भारतीय दंड संहिता Archive

rp_188157_142310595795100_543578_n.jpgसमस्या-

सीता गुप्ता ने मैसूर, कर्नाटक से समस्या भेजी है कि-

में सीता गुप्ता मैसूर निवासी हूँ। वर्ष 2000 में मेरा विवाह दिल्ली निवासी आर एस अग्रवाल के साथ हुआ था। विवाह के 4 वर्ष बाद पारिवारिक कलह के कारण मैं अपने दो बच्चों को लेकर मायके आ गयी और 125 के मुक़दमे से गुज़ारा भत्ता मुझे मिलने लगा। 2004 से मैं अपने पति से किसी संपर्क या सम्बन्ध के बिना अपने माता-पिता के पास अपने दो बच्चों उम्र 14 साल और 12 साल के साथ रह रही हूँ। मुझे पता लगा है कि मेरे पति ने किसी महिला से अपने सम्बन्ध बना लिए और उनके एक पुत्र भी है। मैंने प्रयास करके उनके पुत्र के पासपोर्ट की नक़ल प्राप्त कर ली जिसमें माता-पिता के स्थान पर मेरे पति और उस महिला का नाम लिखा हुआ है। मेरे पति और उस महिला के पासपोर्ट की नक़ल भी मुझे मिल गई है जिसमें महिला के पासपोर्ट में पति के नाम का स्थान और मेरे पति के पासपोर्ट में पत्नी के नाम का स्थान खाली है। उन दोनों के विवाह का कोई सबूत मेरे पास नहीं है लेकिन वे रहते इक्कठे ही हैं। मेरे वकील का कहना है कि उन्हों ने शादी नहीं की है वे लिव-इन-रिलेशन में रहते हैं इसलिए कोई कारवाई नहीं की जा सकती है। चूँकि, मेरे पति ने उस बच्चे को अपना नाम पासपोर्ट में दिया हुआ है तो क्या इन परिस्थितियों में मैं अपने पति के खिलाफ बायगेमी या अडलट्री या कोई अन्य केस कर सकती हूँ?

समाधान-

बायगेमी का तो कोई अपराध आप के पति के विरुद्ध नहीं बनता है। धारा 494 आईपीसी में बायगेमी का जो अपराध है उस में कोई पति किसी पुरुष के विरुद्ध तभी संस्थित कर सकता है जब दूसरे पुरुष ने उस की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाए हों।

धारा 497 में (Adultery) जारकर्म का जो अपराध वर्णित है वह भी तभी अपराध है जब कि पति या पत्नी ने अपने पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह कर लिया हो। यदि आप के पति किसी स्त्री के साथ लिव इन में रहते हैं तो इसे दूसरा विवाह होना नहीं कहा जा सकता। इस कारण आप धारा 497 में भी कोई परिवाद न्यायालय मे तभी दर्ज करवा सकती हैं जब कि पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो। पति के पासपोर्ट में पत्नी का नाम और पत्नी के पास पोर्ट में पति का नाम दर्ज नहीं है लेकिन पुत्र के पासपोर्ट में पिता का नाम दर्ज है। यह लिव इन में होना संभव है।

किसी का पुत्र होने के लिए यह कतई जरूरी नहीं है कि उस के पिता का उस की माता के साथ विवाह हुआ ही हो। लिव इन रिलेशन से भी संतान का जन्म हो सकता है और उस की मां या पिता जन्म-मृत्यु पंजीयक के यहाँ पुत्र का जन्म पंजीकृत करवा सकता है। उस जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर पुत्र का पासपोर्ट बन सकता है।

ब तक आप यह सिद्ध करने की स्थिति में न हों कि आप के पति ने दूसरा विवाह कर लिया है आप यदि परिवाद करेंगी तो वह मिथ्या साबित हो सकता है और आप एक दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के मामले में फँस सकती हैं।

अपराधिक प्रकरण का निर्णय गुणावगुण पर ही होगा।

October 27, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_judge-cartoon-300x270.jpgसमस्या-

हबीब ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2005 में हुई थी। शादी के एक साल बाद मेरी बीवी ने मुझ पर 498ए, 406 भा.दं.संहिता तथा 125 दं.प्र.संहिता के मुकदमे लगा दिए जो आज तक चल रहे हैं। केस लगाने के तीन माह बाद मैं ने उसे लाने के लिए दिल्ली में केस भी किया। लेकिन उस ने विरोध किया और न्यायालय ने मेरे विरुद्ध उस का खर्चा बांध दिया। 2010 में मेरी पत्नी की मृत्यु उस के माता पिता के घर पर हो गयी। मरने से पहले मुकदमों में उस के बयान हो गए, लेकिन डाक्टर और पुलिस के बयान में नहीं हुए। बीवी मरने से 125 दंप्रसं का मुकदमा तो खत्म हो गया। पर 498ए व 406 भा.दं.संहिता का मुकदमा अभी भी चल रहा है। मेरे ससुर के बयान भी हो गए उन्हों ने कहा कि मुझे किसी बात का पता नहीं है। फिर भी मुझे आज महीने में दो बार बुलन्दशहर कोर्ट में जाना पड़ता है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के विरुद्ध जो धारा 498ए व 406 भारतीय दंड संहिता का प्रकरण चल रहा है वह अपराधिक है। जिसे पुलिस के आरोप पत्र पर पंजीकृत किया गया है। इस मामले में आप की पत्नी परिवादी थी जिस के परिवाद पर यह आरंभ हुआ था। उस का बयान न्यायालय में पहले ही हो चुका है। अन्य साक्षी सभी जीवित हैं इस कारण से आप की पत्नी की मृत्यु के कारण उस मुकदमे पर कोई असर नहीं आएगा। सभी शेष साक्षियों के बयान दर्ज होने के उपरान्त गुणावगुण के आधार पर ही इस प्रकरण का निर्णय हो सकेगा।

प अपने वकील को यह कह सकते हैं कि वे आप की ओर से न्यायालय को आवेदन दें कि परिवादी का देहान्त हो चुका है और मुख्य गवाहों के बयान भी हो चुके हैं शेष गवाह औपचारिक हैं इस कारण सब को एक साथ बुला कर बयान करा दिए जाएँ जिस से इस मुकदमे का निर्णय शीघ्र हो सके। आप लगातार न्यायालय पर अभियोजन (पुलिस) की गवाही को समाप्त कराने के लिए दवाब डालेंगे तभी न्यायालय इस में गति से काम कर के मुकदमे को समाप्त कर सकेगा। तब तक आप को पेशियों पर तो उपस्थित होना पड़ेगा।

rp_IPC-266x300.jpgसमस्या-

सीमा मिश्रा ने नवी मुंबई, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरी सास ने मेरे १२ साल के पुत्र को बहला फुसला कर घर रखा हुआ है और मुझे उस से बात भी नहीं करने देती। मैं यह जानना चाहती हूँ कि मैं अपने लड़के को कैसे वापस लूँ? अगर शिकायत करूँ तो कैसे करूँ? मैं कई बार सास को फ़ोन कर इस बारे में बात की पर वह मुझसे गाली गलोच करती है और लड़के से बात नहीं करने देती। मेरे पति मेरे साथ में ही हैं।

समाधान

माता पिता संतान के नैसर्गिक संरक्षक हैं, उन से उन की संतान को नहीं छीना जा सकता। यदि आप की सास आप की संतान को बहला फुसला कर अपने पास रखे हुए है और उसे आप के पास नहीं आने देती है तो आप की सास द्वारा ऐसा करना आईपीसी की धारा 361 में वर्णित व्यपहरण (Kidnapping) का अपराध है जो कि धारा 363 के अन्तर्गत सात वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध है। यह एक अजमानतीय और संज्ञेय अपराध है।

दि आप के पति आप के साथ हैं और आप की सास द्वारा संतान को उन के पास रखने के विरुद्ध हैं तो आप अपने पति के साथ जा कर सीधे अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में इस अपराध की रिपोर्ट करवा सकती हैं। यदि पुलिस आप की रिपोर्ट पर कार्यवाही करने से इनकार करती है तो आप सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं जिसे मजिस्ट्रेट जाँच हेतु संबंधित पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को निर्देशित कर सकता है।

दि आप के पति इस मामले में मौन रहते हैं तो आप अकेली भी इस कार्यवाही को कर सकती हैं।

rp_law-suit.jpgसमस्या-

सुनील कुमार ने भोपाल, मध्यप्रदेश समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई और उसकी पत्नी के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं होने की वजह से मेरे भाई ने उसे तलाक का नोटिस दिया और 2002 में न्यायालय में वाद दायर कर दिया। |उस के बाद मेरे भाई की पत्नी ने हमारे पूरे परिवार के खिलाफ दहेज़ प्रताड़ना और मारपीट का झूठा मुकदमा न्यायालय में दायर कर दिया, इसी दौरान उस ने अपने पीहर पक्ष के लोगो के साथ मिलकर हमें कई बार पुलिस की प्रताड़ना भी दी ताकि मेरा भाई तलाक की अर्जी वापस ले ले। लेकिन मेरे भाई ने ऐसा नहीं किया; और अब 2015 में दहेज़ के झूठे मामले में स्थानीय न्यायालय का फैसला आ गया जिस में पूरे परिवार को बरी कर दिया गया और माननीय न्यायालय ने उसे झूठा मुकदमा करार दिया। अब मैं आपसे सलाह लेना चाहता हूँ कि क्या मैं अपने भाई की पत्नी और उसके पीहर पक्ष वालों के खिलाफ मानहानि का दावा कर सकता हूँ। क्योंकि पूरे सात वर्ष तक हम पूरे परिवार वाले लगातार परेशान रहे, दावे की क्या प्रक्रिया होगी, क्योंकि मेरे भाई की पत्नी ने सारा झूठा मुकदमा और पुलिस प्रताड़ना अपने पीहर वालो की मदद और मिलीभगत से किया था?

समाधान-

ब यह प्रमाणित हो गया है कि मुकदमा झूठा था तो आप अब दो काम कर सकते हैं। एक तो आप और वे सभी लोग जिन्हें इस मुकदमे में अभियुक्त बनाया गया था, दुर्भावना पूर्ण अभियोजन तथा मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में साबित करना होगा कि 1. आप को मिथ्या रूप से अभियोजित किया गया था, 2. उक्त अभियोजन का समापन होने पर आप को दोष मुक्त कर दिया गया है, 3. अभियोजन बिना किसी उचित और उपयुक्त कारण के किया गया था, 4. अभियोजन करने में दुर्भावना सम्मिलित थी और 5. आप को उक्त अभियोजन से आर्थिक तथा सम्मान की हानि हुई है। आप को उक्त मुकदमे की प्रथम सूचना रिपोर्ट, आरोप पत्र तथा निर्णय की प्रमाणित प्रतियों की आवश्यकता होगी इन की दो दो प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर लें। जितनी राशि की क्षतिपूर्ति के लिए आप दावा प्रस्तुत करेंगे उस पर आप को न्यायालय शुल्क नियम के अनुसार देनी होगी। प्रक्रिया दीवानी होगी और वैसे ही चलेगी जैसे क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद की होती है।

स के अतिरिक्त आप उक्त दस्तावेजों के साथ साथ मिथ्या अभियोजन व मानहानि के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 211 व 500 में परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस पर प्रसंज्ञान लेने और अपराधिक मुकदमे की तरह प्रक्रिया पूर्ण हो कर न्यायालय निर्णय प्रदान करेगा। इस में मिथ्या अभियोजन करने वाले दो वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड की सजा हो सकती है। आप को इन दोनों ही कार्यवाहियाँ करने के लिए किसी स्थानीय वकील की सेवाएँ प्राप्त करना होगा।

सामान्य आशय और धारा-34 भारतीय दंड संहिता

May 12, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Lady-Justice.jpgसमस्या-

धर्मेन्द्र बट्ट ने दमोह, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३४ क्या है? इस के अंतर्गत दर्ज अपराध में क्या सजा और क्या जुर्माने का प्रावधान है?

समाधान-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 का मूल पाठ निम्न प्रकार है-

34. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य–जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो।

धारा-34 भारतीय दण्ड संहिता के मूल पाठ को पढ़ने के उपरान्त आप को यह तो समझ आ गया होगा कि इस धारा में किसी विशिष्ट अपराध का वर्णन नहीं है और किसी विशेष दण्ड का प्रावधान भी नहीं है। यह धारा सामान्य आशय से एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संपन्न किए गए अपराधों के संबंध में है। यदि दो या दो से अधिक व्यक्ति कोई कार्य संयुक्त रूप से करते हैं तो विधि के अंतर्गत स्थिति वही होगी कि मानो उन में से प्रत्येक के द्वारा वह कार्य स्वयं व्यक्तिगत रूप से किया गया है।

दाहरण के रूप में चार व्यक्ति मिल कर किसी को चोट पहुँचाना चाहते हैं और इस के लिए वे अपने स्थान से रवाना हो कर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ वह व्यक्ति मौजूद है, जैसे ही वह व्यक्ति दिखाई पड़ता है उन चारों में एक व्यक्ति लाठी से उस के सिर पर हमला करता है, वह व्यक्ति लाठी को सिर पर पड़ने से बचाने के लिए हाथ पर झेल लेता है और चार व्यक्तियों को सामने देख कर चिल्लाते हुए भाग लेता है। जब तक हमलावर उसे पकड़ पाएँ आस पास के लोग इकट्ठे हो जाते हैं जिन्हें देख कर चारों हमलावर भाग लेते हैं। यहाँ चोटिल व्यक्ति को चोट पहुँचाने का कार्य एक व्यक्ति ने ही किया है इस कारण केवल उसी ने धारा 323 आईपीसी का अपराध किया है, लेकिन अन्य तीन व्यक्ति उस व्यक्ति को चोट पहुँचाने के उददेश्य से साथ थे इस कारण वे तीनों भी लाठी से हमला करने वाले के समान ही अपराधी हैं क्यों कि उन का सामान्य आशय एक ही था। उन पर जब अभियोग चलाया जाएगा तो धारा 323 के साथ धारा 34 भी आरोपित की जाएगी। यदि उस अभियोग में सभी को दंडित किया गया तो सभी को उसी व्यक्ति के समान दंड मिलेगा जैसा कि लाठी से हमला करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा।

Havel handcuffसमस्या-

लोकेश तुशावदा ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी ने उसके पहले पति के खिलाफ 498ए, 406 का मुक़दमा कर 75,000/- ले कर आपसी समहति से राजीनामा कर लिया। उसके बाद मेरे साथ नाता विवाह किया फिर मेरे ओर मेरे परिवार के खिलाफ 498ए, 406 का मुक़दमा कर मुझ से 75,000/- लेकर आपसी राज़ी नामा कर लिया। अभी वो लोग मुझसे 1,20,000 रुपयों की मांग कर रहे हैं, मेरे द्वारा पैसे नहीं देने पर उन्होने मेरे ओर मेरे परिवार के खिलाफ फिर से 498ए, 406 का मुक़दमा दर्ज करवा दिया है। मेरे पास निम्न दस्तावेज़ हैं-

1, पूर्व पति पर किए गया 498ए, 406 के मुक़दमे की प्रतिलिपि,

2, पूर्व पति से 75000/- लेकर आपसी छोड़ छुट्टी की प्रतिलिपि,

3, वर्तमान पति पर किए गये 498ए, 406 की प्रतिलिपि,

4, मुझसे 75000/- लेकर किए गये राज़ीनामे की प्रतिलिपि,

5, मेरे ससुर द्वारा 1,20,000/- की डिमांड की रेकॉर्डिंग ओर पैसे नहीं देने पर केस करने की धमकी,

6, फोन पर बात की कॉल डीटेल्स,

7, पैसे नहीं देने पर किया गया 125 आईपीसी का मुक़दमा, तथा

8, पैसे नहीं देने पर किया गया 498ए, 406 के मुक़दमे की प्रतिलिपि।

इन लोगों ने व्यापार बना रखा है, इस में मेरा ससुर, मेरी पत्नी, मेरा साला सभी शामिल हैं।

समाधान-

प के द्वारा बताए गए दस्तावेजों के आधार पर आप की पत्नी, ससुर और साले के विरुद्ध धारा 384,388,503 तथा 120 बी का अपराध बनता है। ये धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

  1. उद्दापन–जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उस व्यक्ति को या किसी अन्य व्यक्ति को कोई क्षति करने के भय में साशय डालता है, और तद््द्वारा इस प्रकार भय में डाले गए व्यक्ति को, कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति या हस्ताक्षरित या मुद्रांकित कोई चीज, जिसे मूल्यवान प्रतिभूति में परिवर्तित किया जा सके, किसी व्यक्ति को परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करता है, वह “उद्दापन” करता है।
  2. उद्दापन के लिए दंड–जो कोई उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा।
  3. आपराधिक अभित्रास–जो कोई किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, ख्याति या सम्पत्ति को या किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर या ख्याति को, जिससे कि वह व्यक्ति हितबद्ध हो कोई क्षति करने की धमकी उस अन्य व्यक्ति को इस आशय से देता है कि उसे संत्रास कारित किया जाए, या उससे ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधन स्वरूप कोई ऐसा कार्य कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह आपराधिक अभित्रास करता है।

120. आपराधिक ड़यंत्र का दंड–(1) जो कोई मॄत्यु, 2[आजीवन कारावास] या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दंडनीय अपराध करने के आपराधिक षड़यंत्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षड़यंत्र के दंड के लिए इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है, तो वह उसी प्रकार दंडित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था ।

(2) जो कोई पूर्वोक्त रूप से दंडनीय अपराध को करने के आपराधिक षड़यंत्र से भिन्न किसी आपराधिक षड़यंत्र में शरीक होगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से अधिक की नहीं होगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।]

प को चाहिए कि आप पत्नी, ससुर और साले के विरुद्ध उक्त धाराओं में संबंधित थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराएँ। पुलिस कार्यवाही न करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उस के अन्वेषण के लिए पुलिस को भिजवाएँ। यही दस्तावेज आप के विरुद्ध प्रस्तुत की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में आप के पक्ष में अन्तिम प्रतिवेदन प्रस्तुत करने पुलिस की सहायता करेंगे। यदि पुलिस फिर भी आप के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो न्यायालय में आप के बचाव में मजबूत साक्ष्य बनेंगे।

चैक बाउंस के मुकदमे ब्लेक मेलिंग का आधार बन रहे हैं।

February 24, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

arrested-man-in-handcuffsसमस्या-

प्रियंका असरानी ने सांगानेर, जयपुर, राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी ने किसी से 4 साल पहले 90,000 रुपये उधार लिए थे। उस में से कुछ रुपया हम ने वापस भी किया था। पर हमारी आर्थिक हालत कमजोर होने के कारण जब हम ने पैसा देना कुछ समय के लिए रोक दिया तो उस व्यक्ति ने झूठा अमाउंट भर कर चैक लगा दिया, अब मामला कोर्ट में है और बयान मुल्ज़िम तक पहुँच गया है। ये बात हमें भी पता है की चेक में भरा गया पैसा हमें देना पड़ेगा। लेकिन उस ने चेक में 350000 रुपया भरा है और हमारे वकील साहब का कहना है कि कोर्ट आपको 2 साल तक की सजा और चेक अमाउंट से डबल तक जुर्माना सुना सकता है, बेहतर होगा आप उस व्यक्ति से बात कर राजीनामा कर लें। जब हम ने उस व्यक्ति से बात की तो वह हम से केस वापस लेने की एवज में 450000 रुपये देने की मांग करने लगा। हम ने जितना पैसा लिया था उस से 5 गुना ज्यादा उसने पहले ही चेक में भर दिया है फिर भी हम मज़बूरी क कारण उसे चेक का अमाउंट देने को तैयार हैं। लकिन उसने तो इंसानियत को ही मार दिया। अगर हम कोर्ट में 350000 का डिमांडिंग ड्राफ्ट बनवा के दे तब भी क्या हमें जुर्माना दुगना तक ही देना पड़ेगा। अगर कोई रास्ता या कानून में ऐसा कोई क्लोज है तो प्लीज बताये हम बड़ी परेशानी में है।

समाधान-

प की समस्या बहुत आम है। धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम जिस तरह है उस में अपराध यह है कि यदि आप ने कोई चैक दिया है तो उस का भुगतान होना चाहिए। वह बाउंस होता है तो नोटिस मिलने के 15 दिन में चैक राशि का भुगतान होना चाहिए। अन्यथा चैक बाउंस की रकम अदा करने का नोटिस मिलने के 15 दिन में भुगतान न करना अपराध है जिस का दंड वही है जो आप के वकील ने बताया है। अर्थात 2 वर्ष तक का कारावास तथा चैक की राशि के दुगने तक जुर्माना। लेकिन यह बिलकुल जरूरी नहीं है कि अदालत दो वर्ष तक की सजा दे ही। अधिकांश मामलो में छह माह की और कुछ मामलों में एक वर्ष की सजा होती है। सजा होने के बाद भी अदालत कम से कम एक माह तक उसे निलंबित कर देता है जिस से अपील की जा सके। इस अवधि में अपील प्रस्तुत कर सजा को लंबित कराया जा सकता है। अपील कोर्ट निचली अदालत के निर्णय के अनुसार या उस से कम राशि जमा कराने की शर्त पर सजा को निलंबित कर देती है। इस कारण पहली अदालत के निर्णय तक इन्तजार किया जा सकता है।

सल में जब से यह कानून अस्तित्व में आया है किसी को भी खाली चैक हस्ताक्षर कर के किसी को भी नहीं देना चाहिए। चैक में धनराशि भर कर तारीख डाल कर ही देना चाहिए और उस तिथि को चैक की राशि बैंक में रखना चाहिए जिस से वह बाउंस न हो। लेकिन मजबूरी में और अज्ञान के कारण लोग ऐशा करते हैं। उधार देने वाले सूदखोर लोगों ने इस कानून को लूटने का माध्यम बना लिया है। एक तरह से वे इस कानून की सहायता से अदालतों को ब्लेकमेल का साधन बना रहे हैं। जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। अदालतें कानून के मुताबिक फैसले देती हैं, उन्हें देना पड़ता है। वे कानून की पालना करती हैं, न्याय नहीं करतीं। वास्तव में यह कानून वित्तीय संस्थाओं की सुविधा के लिए बनाया गया है। उन्हें इसी में सुविधा है। जिस का लाभ सूदखोर लोग खूब उठा रहे हैं। यह कानून ही गलत है लेकिन इस का बड़े पैमाने पर विरोध नहीं हो रहा है। यह कानून हमारे देश की गरीब जनता पर अन्याय है।

स कानून में मुकदमा होने पर बचने का एक ही मार्ग है कि अभियुक्त खुद यह साबित करे कि उक्त चैक किसी दायित्व की पूर्ति के लिए नहीं दिया गया था। जो साबित करना असंभव जैसा है। इस कारण जब भी चैक के आधार पर उधार लिया जाए तो उधार का दस्तावेज जरूर लिखा जाए और उस में दिए गए चैक का नंबर और धनराशि सहित वर्णन जरूर हो।

प के पिताजी का मुकदमा बयान मुल्जिम में है। उस के बाद आप के पिता न्यायालय की अनुमति ले कर अपना बयान और अपने पक्ष में सबूत प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि वे यह साबित करते हैं कि यह चैक सीक्योरिटी के लिए दिया गया था न कि दायित्व के भुगतान के लिए और परिवादी ने जानबूझ कर अधिक रकम भर ली है और अब मुकदमे की आड़ में आप के पिता को ब्लेकमेल कर रहा है उन्हें राहत मिल सकती है। आप के पिताजी को इस तरह के छल और ब्लेकमेलिंग के विरुद्ध पुलिस को भी रिपोर्ट करानी चाहिए क्यों कि उस का यह कृत्य आईपीसी के अन्तर्गत अपराध है। उस व्यक्ति ने एक झूठा मुकदमा प्रस्तुत कर आप के पिता को परेशान किया है। आप की यह शिकायत तो सच्ची और वाजिब होगी। यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो न्यायालय में अलग से परिवाद दाखिल करना चाहिए। जिस से उस व्यक्ति पर भी दबाव बने और किसी तरह बीच का मार्ग निकल सके।

Lawyers in courtसमस्या-

औंकार वैष्णव ने बेमेतरा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी विवाह के पूर्व से मानसिक रोग से ग्रस्त है, वर्तमान में भी इलाज चल रहा है। मेरी पत्नी ने मारपीट कर घर से निकाल देने का झूठा आरोप लगाते हुए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में आवेदन प्रस्तुत कर दिया है। मैंने भी विवाह शून्य करने का केस दर्ज किया है। मेरी पत्नी ने शपथ पत्र में झूठी बात लिखकर पेश की है, जिसे स्वयं उस ने व उस के गवाह ने झूठा स्वीकार किया है। क्या मैं उस के झूठे शपथ पत्र के लिए केस दर्ज करवा सकता हूँ? मेरे पास पर्याप्त सबूत हैं कि उस का शपथ पत्र १००%झूठा है। स्वयं साक्ष्य के समय उस ने शपथ पत्र को झूठा स्वीकार किया है। क्या मैं फैसला आने के पूर्व भादंसं के तहत केस दर्ज करवा सकता हूँ? कर सकता हूँ तो कैसे?

समाधान-

न्यायालय की किसी कार्यवाही में झूठा शपथ पत्र प्रस्तुत करना झूठी साक्ष्य प्रस्तुत करना है और ऐसा करना भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है, जिस में अभियोग साबित हो जाने पर तीन वर्ष तक के कारावास के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। लेकिन इस तरह के मामलों में आप या कोई भी व्यक्ति सीधे मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत नहीं कर सकता।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 की उपधारा (1) (ख) में यह उपबंध किया गया है कि जब मिथ्या साक्ष्य देने का कार्य किसी न्यायालय की कार्यवाही में किया जाता है तो केवल उस न्यायालय का न्यायाधीश अथवा उस न्यायाधीश द्वारा अधिकृत उस न्यायालय का कोई अन्य अधिकारी की शिकायत पर ही अधिकारिता रखने वाला मजिस्ट्रेट मामले में प्रसंज्ञान ले सकता है।

स तरह आप स्वयं इस मामले में किसी तरह का कोई परिवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते। केवल वह न्यायालय ही जहाँ मिथ्या शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया है इस मामले में अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। आप इतना कर सकते हैं कि धारा 340 में एक आवेदन जहाँ धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता का प्रकरण लंबित है उस न्यायालय को प्रस्तुत करें और उस न्यायालय से निवेदन करें कि मिथ्या शपथ पत्र प्रस्तुत करने वाले के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत किया जाए। वह न्यायालय मामले पर विचार कर के अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

फर्जी मुकदमे की धमकी देना अपराध है, अभियोजन चलाएँ.

September 24, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Havel handcuffसमस्या-

आदित्य ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक दोस्त ने घर में एक किरायेदार रखा है। जब वह किराएदार से मकान खाली करने का कहता है तो किराएदार कहता है कि मैं हरिजन समाज का हूँ और तुम पर केस कर दूंगा और मान हानि का दावा कर दूँगा, झूठा केस लगा दूँगा। मेरा दोस्त बहुत परेशान है कि अब वह मकान कैसे खाली करवाए?

समाधान-

प के मित्र किराएदार से मकान खाली कराना चाहते हैं तो उन के पास मकान खाली कराने का कोई वैध कारण होना चाहिए। यदि समस्या इन्दौर की है तो वह मध्यप्रदेश किराया नियंत्रण कानून में जो वैध कारण दर्शाए गए हैं उन्हीं के आधार पर मकान खाली करवा सकते हैं। यदि किराएदार मकान खाली करने को स्वेच्छा से तैयार नहीं है तो उस का एक ही उपाय है कि आप के मित्र मकान खाली कराने के लिए न्यायालय में दावा करें। यदि न्यायालय ने पाया कि आप के मित्र के पास मकान खाली कराने का कोई वैध आधार है तो न्यायालय मकान खाली करने की डिक्री पारित कर देगा। तब उस डिक्री का निष्पादन करवा कर ही मकान खाली कराया जा सकता है। आप के मित्र को चाहिए कि वे स्थानीय वकील से सलाह करें कि किन आधारों पर मकान खाली कराया जा सकता है यदि उन में से कोई आधार आप के मित्र के पास हुआ तो मकान खाली करने के लिए वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

गली बात आप के मित्र को किराएदार द्वारा दी जाने वाली मिथ्या और फर्जी मुकदमों की है तो किराएदार अवश्य ऐसा कर सकता है। लेकिन ऐसी धमकी देना स्वयं में अपराध है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है। आप के मित्र को चाहिए कि वे किराएदार की ऐसी धमकी को रिकार्ड कर लें और कम से कम दो-तीन लोगों के सामने किराएदार से मकान खाली करने की बात करें। इस से यदि किराएदार उस बात को उन के सामने दोहराएगा तो उन्हें इस मामले में साक्षी बनाया जा सकता है। जब इस बात के पक्के सबूत और गवाह हों कि किराएदार फर्जी और मिथ्या मुकदमों की धमकी दे रहा है तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर किराएदार के विरुद्ध फौजदारी मुकदमा दर्ज करवाएँ। इस मुकदमे के दर्ज हो जाने के बाद मकान को खाली करने के लिए कार्यवाही आरंभ की जा सकती है।

धारा 409 भा.दं.संहिता किन किन पर प्रभावी हो सकती है?

September 12, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

arrested-man-in-handcuffsसमस्या-

आस्तिक ने लक्ष्मणपुर, प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

धारा 409 भारतीय दंड संहिता क्या सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के ऊपर ही लग सकता है?

समाधान-

भारतीय दंड संहिता की धारा 409 लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग के बारे में है। अपराधिक न्यास भंग क्या है यह धारा 405 में परिभाषित किया गया है जो निम्न प्रकार है-

  1. आपराधिक न्यासभंगजो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अखत्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैघ संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यास भंग” करता है।

[स्पष्टीकरण 1]–जो व्यक्ति [किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 17) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है या नहीं], तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य-निधि या कुटुंब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।]

[स्पष्टीकरण 2]–जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।]

सी तरह धारा 409 निम्न प्रकार है-

  1. लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंगजो कोई लोक सेवक के नाते अथवा बैंकर, व्यापारी, फैक्टर, दलाल, अटर्नी या अभिकर्ता के रूप में अपने कारबार के अनुक्रम में किसी प्रकार संपत्ति या संपत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने को न्यस्त होते हुए उस संपत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह [आजीवन कारावास] से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।

स से स्पष्ट है कि धारा-409 भारतीय दंड संहिता केवल सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों पर प्रभावी नहीं है अपितु उस में सभी लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी, आढ़तिया, प्रतिनिधि, दलाल, मुख्तार आदि शामिल हैं। इन में से किसी पर भी कोई संपत्ति न्यस्त होने और न्यासभंग करने पर वह धारा 409 भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत दंडनीय अपराध करता है।

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