संविधान Archive

धर्म परिवर्तन की कोई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया नहीं।

May 7, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

धर्म परिवर्तनसमस्या-

यचन्द मौर्य ने मनौवा खमरिया, जनपद मीरजापुर,  उ0 प्र0 से जानना चाहा है-

विजय मौर्य ने अपना हिंदू धर्म बौद्ध धर्म में परिवर्तन करा लिया हैं लेकिन वे इस सम्बन्ध में ज्यादा जानकारियाँ चाहते हैं – उनके प्रश्न निम्न हैं-
1.  उ0प्र0 सरकार या भारत सरकार द्वारा कोई ईमेल या विभागीय वेब साईट उपलब्ध है जहाँ से हमें धर्म परिवर्तन सम्बंधी नियम कानून व अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हो सके ?
2. यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है तो धर्म परिवर्तन करने के बाद उस व्यक्ति का नाम व जाति जो पहले था वो वही रहेगा या फिर बद्ल जायेगा ?
3. धर्म परिवर्तन द्वारा आन लाइन माध्यम से प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया जाता तो फिर जाति प्रमाण पत्र व परिवार रजिस्टर में दर्ज व इसके साथ अन्य दस्तावेजों में परिवर्तन कराना जरुरी होगा या नहीं यदि नहीं तो फिर किसीभी फार्म को भरते समय यदि आवेदक मौर्य हिन्दू जाति का हो और हिन्दू धर्म से हो तो धर्म परिवर्तन के बाद वो आवेदन पत्र में अपना विवरण कैसे दर्ज करायेगा हिन्दू धर्म या बौद्ध धर्म ?
4. महोदय मेरे दोस्त के पुत्र धर्म परिवर्तन कराकर बौद्ध धर्म अपनाया है लेकिन दशमोत्तर छात्रवृत्ति आवेदन भरते समय उसने अपना विवरण मौर्य जाति के साथ व बौद्ध धर्म चुन कर आवेदन आनलाईन भरा था लेकिन इस धर्म परिवर्तन के कारण आवेदन विभाग में पता नहीं किन कारणों से रुक गया था जब उनके बेटे ने इस मामले को मुख्यमंत्री0 महोदय उ0 प्र0 को सीधा ईमेल से जब अपनी समस्या से अवगत कराया था तो शासन स्तर से मामले को प्रमुख सचिव/ समाज कल्याण पिछड़ा वर्ग् को प्रेषित कर दिया गया बाद में विजय जी के बेटे ने
अपने बारे में धर्म परिवर्तन कि जानकारी देते हुए मा0 मुख्यमंत्री जी को बौद्ध धर्म का होने की बात से दुबारा अवगत कराया गया जिस पर बाद में शासन स्तर से मामले को  अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को प्रेषित कर कार्यवाही करने हेतु सचिव को निर्देशित किया गया है। इस सम्बंध में जरा विस्तृत जानकारी ये देने की कृपा करें कि हर बार इनके बेटे को धर्म परिवर्तन कराने की बात बतानी होगी या और कोई भी रास्ता है ?
5. यदि कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है और वह जाति से मौर्य पिछड़ी जाति का है तो धर्म परिवर्तन कराने के बाद  उस व्यक्ति की जाति व धर्म वही रहेगा या फिर क्या होगा? धर्म परिवर्तन कराने वाले को किन किन दस्तावेजों में पूर्व में दर्ज विवरणों को संशोधन कराना पड़ेगा?
6. यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कराता है तो उसके परिवार का धर्म परिवर्तन अपने आप होगा या कराना होगा ? यदि कोई लड़का धर्म परिवर्तन कराता है तो उसके माता पिता का धर्म परिवर्तन होगा या नहीं?

समाधान-

भारत में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया के संबंध में किसी तरह का कोई कानून नहीं है, उस के लिए कोई कानूनी प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। कोई भी व्यक्ति स्वैच्छा से कोई भी धर्म अपना सकता है। कुछ राज्यों में लालच या दबाव में धर्म परिवर्तन कराने पर प्रतिबंध संबंधी कानून अवश्य हैं। इस संबंध में आप को न केन्द्र सरकार और न ही किसी राज्य सरकार की किसी वेबसाइट पर कोई जानकारी प्राप्त नहीं होगी, ऐसी कोई जानकारी किसी सरकार द्वारा उपलब्ध नहीं कराई गयी है।

धर्म परिवर्तन के लिए कोई विशेष प्रक्रिया न होने के कारण कोई भी व्यक्ति जो धर्म अपनाना चाहता है वह उस धर्म के धार्मिक स्थल पर जा कर धर्मानुसार उचित प्रक्रिया जान सकता है। उस प्रक्रिया, अनुष्ठान आदि को पूर्ण कर लेने के उपरान्त यदि उस धर्म के लोग उसे अपने धर्म में स्वीकार कर लेते हैं तो उस का धर्म परिवर्तन सम्पन्न हो जाता है। धर्म विशेष के कोई पीठ आदि हों तो वे इस बात का लिखित प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं कि अमुक व्यक्ति ने अमुक दिन हमारे धर्म की प्रक्रिया/ अनुष्ठान संपन्न कर उन का धर्म अपना लिया है। इस प्रमाण पत्र के प्राप्त होने पर धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति स्वयं अपना एक शपथ पत्र निर्धारित स्टाप्प पेपर पर अंकित करवा कर किसी कार्यकारी मजिस्ट्रेट अथवा नोटेरी पब्लिक से प्रमाणित करवा सकता है। यह प्रमाणीकृत शपथ पत्र ही उस व्यक्ति के धर्म परिवर्तन का प्रमाण होगा।

धर्म परिवर्तन के लिए नाम परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। फिर भी बहुधा लोग अपना नाम परिवर्तित कर लेते हैं, जिस धर्म में वह प्रवेश करता है उस धर्म के लोग भी उस का नया नामकरण करने का सुझाव देते हैं। लेकिन सरकारी रिकार्ड में नाम परिवर्तन करना एक दुष्कर प्रक्रिया है और इस से अनेक जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं। इस कारण से यदि नाम परिवर्तन न हो तो बेहतर है। धर्म परिवर्तन का नाम परिवर्तन से कोई संबंध नहीं है।

जाति जन्म से होती है, धर्म परिवर्तन से उस पर कोई अन्तर नहीं पड़ता है। जाति परिवर्तन केवल किसी व्यक्ति को किसी दूसरी जाति के व्यक्ति द्वारा दत्तक ग्रहण करने और फिर उस के परिवार संबंधियों द्वारा व्यवहार में अपना लिए जाने पर ही हो सकता है अन्यथा नहीं। यहाँ तक कि विवाह से भी जाति परिवर्तन संभव नहीं है। इस कारण धर्म परिवर्तन के उपरान्त भी व्यक्ति की जाति वही रहेगी जिस में उस ने जन्म लिया है।

संविधान के अनुसार भारत में राज्य का धर्म से कोई संबंध नहीं है, उस के हिसाब से राज्य धर्म निरपेक्ष है इस कारण वह धर्म परिवर्तन के लिए कोई प्रमाण पत्र जारी नहीं करता है। सरकारी रिकार्ड में जहाँ जहाँ धर्म अंकित किया  जाता है वहाँ परिवर्तन कराने के लिए वह व्यक्ति अपने सत्यापित शपथपत्र की सत्यापित प्रति तथा अंगीकार किए गए धर्म के लोगों या प्रमुखों द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र की सत्यापित प्रति के साथ आवेदन कर सकता है। इस आवेदन के आधार पर संबंधित रिकार्ड में उस का धर्म परिवर्तित कर दिया जाएगा। किस किस रिकार्ड मेें उसे परिवर्तन कराना होगा यह तो वह स्वयं अपनी आवश्यकता के अनुसार तय कर सकता है, कोई अन्य नहीं।

धर्म परिवर्तन के कारण किसी व्यक्ति की छात्रवृत्ति रुकनी नहीं चाहिए थी। लेकिन धर्म परिवर्तन के बारे में असमंजस हो जाने से अधिकारियों ने उसे रोक दिया गया होगा। लेकिन यह गलत था। यदि ऐसा होता है तो इस के विरुद्ध लड़ा जा सकता है और न्यायालय से भी राहत प्राप्त की जा सकती है।

किसी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन से सिर्फ और सिर्फ उस का धर्म परिवर्तन होगा। उस के परिवार के अन्य सदस्यों का नहीं चाहे वे माता-पिता, बहिन-भाई, पत्नी या संतानें ही क्यों न हों। धर्म परिवर्तन के उपरान्त उत्पन्न हुई संतान का धर्म माता पिता का माना जाएगा। वयस्क होने पर वह चाहे तो अपना धर्म स्वयं निश्चित कर सकता है।

rp_termination-of-employment.jpgसमस्या-

हंसराज मीणा ने कोटा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

म ने नौकरी मांग को लेकर राजस्थान सरकार के विरुद्ध आन्दोलन किया तो हमारे साथियों को गिफ्तार किया। मुझे सलाह चाहिए कि क्या धारा 332,352,147,149,448 आईपीसी लगने और मुकदमा विचाराधीन होने पर सरकारी नौकरी लग सकती है। हमारे पास इस से मुक्ति का क्या उपाय है? क्या हमें इन धारा को छुपाकर नौकरी करते समय कोई दिक्कत हो सकती है? कौनसी धारा के तहत सरकारी नौकरी मे लगने से रोका जा सकता है यदि मामला विचाराधीन हो?

समाधान-

कोई अपराधिक मुकदमा विचाराधीन होने पर, उस में सजा होने पर प्रोबेशन पर छोड़े जाने पर, सजा हो जाने पर, संदेह के आधार पर या साक्ष्य न आने या साक्षी के विरुद्ध हो जाने से दण्डित न किए जाने पर हर सरकार और सरकारी विभागों की अलग अलग नीति हो सकती है। आप को चाहिए कि आप जहाँ नौकरी के लिए आवेदन दे रहे हैं उस नौकरी के संबंध में उस सरकार या विभाग की क्या नीति है। उसी से आप के प्रश्न का उत्तर मिल सकता है।

म तौर पर किसी अनैतिक अपराध के मामले में या किसी गंभीर अपराध के मामले में ही किसी को नौकरी देने से वंचित किया जा सकता है। यदि मामला विचाराधीन है तो चयन होने पर नियुक्ति को मामले में निर्णय होने तक नियुक्ति को रोका जा सकता है। दिल्ली पुलिस की इस तरह की गाइड लाइन्स या नीति को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गयी थी जिस में दिनांक 2 जुलाई 2013 को निर्णय प्रदान किया गया है। Commissioner Of Police And Anr vs Mehar Singh के मामले में दिए गए इस निर्णय को आप यहाँ क्लिक कर के पढ सकते हैं।

दि कोई मामला आप के विरुद्ध विचाराधीन है तो उसे छुपाना बहुत गलत है यह अलग से एक अपराध होगा और मिली हुई नौकरी कभी भी छीनी जा सकती है और तथ्य छुपाने के लिए सजा अलग से मिल सकती है। आप को विचाराधीन अपराधिक प्रकरण और यदि किसी मामले में दंडित किया गया है तो उसे स्पष्ट रूप से अपने आवेदन में पूछे जाने पर अंकित करना चाहिए।

प का मामला हक के लिए आंदोलन के दौरान बनाया गया है। इस तरह के अपराधिक मामले सरकार वापस भी ले लेती है। यदि स्वयं सरकार इस तरह के अपराधिक मामले वापस ले लेती है तो फिर नौकरी प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं रहती है।

Independence-Dayसमस्या-

भानु प्रताप सिंह डांगी ने मुंगावली, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं पेशे से एक पत्रकार हूं। 15 अगस्त के रात्रि करीब 8:45 प्राथमिक विद्यालय मुंगावली पर राष्ट्रीय ध्वज लगा हुआ था। जिस की मेरे एवं मेरे एक पत्रकार साथी के द्वारा मौके पर जाकर विडियो रिकार्डिंग की गई। जिस के बाद कुछ असामाजिक लोगों के द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को गलत तरीके से निकाला गया और उसे वहां से ले गये। मेरे साथ उनका झगड़ा भी हुआ जिस की मैंने विधिवत एफआईआर भी थाने में कराई। पुलिस द्वारा उक्त लोगों के खिलाफ धारा 323, 294, 341, 452, 506 एवं 34 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया और बाद में गवाहों के कथन लेकर प्रकरण में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 की धारा 2 का इजाफा किया गया। परंतु न्यायालय में जब उक्त आरोपियों का जमानत आवेदन पत्र प्रस्तुत किया गया। मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए कि यह उक्त व्यक्ति स्कूल के न तो शिक्षक हैं और न ही इनका स्कूल से कोई संबंध है इस से इन पर यह धारा लागू नहीं होती है,जमानत दे दी। मैं इस संबंध में जानना चाहता हूँ कि अब मुझे उक्त प्रकरण में क्या करना चाहिए?

समाधान

प ने यहाँ राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम 1971 का उल्लेख किया है। इस धारा के अन्तर्गत तीन वर्ष के कारावास या जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान है। इस धारा को जमानतीय घोषित नहीं किया गया है इस कारण से यह धारा अपराध अजमानतीय है। अजमानतीय होने के कारण इस धारा के अन्तर्गत अभियुक्त को गिरफ्तार कर के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है। पुलिस इस मामले में अन्वेषण कर के आरोप पत्र मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करती है और आरोप पर अभियुक्त का विचारण होता है। पुलिस का कर्तव्य इतना ही है, जो उस ने पूरा किया है। आप ने यह नहीं बताया कि इस मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत हुआ है अथवा नहीं।

हाँ तक जमानत का प्रश्न है तो तीन वर्ष से अनधिक कारावास का दंड होने के कारण उस की जमानत लिया जाना सामान्य प्रक्रिया है। जमानत आवेदन में मजिस्ट्रेट ने क्या लिखा है और क्या नहीं लिखा है इस से बहुत अन्तर नहीं पड़ता है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि मजिस्ट्रेट ने ऐसा आदेश दिया होगा जो आपने लिखा है। आप ने जो लिखा है उस के अनुसार मजिसट्रेट ने निश्चयात्मक रूप से यह लिखा है कि यह धारा संबंधित अभियुक्तों पर लागू नहीं होती। किसी भी जमानत के आदेश में इस तरह की निश्चयात्मक भाषा नहीं लिखी जाती है। क्यों कि यह निश्चय तो अभी न्यायालय को विचारण के दौरान आई साक्ष्य के आधार पर दिया जाना है।

प का काम पुलिस को सूचित कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराना था, वह आप करा चुके हैं। आरोप पत्र पुलिस ने प्रस्तुत कर दिया है तो उस की व सभी संलग्न दस्तावेजात की प्रतिलिपियाँ आप न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर प्राप्त कर सकते हैं। उन का अध्ययन कीजिए तथा अपने किसी मित्र वकील से कराइए। यदि आप को लगता है कि पुलिस ने बचाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य एकत्र नहीं की है तो तथ्य को आप एक आवेदन के माध्यम से न्यायालय को अवगत करवा सकते हैं। आप इस बात का ध्यान रखें कि विचारण के दौरान गवाह सच्चा बयान दें और पुलिस को दिए गए अपने बयान से न बदलें। आप अपना बयान तो सही दे ही सकते हैं। यदि न्यायालय के समक्ष साक्ष्य से यह प्रमाणित हुआ कि वास्तव में अपराध किया गया है तो अभियुक्तों को दोष सिद्ध हो जाएंगे और उन्हे दंडित किया जा सकता है। लेकिन यदि अपराध साबित नहीं हो सका तो वे दोष मुक्त भी हो सकते हैं।

दि आप को लगता है कि पुलिस और अभियोजन पक्ष अपनी ड्यूटी पूरी तरह नहीं कर रहे हैं तो आप के लिए यह एक समाचार होगा आप एक पत्रकार की हैसियत से उस समाचार को प्रकाशित करवा सकते हैं।

समस्या-

सुनील कुमार ने बड़ा बाजार, बीकानेर से समस्या भेजी है कि-

पाँच दिन पहले की बात है नगर विकास न्यास बीकानेर ने दुकानों का अतिक्रमण हटाने के लिए बिना नोटिस कार्यवाही की, जिस में अतिक्रमण के साथ साथ बहुत सी दुकानें जो बिलकुल अस्थाई थी उन्हें भी तोड़ दिया। जिस में मेरी भी चाय की एक छोटी सी दुकान थी, वो भी टूट गयी। में क्या करूँ? समाधान बताइए। …अस्थाई दुकानों के कोई कानून नहीं है जिस से कोई गरीब अपनी रोजी रोटी ना छूटे क्योंकि वो ही उस का एक मात्र सहारा है ???

समाधान

 राजस्थान में स्ट्रीट वैंडर्स एक्ट दिनांक 29 अगस्त 2011 को पारित किया गया था तथा यह 1 अप्रेल 2012 से प्रभावी हो गया है। इस के अन्तर्गत टाउन वैंडिंग कमेटी बनाने, स्ट्रीट वेंडर्स का पंजीकरण करने तथा स्ट्रीट वैंडर्स के लिए योजना बनाने का निर्देश दिया गया है। इस के साथ ही इस कानून में टाउन वैंडिंग कमेटी के किस तरह काम करेगी व नगरों में किस तरह इस अधिनियम को लागू किया जाएगा यह भी निर्देशित किया गया है।

लेकिन कानून के अस्तित्व में आने के बाद अभी तक उस की पालना सरकार तथा नगर पालिकाओं/ परिषदों/ निगमों द्वारा नहीं की जा रही है। इस का कारण यह है कि सरकार इसे लागू करना ही नहीं चाहती है। इस कारण से सरकारी अधिकारियों और पुलिस द्वारा लगातार स्ट्रीट वैंडर्स के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा है उन के साथ मारपीट की जाती है और उन्हें बेदखल कर दिया जाता है, उन का माल खराब कर दिया जाता है या जब्त कर लिया जाता है। अभी तक टाउन वैंडिंग कमेटियाँ भी नहीं बनाई गयी हैं जिस से स्ट्रीट वैंडर्स का रजिस्ट्रेशन किया जा सके और न ही स्ट्रीट वैंडर्स के लिए कोई योजना बनाई जा रही है।

न परिस्थितियों में सेंटर फॉर सिविल सोसायटी ने एक जनहित याचिका राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर बैंच के समक्ष दाखिल की है जिस का क्रमांक 6633-2012 है तथा स्ट्रीट वैंडर्स के साथ बुरा व्यवहार करने और उन्हें बेदखल करने से रोकने के लिए स्थगन के लिए भी आवेदन किया गया था जिस में दिनांक 12.02.2015 को आदेश भी पारित किया गया है जिसे यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है।

प चाहें तो इसी तरह की रिट याचिका सभी वैंडर्स मिल कर या उन की किसी संस्था की ओर से जोधपुर उच्च न्यायालय में बीकानेर नगर निगम के विरुद्ध प्रस्तुत कर सकते हैं तथा उजाड़े गए स्ट्रीट वैंडर्स को फिर से बसाने और जब्त शुदा सामान वापस लौटाने की प्रार्थना भी की जा सकती है।

Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

बच्चों की जाति क्या हो?

March 12, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

mother_son1समस्या-

सुरेश ने सुन्दरबनी, जम्मू और कश्मीर से समस्या भेजी है कि-

मेरी माताजी ने दूसरी जाति में शादी की है और दो बच्चे हैं। मेरी माताजी की जाति अलग है, लेकिन दोनों जाति पिछड़ी जाति हैं। कुछ साल के बाद एक विवाद हुआ और वो अलग हो गये। जिसके बाद कोर्ट में केस भी चला लेकिन मेरे पिता ने उस में नहीं माना कि मेरे दो बच्चे हैं। लेकिन बाद में सभी दस्तावेज के बाद कोर्ट ने फैसला दिया कि इनको पालन-पोषण के लिए हर माह कुछ पैसे दिए जाएँ। मेरी माताजी ने वो पैसा नही लिया। अब जब बच्चें बड़े होकर शादी भी हो गई। उसके बाद हम चाहते हैं कि मेरे बच्चों का जाति मैं वो ही रखूँ जो कि मेरी माताजी की हैं क्योंकि समाज में मेरे पिताजी ने हमें कुछ भी नहीं दिया है। क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ?

समाधान-

दि आप को आरक्षण से संबंधित कोई लाभ नहीं लेना है तो आप कोई भी जाति रखें किसी को क्या फर्क पड़ता है? जाति की जरूरत तब पड़ती है जब कोई प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आवेदन देता है।

न्यायालयों के समक्ष भी इस तरह के विवाद आए हैं कि किसी व्यक्ति की जाति क्या होनी चाहिए? इस विषय पर न्यायालयों के जो निर्णय हुए हैं उन में जाति को एक सामाजिक समूह माना है जो भारत में विद्यमान हैं। इन सामाजिक समूहों में केवल वे ही लोग नहीं शामिल होते जो उन समूहों में जन्म लेते हैं, अपितु वे लोग भी सम्मिलित होते हैं जिन्हें ये समूह अपना लेते हैं। मसलन एक लड़की के विवाह के बाद यदि उस के पति का जातीय समूह उसे स्वीकार कर ले तो उस की जाति बदल जाती है। एक व्यक्ति अन्य जाति के बच्चे को गोद ले ले तब भी उस की जाति बदल जाती है। एक पुरुष किसी दूसरी जाति की महिला से विवाह कर ले और उस की खुद की जाति उसे बहिष्कृत कर दे और पत्नी की जाति उसे स्वीकार कर ले तो भी जाति परिवर्तित हो जाती है।

प का मामला कुछ भिन्न है। आप की माताजी का विवाह हुआ लेकिन फिर पति से विवाद हो गया। वे अलग हो गयीं और बच्चे भी उन के साथ ही रहे। पिता पर खर्चा देने का आदेश अदालत से जरूर हुआ लेकिन पत्नी ने खर्चा नहीं लिया और बच्चों का पालन पोषण खुद किया।

स परिस्थिति में जरूरी बात यह है कि आप की माताजी पति से विवाद होने पर कहाँ रहीं। क्या वे मायके लौट आयीं? क्या वे अपने मायके वाले लोगों और मायके वाली जाति के साथ ही रहीं? ऐसा है तो बच्चे भी अपने मामा नाना के साथ ही रहे हैं और उन की जाति ने उन्हें स्वीकार किया है। यदि इस तरह के तथ्य हों तो आप को मानना चाहिए कि आप की और आप की माताजी की जाति वही है जो आप के मामा और नाना की है। आप खुद को माता जी की जाति का बता सकते हैं।

तलाकसमस्या-

कल्याण सिंह रावत ने भीम, राजसमँद, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

प्रेमिका को हिन्दू रीति से खून से माँग-भर कर पत्नी मानकर पिछले 15 वर्ष से लिव-इन-रिलेशन में रहा। महिला जो तलाकशुदा मुस्लिम होकर 3 बच्चों की माँ है उसे उस के सगे भाई ने घर में बँधक बना कर रखा हुआ है। पिता का साया तो 34 साल पहले ही उठ गया है अब मैं अपनी इस पत्नी-प्रेमिका को कैसे उसके भाई की कैद से मुक्त करा सकता हूँ। उस का भाई मुझे मारने का दो बार असफल प्रयास कर चुका है और मेरी पत्नी-प्रेमिका को किसी और व्यक्ति को सौंप देना चाहता है। क्योंकि वह महिला केवल मेरे पास साथ रहना चाहती है पर भाई बीच में दीवार बन कर खडा है। क्या मैं 97 के वारँट द्वारा उस की कस्टडी ले सकता हूँ यदि महिला कोर्ट में अपनी सहमति से मेरे साथ रहना चाहती है। यदि उसे वहाँ से आजाद नही कराया गया तो कहीं वह अपनी जीवन लीला ही समाप्त न कर दे। सबूत के तौर पर उस के लिखे खत मैंने सँभाल कर रखे हैं जिस में उसने अपनी चाहत प्यार का इजहार किया गया है और हमारे साथ बिताये लम्होँ की खूबसूरत फोटो भी है ।

समाधान-

धारा 97 दंड प्रक्रिया संहिता में यदि जिला मजिस्ट्रेट, उप खंड मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह विश्वास हो जाए कि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में परिरुद्ध है जिन में वह परिरोध अपराध की कोटि में आता है तो वह तलाशी वारंट जारी कर सकता है। और यदि ऐसा व्यक्ति मिल जाए तो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। मजिस्ट्रेट मामले की परिस्थितियों के अनुरूप उचित आदेश पारित कर सकता है। आप के मामले के तथ्यों से ऐसा लगता है कि आप धारा 97 दंड प्रक्रिया संहिता का उपयोग कर सकते हैं।

प की प्रेमिका परिरुद्ध ही नहीं है अपितु बंदी प्रतीत होती है। ऐसी स्थिति में आप उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं और वहाँ से उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश जारी करवा सकते हैं। वह धारा 97 से अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है। बाद में जैसा वह महिला चाहेगी वैसा आदेश दिया जा सकता है।

बाल श्रम और उस का प्रतिषेध !

November 14, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

भारत में बच्चों के अधिकारों के बारे में चर्चा बहुत होती है लेकिन उन के बारे में सही जानकारी का भी अत्यन्त अभाव है। भारत में बाल-श्रम के प्रतिषेध के लिए  बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 प्रभावी है। बाल दिवस के अवसर पर हम यहाँ इस अधिनियम के सामान्य प्रावधान यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं-

बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 
इस अधिनियम का उद्देश्य समूचे बाल श्रम का उन्मूलन करना नहीं है, यह केवल कुछ प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों में बाल श्रम के नियोजन को निषिद्ध करता है, जहां नियोजन निषिद्ध नही है, वहां बाल श्रमिकों की सेवा दशाओं को विनियमित करता है, 14 वर्ष की उम्र तक के बालकों को शिक्षा ग्रहण करने की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान करता है और उनकी कोमल अवस्था के विपरीत उनसे कठिन कार्य लेने पर रोक लगाता है तथा विभिन्न श्रम कानूनों में बालक (चाइल्ड) की परिभाषा को एक रूप देता है। इन्हीं उद्देश्यों से इस अधिनियम को विनिर्मित किया जाना इस अधिनियम में कहा गया है।

बाल श्रमिक की परिभाषा    
ऐसे श्रमिक जिन्होंने अपनी आयु के 14 वर्ष पूर्ण न किये हों इस अधिनियम की धारा -2 (II) के अन्तर्गत इस अधिनियम द्वारा “बालक” के रूप में परिभाषित किए गए हैं।

बाल श्रम पूर्ण रूप से निषेध 
अधिनियम की धारा-3 के अधीन भाग (अ) मे उल्लिखित व्यवसायों तथा भाग (ब) में उल्लिखित प्रक्रियाओं को खतरनाक घोषित करते हुये बाल श्रम नियोजित किया जाना पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है। कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 की व्यवस्था के अनुसार इन उद्योगों  में चाहे वे खतरनाक अथवा गैर खतरनाक प्रकृति के हों इस अधिनियम द्वारा बाल श्रम पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है।

बाल श्रम नियोजन का नियमन    
धारा-6 से 11- धारा-3 में उल्लिखित अनुसूची से भिन्न गैर खतरनाक अधिष्ठानों में बालकों को नियोजित किया जा सकता है।

बाल श्रमिक नियोजन की शर्तें    
बाल श्रमिकों को जहाँ नियोजित किया जा सकता है वहाँ उन्हें केवल निम्न की शर्तों के साथ ही नियोजित किया जा सकता है-

  • बाल श्रमिक से किसी भी दिन लगातार 3 घन्टे से अधिक कार्य नहीं लिया जा सकता है। तीन घंटे काम लेने के उपरांत या उस से पहले बालक को न्यूनतम एक घंटे का विश्राम काल देना आवश्यक  है।
  • बाल श्रमिक के कार्य के घन्टे विश्राम काल ( न्यूनतम एक घन्टा ) को सम्मिलित करते हुए छह घन्टे से अधिक नहीं हो सकते। अर्थात उन से दिन में पाँच घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। इस में वह समय भी सम्मिलित है जिस समय उसे काम देने के लिए प्रतीक्षा कराई जाती है।
  • बाल श्रमिक को सप्ताह में एक दिन अवकाश दिया जाना अनिवार्य किया गया है।
  • सांय 07 बजे से प्रातः 08 बजे के मध्य बाल श्रमिक से कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • बाल श्रमिक से ओवरटाईम कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के नियोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जाना आवश्यक कर दिया गया है।

अभिलेख    
प्रत्येक नियोजक को बाल श्रमिक का उपस्थित रजिस्टर पृथक से रखना अनिवार्य है, जिसमें वह उसका नाम, जन्मतिथि, कार्य का प्रकार, कार्य के घण्टे, अवकाश का समय आदि रखेगा।

बाल श्रम नियोजित करने हेतु नोटिस
नियोजक यदि बाल श्रमिक नियोजित करता है तो बाल श्रमिक के पू
र्ण विवरण की सूचना क्षेत्र के निरीक्षक को पूर्ण विवरण सहित 30 दिन के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया है।

दण्ड 
इस अधिनियम की धारा-14 एवं 15 में निषिद्ध नियोजन सम्बन्धी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले नियोजक को प्रथम अपराध पर न्यूनतम तीन माह की कैद जो एक वर्ष तक भी हो सकती है या दस हजार रूपये अर्थदण्ड जो बीस हजार रूपये तक भी हो सकता है अथवा दोनो दण्डों से दण्डित किया जा सकता है। अधिनियम के अन्य किसी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले को एक माह तक की सजा या दस हजार रूपये तक अर्थदण्ड अथवा दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 के अधीन जहां भी बाल श्रम नियोजन निषिद्ध है के प्रावधानों का उल्लंघन भी इस अधिनियम की धारा-14 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है।

आयु का प्रमाण    
बाल श्रमिक की आयु के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न होने पर राजकीय चिकित्सक द्वारा आयु के सम्बन्ध में प्रदत्त प्रमाण पत्र को ही मान्य कर दिया गया है।

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देश

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एम0 सी0 मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य ( 465/86) में दिये गये ऎतिहासिक निर्देश निम्नांकित बिन्दुओं में समाहित हैं –

  • प्रतिकर की वसूली-

खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिक नियोजित करने वाले सेवायोजकों से रूपया 20 हजार तक प्रतिकर भी वसूला जाये।

  • शिक्षा व्यवस्था।

खतरनाक उद्योगों से बाल श्रम को हटाकर उसे शिक्षा का लाभ दिलाया जाये ।
गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के सेवायोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जायेगा।

  • पुनर्वास

बाल श्रमिक के परिवार के एक वयस्क सदस्य को रोजगार दिलाया जाये।

  • कल्याण निधि का गठन।

नियोजकों से वसूल की गयी उक्त धनराशि से प्रत्येक जिले में एक श्रम कल्याण निधि का गठन किया जाये, जिसका उपयोग बाल श्रमिकों के कल्याण हेतु किया जाये।

परोक्त प्रावधानों के बाद भी अनेक निषिद्ध उद्योगों और प्रक्रियाओं में बाल श्रम  का उपयोग किया जा रहा है। लोग देख कर भी उस की अनदेखी करते हैं।  इस का एक मुख्य कारण यह भी है कि हमारे यहाँ अभी लोगों को शिकायत करने की आदत नहीं है।  शिकायत कर देने पर भी उचित कार्यवाही करने वाले निरीक्षकों की बहुत कमी है, जो हैं उन्हें भी ऐसे नियोजको द्वारा प्रायोजित कर लिया जाता है।  जब तक स्वयं जनता में बाल श्रम विरोधी जागरूकता उत्पन्न नहीं होती है, बाल-श्रम का पूरी तरह से उन्मूलन संभव नहीं है।

lawसमस्या-

राहुल ने कोरबा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं एक विद्यार्थी हूँ और जानना चाहता हूँ कि यदि कोई अपनी जाति से दूसरी जाति में विवाह करे और दोनों की जातियाँ ओबीसी श्रेणी की हों तो लड़का या लड़की कोई एक अपनी जाति में परिवर्तन कर सकता है क्या?

समाधान-

कानूनी रूप से जाति परिवर्तन की समस्या तब उपस्थित होती है जब कि विवाहित युगल में से कोई एक किसी दूसरी श्रेणी की जाति का हो। क्यों कि सारी समस्या आरक्षण की सुविधा से उत्पन्न होती है। इस तरह के मामलों में न्यायालयों के निर्णयों में यह माना गया है कि केवल विवाह कर लेने से या किसी को गोद ले लेने मात्र से किसी व्यक्ति की जाति नहीं बदल जाती है।

जाति एक सामुदायिक मामला है। यदि कोई किसी दूसरी जाति में विवाह करता है या करती है तो सामान्य रूप से दोनों ही जाति समुदाय उस युगल को त्याग देते हैं। यह भी होता है कि दोनों में से कोई एक जाति उस युगल को अपना लेती है। तब यह माना जा सकता है कि जिस जातीय समुदाय ने उस युगल को अपनी जाति में ग्रहण कर लिया है। वैसी स्थिति में एक व्यक्ति तो उसी जाति का होता है दूसरा व्यक्ति जो दूसरे जातीय समुदाय से आता है या आती है तो उस का जाति परिवर्तन हो जाता है। इस तरह वह बदली हुई जाति का प्रमाण पत्र बनवा सकता है।

स तरह का प्रमाण पत्र बनवाने में तब अधिक समस्या आती है जब उस से आरक्षण की श्रेणी बदल रही हो। आप के मामले में ऐसी समस्या नहीं है इस कारण यदि कोई जाति बदल कर प्रमाण पत्र बनवाना चाहेगा तो इतनी परेशानी नहीं आएगी। केवल विवाह के प्रमाण प्रस्तुत करने मात्र से यह प्रमाण पत्र बन जाना चाहिए।

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