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सेवाच्युत कर्मकार को पुनः नियोजन में लेने पर कोई रुकावट नहीं।

rp_termination-of-employment.jpgसमस्या-

प्रदीप कुमार सिंह ने शेखपुरा बिहार से पूछा है-

मैं बिहार सरकार,ग्रामीण विकास विभाग द्वारा संचालित बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति “जीविका” में क्षेत्रीय समन्वयक पद पर कार्यरत था, साथ ही में जीविका के कर्मचारियों के यूनियन का प्रदेश अध्यक्ष था। मुझ पर दुर्भावना से प्रेरित होकर प्रबंधन द्वारा कई गंभीर आरोप लगाकर (फिनांस और फीमेल जैसे मामले को छोड़कर) टर्मिनेट कर दिया गया मैं यह जानना चाहता हूं कि अगर फिर से बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति “जीविका’ में वैकेंसी निकलती है तो क्या मैं उसे भर सकता हूं क्या मेरा चयन प्रबंधन द्वारा किया जाएगा !  जबकि मेरे टर्मिनेशन से संबंधित मामला पटना हाईकोर्ट में लंबित है!

समाधान-

प पर दुराचरण के आरोप लगाए और सेवाएँ समाप्त कर दी गयीं। किसी भी आरोप में कर्मकार की सेवाएँ तभी समाप्त की जाती हैं जब नियोजक यह समझ लेता है कि आरोप सही, सच्चे और उस की स्वयं की निगाह में सिद्ध हैं, तथा इन आरोपों के दोषी को किसी भी प्रकार से नियोजन में नहीं रखा जा सकता। ऐसी अवस्था में उसी नियोजक द्वारा उसी कर्मकार को दुबारा नियोजन नहीं देना चाहिए।

यदि वही नियोजक उसी कर्मकार को फिर  से नियोजन देता है तो उस का अर्थ यह लिया जाना चाहिए कि या तो आरोप ऐसे थे जिन के लिए सेवा समाप्ति का दंड दिया जाना उचित नहीं था, या आरोप निराधार और मिथ्या थे और कर्मकार की सेवा समाप्ति नियोजक द्वारा की गयी त्रुटि थी जिस का उसे अहसास हुआ और उस ने अपनी इस गलती को सुधारने के लिए पुनः कर्मकार को सेवा में रख लिया है। किसी दुराचरण के दोष के आधार पर सेवाच्युत किए गए किसी कर्मकार को उसी नियोजक द्वारा फिर से सेवा में ले लिए जाने पर किसी तरह का कोई कानूनी प्रतिबंध या रुकावट नहीं है।

हमारी राय है कि आप को फिर से आवेदन करना चाहिए, लेकिन यदि आवेदन के प्रारूप में कहीं पूछा गया हो कि आप ने पूर्व में कहीं सेवा की है और उस का विवरण दीजिए तो आप को अपनी पूर्व सेवा का विवरण देना होगा। यह विवरण देना आप को पुन नियोजन प्राप्त करने में बाधा बनेगा। फिर भी  यदि जीविका आप को फिर से नियोजन का अवसर देता है तो आप को सेवा ग्रहण कर लेना चाहिए। यह तथ्य आप के उच्च न्यायालय में चल रहे मुकदमे में भी आप के पक्ष में एक अतिरिक्त आधार होगा।

किसी अपराध के लिए मुकदमा विचाराधीन हो या दंडित कर दिया गया हो तो नौकरी प्राप्त करते समय न छुपाएँ।

rp_termination-of-employment.jpgसमस्या-

हंसराज मीणा ने कोटा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

म ने नौकरी मांग को लेकर राजस्थान सरकार के विरुद्ध आन्दोलन किया तो हमारे साथियों को गिफ्तार किया। मुझे सलाह चाहिए कि क्या धारा 332,352,147,149,448 आईपीसी लगने और मुकदमा विचाराधीन होने पर सरकारी नौकरी लग सकती है। हमारे पास इस से मुक्ति का क्या उपाय है? क्या हमें इन धारा को छुपाकर नौकरी करते समय कोई दिक्कत हो सकती है? कौनसी धारा के तहत सरकारी नौकरी मे लगने से रोका जा सकता है यदि मामला विचाराधीन हो?

समाधान-

कोई अपराधिक मुकदमा विचाराधीन होने पर, उस में सजा होने पर प्रोबेशन पर छोड़े जाने पर, सजा हो जाने पर, संदेह के आधार पर या साक्ष्य न आने या साक्षी के विरुद्ध हो जाने से दण्डित न किए जाने पर हर सरकार और सरकारी विभागों की अलग अलग नीति हो सकती है। आप को चाहिए कि आप जहाँ नौकरी के लिए आवेदन दे रहे हैं उस नौकरी के संबंध में उस सरकार या विभाग की क्या नीति है। उसी से आप के प्रश्न का उत्तर मिल सकता है।

म तौर पर किसी अनैतिक अपराध के मामले में या किसी गंभीर अपराध के मामले में ही किसी को नौकरी देने से वंचित किया जा सकता है। यदि मामला विचाराधीन है तो चयन होने पर नियुक्ति को मामले में निर्णय होने तक नियुक्ति को रोका जा सकता है। दिल्ली पुलिस की इस तरह की गाइड लाइन्स या नीति को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गयी थी जिस में दिनांक 2 जुलाई 2013 को निर्णय प्रदान किया गया है। Commissioner Of Police And Anr vs Mehar Singh के मामले में दिए गए इस निर्णय को आप यहाँ क्लिक कर के पढ सकते हैं।

दि कोई मामला आप के विरुद्ध विचाराधीन है तो उसे छुपाना बहुत गलत है यह अलग से एक अपराध होगा और मिली हुई नौकरी कभी भी छीनी जा सकती है और तथ्य छुपाने के लिए सजा अलग से मिल सकती है। आप को विचाराधीन अपराधिक प्रकरण और यदि किसी मामले में दंडित किया गया है तो उसे स्पष्ट रूप से अपने आवेदन में पूछे जाने पर अंकित करना चाहिए।

प का मामला हक के लिए आंदोलन के दौरान बनाया गया है। इस तरह के अपराधिक मामले सरकार वापस भी ले लेती है। यदि स्वयं सरकार इस तरह के अपराधिक मामले वापस ले लेती है तो फिर नौकरी प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं रहती है।

नियमित पद के लिए चयन में संविदा नियुक्ति का कोई लाभ नहीं मिल सकता।

rp_empcontract.jpgसमस्या-

कमल ने उदयपुर, राजस्‍थान से समस्या भेजी है कि-

मैं वर्तमान में नगर पालिका में 06 वर्षो से कम्‍प्‍यूटर ऑपरेटर के पद पर कार्यरत हूँ तथा अभी 02 माह के बाद स्‍वायत शासन विभाग द्वारा क0 लिपिक की भर्ती निकाली जा रही है। जिस में हमारी सेवा का हमें कोई लाभ नहीं दिया गया है। उक्‍त भर्ती एक्‍जाम के द्वारा होगी। इस सन्‍दर्भ में मार्गदर्शन प्रदान करें कि भर्ती पर मेरे द्वारा न्‍यायालय से स्‍थगन प्राप्‍त किया जा सकता है या नहीं? अगर स्‍थगन लगाया जा सकता है तो क्‍या विधि रहेगी?

समाधान

प ने यह स्पष्ट नहीं किया कि आप पिछले छह वर्ष से किस तरह सेवा में हैं। हमारा सोचना है कि आप की यह नियुक्ति संविदा नियुक्ति रही होगी। संविदा नियुक्ति में स्पष्ट होता है कि उन्हें संविदा पर निश्चित अवधि तक के लिए काम करने को रखा गया है। यह निश्चित अवधि समाप्त होने पर नयी संविदा नियुक्ति दे दी जाती है। संविदा नियुक्ति में नियुक्ति पत्र में ही यह अंकित होता है कि कर्मचारी की नियुक्ति एक निश्चित अवधि के लिए है और उस के बाद सेवाएँ स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। इस कारण से आपको इस नौकरी का कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिलेगा। इतना अवश्य है कि साक्षात्कार में यह ध्यान रखा जा सकता है कि आप के पास छह वर्ष तक कार्य करने का अनुभव है।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि सभी सरकारी और अर्ध सरकारी सेवा में स्थाई कर्मचारियों को नियम के अनुसार परीक्षा ले कर तथा साक्षात्कार ले कर नियोजन देना चाहिए। सरकारी नौकरियों पर सभी का अधिकार है और उन नौकरियों के लिए चयन प्रतियोगिता के माध्यम से ही होना चाहिए। इस कारण से यदि आप ने संविदा नियुक्ति पर कार्य किया है तो उस का लाभ स्थाई सरकारी सेवा के लिए नहीं दिया सकता है। हमारी राय में आप को चयन प्रक्रिया में भाग लेना चाहिए और स्वयं को प्रतियोगिता में योग्य सिद्ध करते हुए यह नौकरी हासिल करनी चाहिए। उस के अलावा कोई मार्ग शेष है। इन नियुक्तियों पर आप के द्वारा स्थगन लेना लगभग असंभव है।

लायसेंस समाप्त कर मकान का कब्जा प्राप्त करने के लिए न्यायालय में दीवानी वाद प्रस्तुत करें।

rp_lawyerx200.jpgसमस्या-

ऊषा रानी ने सनलाईट कालोनी नम्बर-1, नई दिल्ली-14 से समस्या भेजी है-

मैं अपने परिवार के साथ रहती हूँ, और जंगपुरा मे दैनिक मजदूरी करती हूँ। मेरे पति श्री सतीश कुमार का 2008 मे हार्ट का ओपरेशन हुआ है और वह अब घर पर ही रहते  हैं। 443, नः का मकान मेरे पति के पिता जी की सम्पत्ति है। काफी समय से हमारे साथ मेरे पति के चाचा के लड़के के बच्चे भी रह रहे हैं। हम लोग उन से किसी भी प्रकार का किराया भी नहीं लेते और मेरे पति समय-समय पर इन लोगों की रूपये पैसो से सहायता भी करते रहे हैं। हमने जब हमारे दिए हुए पैसों को राजकुमारी को वापस करने को कहा तब-तब कोई ना कोई बहाना देती है। हमारे पास पैसों के लेन-देन का राजकुमारी के पति स्वर्गीय श्री सुरेश कुमार का लिखित और इन सब के अंगुठे कि छाप व हस्ताक्षर किया हुआ एग्रीमेंट भी है। जनाब काफी समय से राजकुमारी अपने दोनो लड़को के साथ मिल कर मुझे और मेरे पति एवं बच्चो को परेसान कर रहे हैं। इसका छोटा लड़का अपराधी प्रवृति का है और मेरे बच्चों को अकसर मारने पीटने कि धमकी देता रहता है। हम लोग चुप रह जाते हैं क्योकि मेरे पति का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। दिल भी काफी कमजोर है। डाक्टरो ने उन्हें ज्यादा बोलने चलने फिरने को मना करा हुआ है इसलिए हम लोग उन्हे कुछ नहीं बताते। एक बार पहले भी रितेश कुमार और निकेश कुमार उर्फ कल्ली दोनो भाई मेरे पति के साथ मार पीट कर चुके हैं और मेरे पति को मेट्रो हॉस्पिटल मे भरती करना पडा था। हमें काफी मुश्किलो का सामना करना पड़ा था। हमने इनकी हरकतो से परेशान होकर हमारा मकान खाली करने को कहा और इनका एक डी.डी.ए.क्वाटर ए-57 गढ़ी ईस्ट ऑफ केलाश में है वहां जाकर रहने को कहा। इस पर राजकुमारी बोली वह मकान मेरे पति और सास ने काफी समय पहले बेच दिया। इस पर मेरे पति ने कहा जब वो बेच रहे थे तब मुझे क्यों नहीं बताया। राजकुमारी बोली हमने जरूरी नहीं समझा। ये सुनकर मेरे पति खामोश हो गए। मेरे पति ने राजकुमारी से कहा भाभी देखो आपके बच्चे भी बड़े हो गए हैं और मेरे बच्चे भी और मैं काफी समय से बीमार भी चल रहा हूँ। रिश्तों में काफी खटास आगई है अच्छा यही रहेगा आप मेरा मकान छोड कहीं और चले जाओ। इस से रिश्ते भी बचे रहगें और सब शांति से भी रहेंगे। राजकुमारी बोली ये तो मैं भी समझती हूँ और चाहती भी हूँ पर मेरी भी मजबूरी है मेरी आमदनी से अपना खर्च ही बडी मुश्किल से चला पाती हूँ। बस थोडे दिनों की बात है मैं परमानेन्ट होने वाली हूँ (राजकुमारी MCD में दैनिक मजदूरी सफाई कर्मचारी थी) पक्की होते ही चली जाऊँगी। मेरे पति ने कहा चलो ठीक है, अब राजकुमारी को परमानेन्ट हुए भी काफी समय हो गया। मेरे बेटे की शादी का वक्त भी करीब आ रहा था। शादी की तारीख 25-01-2015 थी। मेरे पति ने राजकुमारी से फिर कहा भाभी अब आप परमानेन्ट भी हो गई हो और घर मे शादी भी है। जगह की जरूरत पडेगी, अब तो घर खाली कर दो। वो बोली मैं परमानेन्ट तो हो गई पर मेरे पास अभी पैसों का जुगाड़ नही हो पा रहा है, जगह भी लेनी है और बनाना भी है तुम्हारे पैसे भी देने हैं। थोडा और रुक जाओ जैसे ही पैसों का जुगाड़ होगा मै खुद ही चली जाऊंगी। इस पर मेरे पति ने कहा भाभी मेरे पैसो की फिक्र मत करो जब तुम्हारे पास हो तब दे देना। फिर राजकुमारी ने कहा मुझे जमीन भी तो खरीदनी पडेगी इतने पैसे कहां से लाऊं। अगर मेरे पास जमीन होती तो कहीं ना कहीं से कर्जा लेकर और कुछ पास से मिला कर बना लेती। इतना सुनकर मेरे पति ने कहा भाभी लगता है कि तुम्हारा ईरादा घर खाली करने का नहीं है। राजकुमारी बोली नही तुम गलत समझ रहे हो भगवान कि कसम खा कर बोल रही हूँ। जमीन लेते ही उसे बनाते ही मैं चली जाऊँगी। मेरे पति ने कहा अगर ऐसी बात है तो जैसा कि तुम्हें मालूम है मेरे पास होलम्बी कलाँ अलीपुर नरेला के पास एक प्लॉट खाली पडा है। अगर तुम चाहो तो उसे बनाकर रह लो। जब आपके पास पैसे हो तब दे देना। राजकुमारी बोली मुझे मंजूर है। मेरे पति ने होलम्बी कलाँ अलीपुर नरेला के खाली प्लॉट के कागज राजकुमारी को सौप दिए। इस बात को भी काफी समय हो गय़ा जब मेरे पति ने होलम्बी कलाँ मे रहने वाले अपने दोस्त से जानकारी हासिल की तब उसने बताया राजकुमारी प्लाँट बेचने की कोशिश कर रही है। जनाब हमने इस बारे में अभी कोई बात नहीं की है। अब मुझे ये खबर भी मिली है कि मेरे मकान 443, में रिपेरिगं के नाम पर मेरे घर पर कब्जा करने की साजिश कर रही है। जनाब मुझ गरीब की मदद करें। राजकुमारी के लडके निकेश और रितेश कि हमें जान से मारने की धमकी से हमें हर वक्त एक अजीब सा डर लगा रहता है। मेरे पति बीमार हैं उनकी देख भाल के लिए मेरा छोटा बेटा और जवान लडकी घर पर ही रहती है। वो निकेश और उसके अपराधी किस्म के बदमाशो का सामना नहीं कर पाएंगे कृप्या करके बताए हम क्या करे ।

उषा रानी के पति सतीश कुमार ने अलग से लिखा है-

मेरी उम्र 51 वर्ष के आस पास हो गई है। मेरे पिता का देहांत 1969 में ही हो गया था। तब से ही दूसरे लोग हम बेसहारा लोगों का फायदा उठा रहे हैं। पिताजी के बाद उनकी नौकरी ले ली और हमें भूखा रह कर गुजारा करना पड़ा। हमारी जमीन हड़प ली और जो मकान मेरे पिताजी ने बनवाया उस पर भी आकर रहने लगे। बोले बच्चे छोटे हैं हम इनकी देखभाल करेंगे। बस फिर क्या था एक-एक करके मेरे पिता के नाम जो भी था हड़प लिया। अब एक मकान बचा है जिस में मैं अपने  परिवार के साथ रह रहा हूँ उसपर भी कब्जे की साजिश चल रही है। मैं इंडियन एयर लाईन्स मे अस्थाई हैल्पर लोडर के पद पर सन 2000 से कार्यरत हूँ। ,2008 में मेरा हार्ट का ओपरेशन हुआ तब से भारी कार्य करने की मनाही है। पर काम ना चला जाए इस डर के कारण सब कुछ करना पडा। 2011 में एयर पोर्ट ड्यूटी पर जाते वक्त मैं दुर्घटना का शिकार हो गया, चोट सीने पर ज्यादा आई। ईलाज के दौरान मुझे टी.बी. हो गई जिस वजह से कार्य पर नहीं जा सका। उसके बाद से घर पर ही हूँ। फिर से भूखे रहने की नोबत आ गई तो मेरी पत्नी ने कुछ घरों में सफाई का कार्य करके हमें सम्भाला। पर अब मैं ठीक हूँ और हर कार्य कर सकता हूँ। क्या मैं दुबारा नौकरी पर जा सकता हूँ, क्योंकि हमे कोर्ट के आदेश पर कम्पनी ने रखा है मेरा नाम भी पैनल में है और जो मकान मेरे पिता के नाम है मैं उसी मे रहता हूँ और मेरी चाची के लडके की बहू अपने बच्चो के साथ ऱह रही है मकान को अपने नाम कैसे करा सकता हूँ?  मेरी चाची के लडके की बहू को कैसे निकाल सकता हूँ?

समाधान

प का मकान सतीश कुमार के पिता के नाम है जिन की मृत्यु हो चुकी है। उत्तराधिकार में वह मकान सतीश कुमार को मिल चुका है और उन्हीं की संपत्ति है। उसे अलग से सतीश कुमार के नाम करवाने की जरूरत नहीं है। यदि नगर निगम में मकान का रिकार्ड हो और मकान सतीश कुमार के पिता के नाम लीज पर हो तो नगर निगम में पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र और उन के पुत्र होने व अन्य कोई उत्तराधिकारी न होने की साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए आवेदन प्रस्तुत करने से मकान की लीज सतीश कुमार के नाम हस्तान्तरित की जा सकती है। इस मामले में आप को नगर निगम से जानकारी करनी चाहिए और मकान की लीज को अपने नाम करवा लेना चाहिए।

प के चाचा की बहू अपने बेटों के साथ इसी मकान में रह रही है वह आप की अनुमति से रह रही है, उस का इस मकान पर कोई हक नहीं है। जिस तरह से आप की पत्नी उषा रानी ने लिखा है, वह कोई कार्यवाही किए बिना मकान खाली नहीं करेगी। उस के लिए आप को कानूनी कार्यवाही अदालत में करनी होगी। यदि उस ने कोई किरायानामा लिखा हो तो वह किराएदार हो सकती है। यदि आप उसे कहें कि अब वह नहीं रह सकती यदि रहना है तो उसे किरायानामा लिखना होगा। यदि वह किरायानामा लिख देती है तो आप अपनी जरूरत के आधार पर उस के विरुद्ध किराए का मकान खाली करने का मुकदमा अदालत में कर सकती हैं। यदि किरायानामा न हो कोई किराए की रसीद नहीं हो तो यह माना जाएगा कि वह एक लायसेंसी की हैसियत से मकान में निवास कर रही है। वैसी स्थिति में आप को एक नोटिस दे कर उस का लायसेंस समाप्त करना होगा। लायसेंस समाप्त करने की तारीख के बाद उस के विरुद्ध मकान खाली करने का मुकदमा करना पड़ेगा। इस काम को करने के लिए आप को किसी स्थानीय वकील की सहायता लेनी पड़ेगी। आप किसी स्थानीय वकील से संपर्क करें और पूछें कि क्या किया जा सकता है। उन्हें हमारी राय बताएँ और अपने वकील के बताए अनुसार कार्यवाही करें।

प को कोर्ट के आदेश से नौकरी पर रखा था। लेकिन आप दुर्घटना में घायल होने व बीमार होने से नौकरी पर नहीं जा सके। आप ने नौकरी पर यह सब लिख कर दिया ही होगा कि आप क्यों नौकरी पर नहीं आ पा रहे हैं। अब आप को नौकरी पर न गए समय का दुर्घटना व बीमारी के कारण इलाज और आराम करने का प्रमाण पत्र डाक्टरों से ले कर उन प्रमाण पत्रों के साथ नौकरी पर लिए जाने के लिए अपने नियोजक को आवेदन करना चाहिए। यदि वे नौकरी पर ले लेते हैं तो ठीक है यदि वे नौकरी पर लेने में 10-15 दिन से अधिक लगाते हैं तो आप को श्रम न्यायालय में कार्यवाही करने वाले वकील से संपर्क कर के अपना मुकदमा श्रम विभाग में लगाना चाहिए।

क और समस्या उषा रानी ने बताई है कि चाची की बहू के लड़के आप के व आप के परिवार के साथ मारपीट करने की धमकी देते हैं। उन की रिपोर्ट पुलिस में कराइए और यदि कोई घटना होती है तो तुरन्त पुलिस को सूचित करें। पुलिस यदि कार्यवाही नहीं करती है तो सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर कार्यवाही करें।

गलत सूचना या प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त सेवा से कार्मिक को हटाया जा सकता है।

appointment-letterसमस्या-

शशि साहु ने हल्दवानी, नैनीताल, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

क प्रिंसिपल अनुसूचित जाति के मिथ्या प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी कर रहा है। यह प्रमाण पत्र आरटीआई द्वारा चाही गई सूचना में भी गलत बताया गया है। क्या किया जा सकता है?

समाधान-

दि जिस रिक्त पद पर उस की नियुक्ति की गई है वह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पद है और उस व्यक्ति ने एक मिथ्या प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त कर ली है तो उस का इस तरह नौकरी प्राप्त करना गलत है, उस की नौकरी गलत सूचना और प्रमाण पत्र के आधार पर प्राप्त करने के आधार पर समाप्त की जा सकती है। यह एक दुराचरण भी है जिस के लिए उसे आरोप पत्र दिया जा सकता है और उसे सेवा च्युति का दंड दिया जा सकता है। यह अपराध भी है और उस के विरुद्ध विभाग द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है व अनुसंधान के बाद अपराध प्रमाणित पाए जाने पर उसे दंडित किया जा सकता है। इस तरह की नियुक्ति से अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति का नियुक्ति का अधिकार समाप्त हुआ है।

प इस के लिए उस के नियोजक अधिकारी को लिखित शिकायत करें। यदि आप की शिकायत पर कार्यवाही न हो तो आप उच्च न्यायालय में रिट प्रस्तुत कर के न्यायालय से प्रार्थना कर सकते हैं कि सरकार इस तरह गलत तरीके से नियुक्ति प्राप्त किए हुए व्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर रही है सरकार को निर्देश दिया जाए कि ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध तुरन्त कार्यवाही करे।

बिना लिखित आदेश या नोटिस के बिना सेवा से पृथक किया है तो श्रम विभाग को शिकायत प्रस्तुत करें

retrenchmentसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने जी ने गोलूवाला सिहागन, पीलीबंगा, जिला हनुमानगढ़ राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं उत्तराखंड की एम एण्ड एम लि. फैक्ट्री में 08 मई 2010 , 07 अगस्त 2012 तक इंजन विभाग केकी असेम्बली लाइन और टेस्टिंग में तीन शिफ्टों में रोटेशन में कार्य करता रहा। मुझे बिना नोटिस दिए ट्रेनिंग का हवाला देते हुए सेवा से हटा दिया। इस के पहले मैं 2009 में दो वर्ष की अप्रेंटिसशिप पूरी कर चुका था। मेरे वेतन से पीएफ, ईएसआई के अंशदान की राशि की कटौती होती थी तथा मुझे मकान किराया, वाहन, भोजन व चिकित्सा भत्ते मिलते थे तथा बोनस भी मिला था। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

दि कोई नियोजक किसी व्यक्ति को अपने उद्योग में नियोजित करता है तो एप्रेंटिसेज एक्ट 1961 में पंजीकृत किए गए एग्रीमेंट से नियोजित किए गए प्रत्येक कर्मकार के अलावा सभी कर्मकार उस उद्योग के कर्मकार होते हैं। आप की एप्रेंटिसशिप 2009 में ही पूर्ण हो चुकी थी। उस के बाद आप को उद्योग द्वारा नियोजित कर लिया गया था। इस तरह आप भी उद्योग के कर्मकार थे।

कोई भी नियोजक किसी व्यक्ति को ट्रेनी बताते हुए भी नियोजन दे सकता है लेकिन यह नियोजन भी एक नियमित नियोजन ही होता है। इस तरह के नियोजनों में जो नियुक्तिपत्र होता है उस में अक्सर एक शर्त होती है कि उन्हें किसी निश्चित अवधि के लिए ट्रेनिंग प्राप्त करने के लिए नियोजन दिया जा रहा है, ट्रेनिंग समाप्त होने के पश्चात कर्मकार का नियोजन स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। यदि किसी कर्मकार के नियुक्तिपत्र में ऐसी कोई शर्त होती है तो वह अवधि या नियत तिथि आते ही कर्मकार का नियोजन वैधानिक रूप से समाप्त हो जाता है। ऐसा नियुक्तिपत्र कर्मकार को दिया जाना चाहिए पर अक्सर नियोजक अपने कर्मकार को ऐसे नियुक्ति पत्र की प्रतिलिपि प्रदान नहीं करता केवल नियोजन देते समय उस पर कर्मकार से हस्ताक्षर करवा कर अपने पास रख लेता है। ट्रेनिंग की निर्धारित अवधि समाप्त होने पर या निश्चित तिथि के उपरान्त ऐसे कर्मचारी को सेवा से हटा दिया जाता है। ऐसी सेवा समाप्ति को चुनौती नहीं दी जा सकती।

प के मामले में यदि आप के नियुक्ति पत्र में सेवा समाप्ति की कोई तिथि या नियोजन की कोई निश्चित अवधि अंकित है और आप को उस निश्चित अवधि समाप्ति के दिन अथवा उस निश्चित तिथि को सेवा से हटाया गया है तो आप के पास ऐसी सेवा समाप्ति को वैधानिक रूप से चुनौती देने का कोई मार्ग नहीं है। लेकिन यदि आप को ऐसी निश्चित अवधि समाप्त होने की तिथि के अथवा निर्धारित तिथि के कुछ दिनों के बाद सेवा से हटाया गया है तो आप अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती दे सकते हैं।

हो सकता है आप को पता ही नहीं हो कि आप का नियुक्ति पत्र कैसा है या फिर उस में इस तरह की कोई शर्त है या नहीं है। ऐसी स्थिति में आप जिस क्षेत्र में उक्त उद्योग स्थित था उस क्षेत्र के श्रम विभाग के कार्यालय में एक आवेदन प्रस्तुत करें कि आप को दो वर्ष तीन माह की सेवा के बाद बिना किसी नोटिस, नोटिस वेतन या छंटनी का मुआवजा अदा किए बिना या ऑफर किए बिना सेवा से हटा दिया गया है जो कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ के प्रावधानों की पालना नहीं किए जाने के कारण उचित एवं वैध नहीं है। आप को पिछले पूरे वेतन व अन्य सुविधाओँ के साथ सेवा में रखवाया जाए। आप अपनी शिकायत प्रस्तुत करने के सबूत के रूप में एक प्रति पर श्रम विभाग से प्राप्ति स्वीकृति के हस्ताक्षर करवा कर मुहर अवश्य लगवा लें। श्रम विभाग आप की शिकायत को दर्ज कर के आप के नियोजक से इस शिकायत का उत्तर मांगेगा। यदि नियोजक उत्तर देता है तो आप की शिकायत और नियोजक के उत्तर के आधार पर श्रम विभाग को कोई औद्योगिक विवाद दिखाई पड़ता है तो वे आप दोनों के बीच कोई समझौता कराने का प्रयत्न करेंगे, समझौता न होने पर आप के विवाद को श्रम न्यायालय को भेजे जाने के लिए राज्य सरकार को रिपोर्ट भेज देंगे।

क्त शिकायत किए जाने के दिन से 45 दिनों के भीतर श्रम विभाग उक्त कार्यवाही पूर्ण कर के कोई नतीजा देता है तो ठीक है अन्यथा आप शिकायत की प्राप्ति स्वीकृति वाली प्रति के साथ सीधे श्रम न्यायालय को अपना विवाद प्रस्तुत कर सकते हैं जिसे राज्य सरकार द्वारा प्रेषित रेफरेंस की तरह श्रम न्यायालय द्वारा निर्णीत किया जाएगा। चूंकि मामले में कानूनी बिन्दु बहुत महत्व के हैं इस कारण से श्रम कानूनों के जानकार और इस तरह का काम करने वाले किसी ट्रेडयूनियन के पदाधिकारी या किसी वकील की मदद लेना आप के लिए हितकर होगा।

अविश्वसनीय नियोजक के यहाँ एक दिन भी नौकरी करना ठीक नहीं।

No employmentसमस्या-
आगरा, उत्तर प्रदेश से अजय गुप्ता ने पूछा है –

मैं 8  महिने पहले आगरा की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था, जिस में मेरी सेलरी 11,500/- थी। वहाँ पर काम करते हुए मेरे पास एक दूसरी कंपनी से ऑफर आया, जहाँ मेरी सेलरी 12000/- तय की गयी और कंपनी के चार्टर्ड अकाउंटेंट के द्वारा मुझसे यह बोला गया कि 3 महीने के बाद हम आपकी सेलरी बढ़ा देंगे। मैं ने वह कंपनी जोइन कर ली। लेकिन मेरा वहाँ किसी भी प्रकार का रेजिस्ट्रेशन नही हुआ और न ही मुझे अपायंटमेंट लेटर दिया गया। मुझे दूसरी वाली कंपनी में काम करते 8 महीने हो चुके हैं, मेरा किसी भी प्रकार का इन्क्रिमेंट नहीं हुआ। मैं वहाँ पर बहुत अच्छी तरह से काम कर रहा हूँ। मैं ने कंपनी के सी.ए. से सेलरी मे इनक्रिमेंट की बात की तो उन्हों ने बोला कि नये नये लड़के 8000 से 10000 रुपये में आ रहे हैं। इसलिए आपका इन्क्रीमेंट नहीं होगा। अब मुझे कंपनी के अकाउंटेंट और चार्टर्ड अकाउंटेंट के द्वारा काम नहीं दिया जा रहा है और डेली कोई ना कोई बहाना बताकर कंपनी छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कंपनी के मालिक कंपनी में नहीं बैठते कंपनी को सिर्फ़ कंपनी का चार्टर्ड अकाउंटेंट ही ऑपरेट करता है। मुझे क्या करना चाहिए जिससे मुझे काम भी मिले ओर सेलरी भी बढ़े।  कृपया जल्द ही रास्ता बताएँ।

समाधान –

प ने केवल पाँच सौ रुपए की बढ़ौतरी के लिए पुरानी कंपनी छोड़ कर गलती की है। पाँच सौ रुपए प्रतिमाह की बढ़ोतरी ऐसी नहीं कि जिस के लिए कोई पुरानी नौकरी छोड़ी जाए। तीन माह बाद आप का वेतन बढ़ाने की बात भी मौखिक झाँसा मात्र ही था। आप को कोई नियुक्ति पत्र भी नहीं दिया और न ही इस बात का सबूत आप के लिए छोड़ा है जिस के आधार पर आप यह कह सकें कि आप कब से उस कंपनी में काम कर रहे हैं।

वास्तव में हुआ यह है कि कंपनी को उस समय काम करने वाले नहीं मिल रहे थे। उन्हों ने आप को झाँसा दे कर आप की नौकरी छुड़वा दी और काम निकाल लिया। अब उन्हें नए लड़के कम वेतन पर मिल रहे हैं तो वे आप को अधिक वेतन दे कर क्यों काम पर रखेंगे? आप का सेवा काल भी अभी इस कंपनी में इतना नहीं हुआ है कि उन्हें आप को सेवा से अलग करने के लिए कोई नोटिस और मुआवजा आदि देना पड़े। आप के काम की शर्तें भी तय नहीं हैं।

वे आप को काम पर नहीं ले रहे हैं इस का सीधा अर्थ यही है कि उन्हों ने आप को काम से अलग कर दिया है। ऐसे अविश्वसनीय नियोजक के यहाँ एक दिन भी नौकरी करना बेकार है। बेहतर यही है कि जितने दिन आप ने वहाँ काम किया है उस का वेतन ले कर उस कम्पनी को आप खुद छोड़ दें और कोई बेहतर नौकरी तलाश करें। इस बार नियुक्ति पत्र भी प्राप्त करें और शर्तें भी लिखित में तय कर लें। इस संस्थान से लड़ कर भी आप को कुछ नहीं मिलेगा।

नौकरी प्राप्त करने के समय नियोजक को गलत सूचना देना या महत्वपूर्ण तथ्य छुपाना गंभीर दुराचरण है।

समस्या-

भोपाल, मध्य प्रदेश से रमेश कुमार ने पूछा है-

मैं शासकीय कार्यालय में नौकरी करता हूँ।  एक माह पहले एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी  के पद पर मेरी नियुक्ति हुई है।  अब उस का पुलिस सत्यापन चल रहा है।  कोई छह वर्ष पूर्व मुझ पर गेम्बलिंग एक्ट की धारा-13 के अंतर्गत 100-150 रुपए का जुर्माना हुआ था।  पिछले छह वर्ष में मेरा रिकार्ड बिलकुल साफ रहा है। तो क्या मुझे इस आधार पर नौकरी से हटाया जा सकता है?

समाधान-

employmentहाँ सेवा नियम की कोई बात नहीं है। समस्या ये है कि किसी भी नौकरी के समय जो आवेदन मांगा जाता है उस में पूछा जाता है कि आप के विरुद्ध कोई अपराधिक मुकदमा तो नहीं चला है? या नहीं चल रहा है? या किसी भी अपराधिक मुकदमे में कोई सजा तो नहीं हुई है? यदि हाँ तो उस का विवरण दें।  आम तौर पर नौकरी चाहने वाला व्यक्ति नहीं में इस का उत्तर दे देता है, जिस का अर्थ यह है कि उस के विरुद्ध कभी कोई अपराधिक मुकदमा नहीं चला है और न ही चल रहा है और उसे कभी दंडित नहीं किया है।

नौकरी के बाद में पुलिस सत्यापन में या कभी भी किसी सूचना के आधार पर यह पता लगता है कि कर्मचारी  के द्वारा दी गई उक्त सूचना गलत थी।  तो ऐसी स्थिति में कर्मचारी पर इस दुराचरण का आरोप लगता है कि उस ने अपने नियोजक को मिथ्या सूचना दे कर या महत्वपूर्ण तथ्य छुपा कर नौकरी प्राप्त की है।

हाँ मामला इस बात का नहीं है कि कर्मचारी के विरुद्ध मामला कितना गंभीर या अगंभीर था। मामला यह बनता है कि कर्मचारी पर यह विश्वास किया था कि उस ने जो सूचनाएँ अपने बारे में नियोजक को दी थी वे सही होंगी।  लेकिन वे गलत निकली और इस तरह कर्मचारी ने नियोजक के विश्वास को तोड़ा। इस तरह के मामलों में कर्मचारी को सेवा से मुक्त भी किया जा सकता है, यदि वह प्रोबेशन पर है तो उस का प्रोबेशन समाप्त होने पर उसे नौकरी से हटाया जा सकता है  या फिर उसे कोई मामूली दंड दे कर नौकरी पर भी रखा जा सकता है।

ह भी सोचा जा सकता है कि यदि पुलिस किसी तरह वेरीफिकेशन में इस तथ्य को कार्यालय के सामने न रखे तो उस की नौकरी बची रहेगी।  लेकिन जब भी यह मामला नियोजक के सामने आएगा तब वह कर्मचारी को आरोप पत्र दे कर जाँच कर के दंडित कर सकता है और उपरोक्त कोई भी दंड दे सकता है। ऐसे मामलों में बेहतर यही है कि पुलिस वेरीफिकेशन को आने दिया जाए। उस के बाद नियोजक को निर्णय लेने दिया जाए। यदि निर्णय कर्मचारी के विरुद्ध जाता है तो वह उसे न्यायालय या सेवा अधिकरण के समक्षघ चुनौती दे सकता है।

फर्जी और धोकेबाज कंपनियों से सावधान रहें।

समस्या-

कर्णाटक, बैंगलोर से श्वेता शर्मा पूछती हैं –

मैं एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत हूँ। 2 महीने पहले मैंने साउथ अफ्रीका स्थित एक कंसल्टेंसी में अपनी योग्गता के अनुसार एक रिक्तता देख कर आवेदन किया।  उस कंसल्टेंसी के एक कर्मचारी ने मुझे ईमेल के द्वारा एक ऑनलाइन टेस्ट देने को कहा।  वो टेस्ट मैंने क्लियर किया।  उसके कुछ दिनों बाद एक टेलीफोनिक इंटरव्यू हुआ जिस में मैंने डायरेक्ट क्लाइंट को इंटरव्यू दिया।  अब कंसल्टेंसी ने मुझे नियुक्ति पत्र भेज दिया है और उन्हों ने मुझे अपने सारे शेक्षिक दस्तावेजों की स्कैन कॉपी देने को कहा है और PCC सर्टिफिकेट भी जो पासपोर्ट सेवा केंद्र से मिलता है।  मेरी समस्या ये है कि जब मैंने उनसे TAN देने को कहा तो कम्पनी ने अभी तक कोई उत्तर नहीं दिया है नाही कोई Enterprise Reg No. दिया है।  मुझे लगता है ये कंपनी लीगल नहीं है।  मैं इसके खिलाफ शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज सकती हूँ?

समाधान-

स कंपनी के साथ आप का अब तक का जो व्यवहार हुआ है वह इंटरनेट के माध्यम से ही हुआ है। कंपनी जो कुछ कर रही है वह जहाँ जिस देश में स्थित कंम्प्यूटर के उपयोग से यह सब कर रही है, उस के विरुद्ध कार्यवाही उसी देश में उसी स्थान पर क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायालय या कार्यालय को की जा सकती है।  इस तरह के मामलों में कार्यवाही करना असंभव जैसा होता है। इस कारण से इस तरह के मामलों में सावधान रहना चाहिए और इस तरह के संस्थानों से किसी तरह का कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए।

प को यदि लगता है कि कंपनी फर्जी है या किसी कपट में संलग्न है तो बेहतर यह है कि आप इस कंपनी से किसी तरह का व्यवहार न करें।  इंटरनेट पर ऐसी साइटस् आप को मिल जाएंगी जिस से आप यह जान सकती हैं कि यह कंपनी फर्जी है या किसी तरह के कपट में संलग्न है अथवा नहीं।

अधिवक्ता बार कौंसिल की अनुमति से अंशकालिक नौकरी कर सकता है

समस्या-

सिरसा, हरियाणा से रामसिंह ने पूछा है-

मैं एक अधिवक्ता (एडवोकेट) हूँ।  मैं बी.ए., एलएल.बी., बी.एड. आदि डिग्रीधारी हूँ। क्या मैं बार कौंसिल में अपना एनरॉलमेंट होते हुए भी एक अध्यापन का अनुभव प्राप्त करने के लिए अध्यापक के रूप में काम करने के लिए अपनी बी.एड. की डिग्री किसी स्कूल में प्रस्तुत कर सकता हूँ?

समाधान-

प एक अधिवक्ता के रूप में बार कौंसिल में अपना एनरॉलमेंट बनाए रखते हुए न केवल अपनी बी.एड. की डिग्री किसी स्कूल में प्रस्तुत कर सकते हैं, वहाँ नियोजन के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और साक्षात्कार भी दे सकते हैं। लेकिन यदि आप को किसी स्कूल में पूर्णकालिक नौकरी के लिए प्रस्ताव प्राप्त होता है तो आप वह स्वीकार नहीं कर सकते।  लेकिन कोई अंशकालिक नौकरी का प्रस्ताव आप अपने राज्य की बार कौंसिल की अनुमति प्राप्त करने के उपरान्त स्वीकार कर सकते हैं।

बार कौंसिल की राय में यदि वह पाती है कि इस अंशकालिक नौकरी का आप के अधिवक्ता के रूप में किए जाने वाले प्रोफेशनल कार्य के साथ कोई टकराव नहीं है और आप के प्रोफेशनल सम्मान को उस नौकरी से कोई आँच नहीं आएगी तो कुछ उचित निर्देशों के साथ राज्य बार कौंसिल एक अधिवक्ता को ऐसी नौकरी करने के लिए अनुमति प्रदान कर देगी।

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