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अपराध, जिनके होने या किए जाने की सूचना पुलिस या मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य है

कल सुमित राय की अगली जिज्ञासा है – – – 
किसी अपराध से प्रभावित वे व्यक्ति जो भय अथवा तथाकथित झंझट के नाम नाम पर अपराधियों के विरुद्ध मुख नहीं खोलते (अर्थात् स्वयं के प्रति भी मूकदर्शक बने रहते हैं), संविधान में ऐसा संशोधन किस प्रकार कराया जाये कि दूसरों अथवा स्वयं पर हुए अन्याय के प्रति मूकदर्शक बने रहने वाले, सब पता होते हुए भी विरोध न करने वाले व्यक्तियों के साथ भी अपराधियों जैसा बरताव किया जाये?
उत्तर – – – 
सुमित जी,
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 39 में यह उपबंधित किया गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 121 से 126 और धारा 130 (राज्य के विरुद्ध विनिर्दिष्ट अपराध), धारा 143,144,145,147 और 148 (लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराध), धारा 161 से 165-क (अवैध परितोषण से संबद्ध अपराध), धारा 272 से 278 (खाद्य और औषधियों के अपमिश्रण से संबंधित अपराध), धारा 302,303 और 304 (जीवन के लिए संकटकारी अपराध), धारा 364क (फिरौती आदि के लिए अपहरण से संबंधित अपराध), धारा 382 (चोरी करने के लिए मृत्यु, उपहति या अवरोध कारित करने की तैयारी के बाद चोरी का अपराध), 392 से 399 और धारा 402 (लूट और डकैती के अपराध), धारा 409 (लोक सेवक द्वारा अपराधिक न्यास भंग/अमानत में खयानत का अपराध), धारा 431 से 439 सं9पत्ति के विरुद्ध रिष्टी mischief का अपराध), धारा 449 व 450 (गृह अतिचार के अपराध), धारा 456 से 460 (प्रच्छन्न गृह अतिचार के अपराध) 489ए से 489ई तक (करेंसी नोटों और बैंक नोटों से संबंधित अपराधों) के  अंतर्गत दंडनीय अपराध के किए जाने या किए जाने के आशय से अवगत  व्यक्ति पर उस की सूचना निकटतम मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को देने का दायित्व निर्धारित किया गया है। 
सामान्यतया किसी अपराध की सूचना किसी मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को देने वाले व्यक्ति का यह दायित्व होता है कि वह ऐसी सूचना के लिए उचित प्रतिहेतु प्रदर्शित करे। लेकिन उक्त धाराओं के अपराधों की सूचना देने के लिए किसी उचित प्रतिहेतु की आवश्यकता नहीं है। 
क्त अपराधों की जानकारी होने पर भी किसी मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी को उन की सूचना न देने के दायित्व को पूरा न करना भारतीय दंड संहिता की धारा 176 व 202 के अंतर्गत दंडनीय अपराध घोषित किया गया है जिस के लिए उस व्यक्ति को छह माह के कारावास या जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
स तरह जिस तरह का उपबंध आप कानून में देखना चाहते हैं वह कुछ गंभीर अपराधों के लिए पहले से मौजूद है। सभी तरह के अपराधों के लिए ऐसा उपबंध बनाया जाना संभव नहीं है। हाँ, यह कहा जा सकता है कि कुछ और अपराधों को धारा 39 दं.प्र.सं. की सूची में सम्मिलित किया जाना चाहिए। इस के लिए मांग उठाई जा सकती है आप भी विधि आयोग को इस संबंध में अपनी राय और सुझाव प्रेषित कर सकते हैं।
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