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बेनामी संपत्ति व्यवहार क्या है?

समस्या-

जितेन्द्र ने  मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे बाबा ने अपनी दो ऐकड जमीन मेरे मामा के नाम बसीयत 1985 में करदी थी। यदि मामा वह जमीन मेरे नाम वसीयत करदे, तो यह जमीन बेनामी सम्पत्ति अधिनियम के अन्तर्तगत तो नहीं आएगी।


समाधान-

बेनामी संपत्ति व्यवहार वह संपत्ति व्यवहार है जिस में संपत्ति किसी के नाम पर खरीदी जाए और जिस का मूल्य किसी और ने चुकाया हो तथा वह संपत्ति जिसे कोई अपने नाम पर किसी अन्य के लाभ के लिए रखता है लेकिन उस संपत्ति का मूल्य चुकाया हो।  इस प्रकार वसीयत और दान आदि व्यवहार किसी तरह के बेनामी व्यवहार नहीं हैं।

आपके मामा को वसीयत में प्राप्त संपत्ति यदि मामा द्वारा आप को वसीयत की जाती है तो यह किसी भी प्रकार से बेनामी संपत्ति नहीं कही जाएगी।

दादी जी से भूमि के बँटवारे का वाद प्रस्तुत कराएँ

agricultural-landसमस्या-

पदम कुमाँवत ने मुखाब खुर्द, तहसील शिव, बाड़मेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की ली हुई १० बीघा जमीन है जो मेरे बड़े पापा के नाम करवाई हुई है। बड़े पापा जब १० साल के थे तब करवाई थी। मेरे दादाजी का स्वर्गवास हो गया। दादी जी बोल रही हैं तीनो बेटो के नाम जमीन करनी है। लेकिन बड़े पापा बोल रहे हैं मेरे नाम जमीन है आपका कोई हक़ नही है। क्या अब हम न्यायालय की शरण ले सकते हैं या कोई और उपाय कृपया मुझे आपकी राय जरूर दिलावे।

समाधान-

प के दादा जी ने उक्त जमीन तब खरीदी थी जब कि आप के बड़े पापा केवल दस वर्ष के थे। उन की अपनी कोई आय नहीं थी। इस तरह उक्त जमीन के स्वामी आप के दादा जी थे। संभावना इस बात की है कि यह जमीन 5 सितंबर 1988 के पूर्व खरीदी गई हो जब तक कि बेनामी ट्रांजेक्शन्स प्रोहिबिशन एक्ट प्रभावी नहीं हुआ था। इस तरह इस भूमि का स्वामित्व बेनामी था। कानून के अनुसार यह भूमिं आप के दादा जी की ही संपत्ति थी और इस का बँटवारा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होना चाहिए जिस में आप के दादा जी के सभी पुत्रों, पुत्रियों और पत्नी को बराबर का हिस्सा मिले। बस आप को यह साबित करना होगा कि यह संपत्ति आप के दादा जी ने खरीदी थी। यह सब आसान इस कारण से है कि उस समय आप के बड़े पापा जी की आयु सिर्फ 10 वर्ष की थी।

प की दादी जी चाहती हैं कि उक्त भूमि का बँटवारा कानून के अनुसार हो। वे भी उक्त भूमि की एक हिस्सेदार हैं और खुद बँटवारे का वाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस कारण सब से अधिक उपयुक्त उपाय यही है कि उक्त भूमि के बँटवारे का दावा आप की दादी की ओर से प्रस्तुत किया जाए। यदि यह भूमि कृषि भूमि है तो इस के बँटवारे दावा राजस्व न्यायालय में किया जा सकता है। यदि आप की दादी इस तरह का बँटवारे का दावा प्रस्तुत करने को तैयार न हों तो आप के पिताजी इस दावे को प्रस्तुत कर सकते हैं। इस दावे में आप के दादा जी के सारे उत्तराधिकारी तथा राज्य सरकार तहसीलदार के माध्यम से पक्षकार बनाए जाएंगे। एक बार वाद प्रस्तुत हो जाने के बाद यदि परिवार में सहमति बनती है तो उस सहमति के आधार पर बँटवारे की डिक्री पारित कराई जा सकती है।

अपने हक पर डटे रहिए, तो हक कायम रहेगा।

ऊसरसमस्या-

श्वेता तिवारी ने रीवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मै मध्य प्रदेश की रहने वाली हूँ। सन 1992 मे मेरे ससुर जी ने और मेरे पति ने मिलकर एक जमीन ली थी उस जमीन की रजिस्ट्री मेरे नाम है। मेरे ससुर जी ने धीरे धीरे उस प्लाट में सन 2000 में दो मंजिला मकान बनवा दिया है जिस पर मेरा सारा परिवार और सास ससुर सब रह्ते थे। सन 2009 में मेरे ससुर के देहान्त के बाद मेरी सासू जी अपने छोटे बेटे के पास जाकर रहने लगी और अब कुछ समय पश्चात मेरे देवर घर आकर हम सब को धमकी देते हैं कि मैं इस मकान में हिस्सा ले के रहूंगा और उन्होने इसके लिये कचहरी के चक्कर काटने शुरु भी कर दिये हैं। जब कि गाँव में 4 बीघा पैतृक सम्पति भी है जिस में से हम लोगो ने अभी एक दमडी भी नहीं लिया है। वे पिछले 20 सालों से उस पर अनाज पैदावार करके कमाई कर रहे हैं। ससुर जी उन के लिये भी गांव में ही मकान बनवाया है। जब मेरे पति ने उनसे ये कहा की भाई जो पैतृक जमीन है हमारे हिस्से वाली उसे तुम्हीं खरीद लो कुछ पैसे कम ही सही दे देना। जमीन तुम्हारी ही रहेगी इतने मे देवर जी भडक गये। कहे कि कोई हिस्सा नहीं मिलेगा अब तो गोलियाँ चलेंगी और उस मकान (मेरे नाम वाला मकान) में भी हिस्सा लूंगा। अब आप उचित राय दे मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प को परेशान होने की जरूरत नहीं है। जो मकान आप का है वह आप का ही रहेगा। आप के देवर को सही सलाह मिली तो वे कोई मुकदमा न करेंगे। यदि करते हैं तो उन्हें असफलता मिलेगी। उन की बातों से उत्तेजित या घबराने की कोई बात नहीं है।

दि आप के देवर गाँव की जमीन में हिस्सा देने को तैयार नहीं हैं होते हैं तो आप के पति को चाहिए कि वे गाँव की जमीन के बँटवारे का मुकदमा कर दें। समय तो लगेगा पर विभाजन हो कर आप के पति का हिस्सा बन कर उस का कब्जा मिल जाएगा। तब जमीन आप के पति के हिस्से को बेचा जा सकता है। कोई गोलियाँ नहीं चलेंगी। यदि आप को लगता है कि देवर कुछ ऐसा भी कर सकता है और अब की बार धमकी दे तो पुलिस को रिपोर्ट कराइएगा। हिम्मत कर के अपने अधिकार पर डटे रहना पड़ेगा। चीजें ठीक हो जाएंगी।

बेनामी संपत्ति पर उसी का अधिकार है जिस के नाम वह खरीदी गई है

समस्या-

सासाराम, बिहार से संजु कुमार ने पूछा है-

 हम तीन भाई हैं।  मैं सबसे छोटा हूँ।  पिताजी ने 1982 में बडे भाई के नाम से उनकी किशोरावस्था में (जब वे 11-12 साल के थे) दो कट्ठा जमीन खरीदी थी।  उस जमीन पर अन्य दो भाईयों का क्या अधिकार है?  स्वयं पिताजी का उस जमीन पर कितना अधिकार है?  कृपया कानून की धाराओं का भी उल्लेख करें।

 समाधान-

प के पिता जी ने 1982 में यह जमीन खरीदी थी।  तब यह एक बेनामी खरीद थी। अर्थात जमीन खरीदने के लिए धन आप के पिताजी ने दिया था और उस जमीन के विक्रय पत्र का निष्पादन आप के भाई के नाम हुआ था।  आप के पिता जी के पास यह अधिकार था कि वे न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर के यह घोषणा करवा सकते थे कि यह जमीन उन की है और उन का उस भूमि पर स्वामित्व है।  इस वाद में यह डिक्री पारित की जा सकती थी कि भूमि का स्वामित्व बेनामी है और वास्तव में आप के पिताजी उस भूमि के स्वामी हैं।

 किन्तु बेनामी ट्रांजेक्शन्स (प्रोहिबिशन) एक्ट 1988 में पारित हुआ और 5 सितंबर 1988 को प्रभावी हो गया।  इस अधिनियम के द्वारा बेनामी संपत्ति हस्तान्तरण को अवैध तथा दंडनीय अपराध बना दिया गया। इसी अधिनियम की धारा 4 के द्वारा यह उपबंधित किया गया कि किसी भी बेनामी संपत्ति पर किसी भी अधिकार के संबंध में कोई भी दावा उस व्यक्ति के विरुद्ध जिस के नाम वह संपत्ति रिकार्ड में है इस आधार पर नहीं किया जा सकेगा कि वह उस संपत्ति का वास्तविक स्वामी है। इस प्रकार 5 सितंबर 1988 के बाद कोई भी व्यक्ति बेनामी संपत्ति को अपनी संपत्ति घोषित कराने का अधिकारी नहीं रहा। इस का असर यह हुआ कि उक्त तिथि के उपरान्त बेनामी संपत्ति उसी व्यक्ति के स्वामित्व की हो गईँ जिस के नाम वे रेकार्ड में दर्ज हैं।

प के पिता जी द्वारा आप के भाई के नाम खरीदी गई जमीन को आप के पिता जी 5 सितंबर 1988 के पूर्व तक दावा प्रस्तुत कर उसे अपनी संपत्ति घोषित करवा सकते थे लेकिन अब उन्हें या किसी भी अन्य व्यक्ति को यह अधिकार नहीं रह गया है। इस तरह आप के पिता जी के द्वारा आप के भाई के नाम खरीदी गई संपत्ति पर केवल उसी भाई का अधिकार है जिस के नाम वह खरीदी गई थी। अन्य किसी का भी कोई अधिकार नहीं रह गया है।

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