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अपराधिक मुकदमे अभियुक्त की उपस्थिति के बिना आगे नहीं बढ़ते।

समस्या-

राधेश्याम गुप्ता ने इंदौर , मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैंने इंदौर जिला कोर्ट में २०१३ से धारा १३८ का परिवाद प्रस्तुत किया था, आरोपी ने मुझे २,१५०००/- का चेक दिया था जो बैंक में अनादरित हो गया था। उसके पश्चात मैंने केस दायर किया था, जो कि अभी तक चल रहा है। नोटिस, जमानती वारंट के बाद अब गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो चुका है, परन्तु आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है।  मैंने परिवाद में आरोपी के दो पते दिए हुए हैं, एक उसका स्वयं का घर जहाँ उसकी माँ रहती है और दूसरा उसके ससुराल का जहाँ वह ज्यादातर रहता था। आरोपी कैसे पकड़ में आये और पुलिस और कोर्ट से मुझे कैसे राहत मिल सकती है, जिससे कि मेरा पैसा मुझे जल्द से जल्द मिल सके। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।


समाधान-

ह एक बड़ी समस्या है। कोर्ट में मुकदमा करने के बाद कोई भी व्यक्ति आप की तरह यह सोचता है कि अब तो पैसा वसूल हो ही जाएगा। वह हो  भी जाता है यदि अभियुक्त पकड़ में आ जाए। लेकिन इस के लिए कोर्ट केवल समन, जमानती या गैरजमानती वारंट जारी कर सकता है। पुलिस ही अभियुक्त को पकड़ कर लाएगी। पुलिस के पास पहले ही बहुतेरे काम हैं। अब 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अभियुक्तों को पकड़ने का काम भ ी उस के जिम्मे है। पुलिस की स्थिति आप जानते हैं कि यदि उसे पता हो कि किसी को गरज है तो अदना सा सिपाही भी अकड़ कर चलता है, जब तक उस की पर्याप्त फीस नहीं मिल जाती वह सरकता नहीं है या फिर ऊटपटांग रिपोर्ट लिख कर समन /वारंट अदालत को वापस लौटा देता है। इस मामले में आप अधिक से अधिक यह कर सकते हैं कि अदालत से वारंट दस्ती प्राप्त कर लें उस थाने के नाम पर जिस थाने के सिपाही को आप साथ ले जा सकें। जैसे ही आप को पता लगे कि अभियुक्त एक खास स्थान पर है तब आप सिपाही को ले जा कर उसे गिरफ्तार करवा सकते हैं।

इतना तो आप भी जानते होंगे कि यह एक अपराधिक मुकदमा होता है, अभियुक्त की उपस्थिति के बिना इस मेंं आगे कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यदि एक बार पकड़ में आ कर अदालत से जमानत पर छूट जाने के बाद भी यदि अभियुक्त गैर हाजिर हो जाता है तो भी मुकदमा वहीं रुक जाता है,आगे नहीं बढ़ता है। यह एक प्रकार का छिद्र है जिस के कारण देश में हजारों मामलों की सुनवाई लटकी पड़ी है।

वारंट मामले में अभियुक्त को समन्स या वारंट से तलब करना न्यायालय का विवेक है।

rp_judge-caricather11.jpgसमस्या-

पिंकी कुमारी ने बिहार से पूछा है-

मैं एक अनुसूचित जाति की लड़की हूँ और मैं बिहार सरकार की एक सोसायटी में काम करती हूँ।  मैंने अपने वरिष्ठ पदाधिकारी की प्रताड़ना से तंग आकर वरिष्ठ पदाधिकारी के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद पत्र दायर किया था। जिस पर न्यायालय ने प्रसंज्ञान लेते हुए धारा 3(1) (x) अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सम्मन जारी किया है जिस में आरोपित को दो महीने बाद उपस्थित होना है। क्या इस बीच आरोपित व्यक्ति की गिरफ़्तारी हो सकती है।

समाधान-

किसी भी मामले में न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान लिए जाने के उपरान्त अभियुक्त को न्यायालय में लाने के लिए प्रोसेस धारा 204 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत जारी किया जाता है। यदि मामला समन्स केस का हो तो न्यायालय अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष लाने के लिए समन्स जारी कर सकता है। लेकिन यदि मामला वारंट केस का हो तो न्यायालय उस मामले में अपने विवेक से समन्स या वारंट दोनों में से कोई एक तरीका अभियुक्त को कोर्ट के समक्ष लाए जाने हेतु अपना सकता है।

आप के मामले नें न्यायालय ने समन्स से अभियुक्त को बुलाना उचित समझा है। इस कारण इस मामले में अभी वारंट जारी होना या गिरफ्तारी संभव नहीं है। यदि अभियुक्त समन्स तामील होने पर भी न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो आप न्यायालय से आग्रह कर सकती हैं कि गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाए। न्यायालय मामले में वारंट जारी कर सकता है और पुलिस अभियुक्त को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है।

इस मामले में न्यायालय ने समन्स जारी किए हैं इस कारण अगली बार भी गिरफ्तारी के स्थान पर जमानती वारंट ही जारी किए जाने की संभावना है।

घऱेलू हिंसा मामले में अप्रार्थी की उपस्थिति के लिए वारंट जारी किया जा सकता है।

समस्या-

एटा, उत्तर प्रदेश से डॉ. निरूपमा वर्मा ने पूछा है –

मेरी मित्र का घरेलू हिंसा का वाद अदालत में लंबित है।  परन्तु उसका पति अदालत का समन नहीं ले रहा है।  क्या उसकी गिरफ्तारी का कोई आदेश हो सकता है?घरेलू हिंसा अधिनियम

समाधान-

रेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 की धारा 28 में यह उपबंध किया गया है कि धारा 12,18,19, 20, 21, 22 और 23 की कार्यवाहियाँ दंड प्रक्रिया संहिता से शासित होंगी। दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 6 में व्यक्तियों को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने को बाध्य करने के लिए उपबंध किए हुए हैं।  किसी भी व्यक्ति को सब से पहले समन भेजा जाता है जो कि किसी पुलिस अधिकारी या किसी लोक सेवक द्वारा तामील कराया जाता है। धारा 64 में यह उपबंध है कि यदि जिस व्यक्ति को समन तामील नहीं हो रहा है तो समन की प्रति परिवार के किसी वयस्क पुरुष सदस्य को दी जा सकती है समन तामील कराने वाला समन की पुश्त पर परिवार के जिस वयस्क सदस्य को यह समन दिया गया है उस के हस्ताक्षर प्राप्त करेगा और रिपोर्ट करेगा।  इस तरह आप की मित्र के पति को समन की तामील कराई जा सकती है।  लेकिन यदि समन इन तरीकों से तामील नहीं कराया जा सकता है तो तामील कराने वाला अधिकारी समन की एक प्रति जिसे समन तामील कराया जाना है उस के सामान्य निवास स्थान पर चस्पा कर के तामील कराई जा सकती है।

लेकिन यदि न्यायालय को यह विश्वास हो कि कोई व्यक्ति समन को लेने से बचने के लिए गायब हो गया है या उस के गायब होने की संभावना है या फिर समन की तामील के बावजूद न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ है तो वह ऐसा कारण रिकार्ड कर के उस व्यक्ति का वारंट जारी कर सकता है।

स के लिए आप की मित्र को न्यायालय के समक्ष एक आवेदन पत्र प्रस्तुत करना चाहिए कि उस का पति समन लेने से जानबूझ कर बच रहा है और समन तामील कराया जाना संभव नहीं है इस कारण उस की उपस्थिति हेतु वारंट जारी किया जाए। इस आवेदन के साथ एक शपथ पत्र भी इस तथ्य का देना होगा कि आप की मित्र का पति जानबूझ कर समन लेने से बच रहा है।

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