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नाना की संपत्ति में उत्तराधिकार

February 16, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार गुप्ता ने बिरसिंगपुर पाली, जिला उमरिअ, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मेरे नाना की दो संतानें थीं। एक पुत्र एवं एक पुत्री। मेरे नाना की मृत्त्यु 1960 के लगभग हो गई और मेरी माँ की मृत्त्यु 1970 में हो गई। मेरे नाना का जमीन 9 एकड़ है जो कि 1958-59 के रिकार्ड पर मेरे मामा का नाम है। मेरे मामा की मृत्त्यु 2000 के आसपास हुई है। वर्तमान में जमीन मेरे मामा के लड़के एवं बहन के नाम पर है। क्या मुझे मेरे माँ का हिस्सा मिल सकता है।

समाधान-

आप के नाना की जो भी भूमि थी वह या तो पुश्तैनी अर्थात सहदायिक संपत्ति रही होगी अथवा स्वअर्जित रही होगी। यदि वह स्वअर्जित थी तो उस में आप की माताजी का उतना ही अधिकार था जितना कि आप के मामाजी का था।

यदि वह सहदायिक संपत्ति भी रही हो तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 जिसे अब 2005 के संशोधन से निरसित कर दिया गया है में यह उपबंध था कि यदि किसी हिन्दू मिताक्षर सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का कोई हिस्सा हो तो उस का दाय उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यदि ऐसे पुरुष की अधिनियम की अनुसूची के प्रथम खंड में वर्णित कोई स्त्री संबंधी अथवा कोई ऐसा पुरुष संबंधी जीवित हो एसी स्त्री के माध्यम से दावा करता हो तो ऐसे मृत पुरुष का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से शासित होगा। इस तरह संपत्ति सहदायिक होने पर भी आप की माताजी का उस संपत्ति में उतना ही अधिकार था जितना आप के मामा जी का।

यदि राजस्व रिकार्ड में नाना जी के देहान्त के उपरान्त भूमि का नामान्तरण मामाजी के नाम और अब मामाजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संतानों के नाम हो गया है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। स्वयं मध्यप्रदेश उच्चन्यायालय का निर्णय है कि नामान्तरण से संपत्ति में अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं होता। इस तरह आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद संस्थित कर अपने हिस्से पर पृथक कब्जे की राहत की मांग कर सकते हैं।

आप के इस मामले में एक ही बाधा हो सकती है वह यह कि कहीं आपकी माताजी से आप के मामाजी ने उन का हक छोड़ने का आग्रह किया हो और आप की माताजी ने स्वयं स्वैच्छा से अपना हक छोड़ दिया हो। वैसी स्थिति में आप का इस संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं होगा। इस तथ्य का पता रिकार्ड देख कर लगाया जा सकता है या फिर आप दावा करें तो मामा की संतानें अपने प्रतिवाद में यह कह सकती हैं और साबित कर सकती हैं।

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समस्या-

संतपाल वर्मा ने मखदुमपुर, गोमती नगर विस्तार, लखनऊ से पूछा है-

हमारे पिताजी से किसी व्यक्ति (क) ने धोखे से पॉवर ऑफ अटॉर्नी वर्ष 1994 में करवा ली। और उसने वर्ष 1995 में तीसरे व्यक्ति के नाम विक्रय करने का एग्रीमेंट (बिना रजिस्ट्री के) निष्पादित कर दिया। जब हमारे पिताजी को इस मामले का पता चला तो उन्होंने वर्ष 1998 में पॉवर ऑफ अटॉर्नी निरस्त करवा दी। अब उन्होंने उसी निरस्त पॉवर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर 2018 में रजिस्ट्रार विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी रजिस्ट्री करवा ली। हमने यह शिकायत पुलिस थाना में की पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है, कृपया हमें बताए हम अब क्या करें।

समाधान-

आप के पिताजी को चाहिए कि वे जिस उप पंजीयक ने यह विक्रय पत्र पंजीकृत किया है उस के उप महानिरीक्षक पंजीयन को आवेदन दें कि उक्त विक्रय पत्र निरस्त पॉवर ऑफ अटॉर्नी के माध्यम से कराई गयी है इस कारण उसे निरस्त किया जाए।

आप के पिताजी को यह भी करना चाहिए कि पुलिस ने जिस शिकायत पर कार्यवाही नहीं की है उस शिकायत को पूरा लिखते हुए एस पी को एक आवेदन रजि. ए.डी. डाक से भेज दें। उसी दिन या एक दो दिनों में संभव हो तो एस.पी. से मिल कर भी सारी बात उन्हें बताएँ। फिर भी एस.पी. कार्यवाही न करे तो न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वयं परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156(3) में संबंधित पुलिस थाने को अन्वेषण के लिए भिजवाएँ।

आप के पिताजी को तीसरा और अंतिम काम यह करना चाहिए कि पंजीकृत विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी अदालत में वाद प्रस्तुत करें और उसे निरस्त घोषित करने की डिक्री प्राप्त करें।

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भांजे को अपने नाना की संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

February 9, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

अजय कुमार ने ग्राम बासमतिया, जिला अररिया, बिहार से पूछा है-

पापा मम्मी की मृत्यु 1990 के पहले हो चुकी है। अब मेरी बहिन का पुत्र (भांजा) संपत्ति में हिस्सा मांगता है, जब कि उसकी मां-मेरी बहिन की मृत्यु हो चुकी है।

समाधान-

आप के पापा मम्मी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति आप भाई बहिन को समान रूप से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। इससे यह संपत्ति संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति हो गयी जिस में आप और आप की बहिन सम्मिलित हैं।

जब आप की बहिन की मृत्यु हो गयी तो उस का इस संपत्ति में जो हिस्सा है उस की संतानों को प्राप्त हो गया। इस तरह आप की बहिन के स्थान पर उस की संतानें संयुक्त हिन्दू परिवार का हिस्सा हो कर उस संयुक्त संपत्ति के स्वामी हो गए।

इस तरह आप की बहिन के पुत्र, आप के भांजे का इस संपत्ति में हिस्सा है, वह सही अपना हिस्सा मांग रहा है जो आप को देना पड़ेगा। नहीं देंगे तो वह विभाजन का वाद संस्थित कर के प्राप्त कर सकता है।

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समस्या-

श्रीमती तबस्सुम रिज़वी ने बाटला हाउस, जामिया नगर, नई दिल्ली से पूछा है-

मेरी शादी 1996 में हुई थी, मेरे चार भाई, और हम दो बहने हैं। मेरे पिताजी का एक मकान 200 गज़ का यहीं कालिन्दी कुंज, नई दिल्ली में है। मेरे पिता मुझे मेरी शादी में कुछ भी समान नहीं दे पाए थे जिसका उन्हें हमेशा दुख रहता था। जिसका ज़िक्र वो बार बार मेरे भाइयों और मेरी मां के सामने करते हुए कहते थे, जिस दिन मैं इस मकान को बेचूँगा या लड़कों को हिस्सा दूँगा तो अपनी बेटी को भी बराबर का हिस्सा दूँगा। साल 2017 मैं हार्ट अटॅक की वजह से मेरे पिता की मौत हो गयी। जिसके बाद मेरे चारों भाइयों ने हम बहनों की अपने पर्मनेंट अड्रेस ग्राम लोहिया तहसील सारधना मीरूत और शाहीन बाघ न्यू देल्ही के घर मैं हमारी मां से मिलने या जाने के लिए एंट्री बंद कर दी और मेरे भाई मेरी मां को भी मेरे पास मिलने नहीं आने देते। मैं अब किस तरह अपने घर में से कितने हिस्से के मालिकाना हक़ ले सकती हूँ या मुझे मेरा हिस्सा मुस्लिम लॉ के हिसाब से कितना मिलना चाहिए।

समाधान-

आप के भाई आपको हिस्सा नहीं देना चाहते इस लिए आप की एन्ट्री उन्हों ने अपने घर में बंद कर दी है। कहीँ आप से मिल कर आप की माँ भी अलग हिस्सा न मांग ले इस कारण वे माँ को भी आप से नहीं मिलने देते हैं।

मुस्लिम लॉ के मुताबिक यदि आप के बताए लोगों के सिवा आप के पिता का कोई अन्य वारिस नहीं है तो जो भी जायदाद आप के पिता ने छोड़ी है उस में आप की माँ का 1/8 हिस्सा है। उस के बाद जो भी बचेगा उस में से दस हिस्से होंगे। एक एक हिस्सा आप बहनों के हक का है और दो दो हिस्से आप के भाइयों के हिस्से के हैं।

आप को चाहिए कि जिस क्षेत्र में आप के पिता की संपत्ति स्थित है उस क्षेत्र के जिला न्यायालय के समक्ष आप बंटवारे का वाद संस्थित करें और बंटवारा करते हुए अपने हिस्से पर अलग से कब्जा दिलाने की प्रार्थना करें। इस के साथ ही अस्थायी निषेधाज्ञा का एक आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त यह आदेश पारित करने की प्रार्थना करें कि बंटवारे के दावे का निर्णय होने तक आप के भाई उस जायदाद को किसी को हस्तान्तरित न करें उस का कब्जा किसी अन्य को हस्तान्तरित न करें।

समस्या-

सुजीत कुमार ने पटौर लाला टोला, पूर्व चम्पारन, मोतीहारी, बिहार से पूछा है-

समाधान-

कोई भी जो संपत्ति का पूर्ण स्वामी नहीं है वह किसी संपत्ति के केवल उस हिस्से को गिरवी या बंधक रख सकता है जिस पर उस का स्वामित्व है, न कि पूरी संपत्ति को। यदि संपत्ति उस के कब्जें में हो तो वह गिरवी रखने पर संपत्ति का कब्जा जरूर दूसरे को दे सकता है।

गिरवी अथवा बंधक कई प्रकार है होते हैं। आपने नहीं बताया कि बंधक किस प्रकार का है। उसमें गिरवी रखने वाले ने आपको प्लाट का कब्जा भी सौंप दिया है अथवा नहीं। यदि उसने कब्जा सौंप दिया है तो आप लाभ में हैं।

अब आप के पास प्लाट का कब्जा है और आप उस प्लाट के हिस्सेदार भी हैं। यदि वह आप को आप की धनराशि चुका कर कब्जा वापस लेना चाहता है तो आप उसे कह सकते हैं कि वह आपसी समझदारी से बंटवारा करा ले और अपने हिस्से का कब्जा ले ले, क्यों कि इस प्लाट में भी उस का केवल हिस्सा है। यदि वह मना करे तो उसे कहें कि वह अदालत में अपने अधिकार के लिए दावा करे।

समस्या-

हरिओउम् ने झाँसी, उत्तर प्रदेश से पूझा है-

मेरी माता जी की निर्वसीयती सम्पत्ति में मेरे पिता ने नगर पंचायत में खुद को वारिस दर्ज करवा रखा है। मेरे पिता अब किसी दूसरी महिला के साथ रहते हैं।  मुझे डर है कि पिता वह सम्पत्ति उक्त महिला को हस्तांतरित न कर दें। नगर पालिका का कहना है कि एक बार जो नाम दर्ज हो गया तो हो गया, अब तुम्हारा नाम दर्ज नहीं किया जा सकता है। बगैर कोर्ट में जाये माता जी की सम्पत्ति में उत्तराधिकार दर्ज कैसे कराया जा सकता है?

समाधान-

नगर पालिका संपत्ति का जो रिकार्ड रखती है उसमें वह नामान्तरण दर्ज करती है। लेकिन कानूनन नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं होता है। फिर भी नामान्तरण एक बार कर दिया जाए तो केवल नामान्तरण आदेश की अपील कर के अपीलीय अधिकारी के आदेश से ही परिवर्तित कराया जा सकता है। यदि नामान्तरण में परिवर्तन करा भी लिया जाए तो भी आप की समस्या बनी रहेगी।  आप के पिताजी फिर भी उस संपत्ति को किसी अन्य को विक्रय पत्र, दानपत्र या अन्य किसी प्रकार का हस्तान्तरण विलेख पंजीकृत करवा कर हस्तान्तरित कर सकते हैं।  उन्हें रोकने के लिए तो आप को न्यायालय की शरण लेनी ही पड़ेगी।

आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की माता जी के उत्तराधिकारी, आप आप के भाई और बहिन तथा आप के पिता हैं। इस तरह आज की तिथि में माताजी की वह संपत्ति एक अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है। इस संपत्ति के बँटवारे के लिए कोई भी एक हिस्सेदार दीवानी वाद संस्थित कर सकता है।

सबसे बेहतर तो यही है कि आप या कोई भी अन्य हिस्सेदार उक्त संपत्ति के विभाजन और अपने हिस्से का पृथक कब्जा प्राप्त करने का दावा दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करे। उस के साथ ही संपति को पिता द्वारा खुर्द बुर्द करने की संभावना के आधार पर उसी दावे में अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर इस आशय की अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करा ले कि विभाजन का वाद निर्णीत होने तक पिता उस संपत्ति या उस का कोई भी भाग खुर्द बुर्द न करें। इस के सिवा अन्य कोई उपाय पिता को रोकने का नहीं है।

समस्या-

मोहम्मद दानिश खान ने मानिकपुर, तहसील कुन्दा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा जी का देहांत 1953 को हुआ है, मेरे पिताजी 2 भाई और एक बहिन हैं। मेरे दादा जी का पैतृक मकान है, जिसका कुछ भाग मेरे चाचा के लड़कों ने सिर्फ़ स्टांप पेपर के ज़रिये बेच दिया है। जिसे किराएदार बनवा रहा है। मेरी फूफी की मौत हो चुकी है, उनकी लड़की ने अपने हिस्से के लिए मुक़दमा दायर किया है। क्या उन्हें हिस्सा मिलेगा? क्या मेरी फूफी की बेटी स्टे ले सकती है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि हम किस तरह अर्जेंट्ली स्टे ले सकते हैं। मेरे पिता जी ने अपना हिस्सा न्ही बेचा है। अभी तक बँटवारा भी क़ानूनी तौर पे नहीं हुआ था, फिर भी मेरे चाचा के लड़कों ने कुल मकान का 1/2 भाग बेच दिया है।

समाधान-

आप एक मुस्लिम हैं, आप का दाय मुस्लिम विधि के अनुसार तय होगा। आपके दादाजी की मृत्यु के उपरान्त आप के पिता, चाचा और फूफी तीनों का उन की संपत्ति पर अधिकार है। पुत्री का हिस्सा पुत्रों के हिस्से से आधा होता है, यह कहा जा सकता है कि पुत्री का 1 हिस्सा होता है तो पुत्रों के 2-2 हिस्से होते हैं।

इस गणना के अनुसार आप के पिता व चाचा को संपत्ति के 2/5-2/5 हिस्से पर अधिकार है और 1/5 हिस्से पर फूफी का अधिकार है। इस तरह चाचा का अधिकार संपत्ति के ½ हिस्से पर नहीं है। उसने यदि ½ हिस्सा बेच दिया है तो वह उसके हिस्से से अधिक है और अवैधानिक है।

यदि आप की फूफी ने बंटवारे का दावा किया है तो उन्हें तुरन्त उसी दावे में मकान में निर्माण कार्य को रुकवाने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर निर्माण कार्य रुकवाना चाहिए। यह तुरन्त हो सकता है। बंटवारे के उसी दावे में आप के पिता भी पक्षकार हैं तो वे फूफी के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं या खुद भी उसी दावे में अलग से स्टे के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्ततु कर सकते हैं।

समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

पुश्तैनी संपत्ति में हिस्से का दावा

January 11, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

विक्रान्त सिंह ने इटावा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे गांव में हमारा पुस्तैनी घर है। चूँकि हमारे बाबा शहर रहने लगे तो गंव वाले घर और खेती पर ध्यान ही नहीं दिया। अब बाबा और पिताजी के गुजरने के बाद हम अपने गांव के घर पर दावा करना चाहते हैं। लेकिन हमारे पास उस घर और खेती के कोई दस्तावेज़ भी नहीं हैं और जो परिवार के लोग है वहां हैं वो लोग कोई हेल्प नहीं कर रहे। उन्होंने उन सब पर कब्ज़ा कर रखा है। कृपया उचित सलाह दें कैसे हम उस घर और खेती को वापस पा सकते हैं।

समाधान-

आम तौर पर जिस स्थायी संपत्ति पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो गया हो और किसी ने इस अवधि में उस पर अपना मालिकाना हक का दावा न किया हो तो उस संपत्ति पर कब्जेदार का प्रतिकूल कब्जा हो जाता है। कब्जा प्राप्त करने का दावा करने की अवधि  आप से कब्जा छिनने से 12 वर्ष की अवधि होने के कारण इस प्रतिकूल कब्जे को वापस लेना संभव नहीं होता। लेकिन यदि संपत्ति पुश्तैनी हो जिस का विभाजन न हुआ हो और परिवार का ही कोई हिस्सेदार उस संपत्ति पर काबिज हो तो यह माना जाता है कि संपत्ति के सभी हिस्सेदारों का उस पर कब्जा है और कोई भी हिस्सेदार उस संपत्ति पर अपने हिस्से को अलग कराने के लिए वाद संस्थित कर सकता है।

 आप अपनी संपत्ति  को पुस्तैनी बता रहे हैं इस कारण आप का उस में हिस्सा हो सकता है। आपने खेती की जमीन का उल्लेख किया है। खेती की जमीन के सभी रिकार्डिस आजकल ऑनलाइन देखे जा सकते हैं।  आप पहले पता कीजिए कि आप के परिवार के अन्य लोग जिन्हों ने खेती और  मकान पर कब्जा कर रखा है वे किन खसरा नंबरों की जमीन पर काबिज हैं। फिर उन खसरा नंबरों को रिकार्ड में तलाश कीजिए।इस से पता लग जाएगा कि वे जमीनें किस किस के नाम हैं। बाद में उन खसरा नंबरों का उस वक्त का रिकार्ड तहसील या आप के गाँव की तहसील के रिकार्डरूम में जा कर तलाश कीजिएगा। इस संबंध में उस तहसील में काम करने वाले राजस्व मामलों के वकील और उन के मुंशी  आप की मदद कर सकते हैं।

एक बार आप को यह पता लग जाए कि आप की जमीन पूर्व में आप के किस पूर्वज के नाम थी और आप के बाबा का उस में क्या हिस्सा था। तब आप अपने बाबा के वंशज होने के आधार पर जमीन के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं, उसी के आधार पर मकान में अपने हिस्से के लिए मकान के बंटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। यही आप के लिए तथा आप जैसे लोगों के लिए एक मात्र रास्ता है।

हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।


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