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जमीन पर आप का कब्जा मालिकाना है, आप मकान तुड़ा कर नया बनाने में बाधा पैदा करने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

अर्पण कुमार जैन ने सिद्धेकेला, जिला बोलानगीर, उड़ीसा से पूछा है-

रीब पचास साल पहले मेरे पापा ने एक जमीन खरीदी थी, पेपर में हाथ से लिखवा क़े। पर उस जमीन मेरे पापा के चाचा के लड़के ने अपने नाम पर करवा लिया।  पर उस जमीन पर हम ही इस्तेमाल करते हैं। अभी हम घर तोड़ के नया घर बना रहे हैं। तो हो नाम भी नहीं करने दे रहे और जमीन के भी एक हिस्सा मांग रहे है।

समाधान-

प की समस्या बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है। बस यह समझ आ रहा है कि आप के पिता ने किसी से एक जमीन खरीदी जिस का एग्रीमेंट किसी कागज पर हाथ से लिखा गया। उस जमीन पर मकान बना कर आप का परिवार निवास करता है। आप के पिता के चाचा के लड़के ने उस जमीन को अपने नाम करा लिया है। यह स्पष्ट नहीं किया है कि उस ने अपने नाम कैसे कराया है? किस रिकार्ड में वह जमीन पिता के चाचा के लड़के के नाम हुई है। जिस के कारण वह नया घर बनाने में अड़चन पैदा कर रहा है और जमीन का एक हिस्सा मांग रहा है।

आप के पिता ने एक हाथ से लिखे एग्रीमेंट के अंतर्गत जमीन खरीदी और उस का कब्जा ले लिया और मकान बना कर उस पर निवास कर रहे हैं।  किसी भी स्थायी संपत्ति जिस में मकान जमीन वगैरा शामिल हैं  उस का मूल्य 100 रुपए या उस से अधिक है तो उस संपत्ति के विक्रय का पंजीकरण होना आवश्यक है। आपने जो विवरण दिया है उस से लगता है कि आप के पिता ने उस का पंजीयन नहीं कराया था।

संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 53 ए में यह प्रावधान है कि किसी संविदा के अंतर्गत विक्रय की गयी संपत्ति का कब्जा यदि क्रेता को दे दिया गया है तो यह संविदा का आंशिक पालन है और ऐसा आंशिक पालन हो जाने के उपरान्त यदि पंजीयन न भी हो तो उस संपत्ति का कब्जा क्रेता से वापस नहीं लिया जा सकता है। हम इस तरह की समस्या का उत्तर पहले भी एक समस्या (संपत्ति अंतरण की किसी लिखत के अनुसार कब्जा दे दिए जाने पर किसी तरह वापस नहीं लिया जा सकता।) में दे चुके हैं।

आप के मामले में भी यही स्थिति है। इस तरह आप के या आप के पिता के पास जो संपत्ति है उस का कब्जा आप से या आप के पिता से कोई नहीं ले सकता। पिता के चाचा का लड़का यदि मकान को तुड़ा कर बनाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है तो आप के पिता या आप उस समय जमीन खरीद की कागज पर लिखत के आधार दीवानी न्यायालय में वाद संस्थित के कह सकते हैं कि जमीन आप के पिता ने इस लिखत से खऱीदी थी और उस पर मकान बना कर आप 50 वर्ष से निवास कर रहे हैं। इस तरह आप उस जमीन पर बहैसियत स्वामी काबिज हैं। इस मकान को तुड़ा कर दूसरा बनाना चाहते हैं ओर प्रतिवादी ( पिता के चाचा का लड़का) इस में बाधा बनता है और जमीन में हिस्सा मांगता है। उसे आप की जमीन पर दखल से रोका जाए और आदेश दिया जाए कि वह आप के मकान को तुड़ा कर नया बनाने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करे। इसी वाद में आप इस तरह के दखल के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त कर सकते है। बेहतर है कि आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे दीवानी मुकदमे लड़ने वाले वकील से मिलें और उस से परामर्श कर के यह वाद संस्थित करें। अस्थई निषेधाज्ञा प्राप्त होने के बाद आप जमीन पर बना मकान तोड़ कर नया बना सकते हैं।

दरवाजा व रास्ता कैसे बनाए रखें?

समस्या-

अन्नू पांडे ने पूछा है-

नमस्ते!
मेरे घर के पीछे कुछ खाली ग्राम समाज की जमीन है।
मेरे पिता के चाचा जी जो की मेरे घर से 200 मीटर दूर मकान मे रहते है।
मेरे घर के दवाज़े को लेकर रोज़ झगड़ा करते है की मैं उस दरवाज़े को बन्द कर दूँ।उनका कहना है के ये जमनीं उनकी है।जबकि वो ग्राम समाज है। और मेरे पिता के चाचा जी के पास 15 बीघा से ज्यादा का खेत और बाग अलग से है।
तो अब आप हमे बताइये की में अपना निर्माण कार्य किस प्रकार बिना दरवज़ा बन्द किये जारी रख सकता हूँ???

सलाह  

आप का दरवाजा पहले से है आप उसे कायम रखें।
बन्द करने की कहने वाले को कहें कि वह अदालत में जा कर नालिश करे।
यदि वह आप को तंग करता है तो पुलिस में रिपोर्ट कराएँ,  और फिर भी काम न बने तो अदालत में निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर  निर्माण कार्य तथा रास्ते में बाधा उत्पन्न न करने के लिए विपक्षी के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।


प्रिय पाठकों!

हम अपने पाठकों से प्राप्त सभी समस्याओं पर अपनी राय ई-मेल से दे रहे हैं।
हम उन्हें यहाँ भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो। हम जानना चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान इस तरह प्रस्तुत करने का यह प्रारूप आप को कैसा लगा। आशा है आप की टिप्पणियाँ हमें प्राप्त होंगी।
-दिनेशराय द्विवेदी

 

गलत निर्माण को रोकने या हटाने के लिए निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत करें

House demolishingसमस्या-

गोविन्द गौतम ने खजुराहो, छतरपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

किसी व्यक्ति द्वारा जबरन मेरी ज़मीन पर छत का छज्जा निकाला जाता है तो ऐसी स्थिति में मैं क्या कर सकता हूँ? पहले से पडौसी के पास दो दो दरवाज़े हैं फिर भी जबरन हमारी जमीन की तरफ तीसरा दरवाज़ा करना उस जगह दूसरे की ज़मीन आती है, वह भी परेशान है तो हम ऐसी स्थिति में क्या करें?

समाधान-

गरीय क्षेत्र में किसी भी आवासीय भूखंड पर निर्माण नगरपालिका या नगर विकास न्यास से बिना मानचित्र स्वीकृत कराए तथा अनुमति प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता। नगर पालिका इस तरह के निर्माण कार्य की स्वीकृति प्रदान नहीं करती है जिस से पड़ौसियों को परेशानी हो या उन के अधिकारों का अतिक्रमण हो। ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह का निर्माण किया जाए तो ग्राम पंचायत इसे रोक सकती है। इस तरह के निर्माण के विरुद्ध सब से आसान तरीका यह है कि जिसे परेशानी हो रही है उसे नगरपालिका अथवा ग्राम पंचायत को शिकायत करनी चाहिए। नगर और ग्राम में व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार इन संस्थाओँ को उचित कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि इस तरह के निर्माण नगर पालिका और ग्राम पंचायत द्वारा उचित कार्यवाही समय पर नहीं करने के कारण ही होते हैं।

दि ऐसा कोई भी निर्माण होने की आशंका हो तो जिस से किसी को परेशानी हो रही हो या फिर किसी के अधिकारों का अतिक्रमण होने वाला हो तो वह सीधे न्यायालय में अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए वाद प्रस्तुत कर उसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर सकता है और न्यायालय से ऐसे कार्य को रोके जाने के लिए आदेश जारी करा सकता है। यदि ऐसे निर्माण का कोई भाग या निर्माण पूरा कर लिया गया हो तो आज्ञात्मक निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए जिस में यह राहत चाही गई हो कि इस तरह का निर्माण वैध नहीं है और इस से आवेदक के अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है। न्यायालय ऐसे मामलों में हो चुके निर्माण को हटाने रास्ते, दरवाजे, खिड़की और पनाले को बन्द करने का आज्ञात्मक आदेश दे सकती है और उस आदेश का पालन करवा सकती है।

दीवानी मामले में दीवानी न्यायालय में कार्यवाही करें, केवल पुलिस को एफआईआर दर्ज कराने से काम नहीं चलेगा

houseconstruction
समस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से प्रगति तिवारी ने पूछा है –

मारे दादा जी द्वारा बनाए घर में तीन परिवार रहते हैं।  उन में से एक परिवार ने घर में अवैध रूप से तोड़-फोड़ शुरू कर दी है। मेरे पिता जी प्रथम सूचना रिपोर्ट FIR लिखाना चाहते हैं लेकिन उन में से एक परिवार ने सुझाव दिया कि आरोपी परिवार के विरुद्ध एक महीने पहले भी प्रथम सूचना रिपोर्ट उसी घर से हो चुकी है इस लिए हमारी रिपोर्ट अब 5 महीने के बाद ही लिखा सकते है। क्या ऐसा कोई नियम है?

समाधान-

सा कोई नियम नहीं है। जब भी अपराधिक घटना घटित हो या होने की संभावना हो तब प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है। आप के पिता जी को इस की रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिए। लेकिन आप का मामला अभी अपराधिक नहीं है। आप के तथ्यों के आधार पर केवल यह मामला बनता है कि मतभेद के कारण शान्ति भंग हो इस मामले में पुलिस अधिक से अधिक शान्ति भंग करने से रोकने के लिए परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करेगी और वहाँ से शान्ति भंग करने के लिए सभी पक्ष पाबन्द कर दिए जाएंगे। इस से कुछ भी हासिल होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। लेकिन रिपोर्ट पुलिस को अवश्य कर देनी चाहिए।

प का घर संयुक्त परिवार की संपत्ति है और अभी बँटवारा नहीं हुआ है। यह दीवानी अधिकारों का मामला है जिस मे दीवानी कार्यवाही करना ही उचित उपाय है। ऐसी स्थिति में आप के पिता जी को घर के बँटवारे के लिए वाद दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए और बँटवारे के विवाद का निपटारा होने तक उक्त घर में किसी भी तरह के निर्माण और तोड़ फोड़ करने से रोकने के लिए साथ में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए तथा उस में सभी विपक्षीगण के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए। इस वाद में आप  के दादा जी के सभी उत्तराधिकारी विपक्षी पक्षकार बनाए जाएंगे।

कोई जबरन लाठी के जोर से आप के कब्जे से जमीन नहीं ले सकता, आप राजस्व न्यायालय से स्थगन प्राप्त करें।

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समस्या-

कोरबा, छत्तीसगढ़ से राजेश ने पूछा है-

ज से 15 साल पहले मेरे पिताजी एक व्यक्ति (करीबी रिश्तेदार ) से २०००० रूपये में 20 डिसमिल सिंचित जमीन खरीदी थी।  जितना उन्होंने बताया  और रजिस्ट्री पेपर में भी यही लिखा हुआ है।  खेती की रजिस्ट्री एवं सारे फार्मेलिटी पूरी कर ली गई और हम पूर्ण स्वामित्व से विगत 15 सालों से खेती करते आ रहे हैं।  पर अचानक उस दुष्ट व्यक्ति द्वारा मेरे पिता जी के देहांत के बाद मुझे यह कह कर धमकाने लगा कि उसने सिर्फ 20 डिसमिल जमीन मेरे पिता को बेची थी।  बाकी के 8 डिसमिल जमीन मैं कब्जा कर रहा हूँ और कोई मना करने आया तो जान से मारने की धमकी दे रहा है।  अभी खेती का समय है हमने धान की बोवाई कर ली है और वो कब्जा करने वाला है।
वास्तविकता में वह जमीन 20 डिसमिल से कुछ ज्यादा है, पर यह पक्का नहीं है कि जमीन 28 डिसमिल ही है। पटवारी से हमने अभी तक नपवाया नहीं है।  तो क्या हमें 20 डिसमिल जमीन को छोड़कर बाकी के जितनी भी जमीन होगी उसे छोडनी पड़ेगी? मैं कैसे अपनी जमीन को बचाऊँ अगर वह इस कृत्य में दोषी है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा कैसे दिलवाऊँ? चूँकि इसके बेटे बेटियां पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं जिसके नाम पर वह हम लोगों पर धौंस जमाता है, और अभी मैं सिर्फ 20 साल का हूँ और अपने पिता की इकलौती संतान हूँ।

समाधान-

मीन पिछले 15 वर्षों से आप के कब्जे में है। रजिस्टर्ड विक्रय पत्र में क्या लिखा है यह नहीं बताया। यदि उस में बेचने वाले ने अपनी कुल जमीन 20 डिसमल ही बताई है और सब बेच दी है तो कुछ जमीन अधिक होने पर भी आप के स्वामित्व की है। आप के कब्जे में आप के स्वामित्व से अधिक की जमीन है तो उस का निर्णय न्यायालय करेगा। यह निर्णय लाठी के जोर से नहीं किया जा सकता। यदि उस व्यक्ति को लगता है कि आप के पास बेची गई जमीन से अधिक जमीन है तो वह न्यायालय में जमीन के कब्जे का वाद प्रस्तुत कर सकता है।  इस तरह जोर जबरदस्ती के माध्यम से जमीन को आप के कब्जे से वापस लेना उचित ही नहीं अपितु गैर कानूनी है।

प को चाहिए कि आप किसी वकील से संपर्क कर के उस व्यक्ति के विरुद्ध अपने निकट के राजस्व न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त करें कि वह जमीन पर आप के कब्जे को डिस्टर्ब न करे। वह व्यक्ति धमका रहा है तो स्थानीय पुलिस को रिपोर्ट करें। यदि आप को अंदेशा हो कि उस के पुलिस में कर्मचारी पुत्रों के कारण पुलिस कार्यवाही नहीं करेगी तो आप के इलाके के एस.पी. व आई जी से सीधे जा कर मिलें और सारी बात बता कर शिकायत करें।

मार्ग बन्द करने के प्रयास को रोकने के लिए नगरपालिका को शिकायत करें तथा दीवानी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करें।

समस्या-

सुमन कुमार ने देवपुरा बिहार से पूछा है-

मेरा घर से रोड की दूरी लगभग 10 मीटर है, बीच में 10 मीटर की डिस्टेन्स के सामने किसी दूसरे आदमी की ज़मीन है जो मेरा रास्ता बंद कर रहा है।  लेकिन वो रास्ता 7 फिट चौरा था, जिसका एक प्रूफ मेरे पास है।  मेरे दादा जी के समय का एक दस्तावेज जिस पर 10 लोगों के हस्ताक्षर हैं वो लोग गाली देता है और रास्ता बंद करने का धमकी दे रहा है, मुझे क्या क़ानूनी कार्यवाही मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

village roadरास्तों को अक्षुण्ण बनाए रखने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं की है। आप को उस व्यक्ति के विरुद्ध ग्राम पंचायत/ नगरपालिका में लिखित शिकायत करनी चाहिए। इस के अतिरिक्त वह गाली गलौच करता है और शान्ति भंग करता है इस के लिए पुलिस थाना को लिखित रिपोर्ट करनी चाहिए।

स के अतिरिक्त आप को दीवानी न्यायालय में अपने दस्तावेज के आधार पर एक वाद स्थाई निषेधाज्ञा हेतु प्रस्तुत कर उस रास्ते को बंद करने से रोकने के लिए ग्राम पंचायत/ नगरपालिका को पक्षकार बनाते हुए प्रस्तुत करना चाहिए और अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश प्राप्त करना चाहिए।

दि वह व्यक्ति गाली गलौच या शान्ति भंग करने से न रुके और पुलिस उस के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करे तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आप धारा 107, 116 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत सीधे शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। इस शिकायत पर पड़ौसी को पाबंद कर दिया जाएगा कि वह शान्ति भंग करने का कोई भी कृत्य नहीं करे।

अवैध अनधिकृत निर्माण को रोकने और हटाने के लिए स्थाई निषेधाज्ञा के लिए वाद प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करें।

समस्या-

भोपाल, मध्य प्रदेश से सौरभ ने पूछा है-

मेरी पुश्तैनी जमीन जबलपुर में है और मेरा परिवार अभी वहाँ नहीं रहता है। मेरे चाचा ने सूचना दी है कि मेरी उस जमीन पर कोई बिल्डर कब्जा कर रहा है। इस बात को अभी महिना भर हुआ है। उन लोगों को काम करने से कैसे रोकना चाहिए?

समाधान-

houseconstructionप को तुरन्त जबलपुर जा कर स्थिति को देखना चाहिए। यदि वास्तव में आप की संपत्ति पर कोई निर्माण कार्य चल रहा है तो किए गए निर्माण कार्य को और निर्माण सामग्री को आप तुरन्त अपने खुद के मजदूर लगवा कर हटवा दें, इस का आप को अधिकार है। लेकिन ऐसा करने में कोई पेरशानी हो तो इस अनधिकृत निर्माण को रुकवाने के लिए आप को स्थाई निषेधाज्ञा का दीवानी वाद प्रस्तुत करना चाहिए तथा इसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए।

किसी भी निर्माण कार्य को करने के पहले नगरपालिका से मानचित्र स्वीकृत करवाना और निर्माण की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। ऐसी स्वीकृति व अनुमति निश्चित रूप से कब्जा करने वाले ने प्राप्त नहीं की होगी। इस कारण से आप नगर पालिका को भी इस मामले में पक्षकार अवश्य बनाएँ और उन के विरुद्ध यह राहत मांगें कि वह मौके पर जा कर निर्माण कार्य को रोके।

क्त मुकदमा करने के पहले आप नगर पालिका को लिखित शिकायत भी करें कि आप की संम्पत्ति पर बिना मानचित्र स्वीकृत कराए और निर्माण की स्वीकृति प्राप्त किए बिना कोई अनधिकृत व्यक्ति निर्माण करना चाहता है। उसे रुकवाया जाए और निर्माण कर दिया हो तो उसे हटाया जाए।

पड़ौसी के पेड़ों से घर की दीवार के नुकसान के हर्जाने और पेड़ हटाने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करें।

समस्या-

बालौदा, छत्तीसगढ़ से राजेश लहरे ने पूछा है –

मै एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति हूँ।  मेरा पड़ोसी जात पात का द्वेश का भाव रखता है, उसने मेरे घर की बाउंड्रीवाल के चारों तरफ बांस और कई वृक्ष लगाए हैं, जो मेरे घर की दीवार को बुरी तरह से नष्ट कर रहे हैं।  पेड़ों से एक डाली तक तोड़ने पर गन्दी गन्दी गालियाँ देता है।  मैं इस व्यक्ति से काफी परेशान हूँ।  कृपया मेरा मार्गदर्शन करें की मै उनके वृक्ष को कैसे कटवा सकता हूँ जो मेरे घर की दीवार को नष्ट कर रहे हैं?

समाधान-

Damages from treesप ने यह नहीं बताया कि जिस भूमि पर आप के पड़ौसी ने पेड़ लगाए हैं वह किस के स्वामित्व की है, वह उस व्यक्ति के स्वामित्व की है या फिर सार्वजनिक भूमि पर है? यदि वह उस व्यक्ति के स्वामित्व की है तो आप को हर्जाने व स्थाई व्यादेश प्राप्त करने हेतु दीवानी वाद न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए और उस व्यक्ति से आप के मकान की दीवार की क्षति के लिए हर्जाने की मांग करते हुए पेड़ों को हटाने की राहत दिलाने की प्रार्थना न्यायालय से करना चाहिए। इसी मुकदमे में अस्थाई व्यादेश हेतु आवेदन प्रस्तुत कर पेड़ों को हटाने या निरंतर छाँटने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर तुरंत राहत भी प्राप्त की जा सकती है।

दि ये पेड़ सार्वजनिक भूमि पर लगाए गए हैं तो आप को ग्राम पंचायत, नगर पालिका जो भी हो वहाँ शिकायत करनी चाहिए और पेड़ हटाने का निवेदन करना चाहिए। इस के लिए आप जिला कलेक्टर को भी लिख सकते हैं। इन से भी काम न चले तो आप एसडीओ के न्यायालय में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के अंतर्गत न्यूसेंस हटाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के अतिरिक्त ग्राम पंचायत/नगरपालिका और उस व्यक्ति को पक्षकार बनाते हुए हर्जाने और अस्थाई व्यादेश प्राप्त करने हेतु वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

दि वह व्यक्ति आप को जाति के कारण अपमानित व प्रताड़ित करता है और दो सवर्ण व्यक्ति इस बात के गवाह हों तो आप पुलिस थाना में अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज कराएँ। पुलिस उस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करेगी।

वाद कभी भी स्वीकार किया जा सकता है, आप को न्याय के लिए लड़ना चाहिए

समस्या-

जयपुर, राजस्थान से मनोज ने पूछा है-

मेरी समस्या है कि मेरा एक मकान है जिसे विक्रय करने हेतु मैं ने 2-4-2011 को एक व्यक्ति साथ एग्रीमेंट किया था (जो कि दिल्ली की रहने वाला है) इस एग्रीमेंट की शर्तों में एक शर्त मेरी तरफ़ से थी कि क्रेता पेशगी रकम के अलावा जो राशी बचेगी उसका आधा चार माह के अंदर अदा कर देगा एंव बाकी राशि आठ माह के अंदर अदा करके रजिस्ट्री अपने नाम करवा लेगा। लेकिन 4 माह बीत जाने पर भी क्रेता ने कोई रकम अदा नहीं की। तब मैं ने दिनांक 3-8-2011 को एक हस्तलिखित रिमाईंडर रजिस्टर्ड डाक से भेजा कि वह शर्त के अनुसार रकम का भुगतान 7 दिन के अंदर कर दे अन्यथा आगे की कर्यवाही का वह स्वयं जिम्मेदार होगा।  इसका उस ने कोई जवाब नहीं दिया।  1-9-2011 को मैं ने अपने वकील द्वारा एग्रीमेंट निरस्त करने का नोटिस उसे रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया जिसका भी क्रेता ने कोई उत्तर नहीं दीया।  दो माह बाद 14-11-2011 को क्रेता के वकील का नोटिस मेरे पास आया जिसमें उल्टा मुझ पर ही यह आरोप लगाया गया कि क्रेता 1-7-2011 को चैक लेकर आया था मगर मैं ने नगद लाने को कहा।  फ़िर क्रेता 15-7-2011 को नगद राशि लेकर आया था।  वो भी मैं ने लेने से मना कर दिया (1-7-11 को आने के लिये प्रयोग की गई कार का नं. भी उन्हों ने लिखा है)।  इस नोटिस का जवाब मेरे वकील ने दे दिया कि उनके द्वारा कही गई बातें गलत हैं ऒर एग्रीमेंट निरस्त हो चुका है।  1-12-2011 को क्रेता का फ़ोन मेरे मोबाइल पर आया जो उसने किसी P.C.O. से किया था।  उसने मुझ से रजिस्ट्रार ऑफ़िस आने को कहा।  मैं वहां गया तो वो मुझे नहीं मिला तो मैं ने अपनि उपस्थिति दर्ज करवाने हेतु रसीद कटवा ली।  इसके करीब 9 माह की शान्ति के बाद मेरे पास कोर्ट से नोटिस आया जिस में उसने आदेश 9 -नियम 1 के तहत दीवानी वाद दर्ज किया है।  इसमें 4 राहतें न्यायालय से चाही गई हैं कि 1- वादीगण से शेष राशि प्राप्त करके जायदाद का कब्जा संभला दिया जाए. 2- स्थाई निषेधाग्या जारी की जाए कि प्रतिवादी जायदाद किसी अन्य को अन्तरित नहीं करे।  3- वाद व्यय वादी को प्रतिवादी से दिलाने की कृपा करें। 4- अन्य अनुतोष जो भी न्यायालय उचित समझे प्रतिवादी से दिलाने की कृपा करें।  मेरे मिलने वालों की सलाह है कि एक बार अदालत गए तो सालों बीत जाएंगे इसीलिये जैसा वह कहें कर लो मगर मेरा ये मानना है कि सही होने के बावजूद मैं हार क्यों मानूँ ओर दंड क्यों भुगतूँ?
अब कृपया आप मुझे परामर्श दें कि मुझे क्या करना चाहिये।

समाधान-

प पूरी तरह से सही हैं. आप के उक्त मामले में जो भी सावधानियाँ आप के द्वारा बरती गई हैं। उस के बाद आप का इस मुकदमे में सफल होना निश्चित है। यदि न्यायालय मुकदमे के दौरान इस बात पर किसी तरह की अस्थाई निषेधाज्ञा के माध्यम से उक्त संपत्ति को विक्रय करने या आगे स्थानान्तरित करने पर रोक नहीं लगाता है तो आप को कोई हानि नहीं है। आप ने यह नहीं बताया है कि वादी ने अस्थाई निषेधाक्षा के लिए भी कोई आवेदन प्रस्तुत किया है अथवा नहीं? लेकिन दी हुई परिस्थितियों में हम यह मान कर चलते हैं कि अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया होगा।

जो तथ्य आप ने यहाँ बताए हैं उन के आधार पर वादी को कोई अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त नहीं होनी चाहिए। फिर भी यदि कोई अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश होता है तो आप उस की अपील अपील-न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को यह मुकदमा लड़ना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए।

दि लोगों की सलाह ही माननी हो तो कम से कम विचारण न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन निर्णीत होने और उस की अपील के निर्णय तक तो आप को प्रतीक्षा करनी चाहिए। जो राहत वादी ने न्यायालय से चाही है उसे तो आप कभी भी स्वीकार कर सकते हैं। यदि कोई अस्थाई निषेधाज्ञा जारी नहीं होती है तो आप संपत्ति को किसी भी समय अपनी इच्छानुसार विक्रय या हस्तांतरित कर सकते हैं।

पैतृक संपत्ति में पृथक हिस्से के लिए बँटवारे का वाद प्रस्तुत करें

समस्या-

बर्दवान, बिहार से युवराज ने पूछा है –

मैं एक पाँच वर्ष के बालक का पिता हूँ। दो वर्ष पहले मुझे मेरे पिताजी के घर से निकाल दिया गया क्योंकि मेरे पिताजी लालची प्रवृत्ति के इंसान हैं। मैं ने लव मैरिज की थी, जिसे बाद में मेरे पिता जी ने मान लिया। उस समय मेरे ससुर जी ने मुझे एक लाख रुपए और कुछ सोना दिया था।  बाद में मेरे पिताजी ने और मांगना आरंभ कर दिया।  मुझसे कहते थे कि अपने ससुर से पैसे मांगो, बोलना बिजनेस करना है।  पर मैं ने शर्म के कारण कभी नहीं मांगा।  फिर एक दिन पिताजी और मेरे बीच झगड़ा हुआ और उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया।  दो वर्ष से मेरी पत्नी और बच्चा पत्नी के मायके में हैं। मैं उसी के पास के शहर में प्राइवेट नौकरी करता हूँ।  भाड़े के मकान में रहता हूँ।  गाँव में हमारा एक घर है जो दादा जी का है, दादाजी अब नहीं रहे। मेरे पिता जी दादा जी की इकलौती संतान हैं। हम तीन भाई हैं और मैं सब से बड़ा हूँ। क्या मैं इस संपत्ति में से कुछ प्राप्त कर सकता हूँ और अगर प्राप्त कर सकता हूँ तो उस के लिए मुझे क्या करना पड़ेगा? इस में कितना समय लगेगा? यदि मेरे पिताजी उक्त संपत्ति में से कुछ को बेचना चाहें तो क्या मैं उन्हें रोक सकता हूँ?

समाधान-

रंपरागत हिन्दू विधि यही है कि यदि किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो वह पैतृक संपत्ति है। इस में पौत्रों व परपौत्रों का भी हिस्सा होता है।  लेकिन 1956 में उत्तराधिकार अधिनियम आ जाने के उपरान्त स्थिति में कुछ परिवर्तन आया।   पुत्रियों और पत्नी को भी पिता का उत्तराधिकारी घोषित कर दिए जाने से ऐसी संपत्ति में पोत्रों के अधिकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया।  फिर 2005 में उत्तराधिकार अधिनियम में पुनः संशोधन हो जाने पर स्थिति में फिर से परिवर्तन हुआ।  इस कारण से इस तरह के मामलों में सही विधिक राय के लिए कुछ तथ्यों की जानकारी होना अत्यन्त आवश्यक हैं।  आप के मामले में यह तथ्य आवश्यक थे कि आप के दादा जी का देहान्त कब हुआ?  आप के दादा जी को यह संपत्ति अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी?  या उन्हों ने इसे स्वयं अर्जित किया था? आप के पिता जी की कोई बहन या बहनें हैं अथवा नहीं हैं?  इन तथ्यों की जानकारी के अभाव में अंतिम रूप से सलाह दिया जाना संभव नहीं है।

प के पिताजी को संपत्ति उन के पिता अर्थात आप के दादा जी से प्राप्त हुई है।  आप के पिता के कोई बहिन नहीं थी वैसी स्थिति में यह संपत्ति एक पैतृक संपत्ति है।  आप के दादा जी के देहान्त के उपरान्त यह संयुक्त हिन्दू परिवार की अविभाजित संपत्ति है।  इस संपत्ति में केवल आप के पिता का ही नहीं अपितु उन की संतानों का भी बराबर का हिस्सा है।

दि आप इस संपत्ति में से अपना हिस्सा अलग करना चाहते हैं तो आप को उक्त संपत्ति के विभाजन के लिए वाद दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। विभाजन के इस वाद के निर्णय में जो भी समय लगेगा वह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस संबंध में आप को अनुमानित समय केवल कोई स्थानीय वकील ही ठीक से बता सकता है।

दि आप को यह आशंका है कि आप के पिता उक्त संपत्ति या उस के किसी भाग को विक्रय कर सकते हैं तो आप को तुरन्त ही न्यायालय में संपत्ति के विभाजन  के लिए वाद प्रस्तुत करना चाहिए और साथ में अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु एक आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए जिस में यह प्रार्थना करनी चाहिए कि आप के पिता या अन्य सहदायिक संपत्ति को हस्तान्तरित  कर सकते हैं इस कारण से मुकदमे का निर्णय होने तक उक्त संपत्ति के किसी भी प्रकार से हस्तान्तरण पर रोक लगाई जाए। अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर लेने पर विभाजन के पूर्व आप के पिता या अन्य कोई सहदायिक उक्त संपत्ति या उस के किसी भाग को हस्तांतरित नहीं कर पाएगा।

स मामले में आप को तुरन्त अपने जिला मुख्यालय पर दीवानी मामलों के अनुभवी स्थानीय वकील को सभी आवश्यक दस्तावेज या जानकारी उपलब्ध करवा कर सलाह प्राप्त करनी चाहिए।

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