Property Archive

समस्या-

गौरव मिश्रा ने ग्राम-मोहान, जिला-कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मने और हमारे बड़े भाई जी ने हमारे बड़े ताऊ जी यानी हमारे पिता जी के बड़े भाई से 12.02.2004 को उनके भूमि के 1/2 भाग यानि उनकी संपूर्ण जमीन का पंजीकृत बैनामा कराया था। जिसका दाख़िल ख़ारिज भी हो चुका था। हमारे ताऊ जी का यानी विक्रेता का सन 2015 में स्वर्गवास हो चुका है, अब विक्रेता (ताऊ जी) की इकलौती विवाहित पुत्री कहती है कि हमारे पिता से बैनामा धोखे से फर्ज़ी तरीके से के करा लिया गया है।  उसने किसी के कहने पर पर हमारे खिलाफ (दीवानी न्यायलय) में बैनामा निरस्त करने के लिए 23.02.2018 को मुकदमा डाल दिया है, यानी बैनामा होने के 14 वर्ष बाद।  हम यह जानकारी चाहते हैं कि बैनामा होने के कितने वर्ष बाद तक बैनामा निरस्त कराने के लिये मुकदमा डाला जा सकता है, और जो हमारा मुकदमा चल रहा है उसे ख़ारिज कैसे करायें, जिससे हमारा समय और पैसे बर्बाद ना हो?

समाधान-

प ने और आप के भाई ने अपने ताऊजी से जमीन खरीद ली, उस के विक्रय पत्र का पंजीयन हो गया। इस पंजीयन के 14 वर्ष बाद ताऊजी की पुत्री ने उस विक्रय को धोखे से, फर्जी तरीके से कराने का आरोप लगाते हुए दीवानी वाद संस्थित किया है। आम तौर पर इस तरह का वाद दस्तावेज के निष्पादन की तिथि अर्थात पंजीयन की तिथि के तीन वर्ष की अवधि के भीतर ही किया जा सकता है, उस के उपरान्त नहीं। उस के उपरान्त ऐसा वाद दाखिल होने पर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण ग्रहण के योग्य ही नहीं रहता है और न्यायालय ऐसे वाद को पंजीकृत करने के पूर्व ही निरस्त कर सकता है। लेकिन आप के मामले में वाद को पंजीकृत भी किया गया है और आप को उस के समन भी प्राप्त हो चुके हैं। इस से स्पष्ट है कि वाद को निर्धारित अवधि में लाने के लिए कुछ न कुछ कथन वाद-पत्र में किए गए होंगे। आप को वे कथन यहाँ अपनी में हमें बताने चाहिए थे। जिस से समाधान करने में हमें सुविधा होती।

ह तो स्पष्ट है कि आप के विरुद्ध विक्रय पत्र के पंजीयन को निरस्त कराने के लिए फ्रॉड/ जालसाजी करने का आधार लिया गया है। इस के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 17 में अलग से उपबंध दिए गए हैं। इस में यह कहा गया है कि यदि जालसाजी या किसी त्रुटि से निर्मित किए गए दस्तावेज को प्रतिवादी ने ही छुपा कर रखा है तो उस मामले में लिमिटेशन तब आरंभ होगी जब कि जालसाजी से निर्मित दस्तावेज की जानकारी वादी को होगी। आप के मामले में वाद प्रस्तुत करने के लिए इसी उपबंध का सहारा लिया गया प्रतीत होता है।

दि आप ने भूमि का क्रय करने के बाद दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं किया है और अपने पास रखा है तो निश्चित रूप से आप के ताऊ की पुत्री को तभी उस की जानकारी हुई होगी जब ताऊ जी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति  को उन की पुत्री ने अपने नाम नामांतरण कराना चाहा होगा और जमीन का रिकार्ड देखा होगा। इस तरह आप के ताऊजी की मृत्यु से तीन वर्ष की अवधि में आप के विरुद्ध वाद फ्रॉड के आधार पर ही लाया जा सकता था।

ब इस वाद का समापन केवल और केवल दोनों पक्षों की साक्ष्य के उपरान्त ही किए गए निर्णय से ही हो सकता है। इस का कोई शॉर्टकट नहीं है। मुकदमा आप को लड़ना होगा। उस की अपील भी लड़नी होगी। तब तक लड़ना होगा जब तक खुद वादिनी थक हार कर घर नहीं बैठ जाती है। इस के सिवा कोई उपाय नहीं है।

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मुकदमों में देरी अदालतों की बहुत कम संख्या के कारण होती है।

December 5, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

संजु देवी ने गांव- ऱानोली, तहसील- खाटुश्यामजी, जिला- सीकर, राजस्थान से पूछा है-,

मैं अपने पिता की सबसे छोटी पुत्री हूँ। मेरे पिता की मौत बचपन में हो चुकी थी। शादी के बाद मैंने पिता की पैतृक संपति में हिस्से का वाद दो साल पहले कर दिया था। लेकिन मेरे भाई ने अभी तक न्यायालय में कोई जवाब नहीं दिया। इस तरह मेरे केस को कमजोर कर दिया गया है? न्यायालय के स्टे के बाद भी मेरी माँ का सम्पूर्ण भूमि से हकत्याग करवा कर अपने नाम पर चढवाने की कोशिश की गई है।  लेकिन मैंने पटवारी को पूरी बात बताकर उस हकत्याग को निरस्त करवाने के लिये एक और वाद दायर किया है, अब मेरी मॉ चल बसी है। क्या मेरे केस का कुछ भविष्य है? स्टे के बाद भी वो लोग मुझे नुकसान पहुँचाने की पूरी कोशिशें कर के मुझे एक तरह से बेदखल करना चाहते हैं। सर मार्गदर्शन देवे।

समाधान-

प की समस्या भारत के तमाम न्यायार्थियों की समस्या है।  हमारे देश में न्यायालयों की बहुत कमी है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 140 से अधिक अदालतें हैं, जब कि भारत में 10 लाख की आबादी पर केवल मात्र 12-13 अदालतें हैं। ऐसी स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका के मुकाबले में हमारी अदालतों पर 10 गुना से भी अधिक मुकदमों के निपटारे का बोझा है। हमारे यहाँ कम अदालतें होने का एक कारण यह है कि हमारी सरकारें अदालतों की संख्या को बढ़ाने पर कोई रुचि नहीं लेतीं क्यों कि वे समझती हैं कि अदालते बढ़ा देने से उनकी पार्टी को अगले चुनाव में मिलने वाले वोटों में कोई इजाफा नहीं होने वाला है। वे सारे फण्डस को इस तरह उपयोग में लेते हैं जिस से वे अगले चुनाव में वोट प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल कर सकें।

दालतें इन मुकदमों को निपटाने के लिए कोशिश भी करती है। अधिक मुकदमे होने और पुराने मुकदमों की भरमार होने के कारण नए मुकदमों में जरा जरा सी बात के लिए पेशी की तारीख बदल दी जाती है। इस वर्ष उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने सभी अधीनस्थ न्यायालयों को निर्देश दिए हैं कि वे साल के अंत तक 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों का निपटारा कर दें। इस के बावजूद बहुत सी अदालतें ऐसी हैं जहाँ 20 वर्षे से अधिक पुराने मुकदमो का निपटारा भी नहीं हो सकेगा।

प के मामले में हो सकता है कि आपके भाइयों ने अदालत के सम्मन लेने में ही देरी की हो। इस कारण कुछ पेशियाँ हो गयी हों वर्ना अब यह नियम है कि प्रतिवादी की तामील होने के 90 दिनों के भीतर उसे अनिवार्य रूप से जवाब दावा पेश करना होगा। यदि 90 दिनों के भीतर जवाब दावा पेश न हुआ हो तो आप अदालत पर दबाव बनाएं कि वह प्रतिवादीगण के जवाब के अवसर को समाप्त करते हुए आगे की कार्यवाही करे।

प सोच रही हैं कि देरी करने से आप का मुकदमा कमजोर हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है। बस आप यह ध्यान रखें कि आप का वकील अच्छा हो और पैरवी में किसी तरह की कमजोरी या भूल न हो। यह आप की स्वयं की मुस्तैदी से ही संभव है। नतीजें में देरी हो सकती है लेकिन  नतीजा आप के पक्ष में आएगा।

हाँ तक पूरी न्याय व्यवस्था को गति प्रदान करने की बात है तो उस के लिए जरूरी है कि जनता का दबाव भी राजनेताओँ और राज्य सरकार पर होना चाहिए। अभी अवय्स्क बालिकाओं के प्रति यौन अपराधों के मामले में दबाव था तो सरकारों को इस तरह की नयी अदालतें बड़ी संख्या में खोलनी पड़ीं हैं। इस से उस तरह के अपराधों में साल-छह माह में ही फैसले आने लगेंगे। इसी तरह का दबाव समूची न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पड़े तो बात बन सकती है, पर वह पूरे देश के स्तर का मसला है।

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समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मारे दादा जी ने ज़मीन खरीदी उस वक़्त के उनके हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी रजिस्ट्रार ऑफिस में किए थे। लेकिन जब हम ने इस के बारे मे हमारे भाइयों से पूछा तो उन्होने कहा कि ये ज़मीन हमारे दादा जी ने उनको बेच दी थी। फिर जब हम ने बेचान की रजिस्ट्री की कॉपी निकलवाई तो पता चला कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री में उन के सिग्नेचर हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी मैच नहीं करते हैं। इस की हम ने एफएसएल जाँच भी करवायी है. एफएसएल की रिपोर्ट में भी ये मैच नहीं हुए हैं। कृपया हम को बताएँ कि हम क्या कर सकते हैं।

समाधान-

किसी भी मामले में कानूनी सलाह लेते समय यह आवश्यक है कि जिस विधि विशेषज्ञ से आप सलाह ले रहे हैं उस के समक्ष सभी तथ्य रखे जाएँ। आपने आपके इस मामले में दादाजी द्वारा जमीन खरीदे जाने के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि तथा फिर दादाजी द्वारा भाइयों के नाम किए गए विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि नहीं बताई है। एफएसएल की रिपोर्ट कब आई है इस की तिथि भी नहीं बताई है। हर उपाय प्राप्त करने के लिए न्यायालय के ममक्ष कार्यवाही करे की एक निश्चित समयावधि होती है और कोई भी उपाय केवल सही समय पर नहीं करने के कारण असफल हो सकता है।

हली बात आप को यह देखनी चाहिए कि जब आप के दादा जी ने जमीन खरीदी थी तब रजिस्ट्री पर उन के हस्ताक्षर हुए थे क्या? यदि उन के हस्ताक्षर उस रजिस्ट्री पर हुए थे तो बेचान की रजिस्ट्री पर हुए उन के हस्ताक्षर पूर्व के हस्ताक्षरों से मिलने चाहिए थे और साथ ही अंगूठा निशानी भी मेल खानी चाहिए थी। इस का एक ही अर्थ हो सकता है कि भाइयों ने किसी अन्य व्यक्ति को आपके दादाजी बना कर रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली हो। यदि इस की जरा सी भी संभावना है तो यह गंभीर अपराध है क्यों कि इस में फर्जी दस्तावेज का निर्माण कर के छल हुआ है। इस में अनेक अपराध एक साथ हुए हैं।आप इस की रिपोर्ट पुलिस को करवा सकते हैं और पुलिस के कार्यवाही न करने पर परिवाद प्रस्तुत कर सीधे न्यायालय को कह सकते हैं कि इस मामले को दर्ज कर पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाए।

दि आप को पक्का है कि जो रजिस्ट्री आपके दादा की ओर से भाइयों के नाम हुई है वह फर्जी है और उस में छल हुआ है तो आप इसी आधार पर उस कूटरचित रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं और जमीन का बंटवारा करा कर अपने हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिए जाने के लिए राजस्व न्यायालय में विभाजन का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

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समस्या-

इन्‍द्र कुमार कंचनवार ने ग्राम बरघाट, ‍जिला सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता की दो पत्नियां थी।  एक पत्नी से 1 संतान। पहली पत्नू की मृत्‍यु के बाद मेरी माता जी से विवाह हुआ जिन से 2 बेटी एवं 2 बेटे हुए। मेरी सौतेली बहन को उसका हिस्‍सा 1974 में जब मेरा जन्‍म भी नहीं हुआ था, त‍ब उसे दे ‍दिया गया था ‍किन्‍तु उसे ‍बिक्री पत्र के माध्‍यम से ‍हिस्‍सा दिया गया। चूंकि मेरे पिता जी अनपढ थे, उन्‍हे लोगों न जबरन बहका दिया कि कहीं उस सौतेली संतान से तुम्‍हारा पुत्र वापस न जमीन ले ले इसलिए उसे रजिस्‍टरी कर के दे दो, ताकि वह वापस न ले सके। इसके बाद बहुत सालों तक अच्‍छा चल रहा था। ‍किन्‍तु बाद में हमारी सौतेली बहन से न बन पाने के कारण, वह अपना ‍हिस्‍सा लेना चाह रही है। ‍किन्‍तु मेरी ‍पिता जी ने अपने जीते हुए बाकी बची हुए जमीन को सन 1987 में हम दो भाईयों को आपसी बटवारा नामा के नाम से रजिस्‍टर्ड करवा के बटवारा कर ‍दिया गया है। क्‍या वह ‍हिस्‍सा ले सकती है। उसका नाम ‍रिकार्ड में कभी भी नहीं रहा है और न ही है कृपया समस्‍या का हल बताने का कष्‍ट करें।

समाधान-

पनी संपत्ति का जो हिस्सा आप के पिता ने आप की सौतेली बहिन को स्थानांतरित किया उसे आप हिस्सा कह रहे हैं, अपनी सुविधा से क्यों कि लिखित में तो वह बिक्री-पत्र है। आप की सौतेली बहिन उसे गिफ्ट भी कह सकती है। इस तरह तो विवाद सुलझने से रहा।

प के पिता की यह संपत्ति स्वअर्जित है तो फिर जो उन्हों ने रजिस्टर्ड बंटवारा नामा किया है वह अंतिम है। इस बंटवारे के कारण पिता की मृत्यु के समय आप के पिता के नाम कोई संपत्ति शेष रही नहीं थी तो आप की बहिन किस में हिस्सा मांगेगी?  किसी की मृत्यु के समय कोई संपत्ति या ऋण न हो तो उसका उत्तराधिकार भी नहीं हो सकता।आप की बहिन केवल आप को धमका सकती है, दिखाने को शिकायत मुकदमा कर सकती है पर उसे मिलेगा कुछ भी नहीं।

लेकिन यदि आप के पिता की संपत्ति पुश्तैनी-सहदायिक है अर्थात वह 17 जून 1956 के पहले किसी पूर्वज से आप के पिता या उन के पूर्वज को उत्तराधिकार में मिली थी तो स्थिति कुछ विकट हो सकती है। वैसी स्थिति में उस संपत्ति में से आप के पिता बेटी को केवल अपने हिस्से के बराबर ही हस्तांतरित कर सकते थे उस से अधिक नहीं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह हस्तांतरण कब किया गया था। आप  की सौतेली बहिन यदि हिस्से का दावा करती है तो उसे पूर्व में हस्तांतरित संपत्ति का प्रश्न भी उठेगा क्यों कि हिस्से का दावा तो तभी किया जा सकता है जब कि वह पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो। हमें नहीं लगता कि आप की सौतेली बहिन अब कोई हिस्सा ले सकती है। हाँ दावे के बहाने आप से अदलतों में कसरत जरूर करवा सकती है। जब वह दावा करें तब किसी अच्छे वकील से सलाह लीजिएगा।

में लगता है कि आप की सौतेली बहिन आप के व्यवहार से नाराज है। हो सकता है कभी किसी शादी ब्याह में उसे पर्याप्त मान न मिला हो।  बहिनें मान मनौवल से मान जाती हैं। तो उसे मान दीजिए, पिछली गलती के लिए माफी मांग लें। उसी से आप का काम बन जाएगा।

समस्या-

नितिका चौहान ने ग्राम खेडली, पोस्ट भद्रबाद, जिला हरिद्वार, उत्तराखंड से पूछा है-

मेरा जन्म 1992 में हुआ था। मेरे मेरे दादाजी के दो पुत्र मेरे ताऊजी आदित्य कुमार और मेरे पिताजी रविंद्र कुमार थे। मैं रविंद्र कुमार जी की इकलौती संतान हूँ। मेरे पिताजी रविंद्र कुमार जी का देहांत 1994 में हो गया था।  उसके पश्चात मेरे दादा जी का देहांत 2011 में हो गया। मेरे दादाजी के बैंक खाते में जो धनराशि थी, मेरे दादाजी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी ने उसको निकाल लिया और उसमें मुझे कोई हिस्सा नहीं दिया। मुझे बैंक जाकर पता चला कि मेरे ताऊजी ने परिवार रजिस्टर की जो नकल वहां लगाई थी उसमें मेरे ताऊजी ने मुझे अपनी पुत्री दर्शाते हुए बैंक खाते से धनराशि प्राप्त कर ली है।  मैं जानना चाहती हूं कि क्या उस धनराशि पर मेरा भी उतना ही हक था, जितना कि मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी का था।

समाधान-

बिलकुल आप ने सही कहा। उस धनराशि पर आप का उतना ही अधिकार था जितना की आप के ताउजी को था। किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत तय होता है। धारा 8 में सब से पहले उन लोगों का बराबर का अधिकार होता है जो अधिनियम की अनुसूची की प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हों। उस में पुत्र और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र-पुत्री एक साथ रखे गए हैं। क्यों कि आप अपने पिता की इकलौती संतान हैं तो आप का अपने दादाजी की संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि आप के ताऊजी को है।

बैंक किसी भी प्रकार से आप के ताऊ जी को यह धन नहीं देता और उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की मांग करता। लेकिन आप के ताऊजी ने आप को अपनी पुत्री बता दिया। जीवित पुत्र की पुत्री तो प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी नहीं है इस कारण बैंक ने वह धन आप के ताऊजी को दे दिया।

लेकिन इस तरह गलत सूचना दे कर बैंक से धन प्राप्त करना धारा 402 भारतीय दंड संहिता व अन्य कुछ धाराओं के अंतर्गत अत्यन्त गंभीर अपराध है। यदि आप पुलिस में रिपोर्ट करें या पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद करें और आप के ताऊजी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित हो तो उन्हें हर हाल में कारावास की सजा हो जाएगी।

स के अतिरिक्त आप जितना धन आप के ताऊजी ने बैंक से प्राप्त किया है उस के आधे धन और वह धन प्राप्त करने से लेकर उस की अदायगी तक के ब्याज प्राप्त करने के लिए आप दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

समस्या-

हरगोबिंद सिंह ने ग्राम पो. मालारामपुरा, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से पूछा है-

त्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने किसी महिला से शादी कर ली, तो इस पुरुष की मौत के बाद इस दूसरी जीवित पत्नी का जमीन-संपत्ति पर क्या हक होगा? मृत पुरुष के दोनों पत्नियों से दो-दो बच्चे इसी पुरूष की संतान हैं।

समाधान-

पुरुष ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह किया है इस तरह दूसरी पत्नी उस की उसी तरह वैध पत्नी है जैसे पहली पत्नी वैध थी। इस कारण इस दूसरी पत्नी को वही अधिकार प्राप्त होंगे जो अधिकार पहली पत्नी को उस के पति के मरने के बाद हासिल होते।

इस पुरुष की दो  संतानें पहली पत्नी से और दो ही संतानें दूसरी पत्नी से हैं। इस कारण से उस की चारों ही सन्ताने भी वैध संतानें हैं। दूसरी पत्नी से उत्पन्न होने वाली संतानों को भी उसी तरह अधिकार प्राप्त होंगे जैसे पुरुष की पहली पत्नी से मृत्यु नहीं हुई थी और बाद वाली दोनों संतानों का जन्म भी पहली पत्नी से ही हुआ है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से मृत हिन्दू पुरुष का उत्तराधिकार तय होगा। यदि खेती की जमीन है तो उस का उत्तराधिकार भी धारा 8 से ही तय होगा। इस धारा के अनुसार माता (यदि जीवित हो तो), पत्नी और सभी सन्तानों को बराबर उत्तराधिकार प्राप्त होगा। आप के मामले में लगता है कि माता जीवित नहीं है। वैसी स्थिति में प्रथम श्रेणी के पाँच उत्तराधिकारी हैं। चारों संतानें और पत्नी। पाँचों में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। खेती की जमीन में मृत्यु के कारण खुलने वाले नामान्तरण (फौती इन्तकाल) में पाँचों के नाम 1/5 हिस्सा दर्ज होगा। शेष अचल संपत्ति में भी पाँचो को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

समस्या-

भागलपुर, बिहार से अभिषेक शर्मा ने पूछा है-

मारा पुश्तैनी मकान है और मेरे पिताजी हमें अपने मकान में जाने नहीं देते हैं, इसलिए हम 10 बरसों से बाहर रह रहे हैं। जब मैं अपने पिताजी से अपना हक़ हिस्सा माँगने के लिए गया तो मेरे पिताजी ने एक स्टाम्प पेपर बनवा के रखा था,जिस पर लिखा था कि मैं अपनी मर्ज़ी से प्रॉपर्टी कुछ पैसे के लिए पिता के ना कर रहा हूँ और उन्होने हस्ताक्षर करवा कर मुझे बेदखल कर दिया। क्या मैं अपनी प्रॉपर्टी वापस ले सकता हूँ, उनके उपर 420 का केस कर सकता हूँ। मेरे पिताजी ने सिग्नेचर प्रेशर डाल कर के मुझसे ज़बरदस्ती करवाया है, इस घटना को एक साल हो गया। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, अब अपना हिस्सा कैसे ले सकते हैं?

समाधान-

भिषेक जी, आप के पिता ने आप से एक वर्ष पूर्व दबाव डाल कर जबरन आप से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवा लिए। इस दस्तावेज में मकान में अपना हिस्सा पैसा ले कर छोड़ने की बात लिखा जाना आप बताते हैं। लेकिन आपने यह नहीं बताया कि कितना पैसा लेना लिखा है? आप पिता के विरुद्ध 420 का केस करने की इच्छा रखते हैं, पर इस में 420 जैसा क्या है? फिर आप उस की शिकायत एक साल बाद कैसे कर सकते हैं? इस तरह की शिकायत इतने दिन बाद करने का आधार क्या है? इस कारण धारा 420 या किसी अन्य अपराधिक मामले की रिपोर्ट करना तो इस मामले में बिलकुल असंभव है। आप करेंगे तो भी उस का कोई नतीजा नहीं निकलेगा।

यदि आप की संपत्ति पुश्तैनी है और उस में आप का भी हिस्सा है इस बात की पुष्टि इस बात से होती है कि आप के पिता ने स्टाम्प पर लिखवा कर वह हिस्सा छुड़वाने की कोशिश की है।

किसी भी पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में बच्चे का जन्म से ही अधिकार होता है। आप का भी उस संपत्ति में जन्म से अधिकार है और आप का हिस्सा उस संपत्ति में है। यह हिस्सा रजिस्ट्रार के कार्यालय में विक्रय पत्र या रिलीज डीज निष्पादित कर उस का पंजीयन कराए बिना पिता के हक में चला जाना संभव नहीं है। आप के पिता द्वारा स्टाम्प पर लिखा लिए जाने के बावजूद भी आप का हिस्सा आप का ही है। अब आप का हिस्सा प्राप्त करने के लिए आप अपने पिता के विरुद्ध बंटवारे का दावा दीवानी न्यायालय में कर सकते हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप आप के क्षेत्र के जिला न्यायालय में जा कर किसी अच्छे दीवानी वकील से मिलें और विभाजन का वाद पेश करवाएँ। इसी तरीके से आप पुश्तैनी जायदाद में हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

अर्पण कुमार जैन ने सिद्धेकेला, जिला बोलानगीर, उड़ीसा से पूछा है-

रीब पचास साल पहले मेरे पापा ने एक जमीन खरीदी थी, पेपर में हाथ से लिखवा क़े। पर उस जमीन मेरे पापा के चाचा के लड़के ने अपने नाम पर करवा लिया।  पर उस जमीन पर हम ही इस्तेमाल करते हैं। अभी हम घर तोड़ के नया घर बना रहे हैं। तो हो नाम भी नहीं करने दे रहे और जमीन के भी एक हिस्सा मांग रहे है।

समाधान-

प की समस्या बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है। बस यह समझ आ रहा है कि आप के पिता ने किसी से एक जमीन खरीदी जिस का एग्रीमेंट किसी कागज पर हाथ से लिखा गया। उस जमीन पर मकान बना कर आप का परिवार निवास करता है। आप के पिता के चाचा के लड़के ने उस जमीन को अपने नाम करा लिया है। यह स्पष्ट नहीं किया है कि उस ने अपने नाम कैसे कराया है? किस रिकार्ड में वह जमीन पिता के चाचा के लड़के के नाम हुई है। जिस के कारण वह नया घर बनाने में अड़चन पैदा कर रहा है और जमीन का एक हिस्सा मांग रहा है।

आप के पिता ने एक हाथ से लिखे एग्रीमेंट के अंतर्गत जमीन खरीदी और उस का कब्जा ले लिया और मकान बना कर उस पर निवास कर रहे हैं।  किसी भी स्थायी संपत्ति जिस में मकान जमीन वगैरा शामिल हैं  उस का मूल्य 100 रुपए या उस से अधिक है तो उस संपत्ति के विक्रय का पंजीकरण होना आवश्यक है। आपने जो विवरण दिया है उस से लगता है कि आप के पिता ने उस का पंजीयन नहीं कराया था।

संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 53 ए में यह प्रावधान है कि किसी संविदा के अंतर्गत विक्रय की गयी संपत्ति का कब्जा यदि क्रेता को दे दिया गया है तो यह संविदा का आंशिक पालन है और ऐसा आंशिक पालन हो जाने के उपरान्त यदि पंजीयन न भी हो तो उस संपत्ति का कब्जा क्रेता से वापस नहीं लिया जा सकता है। हम इस तरह की समस्या का उत्तर पहले भी एक समस्या (संपत्ति अंतरण की किसी लिखत के अनुसार कब्जा दे दिए जाने पर किसी तरह वापस नहीं लिया जा सकता।) में दे चुके हैं।

आप के मामले में भी यही स्थिति है। इस तरह आप के या आप के पिता के पास जो संपत्ति है उस का कब्जा आप से या आप के पिता से कोई नहीं ले सकता। पिता के चाचा का लड़का यदि मकान को तुड़ा कर बनाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है तो आप के पिता या आप उस समय जमीन खरीद की कागज पर लिखत के आधार दीवानी न्यायालय में वाद संस्थित के कह सकते हैं कि जमीन आप के पिता ने इस लिखत से खऱीदी थी और उस पर मकान बना कर आप 50 वर्ष से निवास कर रहे हैं। इस तरह आप उस जमीन पर बहैसियत स्वामी काबिज हैं। इस मकान को तुड़ा कर दूसरा बनाना चाहते हैं ओर प्रतिवादी ( पिता के चाचा का लड़का) इस में बाधा बनता है और जमीन में हिस्सा मांगता है। उसे आप की जमीन पर दखल से रोका जाए और आदेश दिया जाए कि वह आप के मकान को तुड़ा कर नया बनाने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करे। इसी वाद में आप इस तरह के दखल के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त कर सकते है। बेहतर है कि आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे दीवानी मुकदमे लड़ने वाले वकील से मिलें और उस से परामर्श कर के यह वाद संस्थित करें। अस्थई निषेधाज्ञा प्राप्त होने के बाद आप जमीन पर बना मकान तोड़ कर नया बना सकते हैं।

सहदायिक संपत्ति कभी अपना चरित्र नहीं खोती।

November 20, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

दीपक शर्मा ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-  

मेरे दादा जी तीन भाई थे तीनो भाइयों का मौखिक बंटवारा हुआ था और सम्पति के अलग अलग भाग पर अपना अपना कब्जा था, परंतु कोई रजिस्टर्ड बंटवारा नहीं हुआ था।, उन में से एक भाई व उन की पत्नी का 1961 में बिना औलाद स्वर्गवास हो गया। मेरे दादा जी से पिता जी (पिता जी का जन्म 1938) को एक सम्पति मिली दादा जी का स्वर्गवास 1966 में हो गया, उस के बाद मेरा जन्म 1969 में हुआ। हम दो भाई हैं, दूसरा भाई 5 साल छोटा है, दादी का स्वर्गवास 1985 में हुआ था, माँ का भी स्वर्गवास 2005 में हो गया।  मेरे पिता जी के एक भाई व एक बहन हैं, पर मेरे पिता जी ने अपने भाई व बहन को भी कुछ भी नही दिया। अब पिताजी मुझे भी कुछ भी नही देना चाहते। छोटा भाई व पिताजी मिलकर ये सम्पति किसी को बेचकर या गिफ्ट दिखाकर रुपये लेना चाहते हैं। अभी पूरी सम्पति किराये पर दे रखी हैं, किराया पिताजी ही लेते हैं ,पिता जी का ही कब्जा है।  पिता जी के भाई व पिता जी की बहन इस मामले से दूर रहना चाहते हैं। क्या मेरे दादा जी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले होने की वजह से मेंरा इस सम्पति में कोई अधिकार नही होगा? परंतु मेरे जन्म के वक्त दादी तो थी। क्या में न्यायालय में केस कर सकता हूं और कौन से सक्शन के तहत में केस करु?

समाधान-

प के दादाजी तीन भाई थे उन में किसी संपत्ति का मौखिक बँटवारा हुआ, अर्थात वह संपत्ति संयुक्त थी और संभवतः वह उन्हें उन के पिता से प्राप्त हुई थी। यदि दादाजी के पिता जी का देहान्त 1956 के पहले हो चुका था तो इस तरह तीनों भाइयों को प्राप्त संपत्ति पुश्तैनी और सहदायिक थी।  एक बार जो संपत्ति सहदायिक हो जाती है वह अपनाा सहदायिक होने का तब तक कभी अपना चरित्र नहीं खोती जब तक कि वह किसी अन्य व्यक्ति को उत्तराधिकार के अतिरिक्त किसी अन्य विधि से हस्तान्तरित न हो जाए।

 

स तरह आप के दादाजी व उन के भाइयों को उस में जन्म से अधिकार प्राप्त था। तीन में से एक भाई का स्वर्गवास बिना वारिस हो गया। उन की संपत्ति भी दोनों भाइयों को मिल गयी होगी या उस का क्या हुआ आप बेहतर जानते हैं। आप के पिता को दादाजी से कुछ संपत्ति मिली यदि पिताजी को मिली हुई संपत्ति उसी संपत्ति का एक भाग है जो कि उन के दादा जी को उन के पिता से मिली थी तो पिता के पास जो भी संपत्ति है उस में आप का भी जन्म से हिस्सा है।

 

ब आप का कहना है कि वह संपत्ति  आप के पिताजी ने किराए पर दे रखी है और किराया खुद प्राप्त करते हैं, और वे उसी संपत्ति को बेच कर या गिफ्ट कर के रुपए प्राप्त करना चाहते हैं और आप को कुछ नहीं देना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो आप तुरन्त जिस जिले में संपत्ति मौजूद है उस जिले के जिला न्यायाधीश के न्यायालय में संपत्ति के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।  इस वाद के साथ ही आप एक अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र भी उसी न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप आदेश प्राप्त कर सकते हैं कि बंटवारा हो जाने तक आप के पिता इस संपत्ति को विक्रय, दान या किसी अन्य प्रकार से हस्तान्तरित नहीं करें। इसी वाद में आप रिसीवर नियुक्त करने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं जो संपत्ति से होने वाली आय को अपने पास रखे और बाद में न्यायालय के आदेश के अनुसार उस के हिस्से उस संपत्ति के सभी स्वामियों को उन के हिस्से के अनुपात में दिए जा सकें। आप को इस मामले में अपने यहाँ के किसी अनुभवी दीवानी मामलों के वकील से परामर्श करना चाहिए और उसकी सहायता से यह वाद संस्थित करना चाहिए।

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