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संपत्ति के बँटवारे और उत्तराधिकार के मामलों में संपत्ति का चरित्र और पूर्वजों के देहान्त की तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं

समस्या-

मेरे पापा और पाँच भाई और पाँच बहनें हैं, सबसे बडे् मेरे पापा हैं।   पापा व उससे छोटे बेटे की शादी के बाद ही दादा जी का देहान्त हो गया।  परिवार की सारी जिम्मेदारी पापा जी पर आ गई थी।  पापा ने ही तीनों चाचा कि शादी करवाई व दादी जी का सारा खर्चा पापा ही करते थे।  दादी जी ने अपने व पांचों बेटों के सामने स्टाम्प पेपर में वसीयत से बँटवारा करवाया था।  जिसमें सबकी मंजूरी के मुताबिक ही बँटवारा किया गया था।  जिसमें दादी जी ने यह लिखवाया था कि मैं अपने बडे़ बेटे के साथ ही रहती हूँ।  इसलिए मेरे हिस्से का एक कमरा मेरे बडे् बेटे का होगा। मेरे चारों छोटे बेटो के पास नौकरी है।  परन्तु मेरे सबसे बडे बेटे (पापा जी) किसी नौकरी में न होने के कारण मैं उसे मकान के नीचे दुकान बनाने कि सहमति देती हूँ।  वसीयत के अनुसार उस समय दुकान बनी नहीं थी।  बाद में पापा जी ने बनवाई थी।  वसीयत में केवल दो भाईयों के ही हस्ताक्षर हैं,  एक तो पापा जी और एक सबसे छोटे चाचा।  परन्तुं सहमति सभी कि थी।   क्योंकि उस समय किसी प्रकार का कोई झगडृा नहीं था।  अब सबके बच्चे बडे़ हो गये हैं और मसूरी को छोड्कर देहरादून शिफ्ट होना चाहते हैं।   मेरे परिवार में मेरी तीन बड़ी बहने हैं।   तीनों की शादी हो चुकी है।  घर में केवल मम्मी पापा और मैं ही हूँ।  पापा को ब्रेन हैमरेज होने के कारण स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है।  इसलिए मेरे चाचा डरा कर हमारी दुकान व मकान छीनना चाहते हैं। अब बँटवारा हुए 30-35 साल हो गये हैं,  तब से अब तक सब ठीक चल रहा था परन्तुन अब चाचा धमकी देते हैं।  हमसे जबरन दुकान खाली करवाना चाहते है या बँटवारा दुबारा से करवाने कि बात करते हैँ।  वसीयत के अनुसार पापाजी के हिस्से कि संपत्ति में मम्मी और हमारा (बेटियों) का हक बनता है।  तो क्या हमको डरने कि जरूरत है? यदि वे कानूनी कार्यवाही से हमें डराते हैं तो क्या हम कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं।  क्या किसी तरह से मकान व दुकान मम्मी के नाम हो सकता है, क्योंकि घर के बिजली के बिल व दुकान का लाइसेंस मम्मी् के नाम से है?

-श्वेता शर्मा, देहरादून, उत्तराखंड

समाधान

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 17, जून 1956 से प्रभावी हुआ है।  उस के पहले तक हिन्दू परिवारों और व्यक्तियों की संपत्ति का उत्तराधिकार परंपरागत हिन्दू विधि से शासित होता था।  हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में भी समय समय पर संशोधन हुए हैं, जो पारित होने के बाद की तिथि से ही प्रभावी हुए हैं।  इस कारण से जिस समस्या में हिन्दू उत्तराधिकार का प्रश्न निहीत है उस में यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति का देहान्त किस तिथि को हुआ है।  आप के प्रकरण में दादाजी और दादीजी के देहान्त की तिथियाँ महत्वपूर्ण हैं।  आप के दादा जी का देहान्त कब हुआ? उन्हों ने अपने देहान्त के समय जो संपत्ति छोड़ी वह उन की स्वयं की अर्जित संपत्ति थी अथवा वह उन्हें उन के पिता, दादा या परदादा से प्राप्त हुई थी? ये दोनों ही तथ्य भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इन तथ्यों की जानकारी के बिना उचित सलाह देना संभव नहीं है।

प के दादा जी के देहान्त के समय उन के पास दो तरह की संपत्ति हो सकती है,  एक संपत्ति वह जो उन्हें अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली हो। ऐसी संपत्ति पैतृक संपत्ति होगी और उस में उत्तराधिकारियों के अधिकार अलग होंगे तथा दूसरी वह संपत्ति जो उन्हों ने स्वयं अर्जित की है, उस पर उत्तराधिकार भिन्न होगा।  यदि हम यहाँ मान लें कि आप के दादा  जी द्वारा छोड़ी गई संपत्ति उन की स्वअर्जित थी तो उन के देहान्त के साथ ही वह संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार में प्राप्त हो गई थी।  अर्थात दादा जी के देहान्त के उपरान्त उस संपत्ति के ग्यारह समान भागीदार हो गए।  जिन में से आप के पिता, चाचा, बुआएँ और दादी को प्रत्येक को 1-11 हिस्सा उस संपत्ति में हुआ।  आप की दादी को उक्त संपत्ति में केवल 1/11 अधिकार ही प्राप्त था।  दादी उक्त संपत्ति में अपने 1/11 हिस्से के बारे में ही वसीयत कर सकती थीं। जो बँटवारा न हो पाने के कारण अनिश्चित था।

जिस दस्तावेज का आप ने वसीयत और बँटवारा कह कर उल्लेख किया है उस का पूर्ण रूप से अध्ययन किए बिना यह बता पाना संभव नहीं है कि वह वसीयत है अथवा बँटवारा है। उस दस्तावेज पर आप की दादी और उन के केवल दो पुत्रों के हस्ताक्षर होने से उसे बँटवारा नहीं कहा जा सकता है। यदि वह बँटवारा हो भी तो बँटवारे के बाद सब को अपने हिस्से पर कब्जा प्राप्त न होने से भी उस का कोई प्रभाव नहीं होगा। आप के कथनों से केवल इतना पता लगता है कि दादा जी की संपत्ति में दादी का जो हिस्सा है उसे उस ने आप के पिता को वसीयत किया है और संपत्ति के एक हिस्से पर एक दुकान बनाने की अनुमति आप के पिता को दी गई है। उस में भी आठ हिस्सेदारों (चाचा और बुआओं) की सहमति के हस्ताक्षर उस पर नहीं हैं।

स तरह जो भी संपत्ति है। वर्तमान में उस के ग्यारह हिस्से हैं। आप के पिता का स्वयं का हिस्सा और दादी का हिस्सा मिला कर दो हिस्सों के आप के पिता अधिकारी हैं। शेष नौ हिस्सों पर अन्य भागीदारों का अधिकार है। यदि अब न्यायालय द्वारा बँटवारा होता है तो आप के पिता को अधिक से अधिक 2/11 हिस्सा प्राप्त होगा। यदि शेष नौ हिस्सेदारों में से कोई अन्य अपना हिस्सा आप के पिता को रिलीज डीड द्वारा हस्तांतरित कर दे तो अधिक से अधिक वह आप के पिता को प्राप्त हो सकता है।

जिस संपत्ति पर आप के पिता का कब्जा है उस पर से उन्हें जबरन नहीं हटाया जा सकता है।  यदि उन्हें किसी के द्वारा जबरन संपत्ति के कब्जे से बेदखल करने की संभावना हो तो आप के पिता न्यायालय में स्थाई व्यादेश (निषेधाज्ञा) का वाद प्रस्तुत कर स्वयं को बेदखल करने के विरुद्ध व्यादेश जारी करवा सकते हैं।  जब तक न्यायालय से संपत्ति के बँटवारे और कब्जे के बारे में कोई निर्णय नहीं हो जाता है तब तक वे संपत्ति पर काबिज रह सकते हैं।  हमारी राय में आप के पिता को बँटवारे के लिए कोई वाद प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।  जो बँटवारा चाहता है वह स्वयं ही न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर देगा।  न्यायालय में आप के पिता अपना पक्ष रख सकते हैं।

प के पिता को मसूरी या देहरादून में दीवानी मामलों के किसी अच्छे जानकार वकील को संपत्ति से संबंधित दस्तावेज दिखा कर तथा परिवार के संबंध में पूरी जानकारी दे कर सलाह प्राप्त करनी चाहिए।  उस के उपरान्त ही कोई कदम उठाना चाहिए।

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