्रो का एक समूह भी होना चाहिए। स्त्री के लिए ये दो चीजें सब से अधिक जरूरी हैं। जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता या कम से कम ध्यान दिया जाता है। अभी आप के पास ये दो चीजें होतीं तो आप को कोई परेशानी नहीं होती, आप खुद अपनी समस्या से मुकाबला कर सकती थीं। आप ने अपनी समस्या में अपनी आत्मनिर्भरता, आत्मनिर्भर मित्र समूह और मायके के बारे में कुछ नहीं बताया है।

आप के पति के अपनी भाभी के साथ संबंध वाली समस्या का कानून के पास कोई हल नहीं है। आप के साथ जो कुछ हुआ है उस के बाद आप का उस परिवार से संबंध तोड़ना, पति से तलाक लेना और टॉर्चर के लिए ससुराल वालों को सजा दिलाना ही आप का उपाय है। इस के लिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन दे कर अपनी सुरक्षा, पृथक आवास की सुविधा और भरण पोषण की राशि प्रतिमाह प्राप्त करने के लिए तुरन्त आवेदन करना चाहिए। आप अपने साथा हुई हिंसा के लिए तथा आप के स्त्रीधन को पाने के लिए जो आप के पति के पास या ससुराल में रह गया है धारा 498ए तथा 406 भारतीय दंड संहिता में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती हैं और पुलिस द्वारा यथोचित कार्यवाही न करने पर न्यायलाय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के साथ ही धारा 13  हिन्दू विवाह अधिनियम में अपने पति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन  तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भरण पोषण राशि प्रतिमाह पाने के लिए आवेदन करने के उपाय आप के पास उपलब्ध हैं। बेहतर है कि आप अपने निकट के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर ये सब उपाय करने का प्रयत्न करें, देरी न करें।

पत्नी को उस की इ्च्छा के विरुद्ध साथ नहीं रखा जा सकता।

समस्या-

कमलेश कुमार ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरी शादी 20 मई 2017 को हिन्दू रीति रिवाज के साथ हुई थी। बारात में मेरे गांव के लोगो से ससुराल पक्ष के लोगो ने मारपीट कर दी। उनके गांव वालों ने एक बाराती को खूब लहूलुहान होने तक मारा और नजदीक के थाना मे बाराती के खिलाफ केस दर्ज कर दिया। इसके बाद हमने समझौता कर के शादी की। लेकिन शादी के 1 माह बाद पता चला कि मेरी लड़की पक्ष के लोगों ने मेरे छोटे भाई के खिलाफ मारपीट की रिपोर्ट की है। फिर यह झुठा मामला समझौता करने पर बहुत मुश्किल से ससुराल पक्ष के हाथ-पांव जोड़ने पर 8-9 महीने में खत्म हुआ। शादी के बाद लड़की मेरे और मेरे परिवार के साथ गलत व्यवहार औऱ मेरे साथ मारपीट करने लगी। बात बात में लड़ने झगड़ने लगी फिर भी मैं इसे सहन करता रहा, कुछ समय बाद ठीक हो जाएगा कह कर। लेकिन दिन ब दिन और ज्यादा लड़ाई झगड़ा करने लगी।  फिर वह कभी 15 दिन के लिए तो कभी 1 माह के लिए बिना पूछे मायके चली जाती थी। कुछ महीनों बाद पता चला कि लड़की का गांव के एक लड़का के साथ अवैध संबंध था। तीज में एक माह से अधिक समय तक अपने घर मे रही और तभी वहीं गर्भवती हो गई। इस अवैध गर्भधारण की बात को उनसे कहने पर दहेज में फंसाने की बात करती थी। फिर भी लड़की को रखने के उद्देश्य से मैंने बात दबा दिया। 17 जून 2017 को एक लड़के को जन्म दिया।  लड़की मेरे साथ मुश्किल से 10 माह ही रही। इसके बाद मेरे घर रायपुर से अपने जीजा के साथ चली गई। उनका अपने जीजा के साथ भी अवैध संबंध है। फिर भी मैंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया और उनके साथ रहने के लिए उनके जीजा के खिलाफ थाना में कोई शिकायत नहीँ की। उसके बाद कई प्रयास के बाद भी लड़की वापस नही आई। समाज मे भी आवेदन देके बुलाया लेकिन लड़की नही आई। महिला थाना में रिपोर्ट लिखाई थी की मेरे पति मुझे रख नही रहे है। महिला थाना में भी समझाइस दी गई कि अपने पति के साथ रहो लेकिन लड़की नही मानी और दहेज के समान मांग कर दी। मैं भी समान देने के लिए राजी हो गया। उसको महिला थाने में अपने सामान का लिस्ट देना था जो लड़की नही दी जिससे समान वापस नही कर पाया। अब कोर्ट में भरण पोषण की मांग कर रही है। मैं निजी कंपनी में काम करता हँ। मेरी सैलरी 10,000 महीना है। मैं रायपुर में 3000 किराये के मकान रहता हूं। लड़की मुझसे 12,000 महीना भरण-पोषण के लिए मांग रही है। मेरे और मेरे परिवार के नाम पर  कोई जमीन जायदाद नहीं है और न ही मेरे परिवार का अन्य आय का स्त्रोत है। जब भी समझौता के लिए उनके घर जाता हूँ तो मेरी पत्नी और उनके घर वाले मारपीट करते हैं। कई बार जाति समाज ने इस मामले को सुलझाने के लिए उन्हें बुलाया लेकिन कभी नही आई। इस वजह से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। वही आफिस का काम भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा हूं। जिससे नौकरी छूटने का भी खतरा है। अब मैं उस लड़की को मर्जी के हिसाब रखना चाहूंगा अगर वह मेरी साथ नहीं रहना चाहेगी तो मैं तलाक चाहता हूं। लेकिन जल्द से जल्द इस मामला का निराकरण चाहता हूँ। कृपया सलाह प्रदान करें।

समाधान-

प के अनुसार शादी के पहले झगड़ा हुआ, आप के बाराती से मारपीट की तब भी आपने शादी की। फिर वह परिवार वालों से बिना कारण झगड़ने लगी तब भी आप ने उस से कुछ नहीं कहा। वह मर्जी से अपने मायके आती जाती रही। फिर आप को पता लगा कि उस के किसी लड़के से संबंध हैं तब भी आप शान्त रहे। फिर वह मायके में गर्भवती हो गयी और एक बच्चे को जन्म दिया फिर भी आपने कुछ नहीं कहा। फिर वह बच्चे को साथ ले कर जीजा के साथ चली गयी, उस के साथ भी उस के अवैध संबंध हैं। आप ने उस के जीजा के खिलाफ भी कोई शिकायत नहीं की। अब तक आपने अपना कोई दोष नहीं बताया। आप इंसान हैं कि देवता है?

अब आप कहते हैं कि पुलिस ने समझौते के लिए बुलाया वह आप के साथ रहने को मना कर गयी। फिर कहते हैं कि आप उस को अपनी मर्जी के हिसाब से रखेंगे। भाई आप रखेंगे कैसे? वह रहना चाहेगी तब ना। और यदि पत्नी या पति न चाहे तो उसे जबरन तो पुलिस और अदालत भी साथ नहीं रखवा सकती। इस लिए यह ख्याल तो छोड़ दें कि आप उसे मर्जी के अनुसार अपने साथ रखेंगे।

आप तलाक लेना चाहते हैं तो किसी स्थानीय वकील से मिलिए। वे आपसे बात कर के आपसे जरूरी दस्तावेज इकट्ठा कर के पता करेंगे कि आप किन किन आधारों पर तलाक ले सकते हैं। फिर आप तलाक के लिए मुकदमा कर दें। पत्नी खर्चा मांग रही है तो देना पड़ेगा। जब तक वह दूसरी शादी नहीं कर लेती है तब तक देना पड़ेगा। बच्चे का खर्च भी देना पड़ेगा तब तक जब तक कि उस की कस्टडी आप को नहीं मिल जाती। आप तलाक का मुकदमा करने के बाद बच्चे की कस्टडी का मुकदमा कर सकते हैं।

मानसिक संतुलन मत बिगाड़िए, यह बीमारी है डाक्टर के पास जा कर इलाज कराइए। उस से कुछ होने वाला नहीं है और शारीरिक व मानसिक हानि और होगी।

बिना न्यायालय की डिक्री के हिन्दू विवाह विच्छेद संभव नहीं है।

समस्या-

प्रियंका जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी नवंबर 2016 में हुई थी शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे ससुराल में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताण्डित किया जाने लगा। एक दो महीने तक तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर मैं ने अपने माता पिता को यह बात बताई और शादी के 5 महीने बाद अलग हो जाने का निर्णय लिया। आपसी रज़ामंदी एवं सामाजिक स्तर पर स्टाम्प वगैरह लिखवाकर हम अलग हो गए। न्यायालय का इस में कोई योगदान नहीं था। अब घरवाले मेरे लिए लड़का ढूंढ रहे हैं, मुझे इस बात का डर है कि मेरा तलाक वैध है या नहीं? कहीं इस तरह शादी कर के मैं अपने होने वाले पति की मुसीबत तो नही बढ़ा रही हूँ?  डिक्री क्या है? इसका होना आवश्यक है क्या? कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प जैन हैं और आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी है। हिन्दू विवाह विधि में कोई भी विवाह विच्छेद बिना न्यायालय के निर्णय और डिक्री के संभव नहीं है। आपसी समझौते से आप लोग अलग हो गए हैं लेकिन वैवाहिक संबंध वैध रूप से समाप्त नहीं हुआ है। अभी भी कानूनी रूप से आप के पूर्व पति ही आप के पति हैं और आप उन की पत्नी हैं। यदि आप विवाह विच्छेद के न्यायालय के निर्णय व डिक्री के बिना विवाह करती हैं तो वह पूरी तरह अवैध होगा। क्यों कि इस के बाद आप के नए पति से यौन संबंध स्थापित होंगे जो आप के पूर्व पति की सहमति के बिना होंगे तो आप के नए पति भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत दोषी माने जाएंगे। इस कारण आप के लिए यह आवश्यक है कि आप न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री प्राप्त करें।

न्यायालय का निर्णय कई पृष्ठ का होता है। उस में विस्तार से दोनों पक्षों के अभिकथन, साक्ष्य व उन की विवेचना के साथ निर्णय अंकित होता है। जब कि डिक्री किसी भी दीवानी (सिविल) मामले में हुए निर्णय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति है जिस में वाद के पक्षकारों के अधिकारों को प्रकटीकरण होता है। किसी विवाह विच्छेद के मामले में डिक्री दो पृष्ठ की होगी जिस में पक्षकारों का नाम पता लिखा होगा तथा यह लिखा होगा कि इन दोनों के बीच विवाह विच्छेद हो चुका है। कहीं भी आप को बताना हो कि आप का विवाह समाप्त हो गया है तो दो पृष्ठ की इस डिक्री की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करना पर्याप्त होगा।

किसी भी मामले में सामान्य रूप से विवाह के एक वर्ष तक विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इस कारण आप के मामले में भी नवंबर 2017 में पूरा एक वर्ष व्यतीत हो जाने तक यह आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि दोनो पक्ष सहमत हों तो जिस समय आप के विवाह को एक वर्ष पूर्ण हो आप और आपके पति मिल कर सहमति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करें। आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री मिल जाएगी। यदि दोनो पक्ष सहमति से तलाक के लिए अर्जी प्रस्तुत नहीं करते तो फिर आप को अकेले किसी आधार पर संभवतः क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना होगा। उस में विवाह विच्छेद में समय लग सकता है।

तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।


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