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पुश्तैनी संपत्ति में हिस्से का दावा

समस्या-

विक्रान्त सिंह ने इटावा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे गांव में हमारा पुस्तैनी घर है। चूँकि हमारे बाबा शहर रहने लगे तो गंव वाले घर और खेती पर ध्यान ही नहीं दिया। अब बाबा और पिताजी के गुजरने के बाद हम अपने गांव के घर पर दावा करना चाहते हैं। लेकिन हमारे पास उस घर और खेती के कोई दस्तावेज़ भी नहीं हैं और जो परिवार के लोग है वहां हैं वो लोग कोई हेल्प नहीं कर रहे। उन्होंने उन सब पर कब्ज़ा कर रखा है। कृपया उचित सलाह दें कैसे हम उस घर और खेती को वापस पा सकते हैं।

समाधान-

आम तौर पर जिस स्थायी संपत्ति पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो गया हो और किसी ने इस अवधि में उस पर अपना मालिकाना हक का दावा न किया हो तो उस संपत्ति पर कब्जेदार का प्रतिकूल कब्जा हो जाता है। कब्जा प्राप्त करने का दावा करने की अवधि  आप से कब्जा छिनने से 12 वर्ष की अवधि होने के कारण इस प्रतिकूल कब्जे को वापस लेना संभव नहीं होता। लेकिन यदि संपत्ति पुश्तैनी हो जिस का विभाजन न हुआ हो और परिवार का ही कोई हिस्सेदार उस संपत्ति पर काबिज हो तो यह माना जाता है कि संपत्ति के सभी हिस्सेदारों का उस पर कब्जा है और कोई भी हिस्सेदार उस संपत्ति पर अपने हिस्से को अलग कराने के लिए वाद संस्थित कर सकता है।

 आप अपनी संपत्ति  को पुस्तैनी बता रहे हैं इस कारण आप का उस में हिस्सा हो सकता है। आपने खेती की जमीन का उल्लेख किया है। खेती की जमीन के सभी रिकार्डिस आजकल ऑनलाइन देखे जा सकते हैं।  आप पहले पता कीजिए कि आप के परिवार के अन्य लोग जिन्हों ने खेती और  मकान पर कब्जा कर रखा है वे किन खसरा नंबरों की जमीन पर काबिज हैं। फिर उन खसरा नंबरों को रिकार्ड में तलाश कीजिए।इस से पता लग जाएगा कि वे जमीनें किस किस के नाम हैं। बाद में उन खसरा नंबरों का उस वक्त का रिकार्ड तहसील या आप के गाँव की तहसील के रिकार्डरूम में जा कर तलाश कीजिएगा। इस संबंध में उस तहसील में काम करने वाले राजस्व मामलों के वकील और उन के मुंशी  आप की मदद कर सकते हैं।

एक बार आप को यह पता लग जाए कि आप की जमीन पूर्व में आप के किस पूर्वज के नाम थी और आप के बाबा का उस में क्या हिस्सा था। तब आप अपने बाबा के वंशज होने के आधार पर जमीन के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं, उसी के आधार पर मकान में अपने हिस्से के लिए मकान के बंटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। यही आप के लिए तथा आप जैसे लोगों के लिए एक मात्र रास्ता है।

कानून के उल्लंघन पर अदालत के चक्कर काटना लाजमी है।

समस्या-

वनराजसिंह चौहण ने धामतवाण दश्कोई, अहमदाबाद से पूछा है-


मेरे दादाजी के पास 2 ऐकर पुश्तैनी जमीन है। दादाजी को 7 संतान हैं। 4 लडके 3 लड़कियाँ है। लडकियों की शादी हो चुकी है। दादाजी का ही पूरे 2 ऐक़ड़ में नाम है। वो जमीन दादाजी ने पैसे ले कर बेचदी है। कबजा भी दे दिया है। पैसा भी सब मिल गया है। दादाजी की 3 में से 1 लडकी ने सिविल कोर्ट में 2005 के उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन एक्ट के तहत हिस्सा मांगा है। दादाजी को कोर्ट के चक्कर काटने पड़े हैं। और जमीन का पैसा चारों लडकों को दे दिया है। इसका समाधान बताइए।

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन को अस्तित्व में आए 13 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। अभी तक भी यदि उसे लागू करने की इच्छा इस अधिनियम के अंतर्गत हिन्दू शब्द की परिभाषा में आने वाले तमाम समाजों में सहदायिक/ पुश्तैनी संपत्ति में पुत्रियों को पुत्रों के समान हिस्सा देने की मानसिकता नहीं बनी है और वे अपनी इच्छा से लड़कियों को दूसरे तरीकों से संपत्ति से वंचित करने की कोशिश करेंगे तो ये दिन तो देखने को मिलेंगे।

आप के दादाजी ने काम ही ऐसा किया है कि उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़ें। कोई भी व्यक्ति यदि कानून के विरुद्ध या उस के उल्लंघन में कोई काम करेगा तो उसे कभी भी और कितने भी समय तक के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ सकते हैं। चक्कर तो उसे भी काटने पड़ेंगे जिस ने दादाजी से यह माल खरीदा है। चूंकि हिस्सा मांगा है इस कारण से चारों पुत्रों और दो दूसरी पुत्रियों को भी अदालत का मुहँ देखना पड़ रहा होगा।

आप के दादाजी ने उस पुश्तैनी संपत्ति को बेच कर जो धन प्राप्त किया है वह भी सहदायिक संपत्ति है जो अब चारों भाइयों के पास है। इस कारण आप की बहिनें चारों भाइयों और दादाजी के विरुद्ध जमीन में या विक्रय से प्राप्त धन से अपना हि्स्सा मांग सकती हैं।

अब तो इस का एक ही रास्ता है। चारों भाई मिल कर तीनों बहिनों को मनाएँ और कहें कि वे उन्हें उनके हिस्से के बदले नकद धन देने को तैयार हैं। तीनों बहिनों को बिठा कर बात करें और एक समझौते पर पहुँचें जिस में तीनों बहिनें यह लिख कर देने को तैयार हों कि उन्हें जमीन बेचने से प्राप्त धनराशि में से उन के हिस्से की धनराशि मिल गयी है और अब इस मुकदमे को वे नहीं चलाना चाहती हैं। यह समझौता अदालत में पेश हो और इस के अनुसार अदालत अपना निर्णय पारित कर यह फैसला दे कि सभी उत्तराधिकारियों को उन का हिस्सा मिल चुका है। तभी इस विवाद से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों को अधिकार

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

सुमन ने सोनीपत हरियाणा से पूछा है-

मैं 45 साल की विवाहित महिला हूँ। हम दो भाई व दो बहनें हैं।  मेरे पिता जी जीवित हैं। मेरे पिता के नाम गाँव कुण्डली में 20 एकड़ जमीन है जो कि मेरे पिता जी को मेरे दादा जी व दादा जी को उनके पिता जी से तथा आगे उनके पिता जी से उत्तराधिकार में मिली थी। ये पुश्तैनी जमीन है।  मैंने मेरे पिता जी व भाईयों को छ: साल पहले दस लाख रुपये उधार दिए थे। एक साल पहले मैंने मकान खरीदना था तब मैंने पिता जी व भाईयों से रुपये लौटाने को कहा तो उन्होंने मेरे रुपये देने से मना कर दिया तथा अब बोलचाल भी बन्द कर दी है। मेरे पति मुझे रुपये लाने को कहते है । परन्तु मैं मजबूर हूँ।  मैं बहुत दु;खी रहती हूँ। क्या पुश्तैनी जमीन में मेरा हिस्सा है?  यह जानना चाहती हूँ कि क्या मैं पिता के जीवित रहते पुश्तैनी जमीन में से मेरे हिस्से की जमीन ले सकती हूँ? मुझे क्या करना होगा तथा मुझे कितना हिस्सा मिल सकता है?  क्या मेरे पिता जी पुश्तैनी सारी जमीन मेरे भाईयों के नाम कर सकते है? कृपया उचित कानूनी सलाह दें।

समाधान-

दिनांक 09.09.2005 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के प्रभावी होने के पूर्व पुत्रियों को पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार नहीं था। किन्तु उक्त तिथि से सभी पुत्रियों को पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में उसी तरह अधिकार प्राप्त हो गया है जैसे कि पुत्रों को प्राप्त है। उक्त तिथि के उपरान्त जन्म लेने वाली पुत्रियों को यह अधिकार जन्म लेने के समय ही प्राप्त होने लगा है।

उक्त अधिनियम के अनुसार आप को भी अपने पैतृक परिवार की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति में दिनांक 09.09.2005 से ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, अब आप भी उस सहदायिकी की एक सदस्य हैं। और आप अपने हिस्से को अलग करने की मांग कर सकती है। यदि उक्त तिथि के बाद सहदायिकी का कोई हिस्सा सहदायिकी से अलग किया गया हो तो उस में भी आप का अधिकार था।

आप तुरन्त बँटवारा कराने तथा अपना पृथक हिस्सा व उस पर कब्जा प्राप्त करने के लिए तुरन्त बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

भूमि/ संपत्ति विवादों में पहले जानें की वह पुश्तैनी है या नहीं।

rp_land-demarcation.jpgसमस्या-

संजीव कुमार ने समस्तीपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पास 20 कट्ठा पुश्तैनी भुमि है, जो मेरे स्व0 दादाजी (मृत्यु वर्ष 1975) की स्वअर्जित संपत्ति है। मेरे स्व. पिताजी (मृत्यु वर्ष 2003) एंव मेरी बुआ अपने ससुराल में अभी जीवित है। मेरे पिताजी का एक पुत्र मैं स्वंय एंव चार विवाहित पुत्रियॉँ हैं। साथ ही मेरी एक विधवा मॉं भी है जो सरकारी पेंशनधारी महिला है। जब 16 अक्टूबर, 2015 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘‘प्रकाश वर्सेस फुलावती‘‘ एंव अन्य मामलों के संज्ञान में यह निर्णय सुनाया गया कि जिन के पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 से पहले हो गई है उनकी बेटियों को पिता की पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा नहीं मिलेगा।‘‘ सर्वोच्च न्यायालय के उक्त फैसले के बाद मेरे दादाजी की पुश्तैनी भुमि में मेरा, मेरी चार विवाहित बहनों, मेरी बुआ एंव मेरी विधवा माँ की क्या हिस्सेदारी होगी, जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु वर्ष 2003 में ही हो गई थी?

 

समाधान-

प की यह भूमि पुश्तैनी नहीं है। 17 जून 1956 के पूर्व किसी हिन्दू पुरुष को अपने तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति ही पुश्तैनी है। 17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हो गया और उस समय तक जो स्वअर्जित संपत्तियाँ थीं उन का उत्तराधिकार इस अधिनियम की धारा 8 के अनुसार होने लगा। इस अधिनियम से उत्तराधिकार मिलने पर कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। हिस्से पर जिस का स्वामित्व स्थापित होता है वह उस की निजी संपत्ति होती है। उस में पुत्र पौत्र आदि का कोई अधिकार नहीं है। उस का उत्तराधिकार उस हिस्सेदार की मृत्यु पर खुलता है।

प की भूमि दादा जी की स्वअर्जित थी। उन का देहान्त 1975 में हुआ। इस तरह आप के पिता व बुआ दोनों 50-50 प्रतिशत भूमि के हिस्सेदार हुए। आप के पिता जी का देहान्त 2003 में हुआ। इस समय 20 प्रतिशत अर्थात 10 कट्ठा जमीन पर उन का स्वामित्व था। इस समय माँ व चार बहनों सहित आपके पिता के आप छह उत्तराधिकारी थे इस कारण आप का इस जमीन पर 1/6 हिस्सा हुआ। आप का अधिकार सिर्फ 10/6 कट्ठा जमीन पर है।

प्रकाश बनाम फूलवती के मामले का निर्णय उन संपत्तियों के संबंध में है जो 1956 के पूर्व ही पुश्तैनी संपत्ति थीं। वह आप के मामले में प्रभावी नहीं होगा।

पिताजी के भले के लिए उन्हें कैसे भी समझाएँ, जरूरत हो तो कानून की मदद लें …

20130504_173009समस्या-

कृष्ण पाल ने इन्दौर,मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को मेरे दादा जी से सात एकड़ जमीन (उत्तराधिकार में) मिली है जो कि पुश्तैनी है। वे रीवा (मध्यप्रदेश) जिले के गाँव में अकेले रहते हैं। मेरे पिताजी की आयु 80 बरस है। उन्हें मैं अपने पास इन्दौर ले आया हूँ। मैं यहाँ अपने फ्लेट में रहता हूँ। मेरी माताजी का देहांत हो चुका है। गाँव के खुले वातावरण के स्थान पर यहाँ के भीड़ भरे माहौल तथा फ्लेट के बंद वातावरण में घुटन महसूस करते हैं और कहते हैं कि मुझे कहाँ जेल में ले आए हो। मुझे गाँव में ही छोड़ दो। मैं उन्हें गाँव में भी अकेले नहीं छोड़ सकता। उन्हें भूलने की बीमारी है, आधे घंटे पहले की बात भी याद नही रहती। मेरी 2 बहनें हैं। यह भी कहते हैं कि गांव की जमीन बेच दूंगा तो मेरा काम चल जाएगा। उन्हों ने जमीन पर ऋण ले रखा था उसे मैंने पैसा भेज कर चुकाया है। मेरी सारी बचत उसी में लग गई है। पिताजी को गाँव भेजना ही पड़े तो वे जमीन न बेच दें इसके लिये क्या किया जा सकता है?

समाधान-

प की समस्या कानूनी कम है और सामाजिक अधिक है। पिताजी गाँव के वातावरण में रहने के आदी हैं। निश्चित रूप से फ्लेट में घुटन महसूस करते होंगे। उन्हें कुछ समय खुले में बिताने का अवसर मिलना चाहिए। आप की सोसायटी में कुछ बुजुर्ग हों तो उन के साथ उन का साथ बन जाए तो उन्हें कुछ खुलापन मिल सकता है। इस के लिए आप को प्रयत्न करने होंगे। उन्हें स्थानीय बुजुर्गों से मिलाया जाए। हर सोसायटी में बुजुर्ग कोई न कोई स्थान ऐसा निकाल लेते हैं जहाँ वे दिन के समय आपस मिलते हैं बातचीत करते हैं और कुछ खेलते वगैरा भी हैं। यदि आप की सोसायटी में ऐसा नहीं है तो बुजुर्गों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए। आप इस पर काम करें। आप पिताजी को इस बारे में बताएंगे तो उन्हें अच्छा लगेगा। वे भी इस में मदद करेंगे।

प की जमीन यदि पुश्तैनी है तो वह केवल पिताजी की नहीं है। फिर उस में आप की व्यक्तिगत कमाई का धन लगा है। आप अपने पिताजी से कह सकते हैं कि जमीन की बाजार कीमत यदि 10 लाख है और उस में पाँच लाख का कर्ज आप ने चुकाया है तो उस की वास्तविक कीमत केवल पाँच लाख या इस से भी कम की है क्यों कि आप के लगाए धन का ब्याज भी तो जुड़ेगा। इस कारण उस की कीमत इस से भी कम रह गई है। फिर पुश्तैनी होने के कारण वह केवल उन की नहीं है उस में आप का और बहनों का भी हिस्सा है। उन से कहें कि वे यदि जमीन बेचना चाहें तो शौक से बेचें लेकिन पहले तो उन्हें आप तथा आप की बहनों से सहमति लेनी होगी। दूसरे जमीन को बेचने से जो धन मिलेगा उस में से पहले आप का धन लौटाया जाए, फिर शेष में से आप का और बहनों का हिस्सा दिया जाए और फिर जो शेष बचेगा वह पिताजी ले लें। यदि गाँव की जमीन बेच देंगे तो गाँव में रहने का कोई कारण भी शेष नहीं रहेगा। उन्हें फिर आप के पास रहना होगा। आप की बहनों से भी पहले आप बात करें जिस से वे भी उन्हें समझाएँ। उन का गाँव जा कर अकेले रहना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है यह बात आप उन्हें समझा सकते हैं। हमें लगता है वे समझ जाएंगे।

दि फिर भी न समझें तो आप उन्हें यह भी कह सकते हैं कि जितनी जमीन है उस की बाजार कीमत तय कर लें। आप का धन जितना लगा है उतनी जमीन अलग कर दें शेष जमीन के हिस्से चार हिस्से बना लें जिस में से केवल एक हिस्सा उन का होगा। इस तरह चारों के हिस्से हो जाने पर बँटवारा रजिस्टर्ड कराएँ और जो उन का अपना हिस्सा हो उसे विक्रय कर दें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो आप अदालत जा कर जमीन का कोई भी हिस्सा बेचने पर स्टे लाएंगे। इतनी सारी मुसीबतें जान जाने के बाद आप के पिताजी गाँव जाने की जिद त्याग देंगे। लेकिन आप को चाहिए कि उन के अनुकूल कुछ वातावरण यहाँ भी बनाएँ, जिस में वे कुछ खुली साँस ले सकें। इस उम्र में पिताजी का आप से अलग अकेले रहना किसी भी हालत में ठीक नहीं, आप को उन्हें साम, दाम, दण्ड, भेद सभी तरीकों से समझा कर अपने पास रखना होगा।

आप की संपत्ति पुश्तैनी या सहदायिक नहीं, उस में पुत्र-पुत्रियों का कोई अधिकार नहीं है।

Farm & houseसमस्या-

प्रीतम सिंह ने गाँव नारायणगढ़, तह. नरवाना, जिला जीन्द, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरे (प्रीतम सिंह उम्र 65वर्ष) दो पुत्र व दो पुत्री हैं जो सभी शादीशुदा हैं। मेरे पास 4 एकड़ 2 कनाल अर्थात् 34 कनाल खेत की ज़मीन और लगभग 7-8 मरले घर की ज़मीन है जो रजिस्ट्री की है। ये सब मुझे मेरे पिता से प्राप्त हुई थी। जो मेरे पिता ने 55-60 साल पहले खुद ही खरीदी थी। मेरे पिता का देहांत जुलाई 2002 में हो गया था। एक कनाल मेरी पंजाब में है जो मैंने 22 साल पहले खुद खरीदी थी। अक्टूबर 2005 में परिवार व् गाँव के मौज्जिज व्यक्तियों ने मेरे खेत का बँटवारा तीन हिस्सों में किया था। जिसमें एक हिस्सा(11कनाल) मेरे बड़े पुत्र परमजीत को और एक हिस्सा(11कनाल) मेरे छोटे पुत्र राजबीर को और शेष बचा एक हिस्सा (12कनाल) मुझे दी गई थी। घर दोनों पुत्रों को आधा-आधा दिया गया और ये कहा गया कि आगे से जो भी साझा खर्च आएगा वो सबको बराबर देना होगा। मुझे छोटे पुत्र के पास रहने को कहा गया। जो मुझे कर्ज (2 लाख 25 हजार रूपये की देनदारी) थी वो भी तीन हिस्सों में बराबर बाँट दी गई थी। बड़े पुत्र के हिस्से में 75000 रूपये की देनदारी (कर्ज) आया। उस के पास उस समय 75000 रुपये देने के लिए नहीँ थे तो उसको मौजिज व्यक्तियों ने कहा कि कर्ज के बदले तुम खेत की ज़मीन को मई 2011 तक 6 साल के लिए अपने पिता के पास छोड़ दो। वह इसके लिए मान गया और यह फैसला लिखा भी गया जो आज भी मेरे पास है। इसमें मेरी दोनों पुत्रियों को कुछ भी नहीं दिया गया। परन्तु परमजीत ने मुझसे जबरदस्ती ज़मीन मई 2009 में वापिस ले ली। उसने न ही मुझे रूपये दिए। वह मुझे तीसरे हिस्से का साझा खर्च भी नहीं देता। इसके बावजूद भी वह मेरे साथ झगड़ता रहता था। फिर मई 2012 में भी उसने मेरे साथ झगड़ा किया और मेरे व मेरे छोटे पुत्र राजबीर पर परमजीत ने मारपीट व उसकी पत्नी ने छेड़ छाड़ का झूठा केस कर दिया। फिर परिवार, रिश्तेदारों व गाँव के मौज्जिज व्यक्तियों ने हमारा समझौता करा दिया और लिख भी दिया जो कि इस प्रकार था:- खेत तो पहले की तरह तीन हिस्सों में ही रहेगा। घर सारा छोटे् पुत्र राजबीर के पास रहेगा। पंजाब वाली 1 कनाल में बड़े पुत्र परमजीत को जितनी घर के हिस्से में आती थी वो देकर शेष दोनों पुत्रों को आधी आधी दी गई। और बड़े पुत्र परमजीत का जो घर वाली ज़मीन में जो कमरा था उसकी क़ीमत 30000 रूपये लगाई गई और छोटे पुत्र राजबीर ने ये 30000 रूपये बड़े पुत्र परमजीत को दे दिए। लेकिन परमजीत ने वो कमरा अब तक भी खाली नहीं किया। अगर मैं या मेरा छोटा पुत्र उसे खाली करने के लिये कहते तो वह सुसाइड करने की धमकी दे देता है। छोटे पुत्र ने घर में जो बड़े पुत्र वाला हिस्सा आया था उसने खाली पड़ी जगह की मरम्मत कर ली और उस में मिटटी डलवा ली। जिसमे उसके लगभग 50000 रूपये लग गए। मेरा बड़ा पुत्र ये फैसला होने के बाद भी मेरे साथ मारपीट व झगड़ा करता रहता था। मेरा बड़ा पुत्र परमजीत मेरे कहने सुनने से बाहर था। वह मेरे और मेरे परिवार के साथ बार बार झगड़ा करता रहता था। जिससे तंग आकर मैंने बड़े पुत्र परमंजीत और उसकी पत्नी को अपनी चल अचल सम्पति से बेदखल कर दिया और इसकी सार्वजनिकता मैं ने 28-10-2014 के अख़बार में करवा दी थी। वह मुझे व् मेरे छोटे पुत्र को मार् डालने की भी धमकी देता है और खुद भी हमारा नाम लिख कर सुसाइड करने की धमकी देता है। उस की इन दोनों बातों के खिलाफ मैने थाना में भी 30-10-2014 को दरख्वास्त दी थी। लेकिन थाना वालों ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की। मैं अब उसे कुछ भी नहीं देना चाहता। बड़े पुत्र ने जिस को खेत की जमीन चकोते पर दे रखी थी मैं ने उसको खेत की ज़मीन छोड़ने को कहा तो उस ने कहा कि वह अप्रैल 2015 में खाली कर देगा। लेकिन अब मेंरे बड़े पुत्र ने मेरे ऊपर मुकदमा कर दिया। जिसके समन मुझे आज मिले हैँ। समन क़े अनुसार उसने कहा है कि मेरे हिस्से की 11 कनाल जो मुझे दी गई थी उस पर मेरे पिता कब्जा करना चाहता है यह मुझ पर ही रहनी चाहिए और घर व पंजाब वाली 1 कनाल में से मुझे आधी आधी मिलनी चाहिये। मैं अपने बडे पुत्र से बहुत तंग हूँ। आप मुझे कोई ऐसा तरीका बताइये जिस से बड़े पुत्र को मेरी सम्पति में से कुछ भी न मिले या फिर कम से कम मिले। मेरे परिवार में मैं खुद, (पत्नी नहीं है) दो पुत्र दो पुत्री चारों बच्चे शादीशुदा हैं। कृपया समस्या को गम्भीरता से लेते हुए समाधान जल्दी से जल्दी बतायें क्योंकि समन में सुनवाई की तारीख 24-12-2014 की है। मैंने अपना वकील भी करना है।

समाधान-

में खेद है कि हम आप की समस्या का समाधान आप के समय के अनुसार नहीं कर सके। हम अभी तक प्रतिदिन एक समस्या का समाधान ही यहाँ प्रस्तुत कर पाते है। इस से अधिक चैरिटी संभव नहीं है। क्योंकि तीसरा खंबा दो व्यक्तियों के व्यक्तिगत प्रयास का परिणाम है और उन दोनों की अपनी अपनी निजी जिम्मेदारियाँ और व्यस्तताएँ हैं। हम त्वरित सशुल्क सेवाओँ पर विचार कर रहे हैं, लेकिन अभी वह कम से कम दो माह संभव नहीं है।

प को मेल से बता दिया गया था कि या तो आप वकील कर लें, अन्यथा केवल पेशी ले लें जिस से आप को समय मिल जाएगा। तब तक हम आप की समस्या का समाधान भी कर सकेंगे।

प के  पास जो संपत्ति है वह आप के पिता द्वारा तथा आप के द्वारा अर्जित है। आप पर हिन्दू विधि प्रभावी होती है। आप के पिता के जीवनकाल में उन के द्वारा जो भी संपत्ति अर्जित की गई उस पर उन का खुद का स्वामित्व था तथा वे अपने जीवन काल में इसे किसी को भी विक्रय, दान या अन्य प्रकार से हस्तान्तरण कर सकते थे। उन का देहान्त दिनांक जुलाई 2002 में हुआ और उन की संपत्ति आप को उत्तराधिकार में प्राप्त हो गई।

17 जून 1956 के पूर्व तक हिन्दू विधि मं यह नियम था कि जो भी संपत्ति किसी पुरुष को अपने पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त होती थी उस में उस के पुत्रों, पौत्रों और प्रपोत्रो का भी हिस्सा होता था। इसे पुश्तैनी अथवा सहदायिक संपत्ति कहा जाता था। लेकिन यह स्थिति उक्त तिथि से परिवर्तित हो गई। उक्त तिथि के बाद यदि कोई सपंत्ति पहले से पुश्तैनी या सहदायिक नहीं थी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की अनुसूची के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होने लगी। ऐसी संपत्ति जिन्हें उत्तराधिकार में प्राप्त हुई या हो रही है उस पर उत्तराधिकारियों का स्वामित्व स्थापित होने लगा और वे उसे दान, वसीयत या अन्य प्रकार से हस्तान्तरित कर सकते हैं।

स तरह आप को जो संपत्ति पिता से प्राप्त हुई उस में आप के पुत्रों, पुत्रियों या पत्नी का कोई अधिकार नहीं है। आप को उसे विक्रय, दान, वसीयत या अन्य प्रकार से हस्तान्तरित करने का अधिकार है, ऐसा ही अधिकार आप को उस संपत्ति पर प्राप्त है जो आप ने खुद अर्जित की है। आप चाहें तो अपनी सारी संपत्ति जो आप ने पुत्रों में बाँट दी है उस के बारे में वसीयत के माध्यम से या अन्य प्रकार से हस्तान्तरित कर के व्यवस्था कर सकते हैं।

प के बड़े पुत्र ने समझौते को नहीं माना है और वह जबरन अधिक से अधिक हथिया लेना चाहता है तथा जिम्मेदारियों को निभाना भी नहीं चाहता है। वैसी स्थिति में आप ने उसे बेदखल कर दिया है। लेकिन इस बेदखली का कोई कानूनी अर्थ नहीं है। आप के जीवनकाल के बाद यदि आप ने वसीयत नहीं की है तो वह आप की निर्वसीयती संपत्ति में से अपने हिस्से के अनुसार अर्थात एक चौथाई संपत्ति प्राप्त कर सकता है। यदि आप उसे छोड़ कर अन्य लोगों के नाम वसीयत कर देंगे तो आप की संपत्ति वसीयत के अनुसार अन्य को प्राप्त होगी। जिस के नाम वसीयत नहीं है उसे कुछ नहीं मिलेगा। इस कारण यदि आप चाहते हैं तो आप वसीयत कर के उसे पंजीकृत करवा दें। वसीयत में वंचित कर देने से ही वास्तविक बेदखली हो सकती है।

दि आप ने जो समझौता किया था उस के अनुसार नामांतरण करवा कर अलग अलग खाते न किए गए हों तो फिलहाल जो मुकदमा आप के पुत्र ने किया है उस में उसे सफलता मिलना संभव नहीं है। बल्कि आप उस के कब्जे की जमीन को वापस प्राप्त करने के लिए जमीन पर कब्जे का दावा अपने बड़े पुत्र के विरुद्ध कर सकते हैं।

हाँ तक आप के बड़े पुत्र द्वारा मारने या मरने की जो धमकी दी जा रही है उस का कोई महत्व नहीं है। ऐसी धमकियों से डरने का अर्थ तो यह होगा कि समाज में जिस की लाठी होगी उसी की भैंस होने लगेगी। वह ऐसा केवल खुद के लाभ के लिए करता है, आप को कड़ाई से उस का मुकाबला करना चाहिए।

संपत्ति तभी पुश्तैनी (सहदायिक) है यदि वह 17 जून 1956 के पू्र्व भी पुश्तैनी थी।

agricultural-landसमस्या-

प्रीतम ने गाँव-नारायणगढ, तह०-नरवाना, जिला- जींद, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं (उम्र-57 वर्ष) एक अनपढ़ व्यक्ति हूँ मेरी पत्नी 3 साल पहले गुजर गई थी। मेरी एक गंभीर समस्या है कि मेरे खुद के नाम पूरे 4 एकड़ अर्थात 480 मरले खेत की जमीन है जो मुझे मेरे पिता से प्राप्त हुई थी अर्थात पुश्तेनी है। मैं ने अभी-अभी पटवारी से पूछा है कि मेरी जमीन मेरे पिता के पास 17 जून 1956 से पहले से है। मेरे 4 पुत्र हैं बड़ा पुत्र का व्यवहार परिवार के किसी भी सदस्य के साथ ठीक नहीं है। वह मेरे साथ झगड़ता रहता है। मैं उसे अपनी सम्पति(जमीन) में से कुछ भी उसे देना नहीं चाहता। अब आप मुझे इन 9 बातों का अलग-अलग स्पष्ट समाधान बताएं:- 1.मेरे जीवित रहते मैं अपने बड़े पुत्र को 4 एकड़ अर्थात 480 मरले में से कुछ भी नहीं देना चाहता। क्या मेरा बड़ा पुत्र मेंरे जीवित रहते मेरी जमीन में से कोई हिस्सा लेने का दावा कर सकता है जबकि मैं उसे कुछ भी नहीं देना चाहता और जमीन भी मेरे नाम है। 2. क्या मैं बड़े पुत्र को छोड़कर सारी जमीन जो 4 एकड़ अर्थात 480 मरले है शेष तीनों पुत्रों के नाम वसीयत कर सकता हूँ। 3. अगर मैं शेष तीनों पुत्रों के नाम वसीयत कर देता हूँ तो क्या मेरे मरने के बाद मेरा बड़ा पुत्र कोर्ट के माध्यम से अपने हक लेने का कोई दावा कर सकता है। 4. अगर वो दावा करता है तो कोर्ट उसे उसका कितना हक दिला सकता है कृपया एकड़ या मरले में बताएं या कोर्ट के माध्यम से भी उसे कुछ नहीं मिल सकता। 5.कोई ऐसा तरीका या सुझाव बताओ ताकि मेरे बड़े पुत्र को मेरे मरने के बाद मेरी पूरी जमीन में से बिल्कुल भी हिस्सा न मिले। 6. मेरी पत्नी मर चुकी है क्या अब उसका भी मेरी जमीन में कोई हिस्सा है? अगर है तो वो किसके पास माना जायेगा? 7. अगर मेरी पत्नी का हिस्सा मेरे पास माना जाये तो क्या मैं उस हिस्से को किसी एक पुत्र को वसीयत कर सकता हूँ। दूसरे पुत्र कोर्ट के माध्यम से उस हिस्से में से कुछ ले सकते हैं या नहीं। 8. क्या मुझे सारी जमीन बेचने का हक है। 9. अगर मैं सारी जमीन बेचना चाहूँ तो क्या मेरा बड़ा पुत्र उसमें कोई रुकावट डाल सकता है जबकि सारी जमीन मेरे नाम है। 4 नं. बात का जवाब एकड़ या मरले में दें। कृपया इन सभी 9 बातों का अलग-अलग स्पष्ट समाधान बताएं। आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि समस्या को गम्भीरता से लेते हुए जरुर से जरुर और जितना जल्दी हो सके समाधान बताएं।

समाधान-

प ने जल्दी समाधान के लिए लिखा है। तीसरा खंबा की यह सेवा निशुल्क है। तीसरा खंबा पर प्रतिदिन कितने ही लोगों की समस्याएँ आती हैं। हम कोशिश करते हैं कि सभी की समस्याओं का क्रम से समाधान प्रस्तुत करें। यह क्रम तभी टूटता है जब किसी को तुरन्त आवश्यकता हमें महसूस होती है। हम केवल एक समस्या का समाधान प्रस्तुत कर पाते हैं। आप की समस्या का समाधान भी हम आप के क्रम पर ही प्रस्तुत कर रहे हैं। क्यों कि हमें महसूस नहीं हुआ कि आप का समाधान तुरन्त प्रस्तुत करना आवश्यक है।

टवारी ने आप को बताया है उक्त भूमि आप के पिता के पास 17जून 1956 के पहले से है। लेकिन आप के पिता को भूमि उन के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो ही पुश्तैनी है, अन्यथा नहीं। यदि आप के पिता को यह भूमि किसी भी अन्य व्यक्ति से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी या उन्हों ने खुद खरीदी थी तो यह भूमि किसी भी प्रकार से पुश्तैनी नहीं है और कभी हो भी नहीं सकती। क्यों कि उक्त तिथि के उपरान्त कोई भी भूमि उत्तराधिकार के कारण सहदायिक नहीं हो सकती। इस कारण पहले आप यह तय करें कि आप की भूमि पुश्तैनी है अथवा नहीं।

दि भूमि पुश्तैनी है तो आप के बड़े पुत्र का उस में हिस्सा है अन्यथा नहीं है। आप की पत्नी का देहान्त आप के जीवनकाल में हो चुका है इस कारण उसे तो आप की इस भूमि में कोई हिस्सा प्राप्त ही नहीं हुआ उस का कोई हिस्सा नहीं है।

प के बड़े पुत्र को कभी भी कोई भी मुकदमा प्रस्तुत कर दावा करने से रोका नहीं जा सकता। लेकिन यदि उक्त भूमि पुश्तैनी नहीं है तो उस के सारे दावे बेकार जाएंगे। लेकिन यदि पुश्तैनी है तो वह उस का हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

दि आप की भूमि पुश्तैनी है तो भी उस में आप का खुद का जो हिस्सा है उसे आप वसीयत कर सकते हैं। इस से आप के जीवनकाल के उपरान्त आप का जो हिस्सा है वह उन्हें ही नहीं मिलेगा जिस के नाम आप वसीयत करेंगे। जिन के नाम नहीं करेंगे वे उस से वंचित हो जाएंगे।

दि भूमि पुश्तैनी नहीं है तो आप सारी भूमि की वसीयत कर सकते हैं। जिस में आप अपने किसी पुत्र को या सभी पुत्रों को वंचित करते हुए किसी भी व्यक्ति को अपनी संपत्ति वसीयत कर सकते हैं। भूमि के पुश्तैनी न होने पर आप सारी भूमि विक्रय भी कर सकते हैं। कोई उस में बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता। यदि कोई कोशिश करेगा तो भी वह नाकाम हो जाएगी।

संपत्ति पुश्तैनी होने की स्थिति में एकड़ या मरले का हिसाब केवल उन तथ्यों के आधार पर नहीं बताया जा सकता जो यहाँ आप ने बताए हैं। उन के लिए यह भी देखना होगा कि आप के पिता के जीवित रहते आप के बच्चों में कितने जन्म ले चुके थे और कितने बाद में। इस कारण इस समस्या के हल के लिए आप को स्थानीय वकील से संपर्क करना चाहिए।

संयुक्त संपत्ति के लिए विभाजन का वाद करें …

court-logoसमस्या-

अजय कुमार ने लखनऊ, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे बाबा के पिता जी ने एक मकान खरीदा था, उसकी उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की थी। मेरे बाबा का स्वर्गवास हो गया है उन्हों ने भी कोई वसीयत नही की। मेरे बाबा के एक भाई हैं जो जीवित हैं नगर निगम का गृह कर उन्हीं के नाम पर है। मेरे बाबा के ३ लड़के थे जिन में से बड़े का स्वर्गवास हो गया है, मेरे पिता और चाचा हैं। मेरे बाबा के भाई तथा चाचा ने अभी हाल ही मे एक वसीयत करा ली है हम लोगों को बिना बताए तथा उसकी फोटो कापी भी नहीं दी। क्या मेरे चाचा मेरे बाबा के भाई के साथ मिल कर पूरा मकान अपने नाम करा सकते हैं? क्या मेरा उस मकान पर कोई हक है?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि बाबा के पिताजी ने वह मकान कब खरीदा था और उन का देहान्त कब हुआ। इस विवाद में यह तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं। यदि आप के दादा जी के पिता का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हुआ है तो फिर उक्त संपत्ति पुश्तैनी है और उस में आप का जन्म से अधिकार है। यदि उन का देहान्त उक्त तिथि के उपरान्त हुआ हो तो आप का अधिकार उस संपत्ति में जन्म से नहीं है वह पुश्तैनी संपत्ति न हो कर अविभाजित हिन्दू परिवार की संपत्ति है। बाबा के पिता के देहान्त के उपरान्त उक्त संपत्ति उत्तराधिकार में आप के बाबा व उन के भाई बहनों को प्राप्त हुई है जिस में सभी का समान हिस्सा है। यदि आप के बाबा के कोई बहिन भी है तो उस का भी अधिकार उक्त संपत्ति में है।

प के बाबा के देहान्त के बाद उक्त संपत्ति में उन के हिस्से में आप के पिता व उन के भाई बहनों को समान अधिकार प्राप्त हुआ है। यदि आप के पिता तीन भाई थे और कोई बहिन नहीं थी तथा आप के बाबा केवल दो भाई थे तो उक्त मकान में आप के बाबा को ½ हिस्सा और आप के पिता को उस का 1/3 अर्थात उक्त मकान में आप के पिता का 1/6 हिस्सा है। यदि आप के बाबा के पिता का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हुआ है तो उक्त संपत्ति पुश्तैनी है और उस में आप का भी अधिकार है। कितना है इस का निर्धारण आप के बाबा के पिता से ले कर आज तक का वंशवृक्ष (शजरा) देख कर ही किया जा सकता है।

प के चाचा और बाबा यदि किसी तरह से आप के पिता को उक्त मकान के हिस्से से वंचित करने का प्रयत्न कर रहे हैं तो आप के पिता उक्त संपत्ति के विभाजन के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि संपत्ति पुश्तैनी है तो फिर आप भी विभाजन के लिए वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

माता के पूर्व पति की संपत्ति के उत्तराधिकार का प्रश्न…

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

पवन ने सागर मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि

कोई महिला अपने पति के मरने के बाद किसी दूसरे से विवाह करती है तो क्या उस से होने वाली संतानें उस महिला के पहले पति की संपत्ति की अधिकारी होंगी या नहीं? महिला के पहले पति की मृत्यु सन् 1948 के पहले हो चुकी है। महिला के पहले पति से दो संताने हैं और दूसरे पति से भी उसे दो संताने है। महिला की मृत्यु 2009 में हो चुकी है। दूसरे पति की संतानों ने 2013 में पहले पति की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी पाने हेतु सिविल वाद प्रस्तुत किया है। अभी संपत्ति पहले पति की संतानों के नाम है क्या इन चारों में संपत्ति का बँटवारा समान रूप से हो सकता है?

समाधान-

संपत्ति से संबंधित समस्याएँ अक्सर जटिल होती हैं। पैतृक संपत्ति का अस्तित्व अब लगभग समाप्त हो रहा है। 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम अस्तित्व में आने के बाद से किसी भी पुरुष पूर्वज से किसी भी पुरुष को उत्तराधिकार में प्राप्त होने वाली ऐसी संपत्ति जो उक्त अधिनियम प्रभावी होने के पूर्व से पैतृक नहीं थी पैतृक संपत्ति में परिवर्तित नहीं हो रही क्यों कि अधिनियम की अनुसूची में जीवित पुत्र के पुत्र और पौत्र को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण आप को पहले किसी भी विवादित सम्पत्ति का इतिहास 1956 के पहले उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो वहाँ तक का जाँचना पड़ेगा कि वह वास्तव में पैतृक है भी या नहीं। अक्सर ऐसा होता है कि वादी वाद प्रस्तुत करता है और किसी ऐसी संपत्ति को पैतृक बता देता है जो वास्तव में पैतृक नहीं है और प्रतिवादी उसे भ्रम में अथवा उस में अपना लाभ देख कर जानबूझ कर स्वीकार कर लेता है और वह संपत्ति पैतृक मान ली जाती है, जब कि वह होती नहीं है। आप के मामले में पहले यह निर्धारित करें कि संपत्ति पैतृक है या नहीं है।

हाँ तक साधारण उत्तराधिकार का प्रश्न है। किसी भी व्यक्ति की मृत्यु होते ही उस की संपत्ति उसी समय उस के उत्तरादिकारियों को मिल जाती है। आप को इस समस्या पर उसी दृष्टि से विचार करना होगा। एक स्त्री के पति के देहान्त के समय उस के दो संताने जीवित हैं तो उस के पति की संपत्ति के 3 हिस्से हो कर एक एक हिस्सा तीनों को मिल चुका है। अब उस संपत्ति में 1/3 हिस्सा स्त्री का है। उस स्त्री ने दूसरा विवाह किया और दो संताने और हो गईं और उस के बाद स्त्री की मृत्यु हो गई, अब उस स्त्री को जो 1/3 हिस्सा अपने पूर्व पति से मिला है उस में उस की चारों संतानों का बराबर का हिस्सा होगा। जो 2/3 हिस्सा पहले ही पूर्व पति की संतानों को प्राप्त हो चुका है उस में दूसरे पति की संतानों का कोई अधिकार नहीं है।

पैतृक संपत्ति के मामले में संपत्ति के दस्तावेज व परिवार की संपूर्ण जानकारी दे कर स्थानीय वकील से सलाह लें।

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कल्पना राठौर सारागांव जिला जांजगीर-चाम्पा, छत्तीसगढ़ से पूछती हैं-

मेरे दादा जी ने अपनी पैतृक सम्पत्ति 1993 में अपने जीते जी मेरे भाइयों के नामवसीयत करदी थी, वसीयत का पंजीकरण भी करवाया था। उनकादेहांत 20032 में हुआ अब 2014 में मेरी छोटी बुआ अपने हिस्से की मांग कररही है और कोर्ट जाने की धमकी दे रही है, तो ऐसे में क्या मेरी बुआ को उनकाहिस्सा मिल पायेगा|

समाधान-

प ने लिखा है कि दादा जी ने पैतृक संपत्ति को वसीयत कर दिया था। पर पैतृक संपत्ति में तो पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रों का भी अधिकार जन्म से होता है। इस तरह पैतृक संपत्ति एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं होती। आप के दादा जी की जो पैतृक संपत्ति थी उस में उन के पुत्रों और पौत्रों का भी अधिकार था। वे उस संपत्ति को वसीयत नहीं कर सकते थे, वे केवल उस संपत्ति में से अपने हिस्से की संपत्ति की वसीयत कर सकते थे।

स तरह आप का यह मामला अत्यन्त जटिल है। इस मामले में बहुत सारे तथ्यों का ज्ञान होने पर ही कोई निश्चायक राय दी जा सकती है। मुख्यतः यह जानना आवश्यक है कि 17 जून 1957 के पूर्व उस संपत्ति की स्थिति क्या थी और उस समय कौन कौन लोग उस संपत्ति में अपना सहदायिक हित रखते थे। उस के बाद प्रत्येक के हित और उन की संतानों का पूरा लेखा जोखा (वंश-वृक्ष) की जानकारी होना आवश्यक है।

फिर भी यह कहना उचित होगा कि उक्त संपत्ति में आप की बुआ का हिस्सा हो सकता है। लेकिन उस की ठीक से परीक्षा करनी होगी। यदि हिस्सा हुआ तो वह बुआ को देना पड़ेगा। यह भी हो सकता है कि उन का हिस्सा न हो। आप को अपने यहाँ किसी अच्छे जानकार वकील को संपत्ति के सभी दस्तावेज व परिवार के बारे में संपूर्ण जानकारी दे कर सलाह प्राप्त करनी चाहिए।

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