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सहमति से विवाह विच्छेद का मार्ग बनाएँ।

husband wifeसमस्या-
अनुराग ने बरेली, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं मूलतः बरेली जिले का रहने वाला हूँ व अपने ही कार्यक्षेत्र (प्राइवेट) से सम्बंधित एक सजातीय वर्ग की लड़की से मेरी मुलाकात 2006 में हुई। मैं उसे प्रेम करने लगा क्यों कि कुछ समय बाद उसने अपने अतीत के बारे में मुझे लगभग काफी कुछ बता दिया जो कि आम लड़कियां कम ही बताती हैं।  उसके एक वर्ष के उपरांत दोनों ही पक्षों की पारिवारिक सहमति से मेरा विवाह 21 अप्रैल 2007 को लखनऊ में संपन्न हुआ। मेरी पत्नी अपने माँ-बाप कि इकलौती संतान है तथा शादी के कुछ महीनों के बाद हम दोनों अपने कार्य क्षेत्र दिल्ली में आकर रहने लगे। शादी के एक वर्ष बाद हम दोनों को पारिवारिक व आर्थिक स्थितियों के कारण दिल्ली से बरेली आना पड़ा। यहाँ पर मेरी पत्नी की मेरी माँ से कहा-सुनी हो जाने के कारण वो 2008 में लखनऊ जाने लगी। वह एक बार दिल्ली में भी ऐसा कर चुकी थी और मैं उसके गुस्से व स्वछंद विचारों को जान चुका था और ये भी जानता था को वो दिल की बुरी नहीं है ऊपर से वो गर्भवती भी थी। इस कारण मुझे भी उसके साथ जाना पड़ा। उस समय मेरे घर पर मेरे दो छोटे भाई मेरी माँ के साथ रहते थे व मेरी माँ एक सरकारी टीचर थी। मेरे पिता का देहांत काफी पहले हो चुका था। लखनऊ जाने के बाद मेरे दो पुत्र हुए जिन की उम्र आज क्रमशः 5.5 व 4 वर्ष है। मेरी सास का देहांत 2009 में हार्टअटैक से हो चुका है व ससुर जी अक्टूबर 2014 में अपनी सरकारी नौकरी  से रिटायर होने वाले हैं और एक किराये के मकान में रहते हैं। मेरी समस्या जनवरी 2012 से शुरू हुई जब मेरे एक मित्र की शादी थी और वो अपने भाई के साथ कुछ दिन खरीददारी के लिए मेरे घर पर रुका। उस समय मै एक टूरिंग जॉब करता था। वापस आने पर एक बार फिर से वो लोग खरीदारी के लिए लखनऊ आये। उस समय मुझे मेरी पत्नी के व्यवहार में परिवर्तन महसूस हुआ जिसे मेरी पत्नी ने ज्यादा थकान को वजह बताया। पर चंद दिनों के बाद मेरी जानकारी में कई चीजे आयीं जैसे असमय फोन पर बात करना, बातों को छिपाना व झूठ बोल देना जिसके लिए मैंने उसको काफी दिनों तक उसे समझाया कि उसे मुझसे ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने उस मित्र की शादी में मैं अपनी पत्नी व बच्चो के साथ फरवरी 2012 में बरेली गया तथा इस समय के दौरान मुझे इस बात का पूर्ण अहसास होगया कि मेरी पत्नी मेरे दोस्त के भाई को पसंद करने लगी है। वहां पर एक रात किसी कारणवश उसके ऊपर मैंने शराब के नशे में हाथ उठा दिया और उस गलती का अहसास मुझे आज तक है। उसके बाद से मेरी पत्नी ने शादी से वापस आने के बाद मेरे सामने ही उस लड़के से फोन पर बातें करना चाहे वो दिन हो अथवा रात, मैं सामने रहूँ या घर पर ना रहूं, करने लगी। दो अलग-२ बार मार्च व अगस्त में उस लड़के को मेरे कई बार मना करने के बाबजूद बरेली से लखनऊ बुलाया और वो मेरे ही घर पर रुका। इस समय तक मेरे ससुर जी अथवा किसी भी दूसरे सदस्य को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पर इन बातों के बाद एक दिन जब मैं और अधिक बर्दास्त नहीं कर सका तो मैंने इन बातों का खुलासा अपने ससुर जी को पत्नी के सामने कर दिया। और जो साक्ष्य थे उनको बताया व दिखाया भी। पर मेरी पत्नी ने उन सभी बातों को अपने पिता के सामने नकार दिया और मेरे लिए कहा कि मैं उसको परेशान करता हूँ व उस पर शक करता हूँ। ससुर जी ने यहाँ अपनी बेटी को सही माना और मुझसे कहा कि मैं उनकी बेटी पर गलत इल्जाम लगा रहा हूँ। इन बातों से परेशान हो कर मैं लखनऊ से बरेली अपने घर पर सितम्बर 2012 में वापस आगया और फोन से अपनी पत्नी के संपर्क में रहा। मैंने इस दौरान अपनी पत्नी को वो बातें बोली जो उसने मुझसे शादी से पहले अपने बारे में कही थी। जिस पर आपस में काफी झगडा हो गया तथा अक्तूबर 2012 में मै वापस गया और अपनी पत्नी से व ससुर जी से अपनी गलतियों की माफ़ी भी मांगी। पर पत्नी ने ससुर जी से ये बोल दिया कि अगर में उस घर में रुका तो वो घर से बच्चो को लेकर चली जाएगी। तब ससुर जी ने मुझे अपने एक दोस्त के पास कुछ दिन रुकवाया (लगभग 1 हफ्ता)। उसके बाद मैं उनके कहने पर ससुर जी के बड़े भाई के पास 1 महीना रहा और अपनी पुरानी जॉब को करने लगा। इस दौरान अपने बीच में अपने बच्चो से मिलता रहा। पर मेरी पत्नी का ससुर जी की इस बात पर गुस्सा बढ़ गया। और एक दिन ससुर जी ने अपने भाई से कहा कि वो मुझे अब अपने घर पर ना रखे। इस पर उनके बड़े भाई ने मुझे समझाया और मुझे प्रेरित किया कि मैं अपने घर जाऊँ और अपने आप को आत्मनिर्भर बनाऊँ और कुछ समय अपनी पत्नी को दूँ। समय के साथ शायद मेरी पत्नी इन बातो को भुला दे जो कि मुझे भी सही लगी। मैं जनवरी 2013 में बरेली वापस आ गया उस लड़के व उसके परिवार से सारे सम्बन्ध समाप्त कर लिये। कुछ समय के बाद अपना कारोबार शुरू किया। इसके बाद मेरी पत्नी से बातचीत कम हो गयी क्योकि फोन पर जब भी उससे बात करता तो बातचीत एक झगडे का रूप ले लेती। जून 2013 में मैं एक बार फिर से अपनी पत्नी को मनाने गया वहां एक दिन रुका भी पर मेरी कोशिशें बेकार होती गयी। वो मेरी माँ और भाई को उल्टा सीधा कहने लगी और मेरे उपर इल्जाम लगाये कि मैं उसे बार बार  फोन करके परेशान करता हूँ और उसके चरित्र के बारे में ख़राब बोलता हूँ। जब कि वो ऐसा कुछ नहीं करती है मेरे इस तरह बोलने के कारण अब वो किसी दोस्त या रिश्तेदार से कोई मतलब नहीं रखती है, एक प्राइवेट स्कूल में अपनी जॉब करती है और खाली समय में कांट्रेक्ट बेस काम करती है। वह मेरे साथ नहीं रहना चाहती है। मेरे ससुर जी ने मुझसे यह बोला कि मै मासिक रूप से 10000 रू बच्चो की परवरिश हेतु उनको दूँ। जिससे शायद मेरी पत्नी का भी दिल बदल जाये।  अपने बच्चों से मैं उन की परमीशन के बाद मिल सकता हूँ या फोन पर बात कर सकता हूँ। पर मैंने ये कहकर उनकी बात नहीं मानी कि मैं अपने परिवार को अपने साथ रख कर अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखभाल करना चाहता हूँ। जिस पर वो राजी नहीं हुए और कई महीने निकल जाने के बावजूद तक ऐसी ही स्थिति बनी रही। बच्चों के लिए भी अगर कुछ करना हो या बात करनी हो तो उन दोनों की परमिशन लेनी होती थी। जनवरी 2014 में जब ससुर जी के बड़े भाई द्वारा कोई बात नहीं बनी तो तो ससुर जी के बड़े भाई ने पत्नी की एक चाची जी को मध्यस्थ बनाया और चाची जी ने मुझे अपनी माँ के साथ आने को बोला। वहां अपनी माँ के साथ जाने पर मेरी पत्नी ने सभी के सामने कई तरह के झूठे इल्जाम लगाये व पुलिस, कानून की धमकी दी कि वो चाहे तो मेरे परिवार को जेल भी करा सकती है। ससुर जी ने कहा कि अभी 2 साल का समय है, मेरे पास अपने रिश्तो को सुधारने के लिए।  2 साल के बाद जब बच्चे बड़े हो जाएंगे तो तय होगा कि हम दोनों लोग साथ में रह सकते है या नहीं। मेरी पत्नी का कहना था कि वो अपने आप को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है और मैं चाहूँ तो बच्चो से लखनऊ आकर मिल सकता हूँ। पर उन्हें अपने साथ अकेले कहीं भी नहीं ले जा सकता हूँ और वो बरेली आकर नहीं रहना चाहती है, ना ही तलाक देना चाहती है। उसकी चाची जी ने कहा कि मै कुछ महीने यहाँ आता जाता रहूँ जिससे स्थिति में परिवर्तन हो और उनका प्रयास रहेगा कि वो मेरी पत्नी को साथ रहने को मना सके। कुछ समय उनकी बात को मानकर मेरी माँ व मैं वापस आ गये और अपनी ओर से मैंने सार्थक पहल करनी चाही और मै वहां पर गया भी 1-2 दिन के लिए इस उम्मीद से कि शायद मेरी पत्नी मुझसे अलग रहने की डेढ़ साल पुरानी जिद्द को छोड़ दे। पर इस दौरान मेरे प्रति पत्नी ने अपना कोई रवैया नहीं बदला। जैसे मेरे सामने फोन को साइलेंट करना या फिर उसको बंद कर देना। मुझे वहाँ उन दिनों में कुछ फोटोग्राफ मिले जो कि मेरे ही घर (जहाँ पर मेरी पत्नी इस समय रहती है) के हैं। जो उसके स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर के अर्धनग्न अवस्था में अकेले के है और उस समय के जब मैं वहां पर नहीं था। क्योकि पुराने वाले मकान को बदल कर मेरे ससुर जी पिछले लगभग 1 साल से दूसरे घर में रहते हैं  और मै ये भी नहीं जानता हूँ कि मेरे ससुर जी को इन बातों पता है भी या नहीं।
इस बात को अभी तक किसी को नहीं बताया है क्योकि मै पुराने इतिहास को दोहराकर अपने बच्चो के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता हूँ। मेरी पत्नी अभी भी अपनी आर्थिक स्थिति व आत्मनिर्भरता का हवाला देते हुए 2 साल तक साथ में रहने को तैयार नहीं हो रही है। जब कि मैं अपने परिवार की बेहतर तरीके से देखभाल कर सकता हूँ। ये भी जानता हूँ कि अपनी पत्नी अथवा बच्चों को तब तक नहीं ला सकता हूँ जब तक कि पत्नी खुद ना चाहे। वो इस बारे में कुछ नहीं सोच रही है अब जब कि ससुर अपनी जॉब पर जाते हैं और पत्नी अपनी जॉब पर, दोनों बच्चे सुबह क्रच में जाते हैं (बड़ा बेटा वहीँ से अपने स्कूल जाता है वैन द्वारा) और शाम को पत्नी या ससुर अपनी जॉब से आने के बाद बच्चो को क्रच से लेकर आते हैं। आप मुझे ये सलाह दें कि मुझे क्या उपय़ुक्त कार्यवाही करनी चाहिए जिससे मै अपने परिवार के भविष्य को संभाल सकूँ? मैं अपने कारोबार को छोड़ कर लखनऊ जा कर नहीं रहना चाहता हूँ क्यों कि मुझे या मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को स्त्रियों के बाहर काम करने या आने जाने अथवा बात करने पर कोई आपति नहीं है। पर वो अमर्यादित न हो।  अभी तक मैंने कोई भी कानूनी कार्यवाही नहीं की है और दूसरे पक्ष के बारे में मैं नहीं जानता हूँ कि उन्होंने ऐसा कुछ किया है अथवा नहीं। मैं केवल यही चाहता हूँ कि मेरा परिवार मेरे साथ रहे। अगर मेरी पत्नी मेरे साथ बरेली नहीं रहती है तो ऐसी स्थिति में मैं उससे तलाक लेना चाहूँगा।

समाधान-

मित्र, हो सकता है आप बुरा मान जाएँ। पर सचाई तो सचाई है। आप ने अपनी पत्नी को केवल चाहा, उस से प्रेम नहीं किया। आप चाहत भी इतनी थी कि वह आप की वफादार भारतीय पत्नी बनी रहे। लगता है आप प्रेम का अर्थ अभी तक जानते ही नहीं। आप की पत्नी ने जब जरा सी स्वतंत्रता लेनी चाही तो आप के मन में संदेह पनपने लगा। तब आप को अपनी पत्नी की मामूली व्यवहारिक बातें भी आप को बेवफाई लगने लगी। आप को लगा कि आप की पत्नी किसी और को चाहने लगी है। आप को गुस्सा भी आया और आप ने पत्नी पर हाथ उठा दिया। आप के लिहाज से आप की इतनी सी हरकत पत्नी के लिए तो बहुत बड़ी थी। उस ने आप को त्याग दिया। आप की पत्नी समझती थी कि आप उसे प्यार करते हैं, उसे सम्मान देते हैं। लेकिन उस की निगाह में आप वही भारतीय परंपरागत पति निकले।

प जिन सबूतों की बात कर रहे हैं, वे कोई सबूत नहीं हैं, उन से आप की पत्नी की बेवफाई साबित नहीं होती है। आप के मन में अभी भी सन्देह का कीड़ा विराजमान है। आप के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया है। जो तगड़ा सदमा आप ने अपनी पत्नी को दिया है, वह उस से बाहर नहीं निकल पाई है। वह अब आत्मनिर्भर जीवन जीना चाहती है। उस के जीवन में आप का कोई स्थान नहीं है। यहाँ तक कि वह उस के साथ जो आप का नाम जुड़ा है उसे छोड़ना भी नहीं चाहती। जब कि आप को फिर पत्नी की जरूरत है। आप एक पत्नी चाहते हैं। वह नहीं तो उस से छुटकारा प्राप्त कर के कोई और।

त्नी आप से सिर्फ अपने बच्चों का खर्च चाहती है। आज के जमाने में दो बच्चों का खर्च 10000 रुपया प्रतिमाह अधिक नहीं है। निश्चित रूप से उसे इस से अधिक खर्च करने पड़ेंगे। उस की यह मांग वाजिब है।

दि आप की पत्नी नहीं चाहती है तो आप उसे अपने साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकते। यह बात आप खुद अच्छी तरह जानते हैं। मेरे विचार में आप को अपनी पत्नी को प्रतिमाह खर्च देना चाहिए। यदि 10000 रुपए दे सकने की स्थिति में न हों तो कम दीजिए पर दीजिए। आप की पत्नी तपस्या पर उतर आई है। जब कि जो गलतियाँ आप ने की हैं उन में तपस्या आप को करनी चाहिए।

प विवाह विच्छेद चाहते हैं, फिलहाल उस का आप के साथ रहने से मना करना ही एक मात्र विवाह विच्छेद का आधार हो सकता है। लेकिन अलग रहने की उस की वजह अभी तो वाजिब लगती है। आप यदि कोई कार्यवाही करेंगे तो हो सकता है वह भी कानूनी कार्यवाही करे। उस के पास उस के ठोस कारण भी हैं। उस परिस्थिति में आप को परेशानी हो सकती है। कुछ दिन पुलिस और न्यायिक हिरासत में भी काटने पड़ सकते हैं।

मेरी राय में फिलहाल आप के पास कोई रास्ता नहीं है। आप चुपचाप बच्चों का खर्च देते रहें। समय समय पर बच्चों से मिलते रहें। उन्हें एक पिता का स्नेह देते रहें। बच्चों में आप के प्रति स्नेह पनपने लगे तो हो सकता है कि आप की पत्नी भी अपने बच्चों के पिता के प्रति नरम पड़े और आप का मसला हल हो जाए। मुकदमेबाजी से तो कुछ भी आप को हासिल नहीं होगा।

क काम और कर सकते हैं, आप अपने ससुर से बात कर सकते हैं कि जब उन की पुत्री आप के प्रति इतनी कठोर हो गई है तो उसे आप से विवाह विच्छेद की कर स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। वह बच्चों के लिए जितना हो सके एक मुश्त भरण पोषण राशि प्राप्त कर ले और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करवा ले। यह काम दोनों की सहमति से हो जाए तो ही अच्छा है। अन्य कोई मार्ग आप के पास नहीं है। बच्चों की अभिरक्षा आप को कानूनी रूप से भी नहीं मिल सकेगी।

पत्नी से तलाक नहीं हुआ तो उस का दूसरा विवाह अवैध है।

alimonyसमस्या-

दिल्ली से मोहम्मद नसीम ने पूछा है –

मेरी शादी 15.05.1990 को हुई थी,  हमारे एक बेटा भी हुआ। उसके बाद हम दोनों में झगड़े होने लगे मेरी पत्नी 1993 में अपनी माँ के पास चली गई। वहीं से महिला समिति में केस कर दिया महिला समिती में एक साल तक केस चला।  हमने 1994 में दहेज का सारा सामान महिला समिति में पत्नी को दे दिया और केस वही खतम हो गया।  लेकिन तलाक नहीं हुआ था। सामान लेकर मेरी पत्नी अपनी माँ के साथ ही वापस चली गई।  फिर 1995 में मेरी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।  वह तभी से दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है। मेरा बेटा भी मेरी पत्नी के पास है। पत्नी से मेरा तलाक नहीं हुआ है तो क्या वो आज भी कानूनन मेरी पत्नी है?  मेरी पत्नी ने जो दूसरी शादी की है क्या उस शादी की कानूनी मान्यता है? और क्या मैं अदालत से अपने बेटे को अपनी अभिरक्षा में ले सकता हूँ?

समाधान-

प की शादी अपनी पत्नी से हुई थी और तलाक नहीं हुआ है तो आप की पत्नी अभी भी आप की पत्नी है। उस ने जो दूसरी शादी की वह अवैध है जो कि धारा 494 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है। जिस व्यक्ति ने आप की पत्नी के साथ शादी की है वह जार-कर्म का दोषी है। जो कि धारा 497 भा.दं.संहिता के अन्तर्गत अपराध है।  यदि आप साबित कर सकते हों कि आप की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है तो आप अपनी पत्नी के विरुद्ध धारा 494 भा.दं.संहिता तथा उस के साथ विवाह करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध धारा 497 भा.दं.संहिता के अंतर्गत पुलिस थाना में रिपोर्ट लिखा सकते हैं या फिर सीधे न्यायालय में शिकायत कर के मुकदमा कर सकते हैं।

दि आप पत्नी का दूसरा विवाह साबित कर सकते हैं तो आप उसे इस आधार पर तलाक भी दे सकते हैं और अपने बेटे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर उस की अभिरक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

पत्नी सही प्रतीत होती है, अपना मामला उस के साथ मिल बैठ कर या काउंसलर के माध्यम से निपटाएँ।

समस्या-

सांगरिया, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से लोनाराम ने पूछा है –

मेरी शादी 1998 में हुई थी। हमारे दो संताने हैं। जून 2007 से पत्नी बच्चों के साथ घर छोड़ कर सुनाम चली गई जहाँ वह सरकारी नौकरी करती है। उस का वेतन 40,000/- रुपए प्रतिमाह है।  2007 के बाद हम कभी भी नहीं मिले न ही वे लोग मुझे बच्चों से मिलने देते हैं। मैं ने 2009 से सुनाम कोर्ट में बच्चों की कस्टडी के लिए मुकदमा कर रखा है पर न्यायालय में मेरी कोई बात नहीं बनी। न ही मुझे बच्चों से मिलवाया गया है। न्यायालय ने मेरे से 3000/- रुपए प्रतिमाह का खर्च पत्नी को देने को बोला है। मैं अब पत्नी से तलाक लेना चाहता हूँ। पत्नी और उस के माता-पिता और वह और रुपए की मांग कर रहे हैं मुझे पत्नी से तलाक और बच्चे कैसे मिल सकते हैं?

समाधान-

Counsellingप ने अपनी पत्नी के बारे में मामूली सूचनाएँ यहाँ दी हैं। अपने और अपने बच्चों के बारे में कोई सूचना नहीं दी है। बिना किन्हीं तथ्यों के तलाक और बच्चों की कस्टडी के बारे में क्या कोई किसी को राय दे सकता है?

प ने अपने बारे में कुछ नहीं बताया। आप क्या करते हैं? क्या कमाते हैं? परिवार में कौन कौन साथ रहता है। आप की पत्नी की शिकायत क्या है? वह आप को छोड़ कर जाने की बात क्यों करती है? बच्चों से न मिलने देने के कारण क्या बताती है? और आप बच्चों को माँ के पास रखने के स्थान पर अपने पास क्यों रखना चाहते हैं?

प की पत्नी 40,000/- रुपए प्रतिमाह वेतन पाती है, सरकारी सेवा में है जिस में सामाजिक सुरक्षा अधिकतम है। वह क्यों अपना रोजगार छोड़ेगी? अदालत को भी बच्चों का भविष्य उसी के पास नजर आएगा। इस कारण से आप को बच्चों की कस्टडी मिलने का मार्ग तो न्यायालय से नहीं ही खुलेगा। आप तलाक लेना चाहते हैं और आप की पत्नी व उस के माता-पिता इस के लिए धन चाहते हैं तो गलत क्या है? आखिर आप की संतानें आप की और आप की पत्नी की हैं और यदि बालिग होने तक उन की परवरिश के खर्चे में आप के योगदान के रूप में वे कुछ धनराशि चाहते हैं तो यह तो आप को देना होगा। वर्तमान में जो 3000 रुपया प्रतिमाह खर्च अदालत ने निर्धारित किया है वह भी बच्चों के लिए है। उसे देने में आप को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यदि इसी राशि को किसी राशि का ब्याज मानें तो भी वह राशि भी चार लाख रुपया होती है। बच्चों की उम्र् बढ़ने के साथ उन का खर्च भी बढ़ेगा।

प तलाक ही चाहते हैं तो अपनी पत्नी और उस के माता-पिता से बात करें। जरूरत हो तो किसी काउंसलर की मदद लें या अदालत को ही बीच में डालें और समझौते व सहमति से विवाह विच्छेद प्राप्त कर लें।

अवयस्क की अभिरक्षा के लिए उस स्थानीय क्षेत्र के न्यायालय को क्षेत्राधिकार है, जहाँ अवयस्क निवास करता है।

समस्या-

सीतापुर, उत्तर प्रदेश से आकाश ने पूछा है –

मेरी पत्नी लखनऊ में मेरे बेटी के साथ रहती है। मैं सीतापुर में रहता हूँ। मैं एक बार लखनऊ में अपनी बेटी से मिलने गया तो मेरी पत्नी ने मुझे मारपीट कर झूठे मुकदमे में फँसा दिया। मुझे लखनऊ में जान का खतरा है। मैं ने सीतापुर में संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 25 में बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए मुकदमा किया है। पत्नी के वकील ने अदालत में कहा है कि मुकदमा सीतापुर न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है, यह लखनऊ की अदालत के क्षेत्राधिकार में है। क्या मैं इस मुकदमे को सीतापुर में लड़ सकता हूँ? पत्नी मुकदमे को लखनऊ ले जाना चाहती है। कोई ऐसा केस पहले हुआ हो जिस में बच्चे के पिता के यहाँ मुकदमा चला हो तो बताएँ। उचित सलाह दें।

समाधान –

widow daughterकिसी भी बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन पर सुनवाई का अधिकार किस न्यायालय को हो यह इस बात से निर्धारित नहीं होता कि आवेदक कहाँ रहता है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस बात से निर्धारित होता है कि बालक कहाँ रहता है या रह रहा है। जब आप स्वयम् ही कह रहे हैं कि बेटी पत्नी के साथ लखनऊ में निवास करती है। तो इस तरह सीतापुर के न्यायालय को उक्त मामले में क्षेत्राधिकार नहीं है। इस आधार पर आप का मुकदमा सीतापुर के न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है। आप की पत्नी के वकील ने सही आपत्ति उठाई है। इस आपत्ति के आधार पर न्यायालय यह निर्णय देगा कि मामला उस के क्षेत्राधिकार का नहीं है और वह उसे नहीं सुन सकता। इस स्थिति में आप चाहें तो मुकदमा वापस ले कर पुनः लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। या क्षेत्राधिकार के आधार पर निरस्त होने के उपरान्त लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं।

प की मुख्य परेशानी ये है कि लखनऊ में आप को जान का खतरा है। ये जान का खतरा तो सीतापुर में भी हो सकता है। आप उस खतरे के बारे में पुलिस, प्रशासन और न्यायालय से अलग से राहत प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन इस आधार पर उक्त मुकदमे का क्षेत्राधिकार नहीं बदल सकता। आप को उक्त आवेदन सीतापुर न्यायालय से वापस ले कर लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए। बाद में आप उसी न्यायालय से जान के खतरे की बात कर सकते हैं या फिर उच्च न्यायालय के समक्ष उक्त मुकदमे को लखनऊ से अन्यत्र जहाँ आप को खतरा न हो स्थानान्तरित करने हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

संतान की अभिरक्षा (Custody) के लिए आवेदन किस न्यायालय को प्रस्तुत करें?

समस्या-

सीतापुर, उत्तर प्रदेश से आकाश  ने पूछा है-

मेरा विवाह 2006 में हुआ, 2008 में एक पुत्री ने जन्म लिया। उस के बाद मेरी पत्नी अपने मायके चली गई। मैं विदा कराने गया तब विवाह पैदा हुआ। पत्नी ने मेरे शहर में रहने से इन्कार कर दिया। तब मैं ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम में पत्नी को विदा कराने का मुकदमा किया जो एक पक्षीय 17 फरवरी 2010 को निर्णीत हो गया। पत्नी ने अदालत के आदेश की पालना नहीं की। बल्कि पूरे परिवार ने मेरे घर आ कर मेरी माँ के साथ मारपीट की।  जिस में धारा 323, 452 भारतीय दंड संहिता का मुकदमा बना। मैं ने धारा 9 के आदेश के निष्पादन की कार्यवाही की।  अभी मेरी पुत्री मेरी पत्नी की अभिरक्षा में है। मैं उस की अभिरक्षा स्वयं लेना चाहता हूँ। इस के लिए मैं ने अपने शहर सीतापुर में पुत्री की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत किया है। मेरी पत्नी लखनऊ  में रहती है। क्या मेरा मुकदमा उस के शहर में स्थानान्तरित तो नहीं होगा? या मेरे शहर में मेरा मुकदमा खारिज तो नहीं होगा?  मेरी पत्नी मुझे मेरी बेटी से नहीं मिलने देती है, उस के लिए मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

imagesप ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के आदेश का निष्पादन कराने के लिए आवेदन किया है।  लेकिन किसी भी मनुष्य को उस की इच्छा के विपरीत किसी के साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता।  यदि आप की पत्नी आप के साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है तो आप को यह अधिकार है कि आप धारा 9 के आदेश / डिक्री के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री के लिए आवेदन कर सकते हैं।

किसी बालक/ बालिका की अभिरक्षा के लिए आवेदन उस न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जिस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत बालक /बालिका सामान्य रूप से निवास करती है। आप के मामले में 2008 में पुत्री के जन्म के बाद से ही वह माँ के साथ लखनऊ में निवास कर रही है वही उस का सामान्य निवास का स्थान है। इस कारण से आप को अभिरक्षा के लिए आवेदन लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए था। आप का आवेदन सीतापुर के न्यायालय से लखनऊ के न्यायालय में स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता। किन्तु सीतापुर का न्यायालय आप के आवेदन को लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए आप को वापस कर सकता है।

बालक /बालिका की अभिरक्षा के लिए न्यायालय यह देखता है कि बालक /बालिका का हित किस की अभिरक्षा में रहने में है। इसलिए बालक/ बालिका की अभिरक्षा का प्रश्न माता या पिता के अधिकार का न हो कर बालक /बालिका के हित का है। उसी के आधार पर आप का आवेदन निर्णीत होगा। आप को आप की पत्नी आप की पुत्री से नहीं मिलने देती है। इस के लिए आप ने जिस न्यायालय में अभिरक्षा के लिए आवेदन किया है उसी न्यायालय में यह आवेदन कर सकते हैं कि बालक /बालिका को माता और पिता दोनों के साथ रहने और मिलने का अवसर दिया जाना चाहिए। न्यायालय आप के आवेदन पर इस तरह का आदेश प्रदान कर सकती है जिस से आप अपनी पुत्री से मिल सकें और कुछ समय उस के साथ बिता सकें।

बच्चों की अभिरक्षा के विवादों में उन का हित सर्वोपरि बिन्दु है

समस्या-

क हिन्दू महिला के एक पुत्र 9 साल का व एक पुत्री 12 साल की है उसका पति से तलाक हो गया, वह स्त्री-धन भी साथ ले गई लेकिन वह दोनों संतानों को उसके पति की कस्टडी में देकर गयी।  तलाक के दो माह बाद उसके पति की मृत्यु हो गयी।  दोनों बच्चे दादा दादी की परवरिश में हैं, अच्छे स्कूल में इंग्लिश मीडियम में शिक्षा क्लास 3 और क्लास 7 में प्राप्त कर रहे हैं।  अब उस महिला ने अपने दोनों बच्चों को पाने के लिए कोर्ट में केस दायर कर दिया है और सहायता चाही है कि दोनों बच्चों को मेरी अभिरक्षा में दिया जाये, दादा दादी बुजुर्ग हैं अनपढ़ हैं।  वैसे तो वह महिला के पास आय कोई साधन नहीं है फिर भी वकीलों की सलाह के कारण उसने प्राइवेट स्कूल में सर्विस करने का सर्टिफिकेट और ट्यूशन से आय का साधन बताया है और पिता के मकान में रहना बताया है।  बच्चों की पैतृक सम्पत्ति तो यथावत है क्योंकि अभी दोनों बच्चे नाबालिग हैं जिस पर उनके स्वत्व सुरक्षित हैं और परिवार की संयुक्त सम्पत्ति है।  लेकिन बच्चो की अभिरक्षा प्राप्त कर उसके साथ उन बच्चों की सम्पत्ति हथिया लेना उसका उद्देश्य है।  वास्तव में वह तलाक के बाद वह किसी और से शादी करना चाहती थी।  लेकिन इस बात को कोर्ट में सिद्ध नहीं किया जा सकता।  यदि बच्चों और उनकी सम्पत्ति ले कर वह किसी और से शादी कर ले तो इन बच्चों का भविष्य क्या होगा?  यदि वास्तव में वह बच्चों की हितैषी होती तो तलाक के समय बच्चे मात्र 3 और 6 साल के थे तो उस में उन के प्रति ममत्व क्यों नहीं जागा? और अब क्यों जाग उठा है? क्या जब तलाक लिया था तब उसने बच्चों को अपने साथ रखने में असमर्थता होना पाया और अब बच्चे पाना चाहती है?  जब कि वह इस बात को बहुत ही अच्छी तरह से जानती थी कि इन बच्चों को मात्र उनके दादा दादी ही पालन करेंगे, न कि उनके पिता।  क्या हिन्दू तलाकशुदा महिला यदि तलाक के बाद किसी से शादी नहीं करती है और उसके मायके बैठी रहती है तो उस का उसके मृत पति की सम्पत्ति में स्वत्व होगा या नहीं?  क्या उसके पति की म्रत्यु के बाद वह संतान को पाने का अधिकार रखती है?

-राकेश अरोड़ा, जावरा, मध्यप्रदेश

समाधान-

माता-पिता के तलाक के समय बच्चों की उम्र और उन की वर्तमान उम्र में छह वर्ष का अंतर है इस का सीधा अर्थ यह है कि पिछले छह वर्ष से बच्चे अपने दादा-दादी के साथ निवास कर रहे हैं जहाँ उन्हें पर्याप्त और अच्छा संरक्षण प्राप्त हो रहा है उन के संरक्षण में बच्चों के विकास की अच्छी संभावना है।  छह वर्ष से माता से दूर रहने पर बच्चे भी अब शायद ही माता के साथ जा कर रहने की इच्छा रखते हों।  ये दो तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, जिन के आधार पर बच्चों की अभिरक्षा दादा-दादी के पास बने रहने का निर्णय न्यायालय से प्राप्त किया जा सकता है।

प के द्वारा कुछ प्रश्न और तथ्य उठाए गए हैं।  “यदि बच्चों और उनकी सम्पत्ति ले कर वह किसी और से शादी कर ले तो इन बच्चों का भविष्य क्या होगा?  यदि वास्तव में वह बच्चों की हितैषी होती तो तलाक के समय बच्चे मात्र 3 और 6 साल के थे तो उस में उन के प्रति ममत्व क्यों नहीं जागा? और अब क्यों जाग उठा है? क्या जब तलाक लिया था तब उसने बच्चों को अपने साथ रखने में असमर्थता होना पाया और अब बच्चे पाना चाहती है?  जब कि वह इस बात को बहुत ही अच्छी तरह से जानती थी कि इन बच्चों को मात्र उनके दादा दादी ही पालन करेंगे, न कि उनके पिता।” इन सब प्रश्नों को दादा-दादी के बयान व अन्य साक्ष्य के माध्यम से न्यायालय के रिकार्ड पर लाना होगा।  इस का लाभ दादा-दादी को बच्चों की अभिरक्षा बनाए रखने में मददगार सिद्ध होगा।  प्राइवेट स्कूल व ट्यूशन के जो दस्तावेज माता ने प्रस्तुत किए हैं उन्हें स्कूल संचालक और ट्यूशन के दस्तावेज निष्पादित करने वाले व्यक्तियों के बयान न्यायालय के समक्ष कराए बिना उन्हें साबित नहीं किया जा सकता।  आप उन्हें गलत साबित करने के लिए स्कूल से स्कूल का रिकार्ड जिस में नियुक्ति पत्र, वेतन पंजिका न्यायालय से मंगवा सकते हैं।  इस के अतिरिक्त उसी स्कूल में काम करने वाले किसी व्यक्ति के तथा जहाँ बच्चों की माता रहती है उस मुहल्ले से किसी व्यक्ति के बयान कराए जा सकते हैं। जो कोई भी वकील इस मुकदमे को लड़ रहा है उसे इस मामले में अतिरिक्त श्रम करना होगा।

भी हाल ही में एक मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया है, हालाँकि इस मामले में अभी अंतिम निर्णय पारित नहीं किया गया है लेकिन कुछ आदेश दिए गए हैं।  इस मामले में एक मुस्लिम लड़का अपने माता-पिता से बिछड़ गया था।  उसे एक हिन्दू व्यक्ति ने आश्रय दिया और बेटे की तरह पालने लगा।  उस का स्कूल में दाखिला कराया और उस ने उस का धर्म और नाम तक नहीं बदला।  कुछ वर्ष बाद बच्चे के पिता का देहान्त हो गया लेकिन माता को बच्चे का पता लगा और अब वह अपने बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करना चाहती है।  इस मामले में बच्चे ने कहा कि वह अपनी माता के पास न रह कर अपने पालक पिता के साथ रहना चाहता है।  सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में टिप्पणी दी है कि ऐसी हालत में बच्चे का संरक्षण उस माता को क्यों दिया जाए जब कि बच्चे का संरक्षण अच्छी तरह हो रहा है, उस के धर्म को बदला नहीं गया है और बच्चे के खोने तक की रिपोर्ट पुलिस को नहीं कराई गई थी जिस से उसे तलाश किया जा सके।  हालाँकि इस मामले में अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और सर्वोच्च न्यायालय ने महिला से उस की आय, उस के दायित्वों और स्कूल के खर्चों आदि के बारे में एक सप्ताह में शपथ प्रस्तुत करने को कहा है।  लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के विचारों से यह स्पष्ट है कि बच्चों की अभिरक्षा के संबंध में निर्णय करने के लिए वह बच्चों के हितों और उन की इच्छा को सर्वोपरि स्थान दे रही है।  प्राकृतिक संरक्षक होने का इस मामले में उतना महत्व नहीं रह गया है।  एक-दो माह में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय इस मामले में हो जाएगा, उस पर आप को निगाह रखनी होगी।

लाचारी को त्यागें और अपना आत्म सम्मान पुनः हासिल करें

समस्या-

मेरी शादी 18 फरवरी 2006 को हुई थी मेरे 2 बच्चे हैं एक पाँच वर्ष का दूसार तीन वर्ष का।  मेरी नौकरी जा चुकी है।  2008 में मेरा एक्सीडेंट हो गया था जिस में मेरा एक पैर टूट गया था।  मेरी पत्नी मुझे लंगड़ा कहती है।  दो माह पहले तक हम साथ रहते थे। लेकिन मेरा पैरा मुझे काम करने में  मदद नहीं करता है जिस के कारण मैं अपने घर आ गया।  तब वह कहने लगी कि मैं गाँव में नहीं रहूँगी।  वह चरित्रहीन है। फिर पतनी मेरी लड़की को छोड़ कर लड़के को ले कर अपने मायके चली गई।  जब हम उसे लेने गए तो पता चला कि वह लखनऊ गई है, हम लखनऊ गए तो वहाँ हमें बहुत बुरा भला कहा और कहा कि मैं लंगड़े के साथ नहीं जाउंगी।  हमें खाने पीने के लिए भी नहीं पूछा।  जब हम वापस आने लगे तो मेरा बेटा वापस मेरे साथ आ गया।  10 दिन बाद पता चला कि हमारे ऊपर हाईकोर्ट में  बंदी प्रत्यक्षीकरण का केस चला दिया है। हमें पुलिस पकड़ कर ले गई तब हम ने बयान दिया।  उस के बाद मैं ने जिला न्यायालय में धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर दिया है।  जब भी मैं पत्नी से बात करता हूँ तो वह गाली देती है और साथ न रहने को कहती है।  मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहना चाहता हूँ।  क्या मेरी पत्नी मेरे पास नहीं आएगी? क्या वह मेरे पुत्र को ले लेगी?

-अजय, लालगंज, रायबरेली, उत्तर प्रदेश

समाधान-

दुनिया में किसी भी व्यक्ति को उस की इच्छा के विरुद्ध किसी के साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता।  यदि आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है तो कानून के पास ऐसा कोई उपाय नहीं कि आप की पत्नी को आप के पास जबरन रहने को कहा जाए।  यदि आप की पत्नी के पास ऐसा कोई उचित और वैध कारण नहीं है कि वह आप से अलग रह सके तो आप ने जो धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम का आवेदन प्रस्तुत किया है उस में आप के पक्ष में डिक्री पारित कर दी जाएगी कि आप की पत्नी आप के साथ आ कर रहे। यदि ऐसी डिक्री पारित होने से एक वर्ष की अवधि में आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहती है तो फिर आप उस से इसी आधार पर तलाक ले सकते हैं।

सा प्रतीत होता है कि आप की पत्नी आप के साथ रहने की इच्छुक नहीं रही है।  वह अब आप से स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहती है।  जब तक उस की यह इच्छा आप के साथ रहने की इच्छा में परिवर्तित नहीं होती है।  आप की उस के साथ रहने की इच्छा की पूर्ति संभव नहीं है।  यह कानून से संभव नहीं है।  इस के लिए तो काउंसलिंग और सामाजिक दबाव ही उपाय हैं।  यदि दोनों संभव  नहीं हों तो अधिक अच्छा यह है कि दोनों पक्ष आपस में बैठ कर तय कर लें कि आगे क्या करना है।   यदि पत्नी आप के साथ नहीं ही रहना चाहती है तो फिर आपसी सहमति से तलाक लेना ही आप के लिए बेहतर होगा।

प के दो बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की।  आप की पत्नी लड़के को तो अपने पास रखना चाहती है लेकिन लड़की को नहीं।  लेकिन ऐसी स्थिति में न्यायालय को इस बात पर विचार करना होगा कि दोनों बच्चों को अलग किया जाए या नहीं, न्यायालय को इस बात पर भी विचार करना होगा कि दोनों बच्चों का लालन पालन कहाँ बेहतर तरीके से हो सकता है और उन के हित कहाँ अधिक सुरक्षित हैं।  यह भी देखा जाएगा कि दोनों बच्चे खुद को कहाँ अच्छा महसूस करते हैं।  जब भी न्यायालय किसी बच्चे की अभिरक्षा के विषय पर विचार करता है तो सर्वोपरि तथ्य यही होता है कि बच्चे का हित किस की अभिरक्षा में हो सकता है।

भी आप के पैर के कारण आप को लाचार स्थिति में ला दिया है।  आप पत्नी की निगाह में  अपना सम्मान खो चुके हैं।  आप को हर हालत में इस लाचारी से निजात पानी पड़ेगी और अपना आत्म सम्मान वापस हासिल करना होगा।  तभी आप के और आप की पत्नी के बीच के स्थितियाँ ठीक हो सकेंगी।  किसी भी स्थिति में लाचारी का त्याग तो करना ही होगा।  मेरे विचार में आप को अपने पैर की चिकित्सा पर अधिक ध्यान देना चाहिए और पैर के उपयोग से संबंधित अधिक से अधिक क्षमता हासिल करनी चाहिए।  यदि आप अपने पैरों पर खड़े होंगे तो बहुत सारी समस्याएँ उसी से हल हो जाएंगी।

अभिरक्षा के निर्णय में बच्चे का हित सर्वोपरि

समस्या-

मेरा पत्नी से करीब छह साल से विवाद है।  उस ने 498-ए का केस 2006 में किया था। बाद में केस समाप्त हो गया।  आए दिन वह घर से भाग जाती है और मेरे व मेरे बड़े भाई के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराती है।  केस चल रहा है।  अभी वह घर पर से मेरे छह साल दो माह के बेटे को जबरन ले कर चली गई।  बच्चा पहली कक्षा में पढ़ता है।  जब मैं अपने भाई के साथ बच्चे से मिलने गया तो पत्नी ने अपने भाइयों के साथ मिल कर मुझे और मेरे भाई को मारा।  जिस की रिपोर्ट थाने में दर्ज है।  मैं सरकारी कर्मचारी हूँ।  मैं ने न्यायालय में बच्चे को प्राप्त करने के लिए आवेदन  किया है।  क्या मुझे बच्चा मिलेगा?  कृपया मेरी मदद करें।

-विनय शिन्दे, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

समाधान-

प ने बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए किस प्रावधान के अंतर्गत किस न्यायालय में आवेदन किया है? यह नहीं बताया है।  यह भी नहीं बताया है कि आप के और पत्नी के बीच विवाह विच्छेद,  दाम्पत्य संबंधों की पुनर्स्थापना,  या न्यायिक पृथक्करण में से कोई प्रकरण लंबित है अथवा नहीं।  यदि आप ने यह विवरण भी दिया होता तो आप की जिज्ञासा का उत्तर देने में आसानी होती।  खैर¡

ब भी कभी किसी न्यायालय के समक्ष ऐसा मामला आता है कि पति या पत्नी अलग अलग रह रहे होते हैं, बच्चा किसी माता-पिता में से एक की अभिरक्षा में होता है और दूसरा अभिरक्षा चाहता है तब न्यायालय सर्वोच्च प्राथमिकता इस बात को देता है कि बच्चे का हित किस चीज में है।

 

च्चे का हित तय करने के लिए न्यायालय माता और पिता की निवास की परिस्थितियों का मूल्यांकन करता है, वह देखता है कि दोनों में से किस के पास बच्चे का पालन-पोषण ठीक से हो सकता है, दोनों स्थानों में से किस स्थान पर बच्चे को अच्छा संरक्षण, अच्छी परवरिश, अच्छी शिक्षा प्राप्त हो सकती है।  न्यायालय बच्चे को बुला कर उस का भी साक्षात्कार लेता है।  जिस से यह पता किया जा सकता है कि बच्चे का लगाव किस के साथ अधिक है और बच्चा अपने पिता के साथ अधिक सहज महसूस करता है अथवा माँ के साथ।

प के मामले में यदि आप का पत्नी के साथ पिछले छह वर्षों से विवाद चल रहा है और 498-ए का प्रकरण चल कर समाप्त हो चुका है, तो निश्चित ही आप के बालक को आप के पास अधिक रहने का अवसर मिला होगा और वह आप के साथ अधिक सहज महसूस करता होगा।  निश्चित रूप से आप ने उसे अब तक अच्छा पालन-पोषण और सुरक्षा प्रदान की होगी।  यदि ऐसा है तो आप को बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त हो सकती है।  लेकिन इस प्रकरण में निर्णय इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आप के वकील किस तरह से तथ्यों को न्यायालय के समक्ष रखते हैं और उन्हें साबित करने कि लिए क्या साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।  यहाँ अभिरक्षा के आवेदन आप की ओर से प्रस्तुत हुआ है और जो तथ्य आप के आवेदन में प्रस्तुत किए गए हैं उन्हें साबित करने का दायित्व आप का है।  इस कारण से आप को इस मामले में चौकन्ना रहना पड़ेगा कि आप साक्ष्य और सबूतों से अपने मामले को साबित कर सकते हैं या नहीं।

पति के विरुद्ध 498-ए का मुकदमा दर्ज करवा दिया है, मेरा दो साल का बच्चा किस के पास रहेगा?

समस्या-

मेरे ससुराल वाले मुझे बहुत तकलीफ देते थे।  बाद में पति ने भी मारना और घर से निकालना शुरु कर दिया। मैं मायके आई तो वहाँ भी शराब पी कर आने लगा और झगड़ा करने लगा। मेरे पिता को जान से खत्म करने की धमकी भी दी। मैं ने पुलिस स्टेशन में धारा 498-ए में रिपोर्ट करवा दी है। मेरे एक दो साल का बच्चा भी है। मैं क्या कर सकती हूँ? मेरा बच्चा दो वर्ष का है वह मेरे पास रहेगा या फिर उस के पिता के पास रहेगा।

-रानी, लातूर, महाराष्ट्र

प के साथ ससुराल में क्रूरतापूर्ण व्यवहार हुआ और मारपीट भी। इस मामले में आप का कहना है कि आप ने धारा 498-ए का प्रकरण पुलिस ने दर्ज कर लिया है। यदि ऐसा है तो आप के पति और ससुराल वालों के विरुद्ध एक अपराधिक मुकदमा तो दर्ज हो ही गया है। पुलिस इस मुकदमे में गवाहों के बयान ले कर और अन्य सबूत जुटा कर न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत कर देगी। अभियुक्तों को आरोप सुनाने के उपरान्त न्यायालय में सुनवाई आरंभ होगी जहाँ आप के और गवाहों के बयानों पर निर्भर करेगा कि आप के पति और अन्य अभियुक्तों को उक्त प्रकरण में दंड मिलेगा अथवा नहीं।

ब आप अपने मायके में रह रही हैं। 498-ए के प्रकरण के दर्ज हो जाने के उपरान्त आप के पति ने आप के मायके आ कर परेशान करना बंद कर दिया होगा। यदि यह बदस्तूर जारी है तो आप महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। इस आवेदन पर आप के पति को पाबंद किया जा सकता है कि वह आप के मायके न आए और आप को तंग करना बंद करे। इसी आवेदन में आप अपने पति से अपने बच्चे और स्वयं अपने लिए प्रतिमाह भरण पोषण के लिए आवश्यक राशि दिलाने की प्रार्थना भी कर सकती हैं। न्यायालय ये सभी राहतें आप को दिला सकता है।

दि आप अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती हैं तो आप उस से विवाह विच्छेद के लिए परिवार न्यायालय में और आप के जिले में परिवार न्यायालय स्थापित न हो तो जिला न्यायालय के समक्ष आवेदन कर सकती हैं। साथ ही साथ धारा-125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रतिमाह अपने और अपने बच्चे  के लिए भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए अलग से आवेदन कर सकती हैं।

हाँ तक बच्चे की अभिरक्षा/ कस्टडी का प्रश्न है, बच्चा आप के पास ही होगा और उसे आप के पास ही रहना चाहिए। उसे आप का पति जबरन आप से नहीं छीन सकता। यदि वह बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन करता है तो आप उस का प्रतिरोध कर सकती हैं। जिस उम्र का बालक है उस उम्र में उसे उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। इस तरह बालक भी आप के पास ही रहेगा। यदि आप दोनों के बीच विवाह विच्छेद होता है तो आप यह तय कर सकती हैं कि आप बच्चे को अपने पास रखना चाहती हैं या नहीं। यदि आप बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहती हैं और बच्चे का पिता उसे अपने पास रखना चाहता है तो आप इस विकल्प को चुन सकती हैं।

बालक की अभिरक्षा के निर्णय में उस का हित सर्वोपरि

न्यायालयों के समक्ष अनेक बार माता, पिता और संरक्षक के बीच यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि बालक किस की अभिरक्षा में रहे? ऐसे प्रश्नों पर निर्णय देने में सर्वोपरि तथ्य यह है कि बालक का हित किस के संरक्षण में रहने पर साध्य होगा। सर्वेोच्च न्यायालय ने श्यामराव मारोती कोरवाटे बनाम दीपक किसनराव टेकम के मुकदमे में यही व्यवस्था प्रदान की है।

क्त प्रकरण में दीपक किसनराव का विवाह कावेरी के साथ 2002 में सम्पन्न हुआ था। 2003 में उस ने एक बालक विश्वजीत को जन्म दिया। लेकिन बालक के जन्म के उपरान्त अत्यधिक रक्तस्राव के कारण कावेरी का देहान्त हो गया। माता के देहान्त के उपरान्त बालक उस की नाना श्यामराव मारोती के संरक्षण में पलता रहा। दीपक किसनराव ने दूसरा विवाह कर लिया जिस से उसे एक और पुत्र का जन्म हुआ। इस बीच अगस्त 2003 में बालक के नाना ने बालक का संरक्षक नियुक्त करने के लिए जिला न्यायालय को आवेदन किया जब कि पिता ने बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए। जिला जज ने दोनों प्रार्थना पत्रों पर एक ही निर्णय देते हुए बालक के 12 वर्ष का होने तक की अवधि के लिए  नाना को उस का संरक्षक  नियुक्त किया। न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि तब तक पिता को बालक से मिलने की स्वतंत्रता होगी। जिला न्यायाधीश ने पिता के आवेदन को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि वह बालक के 12 वर्ष का होने के पश्चात बालक की अभिरक्षा के लिए पुनः आवेदन कर सकता है।

पिता ने जिला न्यायाधीश के निर्णय को मुम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर बैंच के समक्ष नअपील प्रस्तुत कर चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पिता की अपील को स्वीकार करते हुए बालक की अभिरक्षा पिता को देने का निर्णय प्रदान किया। नाना ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि पिता के प्राकृतिक संरक्षक होते हुए भी बालक के हितों को देखते हुए न्यायालय किसी अन्य व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर सकता है। इस मामले में जन्म से ही बालक नाना के साथ निवास कर रहा है और उस का लालन-पालन सही हो रहा है उस की शिक्षा भी उचित रीति से हो रही है ऐसी अवस्था में जिला जज द्वारा नाना को 12 वर्ष की आयु तक के लिए बालक का संरक्षक नियुक्त किया जाना विधिपूर्ण था।

र्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि बालक 12 वर्ष की आयु तक नाना के संरक्षण में ही रहेगा। इस अवधि में पिता बालक के विद्यालय का दो सप्ताह से अधिक का अवकाश होने पर सात दिनों तक के लिए पिता बालक को अपने पास रख सकेगा। जिस के दिनों की पूर्व सूचना पिता बालक के नाना को देगा। इस के अतिरिक्त माह में दो बार अवकाश के दिन शनिवार रविवार को या किसी अन्य त्योहारी अवकाश के दिन नाना बालक को सुबह से शाम तक उस के पिता के पास रहने देगा। इस बीच पिता चाहे तो बालक के स्कूल की फीस, ड्रेस, पुस्तकें व भोजन आदि का खर्च उठा सकता है। बालक 12 वर्ष की आयु का होने के उपरान्त पिता उस की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए जिला न्यायाधीश के समक्ष फिर से आवेदन कर सकेगा।

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