Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

कौन से खाता बही साक्ष्य में प्रस्तुत किए जा सकते हैं?

rp_Image_115.jpgसमस्या-

मुकेश तवँर ने बागानवाला, भिवानी हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

र पर रखे बही खाता में किसी किस्म का लेन देन क्या कोर्ट में मान्य है, अगर है तो किस प्रकार से मान्य है?

समाधान-

ही खाता के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 34 निम्न प्रकार है-

34. लेखा पुस्तकों क प्रविष्टियाँ, जिन में वे शामिल हैं, जिन्हें इलेक्ट्रोनिक रूप में रखा गया है, कब सुसंगत हैं-

कारोबार (बिजनेस) के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियाँ, जिनमें वे जिन्हें इलेक्ट्रोनिक रूप में रखा गया है, जब कभी वे ऐसे विषय का निर्देश करती हैं जिस में न्यायालय को जाँच करनी है सुसंगत है, किन्तु अकेले ऐसे कथन ही ऐसे व्यक्ति को दायित्व से भारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होगी।

स तरह आप देख सकते हैं कि केवल वे खाता-बही जो कि कारोबार के संबंध में नियमित रूप से धारित किए जाते हों उन्हें ही न्यायालय में विवादित विषय में सुसंगत माना गया है और उन्हें साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति पर दायित्व का निर्धारण करने के लिए केवल यह लेखा पुस्तक पर्याप्त नहीं मानी जाएगी।

प के मामले में जिस लेखा पुस्तक को आप साक्ष्य में प्रस्तुत करना चाहते हैं उस के लिए आप को यह साबित करना पड़ेगा कि वह बिजनेस के सिलसिले में नियमित रूप से रखी जाती हैं, तभी आप उन का अपने मामले में साक्ष्य के रूप में उपयोग कर सकेंगे। इस के साथ ही आप को यह ध्यान भी रखना पड़ेगा कि यदि आप इस लेखा पुस्तक से किसी के ऊपर दायित्व को साबित करना चाहते हैं तो केवल यह लेखा पुस्तक पर्याप्त नहीं होगी। आप को अन्य सुसंगत साक्ष्य भी प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

दस्तावेजों में गलती को दोहराए जाने के पहले ही, तुरन्त दुरुस्त कराएँ।

court-logoसमस्या-

वासुदेव रूणवाल ने चौपासनी हाउसिंग बोर्ड पाल रोड, जोधपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरा पुत्र वर्तमान में M.A उत्तीर्ण हो चुका है। उसके द्वारा सैकण्डरी परीक्षा का आवेदन पत्र जो वर्ष 2004 में माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान, अजमेर को प्रस्तुत किया जिसमेंमाता का नाम ”श्रीमती कविता रूणवाल” (उक्त नाम घर में बोलचाल का है)अंकित कर दिया, जबकि माता का वास्तविक नाम श्रीमती कौशल्या रूणवाल है जो किराशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर आई डी कार्ड में अंकित है। मेरी दोनोपुत्रियों के शेक्षणिक योग्यता के दस्तावेजों में माता का वास्तविक नाम “श्रीमती कौशल्या रूणवाल” ही अंकित है। इस प्रकार पुत्र के दस्तावेजो मेंएक बार उक्त गलत नाम अंकित हुआ जिसका समय पर संशोधन नहीं होने के कारण उक्तनाम अग्रेतर परीक्षा फार्म में भी अंकित करना पडा। अत: आप यह मार्गदर्शनकरावें कि उक्त गलत नाम का संशोधन नियमानुसार किस प्रक्रिया द्वारा किया जासकता है। साथ में यह भी बतावें कि उक्त गलत नाम के अंकित हो जाने से मेरेपुत्र के सम्पत्ति इत्यादि के मामले में कोई कठिनाई तो नहीं होगी?

 

समाधान-

प के पुत्र की राजस्थान बोर्ड की मार्क्सशीट में नाम गलत हुआ और बाद में भी वह गलत होता चला गया। आप को उसी समय ध्यान देना चाहिए था। आप ने इसे हलके में लिया और गलत होता चला गया। होना तो यह चाहिए कि पहली बार हुई गलती का पता लगाते ही तुरन्त उसे संशोधित कराने के लिए कार्यवाही करनी चाहिए। तब उसे संशोधित कराना आसान होता है और बाद में गलतियाँ नहीं होतीं।

राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की खुद की नियमावली है जिस के अनुसार दस्तावेजों में छात्र का, उस की माता या पिता का नाम गलत हो जाने पर संशोधन कराया जा सकता है। जिस में कोई समय सीमा भी नहीं है। आप राजस्थान बोर्ड में आवेदन करें और आवश्यक शुल्क जमा करवा कर संशोधन करवा लें।

दि आप इसे पहली गलती के समय ठीक करवा लेते तो आगे गलती नहीं होती। अब आप को जितने भी दस्तावेजों में गलती हुई है वह दुरुस्त करवानी पडेगी और फिर उन की डुप्लीकेट प्रतियाँ प्राप्त करनी होंगी।

शैक्षिक प्रमाण पत्रों में माता का नाम गलत होने से संपत्ति के मामलों में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होगी। पर जहाँ भी इस तरह का प्रमाण पत्र नजर में आएगा उस का स्पष्टीकरण देना होगा।

स्वामित्व के दस्तावेज खो जाएँ तो उपपंजीयक कार्यालय के रिकार्ड से प्रमाणित प्रति प्राप्त की जा सकती है।

Farm & house
समस्या-
वसुन्धरा ने दिल्ली से पूछा है –

मेरे दादा जी ने एक प्लॉट पंजाबी बाग में 20 साल पहले लिया था। जिस की निगरानी के लिए एक वॉचमेन रखा था। मेरे दादा जी अब नहीं रहे। जिस वॉचमेन को मेरे दादा जी ने प्लॉट की रखवाली के लिए रखा था उस ने उस प्लॉट पर क़ब्ज़ा कर लिया है और हमारे पास उस प्लॉट के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं, क्योंकि मेरे दादा जी ने उन्हें कहाँ रखा है इस की को कोई जानकारी हमें नही है। क्या वह प्लॉट हमें किसी तरह वापिस मिल सकता है। वह वॉचमेन वहाँ 20 साल से रह रहा है। हम क्या कर सकते हैं?

समाधान-

किसी भी चल संपत्ति पर स्वामित्व का प्राथमिक सबूत उस पर किसी व्यक्ति का कब्जा है। उस के उपरान्त यदि संपत्ति के स्वामित्व के दस्तावेज हैं तो उन से यह साबित किया जा सकता है कि जिस व्यक्ति के नाम वे दस्तावेज हैं, संपत्ति उस के स्वामित्व की है। आप की समस्या यह है कि आप के पास उस संपत्ति के स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं, हैं तो वे मिल नहीं रहे हैं। दूसरी समस्या ये है कि उस पर ऐसे व्यक्ति का कब्जा है जिसे आप के दादा जी ने रखवाली के लिए वहाँ रखा था। अब यदि आप उस से कब्जा लेना चाहें तो आप को न्यायालय में कब्जे का दावा करना पड़ेगा। जहाँ आप को यह साबित करना होगा कि वह संपत्ति आप के स्वामित्व की है और वह व्यक्ति एक चौकीदार की हैसियत से काम करता था। इसे साबित करने के लिए आप के पास इस बात का कोई दस्तावेजी साक्ष्य होना चाहिए कि वह व्यक्ति सिर्फ आप के दादा जी का कर्मचारी था। तब आप ये साबित कर सकते हैं कि एक कर्मचारी होते हुए भी उस ने आप की संपत्ति पर कब्जा कर के अमानत में खयानत की है। यदि आप ये करने में समर्थ हो जाएँ तो आप उस व्यक्ति के विरुद्ध अमानत में खयानत का अपराधिक मुकदमा भी चला सकते हैं।

लेकिन सब से पहले आप को चाहिए कि आप ऐसे दस्तावेज हासिल करने का प्रयत्न करें जिस से आप स्वयं को उस संपत्ति का स्वामी प्रमाणित कर सकें। यदि आपके दादा जी ने उक्त संपत्ति को खरीदा है तो निश्चित रूप से उस संपत्ति का विक्रय पत्र आप के दादा जी के नाम से निष्पादित किया गया होगा और उपपंजीयक के कार्यालय में उस का पंजीयन भी हुआ होगा। आप को खरीदने का वर्ष, माह और तिथि पता हो तो उपपंजीयक के उन दिनों के रिकार्ड को तलाश कर विक्रय पत्र की प्रमाणित प्रति प्राप्त की जा सकती है। यदि आप इस में सफल हो सकें तो आगे कार्यवाही करना संभव हो सकता है। अन्यथा यह संपत्ति तो आप खो ही बैठे हैं।

आप के कथित हस्ताक्षर युक्त दस्तावेज के आधार पर तलाक संभव नहीं है।

समस्या-

दिल्ली से सुनीता ने पूछा है –

मेरी शादी 31 जनवरी 2013 को हुई थी।  शादी से पहले मैं एक इन्स्टीट्यूट मैं अकॅडेमिक एडवाजर की जॉब करती थी। मुझे वहाँ काम करते 3 साल हो गये थे। शादी के बाद मुझे जॉब करने की अनुमति नहीं थी जिस के कारण मैं ने जॉब छोड़ दी। शादी के बाद जब भी मेरे ऑफिस से मेरे सर कुछ डाटा वगैरह पूछने के लिए कॉल करते थे तो मेरे पति मुझ पर शक करते थे की मेरा मेरे सर कई साथ कोई रिलेशन है। इस बात को लेकर रोज हम दोनों मैं झगड़ा होने लगा। जब मेरे पति ऑफिस से घर आते थे तो वो मेरा फोन चेक करते थे ओर मेरे पीछे से मेरे ऑफिस के सर को ग़लत ग़लत एसएमएस भेजते थे। इस बात से मेरे सर को बहुत गुस्सा आया और उन्हों ने मुझे फोन कर के बोला तुम मुझे इस टाइप के एसएमएस क्यों भेजती हो।  तब मैं ने उन्हें बोला कि मैं ने आप को कोई एसएमएस नहीं किया। फिर मुझे पता चला की मेरे पति मेरे पीछे से से उन को मेरे फोन से एसएमएस करते हैं।  इस बात को लेकर सर और मेरे पति कई बीच झगड़ा हो गया। मेरे पति ने मुझ पर ये भी आरोप लगाया कि मेरे सर के साथ मेरे फिज़िकल रिलेशन है मैं ने उन्हें कितने बार समझाया कि हमारे बीच ऐसा कोई रिलेशन नहीं है। लेकिन वो मानने को तैयार ही नहीं हुए और हमेशा मुझ पर शक करते रहते। वो रोज मुझ से इस बारे में पूछते रहते थे। एक दिन मैं ने गुस्से में आ कर ये बोल दिया कि हाँ हम रिलेशन में हैं और मैं अपनी मम्मी के घर आ गई।  फिर मेरे पति इस बात को ले कर मेरे ऑफिस के सर को परेशान करने लगे और मुझे तलाक़ देने की बात करने लगे।  मेरे सर ने मेरे पति को बोला कि तेरा जैसा पति तो किसी को भी ना मिले। मेरे पति ने बोला कि हाँ, जब तुम दोनों का पहले से ही रिलेशन है तो मैं पति कहाँ से हो गया।  तू ही उस का पति बन जा। इस पर मेरे सर ने कहा कि  अगर तू उससे तलाक़ देगा तो मैं उसे अपना लूंगा, मुझे पता है तू किस टाइप का है। मेरे पति ने उन से एक खाली कागज पर ये सब लिखवा लिया और फिर वो मेरे घर उस पेपर पर मुझ से सिग्नेचर लेने के लिए आ गया।  तो मैं ने उस पर सिग्नेचर करने से मना कर दिया। लेकिन उसने उल्टी सीधी बातें बोल कर मुझ से उस पर सिग्नेचर करवा लिया। अब वो उसी पेपर के बलबूते पर मुझ से तलाक़ मांग रहा है। पर मैं नहीं चाहती कि हमारा तलाक़ हो। पर मेरे पति मुझे बार बार बोल रहे हैं कि अगर ये पेपर मैं ने कोर्ट में दिखाया तो हमारा तलाक़ हो जायगा। मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम मुझे तलाक़ दो या ना दो, लेकिन मुझे तुम से तलाक़ चाहिए। कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

alimonyप को परेशान होने की जरा भी आवश्यकता नहीं है। आप के पति के पास आप के सर और आप के हस्ताक्षर वाला जो दस्तावेज है उस के आधार पर उन्हें कोई तलाक नहीं मिलने वाला है।  यह कोरी धमकी मात्र है।

लेकिन जो परिस्थितियाँ आप ने बताई हैं उन से लगता है कि आप के पति बेहद शक्की मिजाज के हैं और उन का सुधर पाना संभव प्रतीत नहीं होता। वे आप के साथ रहें या किसी अन्य से विवाह कर के वे अपनी पत्नी को जीवन भर परेशान करेंगे। ऐसे में आप के पति के साथ आप का जीवन भर थोड़ा भी शान्ति और सुख के साथ गुजरेगा यह संभव प्रतीत नहीं होता। फिर आप के प्रति उन के मन में जो संदेह का बीज घर कर गया है वह कभी नहीं मिटेगा।

प से भी कुछ गलतियाँ हुई हैं। आप को अपने पति और ससुराल वालों को विवाह के पूर्व ही बता देना चाहिए था कि आप नौकरी करती हैं और उसे नहीं छोड़ेंगी। आप ने अपनी नौकरी छोड़ कर पूरी तरह एक अनजान व्यक्ति से विवाह कर के उस पर सारी निर्भरता स्थापित कर ली। दूसरी गलती आप ने यह की कि गुस्से में आ कर आप ने यह कह दिया कि आप के सर के साथ आप के फिजिकल रिलेशन हैं। जो बात सच नहीं है उसे तो गुस्से में क्या सपने में भी स्वीकार नहीं करना चाहिए। तीसरी गलती यह की कि अपने पति की उलटी सीधी बातों में आ कर आप ने उस कागज पर हस्ताक्षर कर दिए।

प नहीं चाहती हैं कि तलाक लें, तो न लें। आप के पति उस दस्तावेज के आधार पर आप से तलाक नहीं ले सकते। हाँ, यदि आप जब चाहें कि ऐसे पति से छुटकारा मिल जाए तो आप पति के शक्की व्यवहार और जो अन्य हरकतें उस ने की हैं उन के आधार पर तलाक ले सकती हैं।

मारी तो सलाह यह है कि आप को पुनः कोई अन्य नौकरी तलाश कर के अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए और अपने पति की पूरी तरह से उपेक्षा कर देनी चाहिए। यदि उसे अपनी गलतियों का एहसास हो और सुधरने को तैयार हो जाए तथा आप को भी विश्वास हो जाए कि वह सुधर सकता है तो इस शर्त पर कि आप नौकरी करती रहेंगी, आप का पति न तो नौकरी पर कोई सवाल करेगा और न ही किसी तरह का शक जाहिर करेगा और इन सब बातों को लिख कर दे तो आप उस के साथ रहने की बात कर सकती हैं। तब जा कर कुछ संभावना है कि आप का जीवन थोड़ा बहुत शान्ति से गुजर जाए। अन्यथा आप अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय कर सकती हैं। यदि आप का पति आप के विरुद्ध तलाक का मुकदमा कर दे तो आप उस के आवेदन का उत्तर देने के पहले न्यायालय को कह सकती हैं कि पहले मकदमा खर्च, अदालत आने जाने का खर्च और आवश्यक भरण पोषण भत्ता आप के पति से दिलाया जाए। अदालत आप के पक्ष में आदेश कर देगी।

अपराधिक मामले में आवश्यक होने पर न्यायालय कोई भी दस्तावेज मंगवा सकता है।

समस्या-

बनारस, उत्तर प्रदेश से अशोक तिवारी ने पूछा है-

किसी भी अपराधिक मुकदमे में जिरह के दौरान गवाह किसी ऐसी घटना से इन्कार करे जिस के दस्तावेज सरकारी रेकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं तो क्या उस सरकारी विभाग से जिरह पूर्ण होने के पहले दस्तावेज मंगाए जा सकते हैं?

समाधान-

दि किसी अपराधिक मामले में जिरह के दौरान गवाह किसी ऐसी घटना से इन्कार करे जिस के दस्तावेज सरकारी रेकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं तो क्या उस सरकारी विभाग से संबंधित दस्तावेज मंगाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के अंतर्गत आवेदन किया जा सकता है। यदि मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश उचित समझता है तो ऐसा दस्तावेज जिरह पूरी होने के पहले मंगवा सकता है। लेकिन यदि आवश्यक न हुआ तो दस्तावेज मंगाए जाने की प्रार्थना को अभियोजन की साक्ष्य पूर्ण होने तक मुल्तवी कर सकता है। लेकिन ऐसी अवस्था में न्यायाधीश से आप यह प्रार्थना कर सकते हैं कि आप उस गवाह को पुनः जिरह के लिए बुलाने का अधिकार सुरक्षित रखना चाहते हैं। यदि इस संबंध में भी आप अपने आवेदन में या अन्य आवेदन प्रस्तुत कर उल्लेख कर दें तो उचित रहेगा।

दि न्यायालय आप के आवेदन को अभियोजन साक्ष्य पूर्ण होने तक मुल्तवी करता है और आप के गवाह को पुनः जिरह हेतु बुलाए जाने का अधिकार सुरक्षित नहीं रखता है तो आप इस आदेश को पुनरीक्षण याचिका द्वारा चुनौती दे सकते हैं।  इस बीच आप गवाह से वे सारे प्रश्न पूछ लें जो कि उस दस्तावेज के संबंध में हैं।  शेष तथ्य आप दस्तावेज से साबित कर सकते हैं। यदि दस्तावेज के रिकार्ड पर आने के उपरान्त आप को लगता है कि गवाह को जिरह के लिए बुलाना आवश्यक है तो आप उसे जिरह हेतु पुनः बुलाए जाने हेतु आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

अपराधिक मुकदमों में दस्तावेज व वस्तुएँ प्रस्तुत कराने हेतु न्यायालय के आदेश का उपबंध

समस्या-

वाराणसी, उत्तर प्रदेश से आई. एन. सिंह ने पूछा है –

पराधिक प्रकरण में परिवादी का प्रतिपरीक्षण (जिरह) चल रहा है।  अभियुक्त से परिवादी जैल में मिलने जाती थी, लेकिन जिरह में उस ने इस तथ्य से इन्कार कर दिया और कहा कि मैं कभी मिलने नहीं गयी। मैं चाहता हूँ कि न्यायालय जैल से वह दस्तावेज मंगवाए जिस पर परिवादी के हस्ताक्षर/अंगूठा निशानी है। न्यायाधीश ने पूछा है कि किस उपबंध के अंतर्गत न्यायालय उक्त दस्तावेजों को जेल से मंगवा सकती है? कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 निम्न प्रकार है –

91. दस्तावेज या अन्य वस्तु प्रस्तुत करने के लिए समन-

(1) जब भी कोई न्यायालय या पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी यह समझता है कि किसी ऐसे अन्वेषण, जाँच, विचारण या अन्य कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए. जो इस संहिता के अधीन ऐसे न्यायालय या अधिकारी के द्वारा या उस के समक्ष हो रही है, किसी दस्तावेज या अन्य किसी चीज का पेश किया जाना आवश्यक या वाँछनीय है तो जिस व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में ऐसी दस्तावेज या चीज होने का विश्वास है उस के नाम ऐसा न्यायालय एक समन या ऐसा अधिकारी एक लिखित आदेश उस से यह अपेक्षा करते हुए जारी कर सकता है कि उस समन या आदेश में उल्लखित समय और स्थान पर उसे प्रस्तुत करे अथवा हाजिर हो और उसे प्रस्तुत करे।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जिस से इस धारा के अधीन दस्तावेज या अन्य कोई वस्तु पेश करने की ही अपेक्षा की गई है उसे पेश करने के लिए स्वयं हाजिर होने के स्थान पर वह उस दस्तावेज या वस्तु को प्रस्तुत करवा दे तो यह समझा जाएगा कि उस ने उस अपेक्षा का अनुपालन कर दिया है।

इस धारा की कोई बात-

(क) भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी, अथवा

(ख) डाक या तार प्राधिकारी की अभिरक्षा में किसी पत्र, पोस्टकार्ड, तार या अन्य दस्तावेज या किसी पार्सल या चीज पर लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी।

प जेल का रिकार्ड न्यायालय में मंगवाने के लिए उक्त धारा 91 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करें जिस में यह लिखें कि किस तरह उक्त दस्तावेज उक्त प्रकरण में प्रासंगिक हैं  और न्याय को प्रभावित करने वाले हैं और जिन्हें न्यायालय के समक्ष नहीं लाए जाने के कारण अभियुक्त द्वारा अपराध नहीं किया होने पर भी दोषी ठहराया जा सकता है। न्यायालय आप के आवेदन पर यथोचित आदेश पारित करेगा। यदि वह आप के दस्तावेज मंगाए जाने के आवेदन को निरस्त कर देता है तो आप उस आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय में रिविजन याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।

जिस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए आप उक्त दस्तावेज मंगाना चाहते हैं वह आ जाने पर भी आप को उस दस्तावेज को प्रमाणित करने के लिए उस दस्तावेज को तैयार करने वाले अधिकारी/कर्मचारी को साक्ष्य हेतु बुलाना होगा। जो अपने बयान में कहेगा कि वह लड़की अभियुक्त से मिलने आती थी और तभी उस पंजिका में उस के हस्ताक्षर/अंगूठा निशानी कराए गए थे और उसी के सामने किए गए थे।  तभी परिवादी के जैल में जा कर अभियुक्त से मिलने का तथ्य आप साबित कर सकेंगे।

न्यायालय प्रमाणित तथ्यों के आधार पर निर्णय करते हैं

समस्या-

गर कोई तीन कक्षा पढ़ कर छोड़ देता है और फिर पहली में वापस प्रवेश लेकर आज बी.ए कर रहा है। तो उसकी उम्र के दो रिकार्ड हो जाते हैं। बाद वाली पढाई से उसकी उम्र सतरह साल होती है और पहले वाली से बीस साल होती है। इस तरह उस की उम्र के दो दस्तावेज हो जाते है! बाद वाली उम्र से वह नाबालिग होता है।  अगर उसका पहले वाला दस्तावेज न्यायालय में प्रस्तुत हो तो क्या न्यायलय उसे बालिग मानेगी? यदि  उस ने कोई एग्रीमेंट किया हुआ है तो उसे मानेगी या बाद वाली उम्र से उस एग्रीमेंट को शून्य मानेगी?

-भंवर जानी, जोधपुर, राजस्थान

समाधान-

न्यायालय सदैव ही साक्ष्य द्वारा प्रमाणित किए गए तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय देते हैं। यहाँ एक ऐसे व्यक्ति के मामले में प्रश्न किया गया है जिस के सम्बन्ध में कोई मुकदमा चल रहा है। लेकिन अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति की उम्र क्या है। एक तो उस का सैकंडरी स्कूल परीक्षा का प्रमाण पत्र है जिस में उस की जन्म तिथि अंकित है और जिस के आधार पर वह नाबालिग ठहरता है। दूसरा उस के स्कूल का स्कॉलर रजिस्टर हो सकता है जिस में स्कूल में प्रवेश लेने वाले बालक का विवरण होता है। इस अभिलेख के आधार पर वह व्यक्ति बालिग ठहराया जा सकता है।

लेकिन दोनों ही साक्ष्य दस्तावेजी हैं। इन्हें किसी मौखिक साक्ष्य द्वारा प्रमाणित कराया जाना आवश्यक है।  यदि मौखिक साक्ष्य से यह प्रमाणित हो जाता है कि दोनों ही दस्तावेजी साक्ष्य सही हैं तो न्यायालय के समक्ष सही स्थिति सामने आ जाएगी कि इस व्यक्ति ने पहले स्कूल में प्रवेश लिया और तीन वर्ष के बाद अध्ययन कर के स्कूल त्याग दिया। पुनः उस ने स्कूल में पहली कक्षा में प्रवेश लिया और इस समय उस के माता पिता ने अपनी जन्म तिथि तीन वर्ष कम कर के लिखवा दी। ऐसी अवस्था में न्यायालय इसी निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि व्यक्ति की जन्म तिथि वही सही है जो उस के माता पिता ने पहले वाले प्रवेश के समय स्कूल का प्रवेश फार्म भरते समय लिखाई थी। इस हिसाब से वह व्यक्ति वयस्क माना जाएगा।

क बार यह निर्धारित हो जाने पर कि वह व्यक्ति वयस्क है। उस के द्वारा किए गए अनुबंध पर विचार किया जाएगा। यदि अनुबंध करते समय वह व्यक्ति वयस्क पाया जाता है तो उस के द्वारा निष्पादित किया गया अनुबंध वैध माना जाएगा और यह माना जाता है कि वह अनुबंध करते समय वह व्यक्ति अवयस्क था तो उस अनुबंध को अवैध माना जाएगा।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada