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कांट्रेक्टर ने धन ले कर मकान का निर्माण नहीं किया तो यह अमानत में खयानत का अपराध है।

lawसमस्या-

वैभव ने जलगाँव, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक कांन्ट्रेक्टर को 3 लाख रुपया दिया था, मकान निर्माण के लिए। पर उस ने हमें मकान नहीं दिया और पैसे भी नही दे रहा है। उस ने पुलिस स्टेशन जाकर कंप्लेंट दी है कि इनकी वजह से मेरी जान को धोका है। पैसे मांगने पर पैसा भी नहीं दे रहा है। उसके लिए क्या करूँ?

समाधान-

प के पास कांट्रेक्टर को तीन लाख रुपया देने का कोई सबूत तो अवश्य होगा। आप किसी वकील से अथवा खुद उसे रजिस्टर्ड ए.डी. के माध्यम से एक नोटिस प्रेषित कीजिए जिस में लिखिए कि उस ने आप से मकान निर्माण करने के लिए रुपए तीन लाख एडवांस लिए थे, जिसे वह नहीं लौटा रहा है और उस धन का उस ने बेईमानी से निजी कामों में उपयोग कर लिया है जो धारा 406 आईपीसी में अपराध है। वह आप का धन 12% वार्षिक ब्याज या जो भी बाजार दर हो ब्याज सहित 15 दिनों में लौटा दे अन्यथा आप उस के विरुद्ध दीवानी और अपराधिक दोनों प्रकार की कार्यवाही करेंगे। इस नोटिस की प्रति और उस की रजिस्ट्री की रसीद तथा एडी प्राप्त हो जाए तो उसे संभाल कर रखें।

स के बाद आप किसी वकील के माध्यम से धारा 406 आईपीसी का परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करें और न्यायालय से आग्रह करें कि उस परिवाद को अन्वेषण हेतु धारा 156(3) दं.प्र.संहिता में पुलिस को भिजवा दिया जाए। यदि पुलिस अन्वेषण के दौरान कांट्रेक्टर आप को आप का रुपया लौटा देता है तो ठीक है अन्यथा उस के विरुद्ध या तो न्यायालय में पुलिस द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत किया जाएगा अथवा मामले को दीवानी प्रकृति का बताते हुए अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत होगा। यदि आरोप पत्र न्यायालय में नहीं दिया जाता है तो न्यायालय आप को सूचना दे कर न्यायालय में बुलाएगा। तब आप आपत्तियाँ प्रस्तुत कर के आप का तथा अपने गवाहों के बयान वहाँ करवाने से न्यायालय कांट्रेक्टर के विरुद्ध अपराधिक मामले में प्रसंज्ञान ले कर उस के विरुद्ध मुकदमा चला कर उसे दंडित कर सकता है।

दि आप के पास तीन लाख रुपए देने का लिखित सबूत है तो आप 3 लाख रुपया, ब्याज व न्यायालय के खर्चा प्राप्त करने के लिए कांट्रेक्टर के विरुद्ध दीवानी वाद भी संस्थित कर सकते हैं।

जब कोई पुलिस अदालत तक पहुँचता है तभी लोगों को कानून याद आता है।

rp_Hindu-marrige1.jpgसमस्या-

मनोज कुमार चौरसिया ने सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 28 मई 2013 को हुई। शादी के एक माह बाद मेरी पत्नी मानसिक रूप से बीमार हो गयी जिसका हमने मनोचिकित्सक इलाहाबाद से इलाज कराना शुरू किया और अभी भी इलाज चल रहा है। मेरे ससुराल वाले जबरन मेरी पत्नी को विदा कराकर ले जाते है और वापस विदा नहीं करते। चूँ कि मेरे ससुर वकील सुलतानपुर दीवानी में एवं ममिया ससुर भदोही में जज हैं। इसलिए मुझे झूठे मुकदमें में फँसाने की धमकी देते हैं। 07 फरवरी को मेरी पत्नी को जुड़वाँ बच्चे एक बेटा और एक बेटी आपरेशन से हुए। दवा का सारा पैसा हम ने दिया और हास्पिटल से पत्नी मायके चली गयी। जाते समय ससुराल वालों ने कहा कि तुम को तरसा लेगें। देखो अब हम क्या–क्या करते हैं? तुम्हे बच्चा पैदा करने की क्या जरूरत थी? अब 8 माह का समय बीत चुका है, ससुराल वाले से बात किया परन्तु भेजने को तैयार नहीं थे। मेरी माँ को अपने घर बुलाकर कहा कि अब मेरी लडकी नहीं जायेगी लड़ कर हिस्सा लेगी। इसपर हमने वकील से बात किया तो वकील ने धारा 13 के अन्तर्गत मानसिक बीमारी और जबरन ले जाने व धमकी देने को आधार बनाकर तलाक का मुकदमा कर दिया है। मानसिक बीमारी का लगभग एक वर्ष का पर्चा व कुछ डिलीवरी हास्पिटल का पर्चा मेरे पास है। क्या मुझे तलाक मिल जायेगा? और क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406‚ 125‚ 24 व अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड सकता है?

समाधान-

तीसरा खंबा को इस तरह की समस्याएँ रोज ही मिलती हैं। जिन में बहुत से पति यह पूछते हैं कि मुझे तलाक तो मिल जाएगा? क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406 या अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड़ सकता है? आदि आदि।

र कोई विवाह करने के पहले और विवाह करने के समय यह कभी नहीं सोचता कि कानून क्या है? और उन्हें देश के कानून के हिसाब से बर्ताव करना चाहिए। वह सब कुछ करता है। वह दहेज को बड़ी मासूमियत से स्वीकार करता है, वह मिले हुए दहेज की तुलना औरों को मिले हुए दहेज से करता है, वह उस दहेज में हजार नुक्स निकालने का प्रयत्न करता है।

ब विवाह के लिए लड़की देखी जाती है तो उस की शक्ल-सूरत, उस की पढ़ाई लिखाई, उस की नौकरी वगैरा वगैरा और उस के पिता का धन देखा जाता है। यह कभी नहीं जानने का प्रयत्न किया जाता कि लड़की या लड़के का सामान्य स्वास्थ्य कैसा है? वह किस तरह व्यवहार करता या करती है, विवाह के उपरान्त दोनों पति-पत्नी में तालमेल रहेगा या नहीं? क्यों कि यह सब जानने के लिए लड़के लड़की को कई बार एक साथ कुछ समय बिताने की जरूरत होती है। इसे पश्चिम में डेटिंग कहते हैं। भारतीय समाज डेटिंग की इजाजत कैसे दे सकता है? क्या पता लड़के-लड़की शादी के पहले ही कुछ गड़बड़ कर दें तो? या लड़का या लड़की रिश्ता के लिए ही मना कर दे तो दूसरे की इज्जत क्या रह जाएगी?

विवाह के बाद दहेज को दहेज ही समझा जाता है। पति और उस के रिश्तेदार उसे अपना माल समझते हैं। वे जानते हैं कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। पर कौन देखता है? की तर्ज पर यह अपराध किए जाते हैं। दहेज के कानून में माता-पिता, रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य लोगों यहाँ तक कि ससुराल से प्राप्त उपहारों को दहेज मानने से छूट दी गयी है। इस कारण जब कोई मुकदमा दर्ज होता है तो लोग उसे दहेज के बजाय उपहार कहना आरंभ कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि किसी स्त्री को मिले उपहार उस का स्त्री-धन है। उस के ससुराल में रखा हुआ यह सब सामान उस की अमानत है। उसे न लौटाएंगे तो अमानत में खयानत होगी। फिर जब आईपीसी की धारा 406 अमानत में खयानत का मुकदमा ही बनाना होता है तो बहुत सी काल्पनिक चीजें लिखा दी जाती हैं।

त्नी को मानसिक या शारीरिक क्रूरता पहुँचाना हमारे यहाँ पति और ससुराल वालों का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन कानून उसे 498-ए में अपराध मानता है, तो यह अपराध भी धड़ल्ले से देश भर में खूब चलता है। लोग ये दोनों अपराध खूब धड़ल्ले से करते हैं। समझते हैं कि इन्हें करने का उन्हें समाज ने लायसेंस दिया हुआ है। पर जब इन धाराओं में मुकदमा होने की आशंका होती है या धमकी मिलती है तो वही लोग बिलबिला उठते हैं। उन्हें कानून का यह पालन अत्याचार दिखाई देने लगता है।

म मानते हैं कि जब मुकदमा होता है तो बहुत से फर्जी बातें उस में जोड़ी जाती हैं। यह भी इस देश की प्राचीन परंपरा है। गाँवों में जब लड़ाई होती है तो इज्जत की रखवाली में हथियार ले कर बैठे परिवारों की स्त्रियों से पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट करा दी जाती है। लेकिन विवाह के रिश्ते में ऐसा फर्जीवाड़ा करना दूसरे पक्ष को नागवार गुजरता है।

ब अदालत में कोई भी पीड़ित हो या न हो। एक बार शिकायत कराए, या पुलिस को एफआईआर लिखाए तो उन का फर्ज है जाँच करना और जाँच करने का मतलब पुलिस के लिए यही होता है कि पीड़ित पक्ष और उस के गवाहों के बयान लिए जाएँ और उन से जो निकले उस के आधार पर अपराध को सिद्ध मानते हुए अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया जाए। एक बार आरोप पत्र पेश हो जाए तो जब तक उस मुकदमे का विचारण नहीं हो जाए तब तक अदालत के चक्कर तो काटने ही होंगे। सचाई पता लगाने की जरूरत पुलिस और अदालत को कभी नहीं होती। वैसे भी जो चीज पहले से ही पता हो उसे जानने की जरूरत नहीं होती। आखिर वह जान लिया जाता है जो पहले से पता नहीं होता।

प के सामने समस्या है। आप ने तलाक का मुकदमा कर दिया है। वकील की सहायता ली है। वकील को सारे तथ्य पता हैं। हमे तो आप ने पत्नी को मानसिक रोगी मात्र बताया है। उस का पागलपन या मानसिक रोग क्या है? वह रोग के कारण क्या करती या नहीं करती है? या चिकित्सक ने उसे क्या रोग बताया है? आपने हमें कुछ नहीं बताया है। जो मुकदमा किया है उस में क्या आधार किन तथ्यों पर लिए हैं? यह भी नहीं बताया है फिर आप हम से अपेक्षा रखते हैं कि तीसरा खंबा आप को बता देगा कि आप को तलाक मिलेगा या नहीं और आप को फर्जी मुकदमों में फँसा तो नहीं दिया जाएगा।

लाक का मिलना मुकदमे में लिए गए आधारों और उन्हें साक्ष्य से साबित करने के आधार पर निर्भर करता है। आप की पत्नी मुकदमा दर्ज कराएगी तो हो सकता है आप को गिरफ्तार भी कर लिया जाए। लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में जमानत हो जाती है और जल्दी ही पति और उसके परिवार वाले रिहा हो जाते हैं। ऐसे मामलों में चूंकि झूठ जरूर मिलाया जाता है इस कारण ज्यादातर पति इस मिलावट के कारण बरी हो जाते हैं। पर कभी कभी सजा भी हो जाती है। अगर आप ने कोई अपराध नहीं किया है। कभी पत्नी को गाली नहीं दी है, उस पर हाथ नहीं उठाया है, उस के उपहारों और स्त्री-धन को उस का माल न समझ कर अपना माल समझने की गलती नहीं की है तो आप को सजा हो ही नहीं सकती। पर यह सब किया है तो सजा भुगतने के लिए तैयार तो रहना ही चाहिए। अपराध की सजा हर मामले में नहीं तो कुछ मामलों में तो मिल ही सकती है।

भी तक कानून ने पत्नी को पति की संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं दिया है। पति की मृत्यु के बाद यदि पति ने कोई बिना वसीयत की संपत्ति छोड़ी हो तो उस का उत्तराधिकार बनता है जिसे वह ले सकती है। लेकिन जीते जी अधिक से अधिक अपने लिए भरण पोषण मांग सकती है। इस कारण जो यह धमकी दे रहे हैं कि पत्नी हिस्सा लड़कर लेगी वे मिथ्या भाषण कर रहे हैं। अभी तक कानून ने ही पति की संपत्ति में हिस्सा पत्नी को नहीं दिया है अदालत कैसे दे सकती है। इस मामले में आप निश्चिंत रहें। आज तीसरा खंबा की भाषा आप को विचित्र लगी होगी। पर इस का इस्तेमाल इस लिए करना पड़ा कि लोग ऐसे ही समझते हैं। आप इस बात को समझेंगे और दूसरे पाठक भी इस तरह के प्रश्न करना बन्द करेंगे। हम तो ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना बन्द कर ही रहे हैं।

स्त्री-धन जो पिता, माता, भाई, भाभी और बहन के पास है, अमानत है और उसे लौटाने से मना करना गंभीर अपराध है।

POSTMANसमस्या-

कप्तान सिंह ने राजौरी, जम्मू कश्मीर से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी के साथ धोखा हुआ है। उस की बहन बड़े भाई, भाभी और पिता ने साथ मिल कर अपने गहने सोने का हार झुमके, अंगूठी, इयर टॉप्स और सोने की चूड़ियाँ सारे सामान देने से मना कर दिया है। मेरी शादी को 10-11 साल हो गए हैं अब मेरी पत्नी बहुत दुखी है कृपया उपाय बताएँ।

समाधान

प की पत्नी के गहने जो भी उस के हैं वे पत्नी का स्त्री-धन हैं। यदि वे उस की बहन आदि के पास थे तो वे अमानत के तौर पर रखे थे। अमानत के तौर पर किसी पास रखी कोई भी संपत्ति अमानत ही होती है। यदि वह उसे देने से इन्कार करता है तो यह अमानत में खयानत है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 406 आईपीसी में दंडनीय अपराध है। आप की पत्नी को उक्त लोगों ने यह स्त्री-धन देने से मना किया है इस का अर्थ यह है कि उन्हों ने यह अपराध किया है।

प की पत्नी चाहें तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है, यदि पुलिस कार्यवाही करने से इन्कार करती है तो इलाके के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सीधे परिवाद प्रस्तुत करें। बेहतर होगा कि पुलिस को रिपोर्ट करने या न्यायालय में परिवाद दर्ज कराने के पहले आप की पत्नी स्वयं या किसी वकील के माध्यम से उक्त गहनों को लौटाने के लिए एक नोटिस रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेजें। नोटिस की एक एक प्रतियाँ उक्त सभी व्यक्तियों को अलग अलग डाक से भेजे जाएँ। सब की डाक की रसीदें और प्राप्ति स्वीकृतियाँ अपने पास रखी जाएँ।

बहनों को आत्म निर्भर होने और विवाह विच्छेद व भरण पोषण प्राप्त करने में मदद करें।

rp_Two-Girls-2006.jpgसमस्या-

नेमीचन्द सोनी ने बीकानेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी दो बहनों की शादी नागौर शहर राजस्थान में 2006 में की थी। मेरे जीजाजी तब से मारपीट करने लग गये। हम लोगों ने समाज के लोगों से सामाजिक मीटिंग करवा के जीजाजी को समझाया। फिर 5 साल में बड़ी बहन के 3 बच्चे ओर छोटी के 2 बच्चे हैं। मेरे जीजाजी दोनों सगे भाई है अभी दो साल पहले बड़े जीजा ने बहुत ज्यादा मारपीट शुरू कर दी। एक बार तेजाब से जलाना चाहा तो मेरी बहन की सास ने बचा लिया। बाद में हमें पता चला तो हम लोग जाकर मेरी बहनों को लेकर आ गये। आज दो साल हो गये मेरे जीजा आज तक लेने नहीं आये हैं। और लोगों को बोलते हैं कि मेरी पत्नी को जरूरत होगी तो वो अपने आप आयेगी और मैं तो मारपीट ऐसे ही करूंगा। हम लोगों को धमकी देता है। मैं घर में अकेला कमाने वाला हूँ। 18 सदस्यों का खर्चा मेरे को चलाना पड़ता है। आप कानूनी राय दो कि हमें क्या करना चाहिए?

समाधान

प की समस्या यह है कि आप के परिवार ने आप की बहनों को इस लायक नहीं बनाया कि वे अपने पैरों पर खड़ी हों। अब वह जमाना आ गया है कि केवल उन्हीं लड़कियों और स्त्रियों का जीवन सुरक्षित कहा जा सकता है जो स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हों, आत्मनिर्भर हों। शेष स्त्रियाँ जो माता पिता या पति पर आश्रित हैं उन का जीवन उन के आश्रयदाता की इच्छा पर निर्भर करता है। आप की बहनों के साथ यही हुआ है। यदि आप की बहनें स्वयं भी आत्मनिर्भर होतीं और अपना और बच्चों का पालन पोषण करने में समर्थ होतीं तो आप को बिलकुल परेशानी नहीं होती। अब आप तो अपने जीजाजी की सोच और उन के व्यवहार को बदल नहीं सकते। यदि जीजाजी बदल नहीं सकते और बहनों को उन्हीं पर निर्भर रहना है तो उन्हें वह सब भुगतना पड़ेगा। पहले भी आप की बहनों ने बहुत कुछ भुगता होगा। वे आप को अपने साथ हुए अत्याचारों के बारे में बताती भी नहीं होंगी, यही सोच कर कि वे यदि अपने मायके चली गयीं तो अकेला भाई कैसे इतने बड़े परिवार का पालन पोषण करेगा? वह तो आप लोग ही अपनी बहनों को अपने साथ ले आए। यदि न लाते तो शायद वे कभी आप को शिकायत तक न करतीं। खैर¡

पनी पत्नी के साथ मारपीट करना और तेजाब डाल कर जला देना हद दर्जे की क्रूरता है और धारा 498ए आईपीसी का अपराध है। हमारी राय में इस तरह की क्रूरता के बाद भी इन विवाहों में बने रहने का कोई कारण नहीं शेष नहीं बचता। ऊपर से यह गर्वोक्ति कि यदि पत्नी को जरूरत होगी तो वह खुद चली आएगी। यह एक दास-स्वामी की सोच है। विवाह हो गया तो पत्नी दासी हो गयी। आज के युग में कौन स्त्री इस दर्जे की दासता को स्वीकार करेगी और अपने ऊपर अमानवीय अत्याचारों को सहन करेगी।

मारी राय में आप को यह आशा त्याग देनी चाहिए कि आप के जीजा आप की बहनों को लेने आएंगे। वे आ भी जाएँ और आप की बहनों को ले भी जाएँ तो क्या वे उन के साथ उचित व्यवहार करेंगे? हमारे विचार से इस दर्जे की क्रूरता के बाद बहनों के पास पर्याप्त कारण है कि वे अपने पतियों के साथ रहने से इन्कार कर दें और उन से अपने लिए और अपने बच्चों के लिए प्रतिमाह निर्वाह भत्ते की मांग करें। विवाह से आज तक जो भी उपहार आप की बहनों को आप के परिवार से, ससुराल के परिवार से और अन्य परिजनों से प्राप्त हुए हैं वे उन का स्त्री-धन हैं। इस स्त्री-धन में से जो भी उन के पतियों और ससुराल वालों के पास है उसे भी लौटाने की मांग आप की बहनों को उन के पतियों और ससुराल वालों से करना चाहिए। यदि वे स्त्री-धन नहीं लौटाते हैं तो आप की बहनों को पुलिस थाना में धारा 498-ए और धारा 406 आईपीसी की शिकायत दर्ज करानी चाहिए। यदि पुलिस कार्यवाही करने में टालमटोल करती है या इन्कार करती है तो मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस के पास अन्वेषण के लिए भिजवाना चाहिए।

प की बहनें घरेलू हिंसा अधिनियम तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत अपने व अपने बच्चों के लिए भरण पोषण की मांग कर सकती हैं। उन्हें ये दोनों आवेदन प्रस्तुत करने चाहिए। यदि आप की बहनें हमेशा के लिए इस विवाह को समाप्त कर देने को तैयार हों तो हमारी राय में उन्हें विवाह विच्छेद का आवेदन भी प्रस्तुत करना चाहिए। विवाह विच्छेद के आवेदन की सुनवाई के दौरान परिवार न्यायालय अनिवार्य रूप से पति पत्नी के बीच समझौता कराने का प्रयत्न करते हैं। यदि उस समय तक विवाह विच्छेद के लिए या साथ रहने के बारे में कोई सहमति बने तो न्यायालय में भी समझौता हो सकता है।

विवाह विच्छेद के आवेदन के साथ ही धारा 25 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत स्थाई भरण पोषण के लिए भी आवेदन देना चाहिए जिस से आप की बहनों को एक बड़ी राशि एक मुश्त मिल सके।

प के उपनाम से पता लगता है कि आप लोग पेशे से सुनार हैं। सुनार परिवारों में तो बहुत सी महिलाएँ इस तरह के काम करती हैं जिस से वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। इस समस्या का एक मात्र उपाय यही है कि महिलाएँ अपने पैरों पर खड़ी हों। यदि विवाह विच्छेद होता है तो उस के साथ स्थाई भरण पोषण की जो राशि उन्हें मिले उन से वे अपने लिए कोई व्यवसाय खड़ा कर के अपने और अपने बच्चों की सामाजिक सुरक्षा कर सकती हैं। बच्चों का पालन पोषण कर सकती हैं और एक सम्मानपूर्ण जीवन जी सकती हैं।

न सब कामों को करने के लिए आप की बहनों को किसी स्थानीय वकील से सहायता प्राप्त करनी चाहिए। यदि मुकदमे के लिए खर्चों की परेशानी हो तो अदालत के खर्च और वकील की फीस के लिए आप की बहनें जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। प्राधिकरण मुकदमों के खर्चों और वकील की फीस की व्यवस्था कर देगा।

ट्रस्ट संपत्ति को व्यक्तिगत संपत्ति में बदलने का अपराध …

court-logoसमस्या-

रविशंकर तिवारी ने आरा, बिहार से बिहार राज्य की समस्या भेजी है कि-

क व्यक्ति ने अपने जीवन काल में अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी सम्पति को ट्रस्ट के नाम कर अपने ही परिवार के एक व्यक्ति को उसका प्रबंधक नियुक्त कर दिया। ट्रस्ट श्री राम जी लखन जी जानकी जी और महावीर जी के नाम से रजिस्टर्ड डीड सम्पादित किया गया।

ट्रस्ट लिखने वाले ने वह सम्पति अपनी पत्नी की नाम से खरीदी थी। पत्नी की मृत्यु के उपरांत ट्रस्ट लिखने वाले व्यक्ति की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। प्रबंधक ने लगभग पचीस (25) वर्षो बाद उक्त सम्पति को लोक अदालत में ट्रस्ट की डीड को छुपा कर अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ उक्त सम्पति का बँटवारा कर लिया और बँटवारा के कागज के अनुसार अपना दाखिल ख़ारिज करा लिया। क्या उस लोक आदालत की डिग्री को खत्म करवा जा सकता है ट्रस्ट डीड 1983 में लिखा गया था 2010 में लोक अदालत में बँटवारा किया गया। क्या प्रबंधक पर क्रिमिनल केस चलाया जा सकता है?

समाधान-

ट्रस्ट स्थापित करने वाले व्यक्ति ने संबंधित संपत्ति पत्नी के नाम से खुद खरीदी थी। यदि पत्नी की मृत्यु इस व्यक्ति की मृत्यु के पहले ही हो चुकी थी तो पत्नी की मृत्यु के उपरान्त वह संपत्ति उत्तराधिकार में उसी को प्राप्त हो गई। इस तरह वह व्यक्ति उस संपत्ति का पूर्ण स्वामी हुआ। वह ट्रस्ट स्थापित करने के लिए पूरी तरह सक्षम था। इस ट्रस्ट संपत्ति को पुनः व्यक्तिगत संपत्ति में परिवर्तित नहीं किया जा सकता था। प्रबंधक ने ट्रस्ट डीड को छुपा कर तथा अपने ही परिवार के किसी व्यक्ति से मिथ्या बँटवारा वाद संस्थित करवा कर न्यायालय में लोकअदालत के दौरान इस तरह का निर्णय कराया होगा। यह निर्णय गलत है और इसे बदला जा सकता है। कोई भी ट्रस्ट के लाभों से हितबद्ध व्यक्ति लोक अदालत की इस डिक्री को अपास्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकता है।

न्यायालय से संपत्ति की सही स्थिति छुपा कर जो दावा किया गया और बँटवारा कराया गया है वह धारा 207 व 406 आईपीसी में अपराध हो सकता है। सारे दस्तावेजों आदि का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो सकता है। बँटवारे के वाद के उन सारे पक्षकारों के विरुद्ध जो कि इस लोक अदालत के निर्णय से सहमत थे तथा जिन्हो ने उस पर हस्ताक्षर किए उक्त अपराधिक प्रकरण चलाया जा सकता है।

मायके वाले बहन-बेटी के गहनों पर कब्जा कर लें तो वह अमानत में खयानत की रिपोर्ट दर्ज करवाए।

police station receptionसमस्या-

माँगी लाल चौहान ने ग्राम-पोस्ट गोयली, जिला सिरोही, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

 मेरी पत्नी ने मुझ पर अपने घरवालों के बहकावे मे आ कर हम से पैसे ऐंठने के मक़सद से मुझ पर और मेरे माता-पिता पर जूठा 498 ए का मुक़ुदमा किया था। लेकिन गुजरते वक़्त (2-3 साल) के साथ मेरी पत्नी को अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उस ने पेशी के दौरान चुप-चाप अपने घर से बिना बताए अदालत के समक्ष आ कर मेरे साथ जाने का निवेदन किया। मैं भी अपनी बेटी के खातिर उस को अपनाने को राज़ी हो गया और उसे घर ले आया। लेकिन मेरी पत्नी के इस कदम से उसके घर वालों ने सारा रिश्ता उनसे तोड़ दिया और कहा कि आज से तू मेरे लिए मर गई। मैं आप से ये पूछना चाहता हूँ कि हमारे घर से जो भी चीज़ें बनाई गई थीं (सोने,चाँदी की वस्तुएँ) वो मेरे ससुराल वालों के पास हैं और वो देने के लिए मना कर रहे हैं तो मैं उन को कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? हमारे फ़ैसले की तारीख 22-01-2015 है. और फ़ैसले के बाद उस फ़ैसले की प्रमाणित कॉपी कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

समाधान-

प को बहुत बधाई कि आप की पत्नी को समझ आ गई और वह खुद आप के पास चली आई। एक बार 498 ए का मुकदमा समाप्त हो जाने दीजिए। उस के बाद आप अपने वकील के माध्यम से या स्वयं फैसले की प्रमाणित प्रतिलिपि के लिए आवेदन कर सकते हैं, उस के लिए आवेदन व प्रतिलिपि शुल्क के कुछ रुपये के टिकट आप को लगाने होंगे।

प ने जो गहने अपनी पत्नी के लिए बनवाए थे वे तो आप तभी अपनी पत्नी को उपहार स्वरूप दे चुके थे। इस कारण से वे आप की संपत्ति नहीं हैं। वे अब आप की पत्नी की संपत्ति हैं और उस का स्त्री-धन है। उन गहनों के लिए आप को कार्यवाही करने का कोई अधिकार नहीं है।

लेकिन वे गहने आप की पत्नी का स्त्री-धन होने के कारण वे उन गहनों के लिए कार्यवाही कर सकती हैं। आप की पत्नी के मायके वालों के पास वे गहने अमानत थे। इस तरह उन गहनों को देने से इन्कार करने के कारण उस के मायके वालों ने अमानत में खयानत का धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध किया है। आप की पत्नी उक्त अपराध के लिए उस के मायके वालों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है। पुलिस इस प्रथम सूचना रिपोर्ट पर अन्वेषण के दौरान उन गहनों को बरामद कर जब्त कर सकती है। तथा इस अपराध को करने वालों को गिरफ्तार भी कर सकती है। बाद में आप की पत्नी उक्त गहनों को अदालत में आवेदन कर उन का कब्जा प्राप्त कर सकती है। यदि पुलिस इस तरह की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने या उस पर कार्यवाही करने से इन्कार करे तो वह सीधे न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर अदालत से निवेदन कर सकती है कि पुलिस को मामला दर्ज कर अनुसंधान करने का आदेश प्रदान किया जाए।

दि पुलिस उक्त सारे गहनों को या कुछ को बरामद न कर सके तो आप की पत्नी उक्त गहनों को प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकती है।

धारा 409 भा.दं.संहिता किन किन पर प्रभावी हो सकती है?

arrested-man-in-handcuffsसमस्या-

आस्तिक ने लक्ष्मणपुर, प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

धारा 409 भारतीय दंड संहिता क्या सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के ऊपर ही लग सकता है?

समाधान-

भारतीय दंड संहिता की धारा 409 लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग के बारे में है। अपराधिक न्यास भंग क्या है यह धारा 405 में परिभाषित किया गया है जो निम्न प्रकार है-

  1. आपराधिक न्यासभंगजो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अखत्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैघ संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यास भंग” करता है।

[स्पष्टीकरण 1]–जो व्यक्ति [किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 17) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है या नहीं], तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य-निधि या कुटुंब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।]

[स्पष्टीकरण 2]–जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।]

सी तरह धारा 409 निम्न प्रकार है-

  1. लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंगजो कोई लोक सेवक के नाते अथवा बैंकर, व्यापारी, फैक्टर, दलाल, अटर्नी या अभिकर्ता के रूप में अपने कारबार के अनुक्रम में किसी प्रकार संपत्ति या संपत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने को न्यस्त होते हुए उस संपत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह [आजीवन कारावास] से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।

स से स्पष्ट है कि धारा-409 भारतीय दंड संहिता केवल सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों पर प्रभावी नहीं है अपितु उस में सभी लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी, आढ़तिया, प्रतिनिधि, दलाल, मुख्तार आदि शामिल हैं। इन में से किसी पर भी कोई संपत्ति न्यस्त होने और न्यासभंग करने पर वह धारा 409 भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत दंडनीय अपराध करता है।

गिरवी रखे जेवर न लौटाना अमानत में खयानत का अपराध है।

समस्या-

इंदौर, मध्य प्रदेश से प्रहलाद सिंह ने पूछा है-

मेरी उम्र 62 वर्ष है, मैं राष्ट्रीयकृत बैंककर्मी रह चुका हूँ एवं विगत दीर्घ अन्तराल से सेवा से पृथक हूँ जिसके कारण विभिन्न न्यायालयों में निर्णय हेतु प्रकरण लंबित हैं। सेवा पृथक्करण  के पश्चात आर्थिक विषमताओं के चलते मेरे द्वारा अपने पारिवारिक बुजुर्ग मित्र (संबोधन-काकाजी) जो ब्याज पर लेनदेन का व्यवसाय करते थे,  उनसे वर्ष १९९७ में अपनी पत्नी के जेवर गिरवी रखकर २०,०००/- रु. दो प्रतिशत मासिक ब्याज दर पर उधार लिए थे। जितना मूल धन उधार लिया था उससे कई ज्यादा मूल्य जेवरों का था। जेवरों की संख्या, प्रकार इत्यादि की सूची तत्समय कर्जदाता काकाजी द्वारा बनायी गई थी। धन की त्वरित आवश्यकता एवं आपसी सम्बन्धों/ विश्वास के चलते तत्समय मेरे द्वारा ना ही इस सम्बन्ध में कोई लिखा पढ़ी की गई न ही कोई अन्य दस्तावेज इस सम्बन्ध में रखा गया। क्योंकि उनकी पत्नी ने मुझे धर्म भाई बना रखा था एवं सम्पूर्ण परिवार से मधुर पारिवारिक सम्बन्ध थे। मेरे द्वारा उधार धन प्राप्ति से आगामी २-३ वर्षों तक ब्याज राशि नियमित दी जाती रही। फिर मेरा गुजारा भत्ता बंद हो गया तो उन्हें ब्याज देना भी धीरे धीरे बंद हो गया। कुछ वर्षों बाद उनकी म्रत्यु भी हो गई। उनके जीवित रहते मैं आर्थिक परेशानी के चलते लेन देन चुकता कर अपने गिरवी जेवर उनसे नहीं प्राप्त कर सका। वर्तमान में उनके परिवार में पत्नी याने मेरी धर्म बहन काफी वृद्ध हो चुकी हैं एवं उनके ३ पुत्र एवं परिवार है। २ पुत्र शासकीय सेवा में हैं। मेरे द्वारा अपने हालातों में सुधार आने पर उनसे विगत कई वर्षों से अपनी पत्नी के गिरवी रखे जेवर छुडवाने हेतु पूरे परिवार से पृथक पृथक मौखिक निवेदन/ चर्चा कर रहा हूँ किन्तु वे अधिक ब्याज दर से कुल रकम चुकाने की बात करते हैं या सोने के वर्तमान भाव से गिरवी रखे जेवरों को लौटाने का कहकर टालमटोल करते हैं (जो कि मेरे सामर्थ्य से परे है) एवं लेनदेन चुकता कर गिरवी रखे जेवर लौटाने में रूचि नहीं रखते हैं क्यों की वर्तमान में सोने का मूल्य आसमान छू रहा है एवं मेरे लिए गए कर्ज से कई गुना संपत्ति उनके पास है। बातचीत के सारे प्रयास विफल हो चुके हैं। स्वर्गीय काकाजी की पत्नी जो कि मुझे धर्मभाई मानती है वो भी सारे संबंधों/ रिश्ते-नाते को भुला चुकी हैं। संक्षिप्त में मैं नियमानुसार उक्त लेनदेन चुकता करने की मंशा रखता हूँ किन्तु मेरे पास उक्त लेनदेन, गिरवी रखे जेवरों इत्यादि का कोई सबूत / दस्तावेज / अनुबंध उपलब्ध नहीं हैं किन्तु कर्जदाता के बहीखाता में उक्त जानकारी निश्चित उपलब्ध है। तो इस स्थिति में नियमानुसार लेनदेन चुकता कर अपनी गिरवी रखी संपत्ति की वापसी हेतु क्या मैं मनी लांड्रिंग एक्ट के तहत कोई वैधानिक कार्यवाही कर सकता हूँ? या पहले अपना पक्ष पुख्ता करने के लिए उनके समक्ष एक बार फिर लेनदेन चुकता करने एवं अपनी गिरवी जेवर इत्यादि की वापसी हेतु एक डमी चर्चा करूं एवं उस चर्चा/ बातचीत को गुप्त कैमरे/ मोबाइल रिकॉरडिंग इत्यादि से एक स्टिंग ओपरेशन का रूप दूँ एवं उसे सबूत के बतौर न्यायलय में पेश करूं। क्या यह कार्यवाही कारगर साबित होगी या बिना इसके भी उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है जिससे कि मुझे मेरी पत्नी के गिरवी रखे जेवर पुनः प्राप्त हो सकें।

समाधान-

Havel handcuffप के पास जेवर गिरवी रखने का कोई सबूत नहीं है सिवाय इस के कि स्व. काकाजी ने आप के जेवरों की सूची उन के खुद की हस्तलिपि में बनाई थी वह आप के पास है। इस तरह का ऋण चुपचाप प्राप्त किया जाता है इस कारण जेवर गिरवी रखने का भी कोई सबूत न होगा। आप जो ब्याज देते रहे उस का कोई बही खाता या डायरी आपने भी मेंटेन नहीं की होगी। इस लिए आप के पास सबूतों की तो कमी है। इस कारण यदि किसी तरह उन से होने वाली बातचीत रिकार्ड कर ली जाती है तो वह आप के पक्ष में सबूत होगी जो आप के पास की सूची को मिला कर अच्छे साक्ष्य का काम करेगी। इस कारण यदि आप बातचीत को रिकार्ड कर लेते हैं तो यह अच्छा है।

प के जेवर वे वापस नहीं लौटा रहे हैं जो कि उन के पास अमानत हैं। यह सीधे सीधे अमानत में खयानत का धारा 406 आईपीसी का मामला है जो कि एक संज्ञेय अपराध है। जिस के लिए पुलिस तुरंत कार्यवाही कर उन्हें गिरफ्तार कर सकती है और आप के जेवर बरामद कर सकती है जिन्हें बाद में न्यायालय से आदेश करा कर वापस प्राप्त किया जा सकता है।

मारी राय है कि आप पहले रिकार्डिंग कर लें। उस के बाद एक विधिक सूचना (लीगल नोटिस) काका जी के सभी उत्तराधिकारियों को भिजवा दें जिस में जेवर लौटाने का आग्रह कर दें और समय सीमा में न लौटाने पर सक्षम न्यायालय में कार्यवाही करने की चेतावनी दे दें। नोटिस में जेवरों की सूची और रिकार्डिंग जो आप के पास रहेगी उन का उल्लेख न करें। समय सीमा समाप्त होने पर पुलिस में रिपोर्ट लिखाएँ। पुलिस रिपोर्ट न लिखे तो किसी वकील की मदद से सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में भिजवाएँ। इस परिवाद में धारा 406 तथा मनी लांड्रिंग एक्ट के अंतर्गत कार्यवाही करने तथा आप के जेवर वापिस दिलाने की राहत मांगें।

लगभग हर स्त्री के पास धारा 498-ए व 406 भादंसं की शिकायत का कारण उपलब्ध रहता है।

समस्या-

सिरोही, राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

मैं किसी कारणवश अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद (तलाक) ले रहा हूँ। मेरे ससुराल वाले मुझे झूठे मुकदमे में फँसाने की धमकियाँ देते हैं, जैसे घरेलू हिंसा, दहेज, मारपीट आदि।  उस के बाद मैं ने एस.पी. को लिखित में शिकायत दे दी। फिर भी उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?

समाधान-

sadwomanह एक आम समस्या के रूप में सामने आता है। सामान्यतः विवाह के उपरान्त यह मान लिया जाता है कि पति-पत्नी आपसी सहयोग के साथ सारा जीवन शांतिपूर्ण रीति से बिताएंगे। लेकिन विवाह इतनी आसान चीज नहीं है। विवाह के पूर्व स्त्री और पुरुष दोनों के ही वैवाहिक जीवन के बारे में अपने अपने सपने और महत्वाकांक्षाएँ होती हैं। निश्चित रूप से ये सपने और महत्वाकांक्षाएँ तभी पूरी हो सकती हैं जब कि पति या पत्नी उन के अनुरूप हो। यदि पति और पत्नी के सपने और महत्वाकांक्षाएँ अलग अलग हैं। वैसी स्थिति में दोनों में टकराहट स्वाभाविक है। लेकिन इस टकराहट का अन्त या तो सामंजस्य में हो सकता है या फिर विवाह विच्छेद में। दोनों परिणामों तक पहुँचने में किसी को कम और किसी को अधिक समय लगता है। ऐसा भी नहीं है कि परिणाम आ ही जाए। अधिकांश युगल जीव भर इस टकराहट और सामंजस्य स्थापित करने की स्थिति में ही संपूर्ण जीवन बिता देते हैं। अपितु यह कहना अधिक सही होगा कि पति-पत्नी के बीच सामंजस्य और टकराहटों के साथ साथ चलते रहने का नाम ही एक गृहस्थ जीवन है।  यदि सामंजस्य टकराहटों पर प्रभावी हुआ तो जीवन मतभेदों के बावजूद सहज रीति से चलता रहता है। लेकिन जहाँ सामंजस्य का प्रयास मतभेदों के मुकाबले कमजोर हुआ वहीं गृहस्थ जीवन की टकराहटें पहले पति-पत्नी के दायरे से, फिर परिवारों के दायरे से निकल कर बाहर आ जाती हैं।

ब आप ने सहज रूप से यह कह दिया है कि “मैं किसी कारणवश अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद (तलाक) ले रहा हूँ”। आप ने यह तो नहीं बताया कि आप तलाक क्यों ले रहे हैं? इस बारे में एक भी तथ्य सामने नहीं है। आप ने तो पत्नी के विरुद्ध घर, परिवार, बिरादरी से बाहर आ कर अदालत में जंग छेड़ दी है। हमारे यहाँ यह आम धारणा है कि प्यार और जंग में सब जायज है। यह धारणा केवल पुरुषों की ही नहीं है स्त्रियों की भी है। आप क इस जंग में दो  दो पक्ष हैं। एक आप का और आप के हितैषियों का जो आप के तलाक लेने के निर्णय से सहमत हैं और दूसरा पक्ष आप की पत्नी और उस के मायके वालों का। दोनों पक्षों के बीच जंग छिड़ी है तो जंग में जो भी हथियार जिस के पास हैं उन का वह उपयोग करेगा। आप की पत्नी के पक्ष ने उन के पास उपलब्ध हथियारों का प्रयोग करते हुए आप पर मुकदमे कर दिए हैं। अब जंग आप ने छेड़ी है तो लड़ना तो पड़ेगा।

प ने लिखा है कि उन्हों ने दहेज का केस कर दिया है। इस से कुछ स्पष्ट पता नहीं लगता कि क्या मुकदमा आप के विरुद्ध किया गया है। आम तौर पर पत्नियाँ जब पति के विरुद्ध इस तरह की जंग में जाती हैं तो किसी वकील से सलाह लेती हैं। वकील उन्हें धारा 498-ए और 406 आईपीसी के अंतर्गत न्यायालय के समक्ष परिवाद करने की सलाह देते हैं। इस के बहुत मजबूत कारण हैं। आम तौर पर पत्नियाँ पति के साथ निवास करती हैं। उन का सारा स्त्री-धन जो उन की कमाई से अर्जित हो, जो उन्हें अपने माता-पिता, रिश्तेदारों, पति व पति के रिश्तेदारों व अन्य किसी व्यक्ति से मिला है वह पति के घर रहता है। यह पति के पास पत्नी की अमानत है। आप उसे देने से इन्कार करते हैं तो वह अमानत में खयानत का अपराध है। जंग आ चुकी स्त्री वहाँ जितना सामान होता है उस से अधिक बताती है। पति देने से इन्कार करते हैं। धारा 406 आईपीसी का मुकदमा तैयार बैठा है। क्यों की उस का स्त्रीधन कितना था या कितना नहीं, या उस ने उस की मांग भी की थी या नहीं और पति ने उसे मांग पर देने से मना किया था या नहीं यह सब तो बाद में न्यायालय में तय होता रहेगा। उस समय तो पुलिस पत्नी और उस के गवाहों के बयानों को सही मान कर पति व उस के रिश्तेदारों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करती है और आरोप पत्र प्रस्तुत कर देती है।

धारा 498-ए का मैं अनेक बार अन्य पोस्टों में उल्लेख कर चुका हूँ। यह निम्न प्रकार है-

पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विय में

498क. किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना–जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।

स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,“ क्रूरता” निम्नलिखित अभिप्रेत हैः–

(क) जानबूझकर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकॄति का है जिससे स्त्री को आत्महत्या करने के लिए या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा कारित करने के लिए उसे प्रेरित करने की सम्भावना है ; या

(ख) किसी स्त्री को तंग करना, जहां उसे या उससे सम्बन्धित किसी व्यक्ति को किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के लिए किसी विधिविरुद्ध मांग को पूरी करने के लिए प्रपीडित करने को दृष्टि से या उसके अथवा उससे संबंधित किसी व्यक्ति के ऐसे मांग पूरी करने में असफल रहने के कारण इस प्रकार तंग किया जा रहा है ।]

ब आप स्वयं भी देखें कि इस धारा में क्या है। यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को या किसी रिश्तेदार की पत्नी के प्रति ऐसा आचरण करता है जिस से उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरणा मिलती हो या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा उत्पन्न होता है या फिर उसे संपत्ति या अन्य किसी मूल्यवान वस्तु की मांग के लिए प्रपीड़ित करने के लिए तंग करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत अपराध करता है।

स धारा को पढ़ने के बाद सभी पुरुष एक बार यह विचार करें कि इस धारा में जिस तरह स्त्री के प्रति क्रूरता को परिभाषित किया गया है, क्या पिछले तीन वर्ष में कोई ऐसा काम नहीं किया जो इस धारा के तहत नहीं आता है। कोई बिरला पुरुष ही होगा जो यह महसूस करे कि उस ने ऐसा कोई काम नहीं किया। यदि कोई यह पाता है कि उस ने अपनी पत्नी से उक्त परिभाषित व्यवहार किया है तो फिर उसे यह भी मानना चाहिए कि उस ने उक्त धारा के अंतर्गत अपराध किया है। यदि इस अपराध के लिए उस के विरुद्ध शिकायत नहीं की गई है तो यह उस की पत्नी की कमजोरी या भलमनसाहत है। इस से यह तात्पर्य निकलता है कि लगभग हर पत्नी इस तरह की क्रूरता की शिकार बनती है लेकिन शिकायत नहीं करती इस कारण उस के पति के विरुद्ध मुकदमा नहीं बनता है। लेकिन यदि स्त्री को युद्ध में लाए जाने या चले जाने के बाद ये दो हथियार तो उस के पास हैं ही, जिन का वह उपयोग कर सकती है। और भला करे भी क्यों नहीं?

ब के मूल प्रश्न का उत्तर दिया जाए कि ‘उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?’ उक्त धाराओं में पहले स्त्री न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत करती है, फिर पुलिस उस पर प्राथमिकी दर्ज कर उस का अन्वेषण करती है और न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करती है। फिर न्यायालय आरोपों पर साक्ष्य लेता है, और दोनों पक्षों के तर्क सुनता है तब निर्णय करता है कि अभियुक्त के विरुद्ध आरोप प्रमाणित है या नहीं। प्रमाणित होने पर दंड पर तर्क सुनता है और अंतिम निर्णय करता है। लेकिन आप चाहते हैं कि आप को इतना बड़े मामले का निर्णय हम से केवल इतना कहने पर मिल जाए कि ‘उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?’ क्या इस तरह उत्तर कोई दे सकता है? नजूमी (ज्योतिषी) से भी यदि कोई सवाल किया जाए तो वह भी काल्पनिक उत्तर देने के पहले ग्रह नक्षत्र देखता है, उन की गणना करता है तब जा कर कुछ बताता है।  तो भाई इतने से वाक्य से तो बिलकुल संभव नहीं है कि आप के इस प्रश्न का उत्तर दिया जा सके।

प को यही सलाह दी जा सकती है कि आप ने भले ही किसी न किसी महत्वपूर्ण और सच्चे आधार पर अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद चाहते हों और वह कितना ही सच्चा क्यों न हो, आप को अपने विरुद्ध मुकदमों को सावधानी और सतर्कता से लड़ना चाहिए। क्यों कि सजा तो हो ही सकती है।

अमानत को निज-उपयोग में ले लेना अमानत में खयानत का अपराध है।

समस्या-

करनाल, हरियाणा से अमरजीत ने पूछा है-

Havel handcuffमेरे पास किसी से कुछ पैसे अमानती तौर पर रखे हुए हैं।  मैंने उन्हें लिखित में दे रखा है कि- ” मैंने राजीव (काल्पनिक नाम) से 50,000.00 रूपये अमानती तौर पर लिए है और ये मेरे पास अब नहीं होने के कारन में इन्हें वापिस नहीं कर सकता लकिन मैं ये मेरे पास होने पर राजीव को लौटा दूंगा”। इस दस्तावेज पर मेरे, राजीव तथा दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं। मैं इस बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूँ-

1- क्या भुगतान के समय राजीव मुझ से ब्याज की मांग कर सकता है?

2- क्या राजीव मुझ पर किसी एक तारीख को पैसे लौटने का दबाव बना सकता है?

3-मेरे लिए पैसे लौटाने का कितना समय है?

4-मुझे पैसे किस तरीके से वापिस करने चाहिए नगद या चेक और भुगतान के समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए ताकि वह कल को मुझ से दोबारा पैसे न वसूल सके।

समाधान-

प ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि आप के पास राजीव की उक्त 50,000.00 रुपए की राशि अमानत के बतौर रखी है।  अमानत का अर्थ अमानत होता है। उसे सुरक्षित रखना होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की अमानत को व्यक्तिगत उपयोग में ले लेता है तो यह धारा 405 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत एक अपराध है जो धारा 406 के अंतर्गत दंडनीय है। ये दोनों उपबंध निम्न प्रकार है-

405. आपराधिक न्यासभंग–जो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अखत्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैघ संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यास भंग” करता है ।

1[2[स्पष्टीकरण 1–जो व्यक्ति 3[किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 17) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है या नहीं, तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य-निधि या कुटुंब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है ।]

4[स्पष्टीकरण 2–जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है ।]

दृष्टांत

(क) एक मॄत व्यक्ति की विल का निष्पादक होते हुए उस विधि की, जो चीजबस्त को विल के अनुसार विभाजित करने के लिए उसको निदेश देती है, बेईमानी से अवज्ञा करता है, और उस चीजबस्त को अपने उपयोग के लिए विनियुक्त कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(ख) भांडागारिक है । यात्रा को जाते हुए अपना फर्नीचर के पास उस संविदा के अधीन न्यस्त कर जाता है कि वह भांडागार के कमरे के लिए ठहराई गई राशि के दे दिए जाने पर लौटा दिया जाएगा । उस माल को बेईमानी से बेच देता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(ग) , जो कलकत्ता में निवास करता है, का, जो दिल्ली में निवास करता है अभिकर्ता है । और के बीच यह अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा है कि द्वारा को प्रेषित सब राशियां द्वारा के निदेश के अनुसार विनिहित की जाएगी । , को इन निदेशों के साथ एक लाख रुपए भेजता है कि उसको कंपनी पत्रों में विनिहित किया जाए । उन निदेशों की बेईमानी से अवज्ञा करता है और उस धन को अपने कारबार के उपयोग में ले आता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(घ) किंतु यदि पिछले दृष्टांत में बेईमानी से नहीं प्रत्युत सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि बैंक आफ बंगाल में अंश धारण करना के लिए अधिक फायदाप्रद होगा, के निदेशों की अवज्ञा करता है, और कंपनी पत्र खरीदने के बजाए के लिए बैंक आफ बंगाल के अंश खरीदता है, तो यद्यपि को हानि हो जाए और उस हानि के कारण, वह के विरुद्ध सिविल कार्यवाही करने का हकदार हो, तथापि, यतः ने, बेईमानी से कार्य नहीं किया है, उसने आपराधिक न्यासभंग नहीं किया है ।

(ङ) एक राजस्व आफिसर, के पास लोक धन न्यस्त किया गया है और वह उस सब धन को, जो उसके पास न्यस्त किया गया है, एक निश्चित खजाने में जमा कर देने के लिए या तो विधि द्वारा निर्देशित है या सरकार के साथ अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा द्वारा आबद्ध है । उस धन को बेईमानी से विनियोजित कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(च) भूमि से या जल से ले जाने के लिए ने के पास, जो एक वाहक है, संपत्ति न्यस्त की है । उस संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

406. आपराधिक न्यासभंग के लिए दंड–जो कोई आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स तरह आप ने जो कुछ लिख कर राजीव को दिया है उस में अमानत होना और उसे अपने स्वयं के उपयोग में परिवर्तित कर लेने की आत्मस्वीकृति दी हुई है।  आप ने यह भी लिखा है कि अभी मैं लौटा नहीं सकता लेकिन मेरे पास होने पर लौटा दूंगा।  इस तरह आप ने धारा 406 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध स्वीकार किया हुआ है। राजीव आप पर अमानत में खयानत अर्थात अपराधिक न्यास भंग के मामले में पुलिस को या न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकता है जिस में धारा 406 भा.दं.संहिता का मामला दर्ज किया जा सकता है। आप की गिरफ्तारी हो सकती है और आप के विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है जिस में आप को सजा हो सकती है।

लेकिन इस का बचाव भी है। बचाव यह है कि अपराध आप ने किसी एक व्यक्ति के प्रति किया है जिस ने उसे क्षमा कर दिया है। राजीव ने उक्त लिखत के माध्यम से आप के साथ एक संविदा की है जिस के द्वारा अमानत को उधार में बदल दिया गया है तथा उस राशि को लौटाने के लिए तब तक की छूट आप को दी है जब तक कि उतना पैसा आप के पास न हो। यदि आप के विरुद्ध कोई फौजदारी मुकदमा दर्ज हो ही जाए तो उक्त तर्क के आधार पर न्यायालय आप को जमानत प्रदान कर देगा।  इसी आधार पर प्रथमसूचना रिपोर्ट भी रद्द हो सकती है।

ह आप से ब्याज नहीं ले सकता।   क्यों कि इस लिखत में ब्याज लेने की कोई बात नहीं है।  वह आप से रुपए मांग सकता है और कह सकता है कि आप निर्धारित समय में उक्त रुपया लौटाएँ अन्यथा वह आप पर धारा 406 का परिवाद करेगा और रुपया वसूलने की कार्यवाही अलग से करेगा।

मेरी आप को सलाह है कि इस जिम्मेदारी को जितना जल्दी हो आप पूरा कर दें। राजीव का पैसा लौटा दें और उस की रसीद ले लें तथा आप के द्वारा लिखा गया उक्त दस्तावेज अवश्य वापस ले लें।  रसीद और उक्त दस्तावेज लौटाए जाने की स्थिति में रुपये का भुगतान किसी भी प्रकार से चैक या नकद किया जा सकता है।  पर यदि आप यह भुगतान अकाउण्ट पेयी चैक से करें तो सब से बेहतर है। यदि वह अकाउंट पेयी चैक से भुगतान प्राप्त करने को तैयार न हो तो उसे बैंक ड्राफ्ट से भुगतान कर सकते हैं।


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