Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक दूसरा विवाह नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

मिथ्या साक्ष्य देना धारा 193 के अंतर्गत कारावास से दंडनीय अपराध है।

समस्या-

सत्यनारायण सिंह ने जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी पत्नी द्वारा किसी हाउसिंग स्कीम में मकान पाने हेतु आवेदन करने के लिए रुपए 5000 प्रतिमाह आय का शपथ-पत्र 10 रुपए के गैर न्यायिक स्टांप पर नोटरी से बनवाया गया था। मैं ने उक्त आय प्रमाण पत्र को फैमिली कोर्ट में लंबित गुजारा भत्ता केस में पत्नी की आय दिखाने हेतु प्रस्तुत किया तो पत्नी ने लिखित में कहा है कि उसने ऐसा कोई प्रमाण पत्र कभी नहीं बनवाया है। मेरी पत्नी, स्टाम्प वेंडर और नोटेरी पर कौन सी आपराधिक और सिविल कार्यवाही किस सक्षम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती हैं?

समाधान-

प के मामले में आप को यह निश्चित करना पड़ेगा कि आय का वह शपथ पत्र सही है या फिर आप की पत्नी का बयान सही है। आप के प्रश्न से लग रहा है कि पत्नी का बयान सही है और आप की पत्नी ने हाउसिंग स्कीम का लाभ उठाने के लिए एक मिथ्या शपथ पत्र हाउसिंग स्कीम में प्रस्तुत किया है। इस मामले में आप की पत्नी ने धारा 193 आईपीसी के अंतर्गत अपराध किया है।

धारा 193 आईपीसी के दो भाग हैं पहला भाग तो वह है जिस में किसी न्यायिक कार्यवाही में मिथ्या साक्ष्य देने वाले के लिए सात वर्ष तक की सजा का उपबंध है। दूसरे भाग में किसी भी अन्य मामले में साशय झूठी गवाही देने के लिए दंड का उपबंध है जिस में तीन वर्ष तक के कारावास की सजा दी जा सकती है। आप की पत्नी का अपराध इस दूसरे भाग में आता है।

धारा 193 आईपीसी का अपराध असंज्ञेय अपराध है, अर्थात इस मामले में पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। इस धारा में कार्यवाही के लिए आपको जिस थाना क्षेत्र में अपराध हुआ है उस थाना क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा। परिवाद प्रस्तुत करने और उस में आपके बयान हो जाने के उपरांत सबूत के रूप में दस्तावेज एकत्र करना आवश्यक होगा। जो कि हाउसिंग स्कीम में प्रस्तुत किया गया शपथ पत्र है और आवेदन पत्र है। उन्हें बरामद करने के लिए पुलिस को जाँच के लिए भेजने हेतु मजिस्ट्रेट आदेश दे सकता है।

यदि आप सिद्ध कर सकते हैं कि आप की पत्नी ने वह प्रमाण पत्र सही बनवाया था और वह न्याया्लय के समक्ष मिथ्या कथन कर रही है तो यह न्यायालय को झूठी सूचना देने का अपराध है जो कि धारा 177 आईपीसी के अंतर्गत दो वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है। यह भी असंज्ञेय अपराध है पर इस के अंतर्गत कार्यवाही करने के लिए आप को परिवार न्यायालय में ही धारा 340 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आप की पत्नी के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए आवेदन करना होगा।
इस मामले में स्टाम्प वेंडर और नोटेरी के विरु्दध कोई अपराध नहीं बनता है क्यों कि स्टाम्प वेंडर ने केवल स्टाम्प बेचा है और नोटेरी ने शपथ पत्र को सत्यापित किया है।

चैक अनादरण का मुकदमा क्या है? और इस में कितनी सजा हो सकती है?

cheque dishonour1समस्या-
ठीकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश से आनन्द सिंह तोमर ने पूछा है-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के मुकदमे में क्या होता है? यदि कोर्ट फैसला सुना दे तो कितना जुर्माना और अधिक से अधिक कितनी सजा हो सकती है? यदि सम्पति नाम पर हो और रुपए नहीं दें तब क्या होगा?

समाधान –

ज जिस रूप में यह कानून मौजूद है उस का स्वरूप इस प्रकार है ….

क व्यक्ति के पास किसी अन्य व्यक्ति के खाते का चैक है, जो किसी ऋण के पुनर्भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए दिया गया था।  जिस का भुगतान उसे प्राप्त करना है तो वह उस चैक को उस पर अंकित तिथि से वैधता की अवधि समाप्त होने तक अपने बैंक में प्रस्तुत कर उस चैक का धन चैक जारीकर्ता के खाते से प्राप्त कर सकता है।   वैधता की अवधि सामान्य तौर पर चैक पर अंकित जारी करने की तिथि के तीन माह के भीतर और विशेष रूप से चैक पर अंकित इस से कम अवधि तक के लिए वैध होता है।  किसी भी कारण से यह चैक अनादरित (बाउंस) हो कर वापस आ सकता है।    वैधता की अवधि के दौरान इस वापस आए चैक को कितनी ही बार भुगतान हेतु बैंक में प्रस्तुत किया जा सकता है।

दि इस चैक का भुगतान किसी भी तरीके से नहीं होता है और चैक अनादरित ही रह जाता है तो अंतिम बार उस के बैंक से अनादरण की सूचना प्राप्त होने से 30 दिनों की अवधि में चैक धारक लिखित सूचना (नोटिस) के माध्यम से चैक जारीकर्ता से चैक की राशि पन्द्रह दिनों में भुगतान करने की मांग करे और यह नोटिस प्राप्त होने के पन्द्रह दिनों में भी उस चैक की राशि चैक धारक को चैक जारीकर्ता भुगतान करने में असफल रहे तो चैक का यह अनादरण एक अपराध हो जाता है।  चैक धारक नोटिस की पन्द्रह दिनों की अवधि समाप्त होने के तीस दिनों के भीतर अदालत में अपराध की शिकायत दर्ज करा सकता है।

स शिकायत पर अदालत प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त (चैक जारी कर्ता) के विरुद्ध समन जारी करेगी और अभियुक्त के न्यायालय में उपस्थित हो जाने पर मामले की सुनवाई करेगी।  अभियोजन की साक्ष्य के उपरांत अभियुक्त को सफाई में साक्ष्य का अवसर देगी और सुनवाई के उपरांत अभियुक्त को दोषी पाए जाने पर न्यायालय उसे दो वर्ष तक के कारावास और चैक की राशि से दो गुना राशि तक के जुर्माने की सजा से दंडित कर सकता है। जुर्माना अदा न होने पर अभियुक्त को अधिकतम छह माह तक की अवधि का अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है।

ह मामला पूरी तरह से दस्तावेजों पर आधारित है।  चैक, उसे बैंक में प्रस्तुत करने की रसीद, उस के अनादरित होने की सूचना, चैक जारी कर्ता को उस के पते पर भेजा गया नोटिस सभी दस्तावेज हैं और अकेले शिकायतकर्ता के बयान से प्रमाणित किए जा सकते हैं।  यदि कोई गंभीर त्रुटि न हो जाए तो शिकायत का सीधा अर्थ चैक जारीकर्ता को  सजा होना है।

धारा 138  के सभी मामलों में एक ही बात है जो चैक जारीकर्ता के पक्ष में जा सकती थी, वह यह कि चैक किसी ऋण के भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए नहीं दिया गया हो।  आम तौर पर नियम यह है कि जो किसी कथन को प्रस्तुत करेगा वही उसे प्रमाणित करेगा।  सामान्य कानून के अनुसार इस तथ्य को कि चैक किसी ऋण के भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए दिया गया था,  प्रमाणित करने का दायित्व शिकायतकर्ता पर होना चाहिए था।  लेकिन धारा 139 में यह उपबंधित किया गया है कि जब तक अभियुक्त विपरीत रूप से प्रमाणित नहीं कर दे कि चैक को किसी दायित्व के निर्वाह या ऋण के भुगतान हेतु जारी किया हुआ ही माना जाएगा।  धारा 139 ने ही इस कानून को मारक बना दिया है और चैक जारी कर्ता के लिए कोई सफाई नहीं छोड़ी है।

प के मामले में भी आप के व परिवादी के बीच कोई समझौता न हो पाने और समझौते के आधार पर मुकदमे का निर्णय न हो पाने पर आप को अधिकतम दो वर्ष तक के कारावास और चैक की राशि से दो गुना राशि तक के जुर्माने की सजा से दंडित किया जा सकता है। जुर्माना अदा न होने पर अभियुक्त को अधिकतम छह माह तक की अवधि का अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता में यह भी उपबंध है कि जुर्माने की राशि अभियुक्त की संपत्ति की कुर्की कर के उस से वसूल की जा सकती है। इस तरह यदि आप के नाम पर कोई संपत्ति है तो उसे कुर्क कर के उस से भी जुर्माने की राशि वसूल की जा सकती है।

सड़क पर पानी और गंदगी फैलाने वालों के विरुद्ध शिकायत कहाँ करें . . .

nuisanceसमस्या-
हिन्दुपुर, आन्ध्रप्रदेश से सोमनाथ कुलकर्णी ने पूछा है –

मेरा घर का रजिस्टर हुआ है। मेरा घर में रोड से सौ मीटर दूरी पर है। मेरे घर को आने जाने के लिए बारह फीट चौड़ा रोड़ी का कच्चा रोड़ है, मगर उस रोड के बाजू मे कुछ घर वाले उस रोड पर उन के घर के बाथरूम का पानी और कचरा डाल देते हैं। ऐसे में मुझे किस से शिकायत करनी होगी? और क़ानूनी की कौन सी प्रक्रिया करूँ जिस से वो लोग उस रोड पर पानी ना डालें?

समाधान –

किसी भी सार्वजनिक स्थल पर या रास्ते में इस तरह की गंदगी और पानी डालना कंटक (न्यूसेंस) उत्पन्न करना है। आप इस की शिकायत अपने गाँव/नगर की पंचायत/नगरपालिका में कर सकते हैं। लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के अन्तर्गत इस तरह का कंटक हटाने के लिए आप के क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यपालक दंडनायक (Executive Magistrate)   को भी शिकायत एक आवेदन के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है।

स मामले में जिला मजिस्ट्रेट, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यपालक दंडनायक का न्यायालय उन व्यक्तियों के विरुद्ध जो ये कंटक उत्पन्न करते हैं नोटिस जारी कर के बुलाएगा और उन से जवाब देने को कहेगा। मामले की सुनवाई कर के उन्हें कंटक हटाने और भविष्य में कंटक उत्पन्न न करने का आदेश देगा। यदि इस आदेश की पालना नहीं की जाती है तो भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर धारा 188 के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज कर के उसे जुर्माना और कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

मिथ्या अपमानजनक कथन के लिए अपराधिक व मुआवजे के लिए दीवानी मुकदमा किया जा सकता है।

Desertedसमस्या-

दिल्ली से विनय पाण्डे ने पूछा है –

मेरे चाचा की लड़की की शादी होने वाली थी और मेरे एक रिश्तेदार ने लड़के से जा कर कहा कि लड़की ने पहले ही किसी के साथ कोर्ट मैरिज कर रखी है। इस से मेरे चाचा की लड़की की शादी नहीं हो सकी रिश्ता टूट गया। जब कि ऐसा कुछ भी नहीं था। क्या मैं इस के लिए उस रिश्तेदार पर मानहानि का दावा कर सकता हूँ जिस ने ये झूठी बात फैलाई थी?

समाधान-

दि आप यह प्रमाणित कर सकते हैं कि जिस रिश्तेदार के खिलाफ आप मुकदमा करना चाहते हैं उसी रिश्तेदार ने स्वयं यह बात किसी व्यक्ति से कही थी और उस व्यक्ति ने यह बात आप के चाचा की लड़की के होने वाले ससुराल तक यह बात पहुँचाई है तो आप निस्संकोच मानहानि के लिए अपराधिक व मुआवजे के लिए दीवानी न्यायालयों में कार्यवाही कर सकते हैं। इस बात को प्रमाणित करने के लिए आप को ऐसे व्यक्ति की गवाही करानी होगी जिस के सामने यह बात उस रिश्तेदार ने किसी व्यक्ति को कही हो और फिर जिसे यह बात कही हो और फिर यह बात किसी तरह आप के चाचा की लड़की के होने वाले ससुराल पहुँची हो। आप जिस पर आरोप लगा रहे हैं उस से बात के कहने से ले कर चाचा की लड़की के होने वाले ससुराल तक पहुँचने की हर कड़ी को आप को गवाहियों से साबित करना होगा।

मारी राय है कि यदि आप इन सारी कड़ियों को प्रमाणित करने में सक्षम हों तो एक विधिक नोटिस उस व्यक्ति को किसी वकील के माध्यम से भिजवाएँ जिस में यह संदेश दें कि उस व्यक्ति के द्वारा मिथ्या और अपमानजनक बात कहने और वह चाचा की लड़की के होने वाले ससुराल पहुँचा देने से न केवल लड़की, अपितु उस के सारे परिवार का घोर अपमान हुआ है और समाज में प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा है और रिश्ता टूट गया है। वे उस लड़की और आप के चाचा को अमुक राशि मुआवजा के बतौर दें, साथ ही इस कृत्य के लिए न केवल सार्वजनिक रूप से अपनी गलती को स्वीकार करें अपितु सार्वजनिक रूप से क्षमा भी मांगें, अन्यथा उस के विरुद्ध दंड दिलाने हेतु अपराधिक और दुष्कृत्य विधि में मुआवजा प्राप्त करने के लिए दीवानी मुकदमा चलाया जाएगा।  यह विधिक नोटिस देने के बाद नोटिस की अवधि व्यतीत हो जाने पर आप अपराधिक व दीवानी मुकदमा चला सकते हैं। ध्यान रखें कि दोनों मामलों में समयावधि निश्चित है अवधि समाप्त हो जाने के बाद आप दोनों ही कार्यवाही नहीं कर सकेंगे। अपराधिक मामलों में यह अवधि अपराध घटित होने तीन वर्ष तक की है वहीं दीवानी मामलों में यह अवधि एक वर्ष तक की ही है।

सेवाच्युति (बर्खास्तगी) के दंड के विरुद्ध विभागीय अपील निर्धारित समय सीमा में प्रस्तुत करें।

समस्या-

धमतरी, छत्तीसगढ़ से अजय बाबर ने पूछा है-

मेरा मित्र 6 वर्ष तक दैनिक वेतन भोगी (श्रमिक) के रूप में कार्य करने के पश्चात 1986 में सेवा में नियमित हुआ था।  उसे विभाग ने 22 वर्षों तक नियमित कर्मचारी कि हैसियत से कार्य लेने के बाद 29 अप्रेल 2013 को फर्जी अंकसूची के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया।  जबकि उसकी सेवानिवृत्ति 30 अप्रैल 2013 को होनी थी। इस प्रकरण में मेरे मित्र को क्या करना चाहिए…?

समाधान-

dismissalदि किसी कर्मचारी पर किसी दुराचरण का आरोप हो और उसे विभागीय अनुशासनिक कार्यवाही के अंतर्गत हुई जाँच में उस दुराचरण का दोषी सिद्ध कर दिया गया हो तो कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस दे कर तथा उस की सुनवाई कर के सेवा से पृथक किया जा सकता है। न केवल सेवानिवृत्ति के एक दिन पूर्व अपितु सेवा निवृत्ति के दिन सेवानिवृत्त होने के पूर्व भी सेवाच्युति के दंड से दंडित किया जा सकता है।

लेकिन इस तरह सेवाच्युति का दंड देते हुए जिस कर्मचारी की सेवाएँ समाप्त की गई हैं। वह अपनी इस सेवा निवृत्ति के विरुद्ध जाँच के उचित न होने, आरोप सिद्ध न होने तथा अधिक दंड से दंडित किए जाने के आधार पर ऐसे दंड के विरुद्ध विभागीय अपील कर सकता है। पहली अपील निरस्त होने पर सेवाच्युति के दंडादेश तथा प्रथम अपीलीय आदेश के विरुद्ध द्वितीय अपील का उपबंध होने पर द्वितीय अपील कर सकता है। यदि द्वितीय अपील भी निरस्त कर दी जाए तो राज्य सेवा अधिकरण होने पर ऐसे अधिकरण में अथवा सीधे उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी सेवाच्युति के दंड और दोनों अपीलीय आदेशों के विरुद्ध अपील या रिट याचिका प्रस्तुत कर सकता है। आप के मित्र को अपनी सेवा च्युति के दंड के विरुद्ध सब से पहले विभागीय अपील प्रस्तुत करना चाहिए। उन के विभाग में प्रभावी सेवा नियमों (सीसीए रूल्स) का अध्ययन कर के अपील निर्धारित अवधि में प्रस्तुत कर देनी चाहिए।

व्यक्तिगत विधि से अनुमत न होने पर किसी व्यक्ति के लिए पति/पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करना अपराध है।

समस्या-

सिरोही राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

लाक का मामला कोर्ट में लंबित है।  तो क्या मैं दूसरा विवाह कर सकता हूँ? यदि हाँ, तो कौन कौन सी शर्तें लागू होंगी।

समाधान-

Hindu Marriage1प हिन्दू विधि से शासित होते हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-5 में यह उपबंध है कि कोई भी दो हिन्दू तभी विवाह कर सकते हैं जब कि वे इस धारा की शर्तें पूरी कर सकें। इन शर्तों में पहली शर्त ही यही है कि विवाह के किसी भी पक्षकार का पति/पत्नी जीवित नहीं होना चाहिए।  आप ने  विवाह विच्छेद के लिए मुकदमा किया है, वह लंबित है, उस में अभी डिक्री पारित नहीं हुई है। जब डिक्री पारित हो जाए और अपील की अवधि समाप्त हो जाए तब तक आप दूसरा विवाह नहीं कर सकते। यदि करते हैं तो वह अवैध होगा।

हिन्दू विधि से शासित किसी भी व्यक्ति के लिए एक पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करना उन की व्यक्तिगत विधि द्वारा अनमत नहीं होने के कारण ऐसा करना भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के अंतर्गत अपराध है। जिस के लिए सात वर्ष तक के कारावास से दंडित किया जा सकता है। धारा 494 भा.दं.सं. निम्न प्रकार है –

494. पति या पत्नी के जीवनकाल में पुनः विवाह करना

जो कोई पति या पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण शून्य है कि वह ऐसे पति या पत्नी के जीवनकाल में होता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डीय होगा ।

अपवाद-

स धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति पर नहीं है, जिसका ऐसे पति या पत्नी के साथ विवाह सक्षम अधिकारिता के न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया हो,

र न किसी ऐसे व्यक्ति पर है, जो पूर्व पति या पत्नी के जीवनकाल में विवाह कर लेता है, यदि ऐसा पति या पत्नी उस पश्चातवर्ती विवाह के समय ऐसे व्यक्ति से सात वर्ष तक निरन्तर अनुपस्थित रहा हो, और उस काल के भीतर ऐसे व्यक्ति ने यह नहीं सुना हो कि वह जीवित है, परन्तु यह तब जब कि ऐसा पश्चातवर्ती विवाह करने वाला व्यक्ति उस विवाह के होने से पूर्व उस व्यक्ति को, जिसके साथ ऐसा विवाह होता है, तथ्यों की वास्तविक स्थिति की जानकारी, जहां तक कि उनका ज्ञान उसको हो, दे दे ।

अवयस्क लड़की को बहका कर विवाह करने का शपथ पत्र लिखाना अपराध है, पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराएँ या न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत करें।

समस्या-

बिहार शरीफ, बिहार से गौतम शुक्ला पूछते हैं-

मेरी छोटी बहन अपने ही स्कूल के शिक्षक के प्यार के जाल में फंस कर 6 महीने पूर्व 24 मार्च 2012 को हिन्दू रीति रिवाज से बिना किसी को अवगत कराये शिक्षक के साथ नोटरी पब्लिक के मार्फत शादी कर ली।  छह महीने बाद दिनांक 24 दिसंबर को इस बारे में हमलोग और समाज को बताया गया | मेरी बहन की उम्र 25 फरवरी को 18 वर्ष की होगी मगर नोटरी पब्लिक के हलफनामा में शिक्षक की उम्र २५ वर्ष और मेरी बहन की उम्र १९ वर्ष अंकित है।  घटना की जानकारी के बाद हम परिवार वालों की समाज में काफी किरकिरी हुई।  हम लोगों को ये समझ में नहीं आ रहा हैं कि आखिर झूठी उम्र को अंकित करके मेरी बहन ने कैसे शादी कर ली?  मेरी बहन की 10वीं के सर्टिफिकेट की अनुसार जन्म तिथि 25.02.1995 है और नोटरी पब्लिक के हलफ़नामा में 19 वर्ष अंकित है।  शिक्षक दुसरे जाति का हैं और धूर्त किस्म का भी है, जो पहले भी दुसरी कमसिन लड़की को प्रभावित करने का प्रयास करते आया है।  हमलोग इस शादी के खिलाफ हैं और अपनी बहन को अच्छी तरह से समझा बुझा कर किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट कर दिए हैं ताकि वो शिक्षक मेरी बहन से संपर्क ना करे और आगे कोई अनहोनी ना हो।   मैं उस शिक्षक पर कोर्ट के माध्यम से क़ानूनी करवाई करना चाहता हूँ ताकि आगे भविष्य में मेरी बहन की शादी में नोटरी पब्लिक का हलफनामा बाधक ना बने।  मेरी बहन की सारी अकेडमिक सर्टिफिकेट उस शिक्षक के पास हैं।  जिन्हें वो लौटाने से इनकार कर रहा है।   मेरे पास सिर्फ मेरी बहन का 10वीं की मार्क्स शीट की इन्टरनेट कॉपी हैं जिसमें उसकी जन्म तिथि 25.02.1995 है।  घटना की जानकारी वाले दिन (दिनांक – 24.12.2012 को मेरी बहन उस लड़के के किराये के मकान पर गयी थी और उसी दिन हमलोगों को बुला कर नोटरी पब्लिक का हलफनामा दिखलाया गया और सामाजिक रीति-रिवाज से शादी करने के लिए एक पचास रुपये वालें नॉन-जुडिशियल स्टाम्प पेपर पर दिनांक 17.01.2013 की मुक़र्रर करके हमारे पिता जी और पांच गवाह के दस्तख़त करवाया गया।  उस समय हमलोग दस्तख़त करने को मजबूर थे,  क्योकि मेरी बहन अपने घर जाने से इनकार कर रही थी। | घर आकर हमलोग को काफी निराशा हो रही थी और अपने सहयोगियों से सलाह मशविरा करके अपनी बहन को समझा बुझा कर किसी सुरक्षित जगह पर शिफ्ट कर दिए ताकि वो शिक्षक मेरी बहन से संपर्क न करें और आगे कोई गलत कदम ना उठा लें।  मेरी बहन ठीक ठाक से है और अपनी गलती के लिए शर्मिंदा भी हैं।  उसने वादा भी किया है शादी जैसे अहम फैसले अपनी माता – पिता की रजामंदी से ही करेंगी।  वकील साहब, कृपया करके आप हमें मार्गदर्शन करें और जरुरी क़ानूनी प्रक्रिया से अवगत कराएँ।  ताकि भविष्य में वो शिक्षक मेरी बहन की शादी में खलल ना दे सकें।

 समाधान-

भा.दं.संहिता

भारतीय दंड संहिता में किसी 18 वर्ष से कम आयु की नारी के साथ किए जाने वाले कुछ अपराध निम्न प्रकार हैं …

     361. विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण–जो कोई किसी अप्राप्तव्य को, यदि वह नर हो, तो [सोलह] वर्ष से कम आयु वाले को, या यदि वह नारी हो तो [अठारह] वर्ष से कम आयु वाली को या किसी विकॄतचित्त व्यक्ति को, ऐसे अप्राप्तवय या विकॄतचित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है या बहका ले जाता है, वह ऐसे अप्राप्तवय या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण–इस धारा में “विधिपूर्ण संरक्षक” शब्दों के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता है जिस पर ऐसे अप्राप्तवय या अन्य व्यक्ति की देखरेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया है।

अपवाद–इस धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य पर नहीं है, जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह किसी अधर्मज शिशु का पिता है, या जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह ऐसे शिशु की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार है, जब तक कि ऐसा कार्य दुराचारिक या विधिविरुद्ध प्रयोजन के लिए न किया जाए।

362. अपहरण–जो कोई किसी व्यक्ति को किसी स्थान से जाने के लिए बल द्वारा विवश करता है, या किन्हीं प्रवंचनापूर्ण उपायों द्वारा उत्प्रेरित करता है, वह उस व्यक्ति का अपहरण करता है, यह कहा जाता है।

    363. व्यपहरण के लिए दण्ड–जो कोई [भारत] में से या विधिपूर्ण संरक्षकता में से किसी व्यक्ति का व्यपहरण करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

366. विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री को व्यपहृत करना, अपहृत करना या उत्प्रेरित करना–जो कोई किसी स्त्री का व्यपहरण या अपहरण उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए उस स्त्री को विवश करने के आशय से या वह विवश की जाएगी यह सम्भाव्य जानते हुए अथवा अयुक्त संभोग करने के लिए उस स्त्री को विवश या विलुब्ध करने के लिए या वह स्त्री अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध की जाएगी यह संभाव्य जानते हुए करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ; [और जो कोई किसी स्त्री को किसी अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिए विवश या विलुब्ध करने के आशय से यी वह विवश या विलुब्ध की जाएगी यह संभाव्य जानते हुए इस संहिता में यथा परिभाषित आपराधिक अभित्रास द्वारा अथवा प्राधिकार के दुरुपयोग या विवश करने के अन्य साधन द्वारा उस स्त्री को किसी स्थान से जाने को उत्प्रेरित करेगा, वह भी पूर्वोक्त प्रकार से दण्डित किया जाएगा।]

366क. अप्राप्तवय लड़की का उपापन–जो कोई अठारह वर्ष से कम आयु की अप्राप्तवय लड़की को अन्य व्यक्ति से अयुक्त संभोग करने के लिएविवश या विलुब्ध करने के आशय से या तद्द्वारा विवश या विलुब्ध किया जाएगा यह सम्भाव्य जानते हुए ऐसी लड़की को किसी स्थान से जाने को या कोई कार्य करने को किसी भी साधन द्वारा उत्प्रेरित करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

प ने जो विवरण बताए हैं उन के अनुसार उक्त शिक्षक ने उक्त अपराधों में से एकाधिक किए हैं।  इस के अतिरिक्त आप की बहिन से विवाह का शपथ पत्र लिखवा कर आप के परिजनों पर दबाव डाल कर उन से स्टाम्प पर लिखवाना भी धारा 383 भा.दं.संहिता में उद्दापन का अपराध है।  आप को चाहिए कि आप तुरन्त पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाएँ और पुलिस पर कार्यवाही करने को दबाव डालें। यदि पुलिस थाना कार्यवाही करने से इन्कार या देरी करता है तो पुलिस अधीक्षक को शिकायत लिख कर दें। यदि फिर भी कार्यवाही नहीं होती है तो आप सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत करें और आग्रह करें कि इसे अन्वेषण हेतु धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस को भेजा जाए।  इस रिपोर्ट व परिवाद में यह भी बताएँ कि आप की बहिन के शैक्षणिक दस्तावेज उस शिक्षक ने अपने कब्जे में लिए हुए हैं। जिस से पुलिस उन्हें भी शिक्षक से बरामद कर सके। इस काम में आप स्थानीय वकील की मदद लेंगे तो उत्तम रहेगा।

धोखे से निष्पादित कराए गए विलेख को दीवानी वाद प्रस्तुत कर निरस्त कराया जा सकता है।

समस्या-
बीकानेर, राजस्थान से गौरीशंकर आचार्य ने पूछा है –

किसी ने हमारे साथ धोखाधड़ी से हमारी जमीन की रजिस्ट्री करवा ली है।  क्या अब हम उसको किसी भी तरीके से केन्सिल करवा सकते हैं। क्या मैं उस व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर सकता हूँ।

मैं ने पहले भी यह जानकारी लेने के लिए कल 20 नवम्बर 2012 को भी आपकी साइट पर निवेदन किया था, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।  इसका जवाब जल्दी देना।

समाधान-

दि आप मुतमईन हैं कि आप के साथ धोखाधड़ी हुई है तो आप अपनी रजिस्ट्री को निरस्त करवा सकते हैं। लेकिन इस के लिए आप को न्यायालय में पर्याप्त सबूतों के आधार पर धोखाधड़ी को साबित करना होगा। इस के लिए आप को रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त करवाने के लिए दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। आप उस के साथ ही धोखाधड़ी करने वालों के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखवा कर अपराधिक मुकदमा भी चला सकते हैं। यदि पुलिस कार्यवाही नहीं करती है तो आप मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) के अंतर्गत पुलिस थाना को भिजवा सकते हैं। लेकिन धोखाधड़ी को साबित करने वाले साक्ष्य आप पुलिस को उपलब्ध कराव सकेंगे तभी उस मामले में पुलिस आरोप पत्र दाखिल करेगी।

प ने अंग्रेजी में अपनी समस्या लिखी थी। उस का भी समय पर उत्तर दिया जाता। तीसरा खंबा पर एक दिन में एक ही समस्या का समाधान किया जाता रहा है। इन दिनों समस्याएँ अधिक प्राप्त होने के कारण हम दिन में दो समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। वर्तमान में यह हमारी अधिकतम क्षमता है। आवश्यकता समझते हुए कुछ प्रश्नों के उत्तर जल्दी भी दिए जाते हैं लेकिन आम तौर पर क्रमबद्धता के साथ ही उनका उत्तर दिया जाता है। अनेक प्रश्न बिना किसी विवरण के, अपर्याप्त विवरण के अथवा अधूरे विवरण के होते हैं। उन का समाधान करना संभव नहीं होता है। यदि किसी समस्या का समाधान एक-दो सप्ताह में न मिले तो समस्या दुबारा प्रेषित कर देनी चाहिए।

498ए भा.दं.संहिता के मामले में अपील के स्तर पर राजीनामे आधार पर दंड समाप्त किया जा सकता है

समस्या-

मेरे सरकारी सेवारत मित्र को 498-क में सज़ा हुई है।  निचली अदालत में लड़की वाले दहेज का सामान और पैसा वापिस करने की शर्त पर राज़ीनामा करने हेतु मान गये थे।  किंतु उस समय मेरे मित्र नहीं माने।  अब सज़ा के बाद मामला सत्र न्यायालय में है।  अब मेरे मित्र लड़की वालों की शर्तों को मानकर राज़ीनामा करना चाहता है, ये विधि द्वारा कैसे संभव है?  क्या राज़ीनामा ना होने की दशा में सत्र न्यायालय से सज़ा की पुष्टि होने पर मेरे मित्र को जेल जाना पड़ेगा?  और क्या सत्र न्यायालय से सज़ा की पुष्टि के बाद मेरे मित्र की सरकारी नौकरी सदा के लिए जा सकती है?

-के.पी. सिंह, सतना, मध्यप्रदेश

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि राजीनामे की शर्तें क्या होंगी? फिर भी अपील के स्तर पर धारा 498ए भा. दं. संहिताके मामले में राजीनामा संभव है।  लेकिन राजीनामा प्रस्तुत करने के साथ ही यह तय करना होगा कि पति-पत्नी जिन के बीच में विवाद है क्या साथ रहने को सहमत हैं या अलग होने पर सहमत हो गए हैं और उन्हों ने सहमति से तलाक के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है।

दोनों ही स्थितियों में दोनों पक्षों के मध्य कोई लिखित अनुबंध गवाहों के सामने लिखा जाना चाहिए और उसे कम से कम नोटेरी पब्लिक से तस्दीक करा लेना चाहिए।  एक बार उक्त अनुबंध तस्दीक करवा लेने पर उस के अनुसार साथ रहना आरंभ करना चाहिए या फिर तलाक के लिए न्यायालय में आवेदन कर देना चाहिए। इस के उपरान्त दोनों को अपने अपने शपथ पत्र के साथ न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए कि इन परिस्थितियों में अपीलार्थियों को दंडादेश निरस्त कर दिया जाए। इस मामले में आप मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का मातादीन एवं अन्य बनाम राज्य के मामले में दिया गया निर्णय न्यायालय को उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत कर सकते हैं। यह निर्णय यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है।

इस मुक़दमे में क्या हो सकता है?

समस्या-

क लड़की ने जो कि मेरे मित्र के साथ एक प्राइवेट कंपनी मे काम करती थी 20/01/2010 को बलात्कार अपहरण और मारपीट की प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाई जिस में मेरे मित्र उसकी पत्नी, उनके माता पिता, भाई और भाई की पत्नी का नाम लिखा दिया।  उसका मेडिकल हुआ मेडिकल में रिपोर्ट आयी कि 2 फिंगर स्पेस है।  अंदर किसी तरह के शुक्राणु नहीं पाए गये और किसी तरह का चोट का निशान भी नहीं पाया गया।  उस का मेरे मित्र के साथ प्रेम संबंध था, लेकिन शारीरिक संबंध नहीं था।  मेरे मित्र का मेडिकल भी नहीं हुआ।  उस लड़की से मेरे मित्र की हमेशा बातचीत होती थी जिसकी सारी रेकॉर्डिंग मेरे मित्र के पास है और कॉल डिटेल्स भी पुलिस ने कोर्ट में लगाई है।  मेरे मित्र 4 महीने जेल में रहे तो लड़की वहाँ उस से मिलने भी जाती थी।  जो अखबार में छपा था और पुलिस ने भी अपनी डायरी में लिखा है।  पुलिस ने घर के सभी लोगों के नाम हटा केवल मेरे मित्र के विरुद्ध अपहरण, बलात्कार और धारा-120ख आईपीसी के तहत कोर्ट में दाखिल की है।  अभी कोर्ट में ट्रायल चल रही है।  इस केस में 4 आई.ओ. को वो लड़की बदलवा चुकी थी।  उधर लड़की ने एक एप्लिकेशन डीआईजी के पास दी है कि मुलजिम से पैसा लेकर पुलिस ने नाम निकाला है और उस के पक्ष में रिपोर्ट दी है इसलिए फिर से विवेचना की जाए।  पुलिस ने मेरे मित्र के घरवालों को तंग करना चालू कर दिया है।  क्या ये संभव है कि एक तरफ ट्रायल हो और दूसरी तरफ विवेचना फिर से हो।  इस का उपाय क्या है कि वो लड़की दुबारा एप्लिकेशन ना दे और पुलिस तंग ना करे?  लड़की ने जिरह में कहा है कि मैं जेल में मिलने नहीं जाती थी और मोबाइल से बात भी नहीं करती थी।  जब कि सारा रेकॉर्ड जेल में है और दो डिप्टी जेलरों को भी पुलिस ने गवाह बनाया है उनकी गवाही अभी नहीं हुई है।  बातचीत का सारा रेकॉर्डिंग की मेरे मित्र ने सीडी बनवा ली।  वकील तो कहता है कि कुछ नहीं होगा।  चाहे केस कोई भी हो लेकिन कोई भी वकील ये नहीं कहता है कि मैं केस हार जाउंगा?  इस मुक़दमे में क्या हो सकता है?

-मुकेश सिंह, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

ब हम वकालत के पेशे में आए थे तो कोई भी वकील किसी भी अभियुक्त से यह नहीं कहता था कि वह उसे बरी (दोषमुक्त) करा देगा।  उस वक्त के वकील यह कहते थे कि पुलिस ने आरोप लगाए हैं, सबूत भी जुटाए हैं इसलिए सजा होने की पूरी संभावना है और मैं कोशिश करूंगा कि आप की सजा को कम करवा दूँ या फिर बरी करवा दूँ।  लेकिन जैसे जैसे वकीलों की संख्या बढ़ती गई उन के बीच प्रतियोगिता भी बढ़ गई।   अब तो आलम ये है कि अपराधिक मुकदमों की वकालत करने वाले अधिकांश वकील बिना ये जाने भी कि मुकदमा क्या है, उस में आरोप क्या हैं और पुलिस ने क्या सबूत जुटाए हैं, यह कहते नजर आते हैं कि बरी करवा दूंगा।  लेकिन यह सत्य नहीं है।  आज भी अच्छे वकील स्पष्ट कहते हैं कि यह मुकदमे के विचारण में आई साक्ष्य से ही तय होगा कि सजा होगी या नहीं होगी, और कि मैं कोशिश करूंगा कि आप को दंड से बचा सकूँ या उसे कम करवा सकूँ।  खैर, मेरा तो यही कहना है कि जब किसी निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत हो तो जब तक मुकदमे का विचारण पूरा हो कर निर्णय पारित नहीं कर दिया जाता है तब तक उसे यही समझना चाहिए कि वह दोषी पाया जा सकता है और उसे दंडित किया जा सकता है।

मान लीजिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध पूरी तरह से मिथ्या रिपोर्ट थाने में दर्ज कराई जाती है, पुलिस सबूत एकत्र करती है तो शिकायतकर्ता पुलिस को मिथ्या साक्षी और दस्तावेज प्रस्तुत करता है और उस के आधार पर पुलिस आरोप पत्र प्रस्तुत करती है, तो यह भी हो सकता है कि उन्हीं मिथ्या साक्ष्य के आधार पर एक निर्दोष व्यक्ति को दोषी सिद्ध कर दिया जाए।  तब तो दंड मिलेगा ही मिलेगा।  यही कारण है कि अपराधिक न्याय शास्त्र में किसी भी अभियुक्त के बचाव करने के अधिकार को अत्यन्त गंभीर माना जाता है।  किसी भी अभियुक्त को पूरी तरह से बचाव करने का अवसर दिए बिना दंडित नहीं किया जा सकता।

प के मित्र के मामले में अत्यन्त छोटे छोटे तथ्यों को ले कर प्रसन्न हो सकते हैं कि प्रथम सूचना रिपोर्ट की कुछ बातें रिकार्ड से मिथ्या साबित हो जाएंगी और आप के मित्र निर्दोष सिद्ध होंगे।  लेकिन भारत में न्याय का सिद्धान्त यह नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति के बयान के एकाधिक तथ्यों के मिथ्या सिद्ध हो जाने से उस का पूरा बयान मिथ्या मान लिया जाएगा।  भारत में सिद्धान्त यह है कि साक्षी पूरा सच नहीं बोलता, इस लिए न्यायालय को हर बयान में से सच और झूठ को अलग करना चाहिए और उस आधार पर निर्णय देना चाहिए।  आप के मित्र के मामले में तीन आरोप हैं, हो सकता है उसे किसी आरोप का दोषी न माना जाए लेकिन कुछ आरोपों का दोषी सिद्ध मान लिया जाए।  जहाँ तक आप के मित्र के मामले में कोई स्पष्ट राय देने का प्रश्न है तो किसी भी अपराधिक मामले में आरोप पत्र तथा विचारण के दौरान न्यायालय के समक्ष आई हुई साक्ष्य का अध्ययन किए बिना कोई स्पष्ट राय नहीं बनाई जा सकती है। आप के मित्र को चाहिए कि किसी वकील से यह सुन कर कि वह उसे को बरी करा देगा निश्चिंत न हो जाएँ।  पूरी गंभीरता के साथ अपने मुकदमे की पैरवी करवाएँ, स्वयं भी मामले को समझें और समय समय पर अपने वकील को युक्तियों के सुझाव भी दें।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada