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सेवा प्रदाता के विरुद्ध सेवा समाप्ति का विवाद श्रम विभाग में उठाएँ।

THE_INDUSTRIAL_DISPUTES_ACTसमस्या-

पंकज कुमार ने पूसा, समस्तीपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार के एक विभाग में कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर संविदा के रूप में जनवरी 2014 से काम करना शुरू किया था। विश्वविद्यालय मुझे सर्विस प्रदाता द्वारा वेतन देता था जिसका नाम VANISYSTEM P. Ltd, 16 Vidhan Sabha Marg above Andhra Bank, Lucknow (U.P.) है। जनवरी से अक्टूबर 2014 तक मेरा वेतन मिला था. उसके बाद नवंबर का वेतन विभाग द्वारा 13 दिसंबर को VANI SYSTEM के खाता पर RTGS के द्वारा भेज दिया गया। (विभाग मेरा सैलरी कंपनी को RTGS के द्वारा भेजता उसके बाद कंपनी मेरे बैंक खाता पर भेजता था) 16 दिसंबर को मैंने फ़ोन से वेतन भेजने की बात कंपनी से की तो कम्पनी का अकाउंटेंट मीनू यादव मुझे फ़ोन पर कहा की ये तुम्हारे बाप का कंपनी नहीं जो तुम कहो और मैं भेज दूँ। मैंने उनसे कहा की मैं विश्वविद्यालय के कुलपति से शिकायत करूँगा तो उन्हें इस बात का बुरा लगा। उन्होंने मुझे मेल किया कि तुम्हारा टर्मिनेशन लेटर भेज रही हूँ तुम्हारे ऑफिसर को। मैंने उनको मेल के द्वारा कहा कि अगर आप की मर्जी यही है तो मैं काम छोड़ दूंगा लेकिन आप मेरा वेतन तो दे दीजिये। लेकिन उन्होंने मेरा वेतन नहीं दिया और काम से भी हटा दिया। अब किसी लड़की को उस जगह पर रखा जा रहा है। मेरे साथ गेम खेला गया है। कंपनी बहाना बना रही है कि इस ने मुझे गाली दिया इसलिए इसको हटाया। जब कि मैंने कोई गाली नहीं दी। मुझे जो अनुबंध पत्र दिया गया था जिस में लिखा हुआ है की विभाग से शिकायत मिलने पर बिना सूचना के हटा दिया जाएग़I परन्तु विभाग से कोई शिकायत नहीं गया है। मैं बहुत गरीब और बाल बच्चेदार हूँ मेरी पारिवारिक स्थिति काफी ख़राब है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ जिस से मुझे वही काम भी मिल जाये और वेतन भी मिल जाये। मैं बहुत तनाव में हूँ और लगता है कि गरीबी से तंग आकर मैं कोई गलत काम ना कर बैठूँ। कृपया मेरी मदद करें।

समाधान-

प को यह साफ समझ लेना चाहिए कि आप किसी भी तरह से विश्वविद्यालय के कर्मचारी नहीं थे। विश्वविद्यालय तो सेवा प्रदाता से सेवाएँ प्राप्त करता है जिस के लिए वह सेवा प्रदाता को उन की आपसी संविदा के आधार पर भुगतान करता है। आप का नियोजक सेवा प्रदाता था, वह आप को वेतन का भुगतान करता था तथा आप के नियोजक की ओर से प्रदान की गई सेवाओँ के अन्तर्गत आप विश्वविद्यालय में काम करते थे। आप का विश्वविद्यालय से और कोई लेना देना नहीं था।

प गरीब हैं इस से किसी को कोई लेना देना नहीं है। विश्वविद्यालय यदि खुद कर्मचारी रखता है तो उन्हें वेतनमान में वेतन देना होता है, ऐसे कर्मचारियों को संविधान के अन्तर्गत सुरक्षा प्राप्त होती है तथा अनेक सुविधाएँ देनी होती हैं जो विश्वविद्यालय को बहुत महंगी पड़ती हैं। इतना बजट सरकार उन्हें उपलब्ध नहीं कराती, न ही स्थाई पद उपलब्ध कराती है। वैसी स्थिति में किसी सेवा प्रदाता से इस तरह सेवाएँ प्राप्त करना उन्हें बहुत सस्ता पड़ता है।

प सेवा प्रदाता के कर्मचारी थे। विश्वविद्यालय और आप के सेवा प्रदाता दोनों के कार्य उद्योग के रूप में परिभाषित हैं। इस कारण आप के सेवा प्रदाता को आप को औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ की पालना में सेवा से पृथक करने के पूर्व नोटिस या नोटिस वेतन देना चाहिए था तथा मुआवजा भी देना चाहिए था। आप से कनिष्ट कर्मचारी भी आप के सेवा प्रदाता के यहाँ काम कर रहे होंगे। उन्हें सेवा में रखते हुए आप को सेवा से पृथक किया गया है इस तरह धारा 25 जी की भी पालना नहीं हुई है। आप को हटा कर एक नए कर्मचारी को नियोजन दे दिया गया है इस तरह धारा 25 एच की पालना भी नहीं हुई है।

स तरह आप की सेवा समाप्ति आप की छंटनी है जो धारा 25 एफ व जी की अनुपालना के अभाव में अवैध है। साधारणतया आप पिछले पूरे वेतन सहित पुनः सेवा प्रदाता की सेवा में लिए जाने के अधिकारी हैं। 25 एच की पालना न करने के कारण भी आप सेवा में लिए जाने के अधिकारी हैं। इस के लिए आप को स्थानीय श्रम विभाग में अपना विवाद उठाना चाहिए। श्रम विभाग के समझौता अधिकारी आप और आप के सेवा प्रदाता के बीच तुरन्त समझौता वार्ता आरंभ कराएंगे और आप को पुनः सेवा में रखवाने का प्रयास करेंगे। समझौता वार्ता का 45 दिन में कोई परिणाम न निकलने अथवा असफल रहने पर आप सीधे श्रम न्यायालय में अपना विवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के साथ ही बकाया वेतन के लिए भी आप को वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत अपना दावा प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

स तरह के विवादों का निर्णय होने में कई वर्ष लग जाते हैं क्यों कि हमारे यहाँ श्रम न्यायालय जरूरत से बहुत कम हैं। श्रम न्यायालय के निर्णय के बाद भी पुनः नौकरी प्राप्त करना इतना आसान नहीं होता। इस कारण आप को अपना जीवन यापन करने के लिए कोई न कोई वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। आप अपना विवाद उठाइए और अवश्य लड़िये। एक नौकरी चले जाने से जीवन हार जाना ठीक बात नहीं है। जीवन सदैव अनमोल है, चाहे कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो। कभी कभी ऐसा भी होता है कि ऐसी टटपूंजिया नौकरी छूटने पर प्रयास करने पर व्यक्ति अच्छे अवसर प्राप्त कर लेता है या किसी अच्छे धंधे या प्रोफेशन में चला जाता है और कुछ ही वर्षों में यह टटपूंजिया नौकरी बेकार लगने लगती है।

बिना लिखित आदेश या नोटिस के बिना सेवा से पृथक किया है तो श्रम विभाग को शिकायत प्रस्तुत करें

retrenchmentसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने जी ने गोलूवाला सिहागन, पीलीबंगा, जिला हनुमानगढ़ राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं उत्तराखंड की एम एण्ड एम लि. फैक्ट्री में 08 मई 2010 , 07 अगस्त 2012 तक इंजन विभाग केकी असेम्बली लाइन और टेस्टिंग में तीन शिफ्टों में रोटेशन में कार्य करता रहा। मुझे बिना नोटिस दिए ट्रेनिंग का हवाला देते हुए सेवा से हटा दिया। इस के पहले मैं 2009 में दो वर्ष की अप्रेंटिसशिप पूरी कर चुका था। मेरे वेतन से पीएफ, ईएसआई के अंशदान की राशि की कटौती होती थी तथा मुझे मकान किराया, वाहन, भोजन व चिकित्सा भत्ते मिलते थे तथा बोनस भी मिला था। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

दि कोई नियोजक किसी व्यक्ति को अपने उद्योग में नियोजित करता है तो एप्रेंटिसेज एक्ट 1961 में पंजीकृत किए गए एग्रीमेंट से नियोजित किए गए प्रत्येक कर्मकार के अलावा सभी कर्मकार उस उद्योग के कर्मकार होते हैं। आप की एप्रेंटिसशिप 2009 में ही पूर्ण हो चुकी थी। उस के बाद आप को उद्योग द्वारा नियोजित कर लिया गया था। इस तरह आप भी उद्योग के कर्मकार थे।

कोई भी नियोजक किसी व्यक्ति को ट्रेनी बताते हुए भी नियोजन दे सकता है लेकिन यह नियोजन भी एक नियमित नियोजन ही होता है। इस तरह के नियोजनों में जो नियुक्तिपत्र होता है उस में अक्सर एक शर्त होती है कि उन्हें किसी निश्चित अवधि के लिए ट्रेनिंग प्राप्त करने के लिए नियोजन दिया जा रहा है, ट्रेनिंग समाप्त होने के पश्चात कर्मकार का नियोजन स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। यदि किसी कर्मकार के नियुक्तिपत्र में ऐसी कोई शर्त होती है तो वह अवधि या नियत तिथि आते ही कर्मकार का नियोजन वैधानिक रूप से समाप्त हो जाता है। ऐसा नियुक्तिपत्र कर्मकार को दिया जाना चाहिए पर अक्सर नियोजक अपने कर्मकार को ऐसे नियुक्ति पत्र की प्रतिलिपि प्रदान नहीं करता केवल नियोजन देते समय उस पर कर्मकार से हस्ताक्षर करवा कर अपने पास रख लेता है। ट्रेनिंग की निर्धारित अवधि समाप्त होने पर या निश्चित तिथि के उपरान्त ऐसे कर्मचारी को सेवा से हटा दिया जाता है। ऐसी सेवा समाप्ति को चुनौती नहीं दी जा सकती।

प के मामले में यदि आप के नियुक्ति पत्र में सेवा समाप्ति की कोई तिथि या नियोजन की कोई निश्चित अवधि अंकित है और आप को उस निश्चित अवधि समाप्ति के दिन अथवा उस निश्चित तिथि को सेवा से हटाया गया है तो आप के पास ऐसी सेवा समाप्ति को वैधानिक रूप से चुनौती देने का कोई मार्ग नहीं है। लेकिन यदि आप को ऐसी निश्चित अवधि समाप्त होने की तिथि के अथवा निर्धारित तिथि के कुछ दिनों के बाद सेवा से हटाया गया है तो आप अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती दे सकते हैं।

हो सकता है आप को पता ही नहीं हो कि आप का नियुक्ति पत्र कैसा है या फिर उस में इस तरह की कोई शर्त है या नहीं है। ऐसी स्थिति में आप जिस क्षेत्र में उक्त उद्योग स्थित था उस क्षेत्र के श्रम विभाग के कार्यालय में एक आवेदन प्रस्तुत करें कि आप को दो वर्ष तीन माह की सेवा के बाद बिना किसी नोटिस, नोटिस वेतन या छंटनी का मुआवजा अदा किए बिना या ऑफर किए बिना सेवा से हटा दिया गया है जो कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25 एफ के प्रावधानों की पालना नहीं किए जाने के कारण उचित एवं वैध नहीं है। आप को पिछले पूरे वेतन व अन्य सुविधाओँ के साथ सेवा में रखवाया जाए। आप अपनी शिकायत प्रस्तुत करने के सबूत के रूप में एक प्रति पर श्रम विभाग से प्राप्ति स्वीकृति के हस्ताक्षर करवा कर मुहर अवश्य लगवा लें। श्रम विभाग आप की शिकायत को दर्ज कर के आप के नियोजक से इस शिकायत का उत्तर मांगेगा। यदि नियोजक उत्तर देता है तो आप की शिकायत और नियोजक के उत्तर के आधार पर श्रम विभाग को कोई औद्योगिक विवाद दिखाई पड़ता है तो वे आप दोनों के बीच कोई समझौता कराने का प्रयत्न करेंगे, समझौता न होने पर आप के विवाद को श्रम न्यायालय को भेजे जाने के लिए राज्य सरकार को रिपोर्ट भेज देंगे।

क्त शिकायत किए जाने के दिन से 45 दिनों के भीतर श्रम विभाग उक्त कार्यवाही पूर्ण कर के कोई नतीजा देता है तो ठीक है अन्यथा आप शिकायत की प्राप्ति स्वीकृति वाली प्रति के साथ सीधे श्रम न्यायालय को अपना विवाद प्रस्तुत कर सकते हैं जिसे राज्य सरकार द्वारा प्रेषित रेफरेंस की तरह श्रम न्यायालय द्वारा निर्णीत किया जाएगा। चूंकि मामले में कानूनी बिन्दु बहुत महत्व के हैं इस कारण से श्रम कानूनों के जानकार और इस तरह का काम करने वाले किसी ट्रेडयूनियन के पदाधिकारी या किसी वकील की मदद लेना आप के लिए हितकर होगा।

अधिकांश सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा नहीं।

कानूनी सलाहसमस्या-

सुन्दर सिंह ने भिवानी हरियाणा से पूछा है-

मैं वर्तमान में एक निजि उत्पादक कंपनी में बावल (रेवाड़ी) में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के पद पर मार्च 2013 से नियोजित हूँ। नियोजक मुझे बिना कोई कारण बताए सेवा से हटाना चाहते हैं । मुझे कोई ऑफर लेटर, नियुक्ति पत्र आदि नहीं दिए गए थे। मेरा वेतन सीधे मेरे बैंक खाते में 15000 रुपए प्रतिमा जमा होता है। मुझे कोई वेतन वृद्धि नहीं दी गई है। नियोजक के पास मुझे सेवा से हटाने का कोई उचित कारण नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प एक कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव हैं। कुल मिला कर आप का काम कंपनी के विक्रय में वृद्धि करने के लिए काम करना है। औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 में आप को कर्मकार नहीं माना है। इस कारण से आप उस अधिनियम के लाभ नहीं ले सकते। 1976 में संसद ने सेल्स प्रमोशन एम्प्लाइज (कंडीशन्स ऑफ सर्विस) एक्ट बनाया था। जिस के द्वारा सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 का लाभ प्रदान करने के प्रावधान बनाए गए। इस कानून को केवल मेडीकल सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों पर ही लागू किया गया। इसे अन्य प्रकार के सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों पर भी लागू किया जाना था। लेकिन 1980 के बाद देश में श्रमिक-कर्मचारी आंदोलन कमजोर हो गया। सरकार पर कोई दबाव नहीं रहा और यह कानून अन्य उद्योगों के कर्मचारियों पर लागू नहीं हो सका। यहाँ तक कि मेडीकल सेल्स कर्मचारियों को भी इस के लाभ जो मिलने थे वे नहीं मिले। फेडरेशन ऑफ मेडीकल एण्ड सेल्स रिप्रेजेण्टेटिव्ज एसोसिएशन्स ऑफ इंडिया (FMRAI) के आंदोलन की बदौलत दिनांक 31.01.2011 को केन्द्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर इस कानून को 1. सौन्दर्य प्रसाधन, साबुन, घरेलू क्लीनर्स व विसंक्रामक उद्योग, 2. रेडीमेड कपड़ा उद्योग,  3. सोफ्ट ड्रिंक उत्पादक उद्योग, 4. बिस्किट एवं कन्फेक्शनरी उद्योग, 5. आयुर्वेदिक, यूनानी एवंं होमियोपैथिक दवा उद्योग, 6. आटोमोबाइल व उस के पार्ट्स व एसेसरीज उत्पादक उद्योग, 7. सर्जिकल इक्विपमेंट्स, कृत्रिम अंग व डायग्नोस्टिक्स उद्योगों, 8. इलेक्ट्रोनिक्स, कम्प्यूटर्स, उन की एसेसरीज व स्पेयर पार्टस् के उत्पादक उद्योगों, 9. इलेक्ट्रिकल एप्लाएंसेज उद्योग व 10. पेन्ट्स व वेनिशेज उद्योगों पर प्रभावी बनाया गया है।

स तरह यदि आप उक्त उद्योगों में से किसी एक उद्योग में कार्यरत थे तो आप को कानूनी संरक्षा मिल सकती है और आप की यह सेवा समाप्ति अवैध छंटनी है और आप अपनी छंटनी के विरुद्ध श्रम विभाग को शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन यदि आप उक्त वर्णित उद्योगों  के अतिरिक्त किसी अन्य उद्योग में कार्यरत थे तो आप का नियोजन किसी प्रकार के कानून से संरक्षित नहीं है और सिर्फ नियोजक-कर्मचारी के बीच हुए अनुबंध पर आधारित है। जिस में बिना कारण सेवा से पृथक किए जाने पर सिर्फ क्षतियों की मांग की जा सकती है। वह भी तब जब कि वह अनुबंध में शामिल हो। आप के तथा नियोजक के बीच तो कोई अनुबंध भी नहीं है। इस कारण आप नियोजक से सिर्फ अपना काम किए गए दिनें का वेतन प्राप्त कर सकते हैं। पाँच वर्ष की सेवा पूर्ण न होने से ग्रेच्युटी का आप को अधिकार नहीं है, यदि किसी प्रोविडेण्ट फण्ड के लिए आप के वेतन से कटौती की गई हो तो अधिक से अधिक आप अपने फंड का धन प्राप्त कर सकते हैं। कानून से आप को कुछ भी मदद मिलने की संभावना नहीं है।

सेवा समाप्ति की अवैधानिकता को चुनौती दें।

Terminationसमस्या-
ऋषिकेश ने जयपुर राजस्थान से पूछा है-

मैं जयपुर के एक निजी विश्वविद्यालय में पिछले 3 वर्ष से कार्यरत था लेकिन डिपार्टमेंटल द्वेषतावश मुझे लगभग एक माह पूर्व टर्मिनेट कर दिया गया।  टर्मिनेट का कोई ठोस प्रमाण उनके पास नहीं है।
क्या इस परिस्थिति में कोर्ट मुझे लेबर कोर्ट अधिनियम के तहत क्लेम दिल सकती है और अगर दिला सकती है तो लगभग कितना?

समाधान-

प की समस्या स्पष्ट नहीं है आप को स्पष्ट करना चाहिए था कि आप किस पद पर कार्य करते थे  और आप को किस प्रकार सेवामुक्त किया गया है। टर्मिनेट का सबूत उन के पास नहीं है, वाक्य से कुछ भी स्पष्ट नहीं होता है।

श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण में केवल कर्मकारों के ही विवादों का हल हो सकता है। अध्यापक कर्मकार नहीं होते। यदि आप अध्यापक हैं तो आप को वहाँ कोई राहत नहीं मिल सकेगी। लेकिन आप अन्य स्टाफ हैं और प्रबंधकीय व सुपरवाइजरी कार्य नहीं करते थे तो आप कर्मकार हैं और श्रम कानून के अन्तर्गत कार्यवाही कर सकते हैं।

प को गलत रूप से सेवा से पृथक किया गया है तो आप को सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए सेवा से पृथक करने का विवाद उठाना चाहिए और पुनः सेवा में लिए जाने व पिछले संपूर्ण वेतन व अन्य लाभों की मांग करनी चाहिए। आप जयपुर में श्री सुरेश कश्यप एडवोकेट इस मामले में आप की मदद कर सकते हैं। आप उन से 9460142114 नंबर पर संपर्क कर के समय ले कर मिल सकते हैं।

सेवा से लंबी अनुपस्थिति को स्वेच्छा से सेवा का परित्याग माना जा सकता है

समस्या-

मैं एक अर्धशासकीय निगम में लगातार 12 वर्ष तक अस्थाई रूपसे निर्धारित वेतन पर कार्यरत रहा था। इस दौरान मेरे वेतन से कर्मचारी भविष्य निधि की कटौती भी होती थी। पिछले 10 वर्षो से मैं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अपने कार्यालय से लापता रहा हूँ। इस दौरान मेरे साथ कार्यरत सभी साथियों को नियमित कर दिया गया है। पिछले 10 वर्षों में मेरे कार्यालय ने मेरी सेवाएँ समाप्त करने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की है। अभी मैं ने जब अपने कार्यालय से अपने भविष्य निधि खाते से धन निकालने हेतु संपर्क किया तो वहाँ से जवाब मिला कि पहले त्यागपत्र दो। लेकिन इस स्थिति को जानने के उपरान्त मैं त्यागपत्र नहीं देना चाहता और सेवा में वापस आना चाहता हूँ। इस सम्बन्ध में कानूनी स्थिति क्या होगी? मुझे क्या करना चाहिए।

-मुरारी संजय गोयल, बीना, मध्यप्रदेश

 समाधान-

किसी भी सेवा में निरन्तर बना रहना सेवा की एक स्थाई शर्त है। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सूचना के अनुपस्थित हो जाए तो सेवा में उसे तब तक लगातार अनुपस्थित माना जाएगा जब तक कि वह सेवा में स्वयं उपस्थित नहीं हो जाता है। यह भी हो सकता है कि कोई नियोजक एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण अनुपस्थित रहने वाले व्यक्ति की सेवाएँ समाप्त कर दे। आप के मामले में जो तथ्य सामने आए हैं उस से पता लगता है कि आप की सेवाएँ आप के निगम द्वारा समाप्त नहीं की गई हैं। लेकिन आप पिछले दस वर्ष से अनुपस्थित चल रहे हैं। आप ने वहाँ जा कर अपने भविष्य निधि खाते को बंद करने और उस में जमा धन वापस प्राप्त करने का प्रयास किया तो उन के सामने समस्या यह आ गई कि वे आप के भविष्य निधि खाते में आप की प्रास्थिति नौकरी से अनुपस्थित बताएँ अथवा आप को सेवामुक्त बताएँ। रिकार्ड के अनुसार आप आज तक सेवा मुक्त नहीं हैं। अनुपस्थित बताने से आप के भविष्य निधि खाते का समापन संभव नहीं है। इस कारण से आप को निगम द्वारा यह सलाह दी गई कि आप त्याग पत्र दे दें जिस से आप की प्रास्थिति ऐसी बन जाए कि आप के भविष्य निधि खाते का समापन हो सके और आप की भविष्य निधि की राशि आप को प्राप्त हो सके।

दि कोई व्यक्ति बिना बताए सेवा से अनुपस्थित हो जाता है और एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है तो नियोजक के पास यह आधार उपलब्ध रहता है कि कर्मचारी ने स्वयं ही सेवा त्याग दी है। इस तरह उस की सेवाएँ समाप्त समझी जा सकती हैं। दूसरा विकल्प यह है कि नियोजक एक लंबी अवधि तक अनुपस्थित रहने पर आप को आरोप पत्र दे कि आप बिना कोई सूचना दिए और बिना कोई कारण बताए अनुपस्थित हैं जो कि एक दुराचरण है, और आप इस आरोप का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें।  कर्मचारी का कोई भी उत्तर प्राप्त न होने पर नियोजक कर्मचारी के विरुद्ध औपचारिक जाँच कार्यवाही कर उसे सेवा समाप्ति के दंड से दंडित कर सकता है। आप के मामले में आप के नियोजक के पास उक्त दोनों ही विकल्प खुले हैं। एक तीसरा विकल्प यह भी है कि जब भी कर्मचारी सेवा पर उपस्थित हो उसे सेवा में ले ले और अनुपस्थिति के काल को उस के सेवा काल से हटा कर उस के कुल सेवाकाल की गणना कर ले। यह तीसरा विकल्प तभी संभव हो पाता है जब कि नियोजक को आप की सेवाओँ की आवश्यकता हो और नियोजक कर्मचारी के प्रति अत्यधिक सहिष्णुता का रवैया अपनाए।

ब आप के साथियों के नियमित हो जाने से उन्हें अच्छे वेतन प्राप्त हो रहे हैं और सेवा शर्तें भी अच्छी हैं इस कारण से आप नौकरी करना चाहते हैं। इस लिए मेरी राय में आप को सेवा में उपस्थिति दे देनी चाहिए। एक आवेदन प्रस्तुत कर यह बताना चाहिए कि आप किन कारणों से सेवा में उपस्थित नहीं हो सके थे और अब सेवा में उपस्थित हैं आप को सेवा में लिया जाए। यदि आप द्वारा बताए गए कारणों से आप का नियोजक संतुष्ट हो जाता है तो वह आप को तुरन्त सेवा में ले लेगा। यदि वह संतुष्ट नहीं होता है तो आप को पत्र दे कर यह बताएगा कि आप ने इतने दिन  अनुपस्थित रह कर स्वयं ही सेवा का त्याग कर दिया है और अब आप को सेवा में लिया जाना संभव नहीं है। आप की अनुपस्थिति को आप के नियोजक द्वारा स्वेच्छा से सेवा का परित्याग मान लिए जाने पर आप उस के विरुद्ध औद्योगिक विवाद उठा सकते हैं और इस विवाद में यदि श्रम न्यायालय यह मानता है कि आप के पास दस वर्ष की अनुपस्थिति का उचित कारण था और नियोजक को यह मानने का कोई अधिकार नहीं था कि आप ने सेवा का परित्याग कर दिया है तो आप को सेवा दुबारा प्राप्त हो सकती है। श्रम न्यायालय यदि यह मानता है कि आप का दस वर्ष से सेवा में अनुपस्थित रहना सेवा परित्याग के समान है तो आप को कोई भी राहत प्राप्त नहीं होगी। निर्णय बहुत कुछ आप और आप के नियोजक द्वारा श्रम न्यायालय के समक्षअपने अपने पक्ष में प्रस्तुत साक्ष्य पर निर्भर करेगा।

ह आप पर निर्भर करता है कि आप सेवा से त्याग पत्र दे कर अपना हिसाब लेना चाहते हैं या फिर सेवा प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहते हैं।

सेवा समाप्ति की शिकायत श्रम विभाग में प्रस्तुत करने के 45 दिन के बाद सीधे श्रम न्यायालय में न्याय निर्णयन हेतु अपना मुकदमा प्रस्तुत करें

 दिल्ली से प्रवीण सिंह ने पूछा है –
मैं एक प्राईवेट कम्‍पनी के माध्यम से दिल्‍ली मेट्रो रेल मे टिकट काउंटर पर कार्य करता था।  हमारी कम्‍पनी ने मुझे बिना कोई नोटिस दिये नौकरी से हटा दिया। वह इसलिए मेरी कम्‍पनी के कुछ अधिकारी हम सब से पैसा मांगा करते थे। जब हम लोगों ने पैसे देने से मना कर दिया, तो मेरी कम्‍पनी ने हमारे लोगों को बिना कोई नोटिस दिए नौकरी से हटा दिया। इस मुकदमे को हम सब ने श्रम विभाग में दायर किया है। लेकिन वहां भी हमारे लोगों को कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया जाता है।  तकरीबन हम लोग 7 महीने से श्रम विभाग के कार्यालय में चक्‍कर लगा रहे हैं।  हमारी कम्‍पनी का जो अधिकारी है वो हमसे बोलता है कि मैं सभी को खरीद रखा हूँ तुम्‍हारी कोई नही सुनेगा, जाओ जो करना है कर लो, मेरा कुछ नहीं होगा। अगर तुम्‍हे इस कम्‍पनी में दुबारा आना है तो मुझे पचास हजार रूपये दो नहीं तो जो करना है कर लो।  इसका विडीयो रिकॉर्डिंग भी है हमारे पास।   आप हमें कुछ ऐसे उपाय बताएँ, जिससे हमारी समस्‍या का हल हो सके। मै बहुत परेशान हो गया हूँ, अभी मेरे पास कोई नौकरी भी नही है जिस से  मेरा गुजारा हो सके।  ऊपर से हर सप्ताह श्रम विभाग के ऑफिस का चक्‍कर लगाना पड़ता है। जितना जल्‍दी हो सके आप हमें कोई अच्‍छा रास्‍ता बताईये।

 उत्तर – 

प्रवीण सिंह जी, 

प का मामला बिना कोई नोटिस दिए आप की सेवाएँ समाप्त कर देने का है। यह औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत छँटनी का मामला है। आप की छँटनी आदेशात्मक उपबंधों का पालन नियोजक द्वारा नहीं किए जाने के कारण अवैधानिक है। आप का विवाद औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 ए के अंतर्गत औद्योगिक विवाद है जिसे आप स्वयं भी श्रम विभाग के समक्ष उठा सकते हैं। एक से अधिक व्यक्तियों को नौकरी से हटाने की स्थिति में आम तौर पर यूनियनें एक गलती करती हैं कि सभी सेवा से हटाए गए कर्मचारियों का एक ही औद्योगिक विवाद श्रम विभाग के समक्ष प्रस्तुत कर देती हैं। लेकिन ऐसा करने से मामला जटिल हो जाता है और विवाद के न्याय निर्णयन में बहुत समय लगता है। श्रमिक की सेवा समाप्ति के मामले में यूनियनों को भी श्रमिक की ओर से ही उठाने चाहिए और उस में यूनियन के किसी पदाधिकारी को श्रमिक का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकार पत्र लेना चाहिए।  यदि आप की सेवा समाप्ति का मुकदमा केवल आप का ही लगाया गया है तो बिलकुल ठीक है। यदि कई श्रमिकों की और से लगाया गया है तो भी अभी कुछ बिगड़ा नहीं है।

म तौर पर इस तरह के मुकदमों में प्रक्रिया यह है कि शिकायत प्रस्तुत होने के उपरान्त श्रम विभाग नियोजक से उस की टिप्पणी (शिकायत का जवाब) मांगता है, टिप्पणी प्राप्त हो जाने पर इस बात का संधारण करता है कि आप की शिकायत औद्योगिक विवाद है या नहीं। शिकायत औद्योगिक विवाद होने की स्थिति में वह उसे औद्योगिक विवाद के रूप में दर्ज कर के समझौता वार्ता आरंभ करता है। समझौता न हो सकने

किरायेदार छह माह से परिसर का उपयोग नहीं कर रहा है और किराया भी नहीं दे रहा है, आप मकान खाली करा सकते हैं

 
 नेमीचन्द पूछते हैं – – –
मेरा एक किराएदार है, मैं ने उस के साथ कोई संविदा (कंट्रेक्ट) नहीं की है। उस ने छह माह से किराया अदा नहीं किया है और मकान भी खाली नहीं कर रहा है। वह मकान में रह भी नहीं रहा है बल्कि उस का ताला डाल रखा है। कृपया मुझे सही सलाह दें ताकि मैं मकान खाली करा सकूँ। 
उत्तर – – –
 नेमीचन्द जी,
प ने अपना राज्य का नाम नहीं बताया है, जहाँ आप का मकान स्थित है और जिस में किराएदार को रखा है। सभी राज्यों में किराएदारी कानून में भिन्नता है। तीसरा खंबा इसी कारण से सभी प्रश्नकर्ताओं से उन के राज्य और नगर/ग्राम का नाम पूछता है। लेकिन प्रश्नकर्ता इसे बताने में झिझकते हैं।
फिर भी सभी राज्यों में छह माह का किराया अदा नहीं करना किराया अदायगी में चूक मानी जाती है और इस आधार पर किसी भी किरायेदार से मकान खाली कराया जा सकता है।
प ने यह भी बताया है कि किरायेदार वहाँ रहता भी नहीं है उस ने ताला डाल रखा है। इस तरह लगातार छह माह से किराए पर प्राप्त परिसर का उपयोग किराएदार द्वारा न करना भी किरायेदार से मकान खाली कराने का एक आधार है। 
प के पास अपने किरायेदार से परिसर खाली कराने के लिए दो मजबूत आधार उपलब्ध हैं। आप को तुरंत किसी वरिष्ठ और विश्वसनीय वकील से संपर्क कर के किरायेदार के विरुद्ध परिसर खाली कराने तथा बकाया किराया की वसूली के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। इस में तनिक भी देरी करना उचित नहीं।

मुस्लिम विधि में पुरुष का एक से अधिक, चार तक विवाह करना अधिकार नहीं, एक सशर्त छूट है


फीरोज़ अहमद पूछते हैं,

र !  हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने “मुस्लिम सरकारी कर्मचारी के दूसरे विवाह” पर  एक असमंजस भरा निर्णय दिया है, जो कि संविधान प्रदत्त मुस्लिम पर्सनल लॉ के अधिकार के विपरीत है। कृपया इस निर्णय को साधारण भाषा में समझाएँगे कि क्या यह निर्णय सेवा नियमों के अंतर्गत है या या सभी मुसलमानों के लिए है। कृपया यह भी बताएँ कि एक मुस्लिम तलाक को न्यायालय के समक्ष कैसे सिद्ध कर सकता है?

उत्तर–

फीरोज़ भाई !
प ने एक साथ दो प्रश्न पूछ लिए हैं। दोनों के विषय भिन्न हैं इस कारण दोनों का उत्तर एक साथ देना ठीक नहीं है। आप के दूसरे प्रश्न कि एक मुस्लिम तलाक को न्यायालय के समक्ष कैसे सिद्ध कर सकता है? का उत्तर बाद में दूंगा। अभी ताजा सुप्रीमकोर्ट के निर्णय पर चलते हैं।

भी तक यह निर्णय किसी विधि पत्रिका या नैट पर उपलब्ध नहीं हो सका है इस कारण से इस के संबंध में अभी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन जितना समाचार माध्यमों से पता लगा है उतनी जानकारी के अनुसार लियाकत अली राजस्थान सरकार के पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर नियोजित थे। उन्हों ने अपनी पहली पत्नी को तलाक दिए बिना ही दूसरा विवाह कर लिया। यह सही है कि उन का यह दूसरा  विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार गैरकानूनी नहीं है। यह प्रश्न न तो कभी अदालत के समक्ष विवाद का विषय बना और न ही इस पर किसी अदालत ने कोई निर्णय दिया है।
राजस्थान सेवा नियमों के अनुसार कोई भी राज्य कर्मचारी चाहे वह किसी भी पर्सनल लॉ से शासित होता हो पहली पत्नी के साथ विवाह संबंध में रहते हुए दूसरा विवाह केवल तभी कर सकता है जब कि उस ने राज्य सरकार से इस के लिए पूर्वानुमति प्राप्त कर ले। लियाकत अली ने दूसरा विवाह करने के पूर्व राज्य सरकार से पूर्वानुमति प्राप्त नहीं की और इस प्रकार उन्हों ने एक सेवा संबंधी दुराचरण किया। जब इस की शिकायत राज्य सरकार से की गई तो इस का अन्वेषण किया गया और पाया  कि लियाकत अली ने वास्तव में दूसरा विवाह किया है। तब उन्हें दुराचरण के लिए आरोप पत्र दिया गया और आरोप सही पाए जाने पर उन्हें सेवा से निष्कासन का दंड दिया गया। इस दंड को राजस्थान उच्च न्यायायलय ने सही माना और लियाकत अली को कोई राहत प्रदान नहीं की। लियाकत अली ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक विशेष अनुमति याचिका प्रस्तुत की।  किन्तु उन की यह याचिका सुप्रीमकोर्ट द्वारा निरस्त कर दी गई। यह निर्णय केवल उन सरकारी कर्मचारियों के लिए है जिन्हों ने बिना अनुमति लिए पहली पत्नी के साथ विवाह में रहते हुए दूसरा विवाह कर लिया है। यहाँ मामला पर्सनल लॉ का था ही नहीं। यह मामला केवल सेवा नियमों के अंतर्गत एक दुराचरण का था। 
ब यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि सरकार का कोई ऐसा सेवा नियम नहीं होना चाहिए जो पर्सनल लॉ में दखल देता हो। लेकिन यह प्रश्न बिलकुल गलत तरीके और तर्कों के साथ उठाया जा रहा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में विवाह एक कंट्रेक्ट (संविदा) है। एक स्त्री के यह अधिकार प्राप्त है कि निकाह के ल

नरेगा के फंड पर प्रखंड कार्यालय में दो वर्ष काम करने वाले कंप्यूटर ऑपरेटर को बिना सूचना अकारण सेवा से हटाना अवैध है

जयन्त कुमार सिन्हा ने पूछा है –

नरेगा के अन्तर्गत नियुक्त कम्प्यूटर ऑपरेटर ने लगातार 2 वर्षों (अगस्त 2006 से अगस्त 2008) तक प्रखण्ड कार्यालय में काम किया है तथा उसकी उपस्थिति अन्य सरकारी कर्मियों के साथ ही उपस्थिति पंजी में दर्ज हुई है क्या उसे  बिना कोई कारण बताये व पूर्व सूचना दिये कार्य से विमुक्त किया जा सकता है?

 उत्तर –

जयन्त जी,

कम्प्यूटर ऑपरेटर औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (एस) में परिभाषित कार्मिक है।  किसी दुराचरण के आरोप के कारण, सेवा निवृत्ति की आयु होने पर, लगातार बीमारी के कारण,  सेवा संविदा  (नियुक्ति पत्र) की किसी शर्त के कारण या स्वयं कार्मिक द्वारा सेवा त्याग को छोड़ कर नियोजक द्वारा  किसी भी अन्य कारण से किसी भी कार्मिक को सेवा से हटाना  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) के अनुसार उस कार्मिक की छंटनी होती है। 

औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-एफ के अनुसार किसी भी ऐसे कार्मिक को जिस ने एक वर्ष की लगातार सेवा पूर्ण कर ली है, अथवा जिस तिथि को उस की छंटनी की जाती है उस तिथि से पूर्व के एक वर्ष में  उस ने 240 दिन काम कर लिया है, और उसे छंटनी किया जाता है तो  छंटनी किए जाने के लिए उस का कारण बताना आवश्यक है।  छंटनी  के लिए कार्मिक को नियोजक द्वारा पूर्व नोटिस दिया जाना आवश्यक है, जो कार्मिक को छंटनी किए जाने की तारीख के एक माह पूर्व मिल जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई  नोटिस नहीं दिया गया हो तो छंटनी के समय कार्मिक को एक माह का वेतन वास्तविक रुप में दिया जाना चाहिए। साथ ही कार्मिक ने जितनी अवधि तक सेवा की है, प्रत्येक वर्ष पर 15 दिन के वेतन के बराबर छंटनी का मुआवजा भी दिया जाना आवश्यक है।  औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 25-जी के अनुसार छंटनी केवल कनिष्ठतम कार्मिकों की ही की जा सकती है।

यदि उक्त प्रक्रिया अपनाए बिना किसी भी कार्मिक को सेवा से पृथक किया जाता है तो वह अवैधानिक होगी।  ऐसी सेवा समाप्ति को कार्मिक स्वयं श्रम विभाग के समझौता (संराधन) अधिकारी के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर चुनौती दे सकता है। 

आप के मामले में आप की उपस्थिति सब कार्मिकों के साथ उपस्थिति पंजी में दर्ज की गई है इस कारण से चाहे आप को नरेगा या किसी और फंड से वेतन चुकाया गया हो आप उस कार्यालय के कार्मिक हैं जहाँ आप ने काम किया है। आप को बिना कोई कारण बताए और औद्योगिक विवाद अधिनियम  की धारा 25-एफ व धारा 25-जी में वर्णित प्रक्रिया जो संक्षेप में ऊपर वर्णित की गई है की पालना किए बिना सेवा से नहीं हटाया जा सकता है। यदि हटा दिया गया है तो वह उचित और वैध नहीं है। ऐसी सेवा समाप्ति पर समझौता अधिकारी के यहाँ शिकायत प्रस्तुत कर औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

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