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दुर्भावनापूर्ण अभियोजन व मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी वाद व अपराधिक अभियोजन दोनों किए जा सकते हैं।

rp_law-suit.jpgसमस्या-

सुनील कुमार ने भोपाल, मध्यप्रदेश समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई और उसकी पत्नी के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं होने की वजह से मेरे भाई ने उसे तलाक का नोटिस दिया और 2002 में न्यायालय में वाद दायर कर दिया। |उस के बाद मेरे भाई की पत्नी ने हमारे पूरे परिवार के खिलाफ दहेज़ प्रताड़ना और मारपीट का झूठा मुकदमा न्यायालय में दायर कर दिया, इसी दौरान उस ने अपने पीहर पक्ष के लोगो के साथ मिलकर हमें कई बार पुलिस की प्रताड़ना भी दी ताकि मेरा भाई तलाक की अर्जी वापस ले ले। लेकिन मेरे भाई ने ऐसा नहीं किया; और अब 2015 में दहेज़ के झूठे मामले में स्थानीय न्यायालय का फैसला आ गया जिस में पूरे परिवार को बरी कर दिया गया और माननीय न्यायालय ने उसे झूठा मुकदमा करार दिया। अब मैं आपसे सलाह लेना चाहता हूँ कि क्या मैं अपने भाई की पत्नी और उसके पीहर पक्ष वालों के खिलाफ मानहानि का दावा कर सकता हूँ। क्योंकि पूरे सात वर्ष तक हम पूरे परिवार वाले लगातार परेशान रहे, दावे की क्या प्रक्रिया होगी, क्योंकि मेरे भाई की पत्नी ने सारा झूठा मुकदमा और पुलिस प्रताड़ना अपने पीहर वालो की मदद और मिलीभगत से किया था?

समाधान-

ब यह प्रमाणित हो गया है कि मुकदमा झूठा था तो आप अब दो काम कर सकते हैं। एक तो आप और वे सभी लोग जिन्हें इस मुकदमे में अभियुक्त बनाया गया था, दुर्भावना पूर्ण अभियोजन तथा मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में साबित करना होगा कि 1. आप को मिथ्या रूप से अभियोजित किया गया था, 2. उक्त अभियोजन का समापन होने पर आप को दोष मुक्त कर दिया गया है, 3. अभियोजन बिना किसी उचित और उपयुक्त कारण के किया गया था, 4. अभियोजन करने में दुर्भावना सम्मिलित थी और 5. आप को उक्त अभियोजन से आर्थिक तथा सम्मान की हानि हुई है। आप को उक्त मुकदमे की प्रथम सूचना रिपोर्ट, आरोप पत्र तथा निर्णय की प्रमाणित प्रतियों की आवश्यकता होगी इन की दो दो प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर लें। जितनी राशि की क्षतिपूर्ति के लिए आप दावा प्रस्तुत करेंगे उस पर आप को न्यायालय शुल्क नियम के अनुसार देनी होगी। प्रक्रिया दीवानी होगी और वैसे ही चलेगी जैसे क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद की होती है।

स के अतिरिक्त आप उक्त दस्तावेजों के साथ साथ मिथ्या अभियोजन व मानहानि के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 211 व 500 में परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस पर प्रसंज्ञान लेने और अपराधिक मुकदमे की तरह प्रक्रिया पूर्ण हो कर न्यायालय निर्णय प्रदान करेगा। इस में मिथ्या अभियोजन करने वाले दो वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड की सजा हो सकती है। आप को इन दोनों ही कार्यवाहियाँ करने के लिए किसी स्थानीय वकील की सेवाएँ प्राप्त करना होगा।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी है तो पहले जमानत कराइए फिर बचाव की कोशिश करिए।

rp_police-station2.jpgसमस्या-

झुन्ना श्रीवास्तव ने बतौली, बिहार से समस्या भेजी है कि-

बिजली बिभाग ने हम पर टोका फसाकर चोरी से बिजली जलाने की प्राथमिकी दर्ज करा दी। जबकि मेरे पास बैध कनेक्शन है। मैं पुलिस को रसीद दिखाया, लेकिन फिर भी पुलिस गिरफतारी आदेश जरी कर दी है। पुलिस बोल रही है, आप बिजली बिभाग से लिखवाकर लायें की बैध कनेक्शन है। लेकिन बिजली बिभाग बोल रहा है की अगर कोर्ट मांगेगा तो लिख कर देंगे। मैं सूचना के अधिकार से भी माँगा लेकिन सूचना नहीं दे रहे हैं। मैं पुलिस और बिजली बिभाग के पास गुहार कई बार लगाई लेकिन कोई नहीं सुन रहा है। बिजली बिभाग 5 मीटर तार का जब्ति की सूचि बनाई गई है। जिस पर सिर्फ़ बिजली कर्मचारी का ही हस्ताक्षर है। जबकि कुछ भी जप्त नहीं किया गया। नियमनुसार स्थानीय व्यक्ति से जब्ति सूचि पर हस्ताक्षर कराना चाहिए था। जब्ति सूचि नियमानुसार नहीं बनाना अपराध है कि नहीं अगर है तो मैं अलग से कोर्ट में परिवाद दाखिल कर सकता हूँ कि नहीं? मुझे इस की शिकायत कहाँ करनी चाहिए।

समाधान-

सा कोई नियम नहीं है कि जब्ती की सूची पर बिजली विभाग का कर्मचारी गवाह नहीं हो सकता। यह जरूर है कि पुलिस को स्वतंत्र गवाह तलाश करना चाहिए था। लेकिन यदि स्वतंत्र गवाह की तलाश की जाए और कोई उपलब्ध नहीं हो तो बिजली विभाग का कर्मचारी भी गवाह बनाया जा सकता है। आप के ये सभी तर्क जब आप के विरुद्ध मुकदमा चलेगा तब आप के बचाव में काम आ सकते हैं। अन्वेषण के इस स्तर पर नहीं।

ह भी कोई जरूरी नहीं कि जिस के पास वैध कनेक्शन है वे चोरी कर ही नहीं सकते। सब से ज्यादा वे ही चोरी करते हैं जिन के पास कनेक्शन हैं। सारे उद्योगों के पास वैध कनेक्शन होते हैं और सब से ज्यादा कटिया वही मारते हैं जिस का कभी पता नहीं चलता। यह तर्क भी कोई अधिक मायने नहीं रखता।

दि एफआईआर दर्ज हो गयी है तो पहले जमानत कराइए। फिर आप अपने तर्क अदालत में बचाव में प्रस्तुत करते रहिएगा।

किसी गलत अपराधिक मामले से बचने के लिए सारे तथ्य अंकित करते हुए कानूनी नोटिस दिलवाएँ …

justiceसमस्या-

अजमेर, राजस्थान से सुरेश कुमार ने पूछा है –

मेरे एक दोस्त की माँ को उस की नानी की मृत्यु के बाद नानी की नॉमिनी होने के कारण सावधि जमा का धन मिल गया। माँ उसे दुबारा सावधि जमा करना चाहती थी, मगर पिता जी उस धन को खेत मे खर्च करना चाहते थे। माँ ने एक अकाउंट पेयी चैक से अपना धन मेरे दोस्त यानी अपने बेटे के बैंक अकाउंट में हस्तान्तरित करवा दिया। माँ के कहने पर बेटे ने अपने नामे से सावधि जमा करली। इस पर पिता ने अपने पुत्र की पत्नी के जेवरात अपने पास रख लिए। जब पुत्रवधु ने अपने जेवरात माँगे तो पिता ने कहा कि मैं ने तो अपने काम के लिए उन जेवरात को बेच दिया। अब माँ अपनी सावधि जमा का धन वापस लेना चाहती है। मेरा दोस्त अपनी पत्नी के जेवरात सावधि जमा का धन वापस लौटाने को सहमत है लेकिन मगर पिता जी जेवरात देने को सहमत नहीं हैं। अब माँ और पिता जी दोनों एक हो कर कहते है कि अगर सावधि जमा का पैसा नहीं दिया तो वे पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे कि उस ने धोखा देकर माँ के खाते से पैसा अपने खाते में हस्तान्तरित करवा कर सावधि जमा अपने नाम बनवा ली। दोस्त के पास किसी प्रकार की कोई लिखा-पढ़ी नहीं है। सावधि जमा की राशि और जेवरात की कीमत करीब बराबर ही है।  चैक माँ के खाते का था लेकिन चैक में विवरण दोस्त के हाथ से लिखा गया था। क्या माँ ओर पिता जी उस के नाम रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और क्या उस के खिलाफ कोई क़ानूनी धारा लग सकती है? उसे क्या करना चाहिए?

समाधान-

कोई भी व्यक्ति पुलिस में रिपोर्ट कराना चाहे तो कर सकता है उस पर किसी तरह की कोरई रोक नहीं है। यदि पुलिस समझती है कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण कर सकती है और पर्याप्त सबूत होने पर अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती है और न्यायालय में उस के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है।

जिस तरह यह मामला माता-पिता और पुत्र-पुत्रवधु के बीच है, उस से नहीं लगता है कि कोई रिपोर्ट माता-पिता द्वारा दर्ज कराई जाएगी। लेकिन फिर भी सावधानी रखना जरूरी है। जिस तरह आप के दोस्त को डर लग रहा है कि माता-पिता रिपोर्ट दर्ज करवा देंगे जब कि कोई अपराध आप के दोस्त ने किया ही नहीं है।  उधर पिता द्वारा पुत्रवधु के जेवर रख लेना या उन्हें बेच देना तो गंभीर अपराध है। पुत्रवधु के जेवर उस का स्त्री-धन हैं। यदि ससुर उस के जेवर देने से इन्कार करता है या उन्हें बेच देता है तो यह धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत अमानत में खयानत का अपराध है। मेरे विचार में आप के दोस्त की पत्नी यदि रिपोर्ट दर्ज करवा दे तो दोस्त के माता-पिता दोनों ही मुकदमे में बुरी तरह से फँस जाएंगे। पुत्रवधु के प्रति मानसिक क्रूरता का बर्ताव करने के कारण धारा 498-ए के अपराध में भी उन के विरुद्ध मुकदमा बनेगा।

स स्थिति में आप के दोस्त के पास सब से अच्छा उपाय ये है कि वे किसी स्थानीय वकील से संपर्क कर के अपनी और अपनी पत्नी की ओर से एक संयुक्त विधिक नोटिस अपने माता-पिता को भिजवाएँ जिस में ऊपर वर्णित समूची स्थिति का उल्लेख करते हुए यह कहें कि वह अपनी माता को सावधि जमा का धन लौटाने को सदैव तैयार रहा है और अब भी है। लेकिन माता-पिता अपनी पुत्रवधु के जेवर नहीं लौटा रहे हैं जिस से पुत्रवधु को गहरा मानसिक संताप हुआ है जो कि क्रूरता की श्रेणी में आता है तथा माता-पिता दोनों धारा 406 तथा 498-ए के अपराध के दोषी हैं। यदि वे नोटिस मिलने के बाद एक निश्चित अवधि 15 या 30 दिनों में जेवर लौटा दें तो आप का मित्र उसी समय सावधि जमा की जो राशि उसे चैक द्वारा दी गई थी उसे लौटा देगा, यदि माता-पिता उक्त जेवरात नहीं लौटाते हैं तो वे दोनों कानूनी कार्यवाही करने को बाध्य होंगे।

स नोटिस से सारी बात स्पष्ट हो जाएगी तथा माता-पिता घर में बैठ कर ही सारे मामले को निपटा लेंगे। यदि फिर भी वे मामले को नहीं निपटाते हैं तो सारे तथ्य अंकित करते हुए आप का मित्र व उस की पत्नी एक संयुक्त रिपोर्ट पुलिस थाना को प्रस्तुत कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। इस तरह के मामलों में पुलिस भी पहले मामले को आपस में निपटाने को प्राथमिकता देती है। पुलिस के हस्तक्षेप से मामला निपट सकता है। इस नोटिस से कम से कम इतना तो होगा कि यदि माता-पिता कोई मामला दर्ज कराएंगे तो उस में आप के दोस्त व उस की पत्नी के पास पर्याप्त प्रतिरक्षा उपलब्ध रहेगी।

आप के द्वारा विकसित सोफ्टवेयर का बिना मूल्य उपयोग करने वाले के विरुद्ध कापीराइट एक्ट में कार्यवाही करें

समस्या-

मैं आईटी सैक्टर में हूँ, वर्तमान में मैं एक प्राइवेट फर्म  में काम कर रही हूँ। दो वर्ष पूर्व मैं एक व्यक्ति के संपर्क में आई जो कि उस के व्यवसाय के लिए कुछ आईटी एप्लीकेशन्स विकसित करवाना चाहता था। मैं ने उस के लिए आवश्यक सोफ्टवेयर तैयार किए तथा उसे जब भी आवश्यकता हुई आवश्यक सपोर्ट प्रदान किया। मैं ने जब भी उक्त कार्य के भुगतान के लिए उक्त व्यक्ति से कहा उस ने साफ साफ कोई उत्तर नहीं दिया। यह व्यक्ति भारतीय है और अमरीका में ग्रीन कार्ड होल्डर है। मैं उस से अपना पैसा कैसे प्राप्त कर सकती हूँ। मैं सोचती हूँ कि मैं उस के नियोजक जो कि एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी है को शिकायत करूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

-श्वेता शर्मा, बैंगलोर, कर्नाटक

समाधान-

प ने जो कार्य उस व्यक्ति के लिए किया वह आप के तथा उस व्यक्ति के बीच एक संविदा कार्य था। आप के मामले में यदि कोई स्पष्ट और लिखित संविदा हुई हो कि उस व्यक्ति को आप के कार्य के लिए एक निश्चित राशि अदा करनी है तो आप अपना कार्य संपन्न कर चुकी हैं और आप संविदा के अनुसार उक्त कार्य के लिए जो भी धन निश्चित हुआ हो वह उस से प्राप्त करने की अधिकारी हैं। इस तरह के मामलों में लिखित संविदा का होना निहायत जरूरी है।

दि आप का और उस के बीच कोई संविदा नहीं हुई हो तो आप उसे अपने काम की शुल्क स्वयं निर्धारित कर उसे भेज सकती हैं जिस में आप यह कह सकती हैं कि वह  उक्त बिल के भुगतान तक उक्त सोफ्टवेयर का उपयोग नहीं करे। क्यों कि उक्त सोफ्टवेयर को आपने विकसित किया है और उस पर आप का कापीराइट है। आप की अनुमति के बिना वह व्यक्ति उस सोफ्टवेयर का उपयोग नहीं कर सकता जिसे आपने विकसित किया है।

दि बिल भेजने के उपरान्त निर्धारित अवधि में वह व्यक्ति आप को आप के काम के मूल्य का भुगतान न करे तो आप उसे विधिक सूचना (Legal Notice) दें कि वह आप के काम का भुगतान निश्चित अवधि में कर दे अन्यथा आप अपनी शुल्क की राशि प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत करेंगी तथा कापीराइट के उल्लंघन के लिए दीवानी और अपराधिक मुकदमा चलाएँगी, तथा उस के नियोजक को भी शिकायत करेंगी।

नोटिस के उत्तर में भुगतान प्राप्त न होने की दशा में आप उक्त कार्यवाहियों में से कोई एक या सभी कर सकती हैं। पर मेरी राय यह है कि आप पहले न्यायालय में एक वाद उक्त सोफ्टवेयर को उस व्यक्ति द्वारा उपयोग में लेने से रोके जाने के लिए निषेधाज्ञा जारी करने के लिए प्रस्तुत करें और तुरंत अस्थाई निषेधाज्ञा जारी करवाएँ।  उस के बाद उस के नियोजक को सूचित करें, फिर भी काम न हो तो आप कापीराइट एक्ट के अंतर्गत उस के विरुद्ध अपराधिक मामला दर्ज कराएँ। आप उस से अपनी शुल्क और क्षतियाँ प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकती हैं। पर ध्यान रहे शुल्क वसूली के लिए वाद वादकारण उत्पन्न होने के तीन वर्ष की अवधि में ही किया जा सकता है।

अपराध के घटित होने की रिपोर्ट झूठी सिद्ध होने पर परिवादी के विरुद्ध धारा 182 भा.दं.संहिता में मुकदमा चलाया जा सकता है

 समस्या-

ब मैं अपनी मां सियादेवी को अपने गाँव से अपने साथ  कोलकाता ले आया तो उसके बाद मेरी बहन किरण कुमारी ने हमारे ऊपर आरोप लगाया कि विजय कुमार ने सियादेवी का अपरहण कर लिया है और उस की हत्या कर देगा। किरण कुमारी ने मेरे विरुद्ध न्यायालय में जा कर झूठा मुकदमा कर दिया जिसका CR No. 1591/10 Date:20/09/2010 है।  इसके बाद न्यायालय से थाना में फिर दर्ज के लिए पत्र भेजा गया जिसका थाना में Case No. 120/10 Date:29/11/2010 धारा 342/323/363/365/364/506 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया।  इस केस में 4 लोगो का गवाही में नाम दिया गया है, इसके बाद मेरी माँ सियादेवी का धारा 164 के अंतर्गत दिनांक 15/06/2011 को बयान लिया गया जिस में मेरी माँ सियादेवी ने कहा कि “मैं अपने मर्जी से अपने बेटे विजय कुमार के साथ कोलकाता गयी थी।  मेरा अपहरण नहीं किया गया है।  मेरी बेटी किरण कुमारी ने झूठा मुकदमा मेरे बेटे विजय कुमार के ऊपर किया है।“  मेरी बहन किरण कुमारी ने मेरे ऊपर झूठा मुकदमा किया इसका प्रमाण धारा 164 के अंतर्गत लिया गया सियादेवी का बयान का कोर्ट से निकला हुआ नक़ल का कागजात मेरे पास है।  क्या मैं किरण कुमारी और उन चार गवाह के विरुद्ध कौन सी क़ानूनी करवाई कर सकता हूँ या कौन सा मुकदमा इन लोगो के विरुद्ध कर सकता हूँ?

-विजय कुमार, बेगूसराय, बिहार

समाधान-

प के प्रश्न से पता लगता है कि आप की बहिन ने पहले न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत की जिसे धारा 156(3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस को प्रेषित किया गया। बाद में पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर के अन्वेषण किया और आप की माता जी के बयानों के बाद यह पाया कि शिकायत मिथ्या है। आप की बहिन का यह कृत्य धारा 182 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध है जो एक वर्ष के कारावास तथा 1000 रुपए तक के जुर्माने से दंडनीय है। लेकिन यह अपराध असंज्ञेय है और जमानतीय भी इस कारण से इस मामले में आप को न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। पुलिस द्वारा प्रेषित अंतिम प्रतिवेदन तथा उस पर न्यायालय की मंजूरी के आदेश की प्रमाणित प्रतियाँ पहले न्यायालय से प्राप्त करनी होंगी और फिर न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत करना होगा साथ में उक्त प्रमाणित प्रतियाँ भी प्रस्तुत करनी होंगी। आप का बयान लेने के उपरान्त न्यायालय आप की बहिन के विरुद्ध प्रसंज्ञान ले सकता है। इस मुकदमे में आप की बहिन को दंडित किया जा सकता है।

स के अतिरिक्त आप की बहिन द्वारा की गई उक्त शिकायत के कारण जो परेशानी और खर्च उठाना पड़ा है उस के लिए आप उस के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकते हैं और उस से हर्जाने की मांग कर सकते हैं। लेकिन दीवानी वाद में जितने हर्जाने की आप मांग करेंगे उतनी राशि पर आप को निर्धारित कोर्ट फीस न्यायालय को अदा करनी होगी।

दुर्भावना से चलाए गए अपराधिक मुकदमे के लिए वाद प्रस्तुत कर हर्जाना प्राप्त किया जा सकता है

अश्विनी ने पूछा है – 

किसी फौजदारी मुकदमे में बरी हो जाने के बाद जो हमारा समय और रुपया बरबाद हुआ है उस की पूर्ति कौन करेगा? इस के लिए क्या कार्यवाही की जा सकती है?

 उत्तर – – –

अश्विनी जी,

प का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। अक्सर ही ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति की अकारण और दुर्भावनापूर्ण शिकायत पर पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करती है, उस पर अन्वेषण करती है, जो अक्सर ही एक तरफा होती है। अन्वेषण में इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि कैसे आरोपित अपराध को साबित किया जा सकता है, इस बात पर बिलकुल नहीं सोचा जाता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में जिस अपराध का घटित होना कहा गया है वह सत्य भी है या नहीं। अन्वेषण के उपरांत पुलिस न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत करती है और मुकदमे का विचारण आरंभ हो जाता है। विचारण के अंत में सबूतों के अभाव में आरोप साबित नहीं हो पाता है और अभियुक्त दोष मुक्त करार दिया जाता है। जिन मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट का कोई आधार नहीं हो और अभियोजन दुर्भावनापूर्ण हो तो अभियुक्त दोष मुक्त करार दिए जाने के उपरांत अपने खर्चों के लिए दीवानी न्यायालय में दुष्कृति (Tort) के आधार पर दावा ला सकता है, जिस में उसे हर्जाना प्राप्त हो सकता है।
दुर्भावना पूर्ण अभियोजन वास्तव में अपराधिक कानून का गलत रीति से उपयोग कर न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।  जिस के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण अभियोजन चलाया गया हो वह व्यक्ति इस तरह के अभियोजन के लिए दीवानी न्यायालय में हर्जाने का वाद प्रस्तुत कर के अभियोजन से उस की प्रतिष्ठा की हानि, मुकदमे से हुई धन/संपत्ति की हानि और स्वास्थ्य की हानि के लिए हर्जाने की मांग कर सकता है।  गा गया हर्जाना उचित और मुकदमे से संबंधित क्षतियों के लिए होना चाहिए न कि मनमाना। लेकिन दीवानी वाद में  पीड़ित व्यक्ति वादी होगा इस कारण से यह साबित करने का भार  भी उसी पर होगा कि उस के विरुद्ध जो अभियोजन चलाया गया वह दुर्भावनापूर्ण था। यह केवल अपराधिक मुकदमे में बरी हो जाने मात्र से साबित नहीं होगा।  दीवानी न्यायालय हर्जाने का आकलन करने के लिए उस के विरुद्ध लगाए गए अपराधिक आरोप की गंभीरता, प्रकृति उस से आरोपी व्यक्ति को हुई परेशानी, आर्थिक हानि और आरोपी व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठा पर विचार करती है। इस कारण इन सभी से संबंधित तथ्य उस व्यक्ति को वाद में प्रस्तुत करने चाहिए और उन के संबंध में दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य भी प्रस्तुत करनी चाहिए। 
दुर्भावना को अभियोजन चलाने वाले व्यक्ति से पूर्व के तनावपूर्ण संबंधों, अनुचित व्यवहार जैस

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