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नॉमिनी केवल ट्रस्टी है, उसे राशि सभी उत्तराधिकारियों को उन के अधिकार के अनुसार देनी चाहिए।

समस्या-

राजेश ने इसराना, पानीपत, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

म चार भाई बहन हैं हमारे पिता जी एक सरकारी अधिकारी थे उनकी मृत्यु के बाद, nomination होने के कारण सारे पैसे मेरी माँ के नाम हो गए हैं। बहन की शादी हो चुकी है मेरी माँ हम दोनों छोटे भाइयों के पास रहती है। बड़ा भाई 10 साल से अलग है, वो सरकारी नौकरी पर है और अलग राशन कार्ड है, और अलग मकान है। हम दोनों छोटे भाई बेरोजगार हैं पिता की खरीदी हुई गाड़ी भी वही चलाता है जो कि मेरी माँ के नाम है और अब पिता की मृत्यु के एक महीने बाद वो हमसे अपना हिस्सा मांगने लगा है, जबकि वो हमसे 10 साल से अलग है तो क्या पिता के retirement वाले और pension वाले पेसों में उसका हिस्सा है? बताइये हमें क्या करना चाहिये?.

समाधान-

प के भाई ने आप के पिता की संपत्ति में क्या क्या अधिक ले लिया है यह एक अलग विषय है। पिता की संपत्ति में आप की माँ, आप तीनों भाई और आप  की बहन सब का बराबर का हिस्सा है। आप को बराबरी से बांटने की बात करना चाहिए था। यदि आपके भाई इस से अधिक ले लिए हैं तो गलत है, यदि शादी होने के बाद बहिन को कम दिया गया है या कुछ नहीं दिया गया है तो वह भी गलत है।

किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ होता है कि नामिनेशन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के नोमिनी को उस की राशि दे दी जाए। लेकिन इस राशि को प्राप्त करने वाला केवल एक ट्रस्टी होता है उसे वह राशि मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में समानता से बाँटनी होती है।

पेंशन पर को आप की माता जी के सिवा किसी का अधिकार नहीं है क्यों कि आप भाई बहनों में कोई भी नाबालिग नहीं है। रहा सवाल रिटायर होने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी व भविष्य निधि और अन्य राशियों की तो यह सभी उत्तराधिकारियों तीनों भाइयों, माँ और बहिन में बराबर बाँटी जानी चाहिए।

स्त्री-धन जो पिता, माता, भाई, भाभी और बहन के पास है, अमानत है और उसे लौटाने से मना करना गंभीर अपराध है।

POSTMANसमस्या-

कप्तान सिंह ने राजौरी, जम्मू कश्मीर से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी के साथ धोखा हुआ है। उस की बहन बड़े भाई, भाभी और पिता ने साथ मिल कर अपने गहने सोने का हार झुमके, अंगूठी, इयर टॉप्स और सोने की चूड़ियाँ सारे सामान देने से मना कर दिया है। मेरी शादी को 10-11 साल हो गए हैं अब मेरी पत्नी बहुत दुखी है कृपया उपाय बताएँ।

समाधान

प की पत्नी के गहने जो भी उस के हैं वे पत्नी का स्त्री-धन हैं। यदि वे उस की बहन आदि के पास थे तो वे अमानत के तौर पर रखे थे। अमानत के तौर पर किसी पास रखी कोई भी संपत्ति अमानत ही होती है। यदि वह उसे देने से इन्कार करता है तो यह अमानत में खयानत है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 406 आईपीसी में दंडनीय अपराध है। आप की पत्नी को उक्त लोगों ने यह स्त्री-धन देने से मना किया है इस का अर्थ यह है कि उन्हों ने यह अपराध किया है।

प की पत्नी चाहें तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है, यदि पुलिस कार्यवाही करने से इन्कार करती है तो इलाके के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सीधे परिवाद प्रस्तुत करें। बेहतर होगा कि पुलिस को रिपोर्ट करने या न्यायालय में परिवाद दर्ज कराने के पहले आप की पत्नी स्वयं या किसी वकील के माध्यम से उक्त गहनों को लौटाने के लिए एक नोटिस रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेजें। नोटिस की एक एक प्रतियाँ उक्त सभी व्यक्तियों को अलग अलग डाक से भेजे जाएँ। सब की डाक की रसीदें और प्राप्ति स्वीकृतियाँ अपने पास रखी जाएँ।

ट्रस्ट संपत्ति को व्यक्तिगत संपत्ति में बदलने का अपराध …

court-logoसमस्या-

रविशंकर तिवारी ने आरा, बिहार से बिहार राज्य की समस्या भेजी है कि-

क व्यक्ति ने अपने जीवन काल में अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी सम्पति को ट्रस्ट के नाम कर अपने ही परिवार के एक व्यक्ति को उसका प्रबंधक नियुक्त कर दिया। ट्रस्ट श्री राम जी लखन जी जानकी जी और महावीर जी के नाम से रजिस्टर्ड डीड सम्पादित किया गया।

ट्रस्ट लिखने वाले ने वह सम्पति अपनी पत्नी की नाम से खरीदी थी। पत्नी की मृत्यु के उपरांत ट्रस्ट लिखने वाले व्यक्ति की अपनी कोई सन्तान नहीं थी। प्रबंधक ने लगभग पचीस (25) वर्षो बाद उक्त सम्पति को लोक अदालत में ट्रस्ट की डीड को छुपा कर अपनी पत्नी और पुत्रों के साथ उक्त सम्पति का बँटवारा कर लिया और बँटवारा के कागज के अनुसार अपना दाखिल ख़ारिज करा लिया। क्या उस लोक आदालत की डिग्री को खत्म करवा जा सकता है ट्रस्ट डीड 1983 में लिखा गया था 2010 में लोक अदालत में बँटवारा किया गया। क्या प्रबंधक पर क्रिमिनल केस चलाया जा सकता है?

समाधान-

ट्रस्ट स्थापित करने वाले व्यक्ति ने संबंधित संपत्ति पत्नी के नाम से खुद खरीदी थी। यदि पत्नी की मृत्यु इस व्यक्ति की मृत्यु के पहले ही हो चुकी थी तो पत्नी की मृत्यु के उपरान्त वह संपत्ति उत्तराधिकार में उसी को प्राप्त हो गई। इस तरह वह व्यक्ति उस संपत्ति का पूर्ण स्वामी हुआ। वह ट्रस्ट स्थापित करने के लिए पूरी तरह सक्षम था। इस ट्रस्ट संपत्ति को पुनः व्यक्तिगत संपत्ति में परिवर्तित नहीं किया जा सकता था। प्रबंधक ने ट्रस्ट डीड को छुपा कर तथा अपने ही परिवार के किसी व्यक्ति से मिथ्या बँटवारा वाद संस्थित करवा कर न्यायालय में लोकअदालत के दौरान इस तरह का निर्णय कराया होगा। यह निर्णय गलत है और इसे बदला जा सकता है। कोई भी ट्रस्ट के लाभों से हितबद्ध व्यक्ति लोक अदालत की इस डिक्री को अपास्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकता है।

न्यायालय से संपत्ति की सही स्थिति छुपा कर जो दावा किया गया और बँटवारा कराया गया है वह धारा 207 व 406 आईपीसी में अपराध हो सकता है। सारे दस्तावेजों आदि का अध्ययन करने के बाद यह स्पष्ट हो सकता है। बँटवारे के वाद के उन सारे पक्षकारों के विरुद्ध जो कि इस लोक अदालत के निर्णय से सहमत थे तथा जिन्हो ने उस पर हस्ताक्षर किए उक्त अपराधिक प्रकरण चलाया जा सकता है।

लगभग हर स्त्री के पास धारा 498-ए व 406 भादंसं की शिकायत का कारण उपलब्ध रहता है।

समस्या-

सिरोही, राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

मैं किसी कारणवश अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद (तलाक) ले रहा हूँ। मेरे ससुराल वाले मुझे झूठे मुकदमे में फँसाने की धमकियाँ देते हैं, जैसे घरेलू हिंसा, दहेज, मारपीट आदि।  उस के बाद मैं ने एस.पी. को लिखित में शिकायत दे दी। फिर भी उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?

समाधान-

sadwomanह एक आम समस्या के रूप में सामने आता है। सामान्यतः विवाह के उपरान्त यह मान लिया जाता है कि पति-पत्नी आपसी सहयोग के साथ सारा जीवन शांतिपूर्ण रीति से बिताएंगे। लेकिन विवाह इतनी आसान चीज नहीं है। विवाह के पूर्व स्त्री और पुरुष दोनों के ही वैवाहिक जीवन के बारे में अपने अपने सपने और महत्वाकांक्षाएँ होती हैं। निश्चित रूप से ये सपने और महत्वाकांक्षाएँ तभी पूरी हो सकती हैं जब कि पति या पत्नी उन के अनुरूप हो। यदि पति और पत्नी के सपने और महत्वाकांक्षाएँ अलग अलग हैं। वैसी स्थिति में दोनों में टकराहट स्वाभाविक है। लेकिन इस टकराहट का अन्त या तो सामंजस्य में हो सकता है या फिर विवाह विच्छेद में। दोनों परिणामों तक पहुँचने में किसी को कम और किसी को अधिक समय लगता है। ऐसा भी नहीं है कि परिणाम आ ही जाए। अधिकांश युगल जीव भर इस टकराहट और सामंजस्य स्थापित करने की स्थिति में ही संपूर्ण जीवन बिता देते हैं। अपितु यह कहना अधिक सही होगा कि पति-पत्नी के बीच सामंजस्य और टकराहटों के साथ साथ चलते रहने का नाम ही एक गृहस्थ जीवन है।  यदि सामंजस्य टकराहटों पर प्रभावी हुआ तो जीवन मतभेदों के बावजूद सहज रीति से चलता रहता है। लेकिन जहाँ सामंजस्य का प्रयास मतभेदों के मुकाबले कमजोर हुआ वहीं गृहस्थ जीवन की टकराहटें पहले पति-पत्नी के दायरे से, फिर परिवारों के दायरे से निकल कर बाहर आ जाती हैं।

ब आप ने सहज रूप से यह कह दिया है कि “मैं किसी कारणवश अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद (तलाक) ले रहा हूँ”। आप ने यह तो नहीं बताया कि आप तलाक क्यों ले रहे हैं? इस बारे में एक भी तथ्य सामने नहीं है। आप ने तो पत्नी के विरुद्ध घर, परिवार, बिरादरी से बाहर आ कर अदालत में जंग छेड़ दी है। हमारे यहाँ यह आम धारणा है कि प्यार और जंग में सब जायज है। यह धारणा केवल पुरुषों की ही नहीं है स्त्रियों की भी है। आप क इस जंग में दो  दो पक्ष हैं। एक आप का और आप के हितैषियों का जो आप के तलाक लेने के निर्णय से सहमत हैं और दूसरा पक्ष आप की पत्नी और उस के मायके वालों का। दोनों पक्षों के बीच जंग छिड़ी है तो जंग में जो भी हथियार जिस के पास हैं उन का वह उपयोग करेगा। आप की पत्नी के पक्ष ने उन के पास उपलब्ध हथियारों का प्रयोग करते हुए आप पर मुकदमे कर दिए हैं। अब जंग आप ने छेड़ी है तो लड़ना तो पड़ेगा।

प ने लिखा है कि उन्हों ने दहेज का केस कर दिया है। इस से कुछ स्पष्ट पता नहीं लगता कि क्या मुकदमा आप के विरुद्ध किया गया है। आम तौर पर पत्नियाँ जब पति के विरुद्ध इस तरह की जंग में जाती हैं तो किसी वकील से सलाह लेती हैं। वकील उन्हें धारा 498-ए और 406 आईपीसी के अंतर्गत न्यायालय के समक्ष परिवाद करने की सलाह देते हैं। इस के बहुत मजबूत कारण हैं। आम तौर पर पत्नियाँ पति के साथ निवास करती हैं। उन का सारा स्त्री-धन जो उन की कमाई से अर्जित हो, जो उन्हें अपने माता-पिता, रिश्तेदारों, पति व पति के रिश्तेदारों व अन्य किसी व्यक्ति से मिला है वह पति के घर रहता है। यह पति के पास पत्नी की अमानत है। आप उसे देने से इन्कार करते हैं तो वह अमानत में खयानत का अपराध है। जंग आ चुकी स्त्री वहाँ जितना सामान होता है उस से अधिक बताती है। पति देने से इन्कार करते हैं। धारा 406 आईपीसी का मुकदमा तैयार बैठा है। क्यों की उस का स्त्रीधन कितना था या कितना नहीं, या उस ने उस की मांग भी की थी या नहीं और पति ने उसे मांग पर देने से मना किया था या नहीं यह सब तो बाद में न्यायालय में तय होता रहेगा। उस समय तो पुलिस पत्नी और उस के गवाहों के बयानों को सही मान कर पति व उस के रिश्तेदारों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करती है और आरोप पत्र प्रस्तुत कर देती है।

धारा 498-ए का मैं अनेक बार अन्य पोस्टों में उल्लेख कर चुका हूँ। यह निम्न प्रकार है-

पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विय में

498क. किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना–जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।

स्पष्टीकरण–इस धारा के प्रयोजनों के लिए,“ क्रूरता” निम्नलिखित अभिप्रेत हैः–

(क) जानबूझकर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकॄति का है जिससे स्त्री को आत्महत्या करने के लिए या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा कारित करने के लिए उसे प्रेरित करने की सम्भावना है ; या

(ख) किसी स्त्री को तंग करना, जहां उसे या उससे सम्बन्धित किसी व्यक्ति को किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के लिए किसी विधिविरुद्ध मांग को पूरी करने के लिए प्रपीडित करने को दृष्टि से या उसके अथवा उससे संबंधित किसी व्यक्ति के ऐसे मांग पूरी करने में असफल रहने के कारण इस प्रकार तंग किया जा रहा है ।]

ब आप स्वयं भी देखें कि इस धारा में क्या है। यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को या किसी रिश्तेदार की पत्नी के प्रति ऐसा आचरण करता है जिस से उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरणा मिलती हो या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य (जो चाहे मानसिक हो या शारीरिक) के प्रति गंभीर क्षति या खतरा उत्पन्न होता है या फिर उसे संपत्ति या अन्य किसी मूल्यवान वस्तु की मांग के लिए प्रपीड़ित करने के लिए तंग करता है तो वह इस धारा के अंतर्गत अपराध करता है।

स धारा को पढ़ने के बाद सभी पुरुष एक बार यह विचार करें कि इस धारा में जिस तरह स्त्री के प्रति क्रूरता को परिभाषित किया गया है, क्या पिछले तीन वर्ष में कोई ऐसा काम नहीं किया जो इस धारा के तहत नहीं आता है। कोई बिरला पुरुष ही होगा जो यह महसूस करे कि उस ने ऐसा कोई काम नहीं किया। यदि कोई यह पाता है कि उस ने अपनी पत्नी से उक्त परिभाषित व्यवहार किया है तो फिर उसे यह भी मानना चाहिए कि उस ने उक्त धारा के अंतर्गत अपराध किया है। यदि इस अपराध के लिए उस के विरुद्ध शिकायत नहीं की गई है तो यह उस की पत्नी की कमजोरी या भलमनसाहत है। इस से यह तात्पर्य निकलता है कि लगभग हर पत्नी इस तरह की क्रूरता की शिकार बनती है लेकिन शिकायत नहीं करती इस कारण उस के पति के विरुद्ध मुकदमा नहीं बनता है। लेकिन यदि स्त्री को युद्ध में लाए जाने या चले जाने के बाद ये दो हथियार तो उस के पास हैं ही, जिन का वह उपयोग कर सकती है। और भला करे भी क्यों नहीं?

ब के मूल प्रश्न का उत्तर दिया जाए कि ‘उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?’ उक्त धाराओं में पहले स्त्री न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत करती है, फिर पुलिस उस पर प्राथमिकी दर्ज कर उस का अन्वेषण करती है और न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र दाखिल करती है। फिर न्यायालय आरोपों पर साक्ष्य लेता है, और दोनों पक्षों के तर्क सुनता है तब निर्णय करता है कि अभियुक्त के विरुद्ध आरोप प्रमाणित है या नहीं। प्रमाणित होने पर दंड पर तर्क सुनता है और अंतिम निर्णय करता है। लेकिन आप चाहते हैं कि आप को इतना बड़े मामले का निर्णय हम से केवल इतना कहने पर मिल जाए कि ‘उन्हों ने दहेज का केस कर दिया। दोषी कौन होगा? और सजा किस को और कितनी होगी?’ क्या इस तरह उत्तर कोई दे सकता है? नजूमी (ज्योतिषी) से भी यदि कोई सवाल किया जाए तो वह भी काल्पनिक उत्तर देने के पहले ग्रह नक्षत्र देखता है, उन की गणना करता है तब जा कर कुछ बताता है।  तो भाई इतने से वाक्य से तो बिलकुल संभव नहीं है कि आप के इस प्रश्न का उत्तर दिया जा सके।

प को यही सलाह दी जा सकती है कि आप ने भले ही किसी न किसी महत्वपूर्ण और सच्चे आधार पर अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद चाहते हों और वह कितना ही सच्चा क्यों न हो, आप को अपने विरुद्ध मुकदमों को सावधानी और सतर्कता से लड़ना चाहिए। क्यों कि सजा तो हो ही सकती है।

अमानत को निज-उपयोग में ले लेना अमानत में खयानत का अपराध है।

समस्या-

करनाल, हरियाणा से अमरजीत ने पूछा है-

Havel handcuffमेरे पास किसी से कुछ पैसे अमानती तौर पर रखे हुए हैं।  मैंने उन्हें लिखित में दे रखा है कि- ” मैंने राजीव (काल्पनिक नाम) से 50,000.00 रूपये अमानती तौर पर लिए है और ये मेरे पास अब नहीं होने के कारन में इन्हें वापिस नहीं कर सकता लकिन मैं ये मेरे पास होने पर राजीव को लौटा दूंगा”। इस दस्तावेज पर मेरे, राजीव तथा दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं। मैं इस बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूँ-

1- क्या भुगतान के समय राजीव मुझ से ब्याज की मांग कर सकता है?

2- क्या राजीव मुझ पर किसी एक तारीख को पैसे लौटने का दबाव बना सकता है?

3-मेरे लिए पैसे लौटाने का कितना समय है?

4-मुझे पैसे किस तरीके से वापिस करने चाहिए नगद या चेक और भुगतान के समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए ताकि वह कल को मुझ से दोबारा पैसे न वसूल सके।

समाधान-

प ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि आप के पास राजीव की उक्त 50,000.00 रुपए की राशि अमानत के बतौर रखी है।  अमानत का अर्थ अमानत होता है। उसे सुरक्षित रखना होता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की अमानत को व्यक्तिगत उपयोग में ले लेता है तो यह धारा 405 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत एक अपराध है जो धारा 406 के अंतर्गत दंडनीय है। ये दोनों उपबंध निम्न प्रकार है-

405. आपराधिक न्यासभंग–जो कोई सम्पत्ति या सम्पत्ति पर कोई भी अखत्यार किसी प्रकार अपने को न्यस्त किए जाने पर उस सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है या उसे अपने उपयोग में संपरिवर्तित कर लेता है या जिस प्रकार ऐसा न्यास निर्वहन किया जाना है, उसको विहित करने वाली विधि के किसी निदेश का, या ऐसे न्यास के निर्वहन के बारे में उसके द्वारा की गई किसी अभिव्यक्त या विवक्षित वैघ संविदा का अतिक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पत्ति का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति का ऐसा करना सहन करता है, वह “आपराधिक न्यास भंग” करता है ।

1[2[स्पष्टीकरण 1–जो व्यक्ति 3[किसी स्थापन का नियोजक होते हुए, चाहे वह स्थापन कर्मचारी भविष्य-निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (1952 का 17) की धारा 17 के अधीन छूट प्राप्त है या नहीं, तत्समय प्रवॄत्त किसी विधि द्वारा स्थापित भविष्य-निधि या कुटुंब पेंशन निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी-अभिदाय की कटौती कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके द्वारा इस प्रकार कटौती किए गए अभिदाय की रकम उसे न्यस्त कर दी गई है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय का संदाय करने में, उक्त विधि का अतिक्रमण करके व्यतिक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है ।]

4[स्पष्टीकरण 2–जो व्यक्ति, नियोजक होते हुए, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (1948 का 34) के अधीन स्थापित कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा धारित और शासित कर्मचारी राज्य बीमा निगम निधि में जमा करने के लिए कर्मचारी को संदेय मजदूरी में से कर्मचारी-अभिदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसे अभिदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, जिसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यदि वह उक्त निधि में ऐसे अभिदाय के संदाय करने में, उक्त अधिनियम का अतिक्रमण करके, व्यतिक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यथापूर्वोक्त विधि के किसी निदेश का अतिक्रमण करके उक्त अभिदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग किया है ।]

दृष्टांत

(क) एक मॄत व्यक्ति की विल का निष्पादक होते हुए उस विधि की, जो चीजबस्त को विल के अनुसार विभाजित करने के लिए उसको निदेश देती है, बेईमानी से अवज्ञा करता है, और उस चीजबस्त को अपने उपयोग के लिए विनियुक्त कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(ख) भांडागारिक है । यात्रा को जाते हुए अपना फर्नीचर के पास उस संविदा के अधीन न्यस्त कर जाता है कि वह भांडागार के कमरे के लिए ठहराई गई राशि के दे दिए जाने पर लौटा दिया जाएगा । उस माल को बेईमानी से बेच देता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(ग) , जो कलकत्ता में निवास करता है, का, जो दिल्ली में निवास करता है अभिकर्ता है । और के बीच यह अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा है कि द्वारा को प्रेषित सब राशियां द्वारा के निदेश के अनुसार विनिहित की जाएगी । , को इन निदेशों के साथ एक लाख रुपए भेजता है कि उसको कंपनी पत्रों में विनिहित किया जाए । उन निदेशों की बेईमानी से अवज्ञा करता है और उस धन को अपने कारबार के उपयोग में ले आता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(घ) किंतु यदि पिछले दृष्टांत में बेईमानी से नहीं प्रत्युत सद्भावपूर्वक यह विश्वास करते हुए कि बैंक आफ बंगाल में अंश धारण करना के लिए अधिक फायदाप्रद होगा, के निदेशों की अवज्ञा करता है, और कंपनी पत्र खरीदने के बजाए के लिए बैंक आफ बंगाल के अंश खरीदता है, तो यद्यपि को हानि हो जाए और उस हानि के कारण, वह के विरुद्ध सिविल कार्यवाही करने का हकदार हो, तथापि, यतः ने, बेईमानी से कार्य नहीं किया है, उसने आपराधिक न्यासभंग नहीं किया है ।

(ङ) एक राजस्व आफिसर, के पास लोक धन न्यस्त किया गया है और वह उस सब धन को, जो उसके पास न्यस्त किया गया है, एक निश्चित खजाने में जमा कर देने के लिए या तो विधि द्वारा निर्देशित है या सरकार के साथ अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा द्वारा आबद्ध है । उस धन को बेईमानी से विनियोजित कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

(च) भूमि से या जल से ले जाने के लिए ने के पास, जो एक वाहक है, संपत्ति न्यस्त की है । उस संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग कर लेता है । ने आपराधिक न्यासभंग किया है ।

406. आपराधिक न्यासभंग के लिए दंड–जो कोई आपराधिक न्यासभंग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

स तरह आप ने जो कुछ लिख कर राजीव को दिया है उस में अमानत होना और उसे अपने स्वयं के उपयोग में परिवर्तित कर लेने की आत्मस्वीकृति दी हुई है।  आप ने यह भी लिखा है कि अभी मैं लौटा नहीं सकता लेकिन मेरे पास होने पर लौटा दूंगा।  इस तरह आप ने धारा 406 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध स्वीकार किया हुआ है। राजीव आप पर अमानत में खयानत अर्थात अपराधिक न्यास भंग के मामले में पुलिस को या न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकता है जिस में धारा 406 भा.दं.संहिता का मामला दर्ज किया जा सकता है। आप की गिरफ्तारी हो सकती है और आप के विरुद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है जिस में आप को सजा हो सकती है।

लेकिन इस का बचाव भी है। बचाव यह है कि अपराध आप ने किसी एक व्यक्ति के प्रति किया है जिस ने उसे क्षमा कर दिया है। राजीव ने उक्त लिखत के माध्यम से आप के साथ एक संविदा की है जिस के द्वारा अमानत को उधार में बदल दिया गया है तथा उस राशि को लौटाने के लिए तब तक की छूट आप को दी है जब तक कि उतना पैसा आप के पास न हो। यदि आप के विरुद्ध कोई फौजदारी मुकदमा दर्ज हो ही जाए तो उक्त तर्क के आधार पर न्यायालय आप को जमानत प्रदान कर देगा।  इसी आधार पर प्रथमसूचना रिपोर्ट भी रद्द हो सकती है।

ह आप से ब्याज नहीं ले सकता।   क्यों कि इस लिखत में ब्याज लेने की कोई बात नहीं है।  वह आप से रुपए मांग सकता है और कह सकता है कि आप निर्धारित समय में उक्त रुपया लौटाएँ अन्यथा वह आप पर धारा 406 का परिवाद करेगा और रुपया वसूलने की कार्यवाही अलग से करेगा।

मेरी आप को सलाह है कि इस जिम्मेदारी को जितना जल्दी हो आप पूरा कर दें। राजीव का पैसा लौटा दें और उस की रसीद ले लें तथा आप के द्वारा लिखा गया उक्त दस्तावेज अवश्य वापस ले लें।  रसीद और उक्त दस्तावेज लौटाए जाने की स्थिति में रुपये का भुगतान किसी भी प्रकार से चैक या नकद किया जा सकता है।  पर यदि आप यह भुगतान अकाउण्ट पेयी चैक से करें तो सब से बेहतर है। यदि वह अकाउंट पेयी चैक से भुगतान प्राप्त करने को तैयार न हो तो उसे बैंक ड्राफ्ट से भुगतान कर सकते हैं।

देश को जरूरत है 77,664 जजों की

भारतीय न्याय प्रणाली की विश्व में अच्छी साख है, लेकिन यह अपने ही देश में अपनी ही जनता का विश्वास खोती जा रही है। देश में शिक्षा व जागरूकता में वृद्धि होने से समस्याओं के हल के लिए अधिक नागरिक अदालतों की शरण में आने लगे हैं और मुकदमों की संख्या बढ़ी है। मुकदमों की संख्या वृद्धि से निपटने में हमारी न्याय प्रणाली अक्षम सिद्ध ह रही है। इस का सीधा नतीजा यह हुआ है कि अधिकांश अदालतें मुकदमों से अटी पड़ी हैं। मुवक्किल अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं, मुकदमों में तारीखों पर तारीखें पड़ती रहती हैं, पर उन के फैसले नहीं हो पाते।

20 दिसम्बर को भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री के.जी. बालाकृष्णन् ने मुम्बई में एक समारोह में बताया कि तीन करोड़ अस्सी हजार से अधिक मुकदमें देश की विभिन्न अदालतों में लम्बित हैं, जिन में 46 हजार से अधिक सुप्रीम कोर्ट में, 37 लाख से अधिक हाई कोर्टों में तथा ढ़ाई करोड़ से अधिक निचली अदालतों में फैसलों के इन्तजार में हैं। मुकदमों का निपटारा करने का कर्तव्य हमारा (न्यायपालिका का) है, हमने पिछले दो सालों में निपटारे की गति को 30 प्रतिशत बढ़ाया है। लेकिन दायर होने वाले मुकदमों की संख्या भी बढ़ी है जिस से लम्बित मुकदमों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में केवल 14000 जजों के पद स्वीकृत हैं जिन में से केवल 12000 जज कार्यरत हैं 2000 जजों के पद जजों के चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया में खाली पड़े हैं। 500 मुकदमों के निपटारे के लिए हमें एक जज की जरूरत है। इस तरह लम्बित मुकदमों के निपटारे के लिए हमें 77,664 जजों की आवश्यकता है। हमें ज्यादा अदालतें और ज्यादा बजट चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश के ताजा कथन से हमारी न्याय प्रणाली की बेचारगी प्रकट होती है, और एक नंगी हकीकत सामने आती है। हमारे देश में मुकदमें निपटाने के लिए जितनी अदालतों की आज जरुरत है, उस की केवल 16 प्रतिशत अदालतें हमारे पास हैं। हम उन से ही काम चला रहे हैं। ऐसी हालत में शीघ्र न्याय की आशा किया जाना व्यर्थ है ही न्याय की गुणवत्ता भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

हमारी न्यायप्रणाली की सारी समस्याओं और फैसलों में देरी, वकीलों की हड़तालें, भ्रष्टाचार आदि बीमारियों की जड़ यहीं है। न्याय प्रणाली को साधन मुहय्या कराने की जिम्मेदारी केन्द्न और प्रान्तीय सरकारों की है जिसे पूरा करने में वे बुरी तरह असफल रही हैं।

सरकारों की जनता के प्रति जिम्मदारियों का राजनीति में बहुत उल्लेख होता है। जनता को आकर्षित करने वाले मुद्दों को राजनैतिक व चुनाव घोषणा पत्रों में स्थान भी मिलता है लेकिन जनता को सीधे प्रभावित करने वाले न्याय के मुद्दे पर न तो कोई राजनैतिक दल बात करता है और न ही करना चाहता है, चुनाव घोषणा पत्र में स्थान पाना तो बहुत दूर की बात है। अनजान कारणों से हर कोई इस मुद्दे से बचना और इसे जनता से छुपाना चाहता है। हमारे मुख्य न्यायाधीश इस ओर संकेत तो करते रहे मगर उसे खुल कर कभी भी सामने नहीं लाए।

यह पहला मौका है जब मुख्य न्यायाधीश ने खुल कर इस हकीकत को बयान किया है, या उन्हें करना पड़ा
है। क्योंकि अब हालात ऐसे हैं कि स्थिति को नहीं सम्भाला गया तो न्याय प्रंणाली पूरी तरह चरमरा जाएगी और घोर अराजकता हमारे सामने होगी।

वकालत के पेशे की विश्वसनीयता और सम्मान कायम रखने के लिए राज्य और वकील समुदाय को तुरंत प्रयास करने होंगे।

एक समय था जब वकीलों के पेशे को देश भर में सम्मान प्राप्त था। पर सम्मान का वह युग कोई बीस वर्ष पूर्व ही समाप्त हो चुका है। तीसरा खंबा की पिछली कड़ी पर आयी टिप्पणियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं। आप के तुरंत अवलोकन के लिए मैं वे दोनों टिप्पणियां ज्यों की त्यों यहां उद्धृत कर रहा हूं :

  • मगर यह धारणा सभी वकीलों के लिए सही नहीं है। अधिकांश वकील अपने व्यवसाय और अपने मुवक्किलों के प्रति ईमानदार और कर्तव्यपरायण हैं और अपने मुवक्किल, न्याय प्रणाली तथा समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह पूरी निष्ठा के साथ करते हैं।
    ऐसे वकीलों के दर्शन कहाँ हो सकते हैं? अनुनाद सिंह

  • वे वकील कौन थे जो न्याय को अपने हाथ में ले नौएडा/निठारी में बच्चों कि हत्या के अभियुक्तों को मार मार कर अधमरा कर रहे थे ?


खैर अच्छे बुरे लोग सब पेशों में पाए जाते हैं , किन्तु कुछ तो कारण होगा कि आम आदमी वकीलों से दूर ही बना रहना चाहता है।घुघूती बासूतीMired Mirage

वकालत के पेशे की ऐसी हालत क्‍यों हुई? ऐसा क्‍या हुआ कि एक चौथाई सदी ने एक पेशे को समाज के सबसे सम्मानित पेशों की सूची के ऊपर से निकाल कर एकदम नीचे पंहुचा दिया?

ये सभी सवाल आज वकील समुदाय के सामने मुंह बाए खड़े हैं। इन का जवाब भी वकील समुदाय ही खोज कर ला सकता है। वक्त आ गया है कि वकील समुदाय इन प्रश्नों से मुंह चुराने के स्थान पर इन प्रश्नों की सचाई को समझे। इस के कारणों का पता लगाए और उन कारणों को दूर करने का प्रयास करे। इन प्रयासों का प्रारंभ वकील समुदाय के भीतर से ही हो तो उस के अच्छे परिणाम भी शीध्र ही देखने को मिल सकते हैं।

न्यायपालिका, कार्यपा‍लिका और विधायिका के दायित्‍व

वकील न्याय प्रणाली का अहम् हिस्सा हैं। उन की सहायता के बिना कोई भी किसी भी अदालत से न्याय प्राप्त नहीं कर सकता। नई तकनीकों का विस्तार और उन के कारण समाज का विकास सदैव नई तथा पहले से जटिल परिस्थितियों को उत्पन्न करते हैं। इन जटिल परिस्थितियों में नए कानूनों और नियमों की आवश्यकता होती है। इन कारणों से कानून-नियम और अधिक जटिलतर होते जाते हैं। इस तरह वकीलों की भूमिका न्याय प्राप्ति के लिए और अधिक जरूरी होती जाती है। परिवार न्यायालय और अन्य अनेक न्यायालय हैं जिन में वकीलों का प्रवेश सर्वथा अथवा आंशिक रूप से वर्जित है। इन न्यायालयों का अनुभव यह बताता है कि वहां बिना वकीलों की सहायता के अर्जी तक लगा पाना दूभर है। फिर पूरी प्रक्रिया से गुजरने और एक निर्णय हासिल करने में तो उन की सहायता निहायत जरूरी हो जाती है। परिवार न्यायालयों के जज साहबान पहली-दूसरी पेशी पर ही न्यायार्थियों को किसी अच्छे वकील की सहायता प्राप्त करने की सलाह देने लगते हैं, चाहे वे उसी मुकदमे में पक्षकारों को वकीलों के माध्यम से पैरवी कराने की न दें।

इस तरह हम पाते हैं कि न्याय प्रणाली को वकील समुदाय के बिना चला पाना संभव नहीं है। इस कारण से इस समुदाय के लिए आम लोगों में गलत धारणाऐं बनना स्वयं न्याय प्रणाली का भी दोष है। क्यों कि इस दोष को न्याय प्रणाली से मिटाए बिना न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को बनाए रखना मुमकिन नहीं है। इस कारण से वकील समुदाय पर आम जनता का विश्वास और सम्मान कायम रहना आवश्यक है। यही कारण है कि राज्य के तीनों अंगों का यह प्राथमिक दायित्व बन जाता है कि वे तीनों न्याय प्रणाली में आए इस दोष को दूर करने के उपाय अत्यन्त गंभीरता के साथ करें।

यदि इस तरह के उपाय नहीं किए गए और वकीलों उठती विश्वसनीयता और गिरते हुए सम्मान की यही दशा कायम रही तो दिनों दिन न्याय प्रणाली पर से जनता का विश्वास कम होता जाएगा। यह स्वयं राज्य पर से जनता के विश्वास को समप्त कर देगा। तब या तो अराजकता का साम्राज्य होगा या फिर राज्य के ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन की बयार जल्दी ही देखने को मिलेगी।


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