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वकील का चुनाव ठीक से करें।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

रविन्द्र कुमार ने दिल्ली से पूछा है-

मेरे छोटे भाई का विवाह 2012 में हुआ। वो और उसकी पत्नी हमारे साथ 3 महीने रहे फिर भाई की पत्नी को को शक होने लगा की उसके सम्बन्ध भाभी के साथ है, जिस कारण मेने भाई को अलग कर दिया और अख़बार में भी निकलवा दिया कि हमारा उनसे कोई लेने देना नही है। वो तक़रीबन 3 साल अलग किराये पर रहे। दोनों का आपस में कोई विवाद हो गया और 498, 406 आईपीसी  में प्रथम सूचना रिपोर्ट हुई। अभी ये केस कोर्ट में नही लगा है। पर स्त्री धन वापसी का चल रहा है और दोनों केसों में मेरे पूरे परिवार का नाम है। सामान कोर्ट के आदेश पर वापस हो गया है। पर वो कहते हैं कि हमारा सामान लड़के के परिवार के पास है जो कि दिया ही नही गया। उन ने झूठे बिल बना के जाँच अदिकारी को दिए। विवाह में कोई वीडियो फोटो नहीं हुआ। वो और हम दोनों गरीब परिवार हैं। फिर भी तक़रीबन 10 लाख का स्त्री धन लिखा रखा है जो कि दिया ही नहीं गया।  अब मैं क्या करूँ समझ नहीं आता? हमारी अग्रिम जमानत हो चुकी है। क्या मुझे और मेरे परिवार को अरेस्ट किया जा सकता है? अगर हाँ तो मुझे क्या करना चाहिए? जो लिया ही नहीं वापस कैसे करूँ कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

ति-पत्नी में विवाद हो जाने पर 498 ए व 406 आईपीसी की शिकायत दर्ज कराना आम बात हो गयी है। ऐसी शिकायतों में कई बार केवल 10 प्रतिशत सचाई होती है। लेकिन शिकायत की है और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होगी तो उस का अन्वेषण पुलिस को करना पड़ेगा। पुलिस अन्वेषण के दौरान जान जाती है कि कितनी सचाई है और कितनी नहीं। आम तौर पर केवल पति के विरुद्ध ऐसा मुकदमा प्रमाणित दिखाई देता है और आरोप पत्र भी उसी के विरुद्ध प्रस्तुत होता है। आप को अभी चाहिए कि आप पुलिस अन्वेषण में पूरा सहयोग करें और पुलिस को आरोप पत्र प्रस्तुत करने दें। पुलिस भी नहीं चाहती कि जिस मुकदमे में वह आरोप पत्र प्रस्तुत करे उस में अभियुक्त बरी हो जाए।

आप ने खुद लिखा है कि आप की अग्रिम जमानत हो चुकी है। इस का अर्थ है कि पुलिस आप को गिरफ्तार नहीं करेगी। बस जिस दिन आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी उस की सूचना आप को देगी और आप को न्यायालय में उपस्थित हो कर जमानत करानी पड़ेगी। उस के बाद मुकदमा चलता रहेगा।

झूठे आरोपों को साबित करना आसान नहीं होता। यदि आरोप झूठे हैं तो पुलिस ही आरोप पत्र सब के विरुद्ध प्रस्तुत नहीं करेगी। यदि पुलिस ने आरोप पत्र प्रस्तुत कर भी दिया तो तो भी अभियोजन पक्ष मुकदमे को साबित नहीं कर पाएगा तो सभी लोग बरी हो सकते हैं।

आप की जरूरत सिर्फ इतनी है कि आप कोई वकील ऐसा करें जो आप के मुकदमे की पैरवी मेहनत से करे, मुकदमे पर पूरा ध्यान दे। यदि वकील ठीक हुआ तो यह झूठा मुकदमा समाप्त हो जाएगा। इस लिए आप वकील का चुनाव करने में पूरा ध्यान दें। जब भी आप को लगे कि आप का वकील लापरवाही कर रहा है या मेहनत नहीं कर रहा है तो वकील बदल लें।

झूठ तब तक ही असर दिखाता है जब तक सत्य को मजबूती के साथ साबित नहीं कर दिया जाता

rp_law-suit.jpgसमस्या-

प्रकाश पुरोहित ने सूरत, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

म तीन भाई हैं। मेरी शादी 2005 में, दूसरे भाई कि 2013 में और सबसे छोटे भाई की शादी फरवरी 2015 में हुई है। सब से छोटे भाई की पत्नी को जन्म से ही दिल के वॉल्व की बीमारी है, यह बात छुपा कर उस के सास ससुर ने मेरे भाई और मेरे परिवार के साथ धोखाधड़ी की है। सितम्बर 2015 में मेरे भाई को इस बीमारी का पता चला तो हम सब को बताया। 14 अक्टूबर को उसके ससुर जी हमारे घर आकर कुलदेवी मंदिर जाने के बहाने से अपनी पुत्री को ले गये! 4 नवंबर के अखबार में खबर आई कि उसने मेरे भाई और परिवार पे 498ए का केस कर दिया है। अब हमे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के भाई को तुरन्त बिना कोई नोटिस दिए धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम में उस की पत्नी को लाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर उस में न्यायालय से नोटिस जारी कराना चाहिए।

छोटे भाई की पत्नी को दिल के वाल्व की जन्म से बीमारी है यह एक तथ्य है जिसे छुपाया नहीं जा सकता। मुकदमा दर्ज हुआ है तो अन्वेषण अधिकारी आप से भी पूछताछ करेंगे। आप सारी बात उन्हें बताइए और तथ्यों को साबित करने के लिए गवाहों के बयान कराइए। इस से भी पुलिस न मानती लगे तो तुरन्त 438 दंड प्रक्रिया संहिता में अपनी अग्रिम जमानत कराने का प्रयत्न करिए।

दि धारा 438ए का मुकदमा फिर भी चलता है तो आप उसे लड़िए और तथ्यों को मजबूत सबूतों के साथ रखिए। सत्य तो सत्य रहता है। वह साबित हो जाता है। लेकिन झूठ तब तक अपना असर दिखाता है जब तक कि मजबूती से सत्य को साबित नहीं किया जाता। इस कारण आप को इस लड़ाई को लड़ने में सत्य को मजबूती के साथ साबित करना होगा।

498ए में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने या उस की धमकी से परेशान होने या घबराने की जरूरत नहीं।

two wives one husbandसमस्या-1

रवि ने द्वारका, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई के विवाह को 4 साल हो गए है वो अपनी पत्नी के साथ 3 साल से हम से अलग रहता है। 1 महीना पहले पति पत्नी में झगड़ा हो गया। उस की पत्नी केस कर दिया, जिस में हमें भी आरोपी बनाया गया है कि हम ने 3 साल पहले उसके साथ मरपीट की और दहेज़ के लिए घर से निकाल दिया। उस का पति उसे लेजाने को तैयार है पर वो कहती है कि मैं सास ससुर के घर में ही जाउंगी पति के साथ किराए के मकान में नहीं। मेरे माता पिता दोनों को घर में नहीं रखना चाहते अभी उनके कोई बच्चा नहीं है। अब हम क्या करें? क्या हमारे खिलाफ कोई क़ानूनी केस बनता है? जब कि हमारे साथ दोनों में से कोई भी नहीं रहता। अगर बनता है तो अब क्या करें?

समस्या- 2

विकास ने चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 14 फरवरी 2014 को हुई। उस के बाद मेरी पत्नी बस चार माह मेरे साथ रही फिर वह चली गई। ये बोली कि उस के एक्जाम हैं अब जब मैं उसे लेने गया तो उस के पिताजी ने मुझे कफी कुछ गलत बोला और मुझे माँ व भाई से दूर रहने के लिए बोला। जब वह अपनी लड़की को मेरे साथ बेज देंगे। अब एक साल बाद 498ए का मुकदमा करने की धमकियाँ दे रही है और मेरी बहन जो 5 वर्ष से विवाहित है उसे व जीजाजी का भी नाम उस में लिखवा देने की धमकियाँ दे रही है। मैं क्या करूँ?

समाधान-

प दोनों की समस्याएँ एक जैसी हैं। असल में दोनों समस्याएँ पत्नी-पती और पति के रिश्तेदारों के बीच सामंजस्य न बैठने की समस्या है और समाज की एक आम समस्या है। यह हर उस परिवार में आती है। जिस में सब के सब ये सोचते हैं कि उन्हें नहीं अपितु दूसरे को उस के हिसाब से सामंजस्य बिठाना चाहिए। पहले छोटी छोटी बातें होने लगती हैं। उस में हर कोई दूसरे को दोष देता रहता है। फिर वे ही बड़ी बनने लगती हैं और अन्त में यह परिणाम सामने आता है।

धारा 498ए से घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इस तरह के मामलों में केन्द्र सरकार और उच्चतम न्यायालय ने जो निर्देश दे रखे हैं उन में पति के सिवा अन्य लोगों को गलत रीति से अभियुक्त बनाया जाना अब संभव नहीं रहा है। पुलिस एक बार प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पति और उस के रिश्तेदारों से पूछताछ करती है और जब लगता है कि 497ए का ठोस मामला बन रहा है तभी उसे आगे चलाती है। जो मामले बनते हैं उन में भी अधिकांश पति के विरुद्ध ही आरोप पत्र प्रस्तुत हो रहा है। इन दोनों मामलों में पति-पत्नी अलग रह रहे थे। इस कारण यदि पति और रिश्तेदारों की ओर से इस बात के सबूत और गवाह पुलिस के सामने प्रस्तुत किए गए तो पति के सिवा अन्य जिन लोगों के नामजद रिपोर्ट कराई गई है उन के विरुद्ध मामला नहीं बनना चाहिए। फिर भी आप को लगता है कि मामला बनाया जा सकता है तो अग्रिम जमानत के लिए आवेदन प्रस्तुत कर अग्रिम जमानत प्राप्त की जा सकती है।

दि इस तरह का मामला दर्ज कराने की धमकी ही दी जा रही है तो उस मामले में आप को चाहिए कि धमकी दिए जाने के सबूत इकट्ठे करें और पुलिस को रिपोर्ट करें। यदि पुलिस कोई कार्यवाही न करे तो सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत करें। यदि आप की रिपोर्ट या परिवाद पर कोई कार्यवाही नहीं भी होगी तब भी रिपोर्ट या परिवाद एक सबूत के तौर पर आपके बचाव में काम आ सकेंगे।

क बार 498ए में आरोप पत्र प्रस्तुत हो जाए तो उस के बाद किसी तरह की बड़ी परेशानी नहीं होती है। अब यदि पत्नी ने मुकदमा किया है तो ऐसा करना उस का अधिकार है। लेकिन यदि उस में कोई तथ्य नहीं हैं तो ये सब मामले न्यायालय से निरस्त भी हो जाते हैं। भारत में न्यायालयों की संख्या जरूरत की चौथाई से भी कम होने के कारण यहाँ किसकी भी मामले में निर्णय जल्दी नहीं होते। कई बरस लग जाते हैं, इस कारण होने वाली परेशानी से बचना संभव नहीं है। उस का तो एक ही इलाज है कि दोनों पक्ष आपस में बैठें और बातचीत करें। यदि लगता है कि विवाह आगे चल सकता है तो वैसा और नहीं चल सकता है तो सहमति से विवाह विच्छेद की राह निकाली जा सकती है। पर इस तरह पत्नी द्वारा मुकदमा कर देने या उस की धमकी देने मात्र से घबरा जाना ही इस तरह के मामलों को तरजीह देता है। या तो मुसीबत खुद बुलाई हुई होती है या फिर वह अचानक टपक पड़ती है। दोनों ही स्थितियों में घबराहट से कुछ नहीं होता है। समझ बूझ कर शान्त चित्त से उस का मुकाबला करना ही उस के हल की दिशा में सब से अच्छा कदम होता है।

धारा 409 भा.दं.संहिता किन किन पर प्रभावी हो सकती है?

arrested-man-in-handcuffsसमस्या-

आस्तिक ने लक्ष्मणपुर, प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

धारा 409 भारतीय दंड संहिता क्या सरकारी कर्मचारियों या अधिकारियों के ऊपर ही लग सकता है?

समाधान-

भारतीय दंड संहिता की धारा 409 लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंग के बारे में है। अपराधिक न्यास भंग क्या है यह धारा 405 में परिभाषित किया गया है जो निम्न प्रकार है-

  1. आपराधिक न्यासभंगजो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अखत्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैघ संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यास भंग” करता है।

[स्पष्टीकरण 1]–जो व्यक्ति [किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 17) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है या नहीं], तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य-निधि या कुटुंब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।]

[स्पष्टीकरण 2]–जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है।]

सी तरह धारा 409 निम्न प्रकार है-

  1. लोक सेवक द्वारा या बैंकर, व्यापारी या अभिकर्ता द्वारा आपराधिक न्यासभंगजो कोई लोक सेवक के नाते अथवा बैंकर, व्यापारी, फैक्टर, दलाल, अटर्नी या अभिकर्ता के रूप में अपने कारबार के अनुक्रम में किसी प्रकार संपत्ति या संपत्ति पर कोई भी अख्त्यार अपने को न्यस्त होते हुए उस संपत्ति के विषय में आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह [आजीवन कारावास] से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।

स से स्पष्ट है कि धारा-409 भारतीय दंड संहिता केवल सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों पर प्रभावी नहीं है अपितु उस में सभी लोक सेवक, बैंकर, व्यापारी, आढ़तिया, प्रतिनिधि, दलाल, मुख्तार आदि शामिल हैं। इन में से किसी पर भी कोई संपत्ति न्यस्त होने और न्यासभंग करने पर वह धारा 409 भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत दंडनीय अपराध करता है।

क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत करें.

divorceसमस्या-

समीर गुप्ता ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेराविवाह 02-03-2008 को हुआ था। शादी के बाद मेरी पत्नी केवल पंद्रह दिन हीमेरे साथ थी, और शुरु से ही योन संबंध बनाने के लिये आनाकानी करती थी कारणपुछने पर कहती थी कि “मैं धार्मिक स्वभाव की हूं, यह सब अच्छा नहीं लगता, मैतो साध्वी बनना चाहती थी”।इसके बाद मेरी पत्नी मायके चली गई और दो महिनेबाद वह मेरे साथ रहने आई तो गर्भवती होने की जानकारी मिलने पर वह फिर सेमायके चली गई। मायके में ही उसने एक पुत्री को जन्म दिया और लगातार एक सालतक मायके मे रहने के बाद एक महिने के लिये ही मेरे साथ रही। उस के बाद से वह मायकेमें ही रहकर क्रमशः B.Ed., M.Sc. एवं PGDCA की नियमित पढ़ाई कर रही है।पढ़ाई के बाद उसका इरादा मायके में रहकर नौकरी करने का है| इस बीच वह सालमें एक बार केवल एक या दो हफ्ते के लिये मेरी पुत्री को मायके में छोड़कर मेरेसाथ रहने आ जाती है। परंतु दाम्पत्य संबंध बनाने में आनाकानी करती है। इसबारे में जब भी मैं ससुराल वालों से बात करता हूं वो लोग मेरे साथदुर्व्यवहार करते हैं और जिंदगी भर तुमको ऐसे ही रखेंगे कहते हैं। तलाकके लिये कहने पर मुझे व मेरे परिवार वालों को झूठा आरोप लगाकर दहेजउत्पीड़न अपराध 498(A) में फंसाने की धमकी देते हैं। वह मुझे तलाक भी नहींदेना चाहती और अपनी मां को भी छोड़ना नहीं चाहती। साल में केवल एक-दो हफ्ते हीमेरे साथ रहती है। मैं केन्द्रीय शासन के सार्वजनिक उपक्रम मे उच्चअधिकारी के पद पर हूं, अतः मेरी नौकरी में गलत प्रभाव ना पड़े एवं लोकलाज केभय से मैं अभी तक चुप हूं, मुझे तालाक कैसे मिल सकता है?कृपया विस्तृतमार्गदर्शन करें।

समाधान-

प अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद चाहते हैं। जिन परिस्थितियों का आप ने उल्लेख किया है उन में आप का इस के लिए सोचना गलत भी नहीं लगता। किसी भी हिन्दू विवाह का विच्छेद केवल हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में वर्णित आधारों पर ही हो सकता है। आप को स्वयं देखना होगा कि उन में क्या क्या आधार आप को उपलब्ध हैं। इस के अतिरिक्त धारा-13 बी के अन्तर्गता सहमति से विवाह विच्छेद हो सकता है, पर इस के लिए आप की पत्नी और उस के परिवार के लोग तैयार नहीं हैं। वैसी अवस्था में आप को खुद ही विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करना होगा।

प ने जो परिस्थितियाँ बताई हैं उन में आप के साथ लगातार न रहना और यौन संबंध स्थापित करने के लिए इन्कार करना क्रूरता है। यदि आप यह साबित कर सके कि आप की पत्नी वर्ष में केवल एक सप्ताह के लिए आप के साथ रहती है उस में भी वह यौन संबंध से इन्कार करती है तो आप क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद प्राप्त कर सकते हैं।

स के अतिरिक्त यदि आप की पत्नी एक वर्ष से अधिक समय से आप को अपने से अलग रखती है तो आप इस आधार पर भी विवाह विच्छेद प्राप्त कर सकती है। वर्ष में एक सप्ताह के लिए आप के साथ आ कर रहने का कारण भी यही हो सकता है कि वह एक वर्ष का अलगाव पूरा नहीं होने देना चाहती है। इस कारण से आप को क्रूरता के आधार पर ही विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करना होगा।

त्नी और उस के मायके के लोग आप को धमकी देते हैं कि आप ने कोई कार्यवाही की तो वह धारा 498-ए और 106 आईपीसी में आप के विरुद्ध कार्यवाही करेगी। इस धमकी से डर कर अपना जीवन खराब करना कतई उचित नहीं है। आप इन धमकियों के तथ्य को अच्छी तरह अपने आवेदन में अंकित करते हुए न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं। इस आवेदन की न्यायालय से भेजी गई सूचना मिलने पर यदि आप की पत्नी कोई कार्यवाही करती भी है तो उस में आप स्पष्ट रूप से अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं कि यह पहले धमकी देती थी और अब विवाह विच्छेद का आवेदन प्रस्तुत करने के कारण ही उस ने मिथ्या अभियोजन चलाया है। यदि फिर भी आप के विरुद्ध कोई अपराधिक प्रकरण संस्थित हो जाए तो आप अपनी अग्रिम जमानत कराएँ और मुकदमे का सामना करें।

परिवाद की जाँच में सबूत व गवाह प्रस्तुत कर उसे बन्द कराएँ।

father daughterसमस्या-
बबलू ने कोटा, राजस्थान से पूछा है-

मेरा विवाह 2009 में हुआ। 2011 में बेटी का जन्म हुआ। पत्नी को अक्सर सफेद पानी की की शिकायत रहा करती थी। समय समय पर टाइम उपचार करवाया। 12 जनवरी 2013 को पत्नी को समस्या होने पर मैं ने कोटा के जे.के. लोन हॉस्पिटल मे एडमिट करवाया। यहाँ पर 5 यूनिट रक्त चढाया गया। 22 जनवरी 13 को माइनर ऑपरेशन हुआ। जिस में बच्चेदानी के यहाँ से सैंपल लिया और जाँच को भेजा। 24 जनवरी 13 को मैं वाइफ को लेकर अपने रूम पर आ गया। इसी दिन मेरा साला, ससुर, साले की पत्नी और 2 अन्य व्यक्ति आए और मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्नी और बेटी को अपने साथ ले कर चले गये। मेरा ससुराल मेरे घर से करीब 70 कि.मि. दूर है। 30 जनवरी 3 को जाँच रिपोर्ट मिली।  जिस में वाइफ को गर्भाशय  में कैंसर की पुष्टि हुई।  सेनसेर की पुस्ती हुई। बहुत प्रारंभिक स्टेज थी। डाक्टर का कहना था की कीमोथेरेपी से ठीक हो सकती है। क्यों की मामला प्रारंभिक स्तर का है।  मैं ने ससुराल वालों को सूचना दी लेकिन वो लोग मेरी बात को अनसुना करने लगे। और गाँव में ही देसी उपचार करवाने लगे। 4 फरवरी 13 को ज़्यादा तबीयत बिगड़ने पर मेरा साला और अन्य लोग मेरी पत्नी को लेकर कोटा आए। मैं ने मेरे भाई को सूचित किया मेरा भाई उन को लेकर उस डाक्टर के घर पहुचा जिस का उपचार चल रहा था और जिन्होने ओपरेशन किया था। डाक्टर ने हालत देख कर उसे जेकेलोन हॉस्पिटल रेफर कर दिया। लेकिन मेरा साला और साथ वाले लोग मेरे भाई को चकमा दे कर जीप से मेरी पत्नी को पता नहीं कहाँ  लेकर चले गये। मैं रात भर तलाश करता रहा पर पता नहीं चला। 5 फरवरी 13 को नज़दीकी पुलिस स्टेशन में परिवाद दिया। लेकिन पुलिस ने परिवाद दर्ज नहीं किया। परिवाद में था कि मेरी भाभी जी को उसका भाई और अन्य जाने कहाँ ले गये हैं। भाभी की तबीयत काफ़ी खराब है। लेकिन पुलिस ने परिवाद अपने पास रखा लिया। उधर. 5 फरवरी 1 को मेरी पत्नी की बच्चेदानी कोटा के एक निजी हॉस्पिटल में निकलवा दी गयी। मुझे पता चला और मैं ने 18 फरवरी 13 को पुलिस को फिर परिवाद दिया। यह परिवाद दर्ज किया, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं हुई।  मेरे भाई के पुलिस में बयान भी हुए। 24 जनवरी 13 को जब मेरी पत्नी को घर से ले गये थे उस दौरान साथ में पत्नी 50 हजार रुपए नकद स्त्री-धन भी ले गये थे। बाद में मेरे ससुर ने मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ 498ए, 323, 406 भा.दं.सं. में इस्तगासे के ज़रिए मामला दर्ज करवाया। जिस में जो जो आरोप लगाए गये थे, उन सभी का स्पष्टीकरण सबूतों के साथ मैं पुलिस को दे आया। हम मामले की निष्पक्ष जाँच की मांग करते र्हैं लेकिन मामले में जाँच बंद कमरे में हुई। मेरे वकील ने धारा 9. हिन्दू विवाह अधिनियम तथा धारा 97 दंड प्रक्रिया संहिता की कार्रवाई भी की। लेकिन मेरी मुलाकात मेरी पत्नी से नहीं हो सकी। 7 अग्त 2213 को मेरा साला मेरी बेटी को मेरे माता पिता के पास भीलवाड़ा छोड़ आया। एक समझौता पत्र भी लिखा गया। उस पर साले, साले की पत्नी, सरपंच और अन्य गवाहों के हस्ताक्षर हैं। ये समझौता पत्र भी मैं पुलिस को दे आया। फिर भी उस मुकदमे को बन्द नहीं किया है। 20 सितम्बर 2013 को मेरी पत्नी की मृत्यु हो गयी। मुझे मेरे ससुराल वालों ने सूचना तक नहीं दी। और बिना पोस्टमार्टम करवाए ही अंतिम संस्कार करवा दिया। मैं ने यह बात पुलिस को बताई और मामले में निष्पक्ष जाँच की माँग की। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। मुझे शुरू से ही ब्लेक मेल करने की कोशिश मेरा साला करता रहा। मेरा ससुर जो कि फोरेस्ट डिपार्टमेंट में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था वो अपनी संपत्ति में से मेरी बेटी को हिस्सा देना चाहता था। मेरी पत्नी के एक बहिन और भी थी जिसे भी मेरे साले और उस की पत्नी द्वारा डरा धमका कर तंग किया जाता था। 2007 में उस ने ससुराल मे आत्मदाह कर लिया था। उस के भी एक बेटी है। साला और साले की पत्नी किसी भी सूरत में यह नहीं चाहते कि ससुर की सम्पत्ति में नातियों को भी हिस्सा मिले।  31 दिसम्बर 2013 को मेरे ससुर की भी संदिग्ध मृत्यु हो गयी। एस दफ़ा भी मुझे और मेरे परिवार को कोई सूचना नहीं दी गई। बगैर पोस्ट मार्टम के अंतिम संस्कार कर दिया गया। जब मैं ने जानकारी जुटाई तो  पता चला कि बहू और बेटे ने पोइजन देकर मार डाला। 31 को सुबह 9 बजे से पहले अंतिम संस्कार भी जल्दी में कर दिया। .बहन बेटियों और समाज के लोगों को भी अंतिम दर्शन नहीं करवाए। आप बताएँ मैं क्या करूँ। मेरी 2 साल की बेटी अभी मेरे पास है। मैं ऑटो ड्राइवर द्र हूँ। जैसे तैसे बेटी की परवरिश कर रहा हूँ। लेकिन पुलिस अभी तक भी मामले को बन्द नहीं कर रही है। 1 मई 2013 को मेरे खिलाफ 498ए, 323. 406 आईपीसी के मामले में शिकायत मेरे ससुर ने दी थी। अभी तक जाँच चल रही है। मेरी पत्नी के कहीं कोई बयान नहीं हैं। मैं और मेरा परिवार काफ़ी परेशन है। हमारे परिवार का सम्मान समाज में धूमिल किया गया है जब कि हम पर जो आरोप लगाए वो सभी झूठे थे। जिस के हमने सबूत भी पुलिस को दिए हैं। अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के द्वारा प्रस्तुत तथ्यों से प्रतीत होता है कि आप के व आप के ससुराल वालों के बीच आप की पत्नी की चिकित्सा के तरीके के संबंध में मतभेद थे, जिन्हें हल करने में संवेदनशीलता का अभाव रहा। जिस के कारण विवाद बढ़ा और दोनों पक्षों के बीच यह स्थिति उत्पन्न हुई कि आप की पत्नी के पिता उसे जबरन अपने तरीके से इलाज कराने के लिए ले गए। आप ने जब उन का पीछा किया तो उन्हों ने पुलिस को परिवाद दर्ज करवा दिया। इसी बीच आप की पत्नी की मृत्यु हो गई। बाद में पत्नी के पिता की मृत्यु भी हो गई। तब आप की बेटी को आप के पास भेज दिया गया। अब केवल पुलिस के पास परिवाद मौजूद है जिस में अभी तक कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है।

प के मामले में 498-ए के लिए अब कोई साक्षी मौजूद नहीं है। सब से मजबूत साक्षी आप की पत्नी हो सकती थी वह अब इस दुनिया में नहीं है और 161 के बयानों के लिए उपलब्ध नहीं है। अन्य कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं है। दूसरी और आप के पास अपनी पत्नी की चिकित्सा कराने के सारे सबूत और साक्षी उपलब्ध हैं। वैसी स्थिति में धारा 498-ए के लिए प्रारंभिक सबूत भी उपलब्ध नहीं हैं। धारा-406 का कोई प्रश्न ही अब नहीं रहा है। पत्नी की मृत्यु के उपरान्त स्त्री-धन के स्वामी उस का पति और संतानें हैं। इस तरह आज आप स्वयं और आप की पुत्री स्वामी हैं। पुत्री आप के पास आप के संरक्षण में है और आप उस के प्राकृतिक संरक्षक हैं। धारा 323 में भी आप की पत्नी के जीवित नहीं रहने के कारण कोई साक्षी नहीं है। वैसी स्थिति में जाँच कर्ता पुलिस अधिकारी को रिपोर्ट आप के पक्ष में दे देनी चाहिए।

प को चाहिए कि आप पुलिस का जो अधिकारी परिवाद की जाँच कर रहा है उस से मिलें और उसे सारे तथ्य बताएँ और जरूरत पड़ने पर आवश्यक गवाहों के बयान भी करवा दें। जिस से मामला बन्द हो सके। आप अपनी बेटी की परवाह करें, उस का पालन पोषण करें। यदि आवश्यक हो और सही जीवनसाथी मिल जाए तो आप दूसरा विवाह कर लें। एक लम्बा जीवन बिना जीवन साथी के बिना जीना बहुत कठिन है वह भी तब जब छोटी बच्ची साथ में हो और आप को रोजगार के लिए भी बाहर रहना हो।

विवाहेतर शारीरिक संबंध साबित कर सकते हों तो इस आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

divorceसमस्या-
रायपुर, छत्तीसगढ़ से सुजीत कुमार मिश्रा ने पूछा है-

मेरी चाची ने मुझे और मेरे चाचा को 498 के तहत झूठे प्रकरण में फँसाया है। चाची के नाजायज संबंध किसी अन्य व्यक्ति के साथ हैं, जिसका पर्याप्त सबूत है।  उस ने पहले स्वयं इस बात को स्वीकारा स्थानीय लोग हमारे साथ हैं। उसके द्वारा अपने प्रेमी को लिखा गया पत्र मेरे पास है। दोनों की शादी 25 वर्ष पहले 1988-1989 में हुई थी। अब चाची के परिवार वालों से हम तंग आ गये। बार बार धमकी व मानसिंक प्रताडना से तलाक हेतु उपाय बताएँ।  क्या नाजायज सबंध के बाद भी भरण पोषण देना होगा। मैं ने पहले से 10-08-2013 को राष्ट्रीय मानवाधिकार, महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग में आवेदन कर सूचित किया है। इस के द्वारा 20-10-2013 को बाद में महिला थाने में हमारे विरूद्ध रिपोर्ट दर्ज कराई गयी है। उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प के विरुद्ध धारा 498-ए के अन्तर्गत रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। इस में गिरफ्तारी संभव है। सब से पहला काम तो आप यह करें कि अपने सारे सबूतों की फोटो प्रतियाँ तथा आप के साथ के स्थानीय लगों जिन के सामने चाची ने अवैध संबंध स्वीकार किए हैं उन के शपथ पत्र तैयार करवा कर उन की मदद से सत्र न्यायालय में धारा 438 दं.प्र.संहिता के अन्तर्गत अग्रिम जमानत का आवेदन प्रस्तुत कर अपनी और अपने चाचा की जमानत का आदेश प्राप्त करें। इस के बाद सारे सबूत पुलिस को प्रस्तुत करें तथा अपने पक्ष के व्यक्तियों के बयान करवाएँ। कोशिश करें कि पुलिस आप के विरुद्ध मुकदमे में आरोप पत्र प्रस्तुत न कर केवल इस बात की रिपोर्ट करे कि आप दोनों के विरुद्ध इस तरह का कोई मामला नहीं बनता है। फिर भी यदि आप दोनों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत होता है तो उस में किसी अच्छे वकील के माध्यम से मुकदमा लड़ें। आप दोनों निर्दोष सिद्ध हो सकते हैं।

दि आप की चाची के विवाह के उपरान्त किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक संबंध होना आप साबित कर सकते हैं तो आप के चाचा इसी आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन दे सकते हैं और इस आधार पर तलाक हो सकता है। लेकिन तलाक के अन्य आधार भी उपलब्ध हों तो उन का चाचा के आवेदन में वर्णन करते हुए उन्हें भी आधार बनाएँ।

प ने राष्ट्रीय मानवाधिकार, महिला आयोग, राज्य महिला आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग को जो आवेदन प्रस्तुत किए हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं होगी क्यों कि ये सब उन के कामकाज से संबंधित नहीं हैं। वे आवेदन सिर्फ यही साबित कर सकते हैं कि आप की शिकायत के कारण ही आप पर झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है।

रण पोषण एक बिलकुल अलग मामला है। जब तक वह पत्नी है तब तक वह भरण पोषण मांग सकती है और वह देना होगा। लेकिन विवाह विच्छेद के समय परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय यह तय करेगा कि पत्नी को भरण पोषण मिलना चाहिए या नहीं।

क्रूरता की रिपोर्ट थाने में कराएँ और घरेलू हिंसा कानून की कार्यवाही करें और चाहें तो विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

alimonyसमस्या-

इन्दौर, मध्य प्रदेश से रीना ने पूछा है-

मेरी शादी 1 दिसंबर 2007 को हुई थी। यह प्रेम विवाह था, पर मेरे पति के घर वालों ने हमें अपना लिया।  लेकिन मेरी समस्या यह है कि मेरे पति और मेरे बीच बिल्कुल नहीं बनती है। ज़रा ज़रा सी बात पर मुझे मारते हैं।  मेरी एक 2 साल की बेटी भी है।  मैं अब और उनके साथ नहीं रह सकती। आप सुझाएँ मैं क्या करूँ?

समाधान-

जिस तरह की स्थिति आप ने बताई है उस से तो बिलकुल नहीं लगता कि यह कोई प्रेम विवाह था।  आप के इस प्रेम को कच्ची उम्र का यौनाकर्षण जरूर कहा जा सकता है। खैर¡ आप के पति से आप की बिलकुल नहीं बनती और वे आप को मारते हैं। यह सीधे सीधे क्रूरता का मामला है और धारा 498-ए भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत अपराध है। आप इस की शिकायत पुलिस थाना में कर सकती हैं, तुरन्त कार्यवाही होगी। यह क्रूरता आप के पति के साथ न रहने का एक मजबूत आधार भी है। इस आधार पर आप अपनी बेटी के साथ अपने पति से अलग रह सकती हैं और उन से अलग आवास, आप के और आप की पुत्री के लिए भरण पोषण की मांग कर सकती हैं। इस के लिए आप  महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत न्यायालय में सीधे आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। क्रूरता के आधार पर आप विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करने हेतु भी आवेदन कर सकती हैं।

दि आप के पास अलग रहने की व्यवस्था हो तो जिस दिन भी आप के पति आप के साथ मारपीट करें आप बेटी के साथ तुरन्त पुलिस थाना जाएँ और रिपोर्ट कराएँ। इस रिपोर्ट पर पुलिस धारा 498-ए का मुकदमा दर्ज कर के अन्वेषण आरंभ कर देगी। उस के बाद आप आप को उपलब्ध आवास पर जा कर निवास कर सकती हैं। वहाँ रहते हुए आप अपने पति के विरुद्ध घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर अपने लिए अलग आवास, आप के और आप की पुत्री के लिए भरण पोषण की मांग कर सकती हैं। साथ ही यह आदेश भी न्यायालय से आप के पति के लिए प्राप्त कर सकती हैं कि वे आप के आवास के आस पास न आएँ और आप के व बेटी के प्रति किसी प्रकार की हिंसा न करें।

स के उपरान्त आप चाहें तो विवाह विच्छेद के लिए पारिवारिक न्यायालय को आवेदन कर सकती हैं। आप को विवाह विच्छेद के समय एक मुश्त भरण पोषण राशि भी प्राप्त हो सकती है या बेटी और आप के लिए नियमित रुप से मासिक भरण पोषण राशि अदा करने का आदेश भी हो सकता है जो बेटी को उस के विवाह तक और आप को दुबारा विवाह होने तक प्राप्त होता रह सकता है।

पत्नी से खुद या मध्यस्थ के माध्यम से बात करें, राह निकल सकती है।

divorce hinduसमस्या-

ब्यावर, राजस्थान से सांवेरनाथ ने पूछा है-

मैं एक गरीब परिवार का सदस्य हूँ। मेरे माता पिता अनपढ़ हैं, मेरी शादी 17.05.2011 को हुई। शादी के बाद मेरी पत्नी एक महीना मेरे पास रही। तब मैं सूरत में जॉब करता था, मेरी पत्नी भी मेरे पास थी।  एक दिन घर में आटा ख़त्म हो गया तो मैं ने मेरी पत्नी से आटा पीसने को कहा, तो वो बोली की मेरे को आता पीसने में शर्म आती है।  वो बीए तक पढ़ी हुई है और मे एम.ए. पढ़ा हूँ।  इतनी से बात को लेकर उस ने अपने पापा को फ़ोन किया जो की आर्मी के रिटायर्ड फोजी हैं। उस के पापा ने मुझे धमकाया कि तुम मेरी बेटी को तुरंत लेकर आ जाओ।  मैं लेकर गया तो उन्हों ने बोला कि तुम 3 महीना बाद लेने आ जाना।  उसके दो महीना बाद ही उन्हों ने 498 का मुक़दमा लगा दिया और हमें रोड पर लाने की धमकी दी। जब से केस लगा है तब से मेरा जॉब बंद हो गया है और उन्होने 125 के तहत मेरी होल्सेल की दुकान बताकर मंथली 20000 रुपयों की माँग की है। जो मरा पूरा परिवार भी नहीं कमाता है।  अब मेरी पत्नी ना तो आना चाहती है और न ही कोई फैसला करना चाहती है।  अब मैं दूसरी शादी भी नहीं कर सकता।  और तारीखों की वजह से काम भी नहीं कर पा रहा हूँ। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मुझे लगता है कि आप की पत्नी या तो आप के साथ नहीं रहना चाहती है या फिर कुछ शर्तों के साथ। मामला तो पत्नी से बार बार बात करने पर ही सुलझेगा। आप पत्नी से बात करने की कोशिश कीजिए। अपनी नहीं उस की शर्तें जानने का प्रयत्न करिए। एक बार नहीं कई बार। उस से मामला सुलझ सकता है।

दि ऐसे बात न बने तो पत्नी और आप के बीच मध्यस्थता से भी बात बन सकती है। आप को चाहिए कि आप तुरन्त धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम में दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का आवेदन प्रस्तुत करें। इस आवेदन की सुनवाई में न्यायालय अनिवार्य रूप से आप दोनों के बीच मध्यस्थता कराएगा। मध्यस्थता के लिए आप जिला न्यायाधीश के यहाँ स्थापित मध्यस्थता केन्द्र में भी आवेदन कर सकते हैं।

498-अ और धारा 125 के मुकदमों से घबराने की जरूरत नहीं है। फैसला तो जो सच होगा उसी के अनुसार होगा। तारीख पेशी पर तो जाना होगा। कोशिश करें को दोनों –  तीनों मुकदमों की तारीखें एक ही दिन पड़ें। इस से आप की समय की बचत होगी। धारा 125 में कोई कितना भी भरणपोषण मांग सकता है। लेकिन उस में आप की आय और पारिवारिक सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखा जाएगा।

सहमति से विवाह विच्छेद ही सही उपाय है, उस के लिए प्रयत्न करें।

समस्या-

बरवाला, जिला-हिसार हरियाणा से हेमन्त ने पूछा है –

मेरी शादी २२-०४-२००४ को राजस्थान के पिलानी में हुई थी।  मेरी पत्नी घर आते ही मेरे परिवार से ईर्ष्या करने लगी। परिवार में माता पिता भाई बहन हम चार सदस्य हैँ। सबसे पहले वो मेरी बहन को परेशान करने लगी।  हमने बहन की शादी २२-०२-२००८ को पंजाब में कर दी।  उसके बाद वह मेरी माँ से चिढ़ने लगी। क्योंकि मेरी माँ शुरू से ही मानसिक बीमार है।  मैंने पत्नी को उससे अलग रखने की कोशिश की।  हमारा घर बड़ा है। उस में  दो पोर्शन हैं।  एक में हम और एक में मम्मी पापा रहने लगे।  परन्तु मेरी पत्नी को अब मेरे पापा से चिढ़ पैदा हो गई।  उसने घर में बहुत झगडा पहले भी किया था। जिससे वो रुष्ट होकर मायके चली गई थी।  इस दौरान पंचायत भी हुई थी।  इसके बाद भी वह मायके चली गयी थी।  मैं उसको किसी तरह मना के ले आया था।  परन्तु वो अब फिर से चली गई है।  उसका कहना है कि आप कहीं दूसरी जगह रह लो।  परन्तु मैं चाहता हूँ की माँ बाप के और परिवार के बीच रहूँ।  वो मुझे अलग रखकर मेरे बूढ़े माँ बाप से दूर रखना चाहती है।  जबकि मेरी माँ मानसिक बीमार है।  जब मेरी शादी हुई थी तो वह बीए पास थी और मैं १०+२ था।  हम ने उसको यहाँ एमए भी करवाई। इसके बाद हम उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे।  हम चाहते थे कि वो घर को संभाल ले क्योंकि घर को संभालने वाला कोई नहीं था।  लेकिन वो इतनी जिद्दी थी कि हमारी मर्जी के बिना वह अपने मायके वालों से कहकर बीएड भी कर के मानी। लेकिन फिर भी वो घर में झगडा करती थी और अपने मायके चली जाती थी। अंत में हमने परेशान होकर पहले धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम का नोटिस दिया। लेकिन उन्होंने नोटिस का जवाब नोटिस से दिया कि मेरी पत्नी को मेरी मम्मी से प्रोब्लम है और मुझे अलग घर में रखे तो ही मैं रहूंगी।  फिर मैंने जिला संरक्षण अधिकारी को चिट्ठी लिखी।  अधिकारी ने मेरे ससुराल वालों को कई बार बुलाया परन्तु वो नहीं आये। ४ महीने तक मैंने प्रोटेक्शन ऑफिस के धक्के खाए और अंत में मैंने तलाक का केस १८-०८-२०१२ को डाल दिया।  केस की पहली तारीख ११-१०-२०१२ को वो लोग नहीं आये।  उन्होंने कोर्ट का कागज लेने से मना कर दिया था।  जज साहब ने राजस्थान पत्रिका में नोटिस निकलवाने को कहा और आगे तारीख रख दी। वहाँ से मेरे ससुराल वालों ने १६-११-२०१२ को मुझ पर दहेज का केस कार दिया।  उन्होंने धारा ४९८ ए , ४०६ और ३२३ लगायी है।  उसने ५ लोगों के नाम लिखवाए हैं। जिसमे मेरा, मेरे पापा का, चाचा का, चाचा के लड़के का, जो कि हमारे से ५ किलोमीटर दूर गांव में रहते है और मेरी बहन का जो पंजाब में रहती है नाम है। हमें तफ्तीश के लिए पिलानी थाना में बुलाया गया था। जहाँ हम गए थे और लोगों को भी साथ में ले कर गए थे। जिन्होंने अपने बयान पुलिस को दे दिए थे।  अब आप मुझे बताइए की इसमें आगे क्या हो सकता है।  मेरी बहन के ससुराल वाले कह रहे हैं कि हम उन लोगों पर मानहानि का केस करेंगे।  क्या ये संभव है। मेरी पत्नी ने मुझ पर झूठा केस किया है तो मैं उसके विपरीत कुछ कर सकता हूँ?

समाधान-

ब भी कभी ऐसा लगता है कि पत्नी के प्रति पति या उस के संबंधियों द्वारा शारीरिक या मानसिक क्रूरता का व्यवहार किया गया है तो धारा 498 ए का अपराध होता है।  लेकिन यदि पत्नी पति के या उस के संबंधियों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करे तो कोई अपराध नहीं होता। वह एक दुष्कृत्य जरूर होता है जो दंडनीय नहीं है लेकिन ऐसा तथ्य है जिस के आधार पर विवाह विच्छेद हो सकता है। लगभग सभी भारतीय पति पुरुष प्रधानता की मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसे में वे ऐसा व्यवहार कर बैठते हैं जो क्रूरतापूर्ण परिभाषित होता है। यदि पत्नी अड़ ही जाए तो 498-ए का मुकदमा बनता है और साबित भी हो जाता है।

विवाह के समय आप की पत्नी स्नातक थी, आप ने उसे स्नातकोत्तर होने दिया और फिर उस ने आप से छुपा कर अपने मायके जा कर बी.एड. कर लिया। जिस का स्पष्ट निहितार्थ है कि वह आरंभ से ही नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। एक ऐसा जीवन चाहती थी जो आप के व आप के परिवार के साथ रहते संभव नहीं। वह नहीं चाहती कि वह आप की मानसिक रूप से रुग्ण माँ की सेवा करे। उस ने आप को अपने परिवार से अलग करना चाहा जो आप नहीं चाहते।  आप चाहते हैं कि वह नौकरी न करे और आप के घर को संभाले। दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े हैं।  आप अपने माता-पिता को देखते हैं जो आप की जिम्मेदारी है। संभवतः वह अपने और अपने बच्चों के भविष्य को देखती है। यही आप के मध्य विवाद का विषय है।

प दोनों के मध्य समझौते की एक ही राह है कि दोनों में से कोई अपनी बात से हट जाए। वह अपनी राह पर इतना अधिक बढ़ चुकी है कि वहाँ से लौटना कठिन प्रतीत होता है।  लगता है आप को ही पत्नी की बात माननी होगी अन्यथा कोई समझौता संभव नहीं है।  विवाह विच्छेद निश्चित लगता है।  ऐसी स्थिति में समझदारी यही है कि पत्नी और उस के परिवार वालों से बात की जाए कि वह किन शर्तों पर समझौता करने को तैयार है। यदि वे मान जाते हैं तो समझौता कर मुकदमों को समाप्त कीजिए और दोनों अपनी अपनी राह पर चलिए। यदि विवाह विच्छेद होता है तो आप को स्त्री-धन और स्थाई पुनर्भरण की राशि पत्नी को देनी होगी। उस का प्रस्ताव रखिए समझौता संपन्न हो सकता है। यही एक मात्र राह आप के मामले में दिखाई पड़ती है।

प की बहिन के ससुराल वाले मानहानि के मुकदमे के लिए कह रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि मानहानि का मुकदमा करने से कोई लाभ होगा। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट में उन का नाम है और पुलिस उन के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत नहीं करती है तो वे मानहानि का मुकदमा कर सकते

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